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अपना घर ठीक कीजिए, हिंदी आपको दुआएं देगी...

इन दिनों राष्ट्रभाषा हिंदी के बारे में अनेक स्तरों पर जानकार विलाप करते नज़र आते हैं। अगर उनकी बात को गंभीरता से लिया जाए तो लगता है...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

राजेश बादल

हिंदी के लिए करिश्मा उस माध्यम ने किया, जिसे कभी बुद्धू बक्सा कहा गया

तब के हिन्दुस्तान में हिंदी के पंडित थे ही कितने? राज काज की भाषा उर्दू थी और उस पर फारसी का असर था। हिंदी का परिष्कार और प्रयोग तो पिछली सदी में ही पनपा और विकसित हुआ है। गुलाम भारत में भी हिंदी कभी जन जन की भाषा नहीं रही। अलबत्ता यह अवश्य महसूस किया जाने लगा था कि अगर किसी भाषा में हिन्दुस्तान की संपर्क भाषा बनने की संभावना है तो वो हिंदी ही है। भोजपुरी, अवधी, बृज, बुंदेली, बघेली, मालवी, निमाड़ी, छत्तीसगढ़ी और राजस्थान की अनेक बोलियों की छोटी छोटी नदियों ने आपस में मिलकर हिंदी की गंगा बहाई। संस्कृत का मूल आधार तो था ही। इसके बाद उर्दू और अंग्रेजी ने भी हिंदी के अनुष्ठान में अपनी अपनी आहुतियां समर्पित कीं। अगर आप डेढ़-दो सौ साल की हिंदी-यात्रा देखें तो पाते हैं कि शुरुआती दौर की हिंदी आभिजात्य वर्ग के लिए थी। कठिन और संस्कृतनिष्ठ। आज के बच्चे अगर पढ़ें तो शायद उसे हिंदी ही न माने।

जरा याद कीजिए उस दौर के हिन्दुस्तान में अभिव्यक्ति के माध्यम कितने थे? सिर्फ़ एक माध्यम था और वो था मुद्रित माध्यम। किताबों और समाचार पत्र पत्रिकाओं के जरिए उस काल में हिंदी लोगों तक पहुंचती थी। साक्षरता का प्रतिशत कम था। इसलिए लिखा गया साहित्य आम आदमी तक आसानी से पहुंचाना मुश्किल काम था। मगर आजादी के आंदोलन में हिंदी अभिव्यक्ति का एक बड़ा जरिया बन चुकी थी। कहा जा सकता है कि पूरे देश को आजादी के लिए एकजुट करने में हिंदी की बड़ी भूमिका थी। जो भाषा हजारों में लिखी जाती थी और लाखों में बोली जाती थी, वो करोड़ों की भाषा बन गई थी।

मैं इस लेख को आंकड़ों से भरकर उबाऊ और बोझिल नहीं बनाना चाहता। पाठक तमाम स्रोतों से इन्हें हासिल कर सकते हैं। आशय सिर्फ यह है कि हम हिंदी के विस्तार और प्रसार के नजरिए से आगे ही गए हैं। पीछे नहीं लौटे। मिसाल के तौर पर  पत्र-पत्रिकाओं को देख लीजिए। आजादी मिलने के समय हिंदी की मैगजीन और अखबार कितने थे? आप सौ तक की गिनती में समेट सकते थे। आज यह संख्या हजारों में है। समाचारपत्रों का हिसाब किताब देखने के लिए एक भारी भरकम विभाग तैनात है। जिन अखबारों की प्रसार संख्या तीस -चालीस बरस पहले कुछ लाख होती थी, आज वो करोड़ों में जा पहुंची है। जाहिर है इन्हें पढ़ने वाले पेड़ पौधे अथवा मवेशी नहीं हैं? फिर कौन हैं जो हिंदी के मुद्रित प्रकाशनों की तादाद बढ़ाते जा रहे हैं। सिर्फ प्रकाशनों की नफ़री ही नहीं बढ़ रही, उनके क़ारोबार के ग्राफ़ में भी जबरदस्त उछाल आया है। दुनिया का कौन सा देश छूटा है, जहां हिंदी की किताबें नहीं मिलतीं। भारत के आधा दर्जन से ज़्यादा प्रकाशकों के विदेशों में अपनी किताबों के शो रूम हैं। हिन्दुस्तान में आज भी पचास फीसदी विश्वविद्यालय हिंदी नहीं पढ़ाते और दुनिया भर में पचास से ज़्यादा विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है। इसका क्या अर्थ निकाला जाए।

हिंदी के लिए करिश्मा तो उस माध्यम ने किया, जिसे किसी जमाने में बुद्धू बक्सा कहा गया था और जिसके भारत में प्रवेश का भरपूर विरोध हुआ था। यह माध्यम है टेलिविजन। करीब करीब तीस साल से टेलिविजन भारत में घर परिवार का सदस्य बन गया है। बेशक आज के भारत में सभी भारतीय भाषाओं में छोटे परदे ने अपनी घुसपैठ की है लेकिन सबसे आगे तो हिंदी ही है। खबरिया हों या मनोरंजन चैनल-हिंदी के दर्शक सबसे आगे की कतार में बैठे हैं। यही नहीं, अहिंदी भाषी प्रदेशों में भी हिंदी के चैनल, हिंदी के गाने और धारावाहिक उतनी ही दिलचस्पी से देखे जाते हैं, जितने उन प्रदेशों की अपनी भाषा के चैनल। एक अनुमान के मुताबिक छोटे परदे ने पैंतीस बरस में करीब पंद्रह करोड़ लोगों को हिंदी का जानकार बना दिया है। जब अहिंदी भाषी राज्यों के लोगों को राष्ट्रीय महत्त्व की कोई भी सूचना लेनी होती है और उन्हें अपनी भाषा के चैनल पर नहीं मिलती तो वे तुरंत हिंदी के चैनलों की शरण लेते हैं। बरसों से यह क्रम  चल रहा है। इस वजह से वो हिंदी समझने और बोलने भी लगे हैं।

फिर आज के दौर में हिंदी के सामने चुनौतियों की बात क्यों की जाती है? क्यों भाषाविद् और पंडित छाती कूटते नजर आते हैं। अगर देश -विदेश में हिंदी जानने वाले लोग बढ़ रहे हैं, कारोबार बढ़ रहा है, पैसा भी कमाया जा रहा है तो फिर चिंता करने वाले कौन हैं? इसका उत्तर वास्तव में हमारे घरों में मौजूद है। चिंता का कारण हिंदी का सिकुड़ना नहीं, बल्कि उसके स्वाद में हो रही मिलावट है। हम लोग रेडियो पर पुराने हिंदी गाने सुनकर झूमने लगते हैं लेकिन जब बेटा या बेटी आकर उसे बंद कर अंग्रेजी के गाने सुनने लगता है तो हमें लगता है ये लोग अपनी मातृभाषा से प्यार नहीं करते या इन्हें हिंदी क्यों अच्छी नहीं लगती। जब आप बाजार जाते हैं, पुस्तक मेलों में जाते हैं तो आप प्रेमचंद, वृन्दावनलाल वर्मा और धर्मवीर भारती की किताबें देखने रुक जाते हैं और आपके बच्चे अंग्रेजी की किताबें खरीद कर उसका बिल ले रहे होते हैं। आप हैरानी से और कुछ बेगानेपन से बच्चों को घूरते हैं। आप टेलिविजन पर कोई हिंदी का सीरियल या गाना देखना चाहते हैं तो आपका बच्चा रिमोट आपके हाथ से लेकर चैनल बदल देता है। आप देखते रह जाते हैं। आप बच्चों के साथ हिंदी फिल्म देखना चाहते हैं और बच्चे आपके सामने अंग्रेजी फिल्म का प्रस्ताव रख देते हैं। आप जैसे तैसे सिनेमा जाते भी हैं तो फिल्म की भाषा आपके ऊपर से निकल जाती है। बच्चे फिल्म के डायलॉग पर झूमते हैं, गानों पर खुद भी गाते हैं और आप बच्चों को विदेशियों की तरह देखते हैं।

दरअसल ये उदाहरण आपको अटपटे लग सकते हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि हमारी मानसिकता में ये नमूने घुल मिल गए हैं।दिन में दस बार हम राष्ट्रभाषा का तिरस्कार होते अपनों के बीच देखते हैं और चूं तक नहीं करते। इस दुर्दशा पर अब तो आह या ठंडी सांस भी नहीं निकलती। हमारे स्कूलों में शुद्ध हिंदी के जानकार शिक्षक नहीं मिलते। उनकी व्याकरण कमजोर है। कॉलेजों में हिंदी के प्राध्यापक स्तरीय नहीं हैं। आधे से ज़्यादा यूनिवर्सिटीज में हिंदी नहीं पढ़ाई जाती। शिक्षक ठेके पर रखे जाते हैं। उन्हें एक एक पीरियड के हिसाब से पैसे मिलते हैं। ऐसे में ज्ञानवान लोग आपको कहाँ से मिलेंगे? क्या आप अपने बच्चे को हिंदी शिक्षक बनाना चाहेंगे? मैं जानता हूं। आपका उत्तर न में होगा।

 

 




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