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'अमर उजाला' की वर्कशाप में प्रमोद जोशी ने दिए बेहतर खबरें लिखने के टिप्‍स...

हिंदी दैनिक 'अमर उजाला' ने पिछले दिनों अपने हेल्‍थ रिपोर्टरों के लिए एक वर्कशॉप का आयोजन किया...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

समाचार4मीडिया।।

हिंदी दैनिक 'अमर उजाला' ने पिछले दिनों अपने हेल्‍थ रिपोर्टरों के लिए एक वर्कशॉप का आयोजन किया। दिल्‍ली के एक होटल में आयोजित वर्कशॉप में ग्रुप की ज्‍यादातर यूनिटों से हेल्‍थ रिपोर्टर शामिल हुए।

कार्यक्रम में वक्‍ता के तौर पर वरिष्‍ठ पत्रकार प्रमोद जोशी ने रिपोर्टरों को बेहतर खबर लिखने के गुर भी बताए। उन्‍होंने कहा कि 'अमिताभ बच्‍चन को ठंड लगी' और 'राज ठाकरे की पत्‍नी को कुत्‍ते ने काटा' जैसी खबरों के अलावा कई पॉजिटिव खबरें भी होती हैं लेकिन मीडिया द्वारा उन पर ध्‍यान न देने से वे दब जाती हैं।


प्रमोद जोशी का कहना था कि एक पत्रकार की समाज में बहुत अहम भूमिका होती है। उसका काम लोगों के दुख-दर्द को उठाना है, ताकि संबंधित विभागों अथवा अधिकारियों तक जनता की आवाज पहुंचे और लोगों की समस्‍याओं का समाधान हो सके। विजुअल के जरिए यह दिखाते हुए कि एक युवती नदी में डूब रही है जबकि पत्रकार उसे बचाने के बजाय बाइट लेने में व्‍यस्‍त हैं, प्रमोद जोशी ने कहा कि पत्रकार जनता के हमदर्द होते हैं, दूरदर्शक नहीं। ऐसे में जनता की आवाज को जरूर उठाना चाहिए न कि दूर से तमाशा देखना चाहिए।

प्रमोद जोशी का कहना था कि लोगों को तीन तरह की सूचनाएं मिलती हैं जैसे- प्रचार, अफवाह अथवा खबर। ऐसे में एक पत्रकार का कर्तव्‍य होता है कि वह सच का पता लगाकर लोगों तक खबर पहुंचाए ताकि जनता जागरूक हो सके और किसी तरह की अफवाह में आने से बच सके। खबर ऐसी नहीं होनी चाहिए कि वह दूसरों का प्रचार बनकर रह जाए अथवा अफवाह को भी तूल नहीं देना चाहिए। खबर को खबर के तौर पर लोगों को परोसना चाहिए। खबर से मतलब उस सूचना से है जो उपयोगी, सार्वजनिक दिलचस्‍पी से जुड़ी, विचारोत्‍तेजक, ज्ञानवर्धक, रोचक और मनोरंजक हो। इसके अलावा इसमें सामाजिक उपयोगिता भी होनी चाहिए। दरअसल, समाज में दो तरह के लोग होते हैं। एक बा-खबर यानी उसे खबरों के बारे में जानकारी होती है जबकि दूसरी तरह के लोग बेखबर होते हैं। दोनों का अंतर पत्रकार को पता होना चाहिए और बेखबर लोगों को खबरों से रूबरू करना चाहिए।

उन्‍होंने कहा कि हालांकि प्रचार और अफवाह दोनों को फैलाने के लिए भी खास तरह के कौशल की जरूरत है लेकिन हमारी दिलचस्‍पी उनसे बचकर काम करने में है क्‍योंकि खबर मायने सूचना तो है पर वह अफवाह और प्रचार नहीं है। वह रोचक और मनोरंजक भी हो सकती है लेकिन अफीम के नशे की तरह नहीं। हमें इन दोनों बातों से बचना होगा।


उनका कहना था कि स्‍वास्‍थ्‍य की रिपोर्टिंग करने में विशेष ध्‍यान देने की जरूरत है क्‍योंकि यह मसला कई तरह की वैज्ञानिक जानकारियों से भी जुड़ा है। हेल्‍थ रिपोर्टर के सामने इन्‍हें ठीक से समझने की जरूरत है और असानी से लोगों को समझाने की चुनौती भी है। जाहिर है लोगों का ध्‍यान आकर्षित करने के लिए इन खबरों को रोचक बनाने की जरूरत होगी लेकिन रोचक का मतलब चटपटा मसालेदार नहीं है और हेल्‍थ रिपोर्टर को ऐसी चीजों का ध्‍यान रखना होगा।

स्‍वास्‍थ्‍य की खबरों में कई तरह की वैज्ञानिक शब्‍दावली का इस्‍तेमाल होता है। ऐसे में प्रत्‍येक पाठक के लिए इस तरह की खबरों को समझना मुश्किल होता है। हेल्‍थ की खबरें लिखते समय पत्रकारों को ऐसी भाषा का इस्‍तेमाल करना होगा जो लोगों की समझ में आसानी से आ जाए।

प्रमोद जोशी का कहना था कि पत्रकारों को समय की कमी के साथ प्रतियोगिता का सामना भी करना पड़ता है। शब्‍दाबली की मुश्किलें, स्रोतों को खोजने में परेशानी और संपादकों का समझाना भी काफी बड़ी चुनौती होती है। पत्रकारों के सामने आने वाली दिक्‍कतों का जिक्र करते हुए उन्‍होंने कहा कि मीडिया में तेज गति से काम होता है, ऐसे में उसकी पुष्टि करने में समय लग जाता है। वहीं, मीडिया के विभिन्‍न रूपों की चुनौतियां भी अलग-अलग हैं। स्‍वतंत्र विशेषज्ञों को खेजना भी आसान नहीं है। ऐसे में इंटरनेट काफी मददगार साबित हो सकता है।

पत्रकारों की सुविधा के लिए उन्‍होंने कई वेबसाइट भी बताईं ताकि इंटरनेट से विषय संबंधित सामग्री जुटाने में परेशानी न हो और खबर छापने अथवा दिखाने पहले उसकी पुष्टि की जा सके।

स्‍वास्‍थ्‍य और परिवार कल्‍याण : https://mohfw.gov.in/

यूनिसेफ इंडिया :  unicef.in/

विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन : www.who.int/

डब्‍ल्‍यूएचओ की टीकाकरण के नियमन से जुड़ी वेबसाइट : www.who.int/immunization_standards/vaccine_regulation/en/

टीके का इतिहास : https://www.historyofvaccines.org/hindi

उन्‍होंने बताया कि डब्‍ल्‍यएचओ, वर्ल्‍ड बैंक और यूनिसेफ के अलावा कुछ लिंक और हैं जो खबर लिखते समय अथवा उसकी पुष्टि करते समय काफी मददगार साबित होंगे।

संसद : https://india.gov.in/my-government/indian-parliament

आखिर में उन्‍होंने रिपोर्टरों को तथ्‍य आधारित पत्रकारिता के लिए पांच सूत्र दिए।

इनमें सबसे पहले उनका कहना था कि अपने सोर्स अथवा संपर्कों का विकास करें। अपने डोमेन यानी विषय की जानकारी बढ़ाएं। डेटा का मतलब समझें और उसे हासिल करने वाले औजारों को समझें। अपना अलग से डेटा बनाएं। मसलन, आप अपने जिले, शहर या प्रांत का डेटा तैयार करें और उसकी तुलना पुराने डाटा से या दूसरे इलाकों से करें। इससे आप अपने निष्‍कर्ष निकाल सकेंगे। इसके अलावा अपनी रिपोर्ट में डेटा का सहारा लें या वैल्‍यू एडिशन में उसकी मदद लें।

 


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