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समाचार4मीडिया.कॉम का गोलमेज सम्मेलन

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समाचार4मीडिया ब्यूरो 10 years ago

 

 

मीडिया प्लानर, टीवी न्यूज़ चैनल और एडवरटाइजर्स हिंदी मीडिया के

उज्ज्वल भविष्य को लेकर आशान्वित

"आने वाला दशक हिंदी का ही होगा”

 

 

एक्सचेंज4मीडिया समूह के नए उपक्रम समाचार4मीडिया.कॉम ने  नई दिल्ली  स्थित इंडियन इस्लामिक कल्चरल सेंटर में “भारत में हिंदी मीडिया का भविष्य” विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन किया। इस परिचर्चा में हिन्दुस्तान, कादम्बिनी और नंदन के मुख्य संपादक शशि शेखर, दिल्ली प्रेस के ग्रुप एडिटर-इन-चीफ़ परेश नाथ, आउटलुक ग्रुप के प्रकाशक एवं प्रेसिडेंट महेश्वर पेरी, दैनिक भास्कर के समूह संपादक श्रवण गर्ग, भारती एयरटेल के मीडिया प्रमुख अरुण शर्मा, जेनिथ-ऑप्टीमीडिया के सीईओ सत्यजीत सेन, एनडीटीवी इंडिया के प्रबंध संपादक अनिंदो चक्रवर्ती तथा एनडीटीवी इंडिया के सीईओ समीर कपूर ने भाग लिया।

एक्सचेंज4मीडिया की डिप्टी एडिटर नूर फातिमा वारसिया ने परिचर्चा के प्रतिभागियों के परिचय से मीडिया राउंड टेबल की चर्चा का शुभारम्भ किया। एक्सचेंज4मीडिया के समूह संपादक और इंपैक्ट पत्रिका के संपादक प्रद्युम्न माहेश्वरी तथा समाचार4मीडिया.कॉम के संपादक पीके खुराना ने परिचर्चा का संचालन किया।

सभी प्रतिभागियों ने हिंदी व अंग्रेजी मीडिया के बीच बढ़ रही दूरी पर चिंता व्यक्त की, लेकिन हिंदुस्तान के मुख्य संपादक शशि शेखर ने यह कह कर कि हिंदी वाले लोग खुद को बेचारा न समझें, हिंदी संसार में तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है तथा हिंदी पत्रकारिता का क्षेत्र बहुत बड़ा है, आशा का दीप जलाये रखा।

दैनिक भास्कर के समूह संपादक श्रवण गर्ग ने कहा,  “देश के पहले 12 अखबारों में अंग्रेजी के टाइम्स ऑफ इंडिया का स्थान 11 वां है। शुरू के चार बड़े अखबार हिंदी भाषा के ही हैं। दैनिक भास्कर का आईपीओ 40 गुणा अधिक सबस्क्राइब हुआ, जबकि यह क्षेत्रीय अखबार है। अगर बॉलीवुड में हिंदी की फिल्में बनती और सफल होती हैं तो हिंदी अखबार सफल क्यों नहीं हो सकते?”

चर्चा को आगे बढ़ाते हुए दिल्ली प्रेस के ग्रुप एडिटर-इन-चीफ़ परेश नाथ ने कहा “अंग्रेजी अखबारों और पत्रिकाओं का मूल्य हिंदी अखबारों और पत्रिकाओं की अपेक्षा काफी कम है। यहां तक कि बिजनेस इंडिया मैगजीन जिसके पाठक कंपनी के सीईओ और नामी उद्योगपति हैं, उसका मूल्य सिर्फ 15 रुपये है। ज़्यादातर अंग्रेजी के अखबार और पत्रिकाएं अपना मूल्य बढ़ाने से परहेज करते हैं। दूसरी ओर, सरिता का उदाहरण हमारे सामने है।  पत्रिका के लांच के समय, यानी सन 1945 में भी सरिता का मूल्य हमने 1 रुपया रखा था जो आज भी अच्छे दाम पर बिक रही है।”

परेश नाथ ने एक और संवेदनशील मुद्दा उठाते हुए कहा, “पेड न्यूज पर ज्यादा शोर-शराबा इसलिए हुआ क्योंकि इस बार लाभ हिंदी अखबारो को मिला, जबकि अंग्रेजी अखबार तो पहले से ही पेड कंटेंट दे रहे हैं। यह शोर सब दिखावा है, शोर मचाने वाले इन्हीं लोगों ने पेड कंटेंट की रवायत शरू की। देश की 80% जनता हिंदी पढ़ती है, नेता जानते हैं कि अगर चुनाव जीतना है तो हिंदी अखबारों में विज्ञापन देना ही होगा”।
 
हिन्दुस्तान, कादम्बिनी और नंदन के मुख्य संपादक शशि शेखर भी एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू लेकर सामने आये। उनका कहना था, “बिहार का आदमी कलकत्ता या मुंबई में तो विज्ञापन पर खर्च करता है, पर अगर वह स्थानीय स्तर पर विज्ञापन देता है तो गुंडों का फोन आना शुरू हो जाता है,” परन्तु हिंदी की ताकत के बारे में वे बहुत आशान्वित दिखे. उन्होंने कहा, “कुछ दिन पहले मैंने तमिलनाडु में एक ऑटो वाले से हिंदी में बात की, आप समझ सकते हैं कि हिंदी का कितना तेजी से प्रसार हो रहा है। दैनिक भास्कर के पंजाब में जाने के बाद हिंदी मीडिया में काफी परिवर्तन हुए हैं।”
 
उन्होंने आगे कहा, “समाचार4मीडिया से हमें काफी उम्मींदे हैं। 1828 के आसपास जो भी अखबार निकले वे सारे आज के ब्लॉग की तरह थे। तब अख़बार भी अभद्र भाषा से शुरू हो कर अभद्र भाषा पर ख़त्म हो जाते थे। भारत का पहला समाचारपत्र हिक्की गज़ट भी एक अंग्रेज़ ने तत्कालीन गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स से नाराज होकर निकाला था। उस अख़बार का उद्देश्य जनता को शिक्षित -सूचित करना नहीं था। आज अभी ब्लॉग उसी दौर से गुज़र रहे है। कुछ ब्लॉग जो अभी चल रहे हैं उनकी भाषा में सिर्फ गालियों का ही इस्तेमाल होता है। समय के साथ उनमें बदलाव आयेगा। समाचार4मीडिया इस परिवर्तन का नेतृत्व करेगा, इसीलिए मैं कहता हूँ कि समाचार4मीडिया से हमें काफी उम्मींदे हैं।”
 
परेश नाथ ने भी चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा, “जो भी पाठक आ रहे हैं वे सभी भारतीय भाषाओं में आ रहे हैं। जैसे–जैसे भारत में शिक्षा का प्रसार बढ़ेगा वैसे-वैसे ही इनके पाठकों की संख्या में वृद्धि होगी। उदाहरण के लिए अंग्रेजी वाले कहते हैं कि हमारे पास पैसे हैं लेकिन पाठक उतने नहीं है। अंग्रेजी के ज़्यादातर पत्रकारों की भाषा शैली ब्लॉग की भाषा शैली है, जिसका न कोई व्याकरण है, न कोई सही भाषा। अगर हिंदी वाले अपनी व्याकरण, शैली और भाषा पर ध्यान दें तो कोई कारण नहीं है कि हम आगे नहीं बढ़ पायें।”
 
भारती एयरटेल के मीडिया प्रमुख अरुण शर्मा ने विज्ञापनदाताओं का पक्ष रखते हुए कहा “जो बिकता है, वह टिकता है। अगर बॉलीवुड की फिल्में अच्छा बिजनेस करती हैं तो कोई आश्चर्य नहीं कि हिंदी समाचारपत्र और पत्रिकाएं भी अच्छा बिजनेस करें।”  
 
परेश नाथ  का कहना था, “हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाएं किसी से कम नहीं हैं। फर्क सिर्फ यह है कि विज्ञापन देने वाला मीडिया प्लानर और एडवरटाइजर हिंदी नहीं पढ़ता, अंग्रेजी पढ़ा-लिखा वर्ग विज्ञापनों पर कब्जा किए बैठा है। उसके कारण भारतीय पत्रकारिता में ब्राह्यणवादी व्यवस्था कायम हो गयी है। अंग्रेजी वाले ब्राह्मण हो गए हैं और हिंदी वालों को अछूत माना जाने लगा है, जबकि असलियत यह है कि हिंदी पाठकवर्ग कहीं ज्यादा बड़ा है और हिंदी की पत्रिकाएं ज्यादा बड़ी भूमिका निभा रही हैं। हमारे समूह की पत्रिकाओं ने लगातार यह सिद्ध किया है। हमारी पत्रिकाओं की कीमत ज्यादा होने पर भी उच्च स्तरीय सम्पादकीय सामग्री के कारण उन्हें पाठकों का प्यार मिल रहा है।”
 
महेश्वर पेरी ने कहा, “जब आउटलुक में आरुषि मर्डर केस  या राखी सावंत की स्टोरी आती थी तो आउटलुक की बिक्री बढ़ जाती थी, लेकिन हम ऐसी स्टोरी नहीं करना चाहते थे, यही कारण है कि हमें आउटलुक पत्रिका को साप्ताहिक से मासिक करना पड़ा। कॅरियर 360 डिग्री अच्छा बिज़नेस कर रहा है, हम उसे नियमित रूप से प्रकाशित कर रहे हैं।”
 
भारती एयरटेल के मीडिया प्रमुख अरुण शर्मा का कहना था, “पिछला दशक मेट्रो शहरों का था, आने वाला दशक छोटे-छोटे शहरों का है। कुछ समाचारपत्र जो अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में प्रकाशित होते हैं उनके हिंदी संस्करण इसलिए निराश करते हैं कि वे अपने अंग्रेजी संस्करण का अनुवाद मात्र होते हैं, उनमें मौलिक कुछ नहीं होता, यहाँ तक कि कुछ में तो अनुवाद भी बढ़िया नहीं होता। पाँच साल पहले स्टार वर्ल्ड का अच्छा बिजनेस था, लेकिन आज मार्केट कलर्स का है। आज हिंदी जनरल एंटरटेनमेंट का जमाना है, यह केस स्टडी का विषय है कि मलयाला मनोरमा ने किस तरह केरल के गाँव-गाँव में अपनी पहुंच बनायी और सन टीवी ने दक्षिण के राज्यों में अपना ग्रोथ कैसे किया। हमें अब छोटे-छोटे शहरों की तरफ ध्यान देना होगा, अब सारा विकास ग्रामीण क्षेत्रों की ओर हो रहा है। आप दैनिक भास्कर को देख सकते हैं, हिंदी सहित सभी क्षेत्रीय अखबार काफी विकास कर रहे हैं। अब हिंदी समाचारपत्र का जमाना है लेकिन हमें समाचारपत्र की क्वालिटी पर ध्यान देना होगा, अच्छी मार्केटिंग करनी होगी। यह ख़ुशी की बात है कि अब हिंदी में जो नये लोग आ रहे हैं उनके पास एक विजन है, मार्केट की समझ हैं।”
 
जेनिथ-ऑप्टीमीडिया के सीईओ सत्यजीत सेन  ने कहा, “छोटे-छोटे शहरों में विकास की नई धारा बह रही है, बिहार में तेजी से अर्थव्यवस्था में सुधार हो रहा है। हिंदी और क्षेत्रीय मीडिया का तेजी से विकास हो रहा है, विकास की गति 10% से अधिक हो रही है।”
 
श्रवण गर्ग ने पूछा, “अगर राखी सावंत  और आरूषि केस से बिक्री होती है तो कादंबिनी और सरिता क्यों बिकती हैं? रेडियो काफी सुना जाता है लेकिन उसमें उतना विज्ञापन नहीं है। बिहार में अगर समाचारपत्र की बिक्री अधिक है तो इसके पीछे कारण है कि वहां के लोगों की पढ़ने में विशेष रुचि है। मेरा अनुभव है कि मुंबई की विज्ञापन एजेंसियों के बने हुए विज्ञापन छोटे शहरों में ज्यादा प्रभावी नहीं होते क्योंकि उनमें स्थानीय फ्लेवर नहीं होता। मुंबई के कॉपी-राइटर को न स्थानीय मुद्दों की समझ होती है न ही स्थानीय आकांक्षाओं की। ऐसे में उनके विज्ञापन नीरस और मशीनी सिद्ध होते हैं जो अपेक्षित प्रभाव पैदा नहीं कर पाते। इसके बजाय इंदौर और भोपाल की छोटी एजेंसियों द्वारा बनाये गए विज्ञापनों से विज्ञपनदाता की बिक्री बढ़ती है। क्योंकि उनमें स्थानीय संस्कृति की झलक मिलती है, लोकल फ्लेवर मिलता है। यही कारण है कि इंदौर और भोपाल में विज्ञापन काफी मिलते हैं।”
 
एनडीटीवी इंडिया के अनिंदो चक्रवर्ती ने कहा, “हिंदी का भविष्य अच्छा है, बस हमें अपने आपको इम्प्रूव करने की जरूरत है, हिंदी में विज्ञापन काफी मिलते हैं। आज भी अच्छे कंटेंट के पाठक और दर्शक हैं। टैम वालों का अपना बिजनेस है, उनका अपना खेल है, कोई भी दूध का धुला नहीं है। इंडिया टीवी कोई प्रोग्राम करता है तो हम उसकी नकल नहीं कर सकते हैं। हमने गलती यह की कि हमने खुद में भरोसा गँवा दिया और आज तक की नकल शुरू कर दी, उधर आज तक ने इंडिया टीवी की बढ़ती रेटिंग से घबरा कर उनकी नकल करनी शुरू कर दी। आज तक की खासियत ब्रेकिंग न्यूज देने की थी और हमारी खासियत इन-डेप्थ अनालिसिस की थी। हम दोनों ने अपनी खूबियों को भुला कर दूसरों की नकल शरू की तो हमें नुकसान हुआ। हमने अपनी गलती सुधार ली है और हमें दर्शकों की उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया मिल रही है। ज़ाहिर है कि हम किसी दूसरे की नकल करेंगे तो न हम एनडीटीवी रह पायेंगे और न इंडिया टीवी बन पायेंगे।”
 
शशि शेखर ने कहा, “13 दिसंबर 2001 को जब संसद में गोलियां चली थीं, तो हमने आज तक में सिर्फ  एक लाइन की न्यूज़ फ्लैश की कि संसद में गोली चली। हमें अलग अलग लोगों पर शक था की गोली उन्होंने चलवाई होगी, पर हमने किसी पर शक प्रकट नहीं किया। हम तथ्यों पर आधारित खबर ही देना चाहते थे। खबर सिर्फ तथ्यों की सूचना है, उसमें अगर कुछ और मिला दिया जाये तो वह खबर नहीं रह जाती, कहानी बन जाती है। ऐसे समय में संपादकों की भूमिका काफी जिम्मेदारी वाली हो जाती है। सही कंटेंट को लेकर कई बार समस्या हो जाती है, टीवी चैनलों को 24 घंटे दर्शकों के साथ जुड़ना होता है। ऐसे ही एक मौके पर एक बार मुंबई में बारिश हुई तो अरुण पुरी जी ने कहा राजकपूर- नरगिस जैसा बारिश का सीन दिखलाओ, देखो कहीं कोई बारिश में युवा वर्ग मस्ती कर रहे हों तो उनका कोई सीन दिखाओ। हमारी एक संवाददाता बारिश में पूरा दिन भीगती रही, लेकिन कहीं कोई युवा जोड़ा बारिश में रोमांस करता नहीं मिला, तो हमने खुद की क्रिएट की हुई स्टोरी दिखाने की कोई कोशिश नहीं की। इन छोटी छोटी बातों से ही विश्वसनीयता बनती है। मेरा यह भी मानना है कि पिछला दशक टीवी का था, आने वाला दशक प्रिंट का है।”
 
शशि शेखर के अनुसार “अंग्रेजी के नामी पत्रकार हैं महेश रंगराजन, लेकिन हिंदी के लिए लिखते हैं। एक बार राजदीप सरदेसाई ने कहा था कि अगर कंटेंट किंग है, तो बाकी लोग क्या करते हैं, गाड़ी के चार पहिए हैं, सबों को एक साथ काम करना होगा, तभी रिजल्ट आएगा। प्रत्येक उपभोक्ता बुद्धिमान है, उसे सही और तथ्यपरख खबरें मिलनी चाहिएं।”
 
श्रवण गर्ग ने कहा, “विश्वसनीयता पर हमें काम करना होगा, बाबरी मस्जिद विध्वंस, कंधार एपिसोड और गुजरात दंगों के दौरान, तथा करगिल की घटनाओं में हमने देखा कि मीडिया कि गलत भूमिका के कारण जान-माल का काफी नुकसान हुआ। इस दौरान मीडिया की भूमिका काफी खतरनाक रही।”
 
अरुण शर्मा  ने कहा, “हम कंपनियों कि समस्या यह है कि बहुत से रिपोर्टर अपने छोटे से लालच के लिए हमें तंग करते हैं। कई लोग तो सीधे-सीधे ब्लैकमेलिंग करते हैं, अगर आप उन्हें विज्ञापन नहीं देते हैं तो वे सीधे ब्लैकमेलिंग पर उतर आते हैं। इस तरह से न रिपोर्टर कि विश्वसनीयता बनेगी ने मीडिया घरानों की।”
 
परिचर्चा में शामिल सभी मेहमानों का आभार प्रकट करते हुए समाचार4मीडिया.कॉम के संपादक पीके खुराना ने परिचर्चा का समापन करते हुए कहा, “इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंदी मीडिया का भविष्य उज्ज्वल है। हिंदी वालों को बेचारगी का नजरिया छोड़ कर स्वयं को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करना होगा, अपनी अलग पहचान बनानी और दिखानी होगी। मुझे उम्मीद ही नहीं पूरा विश्वास भी है कि हिंदी मीडिया के छोटे-बड़े सभी खिलाड़ी अपने उत्तरदायित्व को समझेंगे और विज्ञापनदाताओं के साथ पेशेवर व्यावसायिक प्रतिष्ठान की तरह पेश आयेंगे। मैं आप सब दिग्गजों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने हमें न केवल हिंदी मीडिया के उतार चढ़ावों से अवगत करवाया बल्कि इसके भविष्य का आइना भी दिखाया। मैं आप सब महानुभावों को विश्वास दिलाता हूँ कि जिस प्रकार एक्सचेंज4मीडिया ने निष्पक्ष ख़बरें दे कर अपनी प्रतिष्ठा बनाई है, समाचार4मीडिया.कॉम में भी हम पूरा प्रयास करेंगे कि आपका विश्वास बना रहे।” 


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