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मुफ्त में बटेगा अखबार? कितना हैं तैयार !
<div align=left>समाचार4मीडिया.कॉम ब्यूरो </div> <div>जहां एक ओर प्रिंट इंडस्ट्री में बढ़ती कीमत
समाचार4मीडिया ब्यूरो 10 years ago
समाचार4मीडिया.कॉम ब्यूरो
जहां एक ओर प्रिंट इंडस्ट्री में बढ़ती कीमतों की लड़ाई बढ़ रही है वहीं दूसरी ओर बड़े प्रकाशक समाचारपत्र 1 रुपये में मार्केट में बेच रहे हैं। एक्सचेंज4मीडिया ने फ्री न्यूज़पेपर के मॉडल और भारतीय मार्केट पर पड़ने वाले असर का पता लगाने का प्रयास किया। मुफ्त समाचारपत्र का कॉसेप्ट 1940 से शुरू हुआ। जब कैलीफोर्निया के प्रकाशक वालनट क्रीक ने कॉन्ट्रा कोस्टा टाइम्स नाम के मुफ्त समाचारपत्र की शुरुआत की। हालांकि, भारत में इस तरह की अवधारणा काम नहीं कर सकी। उद्योगजगत के विशेषज्ञों ने अपने विचार व्यक्त किया कि क्या इस तरह का कॉसेप्ट इस देश में काम कर सकता है।
ऐसे समय में, जब भारतीय प्रिंट इंडस्ट्री तेजी से विज्ञापन पर निर्भर होती जा रही है और कवर मूल्य से राजस्व कम होता जा रहा है. निकट भविष्य में देश में क्या समाचारपत्र को मुफ्त में उपलब्ध कराने की योजना है। यह सोचने का समय है।
एक्सचेंज4मीडिया से हाल ही में बात करते हुए मेल टुडे के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर सुरेश बालाकृष्ण ने कहा कि शानदार ढ़ंग से और अच्छी तरह से उत्पादित एवं काफी शोध के बाद 1 या 2 रुपये में समाचारपत्र को पाना हास्यासपद लगता है। समाचारपत्र तेजी से विज्ञापन पर निर्भर होते जा रहे हैं। अधिकांश समाचारपत्रों में अनुपात 95:5 का है। जहां 95 प्रतिशत राजस्व विज्ञापन के द्वारा आ रहा है। जिससे विज्ञापन पर ही अधिक से अधिक निर्भरता बढ़ती जा रही है।
टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर राहुल कंसल का कहना था कि आप मुफ्त समाचारपत्र का वितरण कर सकते हैं, जब आप स्थापित नहीं है और मार्केट में नए हैं । लंबे समय में यह रणनीति काम नहीं करेगी जब सर्कुलेशन में वृद्धि होगी। फ्री समाचारपत्र नए समाचारपत्रों को मार्केट में लाने का एक तरीका हो सकता है। भारत में कई समाचारपत्र एक रुपये से भी कम में सबस्क्रिप्शन मूल्य पर दे रहे हैं। वे सर्कुलेशन को बढ़ाकर ही अपने विज्ञापन राजस्व को बढ़ा सकते हैं।”
आउटलुक पब्लिशिंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की पत्रिका आउटलुक के प्रकाशक और प्रेसिडेंट महेश्वर पेरी के अनुसार, फ्री न्यूज़पेपर की रणनीति छोटी अवधि के लिए काम कर सकते हैं, लेकिन अंतत: प्रतियों के लिए मूल्य देना ही होगा। उन्होंने कहा, “फ्री न्यूज़पेपर का कोई विशेष लक्षित पाठक वर्ग नहीं है और प्रसार संख्या में विश्वसनीयता का अभाव होगा। यह सही है कि समाचारपत्रों की विज्ञापन पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। 2009 की आर्थिक मंदी से, समाचारपत्र राजस्व के लिए अन्य विकल्पों को देख रहा है। वे जल्द ही कवर मूल्य को बढ़ाकर विज्ञापनदाताओं पर अपनी निर्भरता कम करेंगे।”
फिर सवाल उठता है कि समाचारपत्रों के बढ़ते प्रतिस्पर्धी माहौल में क्या मूल्य बढ़ाने के लिए जगह बच सकती है। पिछले कुछ सालों में समाचारपत्रों का कवर मूल्य कम होता जा रहा है। ओपन पत्रिका के प्रकाशक आर राजमोहन के अनुसार, पहले से स्थापित समाचारपत्रों के बीच जगह बनाना किसी भी मुफ्त समाचारपत्र के लिए एक चुनौती है। “कवर प्राइस पहले से ही कम है और उपभोक्ता इसको भुगतान करने के लिए तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि किसी भी नए प्लेयर्स के लिए समाचारपत्रों को मुफ्त में कुछ समय बांटने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश करने की जरूरत होगी।”
दिल्ली विश्वविद्यालय में इसी तरह का एक मुफ्त समाचारपत्र बीट है जो पिछले तीन सालों से समय की कसौटी पर खड़ा है। सामाचारपत्र के संपादक, राधिका मारवाह ने कहा, “यह देखना दिलचस्प होगा कि मुफ्त समाचारपत्र को मार्केट कैसे प्रतिक्रिया दे रहा है, जिसका लक्ष्य एक बड़े पाठक समूह तक पहुंचना है। भारत में लोग मुफ्त की चीजों को स्वीकार नहीं करते हैं। अगर इस तरह का समाचारपत्र भारत में आयेगा, तो इसकी विश्वसनीयता पर सदैव सवाल उठाया जायेगा। लेकिन मेरा विश्वास है कि भविष्य में मुफ्त समाचारपत्र का मॉडल कार्य कर सकता है। ”
अब तक, बड़े प्लेयर्स में से किसी ने भी इस तरह की अवधारणा में रूचि नहीं दिखाई है। जबकि, उद्योग जगत के अधिकांश विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की अवधारणा नए प्लेयर्स के लिए मार्केट में पांव पसारने में मदद करेगी लेकिन लंबे समय के लिए उन्हें अपने आप को सर्वाइव करने के लिए समाचारपत्र का मूल्य उपभोक्ताओं से लेना ही होगा। इसके अलावा, मुफ्त समाचारपत्रों के सामने विश्वसनीयता का सवाल भी है।
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