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पत्रकार को पत्रकार ही समझा जाए, फिर चाहे वो पुरुष हो या महिला - शीतल राजपूत
<div><b>सुप्रिया अवस्थी</b></div> <div><b>समाचार4मीडिया.कॉम</b></div> <div>मुझे, कभी खुद किसी तरह के
समाचार4मीडिया ब्यूरो 10 years ago
सुप्रिया अवस्थी
समाचार4मीडिया.कॉम
मुझे, कभी खुद किसी तरह के भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा, फिर चाहे घर की बात हो या कार्यक्षेत्र की। मैं, अपने आप को बेहद खुशनशीब मानती हूं क्योंकि, मेरे कॅरियर के शुरुआती दौर में ही मुझे ऐसे असाइनमेंट करने का मौका मिला जो हर पत्रकार का सपना होते हैं। तकरीबन 8 साल पहले, यानी 2003 में, जब मेरे रिपोर्टिंग कॅरियर को कुछ ही साल हुए थे, मुझे इराक जाकर युद्ध के मैदान से रिपोर्टिंग करने का सौभाग्य हासिल हुआ, जिसके लिए मैं अपने सीनियर और पूरे जी परिवार की शुक्रगुजार हूं। जिन्होंने, कभी मुझे इस बात पर भेदभाव नहीं किया कि मैं एक महिला पत्रकार हूं।
मुझे लगता है कि अब जामाना बहुत बदल गया है। खास तौर पर, महिलाओं के प्रति नजरिया में बहुत सुधार हुआ है। हालांकि, अभी भी काफी स्कोप है। आज महिला पत्रकार खेल, राजनीति और युद्ध जैसे असाइनमेंट कवर करती है, जिन्हें पहले सिर्फ पुरुष पत्रकारों का डोमेन समझा जाता था। महिलाएं संपादकीय पदों पर बनी हुई है और बड़ी ही कुशलता से कार्य निर्वाह कर रही है।
असल में, मैं इस बात में विश्वास ही नहीं करती कि कोई पत्रकार महिला या पुरुष कहलाए। पत्रकार को पत्रकार ही समझा जाए, फिर चाहे वो पुरुष हो या महिला। पिछले, दो सालों में मेरा रोल बदला है। पहले, मैं खुद एक रिपोर्टर थी अब मैं रिपोर्टर्स की पूरी टीम संभालती हूं। कभी-कभी फील्ड में जाना जरूर होता है। हाल में, मैंने अमेरिका के प्रेसिडेंट, बराक ओबामा की भारत यात्रा को कवर किया, जिसमें मुझे काफी मजा आया।
2011 के प्लान – पत्रकारिता के लिए, अपनी कमिटमेंट पर बरकरार रहूं, कुछ अच्छी रिपोर्टस करना चाहूंगी, अपनी टीम को प्रेरित और प्रोत्साहित रखना चाहूंगी, लेखन के जरिए लोगों से और जुड़ना चाहूंगी।
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