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उत्पाद को उत्पाद मानने में बुराई कैसी

<p><b>सुधीश पचौरी, मीडिया विश्लेषक</b></p> <div>बाजारीकरण के दौर में सब कुछ बदल रहा है, तो स्वाभाविक

समाचार4मीडिया ब्यूरो 10 years ago

सुधीश पचौरी, मीडिया विश्लेषक

बाजारीकरण के दौर में सब कुछ बदल रहा है, तो स्वाभाविक है मीडिया भी बदलेगा. वो जमाना गया की बड़े-बड़े लोग धर्मार्थ समाज को जागरूक करने के लिए पत्र-पत्रिकाएं निकाला करते थे. अब पत्र- पत्रिकाएं उत्पाद की श्रेणी में आ गयी हैं. ऐसा हो भी क्यों नहीं? अगर बाजार में बने रहना है तो मुनाफे की फिक्र तो करनी ही होगी. अगर मुनाफा ही नहीं होगा तो फिर अखबार निकलेंगे कैसे? हां इतनी संजीदगी जरूर रखनी है कि मीडिया तेल साबुन बेचने का जरिया तो हो ही सकता है, लेकिन साथ-ही-साथ लोगों को जागरूक करने का जरिया भी है. मीडिया पाठकों को उनके अधिकारों, उनके विकास के तौर तरीकों, उनके हित-अहित के विषय में सजग करता है. इसलिए संजीदगी जरूरी है, क्योंकि यह बौद्धिक उत्पाद है. फिर भी कंटेट कैसा होना चाहिए, यह पाठकों की रुचि-अभिरुचि और उनकी जरूरत पर निर्भर करता है. पाठक वर्ग इतना विस्तृत है कि वे क्या पढ़ना चाहते हैं, इस पर एकमत हो पाना इतना आसान नहीं है. हरेक पाठक अपनी जरूरतों के मुताबिक अखबार में खबरें देखना चाहता है.
 
उसे नीतियों व योजनाओं के साथ, साहित्य, शिक्षा, स्वास्थ्य, कारोबार, खेल, मनोरंजन, बॉलीवुड, हॉलीवुड, टीवी सीरियल सबकी खबरें चाहिए. अब अगर अखबार चलाना है तो ये सब तो देना ही पडेगा. अगर आपके अखबार में ये खबरें नहीं हैं, तो स्वाभाविक है कि आप पाठकों की पसंद नहीं बन पायेंगे. अगर पाठकों की पसंद नहीं बन पाये तो फिर विज्ञापन कैसे मिलेगा? अगर विज्ञापन नहीं है तो फिर अखबार कैसे चलेगा? क्योंकि 16 पेज का अखबार निकालने में 22 रुपये का खर्च आता है.
 
इसीलिए मैंने कहा कि अगर धमार्थ समाज को जागरूक करने के लिए अखबार निकालना चाहते हैं, तो फिर निकालते रहिए. लेकिन बाजार में बने रहने के लिए और अखबार को मुनाफे की पूंजी से संचालित करने के लिए विज्ञापन तो चाहिए ही. विज्ञापन तभी मिलेगा जब प्रसार होगा. इसलिए प्रसार को तो ध्यान में रखना ही होगा, क्योंकि इसके बिना आप अखबार को चला नहीं पायेंगे और चला ही नहीं पायेंगे तो क्या बेहतर, क्या खराब. हां, अगर आप विज्ञापन के दबाव में या अधिक-से-अधिक मुनाफा कमाने के फेर में स्थापित मानदंडों का उल्लंघन करते हैं, तो उसके लिए कानून है. चाहे बड़े अखबार की बात हो या छोटे अखबार की सभी को निकालने में पूंजी की आवश्यक ता होती है और अगर कोई पूंजी लगायेगा तो लाभ का ध्यान रखेगा ही. इसलिए अखबार धंधा है और धंधे को चलाने में पूंजी की आवश्यकता होती है और अगर कोई पूंजी लगायेगा तो लाभ कमायेगा ही.  (संतोष कुमार सिंह से बातचीत पर आधारित)
 प्रभात खबर से साभार
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