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नहीं सुलझ पाए पत्रकारों के खिलाफ अपराधों के अधिकतर मामले: UNESCO

यूनेस्को की महानिदेशक ऑड्री अजूले ने पत्रकारों की सुरक्षा और दंडमुक्ति के खतरे के मुद्दे पर सोमवार को एक रिपोर्ट जारी की है – ‘Safety of Journalists and the Danger of Impunity’.

समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago

दुनिया भर में पत्रकारों के खिलाफ अपराधों के मामलों में महज 13 फीसदी मामले ही सुलझ पाए हैं, जबकि 2020 में दर्ज 87 फीसदी मामले अभी भी अनसुलझे हैं। प्रेस स्वतन्त्रता की रक्षा में अग्रणी भूमिका निभाने वाली यूएन एजेंसी ‘संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन’ (UNESCO) की नई रिपोर्ट में यह बात सामने आई है।

यूनेस्को की महानिदेशक ऑड्री अजूले ने पत्रकारों की सुरक्षा और दंडमुक्ति के खतरे के मुद्दे पर सोमवार को एक रिपोर्ट जारी की है – ‘Safety of Journalists and the Danger of Impunity’. रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2020 में पत्रकारों के खिलाफ अपराधों के मामलों में दंडमुक्ति की दर में मामूली गिरावट आई है। फिर भी दुनिया भर में पत्रकारों के खिलाफ अपराधों के मामलों में महज 13 फीसदी मामले ही सुलझ पाए हैं। वर्ष 2019 में यह दर 12 प्रतिशत और 2018 में 11 फीसदी थी।

हर दो साल में जारी की जाने वाली यह रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2018-19 में विश्व भर में पत्रकारों की हत्या के 156 मामले दर्ज किये गए थे।

रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक दशक में हर चार दिन में एक पत्रकार की मौत हुई है। वर्ष 2018 में 99 मौतें दर्ज की गई थीं जबकि 2019 में 57 पत्रकारों के मारे जाने के मामले सामने आए, जोकि पिछले दस वर्षों में सबसे कम आंकड़ा था। रिपोर्ट में कहा गया है कि सितम्बर 2020 तक 39 पत्रकार अपनी जान गंवा चुके हैं।

पत्रकारिता: एक ‘खतरनाक पेशा’

यह रिपोर्ट सोमवार, 2 नवम्बर को ‘पत्रकारों के खिलाफ दंडमुक्ति का अन्त’ करने के लिये मनाए जाने वाले अंतरराष्ट्रीय दिवस के अवसर पर जारी की गई है।

यूएन एजेंसी के मुताबिक पत्रकारिता अब भी एक खतरनाक पेशा बना हुआ है। पत्रकारों के सामने खतरे अनेक हैं और व्यापक सत्र पर हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंसक संघर्षों से गुज़र रहे देशों के सम्बन्ध में हताहतों में गिरावट आई है। भ्रष्टाचार, मानवाधिकार उल्लंघन, पर्यावरणीय अपराध, तस्करी और राजनैतिक घपलों के मामलों पर रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों पर जानलेवा हमले अन्य देशों में बढ़े हैं।

बता दें कि यह रिपोर्ट हर दूसरे वर्ष यूनेस्को में संचार विकास के लिये अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम (International Programme for the Development of Communication) की अन्तर-सरकारी परिषद को सौंपी जाती है। यूनेस्को के सदस्य देशों के लिये यह वैश्विक घटनाक्रम का जायजा लेने और पत्रकारों की सुरक्षा को बढ़ावा देने व दंडमुक्ति के खिलाफ लड़ाई में चुनौतियों पर चर्चा करने का एक अवसर है।

लैंगिक भिन्नताएं

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि पत्रकारों के खिलाफ हमलों में लैंगिक कारकों की भी भूमिका है। वर्ष 2018-19 में पत्रकारों पर हमलों के अधिकांश दर्ज मामलों में पुरुषों को निशाना बनाया गया। 2019 में 91 फीसदी पीड़ित पुरुष थे, जबकि 2018 में यह संख्या 93 प्रतिशत थी। इसकी एक वजह खतरनाक इलाकों में महिला पत्रकारों का कम संख्या में मौजूद होना बताया गया है, साथ ही कम महिलाओं को राजनैतिक भ्रष्टाचार और संगठित अपराधों जैसे सम्वेदनशील मुद्दों की पड़ताल की जिम्मेदारी सौंपी जाती है।

यूनेस्को के अनुसार व्याप्त रुढ़िवादिता के कारण कभी-कभी महिलाओं को जोखिम भरे इलाको में जाने या कुछ खास मुद्दों पर रिपोर्टिंग से भी रोका जाता है। लेकिन महिला पत्रकारों को ऑनलाइन व ऑफलाइन लिंग-आधारित हमलों का सामना करना पड़ता है जिससे उनकी सुरक्षा के लिये जोखिम पैदा होता है।

ये हमले उत्पीड़न से लेकर, शारीरिक या यौन दुर्व्यवहार, निजी और पहचान जाहिर करने वाली जानकारी को सार्वजनिक करने तक हो सकते हैं।

टीवी व स्थानीय पत्रकारों के लिये बड़ा जोखिम

पिछले वर्षों के अनुरूप रिपोर्ट दर्शाती है कि पीड़ितों में सबसे बड़ा समूह टीवी पत्रकारों का है। 2018 और 2019 में, अपनी जान गंवाने वाले 30 फीसदी (47 मौतें) टीवी पत्रकार थे, जिसके बाद 24 फीसदी रेडियो पत्रकारों और 21 फीसदी अखबारों में काम करने वाले पत्रकार मारे गए।

पिछले वर्षों की तरह अधिकांश पीड़ित स्थानीय स्तर पर काम करने वाले पत्रकार थे – 2018 में 95 स्थानीय पत्रकारों और 2019 में 56 स्थानीय पत्रकारों की जानें गई।

यूएन एजेंसी का कहना है कि पत्रकारों के खिलाफ अपराधों के मामलों में दंडमुक्ति अब भी फैली हुई है, अलबत्ता, 2020 में उसमें मामूली गिरावट आई है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सदस्य देशों से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक दुनिया भर में पत्रकारों के खिलाफ अपराधों के 13 फीसदी मामले सुलझा लिये गए, जबकि 2019 में 12 प्रतिशत और 2018 में 11 फीसदी मामले ही सुलझाए जा सके थे।


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