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सुप्रीम कोर्ट ने Zee-आदित्य बिड़ला विवाद में दिल्ली HC के फैसले का किया समर्थन
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एस्सेल ग्रुप के सिटी नेटवर्क और आदित्य बिड़ला फाइनेंस के बीच 150 करोड़ रुपये के ऋण विवाद की मध्यस्थता को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा
समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago
जी-सोनी विलय को लेकर अभी भी अनिश्चितताएं बनी हुई हैं। वहीं इस बीच जी (Zee) को कथित तौर पर एक और झटका तब लगा, जब सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एस्सेल ग्रुप के सिटी नेटवर्क और आदित्य बिड़ला फाइनेंस के बीच 150 करोड़ रुपये के ऋण विवाद की मध्यस्थता को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजने को कहा गया था।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, कोर्ट ने कहा कि विवाद से जुड़े लोगों को अपनी दलीलें दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा नियुक्त मध्यस्थ (arbitrator) के सामने रखनी चाहिए। भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने सिटी नेटवर्क को मध्यस्थता कार्यवाही में पार्टियों की श्रेणी से हटा दिया क्योंकि यह कंपनी पहले ही दिवालिया हो चुका है।
मार्च 2023 में दिल्ली हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एलएन राव को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया था।
विवाद की जड़ 150 करोड़ रुपये का डिफॉल्ट लोन है, जो 2017 में एक क्रेडिट अरेंजमेंट लेटर के तहत सिटी नेटवर्क्स को दिया गया था, जिसमें जी गारंटर था। कथित तौर पर समझौते के तहत, ब्याज दर को 16% से घटाकर 13% प्रति वर्ष कर दिया गया था, इस शर्त के आधार पर कि बकाया लोन 2018 से पहले 75 करोड़ रुपये तक कम हो जाएगा
आदित्य बिड़ला फाइनेंस का आरोप है कि सिटी टर्म लोन का समय से पहले भुगतान करने में विफल रही और सहमति के अनुसार बकाया राशि को कम करने में भी विफल रही। इसने आगे तर्क दिया कि चूंकि सिटी, जी और उनके मूल एस्सेल समूह की एक ही आर्थिक पहचान थी, इसलिए उन सभी को मध्यस्थता के लिए भेजा जाना चाहिए।
वहीं, जी और एस्सेल ने इस आधार पर इसका विरोध किया कि उन्होंने समझौते में मध्यस्थता खंड पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। हालांकि जी के दावों को दिल्ली हाई कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि असाधारण मामलों में गैर-हस्ताक्षरकर्ता या तीसरे पक्ष को भी उनकी पूर्व सहमति के बिना मध्यस्थता के अधीन किया जा सकता है।
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