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समाज में मीडिया की भूमिका को लेकर इन तीन चीजों का जिक्र जरूरी: उपेंद्र राय

नोएडा के रेडिसन ब्लू होटल में 22 फरवरी को ‘एक्सचेंज4मीडिया’ की ‘न्यूज नेक्स्ट 2020’ कांफ्रेंस का आयोजन किया गया

समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago

नोएडा के रेडिसन ब्लू होटल में 22 फरवरी को ‘एक्सचेंज4मीडिया’ की ‘न्यूज नेक्स्ट 2020’ कांफ्रेंस का आयोजन किया गया। इस दौरान समाज को बदलने में मीडिया की भूमिका पर अपनी बात रखते हुए ‘सहारा न्यूज नेटवर्क’ के सीईओ और एडिटर-इन-चीफ उपेंद्र राय ने कहा कि मीडिया और ट्रांसफेशन की बात की जाती है तो तीन बातें जरूर ध्यान में रखनी चाहिए कि मीडिया की सकारात्मक भूमिका क्या है, मीडिया की नकारात्मक भूमिका क्या है और मीडिया में संतुलन साधे रखना, यानी बैलेंस क्या है।

एक घटना का जिक्र करते हुए उपेंद्र राय ने कहा कि मीडिया किस हद तक नकारात्मक और सकारात्मक भूमिका निभा सकती है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि आप सबने पुलित्जर अवॉर्ड का नाम सुना होगा। पुलित्जर बहुत ही गरीब परिवार से थे और 19वीं सदी में वे हंगरी से न्यूयॉर्क आ गए थे। बहुत ही संघर्ष-परिश्रम करके उन्होंने एक अखबार खरीदा था, जो बाद में ‘न्यूयॉर्क वर्ल्ड’ के नाम से मशहूर हुआ था। ये अखबार में बाद में प्रभावी-शक्तिशाली दैनिक अखबार साबित हुआ था। उस समय अमेरिका में एक और अखबार था, जिसे विलियम रैंडोल्फ हर्स्ट चलाते थे। वे अमेरिका के एक दूसरे शहर से न्यूयॉर्क में आकर बसे थे। विलियम हर्स्ट ने पुलित्जर अखबार के सभी अच्छे कर्मियों को तोड़ा और अपने अखबार की ओर ले गए। एक बार उन्होंने एक कहानी गढ़ी कि किस तरह से क्यूबा की एक लड़की को स्पेन ने अपने यहां बंदी बना लिया और वह कहानी इस तरह से चल पड़ी कि क्यूबा और स्पेन में युद्ध जैसी स्थित पैदा हो गई। बाद में ‘पुलित्जर’ अखबार ने पूरे झूठ का पर्दाफाश किया और बताया कि पूरी कहानी ही गलत थी। उस समय दोनों अखबारों में होड़ थी। यदि निगेटिविटी का उदाहरण दिया जाए तो ये अपने आप में बड़ा उदाहरण है, क्योंकि जिन दो देशों के बीच संबंध इतने मधुर थे, वे इतने ज्यादा खराब हो गए कि युद्ध जैसी नौबत आ गई। ये मीडिया का नकारात्मक प्रभाव ही तो है।

वहीं, मीडिया के संतुलित व्यवहार की बात करते हुए राय ने कहा,‘यहां महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू के एक संवाद का जिक्र करना चाहूंगा कि जब ‘नवजीवन’ और ‘यंग इंडिया’ में महात्मा गांधी कॉलम लिखते थे  तो उन्होंने नेहरूजी से कहा कि आप भी कॉलम लिखा करिए। देश के लोगों को पता चलना चाहिए कि गांधी और नेहरू में कितने मतभेद हैं, क्योंकि जब मैं लिखता हूं तो कांग्रेस का कोई भी वरिष्ठ आदमी लिखने को तैयार नहीं होता है। इससे लोगों को ये पता नहीं चलता कि हमारे बीच जी-हुजूरी नहीं है, बल्कि हम एक-दूसरे के विचारों को पसंद और नापसंद भी करते हैं। लेकिन नेहरू जी गांधी जी के साथ कॉलम लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। जब गांधी जी ने ‘नवजीवन’ में कई ऐसे आर्टिकल लिखे, जैसे ‘सत्य के प्रयोग में मैंने आज अपने ब्रह्मचर्य को परखने की कोशिश की।’ इस पर उन्होंने कई बातें लिखीं, तब सरदार पटेल ने उनको पत्र लिखा जो ‘नवजीवन’ में प्रकाशित भी हुआ कि बापू जो आप सत्य का प्रयोग कर रहे हैं, वह हम सभी जानते हैं, लेकिन समाज से उसका बहुत ज्यादा मतलब नहीं है। इसलिए इतना स्पष्ट और साफ बने रहने की जरूरत नहीं है। ये आपके निजी प्रयोग हैं और आप इसे निजी तरीके से करिए। इसे लेकर समाज में लंबे समय तक बहस चलाने की जरूररत नहीं है, ये आपके व्यक्तिगत मामले में हैं इनको व्यक्तिगत तरीके से करिए।

राय ने अपने संबोधन में आगे कहा कि जब आजादी का आंदोलन चल रहा था, उस समय जो अखबार निकल रहे थे, वे सभी चंदे से चलते थे और इसकी वजह से इन अखबारों की जवाबदेही समाज के प्रति थी, क्योंकि जनता का अखबार था, जनता के द्वारा, जनता के पैसे चलता था। वो तब किसी बिजनेस मोटिवेशन या उसके दवाब में नहीं चलता था, लेकिन आज की स्थिति ठीक इसके उलट है।

समाज में मीडिया की भूमिका का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि याद करिए पहले ऋषि-महर्षि वैद्य के रूप में इलाज करते थे, तो उनका एक उद्देश्य होता था कि बीमार को ठीक करना, लेकिन जब इस प्रोफेशन में बिजनेस घुसा तो आज देखिए कि किस तरह से हम लोग अखबारों में रोज खबरें छापते हैं और चैनलों पर बहस करते हैं कि कैसे किसी के मृत शरीर को वेटिंलेटर पर रखकर पांच दिन तक एयर पम्प करके उसको ‘जिंदा’ रखा गया और कैसे आज की तारीख में कई हॉस्पिटल्स चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा बीमार आदमी हमारे यहां ही भर्ती हों। इसके लिए उन्होंने मार्केटिंग के एग्जिक्यूटिव लगा रखे हैं। अब यहीं से होड़ शुरू होती है, क्योंकि सेवा का भाव तो चला गया और बिजनेस ने अपनी जगह बना ली है। ठीक ऐसे ही हम मीडिया के लोगों को भी आलोचना करने का ‘लाइसेंस’ मिला हुआ है और हम यह करते भी हैं। लेकिन कई बार सवाल उठता है कि हमारी आलोचना कौन करेगा, हम पर कौन नजर रखेगा। बवाल उस दिन खड़ा हो जाता है जब हम भी बिजनेस के दवाब में टीआरपी बढ़ाने के लिए, कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए, अपने को श्रेष्ठ साबित करने के लिए कहानियां गढ़ने और बनाने लग जाते हैं।

उन्होंने कहा कि सवाल तो तब खड़ा होता है जब कुछ चैनल ऐसे लोगों को अपने साथ कर लेते हैं जो दो मिनट में दस टायर और चार आदमियों को इकट्ठा करके दंगा करने से भी नहीं चूकते हैं। इस तरह की तमाम बाते हैं जो हम लोगों को पता है, जो हम बता सकते हैं कि हम हीं लोगों में से किस-किस चैनल पर इस तरह की खबरें चलीं। लेकिन साथ ही साथ देखा जाए तो तमाम निगेटिविटी के बीच मीडिया एक सशक्त आवाज भी है, एक सशक्त माध्यम भी है और खासतौर से मध्यम वर्ग की उम्मीदों को मीडिया ने जितना परवान चढ़ाया है, मीडिया ने जितना हौसला दिया है, शायद ही 500 सालों में कोई ऐसा माध्यम या तरीका हो, जिसने आम आदमी के भरोसे, साहस या उसके भरोसे को इतनी मजबूती दी हो।

राय ने कहा कि इस मामले में आप रानू मंडल का केस भी देख सकते हैं कि मीडिया ने कैसे एक भीख मांगकर अपनी जीविका चलाने वाली को रातों-रात स्टार बनाया और तमाम ऐसे लोगों के मन में ये भरोसा पैदा किया, जिसके पास कोई साधन-रिसोर्स नहीं है कि वह कैसे रातों-रात कोई चमत्कार कर सकता है। यही मीडिया और सोशल मीडिया की ताकत है।

आज 40 करोड़ लोग भारत में वॉट्सऐप इस्तेमाल करते हैं और वे ऐप्स जो बहुत ज्यादा लोकप्रिय हो गए हैं, वे न तो कोई पत्रकार हायर करते हैं और न ही किसी मीडियाकर्मी को नौकरी देते हैं फिर भी गूगल की दखल न्यूज में सबसे ज्यादा है और बिना मीडिया का काम करते हुए वॉट्सऐप सशक्त माध्यम बन चुका है।  

जो बदलाव मीडिया के जरिए सोसायटी में हो रहा है वह बहुत हद तक अच्छा है। प्रकृति का सारा सिस्टम द्वंद्वात्म है। अगर कहीं अच्छा है तो उसके साथ बुरा जुड़ा हुआ है और कहीं बुरा है तो उसके साथ अच्छा भी जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि इन तमाम बहस के बीच मैं बतौर जर्नलिस्ट इतना ही कहना चाहूंगा कि अभी तक समाज के प्रति मीडिया ने जो अपनी भूमिका निभाई है वह बहुत अच्छी है और आम आदमी के लिए मीडिया ने भरोसा जगाने का काम किया है। शायद मौजूदा हालात में कोई ऐसा माध्यम, कोई ऐसा साधन नहीं है जो आम आदमी की ताकत बन सके। कहीं न कहीं न्यूज चैनल्स ने, सोशल मीडिया ने आम आदमी के दैनिक व्यवहार, उसके दैनिक जीवन को बदलने का काम किया है।


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