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बजट 2025 से प्रिंट इंडस्ट्री को है राहत मिलने की उम्मीद

1 फरवरी को प्रस्तावित बजट का शीतकालीन सत्र एक बार फिर प्रिंट इंडस्ट्री में चर्चा का विषय बन गया है, जहां हितधारक महत्वपूर्ण नीतिगत हस्तक्षेप की उम्मीद कर रहे हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 year ago

चहनीत कौर, सीनियर कॉरेस्पोंडेंट, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।

1 फरवरी को प्रस्तावित बजट का शीतकालीन सत्र एक बार फिर प्रिंट इंडस्ट्री में चर्चा का विषय बन गया है, जहां हितधारक महत्वपूर्ण नीतिगत हस्तक्षेप की उम्मीद कर रहे हैं। इंडस्ट्री जगत के लीडर्स वित्तीय राहत की उम्मीद कर रहे हैं, जिसमें न्यूजप्रिंट की कीमतों में कमी, कच्चे माल पर आयात शुल्क में कटौती, सेंट्रल ब्यूरो ऑफ कम्युनिकेशन (CBC) द्वारा विज्ञापन दरों में सुधार और इस क्षेत्र को बनाए रखने व बढ़ाने के लिए अन्य सरकारी सहायता शामिल है। 

पिछले कुछ वर्षों में भारत की प्रिंट इंडस्ट्री कई चुनौतियों का सामना कर रही है, खासकर न्यूजप्रिंट की बढ़ती लागत के कारण, जो कुल उत्पादन खर्च का लगभग 50-60 प्रतिशत हिस्सा होती है। 

इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स के अनुसार, हाल के तिमाहियों में न्यूजप्रिंट की कीमतों में 7-8% की वृद्धि हुई है, जिससे यह 600 अमेरिकी डॉलर प्रति मीट्रिक टन से अधिक हो गई है। कोरोना महामारी के प्रभाव से पहले यह कीमत लगभग 400 अमेरिकी डॉलर प्रति मीट्रिक टन थी।

2020-21 के केंद्रीय बजट में आयातित न्यूजप्रिंट पर 5% कस्टम ड्यूटी लगाने से कई प्रकाशनों की वित्तीय स्थिति और अधिक प्रभावित हुई, जिससे कुछ छोटे प्रकाशनों को बंद करना पड़ा और उनके प्रिंट संस्करणों की संख्या घट गई।

इसके अलावा, प्रिंट मीडिया में विज्ञापन के लिए स्पेस बेचने पर 5% जीएसटी लगाया जाता है। वहीं, यदि कोई ऐडवर्टाइजमेंट एजेंसी अखबार की ओर से एजेंट के रूप में विज्ञापन के लिए स्पेस बेचती है और इसके बदले कमीशन लेती है, तो उस कमीशन पर 18% जीएसटी देना होता है।

नीतिगत सुधारों की मांग (Call for policy reforms)

इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी के पूर्व प्रेजिडेंट राकेश शर्मा ने बताया कि देश में 14 लाख मीट्रिक टन न्यूजप्रिंट की जरूरत है, लेकिन भारत में सिर्फ 7 लाख मीट्रिक टन ही उत्पादन होता है। इसलिए, न्यूजप्रिंट को विदेशों से खरीदना पड़ता है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ जाती है। 

उन्होंने कहा, "सरकार को इस इंडस्ट्री के प्रति संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाना चाहिए, क्योंकि यह पहले से ही कई समस्याओं से जूझ रहा है। विज्ञापन कम हो रहे हैं और अन्य उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है।"

इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी की 2023-24 की वार्षिक रिपोर्ट में भी उल्लेख किया गया कि विभिन्न अनुरोधों में लगातार यह बताया गया है कि देशी न्यूज़प्रिंट निर्माता ग्लेज़्ड न्यूजप्रिंट और 40/42 GSM न्यूजप्रिंट का उत्पादन नहीं करते हैं। साथ ही, भारत में न्यूजप्रिंट की कुल खपत में लगभग 7 लाख टन की कमी बनी हुई है। इसलिए, न्यूजप्रिंट पर कस्टम ड्यूटी लगाने का कोई औचित्य नहीं है। 

मैडिसन मीडिया के वाइस प्रेजिडेंट मनोज सिंह ने जोर देकर कहा कि कच्चे माल पर लगने वाले शुल्कों को लेकर सरकार की नीति सीधे तौर पर उद्योग की लागत संरचना को प्रभावित कर सकती है।

उन्होंने कहा, "पल्प और रिसाइकल किए गए कागज जैसे कच्चे माल पर आयात शुल्क में बदलाव उत्पादन लागत को प्रभावित कर सकता है। यदि शुल्क कम किया जाता है, तो इससे घरेलू निर्माताओं को लागत घटाने में मदद मिल सकती है।"

स्टैटिस्टा (Statista) के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024 में पल्प, कागज और पेपरबोर्ड के लिए थोक मूल्य सूचकांक (WPI) लगभग 147.6 था, जो कि 2012 के आधार वर्ष की तुलना में 42% से अधिक बढ़ गया है।

उन्होंने यह भी बताया कि सरकार स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने और आयातित कच्चे माल पर निर्भरता कम करने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन या सब्सिडी शुरू कर सकती है, जिससे उद्योग में कीमतों की स्थिरता सुनिश्चित की जा सके। 

इस बीच, मलयाला मनोरमा के मार्केटिंग व ऐडवर्टाइजिंग सेल्स के वाइस प्रेजिडेंट वर्गीस चांडी ने उन महत्वपूर्ण आवश्यकताओं को रेखांकित किया, जिन पर प्रिंट मीडिया क्षेत्र को समर्थन देने के लिए आगामी बजट में ध्यान दिया जाना चाहिए। 

चांडी ने कहा, 'वर्तमान प्रिंट मीडिया की स्थिति को देखते हुए, यह जरूरी है कि सरकार समाचार पत्रों के कागज पर लगने वाला आयात शुल्क हटा दे, क्योंकि यह प्रकाशकों के लिए आर्थिक बोझ को काफी बढ़ा देता है। इसके अलावा, प्रिंट विज्ञापनों पर पूरी तरह से जीएसटी छूट दी जानी चाहिए, क्योंकि यह उन मीडिया हाउस को राहत प्रदान करेगा, जो घटती आय से जूझ रहे हैं।'

उनके अनुसार, एक और महत्वपूर्ण कदम यह होगा कि प्रकाशनों के लिए केंद्रीय संचार ब्यूरो (CBC) के विज्ञापन दरों में वृद्धि की जाए। कई समाचार पत्रों के लिए सरकारी विज्ञापन उनकी आय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं, और इन दरों में संशोधन जरूरी है ताकि डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के दौर में उनकी स्थिरता बनी रहे।

चांडी ने डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव के कारण छात्रों में पढ़ने की आदतों में गिरावट को लेकर भी चिंता व्यक्त की और सरकार से ऐसे कदम उठाने का आग्रह किया, जिससे पठन-संस्कृति को बढ़ावा मिले। उन्होंने कहा, "सरकार को छात्रों में पढ़ने की आदत को प्रोत्साहित करने के लिए कदम उठाने चाहिए, क्योंकि प्रिंट मीडिया से कम जुड़ाव साक्षरता और समझने की क्षमता को प्रभावित कर रहा है।" 

वहीं, राकेश शर्मा ने यह भी कहा, "हमने सरकार से अनुरोध किया है कि जब अखबार की बिक्री पर जीएसटी नहीं लगाया जाता है, तो ई-सब्सक्रिप्शन पर इसे क्यों लागू किया गया है? तकनीकी रूप से, यदि समाचार पत्र की बिक्री जीएसटी से मुक्त है, तो ई-समाचार पत्र पर भी जीएसटी नहीं लगाया जाना चाहिए।" 

आगे की राह (Way forward)

पिछले वर्षों में, इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) जैसी इंडस्ट्री से जुड़ी संस्थाओं ने लगातार वित्तीय राहत उपायों की मांग की है। 2023 में, INS ने सरकार से समाचार पत्रों के कागज पर लगने वाला आयात शुल्क हटाने का अनुरोध किया, यह तर्क देते हुए कि भारत अपनी जरूरत का लगभग 45-50% समाचार पत्र कागज आयात करता है क्योंकि घरेलू उत्पादन पर्याप्त नहीं है। इसके अलावा, केंद्रीय संचार ब्यूरो (CBC) के विज्ञापन दरों में पिछले एक दशक से कोई वृद्धि नहीं हुई है, जिससे उन प्रकाशकों की आय पर और अधिक दबाव पड़ा है जो सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर हैं।

जैसे-जैसे इंडस्ट्री बजट 2025 का इंतजार कर रहा है, हितधारकों को उम्मीद है कि सरकार वित्तीय दबाव को कम करने के लिए उपाय पेश करेगी, ताकि प्रिंट मीडिया जनता को सूचित और शिक्षित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहे। इन मांगों को पूरा किया जाएगा या नहीं, यह देखना बाकी है, लेकिन एक अनुकूल बजट उस उद्योग को अत्यधिक आवश्यक राहत प्रदान कर सकता है, जो बढ़ती लागत और बदलती उपभोक्ता प्राथमिकताओं से जूझ रहा है।


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