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मीडिया संस्थानों ने नहीं रखा इस बात का ध्यान, अब कोर्ट में देना होगा जवाब

दिल्ली निवासी वकील की ओर से दिल्ली हाई कोर्ट में दायर की गई है याचिका, लगाए गए हैं कई आरोप

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में पीड़िता की पहचान उजागर नहीं की जाती, लेकिन हैदराबाद बलात्कार पीड़िता से जुड़ी हर जानकारी इंटरनेट पर मौजूद है। यहां तक कि मृतका का नाम और फोटो भी सार्वजनिक कर दिया गया है। इस संबंध में अब दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ता ने कई मीडिया संस्थानों पर कानून का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है।

दिल्ली निवासी वकील यशदीप चहल ने अपनी याचिका में कहा है कि आईपीसी की धाराओं और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को नजरअंदाज करते हुए पीड़िता की पहचान और अन्य विवरण को कुछ व्यक्तियों सहित कई मीडिया संस्थानों द्वारा उजागर किया जा रहा है, जिसपर तत्काल रोक लगाई जानी चाहिए। 

चहल का कहना है कि विभिन्न ऑनलाइन और ऑफलाइन पोर्टल पर हैदराबाद कांड की पीड़िता और आरोपितों की पहचान का खुलासा करने वाली विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित करके कई मीडिया संस्थानों ने भारतीय दंड संहिता की धारा 228A का घोर उल्लंघन किया है। आईपीसी की धारा 228A कुछ अपराधों के शिकार व्यक्तियों की पहचान का खुलासा करने पर रोक लगाती है, जिसमें बलात्कार भी शामिल है।

याचिकाकर्ता द्वारा वकील चिराग मदान और साई कृष्ण कुमार के माध्यम से दायर याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि पीड़ित और आरोपितों की पहचान गुप्त रखने के मामले में राज्य पुलिस और उसकी साइबर सेल नाकाम रही है।

गौरतलब है कि 27 नवंबर को हैदराबाद में एक वेटनर डॉक्टर की गैंगरेप के बाद हत्या कर दी गई थी। इस मामले में पुलिस ने चारों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। वारदात के सामने आने के बाद से ही इंटरनेट पर पीड़िता का फोटो और नाम वायरल होना शुरू हो गया था। आरोपितों की पहचान के बाद उनका विवरण भी सार्वजनिक कर दिया गया।

पहले भी कई बार इस तरह के मामलों में मीडिया संस्थान सवालों में घिरते रहे हैं। कठुआ बलात्कार और हत्या मामले में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला था। इसके बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने 12 मीडिया संस्थानों पर पीड़िता की पहचान उजागर करने के लिए 10 लाख रुपए का जुर्माना लगाया था। इन संस्थानों में न्यूज चैनल ‘एनडीटीवी’, ‘द रिपब्लिक’ सहित ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘द वीक’ और ‘द हिंदू’ जैसे अखबार शामिल थे। इन सभी ने पीड़िता की पहचान उजागर करने के लिए अदालत से माफी भी मांगी थी।

सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार, किसी भी मीडिया हाउस या व्यक्ति को इस तरह के मामलों में पीड़िता के नाम को सार्वजनिक करने की अनुमति नहीं है। यहां तक कि वह किसी भी ऐसे तथ्य का खुलासा नहीं कर सकते, जिससे पीड़िता को पहचाना जा सके। इसके अलावा, पुलिस को भी यह निर्देश दिए गए हैं कि ऐसे मामलों में एफआईआर सार्वजनिक न हो और समान दस्तावेजों का एक अलग सेट बनाया जाए, जहां पीड़ित की पहचान उजागर न की गई हो। मूल रिपोर्ट को केवल जांच एजेंसी या अदालत को सीलबंद कवर में भेजा जाना चाहिए।

हैदराबाद के इस मामले में शव मिलने के कुछ घंटों बाद तक पुलिस ने गैंगरेप की पुष्टि नहीं की थी। लिहाजा मीडिया हाउस दावा कर सकते हैं कि उन्होंने इस खुलासे से पहले नाम और तस्वीर प्रकाशित की, लेकिन कई मीडिया संस्थान गैंगरेप के खुलासे के बाद भी पीड़िता की पहचान उजागर करते रहे।


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