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पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में कुछ ऐसी है पत्रकारों की हालत
पाकिस्तान पत्रकारों के लिए दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में एक है। फ्रीडम नेटवर्क की एक रिपोर्ट मुताबिक, पाकिस्तान में पत्रकारों और मीडिया संगठनों के खिलाफ धमकी, हमले और उत्पीड़न में वृद्धि हुई है
समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago
पाकिस्तान पत्रकारों के लिए दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में एक है। फ्रीडम नेटवर्क की एक रिपोर्ट मुताबिक, पाकिस्तान में पत्रकारों और मीडिया संगठनों के खिलाफ धमकी, हमले और उत्पीड़न में वृद्धि हुई है।
पिछले महीने ही छह पत्रकारों की हत्या की कोशिश की जा चुकी है। वहीं तीन पत्रकारों का अपहरण कर लिया गया था। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इस बीच सात अन्य पत्रकारों को गिरफ्तारी की, उत्पीड़न की और कई तरह से कानूनी पचड़ों में फंसाने की धमकियां मिलीं ।
फ्रीडम नेटवर्क के रिपोर्ट में यह जानकारी भी दी गई है कि साल 2000 के बाद से यहां 140 से ज्यादा पत्रकारों की हत्या हुई है। पिछले साल 33 पत्रकारों की हत्या के मामलों में सौ फीसदी दोष मुक्त हो गए और किसी को भी कोई सजा नहीं हुई। यहां के अधिकांश बड़े मीडिया हाउस सरकार से प्रताड़ित हो रहे हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि पूरे देश में प्रिंट से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक सभी में एक तिहाई से ज्यादा पत्रकार मुकदमों का सामना कर रहे हैं। ये सभी मुकदमे फर्जी होते हैं और इनका मकसद सिर्फ भय पैदा करना होता है। किसी अन्य प्रांत या क्षेत्र की तुलना में सिंध क्षेत्र पत्रकारों के लिए तीन गुना जोखिम भरा है। अधिकांश पत्रकारों (एक तिहाई से अधिक) पर दंड संहिता के तहत आरोप लगाया गया है, जबकि अन्य एक तिहाई पर आतंकवाद के आरोप लगाए जाने की संभावना है।
इसके अलावा कुछ अन्य पत्रकारों के खिलाफ इलेक्ट्रॉनिक क्राइम या मानहानि कानूनों के तहत मुकदमा चलाया जाता है। पत्रकारों के खिलाफ सबसे आम आरोप 'राज्य संस्थानों के खिलाफ काम करना' या 'राज्य संस्थानों को बदनाम करना' है। इसके अलावा अवैध हथियार/ विस्फोटक', 'ड्रग्स रैकेट', नागरिकों को परेशान करने का आरोप भी हो सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, जिन मामलों में पुलिस ने जांच पूरी की थी, उनमें से दो-तिहाई मामलों में से केवल आधे को ही ट्रायल के लिए फिट घोषित किया गया। इसके अलावा, 60 प्रतिशत मामलों में मुकदमे का निष्कर्ष नहीं निकला। इससे अधिकांश पत्रकारों को अपनी बेगुनाही साबित करने का मौका नहीं मिला। 17 मामलों में से 10 निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे और इस तरह से अधिकांश पत्रकारों को न्याय नहीं मिला।
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