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सरकार ने पेश किया नया बिल, बढ़ सकती हैं पत्रकारों की मुश्किलें
सैकड़ों पत्रकार सड़कों पर उतरकर विधेयक में संशोधन की मांग कर रहे हैं
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने पर पत्रकार प्रशांत कनौजिया को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन उन्हें सुप्रीम कोर्ट से राहत मिल गई। यदि यह भारत के बजाय पड़ोसी देश नेपाल में हुआ होता तो शायद उसका परिणाम कुछ और होता।
नेपाल सरकार ने मीडिया से जुड़ा एक ऐसा विधेयक संसद में पेश किया है, जिसके कानून बनते ही पत्रकारों के लिए काम करना मुश्किल हो जाएगा। इस विधेयक का जबरदस्त विरोध हो रहा है। सैकड़ों पत्रकार सड़कों पर उतरकर बिल में संशोधन की मांग कर रहे हैं। वहीं, प्रकाशकों और प्रसारकों के शीर्ष संगठन नेपाल मीडिया सोसाइटी (एनएमएस) का कहना है कि विधेयक को तत्काल वापस लिया जाए। हालाँकि, सरकार के रुख में खास परिवर्तन नहीं आया है। बिल में कहा गया है कि किसी की छवि को नुकसान पहुंचाने का दोषी पाए जाने पर पत्रकारों पर 10 लाख रुपए का जुर्माना लगाया जाएगा।
प्रधानमंत्री के.पी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली सरकार ने नौ मई को नेपाल मीडिया परिषद (एनएमसी) के गठन के लिये संसद में मीडिया काउंसिल विधेयक पेश किया था, जिसमें मीडिया संगठनों, संपादकों, प्रकाशकों और पत्रकारों पर किसी की छवि को नुकसान पहुंचाने का दोषी पाए जाने पर 10 लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है। यदि मीडिया संगठन की सामग्री से संबंधित पक्ष की छवि को नुकसान पहुंचता है तो एनएमसी दोषी को मुआवजा देने का आदेश दे सकती है। नया विधेयक मौजूदा प्रेस काउंसिल एक्ट की जगह लेगा। इससे संस्थानों पर भारी जुर्माना लगाने, परिषद के सदस्यों की नियुक्ति और उन्हें हटाने में सरकार की भूमिका बढ़ जाएगी। पत्रकारों का कहना है कि सरकार नियमन की आड़ में उनकी स्वतंत्रता का गला घोंट रही है, अगर ऐसा होता है तो वह खुलकर काम नहीं कर पाएंगे।
वर्तमान प्रेस परिषद अधिनियम में जुर्माने का प्रावधान नहीं है। इसमें केवल यह कहा गया है कि पीड़ित पक्ष के बयान को प्रकाशित किया जाए। इसके अलावा बार-बार उल्लंघन की स्थिति में एक निश्चित अवधि के लिए सुविधाओं और लाभों को आंशिक रूप से या पूरी तरह से रोकने के लिए सरकार को सिफारिश की जाती है। लेकिन नए विधेयक में भारी-भरकम जुर्माने को शामिल किया गया है। नेपाल सरकार के इस कदम के बाद यह सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या भारत में भी प्रेस के अधिकारों को सीमित करने की ज़रूरत है? क्या अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर जो कुछ हो रहा है, उसकी अनुमति दी जानी चाहिए?
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