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'ऑपरेशन सिंदूर' पर मीडिया की तीखी आलोचना को लेकर कली पुरी ने कही ये बात

कली पुरी ने कहा, मुझे लगता है कि यह अनुचित है। जिन लोगों ने (सरकारी या अर्ध-सरकारी स्रोतों से) गलत जानकारी मीडिया में प्लांट की, उन्होंने कई पत्रकारों के साथ भरोसे के रिश्ते तोड़ दिए।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 5 months ago

इंडिया टुडे ग्रुप की वाइस चेयरपर्सन और एग्जिक्यूटिव एडिटर-इन-चीफ कली पुरी ने न्यूज एजेंसी एएनआई की एडिटर-इन-चीफ स्मिता प्रकाश को दिए इंटरव्यू में कहा कि 'ऑपरेशन सिंदूर' जैसे समय में न्यूज चैनल्स को आलोचना झेलनी पड़ी, लेकिन यह सही नहीं है कि कुछ चैनल्स की गलतियों के लिए पूरे जॉनर को दोषी ठहराया जाए। उन्होंने कहा, “न्यूज चैनल्स ने बिना नींद के 24 घंटे काम किया। दफ्तरों में बेड लगे थे ताकि लोग एक घंटे की नींद ले सकें, क्योंकि सायरन अक्सर 3 बजे रात को बज जाते थे।”

कली पुरी ने कहा कि उस समय कई जगह लोग बहक गए, क्योंकि नई पीढ़ी पहली बार न्यूज और सोशल मीडिया को साथ लेकर युद्ध कवर कर रही थी। “SOPs यानी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (काम को करने के लिए पहले से बनाए गए नियम) थे, लेकिन कई युवा रिपोर्टर्स को उनके बारे में जानकारी नहीं थी। आधिकारिक वॉट्सऐप ग्रुप्स से जानकारी आती थी और जब वही सूचना कई ग्रुप्स से मिलती तो लोग मान लेते कि यह सही है। इसी दौरान गलत खबरें भी प्लांट की गईं, जैसे कि कराची पर हमला हुआ, जबकि वास्तव में कराची पर हमला नहीं हुआ था। नौसेना हाई अलर्ट पर थी, यह सच था, लेकिन उस समय कराची पर हमला नहीं हुआ।”

नेवी शिप पर कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो अपने परिचित रिपोर्टर या एडिटर से संपर्क किया होगा और कहा होगा- ‘हम फॉरवर्ड डिप्लॉयड हैं।’ अब वह सैनिक असल में नहीं जानता होगा कि क्या होने वाला है, क्योंकि उसे भी पूरी जानकारी नहीं दी जाती। लेकिन उसे अंदाजा रहता है। इस वजह से पत्रकारों और चैनलों में भी उत्साह और अनुभवहीनता का मिला-जुला असर दिखा। इसीलिए, मैं यह नहीं कहूंगी कि सबने वही बात दोहराई कि कराची पर हमला हुआ और हम लाहौर पहुंच गए। असल में केवल एक-दो चैनलों ने यह कहा था, ज्यादातर ने ऐसा नहीं कहा था। 

मुझे लगता है कि यह अनुचित है। जिन लोगों ने (सरकारी या अर्ध-सरकारी स्रोत) गलत जानकारी मीडिया में प्लांट की, उन्होंने कई पत्रकारों के साथ भरोसे के रिश्ते तोड़ दिए। हां, मीडिया को इसके लिए आलोचना झेलनी पड़ी, लेकिन गलती उन लोगों की भी है। हमेशा मीडिया को ही दोष दिया जाता है। कुछ भी गलत हो तो मीडिया ही सबसे आसान निशाना बनता है। लेकिन कभी-कभी यह कहा जाता है- ‘मैंने ऐसा नहीं कहा।’ जबकि सबके सामने उसका वीडियो बाइट होता है। ऐसे में मिसक्वोटेड (गलत उद्धृत) होने की गुंजाइश ही नहीं रहती। फिर कहा जाता है वीडियो को एडिट कर दिया गया। लेकिन सारा ठीकरा हमेशा मीडिया पर ही फोड़ दिया जाता है। मैं इस बात से सहमत हूं कि मीडिया को जिम्मेदार ठहराया जाता है, लेकिन इससे जुड़ा मुद्दा फेक न्यूज का है। आजकल वीडियो में इतनी एडिटिंग और बदलाव किए जाते हैं कि न्यूजरूम में फैक्ट-चेकिंग का काम बहुत कठिन और समय लेने वाला हो गया है।”

फेक न्यूज पर उन्होंने कहा, “यह हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है। सोशल मीडिया पर फेक वीडियो और न्यूज बहुत तेजी से फैलती है। हमें रियल टाइम फैक्ट-चेक करना पड़ता है, जबकि यह पहले से वायरल हो चुकी होती है। हमारी फैक्ट-चेकिंग टीम 2019 से है और बड़ी टेक कंपनियों ने हमें टूल्स से मदद दी है। लेकिन समस्या यह है कि यदि किसी को वॉट्सऐप पर फेक न्यूज मिलती है, तो भले ही हम फैक्ट-चेक कर दें, वह व्यक्ति इसे सही नहीं करेगा, क्योंकि वह खुद को मूर्ख साबित नहीं करना चाहेगा। इस वजह से फेक न्यूज सच से सात गुना तेज फैलती है।”

उन्होंने कहा कि अब टीवी और डिजिटल पर भी गलती सुधारना मुश्किल है। “पहले प्रिंट में गलती हो जाती थी तो लाखों कॉपियां वापस नहीं मंगाई जा सकती थीं। टीवी और डिजिटल पर लगा था कि तुरंत बदल सकते हैं। लेकिन अब लोग स्क्रीनशॉट ले लेते हैं। एक छोटी सी स्पेलिंग मिस्टेक पर भी राजनीतिक पार्टियों से कॉल आ जाते हैं।”

दबावों पर बोलते हुए कली पुरी ने कहा, “बीजेपी सरकार पर आरोप लगाया जाता है कि मीडिया पर दबाव डालती है, लेकिन कौन सी सरकार ने दबाव नहीं डाला? मुझे याद है बचपन में जब टीवी नहीं था और इंडिया टुडे मैगजीन छपती थी। एक बार जब सरकार को कुछ पसंद नहीं आया तो हरियाणा में प्रेस बंद कर दी गई। तब ए.पी. और उनकी टीम ने चेन्नई में प्रेस लगाई और वहां से मैगजीन देश और दुनिया में भेजी गई। दबाव नया नहीं है- यह राजनीतिक पार्टियों से भी आता है और बड़े बिजनेस हाउसेस से भी। कई बार हमारे स्टोरीज के कारण हमें बैन भी किया गया।”

उन्होंने कहा कि अब यह संपादकों और पत्रकारों पर निर्भर करता है कि वे दबाव में झुकते हैं या नहीं। “यदि सिर्फ बिजनेस के नजरिये से देखें तो झुकना आसान है क्योंकि वह बेहतर बिजनेस सेंस बनाता है। लेकिन यदि आप मानते हैं कि पत्रकारिता एक ‘नोबल प्रोफेशन’ है जिसमें पब्लिक सर्विस का तत्व है, तो आपको झुकना नहीं चाहिए।” 


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