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2026 में क्या बदल सकती है भारतीय मीडिया की तस्वीर?

प्रिंट, टीवी और डिजिटल- तीनों ही माध्यमों के लिए यह समय केवल तकनीकी बदलावों का नहीं, बल्कि नीतिगत सख्ती, जवाबदेही और नियंत्रण के नए ढांचे का संकेत दे रहा है।

Vikas Saxena 1 month ago

साल 2026 की दहलीज पर खड़ी भारतीय मीडिया इंडस्ट्री एक बार फिर बड़े बदलावों के दौर से गुजरने की तैयारी में है। प्रिंट, टीवी और डिजिटल- तीनों ही माध्यमों के लिए यह समय केवल तकनीकी बदलावों का नहीं, बल्कि नीतिगत सख्ती, जवाबदेही और नियंत्रण के नए ढांचे का संकेत दे रहा है। हालांकि सरकार की ओर से अभी तक कोई एकल या व्यापक नीति औपचारिक रूप से घोषित नहीं की गई है, लेकिन डिजिटल कंटेंट, ब्रॉडकास्टिंग और सोशल मीडिया को लेकर जो संकेत और प्रस्ताव सामने आ रहे हैं, वे यह साफ करते हैं कि आने वाला साल मीडिया के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।

पिछले कुछ वर्षों में मीडिया का स्वरूप तेजी से बदला है। डिजिटल प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया और OTT ने न केवल दर्शकों की आदतें बदली हैं, बल्कि कंटेंट के निर्माण, वितरण और निगरानी की पुरानी व्यवस्थाओं को भी अप्रासंगिक बना दिया है। सरकार अब इन्हीं बदलावों के अनुरूप नए नियम और कानून लाने की दिशा में आगे बढ़ती दिख रही है।

डिजिटल कंटेंट पर बढ़ती नजर

2026 में मीडिया को लेकर सरकार का सबसे बड़ा फोकस डिजिटल और ऑनलाइन कंटेंट पर नजर आता है। सूचना प्रौद्योगिकी (IT) नियमों में संशोधन को लेकर लंबे समय से चर्चा चल रही है, जिसमें सोशल मीडिया, डिजिटल न्यूज पोर्टल, वीडियो प्लेटफॉर्म और OTT सेवाओं को अधिक सख्त दायरे में लाने की तैयारी है। खासतौर पर डीपफेक, AI-जनरेटेड वीडियो और भ्रामक कंटेंट को लेकर सरकार गंभीर है।

संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले समय में AI या डीपफेक से बने कंटेंट को स्पष्ट रूप से लेबल करना अनिवार्य हो सकता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दर्शक असली और कृत्रिम रूप से बनाए गए कंटेंट के बीच अंतर कर सकें। इसके अलावा, शिकायत मिलने पर 24 घंटे के भीतर कंटेंट हटाने जैसी समय-सीमाएं भी तय की जा सकती हैं।

डिजिटल मीडिया के लिए इसका मतलब साफ है कि अब केवल खबर प्रकाशित करना या वीडियो अपलोड करना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उसके स्रोत, सत्यता और तकनीकी प्रकृति की जिम्मेदारी भी प्लेटफॉर्म और पब्लिशर दोनों पर होगी।

ब्रॉडकास्टिंग कानून में बड़ा बदलाव संभव

टीवी और ब्रॉडकास्टिंग सेक्टर के लिए भी 2026 अहम माना जा रहा है। सरकार पुराने केबल टेलीविजन कानून की जगह एक नए व्यापक ब्रॉडकास्टिंग कानून की दिशा में आगे बढ़ रही है, जिसमें पारंपरिक टीवी चैनलों के साथ-साथ डिजिटल स्ट्रीमिंग और ऑनलाइन ब्रॉडकास्टिंग सेवाओं को भी शामिल किया जा सकता है।

इस प्रस्तावित ढांचे का मकसद सभी ब्रॉडकास्टिंग प्लेटफॉर्म के लिए एक समान नियम तय करना है- चाहे वह सैटेलाइट टीवी हो या इंटरनेट के जरिए चलने वाला न्यूज चैनल। इससे लाइसेंसिंग, कंटेंट गाइडलाइंस, विज्ञापन मानक और तकनीकी अनुपालन के नियम बदल सकते हैं।

मीडिया इंडस्ट्री का एक वर्ग इसे 'लेवल प्लेइंग फील्ड' के रूप में देख रहा है, वहीं दूसरा वर्ग आशंका जता रहा है कि इससे सरकारी नियंत्रण और सेंसरशिप का दायरा बढ़ सकता है।

स्वतंत्र पत्रकारिता बनाम नियमन की बहस

2026 में मीडिया को लेकर सबसे बड़ी बहस स्वतंत्रता बनाम नियंत्रण की होगी। सरकार का तर्क है कि फेक न्यूज, अश्लील सामग्री और भ्रामक सूचनाओं से समाज को बचाने के लिए नियमन जरूरी है। लेकिन पत्रकारों और मीडिया संगठनों का कहना है कि अस्पष्ट परिभाषाओं वाले नियम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर दबाव बना सकते हैं।

'अश्लील', 'हानिकारक' या 'भ्रामक' जैसे शब्दों की व्याख्या यदि स्पष्ट नहीं हुई, तो डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म और स्वतंत्र पत्रकारों पर सेल्फ-सेंसरशिप का दबाव बढ़ सकता है। कई मीडिया विशेषज्ञों का मानना है कि इससे संवेदनशील और सत्ता से सवाल पूछने वाली पत्रकारिता प्रभावित हो सकती है।

डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन को लेकर सरकार का रुख

नियमों की सख्ती के साथ-साथ सरकार यह भी संकेत दे रही है कि वह मीडिया के डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन में सहयोगी भूमिका निभाना चाहती है। कौशल विकास, नई तकनीक को अपनाने और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने को लेकर सरकार और उद्योग के बीच संवाद जारी है।

हालांकि यह स्पष्ट है कि सरकार सीधे आर्थिक सब्सिडी देने के बजाय नीति और प्लेटफॉर्म स्तर पर सहयोग को प्राथमिकता दे रही है। इसका लाभ उन मीडिया संस्थानों को मिल सकता है जो तकनीक-आधारित पत्रकारिता, डेटा जर्नलिज्म और मल्टी-प्लेटफॉर्म कंटेंट पर निवेश कर रहे हैं।

आर्थिक और संचालन संबंधी असर

2026 की नीतियों का एक बड़ा असर मीडिया कंपनियों के खर्च और संचालन पर भी पड़ सकता है। नए अनुपालन नियम, कंटेंट मॉडरेशन सिस्टम और तकनीकी निवेश छोटे और मध्यम डिजिटल मीडिया संस्थानों के लिए चुनौती बन सकते हैं। वहीं बड़े मीडिया हाउस, जिनके पास संसाधन और तकनीकी क्षमता है, वे इन बदलावों के साथ जल्दी तालमेल बिठा सकते हैं।

इससे मीडिया इंडस्ट्री में एक तरह का पुनर्संयोजन देखने को मिल सकता है, जहां छोटे प्लेटफॉर्म या तो विलय का रास्ता चुनें या अपनी रणनीति बदलें।

बच्चों की सुरक्षा

हाल ही में न्यायालयों की टिप्पणियों के बाद केंद्र सरकार बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग को लेकर अलग गाइडलाइंस लाने पर गंभीरता से विचार कर सकती है। मद्रास हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए भारत को ऑस्ट्रेलिया जैसे मॉडल पर विचार करना चाहिए, जहां बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर सख्त उम्र-आधारित नियम लागू किए गए हैं।

कोर्ट की चिंता बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, अश्लील और भ्रामक कंटेंट तक आसान पहुंच, साइबर बुलिंग और ऑनलाइन लत को लेकर है। इसी कड़ी में सरकार के डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून के प्रस्तावित नियमों में भी यह संकेत मिल चुका है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया अकाउंट खोलने पर माता-पिता की सहमति अनिवार्य की जा सकती है। यदि यह गाइडलाइंस लागू होती हैं, तो सोशल मीडिया कंपनियों को उम्र सत्यापन, पैरेंटल कंट्रोल टूल्स और बच्चों के लिए सुरक्षित कंटेंट फिल्टर जैसे अतिरिक्त इंतजाम करने होंगे।

माना जा रहा है कि 2026 में डिजिटल और मीडिया नीतियों को लेकर होने वाले बदलावों के बीच बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सरकार की प्राथमिकताओं में एक अहम मुद्दा बनकर उभरेगी।

2026: चुनौती भी, मौका भी

कुल मिलाकर, 2026 भारतीय मीडिया के लिए केवल नियमों का साल नहीं होगा, बल्कि आत्ममंथन और पुनर्परिभाषा का दौर भी साबित हो सकता है। एक ओर जहां सरकार जवाबदेही और नियंत्रण पर जोर दे रही है, वहीं मीडिया के सामने यह चुनौती होगी कि वह स्वतंत्रता, विश्वसनीयता और नवाचार के बीच संतुलन बनाए।

यदि नियम पारदर्शी और स्पष्ट रहे, तो वे फेक न्यूज और गलत सूचना के खिलाफ एक मजबूत ढांचा खड़ा कर सकते हैं। लेकिन यदि अस्पष्टता और अत्यधिक नियंत्रण हावी हुआ, तो इसका असर स्वतंत्र पत्रकारिता और लोकतांत्रिक संवाद पर पड़ सकता है।

साल 2026 इसलिए अहम है क्योंकि यह तय करेगा कि भारत की मीडिया आने वाले दशक में किस दिशा में आगे बढ़ेगी- एक जिम्मेदार, तकनीक-सक्षम और विश्वसनीय मंच के रूप में या एक ऐसे क्षेत्र के रूप में जो लगातार नियामकीय दबाव से जूझता रहे। 


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