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एडिटर जयदीप कर्णिक ने बताया, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्यों नहीं है खतरा
‘मीडिया संवाद’ 2024 कार्यक्रम का विषय था- ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बढ़ता मायाजाल और मीडिया पर इसका प्रभाव’, जिस पर चर्चा की गई।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 1 year ago
एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media) समूह की हिंदी वेबसाइट 'समाचार4मीडिया' (samachar4media.com) द्वारा तैयार की गई 'समाचार4मीडिया पत्रकारिता 40 अंडर 40’ (40 Under 40)' की लिस्ट से 12 अगस्त 2024 को पर्दा उठ गया। दिल्ली में स्थित ‘इंडिया इंटरनेशनल सेंटर’ (IIC) के मल्टीपर्पज हॉल में आयोजित एक कार्यक्रम में इस लिस्ट में शामिल हुए प्रतिभाशाली पत्रकारों के नामों की घोषणा की गई और उन्हें सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने विजेताओं को पुरस्कृत किया।
सुबह दस बजे से 'मीडिया संवाद' कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें विभिन्न पैनल चर्चा और वक्ताओं का संबोधन शामिल था। इसके बाद शाम को पुरस्कार वितरण समारोह का आयोजन हुआ। ‘मीडिया संवाद’ 2024 कार्यक्रम का विषय था- ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बढ़ता मायाजाल और मीडिया पर इसका प्रभाव’, जिस पर चर्चा की गई। इस शिखर सम्मेलन में एक ही जगह टेलीविजन, प्रिंट व डिजिटल मीडिया से जुड़े तमाम दिग्गज जुटे और इस विषय पर अपने विचार व्यक्त किए।
इस दौरान अमर उजाला (डिजिटल) के एडिटर जयदीप कर्णिक ने कहा, ‘न्यूजरूम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब एक ऐसा मुद्दा हो गया है, जिस पर दिन रात चर्चा होती है। वैसे 'मायाजाल' शब्द सुनते ही मन में नकारात्मक विचार तो आ ही जाते हैं, क्योंकि मायावी तो वही चीज है, जो आपको फंसाना चाहती है, आपको बहकाना चाहती है, भ्रम है, सच नहीं है और तथ्य नहीं है। पिछले लगभग 25-26 सालों से डिजिटल प्रकाशन की दुनिया से जुड़ने और इसके संपर्क में बने रहने के आधार पर मैं ये कह सकता हूं कि 'मायाजाल' का प्रयोग इसके साथ यहां अनुचित है। जो भी नई तकनीक आती है, वो शुरू में तो डराती है। हम हौवा खड़ा करते हैं और फिर इस पर चर्चा करते हैं। चर्चा करने के बाद उसको अपनाते हैं और अपना लेने के बाद इस तरह से प्रयोग में लाते हैं कि उससे कभी डरे ही नहीं थे और ये चक्र है, जिसे हमने हमेशा से चलाया है। हमने पहले देखा भी है कि कैसे बैंकिंग यूनियन और ट्रेड यूनियन के प्रदर्शन हुए, हड़ताले हुईं और कहा गया कि कम्प्यूटर्स के आने से नौकरी चली जाएगी। हां, कभी कोई तकनीक की चुनौती बड़ी होती है, तो कभी छोटी होती है और सबसे पहले तो चुनौती यही है होती है कि समझ में ही नहीं आता है, तो जब तक इसे समझें तब तक इसे डराकर अलग ही कर दो कि ये कम्प्यूटर नाम का कुछ हौवा है। यानी फिर जबतक इसे समझेंगे, तब तक तो ये हमारी नौकरी नहीं खा पाएगा।
अपने संबोधन में जयदीप कर्णिक ने आगे कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा 'चैट जीपीटी' के लॉन्च होने के बाद हुई है। इसके बाद ही लोगों ने कृत्रिम मेधा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को आम फेम भाषा में समझने और इप्रयोग करने की कोशिश की है और चैट जीपीटी जिस 'ओपन एआई' कंपनी ने बनायी है उसके संस्थापक सैम ऑल्टमैन जब एक पत्रकार को वर्षों पहले कहते हैं कि It's like the Manhattan Project. तो पत्रकार उस समय नहीं समझ पाता है कि वह ऐसा क्यों कह रहा है। वैसे बता दूं कि परमाणु बम के प्रोजेक्ट को मैनेहैट्टन प्रोजेक्ट कहा गया था। सैम ऑल्टमैन जैसा विद्वान व्यक्ति जो उस प्रोजेक्ट से करीब से जुड़ा हुआ है, वो जब उसे मैनहैट्टन प्रोजेक्ट कहता है, तो जब वह लॉन्च हो जाता है, तो उसके दस करोड़ डाउनलोड, जितनी तेजी से हुए हैं, शायद ही किसी और ऐप के हुए हों। सोचिए, इतनी तेजी से यदि चैट जीपीटी का प्रयोग दस करोड़ लोग करने लगते हैं चंद घंटों में, तब समझ आता है और पत्रकार लिखता है कि हां मैं कुछ साल पहले इससे मिला था और तब उसने इसे मैनहैट्टन प्रोजेक्ट जैसा बताया था।
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