सोशलाइट परमेश्वर गोदरेज को वरिष्ठ पत्रकार वीर सांघवी की श्रद्धांजलि...

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। मशहूर समाजसेवी, सोशलाइट और महिला उद्यमी परमेश्वर गोदरेज का 70 साल की उम्र में

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 13 October, 2016
Last Modified:
Thursday, 13 October, 2016
vir-sanghvi

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

vir-sanghviमशहूर समाजसेवी, सोशलाइट और महिला उद्यमी परमेश्वर गोदरेज का 70 साल की उम्र में मुंबई में निधन हो गया। वे गोदरेज ग्रुप के चेयरमैन आदि गोदरेज की पत्नीं थीं। फेफड़े की बीमारी के चलते उन्हें ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल में एडमिट कराया गया था, जहां सोमवार की रात उनका निधन हो गया।

उन्हें नजदीक से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार वीर संघवी ने अंग्रेजी दैनिक 'हिन्दुस्तान टाइम्स' में एक लेख के जरिए उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनका कहना है कि संभवत: डिजाइनिंग में उनका सबसे बड़ा योगदान रेस्तरां डिजाइन के क्षेत्र में है। इसके बाद उन्होंने अपने पति के समूह गोदरेज के रियल एस्टेट डिवीजन को संभाला। संघवी कहते हैं कि उनमें एक के बाद कई भूमिकाएं निभाने की असाधारण क्षमता थी।

सांघवी का कहना है कि परमेश्वर अरबपति थीं, लेकिन विनम्रता उनमें कूट-कूट कर भरी थी। सालों पहले मेरे जैसे नए पत्रकार से वह बेहद शालीनता और विनम्रता से पेश आईं थीं। स्टाइल और ग्लैमर के मामले में उनका कोई जवाब नहीं था।

संघवी कहते हैं, परमेश्वर पंजाबी वर्ग से ताल्लुक रखती थीं। जिनता गोदरेज के पारसी परिवार ने उन्हें नहीं बदला, उतना उन्होंने गोदरेज परिवार को बदल दिया। परमेश्वर पारिवारिक मूल्यों, ग्लैमर और साहस की अद्भुत संगम थीं।

पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार वीर सांघवी का पूरा लेख:

A true original: Vir Sanghvi remembers Parmeshwar Godrej

To the world at large, Parmeshwar Godrej was a coolly elegant figure who partied with the international jet set and carried one of India’s most famous surnames. Those who knew her, however, remember a different Parmesh: warm, caring, giving, and always fun to be with.

I first met her when I was 20 and just starting out in journalism. She was already Mrs Godrej, queen of Bombay society, and had no reason to give a damn about a young journo. But she was unfailingly hospitable, charming and friendly. At the time, she was famous for having bridged the gap between the film world and Bombay society, which had seemed unbridgeable till she appeared on the scene – and on the cover of Stardust.

We forget now that she was India’s first designer, running the successful Dancing Silks boutique at the Oberoi and making clothes for the top heroines of the 1970s. When fashion bored her, she moved into interior designing and set up Bombay’s hottest design firm, Inner Spaces, in partnership with Sunita Pitamber. Inner Spaces designed the homes of millionaires in Bombay, Delhi and London but is probably best remembered for its revolutionary approach to restaurant décor. The original China Garden in Kemps Corner was the first stand alone to actually look better than any five-star hotel restaurant.

By the time others had attempted to copy the success of Inner Spaces, Parmesh had finally got involved with the Godrej Group’s businesses, advising the real estate development division. I used to joke with her that with Inner Spaces she made so much money that she could have maintained her glamorous lifestyle without drawing on the Godrej wealth.

And her lifestyle was certainly glamorous. When she and her husband, Adi, abandoned their Carmichael Road apartment to spend more time at their stunning beach house in Juhu, their move had the effect of quadrupling property prices in Juhu. Suddenly, every millionaire wanted a beach house like the Godrejs.

Some of her legendary parties were thrown at that beach house and attended by the likes of Richard Gere, Goldie Hawn, Amitabh Bachchan and Imran Khan. The parties acquired an iconic status not because of the guest lists or the extravagance but because of Parmesh’s own sense of warm hospitality.

She was born into an upper middle-class Sikh family and met Adi when she was flying with Air India. They had an intense romance before marrying. Till the end, Adi remained the centre of Parmesh’s universe and for all the exterior glamour, the Godrejs and their children were a close-knit family.

When middle-class women marry into billionaire families, they usually have to change to fit in. Parmesh was the exception. She changed the Godrejs much more than they changed her. She took a conservative Parsi family whose idea of a good time was a family picnic and introduced it to international glamour. But through it all, she remained the exuberant Punjabi she had always been: generous to a fault, full of life and vitality, and yet, at the same time, sensitive and vulnerable.

She was a true original.

(साभार: हिन्दुस्तान टाइम्स)

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टीवी संस्कृति में चैनल ऐसा अध्याय लिख रहे हैं, जिसे कोई भी नहीं पढ़ेगा मिस्टर मीडिया!  

अतिरेक किसी भी चीज का अच्छा नहीं होता। यह दौर चीख चीख कर कह रहा है कि अब बस भी करिए। वरना अवाम अब सब कुछ अपने हाथ में ले लेगी।

Last Modified:
Monday, 06 July, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

हमारे कुछ एंकर और उनके साथ चर्चाओं में शामिल चीख पुकार करने वाले अब हद पार करने लगे हैं। एक पुराने फौजी ने बीते सप्ताह सीधे प्रसारण में चर्चा के दरम्यान खुल्लम खुल्ला गाली बकी। उमर दराज यह अधिकारी यकीनन सत्तर साल से अधिक के हैं और दादा-नाना बन चुके होंगे। उनकी अपने घर की नई पीढ़ी ने इस पुरखे के मुंह से मां-बहन की गाली सुनकर कैसा महसूस किया होगा- सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है। यह तो पक्का है कि उसने कोई गर्व का अनुभव नहीं किया होगा। अब ऐसी अभद्र, गंवार और जाहिल भाषा बोलने वाले का क्या किया जाए? कोई भी सभ्य समाज इसे स्वीकार नहीं करेगा। अफसोस! भारतीय टीवी संस्कृति में चैनल एक ऐसा अध्याय लिख रहे हैं, जिसे कोई भी नहीं पढ़ना चाहेगा।

पत्रकारिता जैसे शानदार और गरिमामय पेशे को एक मंडी में ले जाकर खड़े करने वाले लोग अब शर्म और अश्लीलता का कौन सा दृश्य उपस्थित करेंगे, कोई नहीं कह सकता। मगर इतना तो तय है कि एक परिवार साथ बैठकर चाय की चुस्कियों के बीच ये चैनल नहीं देख सकता। युवा पीढ़ी ने तो खबरिया चैनल देखने करीब-करीब बंद ही कर दिए हैं। इस गंभीर स्थिति के बाद भी सूचना-प्रसारण मंत्रालय अगर चैनल लाइसेंस देने के कायदे-कानून की किताब के पन्ने नहीं पलटे तो मान लिया जाना चाहिए कि ऐसे मंत्रालयों पर ताला लटका देना ही बेहतर है। न मंत्रालय अब काम का रहा और न प्रसार भारती। सिर्फ रेडियो और दूरदर्शन अलग अलग अस्तित्व में आएं और सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय के नियंत्रण में हों। साल भर के हजारों करोड़ रुपए बचाए जा सकेंगे।

कुछ दर्शक ऐसे भी होंगे, जो निस्संदेह चैनलों पर यह नंगा नाच पसंद करते होंगे। तभी तो टीआरपी के लिए कुछ भी करेगा वाली शैली में छोटे परदे पर यह गंदगी परोसी जा रही है। ऐसे दर्शक और पाठक तो हर काल खंड में हुआ करते हैं। चालीस पचास साल पहले ‘दिनमान’, ‘रविवार’, ‘धर्मयुग’, ‘नवनीत’, ‘कादंबिनी’ और ‘रीडर्स डाइजेस्ट’ जैसी विशुद्ध साहित्यिक और सम सामयिक पत्रिकाएं निकलती थीं और मुंबई में विक्टोरिया टर्मिनल के सामने तथा उत्तर भारत के तमाम जिलों में फुटपाथ पर मस्तराम और लल्लू मल जैसे लेखकों की नंगी कहानियां भी बिकती थीं। अब वह सब इंटरनेट पर उपलब्ध है। क्या हमारे चैनल उसी श्रेणी में जाकर खड़े हो जाना चाहते हैं?

अतिरेक किसी भी चीज का अच्छा नहीं होता। यह दौर चीख चीख कर कह रहा है कि अब बस भी करिए। वरना अवाम अब सब कुछ अपने हाथ में ले लेगी। जब सड़ी और फफूंद लगी ब्रेड के खिलाफ उपभोक्ता आंदोलन खड़ा हो सकता है, घटिया और मिलावटी माल के खिलाफ कंज्यूमर एकजुट हो सकता है तो भारतीय टीवी चैनलों को भी सड़ांध और दुर्गन्ध फैलाती मानसिक खुराक परोसने के लिए एक विराट उपभोक्ता आंदोलन का सामना करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। अवाम के चाबुक से बड़ा कोई प्रहार नहीं होता। यह हकीकत चैनलों को, उनके पेशेवरों को, उनके मालिकों को और उन्हें संरक्षण देने वालों को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। अगर नहीं ध्यान दिया तो वर्तमान को अतीत बनने में सिर्फ एक पल लगता है। अपने बच्चों, परिवारों और समाज के लिए सुधर जाइए मिस्टर मीडिया!

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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‘जहां काम करना पत्रकार का सपना होता था, उसे राष्ट्रद्रोही कहा जा रहा है मिस्टर मीडिया’

जिस एजेंसी का नाम लेते ही हम मीडिया के लोग गर्व से भर जाते थे, वह अब राष्ट्रद्रोही ठहराई जा रही है। पीटीआई हिंदुस्तान ही नहीं, समूचे संसार में सबसे बड़े नेटवर्क वाली संस्थाओं में से एक है।

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 30 June, 2020
Last Modified:
Tuesday, 30 June, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।  

जिस एजेंसी का नाम लेते ही हम मीडिया के लोग गर्व से भर जाते थे, वह अब राष्ट्रद्रोही ठहराई जा रही है। ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’, हिंदुस्तान ही नहीं, समूचे संसार में सबसे बड़े नेटवर्क वाली संस्थाओं में से एक है। एशिया में तो यह संस्था अव्वल नंबर पर है। इस संस्था में काम करना किसी जमाने में एक पत्रकार का सपना हुआ करता था। लेकिन भारत सरकार की ओर से पोषित प्रसार भारती ने चंद रोज पहले उसे चीनी राजदूत के साक्षात्कार को लेकर देशद्रोही होने का प्रमाणपत्र दे दिया है। पत्रकारिता से जुड़े संस्थान, समाचारपत्र और खबरिया टीवी चैनल इस खबर के बाद बड़े असहज हैं।

दरअसल, आजादी से बीस बरस पहले एसोसिएशन प्रेस ऑफ इंडिया का गठन हुआ था। तब यह रॉयटर की हिंदुस्तानी शाखा की तरह काम करती थी। स्वतंत्रता मिलने के बाद 1949 में देश के समाचारपत्रों ने विदेशी स्वामित्व का जुआ उतार फेंका और इसे खरीद लिया। देखते ही देखते यह संसार की चुनिंदा समाचार एजेंसियों में शुमार हो गई। भारत आज दुनिया में अपनी आवाज को पल भर के भीतर पहुंचाने में सक्षम है तो उसके पीछे पीटीआई का बहुत बड़ा हाथ है। मुझे याद है कि कारगिल जंग में हमारी समाचार कथाएं इस संस्था की बदौलत ही विश्व में सहानुभूति और समर्थन बटोर रही थीं। पाकिस्तान के पास ऐसी कोई प्रतिष्ठित संस्था नहीं है। इसका उसे हरदम खामियाजा उठाना पड़ा है।

मुझे याद है कि बांग्लादेश युद्ध के समय श्रीमती इंदिरा गांधी ने संस्था के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का बेहद चतुराई से उपयोग किया था। दुनिया भर के देशों के सामने पाकिस्तान की हकीकत उजागर हो गई थी। उस समय के पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में पश्चिमी पाकिस्तान की सेना के जुल्मों की कहानियां पीटीआई के मार्फत ही संसार के करोड़ों लोगों तक पहुंची थीं। देखते ही देखते विश्व जनमत भारत के पक्ष में हो गया था। इससे पूर्व मई 1971 से नवंबर तक हिंदुस्तान आए लाखों बांग्लादेशी शरणार्थियों की मार्मिक और लोमहर्षक दास्तानें पीटीआई ने संसार को सुनाईं तो लोग हक्के बक्के रह गए। राष्ट्रहित में प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया के संवाददाताओं ने जोखिम उठाकर पत्रकारिता की है।

1962 के चीन युद्ध, 1965 के पाकिस्तान युद्ध, बांग्लादेश युद्ध, एशियाड, गुट निरपेक्ष देशों के सम्मेलन, परमाणु परीक्षण, अंतरिक्ष अभियान, कारगिल युद्ध और कॉमनवेल्थ खेलों के शानदार कवरेज की बदौलत इस संस्था ने संसार में तिरंगा लहराया है। आज उसी संस्था को पत्रकारिता के मापदंडों का पालन करने पर देशद्रोही ठहराया जा रहा है। एक संस्था देश का नाम रौशन करती है, उस संस्था से अगर काम लेना नहीं आए तो क्या कहा जाए? नाच न जाने आंगन टेढ़ा इसी को कहते हैं।

भारतीय पत्रकारिता इन दिनों संक्रमण काल का सामना कर रही है। इन दिनों व्यवस्था या व्यवस्था से संबद्ध किसी प्रतीक संगठन को जब पत्रकारिता का काम रास नहीं आता तो उसे देशद्रोही या गद्दारी का प्रमाणपत्र दिया जाने लगा है। अभी तक व्यक्तियों को ही देशद्रोही ठहराया जा रहा था। अब ऐतिहासिक और विश्वस्तरीय संस्थाओं को भी राष्ट्रद्रोही बताया जाने लगा है। भय होने लगा है। क्या इस मुल्क में देशद्रोहियों के अलावा और भी कोई भारतीय नागरिक शेष है, जो देशद्रोही नहीं है। अगर ऐसा है तो फिर इस आरोप से दुखी क्यों होना चाहिए मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: धुरंधर संपादक परदे के पीछे के समीकरण क्यों नहीं समझते?

सियासत ने हमें आपस में लड़ने के लिए चाकू-छुरे दे ही दिए हैं मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: इसलिए भी डराती है लोकतंत्र के चौथे खंभे पर लटकी यह तलवार

पिछले दिनों पत्रकारों के साथ हुए अभद्र व्यवहार का असल कारण भी यही है मिस्टर मीडिया!

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‘पत्रकारिता में इस मान्यता को एसपी सिंह ने पूरी तरह बदल दिया था’

आज श्री सुरेंद्र प्रताप सिंह जी की पुण्यतिथि है। सुरेंद्र प्रताप सिंह हिंदी पत्रकारिता के ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने पत्रकारिता में एक विभाजन की रेखा खींची थी।

संतोष भारतीय by
Published - Saturday, 27 June, 2020
Last Modified:
Saturday, 27 June, 2020
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संतोष भारतीय
प्रधान संपादक, चौथी दुनिया।।

आज श्री सुरेंद्र प्रताप सिंह जी की पुण्यतिथि है। सुरेंद्र प्रताप सिंह हिंदी पत्रकारिता के ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने पत्रकारिता में एक विभाजन की रेखा खींची थी। सुरेंद्र प्रताप सिंह के संपादक बनने से पहले हिंदी पत्रकारिता में वही संपादक हो सकता था, जो 50 साल से ऊपर की उम्र का हो और खासकर साहित्यकार हो। उसी को माना जाता था कि यह संपादक होने के लायक है। लेकिन, सुरेंद्र प्रताप सिंह ने इस मान्यता को बदल दिया और उन्होंने ये साबित किया कि 20-22 साल या 24 साल की उम्र के लोग ज्यादा अच्छी पत्रकारिता कर सकते हैं।

उन्होंने इस भ्रम को भी तोड़ दिया कि साहित्यकार ही पत्रकार हो सकता है। उन्होंने ये साबित कर दिया कि पत्रकारिता अलग है और साहित्य अलग है। हालांकि, इसके ऊपर काफी बहस हुई। श्री सच्चिदानंद हीरानंद वात्साययन अज्ञेय और श्री सुरेंद्र प्रताप सिंह ने पटना के एक होटल में काफी चर्चा की। इस बातचीत में अज्ञेय जी वह तर्क रख रहे थे कि सुरेंद्र प्रताप सिंह जो पत्रकारिता कर रहे हैं, वह गलत कर रहे हैं, जबकि उनके समय के लोगों ने जो पत्रकारिता की, वह सही थी। उस समय रिकॉर्डिंग नहीं थी, लेकिन दोनों के बीच में इतना अद्भुत संवाद हुआ कि जो मेरी स्मृति में अब तक लगभग पूरी तरह है। मैं कहना चाहता हूं कि सुरेंद्र प्रताप सिंह ने पत्रकारिता को नई दिशा दी, जिसमें उन्होंने नौजवान लड़के-लड़कियों को नया पत्रकार बनाया।

आज के तमाम बड़े पत्रकारों में वही नाम हैं, जिन्होंने सुरेंद्र प्रताप सिंह के साथ काम किया। ये अलग बात है कि कभी-कभी पत्रकारिता शीर्षासन कर जाती है। जिस आजतक को उन्होंने देश के टेलिविजन के मानचित्र पर एक समाचार चैनल के रूप में स्थापित किया, वो अगर आज होते तो शायद आजतक बहुत बेहतर होता। क्योंकि सुरेंद्र प्रताप सिंह शुद्ध पत्रकारिता करते थे और कभी भी किसी का पक्ष नहीं लेते थे। वे स्टोरी के साथ खड़े होते थे, लेकिन आज ज्यादातर पत्रकार पत्रकारिता कम और पब्लिक रिलेशन को स्टैबलिश करने वाली पत्रकारिता ज्यादा कर रहे हैं। मैं आज दुखी इसलिए हूं कि सुरेंद्र प्रताप सिंह की पुण्यतिथि के ऊपर वो लोग उन्हें याद नहीं कर रहे हैं, जिन्हें सुरेंद्र प्रताप सिंह ने गढ़ा था या बनाया था। शायद इसलिए याद नहीं कर रहे हैं कि लोग रास्ते से भटक गए हैं और वे पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों की जगह अपने नए सिद्धांत गढ़ रहे हैं और ये मैं पत्रकारिता के लिए बहुत दुखद मानता हूं और इसलिए आज देश में पत्रकारिता की साख समाप्त हो गई है।

मुझे वो दिन याद हैं, जब सुरेंद्र प्रताप सिंह रविवार के संपादक थे और उनके कुछ विशेष संवाददाता जब किसी राज्य में जाते थे, तो पूरी राज्य सरकार हिल जाती थी। उनके पत्रकारों की रिपोर्ट के ऊपर कई मंत्रियों के इस्तीफे हुए, मुख्यमंत्रियों के इस्तीफे हुए और पूरी सरकार सामने खड़ी हुई और उसे जवाब देना पड़ा। ऐसी कम से कम 200 स्टोरीज मुझे याद हैं, जो सुरेंद्र जी के जमाने में छपीं। लेकिन आज पत्रकार कुछ लिखता है या टेलिविजन पर कुछ दिखाता है, तो लोग एक सेकंड में समझ जाते हैं कि ये स्टोरी कहां से प्रेरित है या किसके पक्ष में है या ये पत्रकार इस रिपोर्ट में किस पार्टी को या किस व्यक्ति की महिमा मंडित करना चाहता है।

महिमा मंडन की पत्रकारिता सुरेंद्र जी ने कभी नहीं की। इसलिए सुरेंद्र जी पत्रकारिता के शिखर पुरुष हैं, शीर्ष पुरुष हैं और मैं ये मानता था कि सुरेंद्र जी आगे बढ़ने वाला कोई न कोई पत्रकार तो हिंदी में पैदा होगा, लेकिन इतने साल बीत गए सुरेंद्र जी के जाने के बाद, दुर्भाग्य की बात है कि कोई भी पत्रकार सुरेंद्र जी की खींची रेखा से आगे नहीं बढ़ पाया। बल्कि मैं तो ये कहूं कि उन्होंने जिन लोगों को शिक्षा-दीक्षा दी और जो अपने जमाने में जिनके ऊपर वो खुद भरोसा करते थे, उन पत्रकारों से आगे भी कोई दूसरा पत्रकार नहीं बन पाया।

सुरेंद्र जी रिपोर्ट को या रिपोर्टर को इतना सम्मान देते थे, उसे इतनी साख देते थे कि लोग इस लिखे हुए को पढ़ने के लिए ‘रविवार’ खरीदते थे और ये उदाहरण देते थे कि चूंकि रविवार में यह छपा है या इस पत्रकार ने इस रिपोर्ट को लिखा है, इसलिए यह सही ही होगी। ये सम्मान अब किसी को नहीं मिल रहा है। अब तो जो बड़े नाम वाले लोग हैं, जो टीवी में आकर अपनी बात कहते हैं, उनकी बात की भी कोई साख नहीं है, क्योंकि उन्होंने अपनी रिपोर्ट से और अपनी बातों से उस साख को खत्म कर दिया है।

मैं इस पर बहुत ज्यादा नहीं कहना चाहूंगा क्योंकि यह बहुत ही मार्मिक विषय है, दुखद विषय है और पत्रकारिता की ‘लाश’ को देखने का एक तरीके का नजारा दिखाता है। मैं सिर्फ इतना कहूंगा कि सुरेंद्र जी के जमाने की पत्रकारिता या सुरेंद्र जी ने जिस तरह पत्रकारिता को साख दी, जिस तरह उन्होंने पत्रकारिता को गरिमा दी, वैसी साख और गरिमा देने वाले लोगों का आज इंतजार है, वो चाहे रिपोर्टर हों या डेस्क के लोग हों या संपादक हों। मुझे नहीं पता कि कब ऐसा वक्त आएगा, लेकिन ऐसा वक्त अगर नहीं आएगा तो हम अपने देश में पत्रकारिता के ‘कब्रिस्तान’ तो देखेंगे, पत्रकारिता के स्मारक नहीं।           

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
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'वह एक काला दिन था, जब टीवी पर खबरों का संसार रचने वाला शख्स सदा के लिए चला गया'

कोई कहता है कि सफल होने के लिए टैलेंट चाहिए, कोई कहता है कि पैसा चाहिए, कोई कहता है कि अच्छा दिमाग चाहिए।

Last Modified:
Saturday, 27 June, 2020
Nirmalendu

निर्मलेंदु, स्थानीय संपादक
दैनिक भास्कर, उत्तरप्रदेश

कोई कहता है कि सफल होने के लिए टैलेंट चाहिए, कोई कहता है कि पैसा चाहिए, कोई कहता है कि अच्छा दिमाग चाहिए। मैं कहता हूं कि सफल होने के लिए इनमें से कुछ भी नहीं है तो चलेगा, लेकिन नैतिकता और प्रामाणिकता जरूर चाहिए। सच्चा अभिगम चाहिए, काम के प्रति लगाव चाहिए, मेहनत करने का जज्बा चाहिए, लगन चाहिए, अपनी गलती को स्वीकार करने की हिम्मत चाहिए, जीवन में कृतज्ञता और भाव-पूर्णता का संगम चाहिए, कभी न थकने वाला जुनून चाहिए और खुद एवं ईश्वर पर विश्वास चाहिए। अगर इतनी सारी चीजें किसी के पास हैं तो सफलता उनके कदम जरूर चूमेगी। जी हां, ये सभी गुण एसपी सिंह में थे और शायद इसलिए उतनी कम उम्र में वह संपादक रूपी सिंहासन पर आसीन हो सके, जहां अधिकांश लोग पचास के बाद ही पहुंच पाते हैं। 'रविवार' पत्रिका और 'आजतक' चैनल को जन्म देने, उसे बनाने, सजाने और संवारने और दृश्य खबरों के संसार में नई क्रांति लाकर खबरों के संसार में नंबर वन बन बैठे एसपी ने 'आजतक' को ही अपना पूरा जीवन दान कर दिया।

एसपी। जी हां, एसपी यानी मेरे लिए सब कुछ। एसपी सिंह, एक ऐसा नाम जो पत्रकार से ऊपर एक इंसान थे। एक सरल इंसान, स्वाभाविक, मृदुभाषी, कम बोलने वाला हंसता मुस्कुराता हुआ एक चेहरा। छोटा हो या बड़ा, सबसे एक साधारण इंसान की तरह मिलते थे। आप यदि नौकरी मांगने उनके घर जाएंगे, तो आपको नहीं लगेगा कि वह इतने बड़े इंसान हैं। आपके साथ पल्थी मारकर बैठ जाएंगे। आपको माछ भात भी खिलाएंगे, आपके घर की माली हालत के बारे में भी जानेंगे और उसके बाद आपके रेज्यूमे पर गौर करेंगे। मेरे साथ भी कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ था। पापा के कहने पर नौकरी मांगने गये थे उनके कोलकाता स्थित श्यामनगर वाले घर में। मेरे पापा के ऑफिस सहकर्मी साउ जी ने इंट्रोड्यूस करवाया था। घर पहुंचे, वो गेट पर ही मिल गये। पहले तो लुंगी पहन कर वे आये। चूंकि दोपहर का समय था तो मुझे माछ भात खिलाया और उसके बाद उन्होंने रेज्यूमे पर चर्चा की। नौकरी मिल गयी और उनके निधन के पहले तक मै उनके साथ छोटे भाई की तरह लगा रहा, लेकिन 27 जून 1997 के दिन वह हमसे बिछड़ गये।

दरअसल, जिस दिन एसपी सिंह का देहांत हुआ, मैं दिल्ली लेट पहुंचा। कोलकाता में अक्षर भारत में काम करते हुए 13 दिनों तक मैं लगातार कोलकाता और दिल्ली का चक्कर काट रहा था। हुआ यह था कि 16 जून की सुबह सुबह पत्रकार शैलेष जी का फोन आया। उन्होंने कहा कि एसपी बीमार हैं। उन्होंने कहा कि निर्मल अभी किसी को कुछ मत बताना। बस, उनके घरवालों का फ्लाइट का टिकट कटवा दो। मैंने कल्याण मजुमदार को कहकर स्पेशल कोटे में बड़े भइया से लेकर सबका टिकट कटवाया, दोपहर की फ्लाइट थी। 27 जून को भी सुबह 11.30 बजे शैलेष जी का फोन आया कि एसपी सिंह नहीं रहे। दरअसल, दूरदर्शन के 11 बजे के बुलेटिन में यह खबर आयी कि एसपी सिंह नहीं रहे। मैं तब कोलकाता में था, लेकिन मुझे दोपहर का टिकट नहीं मिला। शाम की फ्लाइट पांच बजे की थी। वह फ्लाइट लेट हो गयी। सात बजे कोलकाता से छूटी। मैं रात को साढ़े नौ बजे पहुंचा। निजामुद्दीन घाट जाने के लिए स्कूटर में बैठा। रास्ते में स्कूटर चालक ने पूछा कि वहां कहां जाना है तो मैंने कहा कि घाट जाना है। उन्होंने पूछा क्यों? मैंने कहा कि वो एक सज्जन हैं, जिनकी मौत हो गयी है। उन्होंने पूछा कि आजतक वाले। मैंने कहा हां। उन्होंने कहा कि वह सब कुछ तो शाम सात बजे ही खत्म हो चुका है। बाद में जानकारी मिली कि अटल बिहारी वाजपेयी, गुजराल, सीताराम केसरी, जयपाल रेड्डी माधव राव सिंधिया, सुषमा स्वराज सबसे पहले वहां पहुंचे। सबसे बाद में दो मिनट के लिए दिल्ली के सीएम साहब सिंह वर्मा भी वहां पहुंचे थे। आज ये सभी लोग इस दुनिया में नहीं हैं। शायद एसपी के साथ वे भी ऊपर बैठकर गुफ्तगू कर रहे होंगे। खबर सुनकर मुझे लगा कि मेरी दुनिया खत्म हो चुकी है। मैं भइया को देख नहीं पाया। यह दुख, यह पीड़ा आज भी मुझे सताती है, लेकिन थोड़ी देर बाद मुझे इस बात का अहसास हो जाता है कि वो मेरे आसपास हैं। मुझे निहार रहे हैं। मुझे सिखा रहे हैं। मुझे पढ़ा रहे हैं। मुझ पर प्यार बरसा रहे हैं। दरअसल, आज भी उन्हीं की यादों में मेरे दिन की शुरुआत होती है और ऑफिस पहुंचते ही उनकी यादों को दूसरों से बांटने में दिन बीत जाता है।

कुछ लोग दूसरी रिपोर्टों को पढ़कर एसपी सिंह के बारे में कुछ भी लिखते हैं, लेकिन मेरा तो उनके साथ अप्रैल 1977 से संबंध है। उनके बारे मे क्या लिखूं और क्या बताऊं, समझ में नहीं आता। अनगिनत बातें और अनगिनत यादें। 1977 से 1997 तक। बीस साल तक उनके साथ मैं साये की तरह लगा रहा। वे मेरे लिए क्या थे। शायद मैं इसे किसी को समझा नहीं सकता। पथ प्रदर्शक, संपादक, बड़े भाई, पिता या कुछ और। उन्होंने 'रविवार' क्यों छोड़ा, छोड़ने से पहले क्या हुआ, 'आनंद बाजार पत्रिका' के ऑनर अरूप बाबू ने उन्हें कितनी देर तक बिठाकर रखा, अभीक सरकार ने क्या कहा। 'नवभारत टाइम्स' क्यों छोड़ा, उस दिन 'नवभारत टाइम्स' के ऑनर समीर जैन के साथ क्या हुआ था। मैं घर से दौड़ा दौड़ा सुबह-सुबह क्यों उनके घर गया। उन्होंने मुझे उस दिन क्या हिदायत दी थी। जिस दिन उन्होंने 'नवभारत टाइम्स' छोड़ा था, कपिल देव की एजेंसी में क्यों अचानक गये। जॉइन करने से पहले उनकी क्या-क्या बातें हुईं । एजेंसी में जॉइन करने से पहले कपिल देव से वे कब मिले,  'राष्ट्रीय सहारा' में उन्होंने जॉइन क्यों किया और किसके कहने पर किया। चार दिन बाद उन्होंने 'राष्ट्रीय सहारा' कयों छोड़ा? जब मैं और भइया रोज उनके घर से 'राष्ट्रीय सहारा' जाते तो मुझे वे क्या-क्या सलाह देते और मुझे क्या कहते। किस तरह से वह टेलिविजन की दुनिया में गये। अरुण पुरी से क्या-क्या बातें हुईं और मैं कैसे बिछड़ गया, वे सारी बातें आज यादें बनकर रह गई हैं।

जिस दिन वह सदा के लिए हमसे बिछड़ गये, उस दिन की यादें। सच तो ये ही है कि टेलिविजन और प्रिंट की दुनिया में आज जितने भी बड़े नाम हैं, वे सब उन्हीं की देन हैं। संतोष भारतीय, कमर वहीद नकवी, शैलेष दा, जयशंकर गुप्त, अरुण रंजन, उदयन शर्मा, राजेश बादल, रामकृपाल सिंह, संजय पुगलिया, अजय चैधरी, पुण्य प्रसून वाजपेयी, आशुतोष गुप्ता, दीपक चौरसिया, अनिल ठाकुर, राजकिशोर और आजतक के सुप्रिय प्रसाद ऐसे ही बहुत सारे पत्रकार। 'न्यूज24' के ऑनर राजीव शुक्ला भी उन्हीं की देन हैं। हमें पता नहीं कि ये लोग एसपी सिंह को याद करते हैं या नहीं, लेकिन मैं उन्हें किसी न किसी बहाने लगभग रोज याद कर ही लेता हूं। कभी संपादक के रूप में, कभी एक अच्छे इंसान के रूप में, कभी उन्हें लोगों को माफ करने के कारण, कभी एक मसीहा के रूप में, तो कभी एक खबरचीलाल के रूप में, तो कभी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए एक बड़े भाई के रूप में और कभी पिता के रूप में।

सच तो ये ही है कि मैंने अपनी पूरी जिंदगी में जितनी बातें पिता की नहीं सुनीं, उनकी सुनी हैं। उनकी बातें मेरे लिए ब्रह्म वाक्य थे। और हां, मैं एक नाम लेना तो भूल ही गया। वह नाम है नीरेंद्र नागर का, जो आज भी एसपी की चर्चा चलते ही उन्हें याद करते हैं। उन्होंने ही मेरी लिखी एसपी की किताब के संपादन का भार संभाला और खूब संभाला। मैं आज भी नीरेंद्र नागर को नहीं भूल पाया। इसके साथ ही अरुणरंजन और संतोष भारतीय को भी नहीं भूल पाऊंगा, जो कि उनके साथ साये की तरह लगे रहे। उनके एक और परम मित्र कोलकाता में थे, अक्षय उपाध्याय, वो भी एसपी भइया के पहले ही चले गये और सतन कुमार पांडे को मैं कैसे भूल सकता हूं, क्योंकि उनके साथ उनके कॉलेज के दिनों से ही संबध थे। दोनों मे बहुत ही गहरी मित्रता थी। अंतिम दिनों तक उनके साथ लगे रहे, लेकिन इन लोगों ने एसपी भइया के साथ रहने का दंभ कभी नहीं भरा और चुपचाप दोस्ती निभाते रहे। एक नाम और है, जो अब इस दुनिया में नहीं रहे। आनंद बाजार पत्रिका के बिजित बसु। एसपी भइया के परम मित्रों में से एक और राजदार। राज की बातें उन्हीं से शेयर करते थे।

दरअसल, एसपी भइया के.दो और परम मित्र थे। एमजे अकबर, अंग्रेजी पत्रकारों में एक बड़े ख्याति प्राप्त पत्रकार, उदयन शर्मा जो कि अब नहीं रहे। एसपी सिंह, उदयन शर्मा और एमजे अकबर की दोस्ती 'टाइम्स ऑफ इंडिया' मुंबई से शुरू हुई। ये तीनों विचारों के धनी और दोस्तों के दोस्त। बस यादें रह गयी हैं।

जी हां, यादें ही रह गयी हैं। वह एक काला दिन था, जब टेलिविजन पर खबरों का गजब का संसार रचने वाला एक शख्स हमारे बीच से सदा के लिए चला गया। तब दूरदर्शन ही था, जिसे पूरे देश में समान रूप से सनातन सम्मान के साथ स्वीकार किया जाता था। ये भी एक सच है कि देश के इस राष्ट्रीय टेलिविजन के मेट्रो चैनल की इज्जत एसपी सिंह की वजह से ही बढ़ी थी, क्योंकि वे उस पर रोजाना रात दस बजे खबरें लेकर आते, मुस्कुराते हुए, हंसी ठट्ठा करते हुए, खबरों पर कटाक्ष करते हुए, टीवी के परदे से इस पार झांकते, खबरों को जीते, दृश्यों को शब्द देते और शब्दों को तौलते और बीच बीच में उनका कटाक्ष कभी राजनीतिज्ञों पर, तो कभी ब्यूरोक्रेट्स पर तो कभी विपक्ष पर। सीधा वार। वह समाचार पुरुष खबरों की दुनिया में जो काम कर गया, पत्रकारों को जो इज्जत उन्होंने दी, टेलिविजन जगत में हिंदी पत्रकारिता को जो मुकाम दिया, वह आज तक कोई और नहीं कर पाया।

लेकिन हम सबको इस संसार को एक न एक दिन त्यागना ही पड़ता है। वो भी त्याग कर चले गये, लेकिन वे जरा जल्दी चले गये। हालांकि वे शाही अंदाज में गये। शायद ही ऐसा कोई पत्रकार होगा, जिसे शाही अंदाज मे जाने का मौका मिला हो। हां रफी साब भी जल्दी चले गये थे। मेरे दादा-दादी कहा करते कि जो अच्छे लोग होते हैं, उन्हें भगवान जल्दी बुला लेते हैं। रफी साब को भी जल्दी बुला लिया था। शायद इसलिए इन दोनों को बुला लिया था, क्योंकि भगवान को भी अच्छे लोगों की सोहबत में रहना अच्छा लगता है। गीता में कहा गया है कि जन्म लेने वाले के लिए मृत्यु उतनी ही निश्चित है, जितना कि मृत होने वाले के लिए जन्म लेना। इसलिए जो अपरिहार्य है, उस पर शोक नहीं करना चाहिए। लेकिन किसी की अच्छाइयों को भूल पाना कितना कठिन काम है, यह वही समझ सकता है जिसके साथ यह घटित होता है ...

27 जून 1997 को दूरदर्शन के दोपहर के बुलेटिन पर खबर आई। ये थीं खबरें अब तक। एसपी सिंह नहीं रहे। दुनिया को दुनिया भर की खबरें देने वाला एक खबरची एक झटके में खुद खबर बनकर रह गया। लेकिन दरअसल, यह खबर नहीं थी। एक वार था, एक प्रहार था, जो देश और दुनिया के लाखों दिलों पर बहुत गहरे असर कर गया। शुक्रवार का दिन था। काला शुक्रवार। इतना काला कि वह काल बनकर आया और हमारे एसपी भइया को काल के गर्भ में समा लिया। 27 जून 1997 को भारतीय मीडिया के इतिहास में सबसे दारुण और दर्दनाक दिन कहा जा सकता है। उस दिन से आज तक पूरे 23 साल हो गए। एसपी सिंह हमारे बीच में नहीं हैं, ऐसा बहुत लोग मानते हैं, लेकिन हम नहीं मानते, क्योंकि हमारा मानना है कि वे जिंदा हैं, हम में, आप में, और उन सब में, जो खबरों को खबरों की तरह नहीं, जिंदगी की तरह जीते हैं। हर इंसान की कद्र करते हैं। उन सबमें हम उन्हें देखते हैं, जिन्हें उन्होंने माफ कर दिया।

अनगिनत नाम हैं, जिन्हें उन्होंने माफ कर दिया। मेरे पास उन नामों की लिस्ट भी है, जो एसपी के पीछे उन्हें कोसते थे और एसपी भइया के सामने आते ही बिल्ली की तरह मिमियाते थे। एसपी भइया ने जिस तरह से समाज को दिया, जो प्यार और सरल स्वभाव लोगों में बांटा, जिस तरह से जर्नलिस्ट्स की एक कौम को आगे बढ़ाया, वे अद्भुत, अतुलनीय, अकाट्य और अस्वाभाविक है। वे सिखा ही रहे थे कि हमें छोड़कर चले गये। अपने जीवन के आखिरी न्यूज बुलेटिन में बाकी बहुत सारी बातों के अलावा एसपी भइया ने तनिक व्यंग्य में कहा था, मगर जिंदगी तो अपनी रफ्तार से चलती रहती है। जी हां, जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती रहती है। दरअसल, रात के दस बजे पूरे देश को जिस खिचड़ी दाढ़ी वाले चेहरे ने खबरों के माध्यम से जागृति पैदा की थी, वह शख्स चला गया। देश के लाखों लोगों के साथ अपने लिए भी वह सन्न कर देने वाला प्रहार था।

संगीत प्रेमी थे। सूफी संगीत प्रेमी, लेकिन बांग्ला और हिंदी गीतों को भी वे सुनते थे। मैं जब रफी साब का कोई गीत गुनगुनाता तो मुझे कहते कि निर्मल तुम बहुत अच्छा गाते हो। मजाक में व्यंग्य भी करते ... क्योंकि वह भी उनकी एक शैली थी। कहते-कहां तुम 'रविवार' में पड़े हो, तुम्हारे लिए तो मुंबई ही ठीक है। बस, ये ही कहते-कहते वे हमसे बिछड़ गये। मैं आज कुछ भी नहीं हूं, लेकिन मैं जो कुछ भी हूं, उनके कारण ही हूं। उनके सिखाये हुए कदमों पर ही चलने की कोशिश कर रहा हूं। एक नेक इंसान बनने की कोशिश् कर रहा हूं। मैं नहीं जानता उनका पांच प्रतिशत भी मैं बन पाउंगा या नहीं, लेकिन आज भी मेरी कोशिश जारी है उन्हें छूने की, उनसे बात करने की निर्मल बुलाते ही दौड़कर उन तक पहुंचने की। दरअसल, उनको किसी भी चीज का लोभ नहीं था। निर्लोभी थे। धन, दौलत, राजसी ठाट बाट, अहंकार को उन्होंने कभी नहीं ओढ़ा। उन्होंने काम करने की आजादी दी और मैं आजादी का फायदा उठाकर सीखता गया, सीखता गया, और सीखता गया। आज उनके जाने के बाद मुझे वह गीत याद आ गया। ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है...

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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संस्मरण: जेल जाने के लिए तैयार था मैं, पर कोई पकड़ने नहीं आया: डॉ. वैदिक

अब 45 साल बाद वह दिन फिर याद आया है। उन दिनों मैं नवभारत टाइम्स का सह-संपादक था। गर्मियों की छुट्टियों में अपने शहर इंदौर में था।

Last Modified:
Friday, 26 June, 2020
vaidik

डॉ. वेद प्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

अब 45 साल बाद वह दिन फिर याद आया है। उन दिनों मैं नवभारत टाइम्स का सह-संपादक था। गर्मियों की छुट्टियों में अपने शहर इंदौर में था। 26 जून की सुबह-सुबह मैं अपने मित्र कुप्प सी. सुदर्शन से मिलने गया, सियागंज के पास एक अस्पताल में। वे बाद में आरएसएस के सरसंघचालक बने। सुदर्शनजी का पांव टूट गया था। मेरे जाते ही सुदर्शनजी ने अपना ट्रांजिस्टर चलाया। पहली खबर सुनते ही रोंगटे खड़े हो गए। 25 जून की रात को ही आपातकाल की घोषणा हो गई थी और सूर्योदय के पहले जयप्रकाशजी समेत कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था। सुदर्शनजी से मिलने के बाद मैं सीधे ‘नईदुनिया’ के कार्यालय पहुंचा। उसके मालिक लाभचंदजी छजलानी, तिवारीजी, प्रधान संपादक राहुलजी बारपुते, अभयजी छजलानी आदि हम सब लोग एक साथ बैठे और यह तय हुआ कि इस मप्र के सबसे लोकप्रिय अखबार के संपादकीय की जगह खाली छोड़ दी जाए। अखबारों पर पाबंदियों के निर्देश तब तक सबके पास पहुंच गए थे। दोपहर की रेल पकड़कर मैं दिल्ली आ गया। नवभारत टाइम्स के सारे पत्रकारों की बैठक 27 जून को हुई, जिसमें सभी पाबंदियों को पढ़ा गया। हमारे संपादक श्री अक्षयकुमार जैन के कमरे में जाकर मैंने कहा कि मैं अपना इस्तीफा अभी ही देना चाहता हूं।

उन्होंने कहा कि मैं आपसे राष्ट्रीय राजनीति पर संपादकीय लिखने के लिए कहूंगा ही नहीं। आप अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ हैं। आप बस, उसी पर लिखते रहिए। आपातकाल के सभी उल्टे-सीधे कामों पर मुझसे वरिष्ठ जो दो सह-संपादक थे, वे ही बराबर तालियां बजाते रहे। तीसरे दिन कुलदीप नय्यरजी ने दिल्ली के प्रेस क्लब में पत्रकारों की एक सभा बुलाई। कुलदीपजी और मैंने आपातकाल की भर्त्सना की। उसके बाद मैंने कहा कि यहां रखे रजिस्टर पर सभी पत्रकार दस्तखत करें। देखते ही देखते हॉल खाली हो गया। मेरे सहपाठी और जनसत्ता के संपादक प्रभाष जोशी का शायद उस रजिस्टर में पहला दस्तखत था। अगले दो-चार दिनों में भारतीय पत्रकारिता की दुनिया ही बदल गई।

शास्त्री भवन में बैठे एक मलयाली अफसर को दिखाए बिना किसी अखबार का संपादकीय छप ही नहीं सकता था। बड़े-बड़े तीसरमारखां संपादक नवनीत-लेपन विशारद सिद्ध हो रहे थे। जेल में फंसे और छिपे हुए कई नेताओं से मेरा संपर्क बना हुआ था। अटलजी,चंद्रशेखरजी राजनारायणजी, मधु लिमये, जार्ज फर्नांडिस, बलराज मधोक आदि के संदेश मुझे नियमित मिला करते थे। उस समय के कई वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों जगजीवन राम, कमलापति त्रिपाठी, प्रकाशचंद मेठी, विद्याचरण शुक्ल आदि से मेरा निजी संपर्क था। सबकी बोलती बंद थी। उन दिनों विद्या भय्या (सूचना मंत्री) और मेरा भाषण जबलपुर विश्वविद्यालय में हुआ था। मैंने आपातकाल की खुलकर आलोचना की। विद्या भय्या मुझसे बात किए बिना चल पड़े। रात को शहर में कई पत्रकार मुझसे गुपचुप मिलने आ गए। ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के संपादक जॉर्ज वर्गीज का एक दिन फोन आया कि उन्हें और मुझे कल सुबह गिरफ्तार कर लिया जाएगा। इंदौर में मेरे पिताजी पहले से ही जेल में थे और अपने छात्र-काल में मैं कई बार जेल काट चुका था। मैंने पूरी तैयारी कर ली थी लेकिन कोई पकड़ने आया नहीं। कई और संस्मरण फिर कभी।

(वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वैदिक की फेसबुक वॉल से साभार)

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'परिवार, समाज या देश में कोई भी निर्णय लेने के लिए इन तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए'

कर्म मनुष्य के अधिकार में है परंतु कर्म फल नहीं। अंतिम क्षण में मनुष्य काल के प्रभाव के समक्ष पराधीन है। अतः अपना विवेक खोना नहीं चाहिए।

Last Modified:
Thursday, 25 June, 2020
Life

सृष्टि के आरंभ से लेकर अब तक स्थानानुगामी काल (समय) निरंतर चलता आ रहा है। अर्थात हमारे कालमान के अनुसार भूमण्डल के किसी स्थान में दो दिन के बराबर एक दिन रात्रि, कहीं दो महीनों की और कहीं 6 मासों तुल्य एक दिन रात्रि होती है। प्रायः इस भूमण्डल पर सभी जीव-जन्तु (मनुष्य, पशु-पक्षी, कृमि, कीट-पतंग, लता-गुल्म, वृक्ष-वनस्पति, औषधि-अन्न) आदि एक निश्चित कालखण्ड तक जीवित या दृष्टिगोचर होते रहते हैं। उनका कालखण्ड पूर्ण हो जाने पर अपनी जीर्ण अवस्था को प्राप्त कर एक दिन वे नष्ट हो जाते हैं, परंतु कई घटनाएं आगंतुक होती हैं, वह भी किसी निश्चित कालखण्ड में आकर असामयिक जीव, जन्तुओं को नष्ट कर जाती हैं, जिसका उदाहरण प्राकृतिक आपदाओं के द्वारा जाना जा सकता है। सम्प्रति इसका उदाहरण तूफान, कोरोना आदि है। यहां विचार करने की आवश्यकता यह है कि सब कुछ कालाधीन है।

सृष्टि के सभी शुभ अशुभ पदार्थों का रचयिता काल ही है। वह सब जीवों का विनाशकर्ता है। वही उनकी पुनरुत्पत्ति का कारण है। जब जीव सो रहा होता है तब भी काल जगा रहता है। काल के प्रभाव का अतिक्रमण संभव नहीं है। सृष्टि में जो भी पदार्थ पूर्व में थे, भविष्य में भी होंगे और वर्तमान में हैं, वे सब काल द्वारा निर्मित हैं। कर्म मनुष्य के अधिकार में है परंतु कर्म फल नहीं। अंतिम क्षण में मनुष्य काल के प्रभाव के समक्ष पराधीन है। अतः अपना विवेक खोना नहीं चाहिए।

कालः सृजति भूतानि कालः संहरति प्रजाः।

कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः।। (महाभारत आदि पर्व)

अर्थात् काल (समय) ही संसार को सृजन करता है और काल ही संसार के प्रजा का संहार करता है। काल के बलवान होने पर ही व्यक्ति को इंद्र पद (राजा) बनाता है और काल ही राजा के पद से उतार भी देता है।

काले तपः काले ज्येष्ठं काले ब्रह्मसमाहितः।

कालो हसर्वस्येश्वरोयः पिता{{सीत् प्रजापते:।। अथर्ववेद 19।53।8

अंतिम सत्य ईश्वर प्राप्ति सब का लक्ष्य होता है और होना भी चाहिए। पर परमात्मा का अंश जीवात्मा अपने महत्वाकांक्षा के कारण किस प्रकार इस मायाजाल में फंस जाता है। इसकी सामान्य प्रक्रिया यह है कि हम सब परमात्मा के अंश हैं। परमात्मा के अंश इस जीवात्मा के नवगुण हैं यथा- 1। बुद्धि, 2। इच्छा, 3। सुख, 4। दुःख, 5। प्रयत्न, 6। संस्कार, 7।पुण्य, 8। पाप, 9। द्वेष।

इसी के सहारे सम्पूर्ण संसार चलता है। जैसे ही नीचे के क्रम में विकृति (दोष) उत्पन्न होती है, वैसे ही उत्तरोत्तर के क्रम में विकृति उत्पन्न होने लगाती है। द्वेष से पाप, पाप से पुण्य का क्षय, पुण्य क्षय से संस्कार नष्ट हो जाते हैं, संस्कार नष्ट हो जाने पर प्रयत्न को प्रभावित करता है। प्रयत्न प्रभावित होने पर दुःख उत्पन्न करता है।

दुःख से सुख प्रभावित होता है। सुख न होने पर इच्छाशक्ति कमजोर पड़ जाती है। इच्छाशक्ति कमजोर होने पर बुद्धि को प्रभावित करती है। इस संदर्भ में भर्तृहरि नीतिशतककार ने सज्जन, महान् आत्मा तथा सफल व्यक्ति का उदाहरण बहुत अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया है-

विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।

यशसि चाभिरुचिव्र्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिमिदं हि महात्मनाम।

अर्थात् विपत्ति पड़ जाने पर धीरज, अधिक उन्नति होने पर क्षमा, सभा में उचित बोलने की चतुराई, संग्राम में पराक्रम, यश में अभिलाषा, वेदशास्त्र के पढ़ने में तत्परता, अर्थात् महात्माओं के ये स्वाभाविक लक्षण होते हैं। ये सारे गुण राजाओं में होने चाहिए। क्योंकि राजा भी ईश्वर का अंश है और सामान्य जनता से ईश्वरीयगुण उनमें अधिक होता है। प्राचीन काल में राजाओं का मापदंड हुआ करता था, जो आज न के बराबर है। अतः जिस देश के राजा महान आत्मा वाले होंगे, उस देश का निश्चित रूप से भला होगा।

दूसरी बात परिवार, समाज या देश में किसी भी प्रकार का निर्णय लेने के लिए तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए- 1। देखो, 2। समझो, 3। फिर करो।

यहां प्रश्न यह उठता है कि सब कुछ जानते हुए भी काल के विकराल प्रभाव के समक्ष हम सब छोटे पड़ जाते हैं। ऐसी परिस्थिति में राजा को चाहिए एक उत्तम दैवज्ञ की सलाह से चलें तो उत्तम फल की प्राप्ति होगी। क्योंकि दैवज्ञ (ज्योतिषी) काल वेत्ता होता है। पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति यथा अक्षांश रेखांश आदि का ज्ञाता होता है।

देश, काल, परिस्थिति से पूर्णतः अवगत होता है इसलिए यात्रा में शुभ फल प्राप्ति के लिए, युद्ध में विजय के लिए, किसी धर्म संकट के समय में निर्णय के लिए, महामारी आदि प्राकृतिक प्रकोप से बचने के लिए। ज्योतिष के तीनों स्कन्धों- सिद्धांत, होरा एवं संहिता के मर्मज्ञ विद्वानों (दैवज्ञों) से सलाह अवश्य लेनी चाहिए।

डॉ. फणीन्द्र कुमार चौधरी
सह-आचार्य, ज्योतिष विभाग
श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

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'महामारी के दौर में इस तरह कर सकते हैं अंतिम क्रिया व पितृकर्म'

माना जाता है कि तभी उस जीव की मुक्ति होती है, जब उसकी कपालक्रिया अच्छी प्रकार संपन्न होती है

Last Modified:
Thursday, 25 June, 2020
Last Rituals

विदित हो कि वर्तमान काल में समस्त विश्वमंडल कोरोना नामक इस अदृश्यमान विषाणु से उत्पन्न रोग के दुष्प्रभाव से प्रभावित है। हालांकि दैविक एवं पैतृक आदि धर्मकर्मादियों के आचरण में कलिकाल का प्रभाव तो स्वयमेव एक दुरूह रोधक है, तथापि संस्कारवान लोग स्वधर्मपालन में यावच्छक्ति सदैव तत्पर रहते हैं। उसमें कोरोना विषाणु से प्रभावित यह काल तो महान संकटकाल की तरह सम्पूर्ण विश्व में आया हुआ है।

भारत के प्रधानमंत्री महोदय द्वारा दिनांक 22 मार्च 2020 से सामाजिक दूरी के अनुपालन का एक आग्रह प्रस्तुत किया गया, तत्पश्चात् 24 मार्च से पूर्णतः लॉकडाउन की उद्घोषणा होने के उपरान्त स्वेच्छा से यत्र-तत्र आवागमन पर रोक लगाई गई तथा यातायात-साधनों के परिचालन पर रोक लगाई गई। ऐसे विविध निरोधक प्रबन्ध सर्वत्र ही लागू हैं। देश की  जनता (प्रजा) की सुरक्षा के लिये भारत सरकार द्वारा उद्घोषित इन समस्त नियमों को समस्त भारतीय सहर्ष स्वीकार कर अपने-अपने घरों में पिहित तालिका की स्थिति में रहने तथा जीने के लिये कटिबद्ध हैं|

प्रसंगानुसार यहां यह विचारणीय है कि इस घोर कोरोना महामारी के संकटकाल में यदि किसी व्यक्ति की इहलौकिकी जीवनलीला समाप्त हो जाए तो उसकी और्ध्वदैहिकी क्रिया कैसे सम्पादित की जाए? गांव या नगर, जहां कहीं स्थित लोगों के बाल,वृद्ध,युवाओं की स्त्री,पुरुषों की  रोग के कारण, दुर्घटना से, या स्वाभाविक मृत्यु हो जाए तो उस अस्थिप्रवाह से लेकर द्वादशाह पर्यन्त जो अनेक क्रियायें सम्पन्न होंगी, उन क्रियाओं को उसके परिवार के सदस्यगण कैसे पूर्ण करें? यह एक गंभीर समस्या है|

क्योंकि भारतीय परम्परा के अनुसार अस्थिप्रवाह तो मात्र गंगाजल में ही संभव है| वर्त्तमान समय में यातायात की असुविधा के कारण गंगा तक पहुंचना संभव नहीं है, इस संदर्भा में शास्त्र में क्या कहा गया है? क्या उचित और क्या अनुचित है? यह जानने की जिज्ञासा सबके मन में उठ रही है| इन जिज्ञासाओं के समाधानार्थ मैं यहां यथोपलब्ध साक्ष्यों के साथ सामान्यचर्चा कर सभी के लिए जो उपयुक्त मार्ग है, उस विषय में अपना शास्त्रसम्मत विचार प्रस्तुत कर रहा हूँ | 

यह सर्वविदित है कि हमारे ऋषि एवं मुनिगण अत्यन्त दयालु तथा मानवों के हितचिन्तक थे। उन्होंने सांसारिक समस्त परिस्थितियों को देखकर उस विषय में उपयुक्त ऊंचे-नीचे विषयों के ऊपर विविधशास्त्रों यथा-वेद, वेदांगस, पुराणेतिहास और धर्मशास्त्र आदि ग्रन्थों में जनकल्याण के लिए विविध विषयों का वर्णन किया है। उन शास्त्रों में न केवल एक परिस्थिति पर ही अपितु विविध परिस्थितियों का अवलोकन करके सांसारिक समस्त समस्याओं का अनुभव कर विविध अनुष्ठेय विधियों के मुख्य प्रतिनिधि विषयों के कर्तव्य और अन्य आपद्धर्मों के वर्णन हैं। तदनुसार यहां विचार किया जाता है कि सामान्य स्थितियों में तो सर्वसामान्य नियमों का अनुपालन होगा, परन्तु विषम परिस्थितियों में कैसे कार्य को सम्पादन करना है? यह एक समस्या है, जो हमारे  सामने है जैसे-‘मृतकों के दाहशरीर का अभाव, यातायात साधनों के अभाव में मृतक का अस्थि प्रवाह’ इत्यादि और्ध्वदैहिक क्रिया सम्पादनार्थ आवश्यक कर्म करने में अशक्त होने पर किस उपाय से उसका सम्पादन हो, इन विषयों पर समुचित शोध के उपरांत जो सर्वजन के हित में उपाय हैं, उन पर सामान्य रूप से प्रकाश डालने का प्रयास मात्र कर रहा हूँ |

दाहशरीर के अभाव में पर्णनरदाह की विधि-

 यहां सर्वप्रथम यह समस्या आती है कि यदि किसी की मृत्यु परदेश में या दूरदेश में  होती है तब उस मृतक का शरीर उसके सम्बन्धियों को दाहसंस्कार के निमित्त नहीं मिलता है। उस परिस्थिति में हमारे ऋषियों ने पर्णनरदाहविधि का र्वणन किया है। आचार्यों ने कहा है कि- दाहशरीराभावे तदस्थि घृतेनाभ्युक्ष्य वस्त्रैराच्छाद्य पूर्ववद् दहेत्। अस्थ्नामप्यलाभे षष्ट्यधिकपलाशपत्त्रशतत्रयेण मनुष्याकृतिं विन्यस्य शिरसः स्थाने नारिकेलफलं दत्वा- ‘असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा’ इत्युक्त्वा एवं पर्णनरं पूर्ववद् दग्ध्वा तद्भस्म जले क्षिप्त्वा त्रिरात्रमशुचिर्भवेत्। अर्थात् दाहशरीर के अभाव में उनकी अस्थि भी यदि मिल जाए तो उस अस्थि को घृत से अभ्युक्षण कर वस्त्र से ढंककर दाहविधि के अनुसार दाहसंस्कार करना चाहिए| यदि किसी भी यत्न से अस्थि भी प्राप्त न हो तो 362 पलाश के पत्तों से मनुष्य की आकृति बनाकर शिर के स्थान पर नारियल देकर- असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा यह बोलकर पर्णनर को दाहविधि के अनुसार उसे जलाकर, उसके भस्म को जल में प्रवाहित कर तीन रात तक अशौच मनाये।

362 पलाशपत्रों से मनुष्याकृति का निर्माण कैसे करना है इस विषय में मनुष्य आकृति विन्यास प्रकार उपस्थापित करते हैं । यथा-

शिरस्यशीत्यर्धं दद्याद् ग्रीवायां तु दशैव तु। बाह्वोश्चैवं शतं दद्यादङ्गुलीषु तथा दश।।

उरसि त्रिंशतं दद्याद् विंशतिं जठरे तथा। शिश्ने द्वादशान् दद्यात् त्रिंशतं जानुजङ्घयोः।।

पादाङ्गुलीषु दश दद्याद्देतत् प्रेतस्य कल्पनम्। ऊर्णासूत्रेण बद्ध्वा तु प्रलेप्तव्यस्तथा यवैः।।

सुपिष्टैर्जलमिश्रैस्तु दग्धव्यश्च तथाऽग्निना। असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहेत्युक्त्वा विधानतः।।     ऊर्णासूत्रेण बद्ध्वा तु प्रलेप्तव्यस्तथा यवैः।।

ऊपर दिये गये वचनों के अनुसार पलाश के पत्तों से मनुष्य की आकृति निर्माण के समय  कितने पत्ते कहां स्थापित करने हें यहां क्रम से विचार करते है।

शिर में-40

दोनों बाहुओं में-100×2=200

शिश्न में-12

गर्दन में-10

हाथ की उंगलियों में-10

जानु एवं जङ्घाओं में-30

हृदय में-30

उदर में-20

पैर की उंगलियों में-10, 80,230,52

कुल मिलाकर 80+230+52 =362 पलाश के पत्ते यहां आवश्यक हैं। ऐसे ही बताये गये प्रकार से निर्मित पर्णनर की यथाविधि दाहसंस्कार आदि करना चाहिये पुत्र द्वारा दाहसंस्कार विहित है। वहां दाहसंस्कारकर्ता स्नातः शुचिवस्त्रादिधरः अर्थात् स्नान किया हुआ, पवित्र वस्त्र धारण किया हुआ, कुश हाथ में लिये पूर्वाभिमुख बैठकर नये मिट्टी के बर्तन में जला लेकर शव को  दक्षिण दिशा में शिर करके निम्न मंत्र को पढ़ते हुए -

गयादीनि च तीर्थानि ये च पुण्याः शिलोच्चयाः। कुरुक्षेत्रं च गङ्गाञ्च यमुनां च सरिद्वराम्।।

कौशिकीं चन्द्रभागां च सर्वपापप्रणाशिनीम्। भद्रावकाशां सरयूं गण्डकीं तमसां तथा।।

धैनवं च वराहं च तीर्थं पिण्डारकं तथा। पृथिव्यां यानि तीर्थानि चतुरःसागरांस्तथा।।

इमं मन्त्रं पठित्वा तु तातं कृत्वा प्रदक्षिणम्। मन्त्रेणानेन देह्यग्निं जनकाय हरिं स्मरन्।। 

इन तीर्थों का मन में ध्यान करते हुए उनका जल में आह्वान कर उस जल से शव को स्नान करवाकर नूतन वस्त्र यज्ञोपवीत पुष्पचन्दन से सजाकर लकडी की बनी चिता पर या जिस किसी भी उपलब्ध चिता पर कुशा बिछाकर उत्तर की ओर शिर करके अधोमुख पुरुष को तथा उत्तानमुखी स्त्री को सुला दें। तत्पश्चात् अपसव्य होकर दक्षिणाभिमुख वाम हाथ से पञ्चग्रन्थिसमन्वित या सप्तग्रन्थिसमन्वित उल्मुक (जलते हुए तृण) लेकर -

कृत्वा सुदुष्करं कर्म जानता वाप्यजानता। मृत्युकालवशं प्राप्तं नरं पञ्चत्वमागतम्।।

धर्माधर्मसमायुक्तं लोभमोहसमावृतम्। दहेयं सर्वगात्रणि दिव्यान् लोकान् स गच्छतु।।

एवमुक्त्वा ततः शीघ्रं कृत्वा चैव प्रदक्षिणाम्। ज्वलमानं तदा वह्निं शिरःस्थाने प्रदापयेत्।। 

यह दो मन्त्र पढ़कर स्त्री-पुरुषों की तीन बार प्रदक्षिणा कर ज्वलदुल्मुक शिरोदेश में रख दें। उसके बाद चिता में तृणकाष्ठघृतादि दालकर कपोतावशेष जलाये। आदित्यपुराण में कहा गया है कि- निश्शेषस्तु न दग्धव्यः शेषं किञ्चित्त्यजेत्ततः। अब उचित समय पर कपालक्रिया करना चाहिये। तथाहि- अर्धे दग्धेऽथवा पूर्णे स्फोटयेत्तस्य मस्तकम्। गृहस्थानान्तु काष्ठेन यतीनां श्रीफलेन च।। 

इस वचन से जब मृतक का शरीर आधा जला रहता है, तब उसका कपाल विस्फ़ोट होकर अन्दर का सूक्ष्म प्राण बाहर निकलता है। माना जाता है कि तभी उस जीव की मुक्ति होती है, जब उसकी कपालक्रिया अच्छी प्रकार संपन्न होती है। उसके बाद उसी दिन या किसी अन्य दिन उसकी अस्थियों का चयन विहित है। अब यह विचार करते हुए आचार्य लोग कहते हैं कि- 

प्रथमेऽह्नि तृतीये वा सप्तमे नवमेऽपि वा। अस्थिसञ्चयनं कार्यं निजैस्तद्गोत्रजैर्मतैः||

अस्थ्नां तु सञ्चयः सद्यः कर्त्तव्यो दाहवासरात्। द्वितीयेऽह्नि त्र्यहाशौचे पूर्णे चैव चतुर्थके।।

चतुर्थे ब्राह्मणानान्तु पञ्चमेऽह्नि तु भूभुजाम्। नवमे वैश्यजातीनां शूद्राणां दशमात्परे।। 

इस प्रकार ऋषियों ने देश काल परिस्थिति भेद से सबकी सुविधा को ध्यान में रखकर अनेक विकल्प दिये हैं | सद्यः पक्ष अर्थात् तत्काल, दूसरे दिन, तीसरे दिन, चौथे दिन, पांचवें दिन, सातवें दिन या नौवें दिन स्नान कर ऊर्ध्वपुण्ड्र कर विधिपूर्वक अस्थिचयन का कर्म करना चाहिये।

अस्थियों का सञ्चय तो शास्त्र में कहे अनुसार एकोद्दिष्ट पूर्वक आवाहित शंकर आदि देवों को विसर्जित कर वाग्यमन पूर्वक चिता को गोदुग्ध से अभिषिक्त कर अपसव्य होकर दक्षिणाभिमुख पहले पांच शिरोदेश की अस्थि, उसके बाद अन्यान्य अस्थियों को शमीपलाशशाखाओं से निकाल कर दाहिने हाथ का अंगूठा तथा कनिष्ठिका इन दो उंगलियों से पलाश के पत्ते की बनी हुई पूरा में रखकर दूध से सिक्त कर उस पर घृत का अभिघारण करें। गन्धोदक और पञ्चगव्य से अस्थि को स्नान कराकर क्षौमवस्त्र से लपेटकर आच्छादनवस्त्र से ढककर नये मिट्टी के बर्तन में धीरे से रखें। उपर्युक्त दिनों में उस बर्तन को गङ्गा में प्रवाहित कर देना चाहिये।

गंगा में अस्थि विसर्जन की विधि-

किसी का बेटा, पोता आदि स्नान कर अस्थिकुम्भ खोलकर गंगा किनारे जाकर वहां स्नान कर उन अस्थियों का प्रोक्षण कर हिरण्य-मध्वाज्य-तिल-गन्ध-पुष्पों को हाथ में लेकर मृद्भाण्ड में रखकर दायें हाथ से उस पात्र को लेकर दक्षिण दिशा की ओर देखते हुये- नमोऽस्तु धर्माय यह बोलते हुए जल में प्रवेश कर प्रेत के स्वर्ग कामना के लिये दक्षिण की तरफ़ होकर- स मे प्रीयताम् यह बोलकर पितृतीर्थ से गङ्गाजल में प्रवाहित कर दे। उसके बाद स्नान कर सूर्य को देखकर आचमन कर कुश आदि लेकर- अद् कृतैतद्गङ्गायामस्थिप्रक्षेपप्रतिष्ठार्थमेतावद्द्रव्यमूल्यकहिरण्यमग्निदैवतं यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणामहं ददे। इस वाक्य के द्वारा यथाशक्ति दक्षिणा ब्राह्मण को देकर, ब्राह्मण के मुख से स्वस्ति यह प्रतिवचन सुनकर श्राद्धकर्मनिमित्त गंगाजल और गङ्गौट आदि लेकर घर आ जाएं। इस अस्थिविसर्जनात्मक कर्म गङ्गा आदि पुण्य जलों में करने के महत्त्व का वर्णन पुराणों में किया गया है-

यावदस्थि मनुष्यस्य गङ्गायाः स्पृशते जलम्। तावत्स पुरुषो राजन् स्वर्गलोके महीयते।।  

यावदस्थि मनुष्याणां साध्यामृतजले स्थितम्। तावद्वर्षाणि तिष्ठन्ति शिवलोके सुपूजिताः।। 

यावदस्थि मनुष्याणां गङ्गातोयेषु तिष्ठति। तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते।। 

यह ऊपर लिखे गये वचन से गंगाजल में मृतक के अस्थिप्रवाह के विषय का वर्णन कर अब यह विचार करते हैं कि अस्थियों के गंगा में प्रवाह का समय क्या होना चाहिये ? तब बोले कि-

दशाहाभ्यन्तरे यस्य गङ्गातोयेऽस्थि मज्जति। गङ्गायां मरणे यादृक् तादृक् फलमवाप्नुयात्।। अर्थाद्दश दिनों के अन्दर अस्थि विसर्जन कर लेना चाहिये। परन्तु यहां विचारना यह चाहिये कि अभी जिस प्रकार कोरोना महामारी का संकटकाल है, यातायात की पूर्ण असुविधा है ऐसी दशा में गङ्गाजल में अस्थिप्रवाह के निमित्त जाना और दशाहाभ्यन्तर में ही गंगा में अस्थि प्रवाह करना  संभव नहीं है, तब क्या करें?

 गंगा के अभाव में अश्वत्थवृक्ष के मूल में अस्थि विसर्जन की विधि-

इस विषय में श्रीरामचन्द्रझा द्वारा सम्पादित, चौखम्भा विद्या भवन वाराणसी से प्रकाशित वाजसनेयियों की श्राद्धपद्धति के 39 वें पृष्ठ में अस्थिचयनप्रयोग के अवसर पर लिखित है कि-

अथवा अश्वत्थवृक्षमूले पङ्कशैवालयुतगर्ते वा निभृतं धारयेत्। चिताभस्मादि तोये निःक्षिपेत्। बल्यन्नमन्त्यजादिभ्यो दद्यात्, जले वा क्षिपेत्। ततः गोमयाऽम्बुभिः चिताभूमिशुद्धिं विधाय चिताभूमेः आच्छादनार्थं वृक्षः पुष्करकः पट्टको वा कारयितव्यः। ततः सचैलो बन्धुभिः सह स्नायात्। 

यद्यपि अस्थिचयन करणे के दश दिन के भीतर गंगा में प्रवाह विहित है। गङ्गा तक जाने में असमर्थता हो तो अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष की जड में गड्ढे में कीचड शैवालादि के साथ उस अस्थि वाले वर्तन को रखने का विधान बतलाया गया है। यहां पुनः कोई शंका करता है कि अश्वत्थवृक्षमूल में ही क्यों? अन्य वृक्षों के मूल में क्यों नहीं ? इस विषय में मेरा यह विचार है कि वेदों में कहा गया है कि- अश्वत्थो देवसदनः।  अर्थात् अश्वत्थ (पीपल) देवताओं का निवास स्थान है| इससे ज्ञात होता है कि अश्वत्थ कोई सामान्यवृक्ष नहीं है अपितु वह देवों का निवास स्थान है। जहां देवगण रहते हैं, उस स्थान को स्वर्ग कहते हैं| विचार कीजिये केवल मनुष्य ही नहीं अपितु संसार के समस्त जीव का अन्तिम लक्ष्य तो स्वर्गप्राप्ति ही है। स्वर्ग ही हमारा मोक्ष स्थान है, वह स्थान यह अश्वत्थ (पीपल) भी है तो इसी को स्वर्गस्थान मानकर वहीं अपनी कामना करनी चाहिए| इसी उद्देश्य से उसी स्थान में अस्थि रखने का विधान किया गया है, यह मेरा अभिमत है।

समुद्रजल (लवणाम्भ)  में अस्थि विसर्जन की विधि-

वैखानसगृह्मसूत्र में समुद्र के जला में अस्थि प्रवाह करने का वचन प्राप्त होता है | वहाँ कहा गया है कि -

यस्यास्थीनि मनुष्यस्य क्षिपेयुर्लवणाम्भसि। तावत्स्वर्गनिवासोऽस्ति यावदिन्द्राश्चतुर्दश।।  

वर्तमान स्थिति में दक्षिण देशा के निवासी जो गंगा से अत्यधिक दूर देश में रहते हैं उन लोगों को समुद्र निकटवर्ती है, अतः वे लोग वैखानसगृह्मसूत्र मैं कहे गए वचनों का अनुपालन करते हुए समुद्र जल में ही अस्थिप्रवाह करें।

सभी जल गंगाजल के समान हैं-

इस धरती पर समुपलब्ध समस्त जल गंगाजल के समान हैं ऐसा भी पुराणों में कहा गया है। यथा- 

सर्वं गङ्गासमं तोयं सर्वे ब्रह्मसमा द्विजाः। सर्वं देयं स्वर्णसमं राहुग्रस्ते दिवाकरे।।

सर्वं गङ्गासमं तोयं वेदव्याससमा द्विजाः। स्नानं वायसतीर्थे यो गङ्गास्नानफलं लभेत्।। 

उपर्युक्त दोनों व्यासवचनों में सर्वं गङ्गासमं तोयं यह कथन हमें उपदेश देता है कि सभी जलों में गङ्गाजल के समान हमारी श्रद्धा होनी चाहिये| ऐसी श्रद्धा जब् हमारी होगी तभी हमलोग जलों के महत्त्व को समझेंगे तथा जलों के संरक्षण के प्रति जिम्मेदार बन सकेंगे| आज जो जल का दुरूपयोग हो रहा है वह मात्र जल के महत्त्वों को नहीं जानने और जल के प्रति श्रद्धा भाव नहीं रहने के कारण हो रहा है| जब भारत का प्रत्येक नागरिक जल को गङ्गाजल के समान मानकर उसकी पूजा करेगा तो मुझे विश्वास है कि यहां कभी भी जल का संकट नहीं होगा | यद्यपि ये दोनों व्यासवचन ग्रहण स्नान के संदर्भ में कहे गये हैं, फिर भी यदि हम इसे उस भावना से भी देखें तो हमारा कल्याण ही होगा। यदि ग्रहण के समय यह स्वीकार्य है तो अन्य समय में भेदबुद्धि की आवश्यकता ही क्या है? जैसे अग्नि को पावक कहते हैं वह अग्नि चूल्हे का हो, यज्ञकुण्ड का हो या किसी गौशाला का हो उन सभी अग्नियों में जलाने एवं शुद्ध करने की क्षमता नित्य व्याप्त रहती है|  उन अग्नियों मे जो भी अशुद्ध द्रव्य दाला जायेगा, उसे वह अग्नि पवित्र अवश्य करेगा, इसीलिये अग्नि को पावक कहा जाता है। इसी प्रकार वायु भी प्रवाहित होकर संसार में व्याप्त दुर्गन्धात्मक अशुद्धियों को दूरकर उन्हें पवित्र करता है, अत एव वायु को पवन कहा गया है। जल भी पवित्रकारक है, चाहे वह जल वापी, कूप, तडाग, नदी या समुद्र का हो वः जल शोधन तो करता ही है शतपथब्राह्मण में जल को शोधक और यज्ञीय कहा गया है-

हरिः ॐ व्व्रतमुपैष्यन्। अन्तरेणाहवनीयञ्च गार्हपत्यञ्च प्राङ्तिष्ठन्नप ऽउपस्पृशति तद्यदप ऽउपस्पृशत्यमेध्यो वै पुरुषो यदनृतं वदति तेन पूतिरन्तरतो मेध्या वा ऽआपो मेध्यो भूत्वा व्व्रतमुपायानीति पवित्रं वा ऽआपः पवित्रपूतो व्व्रतमुपायानीति तस्माद्वा ऽअप ऽउपस्पृशति।।  

इस श्रौतवाक्य में मेध्या वा आपः यह वाक्य हमें अवश्य शोधबुद्धि से देखना चाहिये। जल को यहां मेध्य कहा गया है, मेध्य कहने से "यज्ञ के योग्य" ऐसा अर्थ निकलता है। जल के  मेध्यत्व होने से ही यज्ञों में अपांप्रणयन कर्म के आदि में किया जाता है। वह जल चाहे गङ्गा का हो वा किसी वापी-कूप-तडाग का हो वह समस्त प्रकार का जल मेध्य ही है। यद्यपि गङ्गाजल का  महत्त्व अधिक है इसमें किसी को कोई भी संदेह नहीं। तथापि गङ्गातिरिक्त जलोम में भी मेध्यत्व तो है ही यह इस वेदवचन से सुस्पष्ट ज्ञात होता है। इसलिये यदि कोई अस्थिप्रवाह के लिये गङ्गातट पर जाने में असमर्थ हो तो पास में विद्यमान किसी भी पवित्रनदी में भी अस्थिप्रवाह कर सकता है।

अश्वत्थवृक्षमूल में पङ्कशैवालादियुक्त गड्ढे में मिट्टी के बर्तन में स्थित अस्थियों का स्थापन भी शास्त्रसम्मत ही है। इस प्रकार वर्त्तमान संकट के समय में लोग अपनी सुविधा के अनुसार समस्त कार्यों को कर सकें, एतदर्थ हमारे ऋषि-मुनि-आचार्यों ने अनेक विकल्प के मार्ग प्रशस्त किये हुए हैं जिनका अनुसरण कर हम अपना कर्त्तव्य पूरा कर सकते हैं| इत्यलमति विस्तरेण। जयतु संस्कृतम्। जयतु भारतम्। जयन्तु वेदाः।

विद्यावाचस्पति डॉ. सुन्दर नारायण झा
सह आचार्य, वेदविभाग,  श्री लाल बहादुर शास्त्री रास्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय

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मिस्टर मीडिया: धुरंधर संपादक परदे के पीछे के समीकरण क्यों नहीं समझते?

बीते सप्ताह गलवान में चीन के साथ खूनी संघर्ष मीडिया के सभी रूपों में छाया रहा। इस दरम्यान शुरू के तीन-चार दिन तक चीन के बयान एक के बाद एक आते रहे और भारतीय अधिकृत बयान आने में कुछ समय लगा।

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 24 June, 2020
Last Modified:
Wednesday, 24 June, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

बीते सप्ताह गलवान में चीन के साथ खूनी संघर्ष मीडिया के सभी रूपों में छाया रहा। इस दरम्यान शुरू के तीन-चार दिन तक चीन के बयान एक के बाद एक आते रहे और भारतीय अधिकृत बयान आने में कुछ समय लगा। इसका लाभ चीन को मिला और असर मीडिया के समग्र कवरेज पर भी पड़ा। चीन का पक्ष प्रायः प्रतिदिन नए-नए कोण से प्रस्तुत किया जाता रहा और भारतीय मीडिया उसे संतुलित करने के लिए प्रोपेगंडा कवरेज में उलझा रहा। आपसी होड़ के चलते चैनलों ने बेहद आक्रामक अंदाज में इस घटनाक्रम को दर्शकों के सामने परोसा। अलबत्ता, अपवाद छोड़ दें तो अंग्रेजी खबरिया चैनलों का कुल कवरेज अपेक्षाकृत गंभीर और परिपक्व था। यही नहीं, तमिल, मलयालम, तेलुगु, मराठी तथा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के चैनल भी संयत दिखाई दिए।

सवाल यह है कि सिर्फ हिंदी चैनलों की गाड़ी ही पटरी से क्यों उतरती है? एक गलवान की घटना घटती है तो हम फौरन दोनों देशों की सेनाओं की तुलना करने लगते हैं। अपने एक-एक फाइटर प्लेन और गोला बारूद का बढ़ा-चढ़ाकर खुलासा करते हैं। ऐसा प्रकट करते हैं, मानो बस अब जंग छिड़ने ही वाली है। कई चैनल तो विश्वयुद्ध की चेतावनी देने लगते हैं। बिना समीकरणों को समझे ऐलान कर देते हैं कि अमेरिका अब हिन्दुस्तान के लिए मैदान में उतरने वाला है। जापान भी चीन पर हमला करने वाला है और रूस भी जैसे हमारी ओर से चीन के साथ युद्ध करने पर उतारू है। अब चीन की खैर नहीं है। अभी भी देख लें। सेना आने वाले दिनों में क्या करने वाली है। हर तथ्य का परदे पर पहले खुलासा दिख जाता है। क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रत्येक संवेदनशील तथ्य को उजागर करना जरूरी है? क्या इससे हम शत्रु देश की सहायता नहीं करते?

पर हकीकत क्या निकली? अमेरिका ने तीन दिन बाद मुंह खोला और भारतीय शहीदों को श्रद्धांजलि देकर चुप्पी साध ली। इतना ही नहीं, अमेरिका और चीन का डिनर हुआ और दोनों मुल्कों ने नरम सुर में प्रेम राग गाया। इसके बाद उसने चीन के साथ कारोबार चालू रखने के भी संकेत दिए। अमेरिकी रवैया हमेशा ही ऐसा रहा है, मगर मीडिया के धुरंधर संपादक परदे के पीछे के समीकरण क्यों नहीं समझते? रूस से भारत के रक्षा सौदे ठंडे बस्ते में पड़े हैं। इसलिए वह भी शांत ही रहा। राजनाथ सिंह की यात्रा के बाद शायद कुछ तेज हो। भूटान, म्यांमार, अफ़गानिस्तान, मालदीव और बांग्लादेश जैसे देश भी कुछ नहीं बोले। हमारे चैनल जंग के लिए अधिक उतावले थे। समझना होगा कि उपग्रह टीवी के दौर में चैनलों के सिग्नल भारत के बाहर भी दिखाई देते हैं।

विचित्र बात है कि भारतीय हिंदी चैनल परदेसी चैनलों की प्रस्तुति, कंटेंट,प्रोडक्शन क्वालिटी और और पेशेवर अंदाज से अपनी तुलना क्यों नहीं करते। भारत-चीन के बीच तनाव का चीनी टीवी पर कवरेज भी देखा जाना चाहिए था। सीएनएन, अल जजीरा, रसिया टुडे, बीबीसी और एनएचके जैसे चैनल अनेक व्यापक महत्त्व के मसलों पर परदे की गंभीरता नष्ट नहीं करते। तनाव के दौरान भारतीय टीवी एक पक्ष था। इसलिए तनिक आक्रामक होना स्वाभाविक है, लेकिन अतिरेक और उन्माद में अंतर होता है। यह बात गौर करने की है मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

सियासत ने हमें आपस में लड़ने के लिए चाकू-छुरे दे ही दिए हैं मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: इसलिए भी डराती है लोकतंत्र के चौथे खंभे पर लटकी यह तलवार

पिछले दिनों पत्रकारों के साथ हुए अभद्र व्यवहार का असल कारण भी यही है मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: यह अपराध अनजाने में हुए, पर दर्शक समझते हैं कि चैनल ने जानबूझकर ऐसा किया

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पूरन डावर ने उठाया बड़ा सवाल, तो आगे युद्ध कैसे लड़ेंगे?

15 जून को ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ (Line of Actual Control) पर भारत-चीन भिड़ंत से जहां एक ओर जनता में राष्ट्रीयता का जोश है, वहीं देश की राजनीति उबाल पर है।

पूरन डावर by
Published - Sunday, 21 June, 2020
Last Modified:
Sunday, 21 June, 2020
Indo China

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

15 जून को ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ (Line of Actual Control) पर भारत-चीन भिड़ंत से जहां एक ओर जनता में राष्ट्रीयता का जोश है, वहीं देश की राजनीति उबाल पर है। भारत में विपक्ष की राजनीति (चाहे वो कांग्रेस हो अथवा भाजपा) कभी परिपक्व नहीं रही। सीमा के मुद्दे संवेदनशील होते हैं। कई बार बड़े दुश्मन की ज्यादतियों को सहन भी करना पड़ सकता है। पैनिक से काम नहीं चलता। सीमा पर विवाद होगा, विरोध करना ही होगा तो जानें भी जाएंगी।

20 जवानों के मारे जाने पर इतना विलाप करेंगे तो आगे युद्ध कैसे लड़ेंगे। युद्ध होगा तो हजारों की संख्या में भी मारे जा सकते हैं। मजबूत दुश्मन है। परमाणु संपन्न है तो लाखों में भी। पैनिक नहीं, जोश भी और होश भी रखना होगा। न पूर्ण युद्ध और न पूर्ण बहिष्कार, कुछ भी आसान नहीं। धीरे-धीरे कमर तोड़नी होगी। चीन अपनी मौत मरने वाला है। भस्मासुर को समाप्त होना ही है।

भारत की सबसे बड़ी समस्या जनता के ऊल जुलूल सवाल जवाब की ही है। भाजपा ने भी विपक्ष में यही किया है, वही भुगतना भी पड़ रहा है। लेकिन कांग्रेस ने लंबा राज किया है, परिस्थितियों से वाकिफ है। विशुद्ध राजनीति में बची-खुची भूमि भी कांग्रेस खो देगी।

युद्ध नीतियों कतई गुप्त होती हैं। कभी घुसकर मारते हैं, लेकिन कह नहीं सकते। कभी अंदर आकर वो पीट जाते हैं तो जनता के सवाल उठते हैं। जनता का खून खौलना, पैनिक दबाव या दबाव में लिए गए निर्णय सदैव घातक होते हैं। दोनों देशों की सामरिक दृष्टि से तुलना... कहां हम मजबूत हैं और कहां कमजोर, इसकी चर्चा कम से कम सरकार तो नहीं कर सकती।

जहां तक बात आज की स्थिति की, मजबूत नेतृत्व है। सर्वदलीय बैठक में स्पष्ट कहा है कि न चीन घुसा है और न चीन के पास हमारी कोई चौकी है। 20 की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी। चीन सड़क और गलवान घाटी पर पुल नहीं बनाने दे रहा था। घुसकर मारा है। 45 चीन के मरे हैं और 20 भारत के। 10 बंधन बनाए थे, वह भी छोड़े हैं। बंधकों में दो मेजर और दो कैप्टन रैंक के थे। 15 जून से 18 जून तक 72 घंटे में पुल पूरा किया है। 20 खोने के बाद रुके नहीं, झुके नहीं। हमारी शोक संवेदना अपने सैनिकों और परिवारों का संबल है, लेकिन विलाप नहीं। देश की स्वतंत्रता के लिए भी बलिदान दिए हैं। सीमाओं की रक्षा में भी बलिदान देते रहने होंगे। बलिदानों से डरे तो रक्षा नहीं हो सकती।

वैश्विक स्तर पर दबाव बनाना होगा। भारत की वास्तव में चीन से कोई सीमा नहीं लगती। चीन के तिब्बत पर अवैध राज को हटाने, तिब्बत की निर्वासित सरकार को वैश्विक मान्यता दिलाने के लिए एक बड़ी कूटनीति की आवश्यकता है। तिब्बत की स्वतंत्रता ही भारत का रक्षा कवच है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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वरिष्ठ न्यूज एंकर नगमा सहर बोलीं- आने वाले समय में और छोटी होगी टीवी कवरेज की टीम

टीवी मीडिया में विश्वसनीयता का संकट दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। पहले की तुलना में अब टीवी समाचारों को और अधिक संदेह से देखा जाने लगा है

Last Modified:
Saturday, 20 June, 2020
naghma-sahar

‘टीवी मीडिया में विश्वसनीयता का संकट दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। पहले की तुलना में अब टीवी समाचारों को और अधिक संदेह से देखा जाने लगा है। इस समस्या से निपटने के लिए मीडिया समूह को चिंतन कर आवश्यक कदम उठाना चाहिए।’ वरिष्ठ न्यूज एंकर नगमा सहर ने ये बात माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल की ओर से आयोजित ऑनलाइन व्याख्यानमाला ‘स्त्री शक्ति संवाद’ में कही।

उन्होंने कहा कि कोविड-19 आपदा के दौरान टीवी मीडिया में वर्चुअल सेट का महत्व बढ़ा है। बिना स्टूडियो में जाए घर से भी काम किया जाना इस माध्यम से संभव हुआ है।

‘टीवी न्यूज का भविष्य’ विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए पत्रकार नगमा सहर ने कहा कि टीवी के भविष्य को जानने के लिए सबसे पहले इसके वर्तमान पर चर्चा आवश्यक है। उन्होंने कहा कि टीवी समाचारों में भी लगातार बदलाव आ रहा है। आज के समय में समाचार प्राप्त करने के कई माध्यम मौजूद हैं। मोबाइल तकनीक ने समाचारों के स्त्रोतों को पहले से कई गुना अधिक गति दे दी है। न्यू मीडिया को टेलिविजन मीडिया का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी माना जा रहा है।

इस दौरान उन्होंने कहा कि यह भी सच है कि टीवी मीडिया पूरे समाज के लिए आज भी समाचार का सबसे बड़ा जरिया बना हुआ है। ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों में टीवी देखने वाले बड़ी तादाद में हैं। इसलिए टीवी को भारत में आम लोगों का माध्यम कहा जा सकता है।

एक शोध का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पिछले साल के आंकड़े के अनुसार आठ सौ पचास मिलियन लोग तक हिन्दुस्तान में टीवी की पहुंच है और इनमें से ढाई सौ मिलियन लोग हर रोज टीवी देखते हैं। इसके अलावा क्रिकेट मैच या अन्य इंवेट के दौरान ये आंकड़ा 400 मिलियन तक पहुंच जाता हैं। इसलिए टीवी मीडियम और समाचारों को अन्य माध्यमों की तुलना में ताकतवर माध्यम माना जाता है।

उन्होंने कहा कि टीवी मीडिया में विश्वसनीयता की बहुत बड़ी समस्या है। टीवी न्यूज बहुत ज्यादा शक्तिशाली इस मायने में है क्यों कि आप तस्वीरों को 24 घंटे देखते-सुनते हैं और इसमें खबरों को कई बार दोहराया भी जाता है, इसलिए पब्लिक ओपिनियन बनाने में ये माध्यम कारगर साबित हो रहा है। यह माध्यम लोगों की भावना को बदल सकता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक उपयोग भी किया जा सकता है। उन्होंने टीवी का इतिहास बताते हुए कहा कि टीवी तकनीक में एशियाई खेलों के बाद काफी तेजी से बदलाव हुआ, इसके बाद कई चैनल्स आए फिर प्राईवेट चैनल्स के आने के बाद इसमें आमूलचूल बदलाव हुए।

नगमा ने कुंभ सहित कई बड़े इंवेट में अपनी रिपोर्टिंग के अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि अब टीवी एंकरिंग और रिपोर्टिंग की तकनीक बहुत बदल गई है। अब मोबाइल तकनीक के माध्यम से टीवी आपके हाथों तक पहुंच गया है। पहले ब्रेकिंग न्यूज हुआ करती थी लेकिन आज के दौर में तो बस ब्रेकिंग न्यूज ही दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया ने खबरों के मिजाज को बदल कर रख दिया है क्योंकि अब हमारे पास समाचार के कई माध्यम उपलब्ध हैं। इसलिए ताजा खबरें कभी भी मिल जाती हैं। पहले टीवी पर ताजा खबरें केवल प्राइम टाइम में मिला करती थी।

उन्होंने मीडिया छात्रों को समझाते हुए कहा कि खबरों के माध्यम से बांटने की नहीं, जोड़ने की कोशिश की जानी चाहिए। उन्होंने रिपोर्टिंग और एंकरिंग के दौरान तटस्थता और निष्पक्षता को जरूरी बताया। उन्होंने युवा पत्रकारों को कहा कि ओपिनियन देने से बचकर खबरें ज्यादा प्रसारित करना चाहिए। जल्दबाजी या हड़बड़ी में खबर को परोसना की बजाय समाचारों का विश्लेषण करके प्रस्तुत करना चाहिए। टीवी के भविष्य पर जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि आने वाले समय में टीवी कवरेज की टीम और छोटी होगी। काफी तकनीकी बदलाव आ रहे हैं जिसके चलते अब सारी तकनीक एक फोन और छोटे से बाक्स में आ जाने वाली है। पहले की तुलना में कवरेज आसान हुआ है। टीवी बॉक्स की तुलना में अब लोग मोबाइल पर टीवी का ज्यादा देख रहे हैं।

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