सोशलाइट परमेश्वर गोदरेज को वरिष्ठ पत्रकार वीर सांघवी की श्रद्धांजलि...

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। मशहूर समाजसेवी, सोशलाइट और महिला उद्यमी परमेश्वर गोदरेज का 70 साल की उम्र में

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 13 October, 2016
Last Modified:
Thursday, 13 October, 2016
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

vir-sanghviमशहूर समाजसेवी, सोशलाइट और महिला उद्यमी परमेश्वर गोदरेज का 70 साल की उम्र में मुंबई में निधन हो गया। वे गोदरेज ग्रुप के चेयरमैन आदि गोदरेज की पत्नीं थीं। फेफड़े की बीमारी के चलते उन्हें ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल में एडमिट कराया गया था, जहां सोमवार की रात उनका निधन हो गया।

उन्हें नजदीक से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार वीर संघवी ने अंग्रेजी दैनिक 'हिन्दुस्तान टाइम्स' में एक लेख के जरिए उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनका कहना है कि संभवत: डिजाइनिंग में उनका सबसे बड़ा योगदान रेस्तरां डिजाइन के क्षेत्र में है। इसके बाद उन्होंने अपने पति के समूह गोदरेज के रियल एस्टेट डिवीजन को संभाला। संघवी कहते हैं कि उनमें एक के बाद कई भूमिकाएं निभाने की असाधारण क्षमता थी।

सांघवी का कहना है कि परमेश्वर अरबपति थीं, लेकिन विनम्रता उनमें कूट-कूट कर भरी थी। सालों पहले मेरे जैसे नए पत्रकार से वह बेहद शालीनता और विनम्रता से पेश आईं थीं। स्टाइल और ग्लैमर के मामले में उनका कोई जवाब नहीं था।

संघवी कहते हैं, परमेश्वर पंजाबी वर्ग से ताल्लुक रखती थीं। जिनता गोदरेज के पारसी परिवार ने उन्हें नहीं बदला, उतना उन्होंने गोदरेज परिवार को बदल दिया। परमेश्वर पारिवारिक मूल्यों, ग्लैमर और साहस की अद्भुत संगम थीं।

पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार वीर सांघवी का पूरा लेख:

A true original: Vir Sanghvi remembers Parmeshwar Godrej

To the world at large, Parmeshwar Godrej was a coolly elegant figure who partied with the international jet set and carried one of India’s most famous surnames. Those who knew her, however, remember a different Parmesh: warm, caring, giving, and always fun to be with.

I first met her when I was 20 and just starting out in journalism. She was already Mrs Godrej, queen of Bombay society, and had no reason to give a damn about a young journo. But she was unfailingly hospitable, charming and friendly. At the time, she was famous for having bridged the gap between the film world and Bombay society, which had seemed unbridgeable till she appeared on the scene – and on the cover of Stardust.

We forget now that she was India’s first designer, running the successful Dancing Silks boutique at the Oberoi and making clothes for the top heroines of the 1970s. When fashion bored her, she moved into interior designing and set up Bombay’s hottest design firm, Inner Spaces, in partnership with Sunita Pitamber. Inner Spaces designed the homes of millionaires in Bombay, Delhi and London but is probably best remembered for its revolutionary approach to restaurant décor. The original China Garden in Kemps Corner was the first stand alone to actually look better than any five-star hotel restaurant.

By the time others had attempted to copy the success of Inner Spaces, Parmesh had finally got involved with the Godrej Group’s businesses, advising the real estate development division. I used to joke with her that with Inner Spaces she made so much money that she could have maintained her glamorous lifestyle without drawing on the Godrej wealth.

And her lifestyle was certainly glamorous. When she and her husband, Adi, abandoned their Carmichael Road apartment to spend more time at their stunning beach house in Juhu, their move had the effect of quadrupling property prices in Juhu. Suddenly, every millionaire wanted a beach house like the Godrejs.

Some of her legendary parties were thrown at that beach house and attended by the likes of Richard Gere, Goldie Hawn, Amitabh Bachchan and Imran Khan. The parties acquired an iconic status not because of the guest lists or the extravagance but because of Parmesh’s own sense of warm hospitality.

She was born into an upper middle-class Sikh family and met Adi when she was flying with Air India. They had an intense romance before marrying. Till the end, Adi remained the centre of Parmesh’s universe and for all the exterior glamour, the Godrejs and their children were a close-knit family.

When middle-class women marry into billionaire families, they usually have to change to fit in. Parmesh was the exception. She changed the Godrejs much more than they changed her. She took a conservative Parsi family whose idea of a good time was a family picnic and introduced it to international glamour. But through it all, she remained the exuberant Punjabi she had always been: generous to a fault, full of life and vitality, and yet, at the same time, sensitive and vulnerable.

She was a true original.

(साभार: हिन्दुस्तान टाइम्स)

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मिस्टर मीडिया: पत्रकारिता को कुचलने के नतीजे भी घातक होते हैं!

देश के सबसे अधिक संस्करणों वाले समाचारपत्र ‘दैनिक भास्कर’ और लखनऊ के प्रादेशिक टीवी चैनल ‘भारत समाचार’ पर आयकर विभाग के छापे सुर्खियों में हैं।

राजेश बादल by
Published - Friday, 23 July, 2021
Last Modified:
Friday, 23 July, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।   

देश के सबसे अधिक संस्करणों वाले समाचारपत्र ‘दैनिक भास्कर’ और लखनऊ के प्रादेशिक टीवी चैनल ‘भारत समाचार’ पर आयकर विभाग के छापे सुर्खियों में हैं। किसी कालखंड में समाज की परिस्थितियों के बारे में सही चित्रण ही उस पत्रकारिता को अनमोल बनाता है। कोरोना काल में ‘दैनिक भास्कर‘ ने कुछ ऐसी ही मिसाल पेश की है। अब उत्तर प्रदेश समेत कुछ प्रदेशों में विधानसभा चुनाव हैं, जिसमें इस तरह की पत्रकारिता सत्तारूढ़ दल के लिए परेशानी का सबब बन सकती थी।

यह भारतीय जनता पार्टी के अस्तित्व के लिए बड़ी चुनौती है, क्योंकि प्रधानमंत्री इसी राज्य से चुने गए सांसद हैं। वैसे भी उत्तर प्रदेश एक ‘महादेश‘ ही है। इस प्रदेश में हुकूमत का हिलना गंभीर चेतावनी है। पिछले दिनों बंगाल में साम, दाम, दंड, भेद अपनाने के बाद भी बीजेपी की जैसी पराजय हुई है, वह पार्टी के लिए सबक है। इसलिए एक बार फिर उत्तर प्रदेश में पार्टी अपना किला ढहते नहीं देखना चाहेगी। आयकर छापे हमें इसी संदर्भ में देखने चाहिए।

इन छापों के बारे में एक वर्ग कह रहा है कि इस समाचार पत्र समूह के कई धंधे हैं। उनमें गड़बड़ी हो तो अखबार की आड़ में कैसे माफ किया जा सकता है। इस सच से कोई इनकार नहीं कर सकता, मगर यह भी संविधान में नहीं लिखा है कि अखबार का मालिक कोई अन्य उद्योग नहीं चला सकता। आजादी के बाद बिड़लाजी का ‘हिंदुस्तान टाइम्स‘ फला-फूला तो ऐसी किसी छद्म नैतिकता में उन्होंने धंधे तो बंद नहीं किए।

एक जमाने में ‘चौथी दुनिया‘,‘संडे ऑब्ज़र्वर‘ और ‘संडे मेल‘ जैसे असरदार अखबार औद्योगिक घरानों ने ही निकाले थे। उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम चारों दिशाओं से आज भी ऐसे पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित हो रहे हैं, जिनका स्वामित्व उद्योगपतियों के हाथों में है। बताने की जरूरत नहीं कि इनमें अनेक बीजेपी के समर्थन की धुन भी बजाते हैं।

तो प्रश्न टाइमिंग का है। आयकर के छापे किसी के चोर होने का प्रमाण नहीं हैं। कितने अफसरों, कर्मचारियों, उद्योगों और कारोबारियों पर छापे पड़ते हैं। दो-चार अपवाद छोड़ दें तो आज तक किसी को दंड नहीं मिला। जाहिर है ऐसे मामलों का निपटारा भी दंड-शुल्क भरकर हो जाता है। फिर भी मैं किसी अपराध का समर्थन नहीं करता, पर जिस कालखंड में यह छापे पड़े हैं, वे मन में संदेह पैदा करते हैं। सवाल यह भी पूछा जा सकता है कि सरकार को किसका डर सता रहा है। केंद्र और उत्तर प्रदेश में बीजेपी पूर्ण बहुमत से सरकार में बैठी है। उसे चिंतित क्यों होना चाहिए?

सियासी पंडित और मीडिया विश्लेषकों की राय है कि निकट भविष्य में चुनाव, कोरोना काल में नाकामी, पेगासस जासूसी कांड में संतोषजनक उत्तर नहीं, बंगाल चुनाव से उत्साहित ममता बनर्जी का विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास और सरकार का अंतर्राष्ट्रीय डिजिटल मीडिया प्रतिष्ठानों से रार ठान लेना ऐसे उदाहरण हैं, जो हुकूमत को हिलाने की ताकत रखते हैं। सरकार इस सच से भाग नहीं सकती कि उसकी झोली में फिलहाल उपलब्धियों के नाम पर ऐसा ठोस कुछ नहीं है, जिसके आधार पर चुनाव वैतरणी पार की जाए। अगर खाते में उपलब्धियां नहीं हैं तो कम से कम आलोचना के जरिये सही तस्वीर मतदाताओं तक नहीं पहुंचे-यह कोशिश तो वह कर ही सकती है।

लेकिन यह निष्कर्ष निकालने में कोई संकोच नहीं है कि भारत ही नहीं, संसार भर में जब जब किसी सरकार ने पत्रकारिता का गला घोंटने का प्रयास किया, तो उसे नुकसान ही उठाना पड़ा है। अमेरिका के राष्ट्रपति रहे डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पूरे कार्यकाल में जिम्मेदार पत्रकारों और मीडिया प्रतिष्ठानों से शत्रुता बनाए रखी। परिणाम यह कि वे ‘ढेर‘ हो गए। भारत में इंदिरा गांधी ने 1971 में चुनाव जीता, लेकिन आपातकाल और प्रेस सेंसरशिप ने अगले चुनाव में उन्हें ‘निपटा‘ दिया। ‘नई दुनिया‘ अखबार ने संपादकीय स्थान खाली रखा। क्षति सरकार को हुई। ‘नई दुनिया‘ और इसके प्रधान संपादक अगले अनेक वर्षों तक पत्रकारिता की मुख्य धारा के केंद्र में रहे। बिहार में 1983 में जगन्नाथ मिश्र प्रेस बिल लाए। बाद में उन्हें वापस लेना पड़ा।

राजीव गांधी प्रचंड बहुमत से सत्ता में आए थे। वे मानहानि विधेयक लाए थे। वह भी उन्हें वापस लेना पड़ा। उसके बाद चुनाव में बोफोर्स सौदे का ‘प्रेत‘ उनके पीछे लगा। पत्रकारिता ने साथ नहीं दिया। नतीजा, सरकार ही चली गई। चंद्रशेखर ने ‘नवभारत टाइम्स‘ समूह से पंगा लिया और जासूसी के एक पिलपिले कारण से उनकी सरकार चली गई। एक जमाने में किशोर कुमार और जगजीत सिंह जैसे कलाकारों पर रेडियो और दूरदर्शन पर पाबंदी लगा दी गई थी। आज भी ये कलाकार लोगों के दिलों पर राज कर रहे हैं। पाबंदी लगाने वालों को कोई नहीं जानता। इसलिए डरकर निष्पक्ष और संतुलित पत्रकारिता नहीं करने की कोई वजह नहीं है। एजेंडा पत्रकारिता से बचिए। चाहे वह किसी के पक्ष में हो या किसी के खिलाफ हो मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

निजी हित के नाम पर पेशे की पवित्रता को ताक में नहीं रखा जा सकता मिस्टर मीडिया!

इस तरह की आजादी ही असल जम्हूरियत की निशानी है, यह बात ध्यान में रखने की है मिस्टर मीडिया!

हमारी पत्रकारिता को यह कैसी सनसनी का रोग लग गया है मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: राजद्रोह की चाबुक अब बेमानी हो गई है!

पत्रकारिता में हो रही इस गंभीर चूक को कैसे रोका जाए मिस्टर मीडिया?

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भारत के नजरिये से यह खुलासा वाकई चिंता में डालने वाला है: राजेश बादल

दो बरस पहले नवंबर महीने में पेगासस के जरिये भारत में जासूसी पर चिंताएं प्रकट की गई थीं। यानी ठीक उन्हीं दिनों हमें पता लग गया था, जब यह असंवैधानिक और आपराधिक कृत्य किया जा रहा था।

Last Modified:
Tuesday, 20 July, 2021
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

हम अपना तंत्र क्यों नहीं सुधारना चाहते 

दो बरस पहले नवंबर महीने में पेगासस के जरिये भारत में जासूसी पर चिंताएं प्रकट की गई थीं। यानी ठीक उन्हीं दिनों हमें पता लग गया था, जब यह असंवैधानिक और आपराधिक कृत्य किया जा रहा था। यही नहीं, संसद में यह मामला उठा था। राज्यसभा में 28 नवंबर 2019 को कांग्रेस ने इस पर सरकार से सफाई मांगी थी। तत्कालीन इलेक्ट्रॉनिकी तथा सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सदन में उत्तर दिया था। उस समय भी जासूसी की इन खबरों का आकार विकराल था और आज भी ताजा खुलासे के बाद हमारे अपने तंत्र पर सवाल उठ रहे हैं। अंतर इतना है कि उस समय अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव नहीं हुए थे।

इजरायली सॉफ्टवेयर पेगासस बनाने वाली कंपनी एनएसओ कहती है कि उक्त सॉफ्टवेयर सिर्फ लोकतांत्रिक मुल्कों को उनके राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए मुहैया कराया गया है। इसका मकसद सिर्फ अपराधियों, कानून तोड़ने वालों, उग्रवादी संगठनों तथा माफिया गिरोहों से निपटने में किया जाना है। कंपनी के इस मासूम तर्क पर क्या कहा जाए। जिस दिन इस सॉफ्टवेयर का जन्म हुआ होगा, उस दिन से ही स्पष्ट है कि यह नकारात्मक हथियार है और हुकूमतें इसका दुरुपयोग विरोधियों से निपटने में करेंगी। समीकरण समझने हों तो कहा जा सकता है कि अमेरिका और इजरायल के रिश्ते छिपे हुए नहीं हैं। सूचनाएं उस दौर की हैं, जब डोनाल्ड ट्रंप गद्दी पर विराजमान थे और हिन्दुस्तान के बड़े प्रिय थे। वाशिंगटन पोस्ट, गार्जियन तथा इस खुलासे में शामिल संस्थानों के वे कट्टर आलोचक रहे हैं। इन संस्थानों की उनसे कभी नहीं बनी। ट्रंप अगले चुनाव के लिए अत्यंत गंभीर मुद्रा में नजर आते हैं तो जो बाइडेन को क्या करना चाहिए? मैं इसका यह अर्थ लगाने के लिए आजाद हूं कि ट्रंप के प्रिय राष्ट्रों की सरकारें बदनाम और अलोकप्रिय हो जाएं और फिर अगले चुनाव तक डोनाल्ड ट्रंप को सहायता नहीं दे सकें- यह भी इस खुलासे का एक अपवित्र उद्देश्य हो सकता है।ऐसे में उस दौर की सूचनाएं उजागर करने का अर्थ यह है कि पेगासस जासूसी प्रसंग का अंतर्राष्ट्रीय फलक बहुत विकराल है। हिन्दुस्तान तो उसमें एक छोटा सा हिस्सा भर है।    

भारत के नजरिये से यह खुलासा वाकई चिंता में डालने वाला है। यहां के अनगिनत लोगों की जिंदगी के राज फोन से उजागर होते हैं तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है? आम आदमी इजरायल के किसी जासूसी सॉफ्टवेयर का निशाना बन जाए तो नागरिकों  के पास मुकाबले के लिए कोई संसाधन और तकनीकी काबिलियत नहीं है। मान लीजिए अगर वह सक्षम भी हो तो इस अपराध से लड़ाई उसे क्यों लड़नी चाहिए। खास तौर पर उस हाल में, जबकि उसने अपने बेहद ताकतवर हथियार यानी वोट के माध्यम से मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए अपनी सरकार को ही अधिकृत कर दिया हो।

गंभीर मसला यह नहीं है कि सरकार उस पत्रकार, राजनेता, विचारक या किसी आलोचक के हक की हिफाजत कर पाएगी या नहीं। महत्वपूर्ण तो यह है कि क्या भारतीय सरकारी तंत्र भी इस जुर्म में शरीक है। यदि ऐसा है तो इसकी क्या गारंटी है कि जिस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल सरकारी तंत्र ने अपने आकाओं के आलोचकों पर शिकंजा कसने के लिए किया है, कल के रोज उस सॉफ्टवेयर का निशाना भारतीय सुरक्षा से जुड़ी संवेदनशील सूचनाओं को समंदर पार भारत के शत्रु देशों तक पहुंचाने में नहीं होगा। एक प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री, सेनाप्रमुख और परमाणु कार्यक्रमों से जुड़े विशेषज्ञों की जानकारियां भी सुरक्षित नहीं रहेंगीं। यदि ऐसा हुआ तो सभ्य लोकतंत्र में निर्वाचित हुकूमत के लिए इससे बड़ी नाकामी और कुछ नहीं हो सकती। व्यक्ति के तौर पर एक संपादक अपने मौलिक अधिकारों का कुचला जाना एक बार बर्दाश्त कर सकता है, लेकिन जिस दिन देश कुचला जाएगा, उस दिन कोई हुकूमत भी नहीं बचेगी। कहने में हिचक नहीं कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इन दिनों जो साजिशें चल रही हैं, उनका मुकाबला करने के लिए भारत की तैयारी अभी अत्यंत कच्ची और कमजोर है।

यक्ष प्रश्न है कि क्या दुनिया भर की सरकारों की तरह भारत सरकार के इशारे पर यह खुफियागीरी कराई गई है? भारतीय लोकतंत्र में यह कोई नई और अनूठी बात नहीं है। अतीत में इसकी कुछ मिसालें हैं। एक प्रधानमंत्री तो इस मुद्दे पर अपनी सरकार ही खो चुके हैं। इस तरह की जासूसी को भारतीय समाज ने कभी भी मान्यता नहीं दी है। जिस सरकार या व्यक्ति ने ऐसा किया, उसे इस हरकत से क्षति पहुंची है। लाभ कुछ नहीं हुआ। भारतीय संविधान इसकी अनुमति नहीं देता कि चुनी हुई सरकार लोगों की जीवन शैली, आस्था, लोक व्यवहार, गुप्त क्रियाओं, धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक उत्सवों की खुफिया निगरानी करे। यह निहायत जंगली, अभद्र, अशालीन और अमर्यादित आचरण है। भारतीय समाज इसे जायज नहीं मानेगा।

दुनिया के तमाम देश इस पर क्या करते हैं, चर्चा बेमानी है। वैसे भारतीय कानून इस बात की इजाजत तो देता है कि वह किसी की जासूसी अथवा फोन की रिकॉर्डिंग कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति या संस्था ऐसे अपराधों में लिप्त है, जो भारतीय अखंडता-एकता को नुकसान पहुंचा सकता है तो उसे उजागर करने से कौन रोकना चाहेगा। यदि कोई आतंकवादी षड्यंत्र का भंडाफोड़ होता है तो उस पर किसे एतराज़ हो सकता है।

भारत के वित्तीय, सामाजिक और राजनीतिक ढांचे को कोई ताकत क्षतिग्रस्त करना चाहे तो उसके खिलाफ सारा देश अपनी सरकार का साथ देगा। लेकिन संदेह की सुई उस तंत्र की ओर इशारा कर रही हो, जो हमारे हित संरक्षण के लिए बनाया गया है तो फिर अंजाम की कल्पना की जा सकती है। इसके बावजूद भारत में जासूसी षड्यंत्र के पीछे के इरादों की जानकारी अवाम को पाने का अधिकार है। मुल्क इस पर केंद्र सरकार से स्पष्टीकरण की मांग करता है। ऐसा नहीं करने पर उसे लोगों की जलती निगाहों का सामना करना पड़ेगा।

(साभार: लोकमत समाचार)

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निजी हित के नाम पर पेशे की पवित्रता को ताक में नहीं रखा जा सकता मिस्टर मीडिया!

चंद रोज पहले मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने ‘कानून का राज’ विषय पर एक कार्यक्रम को संबोधित किया। उन्होंने इस दौरान एक बात बड़े मार्के की कही।

राजेश बादल by
Published - Monday, 12 July, 2021
Last Modified:
Monday, 12 July, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

चंद रोज पहले मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने ‘कानून का राज’ विषय पर एक कार्यक्रम को संबोधित किया। उन्होंने इस दौरान एक बात बड़े मार्के की कही। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कई बार सोशल मीडिया पर लोगों की भावनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। लेकिन न्यायपालिका को यह ध्यान रखना चाहिए कि इस मंच पर अभिव्यक्त शोर इस बात का सबूत नहीं है कि वह सही है और बहुमत क्या मानता है? ऐसे में यह चर्चा करना आवश्यक है कि कहीं सोशल मीडिया पर प्रस्तुत होने वाले रुझान संस्थानों को तो प्रभावित नहीं करते। इन सबसे न्यायाधीशों को अपनी राय पर कोई असर नहीं पड़ने देना चाहिए। इस नजरिये से चीफ जस्टिस का बयान साहसिक है और समाज के समर्थन की मांग करता है। 

बात बिलकुल सही है। बीते एक दशक में हमने देखा है कि सोशल और डिजिटल मीडिया के तमाम अवतारों पर अनेक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इसके अलावा कुछ सामाजिक और सियासी मसलों पर सच्चाई से परे कहानियां गढ़कर भावनाओं को भड़काने वाले अंदाज में परोसा जाता है। यह सिलसिला अभी भी जारी है। पूर्वाग्रही लोगों की ओर से इतिहास की घटनाओं और चरित्रों के बारे में काल्पनिक घटनाएं और कथाएं रची जाती हैं।

इनका हकीकत से कोई नाता नहीं होता। फिर वे भावुक अंदाज में अपील करते हैं कि इसे देश भर में फैला दो। यह समूचे राष्ट्र,जाति या धर्म के हित में है। इसके बाद मीडिया के मंचों की रगों में ये झूठी, आधारहीन और शरारती सूचनाएं दौड़ने लगती हैं। समाज का एक बड़ा वर्ग उस पर अपनी राय या रुझान बना लेता है। यह घातक है। मुख्य न्यायाधीश ने ठीक ही कहा कि कपोल कल्पित रुझानों पर जजों को क्यों भरोसा करना चाहिए। उनकी जगह रद्दी की टोकरी ही है।

अब सवाल यह है कि सोशल मीडिया की इन सूचनाओं का क्या पत्रकारिता से कोई संबंध है? दुर्भाग्य से यह धारणा बनती जा रही है कि वॉट्सऐप विश्वविद्यालय, फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर और अन्य प्लेटफॉर्मों पर जो बातें कही या दिखाई जाती हैं, वे सीधे अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ती हैं और यह एक किस्म की पत्रकारिता ही है। पर यह सच नहीं है। कोई कितनी ही व्याख्या कर ले-इन विकृत-भ्रामक, अराजक सूचनाओं की जहरीली फसल को पत्रकारिता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

एक पानवाले से लेकर किराना व्यापारी तक और मजदूर से लेकर मालिक तक, डॉक्टर से लेकर वकील तक, अफसर से लेकर राजनेता तक लगभग सब इन माध्यमों का उपयोग-दुरुपयोग करते हैं। यह आवश्यक नहीं कि वे कूटनीति, इतिहास और राजनीतिक अतीत के जानकार हों। विडंबना है कि भारतीय शिक्षा पद्धति उन्हें अच्छा प्रोफेशनल तो बनाती है, पर देश के प्रति जिम्मेदार और इतिहास का जानकार नहीं बनाती। इसलिए आसानी से वे भ्रामक सूचनाओं के जाल में उलझ जाते हैं।

इस तरह यह जहर हमारे दिल, देह और दिमाग में दौड़ता रहता है। मुझे यह स्वीकार करने में भी कोई हिचक नहीं कि पत्रकारों का एक पूर्वाग्रही तबका भी इस झांसे में आ जाता है। कस्बाई और आंचलिक पत्रकारिता में ही नहीं,  महानगरों में भी तथ्यों की गहन जांच पड़ताल किए बिना कुछ पत्रकार इन नकली तथाकथित समाचारों को विस्तार देने का काम जाने-अनजाने कर जाते हैं। हो सकता है कि इसमें उनका कुछ निजी हित भी हो। मगर निजी हित के नाम पर पेशे की पवित्रता को ताक में नहीं रखा जा सकता मिस्टर मीडिया!        

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

इस तरह की आजादी ही असल जम्हूरियत की निशानी है, यह बात ध्यान में रखने की है मिस्टर मीडिया!

हमारी पत्रकारिता को यह कैसी सनसनी का रोग लग गया है मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: राजद्रोह की चाबुक अब बेमानी हो गई है!

पत्रकारिता में हो रही इस गंभीर चूक को कैसे रोका जाए मिस्टर मीडिया?

भारतीय पत्रकारिता को मुख्य न्यायाधीश को शुक्रिया तो कहना ही चाहिए मिस्टर मीडिया!

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'अधूरा रह गया दिलीप साहब के साथ वह इंटरव्यू...'

अनुभवी अभिनेता दिलीप कुमार जी के निधन के बारे में जानकर मन भर आया। उनके अभिनय की अनूठी शैली पीढ़ियों तक फिल्म प्रेमियों के बीच याद की जाती रहेगी

Last Modified:
Wednesday, 07 July, 2021
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निर्मलेंदु वरिष्ठ पत्रकार ।।

अनुभवी अभिनेता दिलीप कुमार जी के निधन के बारे में जानकर मन भर आया। उनके अभिनय की अनूठी शैली पीढ़ियों तक फिल्म प्रेमियों के बीच याद की जाती रहेगी। मैंने उनकी लगभग सभी फिल्में देखी हैं। ज्यादातर फिल्मों में एक आदर्शवान चरित्र को जीने वाले इस अभिनेता से मैंने बहुत कुछ सीखा है। उनकी फिल्मों की न केवल कहानी से मैं प्रेरित रहता था, बल्कि संवाद से भी मैं बहुत कुछ सीखता था। अभिनय के फील्ड में मेरे गुरु रहे दिलीप साहब। संगीत के क्षेत्र में मेरे गुरु रहे मोहम्मद रफी साहब और जीवन के कर्मकांड में मेरे गुरु रहे सुरेंद्र प्रताप सिंह, जिन्हें लोग प्यार से एसपी कहते थे। इन तीनों के कारण ही मैं आज यहां तक पहुंचा हूं। मैं इन्हीं लोगों को देखकर सीखता और आज भी सीख रहा हूं।

बात सन 1998 की है। शायद अगस्त या सितबर माह था। मैं उन दिनों अमर उजाला के मुंबई ब्यूरो का ब्यूरो चीफ था। मैं दिलीप साहब का फैन ही नहीं, मुरीद भी हूं। दीवाना हूं। ऐक्टिंग के फील्ड में मैं उन्हें अपना गुरु मानता हूं, इसलिए मुंबई पहुंचते ही मेरी उनसे मिलने की इच्छा बढ़ गई। उनसे मिलने की प्रक्रिया यही थी कि उन्हें मुझे फैक्स भेजना पड़ेगा। वह स्वीकृति देंगे और समय भी तय कर देंगे। लेकिन फैक्स यहां से तो उनके पास पहुंच गया, लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं आया। मैं विचलित था। समझ में नहीं आ रहा था कि किससे कहूं। तभी किसी ने मुझे कहा कि पाठक जी, जो कि पीआर का काम करते थे, उन्हें कहें। पाठक जी का पूरा नाम है आर.आर. पाठक। मुंबई में वह मेरे अच्छे दोस्त बन गये थे। वह मुझे 12 सालों से जानते थे। उनसे कहते ही बात बन गई। यह वाक्या आज से 23 साल पहले का है।

पाली हिल में उनके रिहाइशखाने में पहुंचे, तो दरवाजे पर दो पठान जैसे पहरेदार मिल गये। उन्हें देखते ही एहसास हो गया कि हम किसी खास व्यक्ति से मिलन आये हैं। पाठक जी को देखते ही उन्होंने मुस्कुराकर दरवाजा खोल दिया। दाहिने हाथ में एक बड़े से हॉल में ले गये और बिठा दिया। शायद पांच मिनट बाद ही सायरा बानो आयीं और झुककर नमस्ते करते हुए कहा, साहब अभी आ रहे हैं, तब तक आप चाय पीजिए। सायरा बानो से मिलकर लगा वह भी हमारी तरह आम इंसान ही हैं। कुछ सोच रहा था कि तभी चाय आ गई। चाय पी ही रहे थे कि एक आवाज आई, पाठक जी बहुत दिनों बाद आप तशरीफ ले आये। क्या बात है भाई, कभी मेरी गली में भी चक्कर लगा जाया करो। कहते हुए सामने बैठ गये। दिलीप साहब ने पाठक जी से पूछा, मेरी ओर इशारा करते हुए, इस शख्स का परिचय, पाठक जी ने जवाब दिया, आपका एक जबरदस्त फैन, जो कि पेशे से पत्रकार भी हैं। पत्रकार का नाम सुनते ही दिलीप साहब उछलते हुए बोले, अरे बाप रे बाप..., पता नहीं यह पत्रकार क्या क्या हमसे कुरेदकर ले जाएंगे। मैंने उनकी ओर देखा और अदब से झुक कर नमस्ते की और कहा, कुरेदेंगे नहीं, केवल यादों को टटोलेंगे। इस पर उनकी जो हंसी थी, वह इतनी तेजी से गूंजी कि मुझे राम और श्याम के एक किरदार की याद आ गई। श्याम का किरदार, जो कि हंसी ठिठोली करता, कभी मुस्कुराता, तो कभी गाता... कभी होटल में खा पीकर पैसे नहीं देता, कभी गाता... राम की लीला रंग लाई, श्याम ने बंसी बजाई... या फिर कभी गाता... आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले, कल तेरी बज़्म से दीवाना चला जाएगा...

दरअसल, जब इस गीत की चर्चा मैंने की, तो उन्होंने हंसते हुए जवाब दिया कि हां, गाने से पहले मेरा एक चांटे के साथ जोरदार स्वागत भी हुआ था। वहीदा ने कस के चाटा मारा था। फिर समझाते हुए कहा, हालांकि मैंने ही उन्हें कसकरके चांटा मारने के लिए कहा था, ताकि चांटों की गूंजी चारों ओर सुनाई दे। दिलीप साहब ने आगे कहा, हम कलाकार हैं, जब तक हम कैरेक्टर में नहीं घुसते, तब तक ऐक्टिंग नहीं निखरती। तभी मेरे मन में एक प्रश्न ने अंगड़ाई ली और मैंने पूछ ही लिया... आपने कभी विज्ञापन की दुनिया में काम क्यों नहीं किया? जवाब में उन्होंने कहा, मैं भाड़ नही हूं, एक्टर हूं जनाब, शुद्ध एक्टर और यह कहते हुए वह स्वयं गाने लगे... ये मेरा दीवानापन है, या मुहब्बत का सुरूर, तू न पहचाने तो है ये, तेरी नजरों का कुसूर। दरअसल, इस गीत के माध्यम से वह कहना ये ही चाह रहे थे कि यह उनकी मर्जी है। वह विज्ञापन के लिए काम करें या न करें, उनकी मर्जी।

मैंने इस गीत से संबंधित एक प्रश्न पूछ लिया कि आप तो रफी साहब से ही इस गीत को गवाना चाहत थे, लेकिन अंततः मुकेश को इस गीत को गाने का मौका कैसे मिल गया। उनका जवाब था, शंकर जयकिशन की कोशिश अच्छी थी। जब गाना मैंने सुना, तो मुझे लगा कि वही इस गीत के साथ न्याय कर सकते हैं। इसके बाद मैंने दिलीप साहब से पूछा कि आपने मदर इंडिया क्यों ठुकरा दी? प्रश्न पूछने के बाद पहले तो उन्होंने मुझे घूर कर देखा, थोड़ी देर तक मंद-मंद मुस्कुराते हुए बोले... बरखुरदार जो मेरी दो फिल्मों में पहले हीरोइन थीं, वह मेरी मां कैसे बन सकती हैं। मां बहुत बड़ी चीज होती हैं जनाब। मैं वह भावना कहां से लाता, मुझे लगा कि यह किरदार के साथ बेईमानी होगी। हां, यह सच है कि जब महबूब खान ने मुझे स्क्रिप्ट सुनाई, तो मैं हतप्रभ रह गया। लेकिन बेटे का रोल न बाबा न... एक्टिंग करते हुए कहा, कैसे मैं नरगिस को मां कहूंगा। दिल ने गंवारा नहीं किया। अब आप ही बताएं कि फिल्म मेला और बाबुल में नरगिस के साथ खुलेआम रोमांस करने के बाद लोग मुझे उस किरदार में एक्सेप्ट करते क्या। उनसे पूरी बातचीत नहीं हो पाई कि हमें लौट कर आना पड़ा, क्योंकि अचानक दिलीप साहब के घर में एक फोन आया कि उनके किसी जानने वाले का इंतकाल हो गया। तो हमारी इच्छा पूरी नहीं हुई और हम वापस दफ्तर लौट आये।

फिल्मों के प्राणाधार दिलीप साहब

एक तरफ जहां, ‘मधुमती’ में मुकेश, सुहाना सफर और यह मौसम हंसी, हमें डर हैं कि हम खो न जाए कहीं... गीत से दिलीप साहब की आवाज बनकर उभरे, तो वहीं जब जरूरत महसूस हुई, तो रफी साहब ने इस गीत को गाकर ... टूटे हुए ख्वाबों ने हमको यह सिखाया है, दिल ने जिसे चाहा था, ... अब समझने वाली बात है कि ये दोनों गाने अलग अलग जॉनर के हैं, लेकिन जब दिलीप साहब की आवाज बनती है, तो कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि दिलीप साहब नहीं गा रहे हैं।

नया दौर (1957), मधुमती (1958), यहूदी (1958), पैगाम (1959), मुगल-ए-आजम (1960), कोहिनूर (1960), गंगा-जमुना (1961) ये सब दिलीप कुमार के उत्कर्ष काल की फिल्में हैं। नया दौर में दिलीप साहब ने मधुबाला की जगह वैजयंतीमाला को रिप्लेस किया। मुगल-ए-आजम उनका चरमोत्कर्ष थी, जिसके लिए दिलीप-मधुबाला ने आपसी अनबन के बावजूद साथ में काम किया। गंगा-जमुना का निर्माण स्वयं दिलीप कुमार ने किया और इसके निर्देशक नितिन बोस थे। यह पूरबी (भाषा) में बनी पहली फिल्म थी और बाद में इसकी तर्ज पर भोजपुरी फिल्मों के निर्माण का एक नया सिलसिला ही चल पड़ा।

आत्मकथा में बचपन का जिक्र करते हुए लिखा है कि एक फकीर ने उनके बारे में ऐलान किया था कि ये कोई आम बच्चा नहीं है। उनकी दादी को बताया कि यह तो बेहद मशहूर होने और असाधारण ऊंचाइयों को छूने के लिए ही आया है। इसका खूब ध्यान रखना। अगर बुरी नजरों से बचा लिया, तो बुढ़ापे तक खूबसूरत रहेगा। हमेशा काला टीका लगाकर रखना। सच में उनके चेहरे की खूबसूरती का वही नूर आखिर तक झलकता रहा।

मेला, शहीद, अंदाज, जोगन, दीदार, दाग, शिकस्त, देवदास उनकी ट्रेजिक फिल्में थीं। डॉक्टर की सलाह पर उन्होंने आजाद, कोहिनूर, आन, नया दौर फिल्मों में खिलंदड़ प्रेमी की भूमिकाएं निभाईं। नया दौर फिल्म का गीत 'उड़े जब जब जुल्फें तेरी...' युवा दिलीप कुमार का सटीक चित्रण है। दर्शकों का उनके प्रति दीवानगी का यही आलम था। दाग और आन, देवदास और आजाद, मुगल-ए-आजम और कोहिनूर जैसी विपरीत स्वभाव वाली उनकी फिल्में आमने-सामने ही रिलीज हुई थीं। एक तरफ वे दर्शकों को पीड़ा की सुखानुभूति देते, तो वहीं दूसरी तरफ लोगों का मनोरंजन करते। दरअसल, अपने साथ वे नाटकीयता का एक तूफान लेकर आए थे। फिल्मों में उनके नए-नए रूप देखकर दर्शक दंग रह जाते थे। अभिनय के प्रति दिलीप कुमार का रवैया सदा पूर्णतावादी रहा। युवावस्था में वे फिल्मों के प्राणाधार होते थे, तो अपने दूसरे दौर की प्रौढ़ भूमिकाओं में भी उन्होंने नवीनताएं दी। बस ये ही है दिलीप साहब की खासियत।

(लेखक दैनिक भास्कर, नोएडा संस्करण के स्थानीय संपादक हैं)

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वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने बताया, कैसे विदेश नीति के चक्रव्यूह से निकले भारत

भारतीय विदेश नीति एक बार फिर चक्रव्यूह में उलझी है। पड़ोसी राष्ट्रों, यूरोप तथा पश्चिमी देशों के साथ संबंधों में जिस तरह के विरोधाभासी हालात बन रहे हैं

Last Modified:
Wednesday, 07 July, 2021
india5454

राजेश बादल वरिष्ठ पत्रकार ।।

भारतीय विदेश नीति एक बार फिर चक्रव्यूह में उलझी है। पड़ोसी राष्ट्रों, यूरोप तथा पश्चिमी देशों के साथ संबंधों में जिस तरह के विरोधाभासी हालात बन रहे हैं, वे इस बात पर जोर देते हैं कि आंतरिक राजनीतिक परिस्थितियों से कहीं अधिक परदेसी नीतियों के प्रति संवेदनशील होना जरूरी है। 

हिन्दुस्तान के भीतर तो उतार-चढ़ाव आते रहते हैं और यह देश काफी हद तक उनसे निपटने में भी सक्षम है। लेकिन वैदेशिक संबंधों के बारे में बेहद जिम्मेदार और जवाबदेह होने की आवश्यकता है। यदि इसे काम चलाऊ ढंग से लिया गया तो वैश्विक परिदृश्य में आने वाले दिन मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं। उनके परिणाम गंभीर हो सकते हैं।

अफगानिस्तान से अमेरिका और सहयोगी देशों के सैनिकों की वापसी के बाद इस मुल्क का भविष्य खतरनाक संकेत दे रहा है। दो राय नहीं कि तालिबान अब वहां अधिक ताकतवर और विराट आकार में प्रस्तुत होंगे। अफगानी सरकार उनका कब तक मुकाबला कर सकेगी-कहना कठिन है। बीस-पच्चीस बरस पहले उन्हें उग्रवादी कहा जा सकता था, पर अब इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वे अफगानिस्तान में अनुदार विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जिसके आगे उदारवादी समर्पण करते दिखाई देने लगे हैं। कमोबेश यही स्थिति दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के तमाम राष्ट्रों की है। 

उदार और मुक्त द्वार की नीति के चहेते हाशिये पर हैं। विडंबना यह कि यह विचारधारा वामपंथियों की उस सोच का समर्थन करती है कि बंदूक की नली से सत्ता की गली मिलती है। विचार के धरातल पर इस तरह के लोग साथ-साथ खड़े नजर आते हैं। दक्षिण एशिया के अफगानिस्तान, म्यांमार, पाकिस्तान इस श्रेणी में रखे जा सकते हैं। 

दूसरी श्रेणी वह है जहां लोकतांत्रिक मुखौटे के साथ अधिनायक पनप चुके हैं। चीन, श्रीलंका, बांग्लादेश और भूटान ऐसे ही देश हैं। तो इसका क्या अर्थ लगाया जाए कि तेज गति से भागते मौजूदा संसार की दिलचस्पी अब शासन प्रणालियों में या कहा जाए कि जम्हूरियत में नहीं रही है। एक मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि आम नागरिक को सामूहिक नेतृत्व-शासन शैली से कोई खास लगाव नहीं रहा है। यानी कि तानाशाही से भी उसे ऐतराज नहीं है। अपवादों को छोड़ दें तो वह अब अपने अधिकारों के लिए लड़ना नहीं चाहता।

लोकतांत्रिक हिन्दुस्तान अब तक तालिबान के साथ सीधे संवाद से बचता रहा है। लेकिन जब लोकतांत्रिक अमेरिका तालिबान से समझौते पर उतर आया तो हिन्दुस्तान के लिए भी झिझक क्यों होनी चाहिए। डोनाल्ड ट्रम्प भी सैनिकों की वापसी चाहते थे और जो बाइडेन भी। जाहिर है यह देश की मांग थी। 

अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में भारत का भारी पूंजीनिवेश दांव पर है। ईरान में चाबहार बंदरगाह के जरिये अफगानिस्तान से व्यापार की संभावनाओं पर भी खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। कोई नहीं जानता कि तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद उनका भारत के साथ कैसा व्यवहार रहेगा। पिछली पारी में उनकी प्राथमिकता मजहबी रही है। पर अब तालिबानी नेतृत्व भी वह नहीं रहा है। 

हमें आशा करनी चाहिए कि उनकी अक्ल पर पड़े पर्दे हट चुके होंगे। ऐसी स्थिति में भारत को अपनी विदेश नीति में लचीलापन तो लाना ही होगा। एक कारण यह भी है कि भारत नहीं चाहेगा कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान का रुतबा बढ़े और उसकी दशकों की पूंजी लूट ली जाए। याद रखना चाहिए कि जब पाकिस्तान में जनरल परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ की सरकार को हटाकर सैनिक शासन लगाया था तो हिन्दुस्तान ने ऐलान किया था कि वह पाकिस्तान में फौजी हुकूमत से कोई संवाद नहीं करेगा, पर वही मुशर्रफ सम्मान से आगरा शिखर वार्ता में आए थे। 

इसलिए एक बार फिर तालिबान के साथ कूटनीतिक संबंध बहाल करने के लिए यू-टर्न लेना पड़े तो कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। अच्छी बात है कि इमरान सरकार से तालिबान भी सहज नहीं है। जिस तरह पाकिस्तान ने अमेरिका-तालिबान समझौते के बाद गाल बजाए हैं और भारत को दूर रखने की बिन मांगी सलाह तालिबान को दी है, वह उन्हें रास नहीं आई है। 

इमरान हुकूमत तो यहां तक कह चुकी है कि वे तालिबान सरकार को पसंद ही नहीं करेंगे। वॉशिंगटन पोस्ट के हालिया आलेख में इमरान खान ने लिखा है कि यदि इस समझौते को तालिबान ने सैनिक विजय माना तो उनकी बड़ी भूल होगी। इससे वहां अंतहीन रक्तपात की शुरुआत होगी। इमरान खान का यह बड़बोलापन तालिबान को रास नहीं आया था।  

तालिबान के आने की आशंका से चीन भी कम परेशान नहीं है। उसे लगता है कि तालिबान शिनजियांग प्रांत में आजादी का समर्थन कर सकते हैं और उईगर मुस्लिम उग्रवादी गतिविधियों के लिए अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके अलावा खनिजों के उत्खनन में उसका पूंजी निवेश भी डूबने की आशंका है। अनेक परियोजनाएं चीन वहां संचालित कर रहा है।

यहां भले ही चीन और हिन्दुस्तान समान चिंताओं की जमीन पर खड़े हों पर हमारी सियासी प्राथमिकता चीन को अफगानिस्तान में अलग-थलग करने की होनी चाहिए न कि दो बाहरी कारोबारी साझेदारों जैसी। चीन सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है लेकिन आर्थिक झटके नहीं। 

पाकिस्तान में पहले ही उसका बहुत पैसा डूब चुका है। ऐसे में भारत को अफगानिस्तान में रौब की स्थिति बनानी चाहिए। याद रखिए कि इस खूबसूरत पहाड़ी मुल्क से हिन्दुस्तान के सदियों पुराने आध्यात्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक रिश्ते रहे हैं। उनकी उपेक्षा ठीक नहीं है।

(साभार: लोकमत समाचार)

 

 

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'मेनका गांधी के शब्दों पर सवाल उठाना आसान है, लेकिन उनके जैसा बनना नामुमकिन'

सोशल मीडिया पर मेनका गांधी के खिलाफ जंग छिड़ी हुई है। वेटनरी डॉक्टर उन्हें खुलकर निशाना बना रहे हैं। डॉक्टरों को मेनका गांधी के शब्दों पर आपत्ति है

नीरज नैयर by
Published - Tuesday, 29 June, 2021
Last Modified:
Tuesday, 29 June, 2021
menkagandhi5454

नीरज नैयर, युवा पत्रकार ।।

सोशल मीडिया पर मेनका गांधी के खिलाफ जंग छिड़ी हुई है। वेटनरी डॉक्टर उन्हें खुलकर निशाना बना रहे हैं। डॉक्टरों को मेनका गांधी के शब्दों पर आपत्ति है, जो उन्होंने वरिष्ठ डॉक्टर के खिलाफ इस्तेमाल किए। शब्दों की मर्यादा जब भी टूटती है, गुस्से का ज्वार फूटता है। न यह पहली बार हो रहा है और न आखिरी बार। ट्विटर पर बॉयकॉट मेनका गांधी ट्रेंड कर रहा है, जिसमें हर रोज सैंकड़ों ट्वीट शामिल हो रहे हैं। आवेश की इस वर्चुअल गंगा में ऐसे लोग भी अपने हाथ धो रहे हैं, जिनके खुद के हाथ कभी न कभी बेजुबानों के खून से रंगे होंगे। जाहिर, इस मुद्दे से लोगों को सांसद और पशुप्रेमी मेनका गांधी के खिलाफ जहर उगलने का मौका मिल गया है। निश्चित तौर पर विरोध में शामिल अधिकांश लोगों को यह भी नहीं पता होगा कि मामला क्या है और मेनका गांधी की नाराजगी की वजह क्या रही। अक्सर ऐसे मामलों में एक पक्षीय विचारधारा वाले एकजुट हो जाते हैं और यही एकजुटता किसी भी बात को बरगद के पेड़ जितना बड़ा कर देती है। 

जिस मामले पर बवाल हो रहा है वो दरअसल आगरा और गोरखपुर के वेटनरी डॉक्टरों को लेकर है। इसकी एक ऑडियो क्लिप भी वायरल हो रही है, जिसमें मेनका गांधी को तल्ख अंदाज में बात करते सुना जा सकता है। आज के आईटी युग में सोशल प्लेटफॉर्म पर आने वाली हर चीज को लेकर एक धारणा कायम कर ली जाती है और कोई नया व्यक्ति इस धारणा का हिस्सा बनेगा या नहीं ये वहां मौजूद ‘लाइक’, रीट्वीट और कमेंट आदि पर निर्भर करता है। यानी सीधे शब्दों में कहें तो लाइक-कमेंट सही को गलत और गलत को सही बनाने की ताकत रखते हैं। इसी वायरल क्लिपिंग में 70 हजार का जिक्र भी किया गया है, जो संभवतः डॉक्टरों ने कुत्ते के इलाज के लिए वसूले, लेकिन उसके बावजूद उसकी हालात खराब होती गई। क्या ये गौर करने लायक विषय नहीं है?     

अस्पताल में जब भारी भरकम फीस भरने के बावजूद लापरवाही से किसी मरीज की मौत हो जाती है, तो दुख से उपजे आक्रोश को सही करार देने वालों की फौज खड़ी हो जाती है। डॉक्टरों पर सवाल खड़े किए जाने लगते हैं, उनके लिए ‘पैसों के पुजारी’ जैसे शब्द गढ़े जाते हैं और जब बात बेजुबानों की आती है तो सबकुछ बदल जाता है। विरोध और गुस्से को लेकर ये दोगलापन किस लिए? मैं ये कतई नहीं कहता कि वेटरनरी डॉक्टरों की पूरी कौम खराब है। कई ऐसे डॉक्टर हैं, जो कार में आने वाले ब्रीड डॉग और सड़क पर घूमने वाले आवारा कुत्तों में कोई फर्क नहीं करते, क्योंकि उनकी संवेदनाएं पैसों के बोझ में दबी नहीं हैं। मैं खुद भी व्यक्तिगत तौर पर कई ऐसे डॉक्टर्स को जानता हूं। लेकिन ये कड़वी सच्चाई है कि अधिकांश वेटनरी डॉक्टर बेजुबानों को जेब भरने का साधन समझने लगे हैं और अपने पेट्स को लेकर इन डॉक्टरों के पास जाने वाले 10 में 8 लोगों को कभी न कभी इस सच्चाई का सामना करना पड़ा होगा। 

उन 8 लोगों में एक मैं भी हूं। कई मौकों पर मैंने वेटनरी डॉक्टरों की शपथ और उनके मिशन के बीच के अंतर को महसूस किया है। आगरा में कई सालों पहले एक रिटायर्ड वेटनरी डॉक्टर की वजह से मेरा जीता जागता डॉग बुत बनकर रह गया था। दरअसल, मैंने एक फीमेल डॉग रेस्क्यू किया था जिसका नाम था हैंसी। उसके पैर के पास सूजन ने मुझे विचलित किया और मैं उसे किसी बड़े खतरे से बचाने के लिए डॉक्टर के पास पहुंच गया। इससे अंजान की जिसे मैं खतरे से बचाने वाला समझ रहा हूं वो असल में खुद ही खतरा बन जाएगा। डॉक्टर ने मेरे पोमेरियन डॉग को तीन-चार काले पीले इंजेक्शन लगाए। उस समय न मुझमें इस विषय को लेकर खास समझ थी और न ही मैं डॉक्टर के अनुभव पर सवाल उठाना चाहता था। वापसी के कुछ घंटों बाद ही डॉग की हालत खराब होने लगी। जब मैं दोबारा क्लीनिक पहुंचा, तो डॉक्टर ने दो-तीन इंजेक्शन और लगा दिए गए। अगले 24 घंटों में हैंसी एक ऐसी बुत बन गई, जो सिर्फ कराह सकती थी। उसके हाथ-पैर अकड़ गए, जीभ मुंह से बाहर आ गई और उसने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया। उस स्थिति में क्या मुझसे डॉक्टर के साथ शालीनता की उम्मीद की जा सकती थी?

कुछ सालों बाद मैंने एक और डॉग रेस्क्यू किया और उसका नाम भी हैंसी रखा। पुणे में रहने के दौरान अचानक एक दिन उसका शरीर एक तरफ मुड़ गया। कुछ हद तक वैसी स्थिति जब डॉग अपनी पूंछ पकड़ने के प्रयास में मुड़ते हैं। लगभग 20-25 किमी का सफर तय करके मैं एक विख्यात वेटनरी डॉक्टर के पास पहुंचा, जहां पुन: ये अहसास हुआ कि बेजुबानों के अधिकांश डॉक्टरों की संवेदनाएं मर चुकी हैं। मेरे डॉग की पीड़ा से डॉक्टर साहब का कोई लेना-देना नहीं था। वो औपचारिकता के लिए आए और बगैर फिजिकल एग्जामिन के आश्वासन दिलाया कि सबकुछ ठीक हो जाएगा। इसके बाद वह अपना लैपटॉप लेकर शेयर बाजार की दुनिया में व्यस्त हो गए और उनके नौसिखए सहायक एक के बाद एक टेस्ट करते गए। मेरे डॉग की मूल समस्या को छोड़कर उन्होंने सबकुछ किया। करीब 4 घंटे तक ये चलता रहा और साहब एक बार भी देखने नहीं आये। अंत में तकरीबन 20 हजार का बिल थामकर कहा गया कल आना, तब देखते हैं। इसके कुछ दिन बाद हमारी हैंसी सीनियर भी हमें छोड़कर चली गई। क्या इस स्थिति में मुझसे डॉक्टर के साथ शालीनता की उम्मीद की जा सकती है?

भोपाल में रहने के दौरान हाल ही में जब मैं एक घायल स्ट्रीट डॉग को वेटनरी डॉक्टर के पास लेकर गया, तो वहां भी पिछली बार जैसा अनुभव हुआ। एक स्वस्थ पैसे वाले कुत्ते की ग्रूमिंग कर रहे डॉक्टर ने तड़प रहे स्ट्रीट डॉग को देखने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई। यहां तक कि उसे अंदर लाने भी नहीं दिया, वो काफी देर तक जमीन पर छटपटाता रहा। पैसे वालों से पैसा बनाकर जब साहब आए तो उसे हाथ से नहीं बल्कि अपने पैरों से एग्जामिन किया, जैसे वो कोई जीवित प्राणी नहीं बल्कि निर्जीव वस्तु है। क्या ऐसे डॉक्टरों के लिए सम्मान की उम्मीद की जानी चाहिए? 

मेनका गांधी के शब्दों पर आपत्ति जताकर उनके खिलाफ आपत्तिजनक शब्द इस्तेमाल करने वालों को पहले उस मालिक का दर्द भी समझना चाहिए, जिसके डॉग को मोटी फीस देने के बाद भी सही इलाज नहीं मिला। मेनका गांधी को मैं सालों से जानता हूं और उनसे मिलने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ है। सौभाग्य इसलिए कहूंगा, क्योंकि जितनी शिद्दत से वह बेजुबानों के लिए काम करती हैं, उनकी पीड़ा को अपनी पीड़ा समझती हैं, उतना कोई इंसानों के लिए भी नहीं कर सकता और ऐसी शख्सियत से मिलना मेरा सौभाग्य है। मेनका गांधी तक पहुंचना बाकी नेताओं तक पहुंचने जितना मुश्किल नहीं है, वह महज एक ई-मेल पर जानवरों की मदद के लिए उपलब्ध हो जाती हैं। दिन भर जानवरों के अधिकारों के लिए लड़ना, उन्हें क्रूरता से बचाने के प्रयास करना और व्यक्तिगत रूप से खुद एक-एक अपडेट लेना क्या कोई आसान काम है? संभव है कि इस आपा-धापी में गुस्से के ज्वार में शब्दों की सौम्यता कहीं बह गई हो, लेकिन इसके लिए मेनका गांधी के संपूर्ण जीवन, सामाजिक कार्यों पर प्रश्न चिन्ह लगाना। उनके लिए ‘घटिया’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना क्या जायज है? इस पर विचार किया जाना चाहिए। निसंदेह इस वर्चुअल तूफान का सामना भी वह बखूबी कर लेंगी। इसलिए नहीं कि वह सत्ताधारी पार्टी की सांसद हैं, बल्कि इसलिए कि उनके पास लाखों प्रशंसकों की शक्ति है। जो यह जानते हैं कि मेनका गांधी किसी बेजुबान के साथ गलत नहीं होने देंगी।

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इस तरह की आजादी ही असल जम्हूरियत की निशानी है, यह बात ध्यान में रखने की है मिस्टर मीडिया!

हिन्दुस्तान के पड़ोस से आ रहीं मीडिया से जुड़ी खबरें डराने वाली हैं। खास तौर पर पाकिस्तान और चीन में निष्पक्ष पत्रकारिता करना खतरे से खाली नहीं है।

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 23 June, 2021
Last Modified:
Wednesday, 23 June, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

हिन्दुस्तान के पड़ोस से आ रहीं मीडिया से जुड़ी खबरें डराने वाली हैं। खास तौर पर पाकिस्तान और चीन में निष्पक्ष पत्रकारिता करना खतरे से खाली नहीं है। इसलिए इस बार मिस्टर मीडिया में परदेसी पत्रकारिता के हाल और उससे देसी पत्रकारिता पर उमड़ते-घुमड़ते चिंता के बादलों के बारे में चर्चा। पहले संसार के सबसे ज्यादा आबादी वाले मुल्क चीन की चर्चा। वहां हॉन्गकॉन्ग के समाचारपत्र ‘एप्पल डेली’ पर चीनी सत्ता ने राजद्रोह का आरोप लगाया है। उसके प्रधान संपादक तथा चार अन्य आला अफसरों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।

अखबार की 17 करोड़ की संपत्ति भी जब्त कर ली गई। ‘एप्पल डेली‘ को निष्पक्ष और लोकतंत्र समर्थक माना जाता है। पिछले बरस हॉन्गकॉन्ग में लोकतंत्र के समर्थन में जो आंदोलन हुए थे, उसके बाद से यह पहली बड़ी कार्रवाई है। सरकारी चेतावनी है कि जो पत्रकार लोकतंत्र के समर्थन में लिखेगा, उसे राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का उल्लंघन माना जाएगा। अच्छी बात यह है कि अखबार इसके आगे झुका नहीं। उसने विरोध में अगले दिन पांच लाख प्रतियां छापीं। दिन भर लोग कतार में लगकर इस अंक को खरीदते रहे। आमतौर पर यह समाचार पत्र 80 हजार प्रतियां प्रकाशित करता है।

अब पाकिस्तान की बात। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, बीते साल में करीब डेढ़ सौ पत्रकारों के साथ मारपीट, हत्या, अपहरण या अन्य उत्पीड़न की वारदात हुईं। हाल ही में राजधानी इस्लामाबाद में पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चेयरमैन अबसार आलम को गोली मार दी गई। इस्लामाबाद में ही एक और लोकप्रिय पत्रकार असद अली तूर के घर में हमलावर घुसे। उनके साथ हाथ-पैर बांधकर देर तक मारपीट की और फौज की तारीफ में नारे लगवाए। जाहिर है कि असद अली सेना के आलोचक थे। अबसार आलम ने भी फौज और आईएसआई की आलोचना की थी।

इससे पहले देश के बेहद सम्मानित एंकर हामिद मीर ने लोकतंत्र पर फौजी दख़ल की निंदा की तो टीवी पर उनका चर्चित शो ही बंद कर दिया गया। समाचार पत्रों में उनके लिखने पर पाबंदी लगा दी गई। हामिद ने पाकिस्तान में पत्रकारों पर सेना के अत्याचारों का विरोध किया था और चेतावनी दी थी कि भले ही पत्रकार फौज की तरह मारपीट और हत्या नहीं कर सकते, लेकिन उनके पास सैनिक तानाशाही के खिलाफ सुबूत हैं। वे कभी भी अवाम के सामने रखे जा सकते हैं। इसी के बाद उन्हें सताया जाने लगा। उत्पीड़न यहां तक बढ़ा कि हामिद मीर को माफी मांगनी पड़ी। एक उदाहरण अजय लालवानी का है। वे सिंध के जुझारू पत्रकार थे। अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए लिखते थे। उनकी दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई। सिंध के सारे पत्रकार इस मामले में एकजुट हो गए, मगर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है?

पास-पड़ोस में अभिव्यक्ति की आजादी पर आक्रमण हिन्दुस्तान के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। जब-जब पत्रकारिता का निष्पक्ष सुर दबाने अथवा असहमति को कुचलने का प्रयास किया जाता है तो राष्ट्र के हित में नहीं होता। सरकार में बैठे नियंताओं के लिए यह सबक है कि स्वस्थ पत्रकारिता पर दबाव डालकर वे अपने देश का नुकसान तो करते ही हैं, निजी खामियाजा भी उन्हें भुगतना होता है। इंदिरा गांधी ने आपातकाल में प्रेस सेंसरशिप लगाईं थी। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके फैसले का ‘प्रेत’ अभी भी देश में जिंदा है। मूक मवेशियों और इंसानों के बीच यही फर्क है कि इंसान अपने सोच को स्वर दे सकता है- ताला लगा के आप हमारी जबान को/कैदी न रख सकेंगे जेहन की उड़ान को/

सोचने-विचार करने और उन्हें प्रकट करने की आजादी ही असल जम्हूरियत की निशानी है। यह बात ध्यान में रखने की है मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

हमारी पत्रकारिता को यह कैसी सनसनी का रोग लग गया है मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: राजद्रोह की चाबुक अब बेमानी हो गई है!

पत्रकारिता में हो रही इस गंभीर चूक को कैसे रोका जाए मिस्टर मीडिया?

भारतीय पत्रकारिता को मुख्य न्यायाधीश को शुक्रिया तो कहना ही चाहिए मिस्टर मीडिया!

इस तरह का व्यवहार दूषित और अमानवीय मानसिकता का प्रतीक है मिस्टर मीडिया!

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न्यू मीडिया में हैं करियर की अपार संभावनाएं : प्रो. संजय द्विवेदी

वेबसाइट, मोबाइल ऐप और ओटीटी प्लेटफॉर्म में जिस तरह लोगों की रुचि बढ़ रही है, उसे देखकर ये कहा जा सकता है न्यू मीडिया ही वो क्षेत्र है, जिसमें करियर की सबसे अधिक संभावनाएं हैं

Last Modified:
Tuesday, 22 June, 2021
sanjay566

'वेबसाइट, मोबाइल ऐप और ओटीटी प्लेटफॉर्म में जिस तरह लोगों की रुचि बढ़ रही है, उसे देखकर ये कहा जा सकता है न्यू मीडिया ही वो क्षेत्र है, जिसमें करियर की सबसे अधिक संभावनाएं हैं।' यह विचार भारतीय जन संचार संस्थान के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने 'जयपुर करियर फेयर' में आयोजित ऑनलाइन कैरियर काउंसलिंग सेशन में व्यक्त किये। इस काउंसलिंग का आयोजन भारद्वाज फाउंडेशन एवं क्रैडेंट टीवी के संयुक्त तत्वाधान में किया गया।

कार्यक्रम में राजस्थान चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के मानद महासचिव डॉ. के.एल. जैन, डाटा इंफोसिस के चेयरमैन अजय डाटा, मणिपाल यूनिवर्सिटी, जयपुर के कुलपति प्रो. जी.के. प्रभु, मारवाड़ी यूनिवर्सिटी, राजकोट के कुलपति प्रो. संदीप संचेती और जेके लक्ष्मीपत यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति प्रो. आर.एल. रैना ने भी भाग लिया।

इस अवसर पर प्रो. द्विवेदी ने मीडिया संगठनों की कार्य प्रणाली से विद्यार्थियों को अवगत कराया तथा इस क्षेत्र में करियर की संभावनाओं को लेकर अपने विचार साझा किये। उन्होंने कहा कि लेखन, डिजाइनिंग और फोटोग्राफी जैसे कौशल वाले क्षेत्रों में मीडिया संगठनों में अवसर खुले हैं। पत्रकारिता के अलावा विद्यार्थी अन्य करियर विकल्प का चयन कर सकते हैं, जिसमें फिल्म या टीवी के लिए प्रोडक्शन तथा लेखन, निजी क्षेत्र में कॉरपोरेट कम्युनिकेशन और डिजिटल मार्केटिंग में काफी अवसर हैं। 

प्रो. द्विवेदी ने कहा कि कोविड-19 ने मीडिया के परिदृश्य को बदल दिया है, इसलिए विद्यार्थियों के लिए ई-कॉमर्स और डिजिटल मीडिया कंपनियों में कंटेंट क्रिएशन में रोजगार के अनेक अवसर हैं। टीवी और फिल्म संगठनों के अलावा, ओटीटी प्लेटफॉर्म भी अच्छे लेखकों की तलाश में हैं। ऐसे में लेखन कार्य में अच्छा कौशल रखने वाले विद्यार्थियों के लिए रोजगार की अपार संभावनाएं हैं।

कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध मैनेजमेंट गुरु पीएम भारद्वाज ने किया। क्रैडेंट टीवी के निदेशक सुनील नरनोलिया ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। इस काउंसलिंग में अनेक विद्यार्थियों ने सक्रिय रूप से हिस्सा लिया तथा मीडिया एवं मनोरंजन क्षेत्र में करियर के अवसरों से संबंधित जानकारी हासिल की।

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लोकतंत्र में प्रादेशिक पार्टियों को ग्रहण सा लग गया है: राजेश बादल

हिंदुस्तानी लोकतंत्र में प्रादेशिक पार्टियों को ग्रहण सा लग गया है। स्थापना के दशकों बाद भी जम्हूरियत से उनका जमीनी फासला बढ़ता जा रहा है।

Last Modified:
Tuesday, 22 June, 2021
Rajesh-badal656

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

प्रादेशिक पार्टियों में कलह और सामंती चरित्र 

हिंदुस्तानी लोकतंत्र में प्रादेशिक पार्टियों को ग्रहण सा लग गया है। स्थापना के दशकों बाद भी जम्हूरियत से उनका जमीनी फासला बढ़ता जा रहा है। बहुदलीय तंत्र किसी भी गणतांत्रिक देश की खूबसूरती का सबब होता है। पर जब दलों के अंदर राजरोग पनपने लगें तो फिर प्रजातांत्रिक शक्ल के विकृत होने का खतरा बढ़ जाता है। बिहार में लोकतांत्रिक जनतापार्टी (लोजपा) का आंतरिक घटनाक्रम कुछ ऐसी ही कहानी कहता है। चिराग रामविलास पासवान के उत्तराधिकारी हैं। जिस तरह राजतंत्र में राजकुमार ही उत्तराधिकारी होता था और कभी कभी हम पाते थे कि उत्तराधिकार के लिए जंग छिड़ जाती थी। ऐसी ही अंदरूनी लड़ाई इस नन्ही सी पार्टी में भी नजर आ रही है। राजघराने की तर्ज पर राजा के भाई ने भतीजे की पीठ में खंजर घोंप दिया।

वैसे तो यह इस प्रदेश की इकलौती कहानी नहीं है। इसी दौर में लालू यादव ने आरजेडी को जन्म दिया। वे घनघोर समाजवादी और लोकतंत्र समर्थक लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में प्रशिक्षित हुए थे। लेकिन उनका लोकतंत्र राजतंत्र में तब्दील हो गया, जब उन्होंने पत्नी और सियासत के ककहरे से अपरिचित राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया। उसके बाद अगली पीढ़ी भी राजपाट संभालने लगी। सत्तारूढ़ जेडीयू के मुखिया नीतीश कुमार क्या अपने आप में सामंती चरित्र का प्रतिनिधित्व नहीं करते? पड़ोसी उत्तर प्रदेश ने भी यही कहानी दोहराई। मुलायम सिंह ने समाजवादी पार्टी बनाई। कुछ बरस बाद पार्टी उनके पुत्र व भाई की कलह का शिकार बन गई। अंततः कमान पुत्र अखिलेश यादव के हाथ में आई। इन दलों में एक और स्थाई रोग चस्पा हो गया। ये दल, यादव कुल की जातियों के रौब तले दब गए। इसी तरह बहुजन समाज पार्टी का उदभव कुछ जातियों से नफ़रत के बीज से हुआ। इन दलों ने समर्थकों को लोकतांत्रिक बनाना तो दूर, उन्हें सामंती प्रजा बना दिया। क्या मायावती के बाद दल में स्वाभाविक निर्वाचित प्रतिनिधियों की दूसरी पंक्ति नजर आती है? इन दलों को अन्य जातियों के वोटों की खातिर कुछ टुकड़े उनको भी डालने पड़े। पर समग्र समाज का प्रतिनिधित्व करने में ये दल नाकाम रहे। इसीलिए ढाई-तीन दशक बाद भी बौने ही हैं। राष्ट्रीय पार्टी के रूप में विकसित नहीं हो पाए। वे शायद राष्ट्रीय होना ही नहीं चाहते। अपनी छोटी छोटी रियासतों से ही गदगद हैं।

हरियाणा में चौधरी देवीलाल ने जिसकी नींव डाली, क्या वह दल युवराजों के अपने खंडित साम्राज्य में तब्दील नहीं हो चुका है? वे जनादेश का मखौल उड़ाते दिखाई देते हैं। जिस पार्टी से चुनाव अभियान में मोर्चा लेते हैं, परिणाम आने के बाद उसी से हाथ मिलाकर गद्दी नशीन हो जाते हैं, पुराने जमाने के छोटे राजाओं की तरह। सिद्धांत-सरोकार कपूर की तरह उड़ जाते हैं। पढ़े लिखे मतदाता भी इन नए नरेशों की स्तुति करते हैं। कमोबेश यही हाल पंजाब का है। वहां अकाली दल भी सामूहिक नेतृत्व को तिलांजलि देकर एक परिवार को ही क्षत्रप बना बैठा है। क्या उस  परिवार से अलग कोई राजनेता उस पार्टी का अध्यक्ष बनने की सोच भी सकता है? महाराष्ट्र में सरकार चला रही शिवसेना भी उत्तराधिकार परंपरा निभा रही है। एक जमाने में इस दल में चचेरे भाइयों के बीच शक्ति संघर्ष देखने को मिला था। अंततः युवराज उद्धव ठाकरे के हाथ में कमान आई। शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी कोई अपवाद नहीं है। इस पार्टी के भीतर कितने चुनाव हुए हैं। क्या वाकई दल में सब कुछ गणतांत्रिक ढंग से चल रहा है। शरद पवार के बिना पार्टी के अस्तित्व की कौन कल्पना कर सकता है। तमिलनाडु में सत्ताधारी द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) का भी हाल ऐसा ही है। करुणानिधि ने राजा की तरह पार्टी को चलाया। राजपरिवार जैसे संघर्ष  इसके अंदर भी हुए, शक्ति केंद्र पनपे और फिर एक युवराज के हाथ में कमान आ गई। नवोदित आम आदमी पार्टी का भी यही हाल है। अरविंद केजरीवाल से बड़ी आशाएं थीं। लेकिन क्या हुआ। इस पार्टी पर भी तानाशाही के घुड़सवार चढ़ बैठे। उनकी टीम में स्वतंत्र सोच रखने वाले अधिकतर लोग उनके साथ नहीं रहे। आशुतोष, कुमार विश्वास, किरण बेदी, योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, आशीष खेतान, मेधा पाटकर, एडमिरल रामदास, कपिल मिश्रा, अंजलि दमानिया, कप्तान गोपीनाथ और प्रो. आनंद कुमार तक उनसे पल्ला झाड़ चुके हैं। अरविन्द की कार्यशैली दरअसल निरंकुश अधिनायक की है।

वैसे तो 25-30 बरस एक विराट लोकतंत्र की आयु में कोई खास मायने नहीं रखते, मगर हिंदुस्तान में इन वर्षों ने यकीनन लोकतंत्र का चेहरा विकृत किया है। नब्बे के दशक में जब राजनीतिक अस्थिरता के खेत में कुकुरमुत्तों की तरह ढेर सारी प्रादेशिक पार्टियों की फसल उगी तो उम्मीद थी कि जम्हूरियत की फसल लहलहाएगी। पर ऐसा न हुआ। इन दलों ने लोकतंत्र मजबूत करने के बजाए उसमें घुन लगा दिया। वे भूल गए कि जातियों की महामारी के कारण यह देश पहले ही बहुत भुगत चुका है। भारतीय संविधान की भावना तो ऐसी नहीं है। तो अब क्या माना जाए। इस मुल्क की मिटटी या मिजाज सिर्फ राजतन्त्र के लिए बचा है? एक अखिल भारतीय रियासत राष्ट्र की छोटी छोटी आधुनिक रियासतों का सहारा लेकर हुकूमत करे। जब कोई महीन सा राजपरिवार बड़ा हो जाए तो वह सल्तनत संभाल रहे राजघराने को हटा दे। अवाम धीरे धीरे लोकतंत्र को बौना होते तब तक देखती रहे, जब तक कि वह दम न तोड़ दे। यदि ऐसा हुआ तो निश्चित ही वह बेहद दुखद होगा। इस आलेख का मक़सद केवल प्रादेशिक पार्टियों की शैली पर ध्यान केंद्रित करना था। दोनों बड़ी पार्टियों पर आईन्दा विश्लेषण करेंगे।

(साभार: लोकमत समाचार)

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'पं. माधवराव सप्रे ने दिए पत्रकारिता को राष्ट्रीय और लोकधर्मी संस्कार'

गुलाम भारत में अनेक प्रखर स्वाधीनचेता नागरिक भी रहते थे, जिनमें एक थे पं. माधवराव सप्रे। भारतबोध उनके चिंतन और चिति का हिस्सा था।

Last Modified:
Saturday, 19 June, 2021
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-प्रो.संजय द्विवेदी

गुलाम भारत में अनेक प्रखर स्वाधीनचेता नागरिक भी रहते थे, जिनमें एक थे पं. माधवराव सप्रे। भारतबोध उनके चिंतन और चिति का हिस्सा था। वे अपनी पत्रकारिता, साहित्य लेखन,संपादन, अनुवाद कर्म और भाषणकला से एक ही चेतना भारतीय जन में भरना चाहते हैं वह है भारतबोध। सप्रे जी का सही मूल्यांकन अनेक कारणों से नहीं हो सका। किंतु हम उनकी रचना, सृजन और संघर्ष से भरी यायावर जिंदगी को देखते हैं, तो पता चलता है कि किस तरह उन्होंने अपने को तपाकर भारत को इतना कुछ दिया। उनका भी भाव शायद यही रहा होगा- चाहता हूं ‘मातृ-भू तुझको अभी कुछ और भी दूं।’

मराठीभाषी होने के बाद भी उन्हें हिंदी नवजागरण का पुरोधा कहा गया तो इसके विशिष्ट अर्थ हैं। उनके संपादन में निकले पत्र ‘छत्तीसगढ़ मित्र’, ‘हिंदी केसरी’ इसकी बानगी हैं। वे ‘कर्मवीर’ जैसे विशिष्ठ प्रकाशन के मूल में रहे। उसके प्रेरणाश्रोत रहे। पत्रकारिता को राष्ट्रीय और लोकधर्मी संस्कार देने वाले वे विरल संपादकों में एक हैं। सप्रे जी लोकमान्य तिलक से बहुत प्रभावित थे। उनका समूचा लेखन इसीलिए भारतबोध की अनुभूति से प्रेरित है। अपने एक लेख ‘सुराज्य और सुराज्य’ में वे लिखते हैं-’अंग्रेज सरकार का राज्य, व्यवस्थित और शासन की दृष्टि से सुराज्य होने पर भी, हम लोगों के लिए सुखकारी या लाभदायक नहीं है और यदि हाल की पद्धति कायम रही तो होना भी संभव नहीं है, क्योंकि यह राज्य केवल गोरे राज्याधिकारियों की सलाह पर चलता है, जिन्हें हिन्दुस्तान के हित की अपेक्षा गोरे लोगों का हित अधिक प्रिय है।’ उनके मन में अंग्रेजी शासन के प्रति गुस्सा है पर वे उसे अपेक्षित संयम से व्यक्त करते हैं। उन्हें यह सहन नहीं कि कोई विदेशी उनकी पुण्यभूमि और मातृभूमि पर आकर शासन करे। वे अंग्रेजी राज के नकारात्मक प्रभावों को अपने लेखों में व्यक्त करते हुए देश पर पड़ रहे प्रभावों को रेखांकित करते हैं। हालांकि वे पूर्व के भारतीय राजाओं और पेशवाओं के राज में हुई जनता की उपेक्षा और दमन को भी जानते हैं। वे मानते हैं कि इसी कारण विदेशियों को जनता का प्रारंभिक समर्थन भी मिला, क्योंकि भारतीय राजा जनता के साथ संवेदना से नहीं जुड़े थे। बावजूद इसके उनका भारतप्रेम उनकी लेखनी से प्रकट होता है। वे लिखते हैं-’ जेलखाने का शासन जैसा कष्ट देता है, उसी तरह अंग्रेजी राज्य-प्रबंध के कानून और कायदों से प्रजा चारों ओर से जकड़ी हुई है। अंग्रेजी व्यापारियों का भला करने के लिए,खुले व्यापार का तत्व शुरू करने से, इस देश का व्यापार डूब गया।’ नागपुर से छपने वाले अपने अखबार ‘हिंदी केसरी’ को उन्होंने आजादी के आंदोलन का मुखपत्र ही बना दिया था। इसमें देश भर में चल रहे आंदोलनों के समाचार छपते रहते थे। इससे पाठकों को राष्ट्रीय आंदोलन की आंच और धमक का पता चलता था। 24 अगस्त,1907 के अंक में इलाहाबाद, चैन्नै,राजमुंदरी,कोचीन आदि थानों के समाचार छपे हैं। एक समाचार कोचीन का है, उसकी भाषा देखिए- ‘राजा के कालेज में कुछ विद्यार्थियों ने एक बड़ी सभा की थी, उसमें वंदेमातरम् गीत गाया था और वंदेमातरम् का जयघोष किया था। यह खबर सुनकर दीवान ने प्रिंसिपल से इसकी कैफियत मांगी है।’  इस प्रकार की साहसी और भारतप्रेम से भरी पत्रकारिता के चलते हुए उन्हें जेल भी जाना पड़ा। 22, अगस्त,1908 में वे गिरफ्तार किए गए और नवंबर में उनकी रिहाई हुई।

उनका समूचा लेखन, अनुवाद कर्म भारतीय मनीषा से प्रेरित है। वे समर्थ गुरू रामदास की पुस्तक ‘दासबोध’ का अनुवाद करते हैं। हमें पता है समर्थ गुरू रामदास शिवाजी के गुरु ही नहीं एक आध्यात्मिक विभूति थे। उनके आशीष से ही छत्रपति ने मराठा राज्य की स्थापना की। शिवाजी के राज्य के शासन मूल्य बताते हैं कि गुरूकृपा से व्यक्ति का किस तरह रूपांतरण हो जाता है। सप्रे जी लोकमान्य तिलक रचित ‘गीता रहस्य’ का भी अनुवाद हिंदी में करते हैं। इस खास पुस्तक को हिंदी पाठकों को सुलभ कराते हैं। ‘महाभारत मीमांशा’ का अनुवाद भी इसी कड़ी का एक कार्य है। इसके साथ ही उन्होंने ‘शालोपयोगी भारतवर्ष’ को भी मराठी  से अनूदित किया। सप्रेजी ने 1923-24 में ‘दत्त-भार्गव संवाद’ का अनुवाद किया था जो उनकी मृत्यु के बाद छपा। उनका एक बहुत बड़ा काम है काशी नागरी प्रचारणी सभा की ‘विज्ञान कोश योजना’ के तहत अर्थशास्त्र की मानक शब्दावली बनाना। जिसके बारे में कहा जाता है कि हिंदी में अर्थशास्त्रीय चिंतन की परंपरा प्रारंभ सप्रे जी ने ही किया।

संस्थाओं को गढ़ना, लोगों को राष्ट्र के काम के लिए प्रेरित करना सप्रे जी के भारतप्रेम का अनन्य उदाहरण है। रायपुर, जबलपुर, नागपुर, पेंड्रा में रहते हुए उन्होंने न जाने कितने लोगों का निर्माण किया और उनके जीवन को नई दिशा दी।  26 वर्षों की उनकी पत्रकारिता और साहित्य सेवा ने मानक रचे। पंडित रविशंकर शुक्ल, सेठ गोविंददास, गांधीवादी चिंतक सुंदरलाल शर्मा, द्वारिका प्रसाद मिश्र, लक्ष्मीधर वाजपेयी,माखनलाल चतुर्वेदी, लल्ली प्रसाद पाण्डेय,मावली प्रसाद श्रीवास्तव सहित अनेक हिंदी सेवियों को उन्होंने प्रेरित और प्रोत्साहित किया। जबलपुर की फिजाओं में आज भी यह बात गूंजती है कि इस शहर को संस्कारधानी बनाने में सप्रे जी ने एक अनुकूल वातावरण बनाया। जिसके चलते जबलपुर साहित्य, पत्रकारिता और संस्कृति का केंद्र बन सका। 1920 में उन्होंने जबलपुर में हिंदी मंदिर की स्थापना की, जिसका इस क्षेत्र में सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ाने में अनूठा योगदान है।

अपने अप्रतिम योगदान के बाद भी आजादी के तमाम नायकों की तरह माधवराव सप्रे को न तो समाज ने उस तरह याद किया , न ही साहित्य की समालोचना में उन्हें उस तरह याद किया गया जिसके वे पात्र थे। निश्चित ही भारतीय भावधारा, भारतबोध की उनकी आध्यात्मिक धारा की पत्रकारिता के नाते उन्हें उपेक्षित किया गया। भारत के धर्म, उसकी अध्यात्म की धारा से जुड़कर भारत को चीन्हने की कोशिश करने वाला हर नायक क्यों उपेक्षित है, यह बातें आज लोक विमर्श में हैं। शायद इसीलिए आज 150 वर्षों के बाद भी माधवराव सप्रे को हिंदी जगत न उस तरह से जानता है न ही याद करता है। उनकी भावभूमि और वैचारिक अधिष्ठान भारत की जड़ों से जुड़ा हुआ है। वे इस देश को उसके नौजवानों को जगाते हुए भारतीयता के उजले पन्नों से अवगत कराना नहीं भूलते। इसीलिए वे गीता के रहस्य खोजते हैं, महाभारत की मीमांसा करते हैं, समर्थ गुरू रामदास के सामर्थ्य से देशवासियों को अवगत कराते हैं। वे नौजवानों के लिए लेख मालाएं लिखते हैं। उनका यह प्रदेय बहुत खास है।

वे अनेक संस्थाओं की स्थापना करते हैं। जिनमें हिंदी सेवा की संस्थाएं हैं, सामाजिक संस्थाएं तो विद्यालय भी हैं। जबलपुर में हिंदी मंदिर, रायपुर में रामदासी मठ, जानकी देवी पाठशाला इसके उदाहरण हैं।19 जून,1871 को मध्यप्रदेश के एक जिले दमोह के पथरिया में जन्में सप्रे जी 23 अप्रैल,1926 को रायपुर में देह त्याग देते हैं। कुल 54 वर्षों की जिंदगी जीकर वे कैसे खुद को सार्थक करते हैं, सब कुछ सामने है। उनके बारे में  गंभीर शोध और अध्ययन की बहुत आवश्यकता है। उनकी 150 वीं जयंती प्रसंग ने हमें यह अवसर दिया है हम अपने इस पुरखे की याद को देश भर में फैलाएं। यह संयोग ही है देश की आजादी की 75 वीं वर्षगांठ का प्रसंग भी साथ आया है। खुशियां दुगुनी हैं। इसलिए इस महान भारतपुत्र याद कर हम मातृभूमि के प्रति भी श्रध्दा निवेदन करेंगें और आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार भी होंगें। यह बहुत सुखद है कि भोपाल में उनकी स्मृति को बनाए रखने के लिए श्री विजयदत्त श्रीधर ने माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय और शोध संस्थान की स्थापना की है। जरूरी है कि शासन स्तर पर भी उनकी स्मृति में  कुछ महत्वपूर्ण काम किए जाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां इन कलमवीरों से प्रेरणा पाकर भारतबोध से भरी मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता करने के लिए प्रेरणा प्राप्त करें।

(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक हैं)

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