‘कई अंग्रेजी अखबारों-चैनलों ने उपराष्ट्रपति को आड़े हाथों लिया है’

उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने हिंदी के बारे में ऐसी बात कह दी है, जिसे कहने की हिम्मत...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 23 October, 2018
Last Modified:
Tuesday, 23 October, 2018
Venkaiah Naidu

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

वरिष्ठ पत्रकार ।।

हिंदी बहन है, मालकिन नहीं:वेंकैया

उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने हिंदी के बारे में ऐसी बात कह दी है, जिसे कहने की हिम्मत महर्षि दयानंद, महात्मा गांधी और डॉ. राममनोहर लोहिया में ही थी। वेंकैयाजी ने कहा कि ‘अंग्रेजी एक भयंकर बीमारी है, जिसे अंग्रेज छोड़ गए हैं।’ अंग्रेजी का स्थान हिंदी को मिलना चाहिए, जो कि ‘भारत को सामाजिक-राजनीतिक और भाषायिक दृष्टि से जोड़ने वाली भाषा है।’

वेंकैया नायडू के इस बयान ने भारत के अंग्रेजीदासों के दिमाग में खलबली मचा दी है। कई अंग्रेजी अखबारों और टीवी चैनलों ने वेंकैया को आड़े हाथों लिया है। अब भी उनके खिलाफ अंग्रेजी अखबारों में लेख निकलते जा रहे हैं? क्यों हो रहा है, ऐसा? क्योंकि उन्होंने देश के सबसे खुर्राट, चालाक और ताकतवर तबके की दुखती रग पर उंगली रख दी है। यह तबका उन पर ‘हिंदी साम्राज्यवाद’ का आरोप लगा रहा है और उनके विरुद्ध उल्टे-सीधे तर्कों का अंबार लगा रहा है।

नायडू ने यह तो नहीं कहा कि अंग्रेजी में अनुसंधान बंद कर दो, अंग्रेजी में विदेश नीति या विदेश-व्यापार मत चलाओ या अंग्रेजी में उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान का बहिष्कार करो। उन्होंने तो सिर्फ इतना कहा है कि देश की शिक्षा, चिकित्सा, न्याय प्रशासन आदि जनता की जुबान में चलना चाहिए। भारत लोकतंत्र है लेकिन लोक की भाषा कहां है? उसे बिठा रखा है पदासान पर और अंग्रेजी को बिठा रखा है, सिंहासन पर! वे अंग्रेजी का नहीं, उसके वर्चस्व का विरोध कर रहे थे।

यदि भारत के पांच-दस लाख छात्र अंग्रेजी को अन्य विदेशी भाषाओं की तरह सीखें और बहुत अच्छी तरह सीखें तो उसका स्वागत है लेकिन 20-25 करोड़ छात्रों के गले में उसे पत्थर की तरह लटका दिया जाए तो क्या होगा? वे रट्टू-तोते बन जाएंगे, उनकी मौलिकता नष्ट हो जाएगी, वे नकलची बन जाएंगे। सत्तर साल से भारत में यही हो रहा है। अंग्रेजी की जगह शिक्षा, चिकित्सा, कानून, प्रशासन और व्यापार आदि में भारतीय भाषाएं लाने को ‘हिंदी साम्राज्यवाद’ कहना अंग्रेजी की गुलामी के अलावा क्या है?

अंग्रेजी को बनाए रखने के लिए हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं से लड़ाना जरुरी है। अंग्रेजी की तरह हिंदी अन्य भाषाओं को दबाने नहीं, उन्हें उठाने की भूमिका निभाएगी। वह अन्य भाषाओं की भगिनी-भाषा है, बहन है, मालकिन नहीं। ऐसा ही है। तभी तो तेलुगुभाषी वेंकैया नायडू ने इतना साहसिक बयान दिया है। हमारे तथाकथित राष्ट्रवादी संगठनों और नेताओं को वेंकैयाजी से कुछ सबक लेना चाहिए।

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यह समय परखने का नहीं, साथ चलने का है: मनोज कुमार

कोरोना महामारी को लेकर आज जो भयावह स्थिति बनी हुई है, वह किसी के भी अनुमान को झुठला रही है।

Last Modified:
Tuesday, 20 April, 2021
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मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ।।

कोरोना महामारी को लेकर आज जो भयावह स्थिति बनी हुई है, वह किसी के भी अनुमान को झुठला रही है। एक साल पहले कोरोना ने जो तांडव किया था, उससे हम सहम गए थे लेकिन बीच के कुछ समय कोरोना का प्रकोप कम रहने के बाद हम सब लगभग बेफिक्र हो गए। इसके बाद ‘मंगल टीका’ आने के बाद तो जैसे हम लापरवाह हो गए। हमने मान लिया कि टीका लग जाने के बाद हमें संजीवनी मिल गई है और अब कोरोना हम पर बेअसर होगा। पहले टीका लगवाने में आना-कानी और बाद में  टीका लग जाने के बाद मनमानी। यह इस समय का कड़ुवा सच है। सच तो यह भी है कि यह समय किसी को परखने का नहीं है बल्कि एक-दूसरे का हाथ थाम कर साथ चलने का है। लेकिन हम ऐसा नहीं कर रहे हैं। हम व्याकुल हैं, परेशान हैं और हम उस पूरी व्यवस्था को परखने में लगे हुए हैं जिसके हम भी हिस्सेदार हैं। यह मान लेना चाहिए। सोशल मीडिया में व्यवस्था को कोसने का जो स्वांग हम रच रहे हैं, हकीकत में हम खुद को धोखा दे रहे हैं। हम यह जानते हैं कि जिस आक्रामक ढंग से कोरोना का आक्रमण हुआ है, उससे निपटने में सारी मशीनरी फेल हो जाती है। फिर हमें भी इसकी कमान दे दी जाए तो हम भी उसी फेलुअर की कतार में खड़े नजर आएंगे। एक वर्ष पहले जब कोरोना ने हमें निगलना शुरू किया था, तब हमारे भीतर का आध्यात्म जाग गया था। हम निर्विकार हो चले थे। हमें लगने लगा था कि एक-दूसरे की मदद में ही जीवन का सार है लेकिन जैसे-जैसे कोरोना उतार पर आया, वही आपाधापी की जिंदगी शुरू हो गई। एक-दूसरे को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने की जद्दोजहद शुरू हो गई।

आज जब हालात एक बार फिर बेकाबू हो चला है तब हमारे निशाने पर सरकार और सरकारी तंत्र है। यह स्वाभाविक भी है। दवा, ऑक्सीजन, बिस्तर की कमी बड़े संकट के रूप में हमारे सामने हैं। इसके अभाव में लोग मरने को मजबूर है तो सरकार पर गुस्सा आना गलत नहीं है। सरकार से समाज की अपेक्षा गलत नहीं है लेकिन क्या आलोचना से स्थिति बेहतर हो सकेगी? शायद नहीं। समय-समय पर तर्क और तथ्यों के साथ तंत्र की कमजोरी उजागर करना हमारी जवाबदारी है। ऐसा जब हम करते हैं तो सरकार की आलोचना नहीं होती बल्कि हम सरकार के साथ चलते हुए सचेत करते हैं। बिगडैल और बेकाबू तंत्र की कमजोरी सामने आते ही सरकार चौकस हो जाती है। शायद ऐसा करने से समाज में एक तरफ सकरात्मकता का भाव उत्पन्न होता है तो दूसरी तरफ हम एक जिम्मेदार समाज का निर्माण करते हैं।

चुनाव में बेधड़क जमा होती भीड़ के लिए हम सयापा करते रहे लेकिन अपने-अपने घरों से निकल कर कितने लोगों ने भीड़ को वहां जाने से रोका? भीड़ राजनीतिक दलों की ताकत होती है लेकिन इस भीड़ को नियंत्रण करने के लिए हमारी कोशिश क्या रही? कोरोना के आने से लेकर अब तक के बीच में जिस तरह सभा-संगत, प्रदर्शनी और मेले-ठेले सजते रहे, उनका कितनों ने विरोध किया? तब हम सबको लग रहा था कि कोरोना खत्म हो गया है। जीवन अब पटरी पर है और जीवन है तो जीवन में उत्सव भी होना चाहिए। आज हमारे सामने यक्ष प्रश्र यह है कि सरकार ने बीते साल भर में कोई इंतजाम क्यों नहीं किया? बात में दम तो है लेकिन हमने सरकार इस इंतजाम को पुख्ता करने के लिए कभी याद दिलाया? आज कोरोना का यह भयावह चेहरा नहीं आता तो सबकुछ ठीक था लेकिन आज सब खराब है। बात खरी है लेकिन चुभेगी।

लगातार ड्यूटी करते पुलिस वाले, नगर निगम के कर्मचारी, डॉक्टर, नर्स और इनके साथ जुड़े लोग पस्त हो चुके हैं लेकिन वे अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद हैं। इसके बाद भी छोटी सी चूक पर हम उनके साथ दो-दो हाथ करने के लिए खड़े हो जाते हैं। निश्चित रूप से काम करते करते कुछेक गलतियां हो सकती हैं तो इसका यह अर्थ नहीं कि हम उनके इतने लम्बे समय से किए जा रहे सेवा कार्य को भुला दें। एक डॉक्टर आहत होकर इस्तीफा देने के लिए मजबूर हो जाता है, यह बात जोर-शोर से उठती है और उठनी भी चाहिए लेकिन इसके बाद इन डॉक्टरों को और मेडिकल स्टॉफ को सुरक्षा मिले, इस पर हम कोई बातचीत नहीं करते हैं? पूरे प्रदेश में दो या तीन पुलिस की ज्यादती की आधा-अधूरा वीडियो वॉयरल होता है और हम मान लेते हैं कि पुलिस अत्याचार कर रही है। कभी इस बात की चिंता की कि पुलिस वाले कितने तकलीफों के बीच अपनी ड्यूटी पूरी कर रहे हैं। खासतौर पर छोटे पुलिस कर्मचारी। कोरोना के शुरूआती दौर में पुलिस के सहयोग और सेवा कार्य की अनेक खबरें आती रही लेकिन इस बार ये खबरें क्यों गायब है? क्या पुलिस ने सेवा कार्य बंद कर दिया है या जानबूझकर उन्हें अनदेखा किया जा रहा है। कोरोना किसी भी तरह से, कहीं से फैल सकता है लेकिन इस बात की परवाह किए बिना आपकी और हमारी चिंता में नगर निगम के कर्मचारी सेवा कार्य में जुटे हुए हैं। क्या इन सबकी सेवा भावना को आप अनदेखा कर सकते हैं। शायद नहीं।

यह समय हमेशा नहीं रहने वाला है। लेकिन हमने समय रहते अपनी जिम्मेदारी नहीं समझा तो यह दुख हमेशा हमें सालता रहेगा। आप सिर्फ इतना करें कि आप और आपके नातेदार, दोस्तों और परिचय में आने वालों को अपने अपने घर पर रोक लें। सड़कों पर भीड़ कम होगी तो तंत्र पर दबाब कम होगा और दबाव कम होगा तो परिणाम का प्रतिशत बड़ा होगा। क्यों ना हम सोशल मीडिया की ताकत का उपयोग कर लोगों को जागरूक बनाने में करें क्योंकि आलोचना से आपके मन को तसल्ली मिल सकती है लेकिन संकट मुंहबाये खड़ा रहेगा। यह संकट कब और किसके हिस्से में आएगा, कोई नहीं कह सकता। इससे अच्छा है कि संकट को हरने के लिए सोशल मीडिया संकटमोचक बने। कोरोना से बचने के छोटे उपाय मास्क पहनों, हाथ धोएं और आपस में दूरी बनाकर रखें। नमस्ते तो हमारी संस्कृति है। समय को आपकी हमारी जरूरत है। साथ चलिए क्योंकि कमियां गिनाने के लिए खूब वक्त  मिलेगा, पहले हम दुश्मन से दो-दो हाथ कर लें।    

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'उम्मीद है, उमाकांत लखेड़ा के नेतृत्व में प्रेस क्लब अपनी रचनात्मक सार्थकता सिद्ध करेगा'

अरसे बाद प्रेस क्लब ऑफ इंडिया को एक खांटी पेशेवर पत्रकार अध्यक्ष के रूप में मिला है। भाई उमाकांत लखेड़ा मेरे बहुत पुराने मित्र और भाई जैसे हैं।

Last Modified:
Tuesday, 13 April, 2021
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अरसे बाद प्रेस क्लब ऑफ इंडिया को एक खांटी पेशेवर पत्रकार अध्यक्ष के रूप में मिला है। भाई उमाकांत लखेड़ा मेरे बहुत पुराने मित्र और भाई जैसे हैं। लेकिन मैं इसलिए उनकी जीत से प्रसन्न नही हूं कि वे मेरे मित्र हैं, बल्कि इसलिए कि उनके नेतृत्व में प्रेस क्लब उन ऊंचाइयों को छुएगा, जिसके लिए उसकी स्थापना हुई थी। उमा कांत जी पत्रकारिता के सरोकारों और प्रतिबद्धताओं को लेकर कोई समझौता नहीं करने वाले साथी हैं। मूल्यों की कसौटी पर कोई मसला खरा साबित हो जाए तो फिर उनका कैसा भी नुकसान हो जाए, वे परवाह नहीं करते। हम लोग अनेक चैनलों में वैचारिक बहसों में शामिल होते रहे हैं। मैने पाया है कि आज की पत्रकारिता में जिस तरह के पत्रकारों की कमी होती जा रही है, वे उनमें से एक हैं। राज्यसभा टीवी का संपादक रहते हुए मैनें उन्हें कई बार चर्चाओं में आमंत्रित किया। यह संतोष की बात रही कि भारतीय संसदीय लोकतंत्र के बारे में उनके विचारों को सदैव दर्शकों ने पसंद किया है।

यह 1985 की बात है। उन दिनों मैं नवभारत टाइम्स, जयपुर में मुख्य उप संपादक था, तो उमाकांत लखेड़ा जी उत्तराखंड से लेख भेजा करते थे। राजेंद्र माथुर हमारे प्रधान संपादक थे और वे अक्सर उमा जी के लेख अपनी टिप्पणी के साथ हमारे पास भेज देते थे। वे लेख बेहद साहसिक, निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकारिता की आवाज होते थे।

उमा जी ने शराब माफिया और सियासत के गठजोड़ को बेनकाब किया तो चिपको आंदोलन के पर्यावरणीय सरोकारों को पुरजोर ढंग से उठाया। मैने अधिकतर लेख वे संपादकीय पन्ने पर प्रकाशित किए। तब तक वे पूर्णकालिक पत्रकारिता में नहीं आए थे। इसी बीच विश्वमानव, दैनिक जागरण, सहारा और हिन्दुस्तान होते हुए वे हिंदी पत्रकारिता की मुख्य धारा में शामिल हो गए। उन दिनों  बिहार के बाहुबली शहाबुद्दीन की मांद में जाकर उसके खिलाफ लिखने का साहस उमाकांत लखेड़ा ही कर सकते थे। कारगिल जंग के दौरान हाड़ कंपाने वाली ठंड में उनकी रिपोर्टिंग गर्मी भरती थी। पोखरण में भारतीय सेना की एक मारक मिसाइल जब अपना लक्ष्य भेद नहीं पाई तो लखेड़ा जी ने फौज की कार्यप्रणाली की बखिया उधेड़ दी। यूपीए के शासन काल में अध्यक्ष सोनिया गांधी के लिए जब आली शान कार्यालय बनाया जा रहा था तो उसके औचित्य पर उमाकांत जी ने ही सवाल सबसे पहले उठाए। यह रपट हिन्दुस्तान में ही छपी, जिसकी मालकिन शोभना भरतिया थीं और वे भी कांग्रेस की संसद थीं। इस रिपोर्ट के छपने के बाद जाहिर है वह दफ्तर दफन हो गया। ऐसे अनगिनत किस्से हैं।

अच्छी बात यह है कि ऐसे अनेक अवसर आए जब बीजेपी के लोगों ने उन्हें कांग्रेसी माना और कांग्रेसियों ने उन्हें भाजपाई समर्थक माना। कभी उन्हें जनवादी पत्रकारिता के कारण वामपंथी समझा गया तो कभी समाजवादी। मेरे साथ भी पिछले पैंतालीस बरस में कई बार ऐसा हुआ है। एक अच्छे पत्रकार की यही पहचान है कि वह निष्पक्ष रहे और किसी सियासी वैचारिक धारा से न जुड़े। 

उम्मीद करता हूं कि प्रेस क्लब ऑफ इंडिया अब अपनी रचनात्मक सार्थकता सिद्ध करेगा। इन दिनों इस क्लब की छवि एक बार कम भोजनालय की होती जा रही है। बेशक कुछ अच्छे कदम भी बीते दिनों उठाए गए हैं। मगर भाई उमा जी इसे एक नाविक की तरह छबियो के झंझावात से निकालकर एक पेशेवर स्वरूप प्रदान करेंगे। उनकी टीम में उपाध्यक्ष शाहिद भाई तथा महासचिव विनय कुमार जैसे अनुभवी चेहरे हैं। इस टीम को मेरी शुभकामनाएं और सभी विजयी प्रत्याशियों को मुबारकबाद।

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‘आज के मीडिया को कैसे देखा जाए? इसका जवाब बाबा साहेब के इस अखबार से समझना होगा’

आंबेडकर ने 65 वर्ष 7 महीने और 22 दिन की अपनी जिंदगी में करीब 36 वर्ष तक पत्रकारिता की।

Last Modified:
Monday, 19 April, 2021
babaSaheb

 - प्रो. संजय द्विवेदी, महानिदेशक, भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली

‘अगर कोई इंसान, हिन्दुस्तान के कुदरती तत्वों और मानव समाज को एक दर्शक के नजरिए से फिल्म की तरह देखता है, तो ये मुल्क नाइंसाफी की पनाहगाह के सिवा कुछ नहीं दिखेगा।’ बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने आज से 100 वर्ष पूर्व 31 जनवरी 1920 को अपने अखबार 'मूकनायक' के पहले संस्करण के लिए जो लेख लिखा था, यह उसका पहला वाक्य है। अपनी पुस्तक ‘पत्रकारिता के युग निर्माता : भीमराव आंबेडकर’ में लेखक सूर्यनारायण रणसुभे ने इसलिए कहा भी है- कि ’जाने-अनजाने बाबा साहेब ने इसी दिन से दीन-दलित, शोषित और हजारों वर्षों से उपेक्षित मूक जनता के नायकत्व को स्वीकार किया था।’

आज के मीडिया को कैसे देखा जाए? यदि इस सवाल का जवाब ढूंढना है, तो 'मूकनायक' के माध्यम से इसे समझना बेहद आसान है। इस संबंध में मूकनायक के प्रवेशांक के संपादकीय में आंबेडकर ने जो लिखा था, उस पर ध्यान देना बेहद आवश्यक है। आंबेडकर लिखते हैं कि 'मुंबई जैसे इलाके से निकलने वाले बहुत से समाचार पत्रों को देखकर तो यही लगता है कि उनके बहुत से पन्ने किसी जाति विशेष के हितों को देखने वाले हैं। उन्हें अन्य जाति के हितों की परवाह ही नहीं है। कभी-कभी वे दूसरी जातियों के लिए अहितकारक भी नजर आते हैं। ऐसे समाचार पत्र वालों को हमारा यही इशारा है कि कोई भी जाति यदि अवनत होती है, तो उसका असर दूसरी जातियों पर भी होता है।

समाज एक नाव की तरह है। जिस तरह से इंजन वाली नाव से यात्रा करने वाले यदि जानबूझकर दूसरों का नुकसान करें, तो अपने इस विनाशक स्वभाव की वजह से उसे भी अंत में जल समाधि लेनी ही पड़ती है। इसी तरह से एक जाति का नुकसान करने से अप्रत्यक्ष नुकसान उस जाति का भी होता है जो दूसरे का नुकसान करती है।’

बाबा साहेब ने जो लिखा, उसको आज के दौर के मीडिया के परिप्रेक्ष्य में देखें, तो स्थितियां करीब-करीब कुछ वैसी ही दिखाई देती हैं। आज का मीडिया हमें कुछ उस तरह ही काम करता दिखाई देता है, जिसको पहचानते हुए बाबा साहेब ने 'मूकनायक' की शुरुआत की थी। इस समाचार पत्र के नाम में ही आंबेडकर का व्यक्तित्व छिपा हुआ है। मेरा मानना है कि वे 'मूक' समाज को आवाज देकर ही उनके 'नायक' बने। बाबा साहेब ने कई मीडिया प्रकाशनों की शुरुआत की। उनका संपादन किया। सलाहकार के तौर पर काम किया और मालिक के तौर पर उनकी रखवाली की। ‘मूकनायक’ के प्रकाशन के समय बाबा साहेब की आयु मात्र 29 वर्ष थी। और वे तीन वर्ष पूर्व ही यानी 1917 में अमेरिका से उच्च शिक्षा ग्रहण कर लौटे थे। अक्सर लोग ये प्रश्न करते हैं कि कि एक उच्च शिक्षित युवक ने अपना समाचार-पत्र मराठी भाषा में क्यों प्रकाशित किया? वह अंग्रेजी भाषा में भी समाचार-पत्र का प्रकाशन कर सकते थे। ऐसा करके वह सवर्ण समाज के बीच प्रसिद्धी पा सकते थे और अंग्रेज सरकार तक दलितों की स्थिति प्रभावी ढंग से रख सकते थे। लेकिन बाबा साहेब ने ‘मूकनायक’ का प्रकाशन वर्षों के शोषण और हीनभावना की ग्रंथि से ग्रसित दलित समाज के आत्म-गौरव को जगाने के लिए किया गया था। जो समाज शिक्षा से दूर था, जिसके लिए अपनी मातृभाषा मराठी में लिखना और पढ़ना भी कठिन था, उनके बीच जाकर ‘अंग्रेजी मूकनायक’ आखिर क्या जागृति लाता? इसलिए आंबेडकर ने मराठी भाषा में ही समाचार पत्रों का प्रकाशन किया।

अगर हम उनकी पहुंच की और उनके द्वारा चलाए गए सामाजिक आंदोलनों की बात करें, तो बाबा साहेब अपने समय में संभवत: सब से ज्यादा दौरा करने वाले नेता थे। सबसे खास बात यह है कि उन्हें ये काम अकेले अपने बूते ही करने पड़ते थे। न तो उन के पास सामाजिक समर्थन था, न ही आंबेडकर को उस तरह का आर्थिक सहयोग मिलता था, जैसा कांग्रेस पार्टी को हासिल था। इसके विपरीत, आंबेडकर का आंदोलन गरीब जनता का आंदोलन था। उनके समर्थक वो लोग थे, जो समाज के हाशिए पर पड़े थे, जो तमाम अधिकारों से महरूम थे, जो जमीन के नाम पर या किसी जमींदार के बंधुआ थे। आंबेडकर का समर्थक, हिन्दुस्तान का वो समुदाय था, जो आर्थिक रूप से सब से कमजोर था। इसका नतीजा ये हुआ कि आंबेडकर को सामाजिक आंदोलनों के बोझ को सिर से पांव तक केवल अपने कंधों पर उठाना पड़ा। उन्हें इस के लिए बाहर से कुछ खास समर्थन हासिल नहीं हुआ। और ये बात उस दौर के मीडिया को बखूबी नजर आती थी। आंबेडकर के कामों को घरेलू ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी जाना जाता था। हमें हिन्दुस्तान के मीडिया में आंबेडकर की मौजूदगी और उनके संपादकीय कामों की जानकारी तो है, लेकिन ये बात ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम कि उन्हें विदेशी मीडिया में भी व्यापक रूप से कवरेज मिलती थी। बहुत से मशहूर अंतरराष्ट्रीय अखबार, आंबेडकर के छुआछूत के खिलाफ अभियानों और महात्मा गांधी से उनके संघर्षों में काफी दिलचस्पी रखते थे। लंदन का 'द टाइम्स', ऑस्ट्रेलिया का 'डेली मर्करी' और 'न्यूयॉर्क टाइम्स', 'न्यूयॉर्क एम्सटर्डम न्यूज', 'बाल्टीमोर अफ्रो-अमरीकन', 'द नॉरफॉक जर्नल' जैसे अखबार अपने यहां आंबेडकर के विचारों और अभियानों को प्रमुखता से प्रकाशित करते थे। भारतीय संविधान के निर्माण में आंबेडकर की भूमिका हो या फिर संसद की परिचर्चाओं में आंबेडकर के भाषण, या फिर नेहरू सरकार से आंबेडकर के इस्तीफे की खबर। इन सब पर दुनिया बारीकी से नजर रखती थी। बाबा साहेब ने अपने सामाजिक आंदोलन को मीडिया के माध्यम से भी चलाया।

मूकनायक का प्रकाशन बंद होने के बाद, आंबेडकर एक बार फिर से पत्रकारिता के क्षेत्र में कूदे, जब उन्होंने 3 अप्रैल 1927 को 'बहिष्कृत भारत' के नाम से नई पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। ये वही दौर था, जब आंबेडकर का महाद आंदोलन जोर पकड़ रहा था। बहिष्कृत भारत का प्रकाशन 15 नवंबर 1929 तक होता रहा। कुल मिलाकर इसके 43 संस्करण प्रकाशित हुए। हालांकि, बहिष्कृत भारत का प्रकाशन भी आर्थिक दिक्कतों की वजह से बंद करना पड़ा। मूकनायक और बहिष्कृत भारत के हर संस्करण की कीमत महज डेढ़ आने हुआ करती थी, जबकि इसकी सालाना कीमत डाक के खर्च को मिलाकर केवल 3 रुपए थी। इसी दौरान समता नाम के एक और पत्र का प्रकाशन आरंभ हुआ, जिससे बहिष्कृत भारत को नई जिंदगी मिली। उसे 24 नवंबर 1930 से 'जनता' के नए नाम से प्रकाशित किया जाने लगा। जनता, भारत में दलितों के सबसे लंबे समय तक प्रकाशित होने वाले अखबारों में से है, जो 25 वर्ष तक छपता रहा था। जनता का नाम बाद में बदलकर, 'प्रबुद्ध भारत' कर दिया गया था। ये सन् 1956 से 1961 का वही दौर था, जब आंबेडकर के आंदोलन को नई धार मिली थी।

आंबेडकर ने 65 वर्ष 7 महीने और 22 दिन की अपनी जिंदगी में करीब 36 वर्ष तक पत्रकारिता की। ‘मूकनायक’ से लेकर ‘प्रबुद्ध भारत’ तक की उनकी यात्रा, उनकी जीवन-यात्रा, चिंतन-यात्रा और संघर्ष-यात्रा का भी प्रतीक है। मेरा मानना है कि ‘मूकनायक’... ‘प्रबुद्ध भारत’ में ही अपनी और पूरे भारतीय समाज की मुक्ति देखता है। आंबेडकर की पत्रकारिता का संघर्ष ‘मूकनायक’ के माध्यम से मूक लोगों की आवाज बनने से शुरू होकर, ‘प्रबुद्ध भारत’ के निर्माण के स्वप्न के साथ विराम लेता है।

मीडिया के पराभव काल की मौजूदा परिस्थितियों में आंबेडकर का जीवन हमें युग परिवर्तन का बोध कराता है। पत्रकारिता में मूल्यविहीनता के सैलाब के बीच अगर बाबा साहेब को याद किया जाए, तो इस बात पर भरोसा करना बहुत कठिन हो जाता है कि पत्रकारिता जैसे क्षेत्र में कोई हाड़मांस का इंसान ध्येयनिष्ठा के साथ अपने पत्रकारीय जीवन की यात्रा को जीवंत दर्शन में भी तब्दील कर सकता है। इस संदर्भ में वरिष्ठ विचारक और चिंतक दत्तोपन्त ठेंगड़ी ने अपनी पुस्तक ‘डॉ. आंबेडकर और सामाजिक क्रांति की यात्रा’ में लिखा है, कि ‘भारतीय समाचार-पत्र जगत की उज्ज्वल परंपरा है। परंतु आज चिंता की बात यह है कि संपूर्ण समाज का सर्वांगीण विचार करने वाला, सामाजिक उत्तरदायित्व को मानने वाला, समाचार पत्र को लोकशिक्षण का माध्यम मानकर तथा एक व्रत के रूप में उपयोग करने वाला आंबेडकर जैसा पत्रकार मिलना दुर्लभ हो रहा है।’

आंबेडकर की पत्रकारिता हमें ये सिखाती है कि जाति, वर्ण, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र, लिंग, वर्ग जैसी शोषणकारी प्रवृत्तियों के प्रति समाज को आगाह कर उसे इन सारे पूर्वाग्रहों और मनोग्रंथियों से मुक्त करने की कोशिश ईमानदारी से की जानी चाहिए और यही मीडिया का मूल मंत्र होना चाहिए। पत्रकारों की अपनी निजी राय हो सकती है, लेकिन खबर बनाते या दिखाते समय उन्हें अपनी राय से दूर रहना चाहिए, क्योंकि रिपोर्टिंग उनके एजेंडे का आईना नहीं है, बल्कि अपने पाठकों के साथ पेशेवर करार का हिस्सा है। हमारे देश का मीडिया बहुत समय पहले से ही अपनी इस पेशेवर भूमिका से हटकर कुछ और ही दिखाने या लिखने लगा है। 100 साल पहले बाबा साहेब ने एक अस्पृश्य समाज की आवाज को देश के सामने लाने के लिए 'मूकनायक' की शुरुआत की थी, और आज देश को फिर ऐसे ही 'नायक' की जरूरत है, जो जनता के मुद्दों को उठाये, जनता की आवाज को बुलंद करे, जिसे व्यवस्थावादी मीडिया ने 'मूक' कर दिया है।

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अवसाद की खबरों में आशा की भाषा कहां है मिस्टर मीडिया?

बीते दिनों अखबारों के पन्नों, टेलिविजन और सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर कवरेज में कोरोना का खौफ दिखाई देने लगा है।

राजेश बादल by
Published - Saturday, 10 April, 2021
Last Modified:
Saturday, 10 April, 2021
rajeshbadal8451

यकीनन बेहद मुश्किल दौर है। देश और दुनिया के लिए। हर उम्र के लोग, हर पेशे के लोग, हर तरह की जीवन शैली वाले लोग अब घबरा उठे हैं। इस माहौल में संयम और संतुलन बरतना सबके लिए आसान नहीं है। आम आदमी की कराह चरम पर है और उसके आई क्यू के मद्देनजर परेशान होने की वजह समझ में आती है। लेकिन उसकी जिंदगी में जो कहर बरपा है, वह खौफनाक है। रिश्तों को चरमराते और रोजगार गंवाते वह बेबस और असहाय सा देख रहा है। इसलिए अब अगर उसकी अभिव्यक्ति संयम के सारे बांध तोड़कर निकले तो असामान्य नहीं लगना चाहिए। ऐसी आपात घड़ी में समाज और देश के व्यवस्थापकों, संचालकों, नियामकों, राजनेताओं, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और संपादकों के धीरज तथा सब्र की परीक्षा होती है कि वे किस तरह देश को दिशा देने का काम करते हैं। यह बहुत विकराल चुनौती है।

बीते दिनों अखबारों के पन्नों, टेलिविजन और सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर कवरेज में कोरोना का खौफ दिखाई देने लगा है। एक तरफ हमारे सियासतदान भाषा का संयम तोड़ रहे हैं तो अभिव्यक्ति के प्रहरी पत्रकार भी अपना आपा खो रहे हैं। एक भी गलत शब्द के इस्तेमाल से सुनने वाले, देखने वाले और पढ़ने वाले के दिलो-दिमाग पर गहरा असर पड़ता है। मेरे एक परिचित के संबंधी ने किसी चैनल पर कोरोना के बारे में इतने भयानक अंदाज में खबरें देखीं कि वे अवसाद (डिप्रेशन) का शिकार हो गए। अब वे अस्पताल में दाखिल हैं। उन्हें कोरोना नहीं हुआ है, लेकिन वे किसी कोरोना-मरीज से बेहतर हालत में नहीं हैं। एक अन्य मित्र सुबह अखबार आते ही सबसे पहले कोरोना से बिगड़ रही हालत की सूचनाएं पढ़ते हैं। फिर दिन भर दोस्तों और शुभचिंतकों को फोन करते हैं और अपने डर के खतरनाक स्वरूप का विस्तार करते हैं। इस तरह समाज में दहशत की अनेक नई लहरें पैदा हो जाती हैं।  

समय आ गया है, जब प्रेस काउंसिल, एडिटर्स गिल्ड, देश भर में बिखरे पत्रकार संगठन, नेशनल ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन और केंद्र तथा राज्यों के सूचना केंद्रों, जन संपर्क विभागों को अत्यंत गंभीर और संवेदनशील कदम उठाने चाहिए। यह किसी जंग से कमतर स्थितियां नहीं हैं। मिलकर एक इमरजेंसी-एक्शन प्लान बनाकर उस पर अमल करना जरूरी है। कोई नहीं जानता कि यह भयावह सिलसिला कब तक चलेगा?

हालांकि सामाजिक स्तर पर एक पहल भी हुई है, जिसे सलाम करने को जी चाहता है। राष्ट्रीय स्तर पर काम करने वाले स्वयं सेवी संगठन विकास संवाद ने यूनिसेफ के सहयोग से चार महीने की मशक्कत के बाद एक मीडिया मेन्युअल जारी किया है। इस शानदार दस्तावेज में मीडिया को सलाह दी गई है कि वह शांत होकर इस तरीके से समाचारों को पेश करे कि समाज में घबराहट नहीं फैले और कोरोना से लड़ने का हौसला पैदा हो। इतना ही नहीं, शब्दों और दृश्यों के चुनाव में बेहद सतर्कता बरतें।

यह दस्तावेज इस बात की सिफारिश करता है कि हर हाल में अफवाहों को सख्ती से कुचला जाए। बीते एक साल में कोरोना काल के दरम्यान अनेक खबरें प्रसारित हुईं, जो बाद में गलत साबित हुईं। इस दस्तावेज ने कुछ उदाहरण भी दिए हैं। नौ अप्रैल को एम्स भोपाल के सौ से अधिक डॉक्टरों के कोरोना पीड़ित होने की खबर मीडिया में आई। यह सच नहीं थी। शाम को एम्स प्रशासन ने खंडन जारी किया कि यह खबर सच नहीं थी। अब इस गैर जिम्मेदारी का क्या किया जाए। इस झूठे समाचार से एम्स में दिन भर अफरा तफरी का माहौल रहा और कोरोना मरीजों के इलाज पर भी प्रतिकूल असर पड़ा। समाज में ऐसी झूठी खबरों से आक्रोश क्यों नहीं होना चाहिए। मीडिया मैन्युअल इसी व्यवहार का परिणाम है और इसका अर्थ यह है कि मीडिया की भूमिका के बारे में अब समाज की ओर से प्रतिरोध शुरू हो गया है। आपातकाल का सन्देश समय की स्लेट पर साफ साफ लिखा है। इस इबारत को पढ़ना और उसके बाद अमल करना जरूरी है। इसमें कोताही या देरी बाद में हाथ मलने का सबब न बन जाए मिस्टर मीडिया!

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ये ग्रह स्थिति बनाती है व्यक्ति को सफल पत्रकार: आचार्य प्रवीण चौहान (ज्योतिषाचार्य)

जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन का क्रेज लोगों में 100 साल से भी ज्यादा समय से बना हुआ है और करियर के लिहाज से यह क्षेत्र कभी भी आउटडेटेड होने वाला नहीं है।

Last Modified:
Friday, 09 April, 2021
Acharya Praveen Chauhan

आजकल कई लोग मीडिया जगत में जाने के लिए काफी उत्सुक रहते है। जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन का क्रेज लोगों में 100 साल से भी ज्यादा समय से बना हुआ है और करियर के लिहाज से यह क्षेत्र कभी भी आउटडेटेड होने वाला नहीं है। 21वीं सदी में करियर विकल्प के रूप में मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म में काफी बदलाव आया है। आज के दौर में मास कम्युनिकेशन काफी विविधता वाला क्षेत्र है, जो तकरीबन हर इंडस्ट्री के साथ जुड़ा हुआ है। आज, लगभग हर संस्थान बड़े पैमाने पर मीडिया के प्रति उत्साही लोगों द्वारा दी जाने वाली सेवाओं का लाभ उठा रहा है। यदि आप उत्साही हैं, क्रिएटिव हैं और लोगों के लिए कुछ करना चाहते हैं तो मास कम्युनिकेशन का फील्ड आपके लिए सही विकल्प है। अब सवाल उठता है कि आप मीडिया जगत में किस तरह ऊंचाइयों तक पहुंच सकते हैं और अपना नाम कमा सकते हैं। 

ज्योतिष एक ऐसा विषय है जिसके द्वारा उचित करियर चुनने मे मार्गदर्शन लिया जा सकता है। यदि आप प्रिंट जर्नलिज्म, इलेक्ट्रॉनिक जर्नलिज्म, पब्लिक रिलेशंस, विज्ञापन, फिल्म्स, रेडियो जर्नलिज्म, न्यूज एंकरिंग में करियर की योजना बना रहे हैं, तो जानते हैं कि पत्रकारिता में जाने के लिए आपका कौन सा ग्रह सबसे सबसे ज्यादा शक्तिशाली होना चाहिए? ग्रहों का विभिन्न राशियों में स्थित होना भी व्यवसाय का चयन करने में सहायता करता है।

1: जन्मकुंडली के भाव: तीसरा पांचवा और दसवां भाव

आपकी जन्मकुंडली में तीसरा भाव (third house) कम्युनिकेशन की मौजूदगी को प्रदर्शित करता है। यह बोलने और शब्दों के चयन की कला को दर्शाता है। इस प्रकार, तीसरा भाव जनसंचार के सभी उपकरणों जैसे टेलिविजन, समाचार पत्र और रेडियो के बारे में जानकारी देता है, जिसमें बेहतरीन कम्युनिकेशन और बोलने के कौशल की आवश्यकता होती है। वही कुंडली का पांचवा भाव शिक्षा को दर्शाता है और यह व्यक्ति को अच्छे से बोलने की क्षमता प्रदान करता है। जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए दोनों की बहुत जरूरत होती है। साथ ही जन्मकुंडली का दसवां भाव जातक के कारोबार का है। मात्र गुण होना ही पर्याप्त नहीं हैं, उन्हें एक आकर्षक करियर में तब्दील करना चुनौतीपूर्ण है। ऐसे में आपकी जन्मकुंडली के दसवें भाव की मजबूती जरूरी है, जो यह निर्धारित करती है। ऐसे में अवसरों का लाभ उठाने और करियर को नई दिशा देने के लिए आपकी जन्मकुंडली में इन तीनों भावो का शक्तिशाली होना जरूरी है। 

2: महत्वूपर्ण ग्रह: मंगल, बुध और बृहस्पति

व्यक्ति की पहचान उसकी वाणी के द्वारा होती हैं। बुध को ज्योतिष शास्त्र में वाणी का कारक माना जाता है। साथ ही बुध ग्रह पेन (pen) का प्रतीक माना गया है, वहीं मंगल ग्रह का ज्योतिष में अलग ही महत्व है। इस मंगल को मेष और वृश्चिक राशियों का स्वामी और पराक्रम व ऊर्जा का कारक माना जाता है। और ये ग्रह स्याही (ink) को दर्शाता है। कुंडली में मंगल और बुध का संयोजन ठीक उसी तरह है, जैसे पेन और स्याही का होता है। यह संयोजन अभिव्यक्ति और विचारों को प्रेरित करता है, जो किसी पत्रकार के दो प्रमुख गुण होते हैं।

वैदिक ज्योतिष के नौ ग्रहों में बृहस्पति को ही ‘गुरु’ की उपाधि मिली है। जातक के शिक्षा तथा विकास के लिए कुंडली में बृहस्पति (Jupiter) का स्थान देखा जाता है। पत्रकारिता के क्षेत्र में बृहस्पति संपादन कार्य को दर्शाता है। यदि आपकी जन्मकुंडली में मंगल, बुध और बृहस्पति शुभ स्थिति मे मौजूद हैं तो यह स्थिति पत्रकारिता के क्षेत्र मे सफलता दिलाने मे सक्षम है।

3: ग्रहों की स्थिति व योग:

ग्रह और भावों के साथ ही कुछ ऐसी ग्रह स्थिति, ज्योतिषीय योग होते हैं, जो पत्रकारिता के क्षेत्र में सफलता का कारण बनते है जो निम्न प्रकार हैं:

ऐसा देखा गया है  कि मिथुन, कन्या, वृषभ, तुला, मकर और मीन लग्न के लोग लेखन कार्य से जुड़े होते हैं। ज्यादातर बड़े लेखक इन्हीं लग्नों में जन्मे हैं। पत्रकार अच्छा व्यवहार विश्लेषक वक्ता होता है, वाणी प्रभावशाली होती है। जब कुंडली में द्वितीय भाव में बुध उच्च राशि में हो तो जातक अच्छा पत्रकार बनता है। बुध दशम भाव में गुरु के साथ हो, द्वितीय भाव में चन्द्र हो तो ऐसा जातक समाचार पत्रों, पत्रिका का संपादन या प्रकाशन का कार्य करता है। सफल एंकर बनने के लिए शुक्र, बुध, चंद्रमा व गुरु का महत्व सर्वोपरि है। जन्मकुंडली में यदि सरस्वती का योग बन जाए तो आप उच्चकोटि के लेखक हो सकते हैं। संपादन कार्य में कल्पनाशक्ति की आवश्यकता रहती है। इसलिए कल्पनाकारक चंद्रमा की शुभ स्थिति भी वांछित है। हालांकि, सफलता पाने के लिए कड़ी मेहनत और लगन बहुत जरूरी है, लेकिन जन्म कुंडली में ग्रहों की स्थिति व स्थान भी आपके करियर को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 

(नोट- यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक दिल्ली के प्रसिद्ध ज्योतिषी और हस्तरेखा विशेषज्ञ हैं। इनसे info@astropraveen.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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राजेंद्र माथुर की पुण्यतिथि पर संस्मरण: कलम के महानायक का साथ

वह राजेंद्र माथुर का पहला तार था। छतरपुर जैसे छोटे से कस्बे में किसी नौजवान पत्रकार को ‘नईदुनिया’ के प्रधान संपादक का तार।

Last Modified:
Friday, 09 April, 2021
rajendramathur5558

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

वह राजेंद्र माथुर का पहला तार था। छतरपुर जैसे छोटे से कस्बे में किसी नौजवान पत्रकार को ‘नईदुनिया’ के प्रधान संपादक का तार। साइकिल उठाकर पूरे शहर के परिचितों को दिखाता फिरा। वो 1977 के चुनाव के दिन थे। ‘नईदुनिया’ ने एक लेख मांगा था। मेरे जैसे कस्बाई और देहाती पत्रकार के लिए यकीनन गर्व की बात थी। उन दिनों की ‘नईदुनिया’ देश की हिंदी पत्रकारिता का सर्वश्रेष्ठ नाम था। आलेख भेजा। छपा। ‘नईदुनिया’ और राजेंद्र माथुर से रिश्ते की शुरुआत। मैं लिखता। माथुर साहब हर दूसरे तीसरे आलेख पर अपनी राय देते। वे पत्र खुद लिखा करते थे। इन पत्रों ने लगातार मेरा हौसला बढ़ाया। आम पत्रकारों की तरह मैं भी ‘नईदुनिया’ का संवाददाता बनना चाहता था, लेकिन ‘नईदुनिया’ की नीति हर जिले में संवाददाता बनाने की नहीं थी। मैं आग्रह करता रहा। ‘नईदुनिया’ ठुकराती रही। अलबत्ता आलेख जरूर छपते रहे। मेरे लिए यही बहुत था। एक दिन माथुर साहब का तार मिला। इंदौर मिलने आइए। आने जाने का किराया दे देंगे। मैं उस अलौकिक अखबार के दफ्तर में था, जिस अखबार का संवाददाता न बन सका, उसका उप संपादक बनने का प्रस्ताव। लॉटरी खुल गई। राजेंद्र माथुर से रिश्ते का एक नया रूप।

पत्रकार के तौर पर बुंदेलखंड जैसे पिछड़े इलाके से अंग्रेजी में लिखने का अवसर कम ही आता था। यू.एन.आई और पी.टी.आई के साथ काम करते हुए स्थानीय खबरें ही भेजीं थीं। माथुरजी ने जॉइन करते ही संपादकीय पन्ने के लिए एक आलेख अनुवाद के लिए दिया। अगर मुझे याद है तो वो आलेख कुलदीप नैयर का था। शायद वे मेरी अंग्रेजी जांचना चाहते थे। जाहिर था- मैं उनकी अपेक्षा पर खरा नहीं उतरा। इसके बाद उनका आदेश था- रोज सुबह घर आओ। मैं अंग्रेजी अनुवाद सिखाऊंगा। अगले दिन से सुबह किराए पर साइकिल लेकर पांच किलोमीटर दूर उनके घर जाता और वे मुझे अंग्रेजी पढ़ाते। राजेंद्र माथुर का यह नया रूप मेरे सामने था। दिन गुजरते रहे। वे अखबार की हर विधा में मुझे पारंगत देखना चाहते थे। शायद मैं कुछ कर भी पाया। इसी बीच वे ‘‘नवभारत टाइम्स’’ के प्रधान संपादक बन कर दिल्ली जा पहुंचे। मैं उनके पैरों की धूल भी न था, मगर कुछ साल बाद ‘नईदुनिया’ प्रबंधन ने मुझ पर भरोसा किया। मैं सह संपादक के रूप में उसी कुर्सी पर बैठकर कमोबेश वही सारे काम कर रहा था, जिस पर माथुर साहब बैठते थे। रोज मैं उस लकड़ी की कुर्सी पर बैठने से पहले प्रणाम करता था।

सिलसिला चलता रहा। माथुर साहब जब इंदौर आते, मैं उनसे मिलने पहुंच जाता। वे बड़े उत्साह से ‘‘नवभारत टाइम्स’’ में हो रहे बदलावों का जिक्र किया करते थे। एक दिन (शायद 28 जुलाई 1985 ) दिल्ली से उनका फोन ‘नईदुनिया’ के दफ्तर आया। मैं उन दिनों तक अखबार की अनेक जिम्मेदारियां संभाल रहा था। माथुर जी ने कहा- एक सप्ताह के भीतर जयपुर पहुंचो। ‘नवभारत टाइम्स’ जयपुर संस्करण शुरू करने जा रहा था। माथुर साहब एक नए अंदाज और अवतार में थे। मैंने मुख्य उप संपादक के रूप में जयपुर जॉइन किया। इसके बाद अगले पांच-छह साल उनके मार्गदर्शन में काम किया। राजेन्द्र माथुर और सुरेन्द्र प्रताप सिंह की जोड़ी ने देश की हिंदी पत्रकारिता को ऐसे सुनहरे दिन दिखाए, जो उस दौर के हिन्दुस्तान में लोगों को चमत्कृत कर रही थी। आज तो सिर्फ उन दिनों की यादों की तड़प बाकी है। राजेंद्र माथुर के साथ काम करने का अनुभव अनमोल मोती की तरह मेरे पास है। वे जितने अच्छे पत्रकार थे, उससे अच्छे लेखक। जितने अच्छे लेखक थे, उससे अच्छे संपादक। जितने अच्छे संपादक थे, उससे अच्छे इंसान। किसी भी देश को ऐसे देवदूत बार-बार नहीं मिलते।

कुछ साल पहले मैं एक पत्रकारिता संस्थान में गया। छात्रों से बातचीत के दौरान मैंने उनसे राजेंद्र माथुर के बारे में पूछा। अफसोस! कम छात्र ही थे जो माथुर जी के बारे में ठीक-ठाक जानकारी रखते थे। मेरे लिए यह एक सदमें से कम नहीं था। कहीं न कहीं बड़ी गलती हुई है। नई पीढ़ी अगर माथुर साहब का लिखा नहीं पढ़ रही है, उन्हें नहीं जान रही है तो हम लोग भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। एक तो उनके लेखन को सामने लाने में देरी हुई। दूसरे पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों में राजेंद्र माथुर को जो जगह मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल पाई। तीसरा टेलिविजन पत्रकारिता ने माथुर साहब को कहीं गुम कर दिया। यह गलती अब भी ठीक की जा सकती है। यह सोचकर मैंने तय किया कि अगर नई पीढी के पत्रकार माथुर जी का लेखन नहीं पढ़ना चाहते तो कम से कम उनके बारे में न्यूनतम जानकारी तो रखें। मैंने राजेंद्र माथुर पर वृतचित्र बनाने का फैसला किया। यह 2005 की बात है। फैसला तो कर लिया, लेकिन जो हमारे बीच से करीब दो दशक पहले जा चुका हो, उस पर फिल्म बनाना आसान नहीं था और फिर माथुर जी जैसा संपादक, जिन्होंने अपने बारे में कभी प्रचार-प्रसार का सहारा नहीं लिया हो। हम लोग तो फिर भी अपनी कुछ तस्वीरें, वीडियो इत्यादि सुरक्षित करते रहते हैं। बहुत कुछ सामग्री मेरे पास थी, लेकिन उनकी आवाज, उनके विजुअल्स खोजना आसान नहीं था। तीन साल भटकता रहा। कई बार लगता- फिल्म नहीं बन पाएगी। फिर अन्दर से ताकत जुटाता और खोज में लग जाता। श्रीमती मोहिनी माथुर ने फिल्म के लिए बहुत सहयोग किया। आलोक मेहता जी ने अपने खजाने से माथुर जी के बारे में कुछ दुर्लभ सामग्री निकाली। इस तरह तीन-चार साल में फिल्म तैयार हो ही गई। जो भी मेरी अपनी बचत थी, उसका इससे बेहतर कोई और इस्तेमाल नहीं हो सकता था। इसका पहला शो उस समय के अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल की पहल पर 2010 में इंदौर प्रेस क्लब में हो चुका है। माथुर जी इसके अध्यक्ष रहे थे। उनके नाम पर सभागार भी वहां है। फिल्म का शो इसी ऑडिटोरियम में हुआ। इसके बाद यह फिल्म देश के करीब एक दर्जन राज्यों के पत्रकारों, मीडिया के छात्रों और विश्वविद्यालयों के बीच दिखाई जा चुकी है। अभी भी दिखाई जा रही है।

इन्ही दिनों मुझे संसद के दूसरे राज्यसभा टेलीविजन चैनल को शुरू करने की जिम्मेदारी मिली। मैंने कार्यकारी संपादक के पद पर जॉइन किया। उसके बाद कार्यकारी निदेशक के तौर पर काम  किया। उन्हीं दिनों मैंने आधा घंटे की एक फिल्म ‘उनकी नजर उनका शहर’ श्रृंखला के तहत तैयार की। जब तक मैं वहां रहा, माथुरजी की हर जन्मतिथि और पुण्यतिथि पर यह फिल्म दिखाई जाती रही। अब तो यह चैनल ही अंतिम सांसें गिन रहा है। इन दिनों मैं राजेंद्र माथुर जी पर एक ग्रन्थ तैयार कर रहा हूं। इसमें माथुर जी के कुछ अब तक अप्रकाशित आलेख, उनका जीवनवृत, उनका इतिहास बोध, उनके समकालीन संपादकों के आलेख और कुछ दुर्लभ चित्र तथा दस्तावेज शामिल किए जाएंगे। पत्रकारिता के छात्रों और पत्रकारों के लिए यह एक संग्रहणीय ग्रन्थ हो सकता है। आजाद भारत के इतिहास में इतना विलक्षण संपादक दूसरा नहीं हुआ। उनके साथ संपर्क के चौदह साल मेरे लिए अनमोल धरोहर हैं। मेरी सादर विनम्र श्रद्धांजलि।

यहां पेश है उन पर केंद्रित फिल्म। मेरी प्रार्थना है कि एक बार अवश्य यह फिल्म देखिए-

भारत के महान हिंदी संपादक राजेंद्र माथुर की नौ अप्रैल को तीसवीं पुण्यतिथि है। कोरोना के प्रकोप और पांच राज्यों में चुनाव के शोर में उनकी याद हिंदी पत्रकार शायद न करें। फिर भी मेरा फर्ज है कि याद दिलाऊं कि हिन्दुस्तान में एक ऐसा विलक्षण संपादक भी हुआ था। श्रद्धांजलि स्वरूप मेरी फिल्म। ऊपर इसके पहले भाग और नीचे दूसरे भाग-  

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लोग हैरान हैं, कोरोना का कहर वहां ज्यादा है, जहां चुनाव नहीं हो रहे हैं: राजेश बादल

दिन प्रतिदिन आ रहे आंकड़े बेहद खौफनाक और डराने वाले हैं। सालभर बाद कोरोना ज्यादा दैत्याकार और विकराल आकार लेता जा रहा है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 07 April, 2021
Last Modified:
Wednesday, 07 April, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

भयावह दौर में बढ़ती सामाजिक चुनौतियां

दिन प्रतिदिन आ रहे आंकड़े बेहद खौफनाक और डराने वाले हैं। सालभर बाद कोरोना ज्यादा दैत्याकार और विकराल आकार लेता जा रहा है। प्रारंभिक महीने तो किसी वैज्ञानिक शोध और व्यवस्थित उपचार के बिना बीते। विश्व बैंक, चीन और अमेरिकी राष्ट्रपति के बीच जारी आरोप प्रत्यारोप ने समूचे संसार को एक तरह से दुविधा में डाल कर रखा। न चिकित्सा की कोई वैज्ञानिक पद्धति विकसित हो पाई और न दुनियाभर के डॉक्टर्स में कोई आम सहमति बन सकी। शुरुआत में इसे चीन की प्रयोगशाला का घातक हथियार माना गया। इसके बाद इसे संक्रामक माना गया तो कभी इसके उलट तथ्य प्रतिपादित किए गए। कभी कहा गया कि यह तेज गर्मी में दम तोड़ देगा, तो फिर बाद में बताया गया कि तीखी सर्दियों की मार कोरोना नहीं झेल पाएगा। हालांकि चार छह महीने के बाद एक दौर ऐसा भी आया, जब लगा कि हालात नियंत्रण में आ रहे हैं। जिंदगी की गाड़ी पटरी पर लौटने लगी है। लोग राहत की सांस भी नहीं ले पाए कि आक्रमण फिर तेज हो गया। पर यह भी एक किस्म का भ्रम ही था।

पिछले एक महीने में तो इस संक्रामक बीमारी का जिस तरह विस्तार हुआ है, उसने सारी मानव बिरादरी को हिला दिया है। रोज मिलने वाली जानकारियों पर तो एकबारगी भरोसा करने को जी नहीं करता। मानवता के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा दूसरा उदहारण होगा, जिसमें आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक ताने बाने को चरमराते देखा गया हो। कोई भी देश या समाज अपनी बदहाली, गरीबी, बेरोजगारी या व्यवस्था के टूटने पर दोबारा नए सिरे से अपनी जीवन रचना कर सकता है, लेकिन अगर सामाजिक मूल्य और सोच की शैली विकलांग हो जाए तो सदियों तक उसका असर रहता है। मौजूदा सिलसिले की यही कड़वी हकीकत है। खासकर भारत के सन्दर्भ में कहना अनुचित नहीं होगा कि बड़े से बड़े झंझावातों में अविचल रहने वाला हिन्दुस्तान अपने नागरिकों के बीच रिश्तों को अत्यंत क्रूर और विकट होते देख रहा है। क्या यह सच नहीं है कि कोरोना ने सामाजिक बिखराव की एक और कलंकित कथा लिख दी है।

एक बरस के दरम्यान हमने श्रमिकों और उनके मालिकों के बीच संबंधों को दरकते देखा। पति पत्नी, बेटा-बहू भाई बहन, चाचा-ताऊ, मामा,मौसा फूफा जैसे रिश्तों की चटकन देखी। भारतीय समाज में एक कहावत प्रचलित है कि किसी के सुख या मंगल काम में चाहे नहीं शामिल हों, मगर मातम के मौके पर हर हाल में शामिल होना चाहिए। कोरोना काल तो जैसे मृत्यु के बाद होने वाले संस्कारों में शामिल नहीं होने का सन्देश लेकर आया। लोग अपने दिल के बेहद निकट लोगों के अंतिम दर्शन तक नहीं कर पाए। आजादी के बाद सबसे बड़ा विस्थापन-पलायन हुआ। इस पलायन ने रोजी-रोटी का संकट तो बढ़ाया ही, आपसी संबंधों में भी जहर घोल दिया। क्या इस तथ्य से कोई इनकार कर सकता है कि कोरोना काल में रोजगार सबसे बड़ा मुद्दा बन कर उभरा है। जो परिवार वर्षों बाद महानगरों से भागकर अपने गांवों में पहुंचे हैं, वे अपनी जड़ों में नई जमीन को तलाश रहे है और उस गांव, कस्बे के पास अपने बेटे को देने के लिए दो जून की रोटी भी नहीं है। भारतीय पाठ्य पुस्तकों में ज्ञान दिया जाता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, लेकिन हकीकत तो यह है कि हम अब असामाजिक प्राणी होते जा रहे हैं। 

यह निराशावाद नहीं है। इस कालखंड का भी अंत होगा। सालभर में अनेक दर्दनाक कथाओं के बीच मानवता की उजली कहानियां भी सामने आई हैं। संवेदनहीनता के बीच कुछ फरिश्ते भी प्रकट होते रहे हैं। पर यह तो सरकारों को ही तय करना होगा कि ऐसी विषम परिस्थितियों के बीच अपनी आबादी की हिफाजत कैसे की जाए। यह उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। आज गांवों, कस्बों, जिलों और महानगरों में तरह-तरह की विरोधाभासी खबरों के चलते निर्वाचित हुकूमतों की साख पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं।

आम आदमी की समझ से परे है कि नाइट कर्फ्यू का औचित्य क्या है? रात दस ग्यारह बजे के बाद तो वैसे ही यातायात सिकुड़ जाता है, फिर उस समय निकलने पर पाबंदी का क्या अर्थ है। रविवार को लॉकडाउन रखने का भी कारण स्पष्ट नहीं है। कोरोना इतना विवेकशील वायरस तो नहीं है जो दिन और समय का फर्क करते हुए अपना आकार बढ़ाए। यह सरकारी प्रपंच नहीं तो और क्या है कि खुद राजनेताओं और उनके दलीय कार्यक्रमों में पुछल्ले नेता कोरोना से बचाव के दिशा निर्देशों की धज्जियां उड़ाते दिख रहे हैं। पाबंदियों के निर्देश जितने लंबे नहीं होते, उससे अधिक सूची तो उनमें छूट देने वाले प्रशासनिक निर्देशों की होती है। जिन प्रदेशों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, उनमें तो लगता है किसी को कोरोना की चिंता नहीं है। न भीड़ को, न उम्मीदवारों को न सियासी पार्टियों को और न सितारा शिखर पुरुषों को। लोग हैरान हैं कि यह कैसा वायरस है, जो उन प्रदेशों में ज्यादा कहर ढा रहा है, जहां चुनाव नही हो रहे हैं। यह मात्र संयोग है कि गैर बीजेपी शासित राज्यों में लगातार स्थिति बिगड़ती जा रही है और जहां बीजेपी की सरकार है, वहां सब कुछ काबू में दिखाई देता है। इंदौर और भोपाल जैसे शहर जो अपनी जागरूकता के लिए विख्यात हैं, वहां कोरोना से बचने के लिए आम आदमी ही लापरवाह नजर आते हैं।

इसी तरह चिकित्सा तंत्र एक कसैली मंडी में बदलता दिखाई दे रहा है। इलाज के लिए कोई कीमतों का निर्धारण नहीं है। अस्पताल मनमानी फीस ले रहे हैं। गंभीर रूप से पीड़ितों को छोड़ दें तो अस्पतालों के पास गले की एंटीबायोटिक और विटामिन की गोलियां देने के सिवा कोई उपचार विधि स्पष्ट नहीं है। कुछ अस्पताल तो फाइव स्टार होटल से बाकायदा खाना ऑर्डर करते हैं और उसका चार गुना बिल में वसूलते हैं। क्या उन पर अंकुश लगाने का कोई फार्मूला सरकारों के पास है?

(साभार: लोकमत समाचार)

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विकास में पैसा लगता नहीं, बनता है: पूरन डावर

यदि खबरें ठीक हैं तो निश्चय ही अच्छे दिन आने वाले हैं। सरकार की नीतियों और सोच को नमन। गड्डों को भरना, अच्छे बसअड्डे, रेलवे स्टेशन, रोड व्यवस्था और क्या चाहिये।

पूरन डावर by
Published - Friday, 26 March, 2021
Last Modified:
Friday, 26 March, 2021
pooran5410

यदि खबरें ठीक हैं तो निश्चय ही अच्छे दिन आने वाले हैं। सरकार की नीतियों और सोच को नमन। गड्डों को भरना, अच्छे बसअड्डे, रेलवे स्टेशन, रोड व्यवस्था और क्या चाहिये। रोड पर बिल्डर खर्च करें, हमारे टैक्स का पैसा न लगे, बसअड्डों पर पूरी सुविधा हो, पैसा भी सरकार का न लगे, यही तो विकसित देशों में होता है।  विकास में पैसा लगता नहीं, बनता है।

अधिक विकास-अधिक समृद्ध, भारत जितना निजीकरण होगा उतनी ही अच्छी सुविधा। रेलवे स्टेशन यदि निजी हाथों में हों तो मेट्रो स्टेशन से कम नहीं। रेस्टोरेंट भी, शॉपिंग भी, एयर कंडिशन का मजा भी... जो दिखता है वो बिकता है। देश की अर्थव्यवस्था भी तेजी से भागती है। स्टेशन पर समय से पहले पहुंच गए तो कॉफी भी पी रहे हैं, शॉपिंग भी कर रहे हैं।

बस स्टैंड जब निजी उपक्रम बनाएंगे, तो किसी मॉल से कम नही होंगे। साफ सुथरे होंगे। व्यवस्थित होंगे। बसें सरकारी भी होंगी, प्राइवेट भी। शर्म आती है आगरा का आईएसबीटी देखकर। लगता है किसी गांव में है अंतरराष्ट्रीय शहर में नहीं।

अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए सर्वाधिक महत्व है घाटे की घरों को बंद करना। उसके दो उपाय हैं, या बंद या निजीकरण। निजीकरण से एक नहीं, दो नहीं, तीन लाभ होते हैं। पहला सरकार का घाटा बंद, दूसरा बंद करने से सुविधा-सेवा समाप्त और लागत का डूब जाना। निजीकरण से लागत जो लग चुका है उसका कुछ हिस्सा मिल जाता। निजी उपक्रमों की गुणवत्ता कई गुनी होती है। निजी संस्थान जो कमाते हैं, उस पर टैक्स भी मिलता है। निजी उपक्रम अच्छी सेवा देकर, पैसा बनाते हैं। यदि उल्लंघन करते हैं तो सरकार है, अदालतें है सरकारी उपक्रम के विरुद्द आप कुछ नहीं कर पाते। सीमित सोच के व्यक्ति सिर्फ व्यक्तिगत आरोप लगा सकते हैं, बेच दिया-बेच दिया कर सकते हैं।  

सरकार का कार्य मूलभूत सेवाएं उपलब्ध कराना है। सुरक्षा देना है, कानून व्यवस्था बनाना, जो अब तक हो रहा था वह कतई गलत नही था। निजी उपक्रम तब तक नहीं आते जब तक लाभदायक न हों। सरकार को सेवा देनी ही है, लेकिन जब घाटे का बोझ बढ़ जाता है और समय के साथ निजी उपक्रम के लिये व्यवहार्य भी हो जाता है। ‘बेच दिया-बेच दिया’ से हास्यास्पद सोच कोई हो नहीं सकती।

बैंक निजी होतीं, तो माल्या को भगा दिया या चौकसी को भगा दिया, बड़े आदमी के कर्जे नफा कर दिया। बैंकिंग एक व्यवसाय है ब्याज कमाते हैं, तो जोखिम भी होगा। हर व्यवसाय में जोखिम होता है, जोखिम न हो तो सभी व्यवसाय कर लें। बैंक जब करोड़ों ब्याज कमाती हैं, तो कुछ एनपीए भी होंगे। हर व्यवसाय में लेनदारियां मरती हैं। सरकारी बैंक होते हैं, तो राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना होती है। एनपीए भी बढ़ते हैं। सरकार पर माफ करने के आरोप लगते रहते हैं। राजनीति हस्तक्षेप से गलत सेटलमेंट होते भी हैं। आरोप लगता है जनता के टैक्स का पैसा लेकर भाग गये और सरकार ने कुछ नहीं किया। लिहाजा एकमात्र उपाय है- निजीकरण। जब राष्ट्रीयकरण हुआ था, तो उस समय देश की आवश्यकता थी। आज उससे निकलने की आवश्यकता है। आज बैंकिंग परिपक्व हो चुकी है। सरकार को केवल छोटे-छोटे ऋण और किसानों के लिए सहकारी बैंक की ही व्यवस्था करनी चाहिए।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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आज के पत्रकारों के लिए सबक है गणेश शंकर विद्यार्थी का जीवन

आज गणेश शंकर विद्यार्थी का बलिदान दिवस है। आज के दौर के पत्रकारों को वाकई में उनके जीवन से सीख लेनी चाहिए।

Last Modified:
Thursday, 25 March, 2021
ganeshshankar54

आज गणेश शंकर विद्यार्थी का बलिदान दिवस है। आज के दौर के पत्रकारों को वाकई में उनके जीवन से सीख लेनी चाहिए। किसी मुद्दे को मुहिम बनाना, उसे अंजाम तक पहुंचाना ऐसा आजकल के कई पत्रकार करते हैं, गणेश शंकर भी करते थे, लेकिन क्या आपने आज के किसी पत्रकार को उस मुहिम के लिए धरने पर बैठते, जेल जाते देखा है? ऐसा गणेश शंकर विद्यार्थी करते थे। वो पांच बार जेल गए, यहां तक कि 9 मार्च 1931 को वो गांधी-इरविन समझौते के तहत जेल से वापस ही आए थे कि कानपुर के दंगों में सैकड़ों लोगों को बचाने के बाद खुद ही दंगे की भेंट चढ़ गए और 25 मार्च 1931 को कानपुर में लाशों के ढेर में उनकी लाश मिली, उनकी लाश इतनी फूल गई थी कि लोग पहचान भी नहीं पा रहे थे। 29 मार्च 1931 को उनको अंतिम विदाई दी गई।

दरअसल विद्यार्थी भी आजाद भारत के संघर्ष के उन्हीं योद्धाओं में से हैं, जिन्हें कांग्रेस की बाद की राजनीति ने किनारे कर दिया, जहां गांधी और नेहरू के अलावा बाकी नेताओं को साइड लाइन कर दिया गया।

फतेहपुर के हथगाम में 26 अक्टूबर 1890 को अपने नाना के घर पैदा हुए गणेश शंकर विद्यार्थी शुरू से ही बड़े मेधावी थे, साहित्य और पत्रकारिता के प्रति रुझान के चलते उन्होंने अपना उपनाम विद्यार्थी रख लिया। उन्होंने 16 वर्ष की उम्र में ही अपनी पहली किताब 'हमारी आत्मोसर्गता' लिख डाली थी। गणेश शंकर भी देश में चल रही गुलामी विरोधी लहर से अछूते नहीं रहे, 1916 में लखनऊ में गांधीजी से मिले और कांग्रेस में भी सक्रिय रहे। कई आंदोलनों में भी हिस्सा लिया। 1925 में यूपी स्टेट प्रोविंसली इलेक्शंस में जीते भी। दो सरकारी नौकरियां भी कीं, लेकिन स्वाभिमानी थे, सो छोड़ दीं।

हजारी प्रसाद द्विवेदी उनसे प्रभावित थे, उनको पत्रिका ‘सरस्वती’ में सब एडिटर बना दिया, लेकिन वे खबरों से जुड़े रहना चाहते थे, सो ‘अभ्युदय’ से जुड़ गए। बाद में उन्होंने साप्ताहिक पत्र ‘प्रताप’ शुरू किया। कानपुर से शुरू हुए पत्र का जलवा इस कदर था कि भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद भी उनसे जुड़ गए। एक साथ गांधीजी की अहिंसा और क्रांतिकारियों की विचारधाराओं के साथ चल रहे थे गणेश शंकर। उन्होंने क्रांतिकारियों की काफी मदद की, कई बार कांग्रेस के आंदोलनों के चलते उनके अखबार की जमानत जब्त कर ली गई, कई बार उन्हें जेल जाना पड़ा।

क्रांतिकारियों से नजदीकी कांग्रेस को पसंद भी नहीं थी, लेकिन इस दोनों विचारधाराओं के अलावा गणेश शंकर की अपनी फिलॉसफी थी, मजलूम को न्याय मिले, गरीब को इंसाफ और जीने के साधन मिलें, इसके लिए वो कांग्रेस और क्रांतिकारियों से इतर भी आंदोलनों को मुहिम बनाकर अंग्रेजी सरकार, जमींदारों और मिल मालिकों के खिलाफ मुहिम चलाते रहते थे। रायबरेली के किसानों के लिए और कानपुर के मिल मजदूरों के लिए प्रताप ने बड़ी लड़ाई लड़ीं। तमाम सरकार विरोधी लेखों के छपने के लिए प्रताप के दरवाजे हमेशा खुले थे, लेकिन वो भारतीयों के खिलाफ भी मुहिम चलाने से परहेज नहीं करते थे, अगर वो किसी भी तरह के अन्याय के कामों में लिप्त हों तो।

9 मार्च 1925 को वो फिर से एक बार जेल से बाहर आए, लॉर्ड इरविन और गांधीजी के बीच हुए समझौते के तहत उन्हें जेल से मुक्ति मिली थी। लेकिन घर नहीं बैठे, कानपुर में दंगा फैल गया। हिंदू और मुस्लिमों के बीच ये दंगा काफी दिनों तक चला, लेकिन गणेश शंकर का एक ही काम था, गरीबों मजलूमों को दोनों तरफ के दंगाइयों से बचाना। विद्यार्थी पूरे दिन दंगाग्रस्त क्षेत्रों में घूमकर निर्दोषों की जान बचाते रहे। कानपुर के जिस इलाके से भी उन्हें लोगों के फंसे होने की सूचना मिलती, वे तुरंत अपना काम छोड़कर वहां पहुंच जाते, क्योंकि उस समय पत्रकारिता की नहीं, मानवता की जरूरत थी। उन्होंने बंगाली मोहल्ले में फंसे दो सौ मुस्लिमों को निकालकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। उनके कपड़े घायलों और लाशों को उठाने के कारण खून से सन गए तो वे घर नहाने पहुंचे। लेकिन तभी चावल मंडी में कुछ मुस्लिमों के फंसे होने की खबर आई। उनकी पत्नी उन्हें पुकारती रह गई और वे 'अभी आया' कहकर वहां पहुंच गए। वहां फंसे लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचा ही पाए थे कि दोपहर के तीन बजे घनी मुस्लिम आबादी से घिरे चौबे गोला मोहल्ले में दो सौ हिन्दुओं के फंसे होने की खबर आई। वे तुरंत वहां जा पहुंचे। वे निर्दोषों को जैसे-तैसे निकालकर लॉरी में बिठा ही रहे थे कि तभी हिंसक भीड़ वहां आ पहुंची। कुछ लोगों ने उन्हें पहचान लिया, लेकिन वे कुछ कर पाते, इसके पहले ही भीड़ में से किसी ने एक भाला विद्यार्थीजी के शरीर में घोंप दिया। साथ ही उनके सिर पर लाठियों के कुछ प्रहार हुए और मानवता का पुजारी इंसानियत की रक्षा के लिए, शांति स्थापना के लिए शहीद हो गया। दंगे रोकते-रोकते ही उनकी मौत हुई थी।

उन्होंने सैकड़ों लोगों की जान बचाई और 25 मार्च को उनकी भी लाश मिली, लाशों के ढेर में। 29 मार्च को उनको अंतिम विदाई दी गई। गांधीजी ने ‘यंग इंडिया’ में उनकी दुखद मौत पर ये लिखा था, "The death of Ganesh Shankar Vidyarthi was one to be envied by us all. His blood is the cement that will ultimately bind the two communities. No pact will bind our hearts. But heroism such as Ganesh Shankar Vidyarthi showed is bound in the end to melt the stoniest hearts, melt them into one. The poison has however gone so deep that the blood even of a man so great, so self-sacrificing and so utterly brave as Ganesh Shankar Vidyarthi may today not be enough to wash us of it. Let this noble example stimulate us all to similar effort should the occasion arise again"।

सोचिए आज के रिपोर्टर्स और एडिटर्स केवल रिपोर्ट करने और उसको मुहिम बनाने में, कभी-कभी तो नॉन इश्यूज को भी मुहिम बनाने में काफी अग्रेसिव तरीके से जुटते हैं। लेकिन सड़क पर उतरकर उस अन्याय के खिलाफ अपनी जान की बाजी नहीं लगाते, जैसी कि गणेश शंकर विद्यार्थीजी ने लगाई थी।

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आत्मघाती पत्रकारिता से बचने का उपाय तत्काल खोजना आवश्यक है मिस्टर मीडिया!

पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि का बयान बेहद गंभीर बहस की मांग करता है। तीन दिन पहले अपने चार पन्ने के बयान में दिशा ने पत्रकारिता को जमकर कोसा है।

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 16 March, 2021
Last Modified:
Tuesday, 16 March, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

जिंदगी बरबाद करने का हक नहीं: पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि का बयान बेहद गंभीर बहस की मांग करता है। तीन दिन पहले अपने चार पन्ने के बयान में दिशा ने पत्रकारिता को जमकर कोसा है। दिशा रवि ने साफ कहा, ‘मीडिया ने मुझे मुजरिम बना दिया। मेरे अधिकारों का हनन हुआ, मेरी तस्वीरें पूरे मीडिया में फैल गईं, मुझे मुजरिम करार दे दिया गया-कोर्ट के द्वारा नहीं, टीआरपी की चाह वाले टीवी स्क्रीन पर। मेरे बारे में काल्पनिक बातें गढ़ी गईं’।

दिशा रवि ने आगे लिखा है, ’विचार नहीं मरते। सच हमेशा बाहर आता है। चाहे वह कितना ही समय ले ले। लेकिन मीडिया को ऐसा नहीं करना चाहिए था। न्याय का प्राकृतिक सिद्धांत भी यही कहता है कि सौ मुजरिम चाहे छूट जाएं, लेकिन किसी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए।’

दिशा के मामले में जो भी होगा, वह अदालत तय करेगी। पर पत्रकारिता के तमाम अवतारों में उसे अपराधी करार दे दिया गया। मीडिया ट्रायल करके किसी नौजवान की जिंदगी बरबाद करने का किसको हक है? क्या किसी सभ्य लोकतांत्रिक समाज में पत्रकारिता को इतनी गैर जिम्मेदारी की छूट दी जानी चाहिए?

न्यायालय की छवि दरकती है: सप्ताह भर भी नहीं हुआ जब भारत के मुख्य न्यायाधीश एस.ए बोबड़े ने भी ऐसी ही एक टिप्पणी की थी। दुष्कर्म के एक मामले की रिपोर्टिंग पर उनकी राय थी कि मीडिया ने गलत रिपोर्टिंग की। एक किशोरी से न्यायालय ने आरोपित को ब्याह रचाने का कोई सुझाव ही नहीं दिया था। पत्रकारों ने उसे गलत अंदाज में परोसा। न्यायालय ने मामले के तथ्यों, दस्तावेजों और सुबूतों के आधार पर पूछा था कि क्या आप पीड़िता से विवाह कर रहे हैं? अदालत में प्रमाण थे कि दोनों पक्ष आपस में शादी की बात कर रहे हैं। माननीय मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस तरह की रिपोर्टिंग से न्यायालय और न्यायाधीशों की छवि तथा प्रतिष्ठा पर आंच आती है। जनमानस में इस लोकतांत्रिक शीर्ष संस्था के बारे में भ्रम फलता है। यह उचित नहीं है। यदि सर्वोच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाघीश को यह टिप्पणी करनी पड़ जाए तो लोकतंत्र के इस स्वयंभू चौथे स्तंभ के लिए चुल्लू भर पानी में डूब मरने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। जानता हूं कि यह तनिक कठोर टिप्पणी है, मगर जिंदगी में एक अवसर आता है जब संयम की परीक्षा में उत्तीर्ण होने की इच्छा भी दम तोड़ देती है।

टूट रहे हैं जम्हूरियत के पाए: मैंने इस स्तंभ में पिछले वर्षों में लगातार इस बात को उठाया है कि यह बात हिन्दुस्तान के मीडिया को समझनी होगी कि गैरजिम्मेदार पत्रकारिता की भी सीमा होती है। आप अनंत काल तक पतन के गड्ढे में नीचे नहीं गिर सकते। जब आप उसकी तलहटी में पहुंचेंगे तो सिवाय दम तोड़ने के कुछ नहीं बचेगा। यदि बिरादरी की ओर से यह तर्क भी दिया जाए कि जब जम्हूरियत के सारे पाए टूट रहे हैं, दरक रहे हैं तो पत्रकारिता के उसूलों की रक्षा कैसे की जा सकती है तो निवेदन है कि यही तो परीक्षा-काल है। गांधी एक विलक्षण और बेजोड़ संपादक थे। उन्हें भी क्रोध आता था। वे विचलित भी होते थे, लेकिन कोई मुसीबत, आफत या संकट उन्हें अपने रास्ते से डिगा नहीं सका। आज बड़े-बड़े अखबारनवीस राह से भटके दिखाई देते हैं। आज नहीं तो कल उन्हें हकीकत का सामना करना ही होगा। लेकिन तब तक वे पेशे का बेड़ा गर्क कर चुके होंगे। इसलिए आत्मघाती पत्रकारिता से बचने का उपाय तत्काल खोजना आवश्यक है। प्रत्यास्थता के चरम बिंदु पर पहुंचने से पहले ही संभल जाएं तो बेहतर है मिस्टर मीडिया।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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