कालेधन-भ्रष्टाचार का इलाज न नोटबंदी से होगा, न नगदबंदी से, बोले वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वैदिक

डॉ. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार ।। नोटबंदी के बाद अब नगदबंदी? हमारी सरकार की नाव नोटबंदी के भंवर में फंसती ही चली जा रही है। ऐसा लग रहा है कि आजकल उसके

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 15 December, 2016
Last Modified:
Thursday, 15 December, 2016
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डॉ. वेद प्रताप वैदिक

वरिष्ठ पत्रकार ।।

नोटबंदी के बाद अब नगदबंदी?

हमारी सरकार की नाव नोटबंदी के भंवर में फंसती ही चली जा रही है। ऐसा लग रहा है कि आजकल उसके पास कोई काम ही नहीं है, सिवाय इसके कि वह नए नोटों के लिए रोज़ मार खाती रहे, नए और पुराने नोटों के जखीरों को पकड़ती रहे, भ्रष्टाचारी बैंकरों पर जांच और मुकदमे चलाए, 40 करोड़ बैंक खातों की जांच करवाए और जन-धन खाताधारियों को नई नैतिकता सिखाए।

अब जबकि सारा काला धन सफेद हो चुका है और जितना आयकर पहले मिलता था, उसके भी घटने की आशंका हो रही है तो हमारी सरकार अपनी आंखें रगड़ रही है, हाथ मल रही है और अपने बाल नोंच रही है। उसे समझ नहीं पड़ रहा है कि अब वह कौन सी बंडी बदले और कौनसा बंडल मारे? डूबती नाव को तिनके का सहारा! अब वह नगदबंदी के तिनके को पकड़कर लटक रही है।

नगदबंदी का दूर-दूर तक कोई जिक्र तक नहीं था, 8 नवंबर की महान घोषणा के वक्त! हमारे प्रचारमंत्री को क्या पता था कि नोटबंदी इस बुरी तरह फेल हो जाएगी। अब वे कालाधन भूल गए। किसी ने उन्हें नगदबंदी की पुड़िया पकड़ा दी। अब वे नगदबंदी का चूरण सबको बांट रहे हैं। बदहजमी का यह चूरण वे उनको भी खिला रहे हैं, जो भूखे पेट सोते हैं। उन्हें यह पता ही नहीं कि दुनिया के अत्यंत सुशिक्षित और समृद्ध देशों में भी नगदबंदी नहीं है। वहां भी नगद का व्यवहार खूब होता है और यांत्रिक लेन-देन के बावजूद भारत से कई गुना भ्रष्टाचार वहां व्याप्त है।

जरा बताएं कि अभी वेस्टलैंड हेलिकॉप्टरों में 300 करोड़ की रिश्वत या बोफर्स में 62 करोड़ की रिश्वत क्या नगद में ली गई थी? यह नोटबंदी और नगदबंदी हमारे बैंकों और आयकर विभाग को भ्रष्टाचार के सबसे बड़े गढ़ बना देगी। 25 करोड़ जन-धन खातेधारी याने उनके 100 करोड़ परिजन (एक घर में चार सदस्य), सभी पर भ्रष्ट होने की तोहमत है याने भ्रष्टाचार ही राष्ट्रीय शिष्टाचार बन गया है। कालेधन और भ्रष्टाचार का इलाज न नोटबंदी से होगा, न नगदबंदी से। ये दोनों दांव उल्टे पड़ गए हैं। नोटबंदी ने कालाधन बढ़ा दिया है और नगदबंदी के चलते आम आदमी की जिंदगी दूभर हो रही है। आपने पहाड़ खोद डाला लेकिन उसमें से आप चुहिया भी नहीं निकाल सके।

(साभार: नया इंडिया)

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‘एक बारगी दिमाग को हिलाकर रख देती है मुंशी प्रेमचंद के बचपन की दास्तान’

सबकी किस्मत एक जैसी नहीं होती। चाहा हुआ कभी पूरा होता है क्या? हां, यह जरूर हर इंसान को लगता है कि उसकी जिंदगी में ही सबसे ज्यादा गम हैं।

राजेश बादल by
Published - Saturday, 31 July, 2021
Last Modified:
Saturday, 31 July, 2021
Premchand Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।    

प्रेमचंद का बिखरा बचपन

सबकी किस्मत एक जैसी नहीं होती। चाहा हुआ कभी पूरा होता है क्या? हां, यह जरूर हर इंसान को लगता है कि उसकी जिंदगी में ही सबसे ज्यादा गम हैं। दूसरे की थाली में घी अधिक दिखता है। जब हम अपने आसमान के सितारों को देखते हैं तो लगता है कि वे कोई चांदी की चम्मच लेकर पैदा हुए थे। तभी तो क़ुदरत ने उन्हें दौलत और शौहरत का अनमोल खजाना बख्शा है। मगर यह सच नहीं है। इन महानायकों की जिंदगी भी दुःख, अवसाद, पीड़ा और वेदना से भरपूर होती है। आप जानेंगे तो लगेगा-उफ! कैसे ये लोग जी पाए? हम होते तो मर ही जाते। पेश है कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद के बचपन की दास्तान, जो एक बारगी हिलाकर रख देती है। 

उन दिनों लोग बनारस से लमही गांव व पैदल ही आते-जाते थे। इसी गांव की एक अंधेरी कोठरी में 31 जुलाई 1880 को डाक मुंशी अजायब राय के घर तीन बेटियों के बाद बेटा आया। पिता ने नाम रखा-धनपत राय। तीन साल के हुए तो उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में बांदा आना पड़ा। पांच साल के हुए तो मौलवीजी के पास उर्दू और फारसी पढ़ने जाना शुरू कर दिया। लेकिन खेलने-कूदने में ज़्यादा मन लगता था । दुबले पतले थे, लेकिन शरारतें ऐसीं कि बड़ी उम्र के बच्चों को मात करते। संयुक्त परिवार था, इसलिए चचेरे भाइयों के साथ दिन भर गुल्ली डंडा खेलते, खेतों से तोड़कर मटर की फलियां खाते, पेड़ पर चढ़कर आम तोड़ते, खेत में घुसकर गन्ने उखाड़ते और उनके मालिकों से नजर बचाकर चंपत हो जाते। मां आनंदी देवी को कभी बेटे की इन हरकतों पर लाड़ आता तो कभी तमतमा जातीं। मां-बेटे की ये बड़ी खूबसूरत जुगलबंदी थी। लेकिन अचानक इस जुगलबंदी को किसी की नजर लग गई। मां आठ साल के धनपत का साथ हमेशा के लिए छोड़ गईं। वो मां जो धनपत को आंचल में छिपाकर रखतीं थीं। दूसरों की नजर न लगे, इसलिए माथे पर काजल का डिठौना रोज लगातीं थीं, वही मां अब जा चुकीं थीं। घर की स्थिति डांवाडोल थी। बदन पर पूरे कपड़े नहीं, पैरों में जूते नहीं और मौलवीजी को देने के लिए फीस नहीं। न कोई खाने को पूछता न पढ़ाई की चिंता करता। पिता भी मां की मौत के बाद रोज शराब पीने लगे थे।

वर्षों बाद धनपतराय ने मां से जुदाई के पलों को कुछ इस तरह बयान किया, ‘छह महीने तक बीमार थीं। मैं सिरहाने बैठकर पंखा झला करता था…जब मां मरने लगीं तो मेरी बहन, मेरे भाई और मेरा हाथ पिताजी के हाथ पर रखा और बोलीं, ‘अब मैं जाती हूं। तीनो बच्चे अब तुम्हारे हवाले हैं। बहन, भाई, पिता और घर के सारे लोग रो रहे थे। मेरी समझ में कुछ नहीं आया। कुछ दिन बाद बहन अपनी ससुराल चली गई। दादी भी लमही लौट गईं। पिताजी काम पर चले जाते। मैं और भैया रह जाते। वो मुझे दूध में शकर डालकर खूब खिलाते, पर मां का वो प्यार कहां? मैं अकेले में बैठा माँ को याद करता और घंटों रोता रहता।‘

पिताजी की दिलचस्पी धनपत की रोजमर्रा की ज़िंदगी में नहीं रह गई थी न ही उनकी पढ़ाई लिखाई पर उनका ध्यान होता। शायद वो खुद अपने अकेलेपन से लड़ रहे थे। दो साल ही बीते थे कि पिताजी दूसरी मां ले आए। धनपत उन्हें चाची कहते थे। पिता बच्चों के लिए चीजें लाते, लेकिन उन तक वो नहीं पहुंच पातीं। पिताजी गुस्सा होते, लेकिन क्या कर सकते थे। बारह साल के धनपत मां की याद में और तड़प जाते। रात-रात भर आंसू बहाते। सौतेली मां अपने छोटे भाई को भी मायके से साथ लाईं थीं। उमर में धनपत से छोटे थे, इसलिए उनसे दोस्ताना ताल्लुक बन गए थे। उन दिनों पचहत्तर पैसे हर महीने स्कूल की फीस देनी पड़ती थी। चाची से फीस मांगते तो फटकार मिलती। धनपत की डबडबाई आंखों में मां का चेहरा तैरने लगता। अब तो शरारतें करने को भी जी नहीं करता था, क्योंकि नई मां अपनी मां की तरह  माफ नहीं करतीं न ही लाड़ करतीं। उल्टे पिता से शिक़ायत किया करतीं। इस कारण पिता भी संरक्षण न देते। इस तरह नई मां और पिता उस बालक मन से बाहर निकल गए।

एक दिन यूं ही आवारागर्दी करते पास में एक किताबों की दुकान पर जा पहुंचे। दुकानदार बुद्धिलाल ने एक-दो दिन तो कहानियों की कुछ किताबें और उपन्यास पढ़ने को दे दीं, मगर रोज़ रोज़ तो ये मुमकिन नहीं था, लिहाज़ा दोनों के बीच कारोबारी समझौता हो गया। बुद्धिलाल रोज़ अंग्रेज़ी की कुंजी और अन्य विषयों के नोट्स बेचने के लिए धनपत को देते। बदले में धनपत उपन्यास और कहानियों की किताबें पढ़ने को ले जाता। देखते ही देखते धनपत ने दुकान की सारी किताबें पढ़ डालीं। धनपत के भीतर किताबों की ऐसी भूख जगी कि तेरह साल की उमर में मौलाना फ़ैज़ी के पच्चीस हज़ार से ज़्यादा पन्ने पढ़ डाले, रेनॉल्ड की मिस्ट्रीज ऑफ द कोर्ट ऑफ लंदन की अनगिनत किताबें, मौलाना सज़्ज़ाद हुसैन की ढेरों किताबें, मिर्ज़ा रुसवां की उमराव जान अदा समेत सारे उपन्यास, रतन नाथ सरकार की सारी कहानियां। यहां तक कि भारतीय संस्कृति के प्रतीक सारे पुराण पढ़ लिए। उस समय तक वो उर्दू और फारसी में ही पढ़ते थे इसलिए नवल किशोर प्रेस ने जब पुराणों का उर्दू अनुवाद छापा तो धनपत उन पर टूट पड़े। आप कह सकते हैं कि धनपत राय या नवाब के भीतर एक प्रेमचंद ने इसी दौर में आकार लिया। धनपत पंद्रह साल के थे, जब नवीं क्लास में पढ़ने के लिए बनारस जाना पड़ा। पिताजी ने पांच रुपये महीने तय कर दिए। रोज़ आठ किलोमीटर पैदल जाते और लौटते। चूंकि पांच रुपये में पढ़ाई का खर्च नहीं निकलता था इसलिए ट्यूशन करना पड़ा। ट्यूशन से भी पांच रुपये मिल जाते। होता ये कि सुबह आठ बजे घर से बनारस के लिए निकलते। भागते दौड़ते स्कूल पहुंचते। साढ़े तीन बजे छुट्टी हो जाती। फिर पैदल बांस फाटक जाते-करीब तीन किलोमीटर। ट्यूशन पढ़ाते और छह बजे तक। फिर निकल पड़ते गाँव के लिए। आठ बजे रात को घर पहुँचते। रात को केरोसिन की कुप्पी में होम वर्क करते और सो जाते।

बचपन दम तोड़ रहा था। इसी बीच चाची के पिता ने एक लड़की धनपत राय के लिए देख ली। धनपत भी खुश थे। मां के बाद ज़िंदगी में कोई महिला तो आएगी, जो उनका ख्याल रखेगी। दरअसल जिन लोगों को ज़िंदगी में मां का भरपूर प्यार नहीं मिलता, वो अपने जीवन में आने वाली सभी महिलाओं में मां का भी एक अंश देखते हैं-यह सोचते हुए कि शायद वो महिला कहीं न कहीं मां की तरह ख्याल रखेगी, पर शायद ऐसा कम ही होता है। बस्ती ज़िले के एक गाँव में धनपत का ब्याह हो गया। ऊँटगाड़ी में पत्नी को लेकर लौटे। शादी के बाद पता चला कि उसकी उमर धनपत से ज़्यादा थी। वर्षों बाद उन्होंने लिखा, ‘मैंने उनकी सूरत देखी तो मेरा खून सूख गया। बदसूरत होने के अलावा कर्कश भी थीं। उन्हें अफीम की लत  थी, रंग काला था, चेचक के दाग थे, एक टांग छोटी थी और भी कुछ था, जिसे न बताना ही बेहतर। ग़ुस्सा होतीं तो कहतीं-मैं बंगाल का काला जादू जानती हूँ। बछड़ा बनाकर खूँटे से बाँध दूँगी।‘

फिर भी धनपत ने गृहस्थी की गाड़ी खींचने का फैसला किया लेकिन मुश्किल यह थी कि सौतेली मां यानी चाची और उनकी पत्नी में नहीं बनती थी। धनपत भारत के आम पति की तरह दो पाटों में पिस गए। किशोर और कोमल मन पर पत्नी नाम की संस्था को लेकर गहरा धक्का लगा। फिर भी वो रिश्ते को ढोते रहे। पिताजी को अफ़सोस और दूसरी पत्नी पर गुस्सा था। बोले,  अफ़सोस! तुम्हारे पिता ने मेरे गुलाब से बेटे को कुएँ में धकेल दिया। पिता जी इतने सदमे में थे कि बीमार पड़ गए, बिस्तर पकड़ लिया। सेवा में लगे धनपत मैट्रिक का इम्तिहान न दे पाए। पिताजी की तबियत बिगड़ती गई और डेढ़ बरस के भीतर ही चल बसे। धनपत अपने माता-पिता को खो चुके थे। गहरे संकट में थे। अगले साल जैसे-तैसे परीक्षा पास की, लेकिन सेकंड डिवीजन ही आई।

अब फीस माफ़ नहीं हो सकती थी और फीस भरकर आगे की पढ़ाई जारी रखने की हैसियत नहीं थी। सौतेली मां, उनके बच्चे और पत्नी का बोझ उनके कदमों को पढ़ाई से रोक देता था। इन्हीं दिनों एक वकील साहब के बेटे के ट्यूशन का काम मिल गया। पांच रुपये महीने मिलते। तीन रुपये घर भेजते और दो रुपये में अपना खर्च चलाते। वकील साहब ने अपनी कोठी में घुड़साल में जगह दे दी। वहीं एक टाट के टुकड़े को बिस्तर बनाया और दो पत्थरों का चूल्हा। एक-दो बर्तन घर से ले आए। सुबह खिचड़ी पका लेते। शाम को अक्सर भूखे सोना पड़ता। कभी-कभी तो दोनों टाइम पानी से पेट भरना पड़ता। लेकिन ऐसी नौबत भी आती कि ट्यूशन के पांच रुपये मिलने पर भर पेट खाने की चाह हलवाई की दुकान पर ले जाती।

परिणाम ये कि उधारी चढ़ जाती। कपड़े फट गए तो दुकान पर ढाई रुपये उधार कर दिए। दर्ज़ी का तकाज़ा बढ़ता गया तो उसकी दुकान के सामने से निकलना बंद कर दिया। तीन साल बाद  उधारी चुकी। एक बार एक मज़दूर से पचास पैसे उधार लिए जो उसने पांच साल बाद घर आकर जबरन वसूले। एक बार दो दिन तक कुछ भी खाने को न मिला। ग़ुस्सा इतना आया कि गणित की किताब बेची और एक रुपया मिला तो पेट भर खाना खाया। गणित की किताब इसलिए बेची क्योंकि इसी विषय ने उनकी डिवीजन बिगाड़ी थी। अगर गणित में अच्छे अंक आते तो फीस माफ़ हो जाती और पढ़ाई चलती रहती। कहावत है, मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है। किताब बेचकर दुकान से निकले तो बड़ी-बड़ी मूछों वाले एक रौबीले सज्जन ने रोक लिया। बातचीत शुरू कर दी। वो चुनार में मिशन स्कूल के हेडमास्टर थे। उन्होंने स्कूल में शिक्षक पद के लिए ऑफर किया। वेतन सुनकर धनपत उछल पड़े। अठारह रुपये महीने। माई गॉड। सपना तो नहीं।

धनपत की लॉटरी लग गई। एक हफ्ते के भीतर स्कूल में काम संभाल लिया। चुनार बनारस से क़रीब पचास किलोमीटर दूर मिर्ज़ापुर के पास था। पांच रुपये का एक ट्यूशन भी करने लगे याने तेईस रुपये महीने। आमदनी तो बढ़ी, लेकिन यह  देखकर चाची यानी सौतेली मां ने भी हाथ खोल दिए। हर महीने रुपयों का तकाज़ा कुछ इस अंदाज़ में होता मानो धनपत ने उनसे क़र्ज़ लिया हो। चाची ने अपने छोटे भाई को चुनार में धनपत के साथ रखा था। उनका खर्च भी उठाना पड़ता था। एक बार तो ऐसा हुआ कि धनपत घर आए और चाची को उनके खर्च के पैसे दिए। जो उनके लिए बचे पैसे थे वो भी संभाल कर रखने को दे दिए। धनपत ने सोचा कि अगर उन्होंने अपने पास पैसे रखे तो उन्हें बचा नहीं पाएंगे। जब छुट्टियां ख़त्म हुईं तो चाची से पैसे मांगे। उत्तर मिला, वो तो खर्च हो गए। धनपत परेशान। लौटने के लिए किराया तक न था। कड़ाके की ठंड। बाज़ार गए। दो रुपये में अपना गरम कोट बेचा, तब कहीं जाकर नौकरी पर पहुंच पाए। उमर तो 22 साल ही थी, लेकिन इस दौरान ज़िंदगी ने उन्हें पूरी उमर के भरपूर अनुभव दे दिए थे। इसी बीच धनपत राय की नौकरी इलाहाबाद के मॉडल स्कूल में लग गई। वो हेड मास्टर हो गए थे और वेतन था पच्चीस रुपये माह।

तीन महीने ही बीते थे कि तबादला कानपुर हो गया। चाची यानी सौतेली मां और वो पत्नी, जिससे उनका कोई रिश्ता न था, लमही में रह रही थीं। उनकी अपनी ज़िंदगी में ज़हर घुल गया था। पत्नी और चाची के झगड़ों के दो पाटों के बीच वो पिस रहे थे। रोज़ मरते और रोज़ जीते थे। घर के झगडे उन्हें रोज़ मार देते, लेकिन कानपुर के कुछ दोस्त उन्हें रोज़ ज़िंदा कर देते। यहां उन्हें एक ऐसा दोस्त मिला, जिससे उनका नाता आख़िरी सांस तक न छूटा। इस दोस्त ने ही दुनिया को मुंशी प्रेमचंद के रूप में नायाब तोहफा दिया। ये था साप्ताहिक ज़माना का मालिक-संपादक दया नारायण निगम। धनपत ज़माना के नियमित लेखक थे ही, निगम जी की कोठी में ही रहा करते थे। निगमजी शौक़ीन तबियत के इंसान थे।

घर में रोज़ महफ़िल जमती। अपने अपने फ़न में माहिर लोग इकट्ठे होते। धनपत को इन्ही महफ़िलों में कभी-कभी पीने की आदत भी पड़ गई। थोड़े वक़्त के लिए घर के तनाव से राहत मिल जाती। उधर, घर के झगड़े ख़त्म होने के बजाय बढ़ते ही जा रहे थे। एक दिन चाची और बीवी में इतनी लड़ाई हुई कि पत्नी ने गले में फाँसी लगा ली। आधी रात का वक़्त था। चाची ने देखा-मामला गड़बड़ है तो किसी तरह उन्हें फांसी के फंदे से उतारा। घबराए धनपत अगले दिन कानपुर से लमही पहुंचे । बीवी ने ज़िद पकड़ ली-मायके जाउंगी। यहाँ न रहूंगी। धनपत ने लाख मनाया। कोई फायदा न हुआ। हारकर धनपत ने कहीं से कुछ रुपयों का जुगाड़ किया और मायके भेज दिया। इसके बाद न बीवी लौटी और न धनपत ने कोई खबर ली।

रिश्ता टूट चुका था। हिन्दुस्तान में बहुत से घर इसलिए भी टूट जाते हैं कि शादी के बाद मायके वाले ससुराल में बेटी की ज़िंदगी में दखल देने का कोई मौका नहीं छोड़ते। पच्चीस साल के धनपत को ज़िंदगी का अकेलापन काटने लगा था। इसी संघर्ष ने मुंशी प्रेमचंद को एक कथाकार बनाया। इसके बाद एक बाल विधवा शिवरानी देवी से शादी की और आख़िरी सांस तक यह रिश्ता चला।

(मेरे संकलन बिखरा बचपन से)

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‘सराहनीय है डिजिटल अम्ब्रेला के नीचे शासन और सरकार का कदम’

क्या आप इस बात पर यकीन कर सकते हैं कि पेपरलेस वर्क कर कोई विभाग कुछ महीनों में चार करोड़ से अधिक की राशि बचा सकता है?

Last Modified:
Friday, 30 July, 2021
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मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ।।

क्या आप इस बात पर यकीन कर सकते हैं कि पेपरलेस वर्क कर कोई विभाग कुछ महीनों में चार करोड़ से अधिक की राशि बचा सकता है? सुनने में कुछ अतिशयोक्ति लग सकती है लेकिन यह सौ फीसदी सच है कि ऐसा हुआ है। यह उपलब्धि जनसम्पर्क संचालनालय ने अपने हिस्से में ली है। हालांकि यहां स्मरण करना होगा कि खंडवा सहित कुछ जिला जनसम्पर्क कार्यालयों को पेपरलेस बना दिया गया था। तब इस पेपरलेस वर्क कल्चर से कितनी बचत हुई, इसका लेखा-जोखा सामने नहीं आया था। कोरोना के कहर के बाद जनसम्पर्क संचालनालय ने सुध ली और पेपरलेस वर्क कल्चर को अमलीजामा पहनाकर खर्च में कटौती की तरफ अपना कदम बढ़ा दिया है। निश्चित रूप से इसे आप नवाचार कह सकते हैं। ऐसा भी नहीं है कि अन्य विभागों ने इस दिशा में कोई उपलब्धि हासिल नहीं की हो लेकिन उनकी ओर से ऐसे आंकड़े सार्वजनिक नहीं होने से आम आदमी को पता नहीं चल रहा है।

मध्यप्रदेश अपने नवाचार के लिए हमेशा चर्चा में रहा है लेकिन इस वक्त हम जिस नवाचार की बात कर रहे हैं, वह सुनियोजित नहीं है लेकिन अब वह दिनचर्या में शामिल हो गया है। नवाचार की यह कहानी शुरू होती है करीब दो वर्ष पहले कोरोना के धमकने के साथ। आरंभिक दिनों में सबकुछ वैसा ही चलता रहा और लगा कि बस थोड़े दिन की बात है लेकिन ऐसा था नहीं। कोरोना की दूसरी लहर ने जो कोहराम मचाया तो सब तरफ हडक़म्प मच गया। कोरोना के शिकार लोगों को इलाज, उनकी देखरेख और व्यवस्था बनाये रखने के लिए मुस्तैद अधिकारियों और कर्मचारियों को मोर्चे पर डटना मजबूरी थी। जिंदगी उनकी भी थी, डर उनके पास था। और इस डर ने एक संभावना को जन्म दिया। टेक्रालॉजी का यह नया दौर है और इस महामारी के पहले हम इस कोशिश में लगे थे कि पूरा तंत्र डिजिटल हो जाए लेकिन सौ फीसदी करने में तब वैसी रुचि लोगों की नहीं थी। आज भी सौ फीसदी डिजीटलीकरण नहीं हो पाया है, लेकिन डर से उपजी संभावना में जो जहां है, वहीं रुक गया और हाथों में कोई मोबाइल लिये तो कोई आइपैड तो कोई घर पर रहकर लैपटॉप से अपने दायित्व को पूरा कर रहा था। इस तरह से जो काम बीस वर्ष में नहीं हो पाया था, वह दो वर्ष में हो गया। इस डिजिटल अम्ब्रेला के नीचे पूरा शासन और सरकार आ गई है। बदलते जमाने के साथ हम अब चलने के लिए अब पूरी तरह से तैयार हैं बल्कि चलने लगे हैं।

इस डिजिटल सिस्टम ने पूरे तंत्र का चेहरा बदल दिया है। पेपरलेस जिस प्रक्रिया की बात हम करीब एक दशक से कर रहे थे लेकिन व्यवहार में संभव नहीं हो पा रहा था, जो अब संभव है।

डिजिटलकरण के पश्चात एक और बड़ी पहल यह हुई है कि हर माह अलग अलग विभागों की बैठक में झाबुआ से लेकर मंडला जिले के अधिकारी कभी राजधानी मुख्यालय भोपाल आते थे तो कभी संभागीय मुख्यालय में उन्हें शामिल होना पड़ता था। शासकीय दस्तूर के मुताबिक बैठक का परिणाम भले शून्य हो लेकिन भौतिक उपस्थिति लाजिमी थी। इस आवन-जावन में सब मिलाकर लाखों रुपए के डीजल-पेट्रोल, भत्ता और अन्य खर्चे होते थे। साथ में अधिकारी के जिला मुख्यालय में नहीं रहने से कई अनिवार्य कार्य रुक जाते थे, या टल जाते थे। यही प्रक्रिया जिला मुख्यालय में भी होती थी और जिले के भीतर आने वाले अधिकारी-कर्मचारी शामिल होते थे। लेकिन अब प्रशासन का चेहरा-मोहरा बदलने लगा है। कोई कहीं नहीं आ जा रहा है, सब अपने ठिकाने पर मुस्तैद हैं। ऑनलाइन मीटिंग हो रही है। चर्चा और फैसले हो रहे हैं। खर्चों पर जैसे कोई ब्रेकर लग गया है। एक किस्म से इसे आप अनुपात्दक व्यय भी कह सकते हैं, जो नियंत्रण में आ गया है। स्वागत-सत्कार में भी होने वाले खर्च लगभग समाप्त हो गए हैं। राजधानी के मंत्रालय से लेकर जिला और तहसील मुख्यालय में ही सब काम निपट जा रहा है। यह अपने आप में नवाचार है क्योंकि इससे होने वाली बचत का समुचित उपयोग किया जा सकेगा।

सरकार ने कोरोना महामारी के दरम्यान शासकीय कार्यालयों को पहले जुलाई तक पांच दिनी सप्ताह घोषित किया था, जिसे बढ़ाकर अब अक्टूबर 2021 तक कर दिया गया है। यह फैसला भी स्वागतयोग्य है। हालांकि कोरोना के पहले सरकार ने पांच दिवसीय कार्यालयीन सप्ताह के लिए सुझाव मांगे थे लेकिन अरुचि के चलते मामला ठंडे बस्ते में चला गया था लेकिन कोरोना ने एक पुरानी और सकरात्मक योजना को आरंभ कर दिया है। पहली नजर में यह पांच दिनी वर्किंग का कांसेप्ट थोड़ा ठीक नहीं लगता है लेकिन यह शासन और अधिकारी कर्मचारियों के लिए हितदायक है। तंत्र के स्तर पर देखें तो लगातार दो दिन कार्यालय बंद रहने से स्थापना व्यय में कमी आती है। संसाधनों की बचत होती है या कहें कि खर्च नियंत्रण में होता है। इन दो दिनों में अधिकारी-कर्मचारी अपने निजी कार्य पूर्ण कर सकते हैं और मानसिक रूप से रिलैक्स होते हैं। वैसे भी माह के दूसरे और तीसरे शनिवार को अवकाश होता ही है। तब केवल दो दिन की इसमें वृद्धि किया जाना अनुचित नहीं होता है। इन दो दिनों के कार्यदिवस में होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए कार्यालय का समय सुबह जल्दी और देर शाम तक कर पूर्ण किया जा सकता है। कई राज्यों में पहले से पांच कार्य दिवस प्रचलन में है।

इस तरह से हम मान सकते हैं कि कोरोना ने ना केवल आम आदमी की जिंदगी में परिवर्तन लाया बल्कि शासकीय तंत्र में भी बेहतर बदलाव की दिशा में प्रेरित किया है। यह तो निश्चित है कि आज नहीं तो कल, हमें डिजिटल दुनिया में सौ फीसदी प्रवेश करना है तो आज से क्यों नहीं। कुछ लोगों का कहना है कि यह असुविधाजनक है। मान लिया तो जो खरीददारी आप इंटरनेट के माध्यम से करते हैं, रेल-बस का किराया अनेक तरह के ऐप के माध्यम से करते हैं, तब क्या आपके लिए यह असुविधाजनक नहीं है। एक बार कोशिश करके देख लीजिए राह आसान हो जाएगी। सबसे बड़ी बात यह है कि समूचे तंत्र में पारदर्शिता आ जाएगी क्योंकि वर्क रिर्पोट करने से लेकर बिल जमा करने और भुगतान पाने की  सारी व्यवस्था ऑनलाइन है तो रिश्वतखोरी का कॉलम भी हाशिये पर चला जाएगा। इसलिए मध्य प्रदेश जिस तरह से डिजिटल अम्ब्रेला के नीचे आ गया है, वह सराहनीय है। अब जरूरत है कि अम्ब्रेला को ओपन कर सभी से कहा जाए आओ, थोड़ा थोड़ा डिजिटल हो जाएं।

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PoK पर इमरान खान के चुनावी बयान से पाकिस्तान में ही मचा बवाल: राजेश बादल

पाक अधिकृत कश्मीर में तो कश्मीरी कल्चर बचा ही नहीं। गुजिश्ता सत्तर-बहत्तर बरस में पाकिस्तान ने इस खूबसूरत वादी में समस्याओं के ढेर सारे पहाड़ उगा दिए हैं।

Last Modified:
Tuesday, 27 July, 2021
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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान नियाजी के एक बयान से वहां की सियासत में बवाल मचा हुआ है। यह बयान पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के बारे में था। इस हिस्से में पाकिस्तान अपने संविधान के हिसाब से चुनाव प्रक्रिया की औपचारिकता पूरी करता है। रविवार को इस क्षेत्र में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान हुआ था।

यह मतदान विधानसभा की 53 सीटों के लिए हुआ था। इनमें आठ सीटों पर सदस्यों का चुनाव मनोनयन से होता है। आठ में से पांच महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। मतदान से पहले इमरान खान अपनी पार्टी का प्रचार करने के लिए वहां पहुंचे थे। बड़बोलेपन और अपने बयानों के लिए यूटर्न लेने के लिए उपहास का केंद्र बन चुके इमरान ने ऐसा वादा कर दिया जो वहां के संवैधानिक जानकारों के हिसाब से कभी संभव ही नहीं है।

जाहिर है कि प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी की स्थिति मजबूत करने के लिए ऐसा कहा होगा। लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं होगा कि उनका यह भाषण उनके लिए मुसीबत बन जाएगा। कमोबेश सारी विपक्षी पार्टियों ने इमरान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है कि उन्होंने संवैधानिक पद पर रहते हुए संविधान की भावना के विरुद्ध लोगों को उकसाया। 

दरअसल इमरान ने शुक्रवार को कहा कि दो जनमत संग्रह कराए जाएंगे। पहले संग्रह में लोगों से यह पूछा जाएगा कि वे पाकिस्तान में रहना चाहते हैं या भारत के साथ जाना चाहते हैं। दूसरे जनमत संग्रह में अवाम से राय ली जाएगी कि वह पाकिस्तान में विलय पसंद करेगी या फिर आजादी चाहती है। लेकिन पाक अधिकृत कश्मीर का जो संविधान है, उसमें प्रत्येक राजनीतिक दल के लिए कहा गया है कि वे पाकिस्तान में विलय के अलावा कोई और बात कर ही नहीं सकते।

इतना ही नहीं, हर निर्वाचित विधायक को यह शपथ पत्र देना होता है कि वह पाकिस्तान में विलय का समर्थन करता है। यह एक किस्म से जबरिया समर्थन लेने की श्रेणी में आता है। इमरान खान ऐसा करके पाकिस्तानी संविधान को ही चुनौती देते दिखाई देते हैं।

उस संविधान का अनुच्छेद-257 कहता है कि कश्मीरी जनता पाकिस्तान में अपने विलय का फैसला करेगी (उनके संविधान में इसे पूरा जम्मू-कश्मीर कहा गया है) तो उस राज्य की तकदीर का फैसला जनता की इच्छा का सम्मान करते हुए किया जाएगा। एक तरफ मुल्क का संविधान जन भावनाओं का सम्मान करता दिखाई देता है तो दूसरी ओर कश्मीर के अपने संविधान में शर्त रखता है कि किसी नागरिक को पाकिस्तान में विलय के खिलाफआवाज उठाने की आजादी नहीं है।

असुरक्षित पाकिस्तान को वहां के निर्वाचित विधायकों से एक हलफनामा भरवाने की जरूरत क्या है कि वे खुद को पाकिस्तानी ही मानें। अब हकीकत पर आइए। असलियत यह है कि वहां देश और प्रदेश का संविधान कोई मायने नहीं रखता। पाक अधिकृत कश्मीर की तथाकथित विधानसभा के नवनिर्वाचित सदस्य अपने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं।

कायदे से उन्हें ही इस क्षेत्र और आबादी के बारे में अंतिम निर्णय करना चाहिए क्योंकि वे अवाम के नुमाइंदे हैं। लेकिन ऐसा नहीं होता। यह कठपुतली सरकार ही होती है क्योंकि इसके ऊपर पाकिस्तान ने एक कश्मीर काउंसिल बनाई है। इसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं। इसमें 14 सदस्य होते हैं। इनमें छह सदस्य पाकिस्तानी हुकूमत मनोनीत करती है।

शेष आठ में से एक पाक अधिकृत कश्मीर के प्रधानमंत्री और सात निर्वाचित असेंबली के मेंबर होते हैं। यानी वे एक तरह से पाकिस्तान सरकार के रबर स्टांप ही हैं। बात यहीं समाप्त नहीं होती। सच तो यह है कि कश्मीर काउंसिल भी दिखावा ही है। इसके ऊपर पाकिस्तान की फौज है, जिसका पूरे इलाके की कानून और व्यवस्था पर नियंत्रण है। उसके इशारे के बगैर वहां पत्ता भी नहीं खड़कता।

इस तरह वहां की सरकारों का अस्तित्व इतना ही है कि उसके चुने हुए प्रतिनिधि गाड़ी-घोड़े का सुख लेते रहें और जब भी, जहां भी हुकूमत कहे, अपने दस्तखत कर दें।

ऐसे घनघोर अलोकतांत्रिक प्रशासन तंत्र के बाद भी इमरान खान आम आदमी से वादा करते हैं कि वहां दो बार जनमत संग्रह कराया जाएगा। तो क्या इसका अर्थ यह है कि जनमत संग्रह वाकई होगा? कभी नहीं। इसका मकसद सिर्फ अंतरराष्ट्रीय बिरादरी और अवाम को बुद्धू बनाना तथा अपने दल का वजूद कायम करना है।

यह तो इमरान भी जानते हैं कि जनमत संग्रह हुआ तो लोग भारत में विलय के हक में राय प्रकट करेंगे। गुजिश्ता सत्तर-बहत्तर बरस में पाकिस्तान ने इस खूबसूरत वादी में समस्याओं के ढेर सारे पहाड़ उगा दिए हैं। विकास के नाम पर आज भी कबीला-संस्कृति चल रही है।

गैस और बिजली के मुद्दे पर वहां चुनाव प्रचार होता है। शिक्षा, सेहत, रोजगार, खेती, सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक पिछड़ापन जैसे मसले लोगों को सालते हैं। वे भारत जैसे विकास की बात नहीं करते। वे तो अपने नेताओं से कहते हैं कि इस घाटी को लाहौर या इस्लामाबाद जैसा ही बना दो। जिस मानव अधिकार की बात पाकिस्तान भारतीय कश्मीर के बारे में करता है, वह अपने कब्जे वाले कश्मीर की दुर्दशा ही देख ले।

हिंदुस्तान में अभी भी कश्मीरियत की खुशबू आती है। वहां अन्य राज्यों का दखल न के बराबर है। मगर पाक अधिकृत कश्मीर में तो कश्मीरी कल्चर बचा ही नहीं। वे कुछ-कुछ पंजाबी, कुछ सिंधी, कुछ पठानी और बहुत सारी चीनी संस्कृति के आक्रमण का मुकाबला कर रहे हैं। इमरान खान किस दम पर जनमत की बात करते हैं?

(साभार: लोकमत समाचार)

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मिस्टर मीडिया: पत्रकारिता को कुचलने के नतीजे भी घातक होते हैं!

देश के सबसे अधिक संस्करणों वाले समाचारपत्र ‘दैनिक भास्कर’ और लखनऊ के प्रादेशिक टीवी चैनल ‘भारत समाचार’ पर आयकर विभाग के छापे सुर्खियों में हैं।

राजेश बादल by
Published - Friday, 23 July, 2021
Last Modified:
Friday, 23 July, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।   

देश के सबसे अधिक संस्करणों वाले समाचारपत्र ‘दैनिक भास्कर’ और लखनऊ के प्रादेशिक टीवी चैनल ‘भारत समाचार’ पर आयकर विभाग के छापे सुर्खियों में हैं। किसी कालखंड में समाज की परिस्थितियों के बारे में सही चित्रण ही उस पत्रकारिता को अनमोल बनाता है। कोरोना काल में ‘दैनिक भास्कर‘ ने कुछ ऐसी ही मिसाल पेश की है। अब उत्तर प्रदेश समेत कुछ प्रदेशों में विधानसभा चुनाव हैं, जिसमें इस तरह की पत्रकारिता सत्तारूढ़ दल के लिए परेशानी का सबब बन सकती थी।

यह भारतीय जनता पार्टी के अस्तित्व के लिए बड़ी चुनौती है, क्योंकि प्रधानमंत्री इसी राज्य से चुने गए सांसद हैं। वैसे भी उत्तर प्रदेश एक ‘महादेश‘ ही है। इस प्रदेश में हुकूमत का हिलना गंभीर चेतावनी है। पिछले दिनों बंगाल में साम, दाम, दंड, भेद अपनाने के बाद भी बीजेपी की जैसी पराजय हुई है, वह पार्टी के लिए सबक है। इसलिए एक बार फिर उत्तर प्रदेश में पार्टी अपना किला ढहते नहीं देखना चाहेगी। आयकर छापे हमें इसी संदर्भ में देखने चाहिए।

इन छापों के बारे में एक वर्ग कह रहा है कि इस समाचार पत्र समूह के कई धंधे हैं। उनमें गड़बड़ी हो तो अखबार की आड़ में कैसे माफ किया जा सकता है। इस सच से कोई इनकार नहीं कर सकता, मगर यह भी संविधान में नहीं लिखा है कि अखबार का मालिक कोई अन्य उद्योग नहीं चला सकता। आजादी के बाद बिड़लाजी का ‘हिंदुस्तान टाइम्स‘ फला-फूला तो ऐसी किसी छद्म नैतिकता में उन्होंने धंधे तो बंद नहीं किए।

एक जमाने में ‘चौथी दुनिया‘,‘संडे ऑब्ज़र्वर‘ और ‘संडे मेल‘ जैसे असरदार अखबार औद्योगिक घरानों ने ही निकाले थे। उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम चारों दिशाओं से आज भी ऐसे पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित हो रहे हैं, जिनका स्वामित्व उद्योगपतियों के हाथों में है। बताने की जरूरत नहीं कि इनमें अनेक बीजेपी के समर्थन की धुन भी बजाते हैं।

तो प्रश्न टाइमिंग का है। आयकर के छापे किसी के चोर होने का प्रमाण नहीं हैं। कितने अफसरों, कर्मचारियों, उद्योगों और कारोबारियों पर छापे पड़ते हैं। दो-चार अपवाद छोड़ दें तो आज तक किसी को दंड नहीं मिला। जाहिर है ऐसे मामलों का निपटारा भी दंड-शुल्क भरकर हो जाता है। फिर भी मैं किसी अपराध का समर्थन नहीं करता, पर जिस कालखंड में यह छापे पड़े हैं, वे मन में संदेह पैदा करते हैं। सवाल यह भी पूछा जा सकता है कि सरकार को किसका डर सता रहा है। केंद्र और उत्तर प्रदेश में बीजेपी पूर्ण बहुमत से सरकार में बैठी है। उसे चिंतित क्यों होना चाहिए?

सियासी पंडित और मीडिया विश्लेषकों की राय है कि निकट भविष्य में चुनाव, कोरोना काल में नाकामी, पेगासस जासूसी कांड में संतोषजनक उत्तर नहीं, बंगाल चुनाव से उत्साहित ममता बनर्जी का विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास और सरकार का अंतर्राष्ट्रीय डिजिटल मीडिया प्रतिष्ठानों से रार ठान लेना ऐसे उदाहरण हैं, जो हुकूमत को हिलाने की ताकत रखते हैं। सरकार इस सच से भाग नहीं सकती कि उसकी झोली में फिलहाल उपलब्धियों के नाम पर ऐसा ठोस कुछ नहीं है, जिसके आधार पर चुनाव वैतरणी पार की जाए। अगर खाते में उपलब्धियां नहीं हैं तो कम से कम आलोचना के जरिये सही तस्वीर मतदाताओं तक नहीं पहुंचे-यह कोशिश तो वह कर ही सकती है।

लेकिन यह निष्कर्ष निकालने में कोई संकोच नहीं है कि भारत ही नहीं, संसार भर में जब जब किसी सरकार ने पत्रकारिता का गला घोंटने का प्रयास किया, तो उसे नुकसान ही उठाना पड़ा है। अमेरिका के राष्ट्रपति रहे डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पूरे कार्यकाल में जिम्मेदार पत्रकारों और मीडिया प्रतिष्ठानों से शत्रुता बनाए रखी। परिणाम यह कि वे ‘ढेर‘ हो गए। भारत में इंदिरा गांधी ने 1971 में चुनाव जीता, लेकिन आपातकाल और प्रेस सेंसरशिप ने अगले चुनाव में उन्हें ‘निपटा‘ दिया। ‘नई दुनिया‘ अखबार ने संपादकीय स्थान खाली रखा। क्षति सरकार को हुई। ‘नई दुनिया‘ और इसके प्रधान संपादक अगले अनेक वर्षों तक पत्रकारिता की मुख्य धारा के केंद्र में रहे। बिहार में 1983 में जगन्नाथ मिश्र प्रेस बिल लाए। बाद में उन्हें वापस लेना पड़ा।

राजीव गांधी प्रचंड बहुमत से सत्ता में आए थे। वे मानहानि विधेयक लाए थे। वह भी उन्हें वापस लेना पड़ा। उसके बाद चुनाव में बोफोर्स सौदे का ‘प्रेत‘ उनके पीछे लगा। पत्रकारिता ने साथ नहीं दिया। नतीजा, सरकार ही चली गई। चंद्रशेखर ने ‘नवभारत टाइम्स‘ समूह से पंगा लिया और जासूसी के एक पिलपिले कारण से उनकी सरकार चली गई। एक जमाने में किशोर कुमार और जगजीत सिंह जैसे कलाकारों पर रेडियो और दूरदर्शन पर पाबंदी लगा दी गई थी। आज भी ये कलाकार लोगों के दिलों पर राज कर रहे हैं। पाबंदी लगाने वालों को कोई नहीं जानता। इसलिए डरकर निष्पक्ष और संतुलित पत्रकारिता नहीं करने की कोई वजह नहीं है। एजेंडा पत्रकारिता से बचिए। चाहे वह किसी के पक्ष में हो या किसी के खिलाफ हो मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

निजी हित के नाम पर पेशे की पवित्रता को ताक में नहीं रखा जा सकता मिस्टर मीडिया!

इस तरह की आजादी ही असल जम्हूरियत की निशानी है, यह बात ध्यान में रखने की है मिस्टर मीडिया!

हमारी पत्रकारिता को यह कैसी सनसनी का रोग लग गया है मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: राजद्रोह की चाबुक अब बेमानी हो गई है!

पत्रकारिता में हो रही इस गंभीर चूक को कैसे रोका जाए मिस्टर मीडिया?

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भारत के नजरिये से यह खुलासा वाकई चिंता में डालने वाला है: राजेश बादल

दो बरस पहले नवंबर महीने में पेगासस के जरिये भारत में जासूसी पर चिंताएं प्रकट की गई थीं। यानी ठीक उन्हीं दिनों हमें पता लग गया था, जब यह असंवैधानिक और आपराधिक कृत्य किया जा रहा था।

Last Modified:
Tuesday, 20 July, 2021
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

हम अपना तंत्र क्यों नहीं सुधारना चाहते 

दो बरस पहले नवंबर महीने में पेगासस के जरिये भारत में जासूसी पर चिंताएं प्रकट की गई थीं। यानी ठीक उन्हीं दिनों हमें पता लग गया था, जब यह असंवैधानिक और आपराधिक कृत्य किया जा रहा था। यही नहीं, संसद में यह मामला उठा था। राज्यसभा में 28 नवंबर 2019 को कांग्रेस ने इस पर सरकार से सफाई मांगी थी। तत्कालीन इलेक्ट्रॉनिकी तथा सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सदन में उत्तर दिया था। उस समय भी जासूसी की इन खबरों का आकार विकराल था और आज भी ताजा खुलासे के बाद हमारे अपने तंत्र पर सवाल उठ रहे हैं। अंतर इतना है कि उस समय अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव नहीं हुए थे।

इजरायली सॉफ्टवेयर पेगासस बनाने वाली कंपनी एनएसओ कहती है कि उक्त सॉफ्टवेयर सिर्फ लोकतांत्रिक मुल्कों को उनके राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए मुहैया कराया गया है। इसका मकसद सिर्फ अपराधियों, कानून तोड़ने वालों, उग्रवादी संगठनों तथा माफिया गिरोहों से निपटने में किया जाना है। कंपनी के इस मासूम तर्क पर क्या कहा जाए। जिस दिन इस सॉफ्टवेयर का जन्म हुआ होगा, उस दिन से ही स्पष्ट है कि यह नकारात्मक हथियार है और हुकूमतें इसका दुरुपयोग विरोधियों से निपटने में करेंगी। समीकरण समझने हों तो कहा जा सकता है कि अमेरिका और इजरायल के रिश्ते छिपे हुए नहीं हैं। सूचनाएं उस दौर की हैं, जब डोनाल्ड ट्रंप गद्दी पर विराजमान थे और हिन्दुस्तान के बड़े प्रिय थे। वाशिंगटन पोस्ट, गार्जियन तथा इस खुलासे में शामिल संस्थानों के वे कट्टर आलोचक रहे हैं। इन संस्थानों की उनसे कभी नहीं बनी। ट्रंप अगले चुनाव के लिए अत्यंत गंभीर मुद्रा में नजर आते हैं तो जो बाइडेन को क्या करना चाहिए? मैं इसका यह अर्थ लगाने के लिए आजाद हूं कि ट्रंप के प्रिय राष्ट्रों की सरकारें बदनाम और अलोकप्रिय हो जाएं और फिर अगले चुनाव तक डोनाल्ड ट्रंप को सहायता नहीं दे सकें- यह भी इस खुलासे का एक अपवित्र उद्देश्य हो सकता है।ऐसे में उस दौर की सूचनाएं उजागर करने का अर्थ यह है कि पेगासस जासूसी प्रसंग का अंतर्राष्ट्रीय फलक बहुत विकराल है। हिन्दुस्तान तो उसमें एक छोटा सा हिस्सा भर है।    

भारत के नजरिये से यह खुलासा वाकई चिंता में डालने वाला है। यहां के अनगिनत लोगों की जिंदगी के राज फोन से उजागर होते हैं तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है? आम आदमी इजरायल के किसी जासूसी सॉफ्टवेयर का निशाना बन जाए तो नागरिकों  के पास मुकाबले के लिए कोई संसाधन और तकनीकी काबिलियत नहीं है। मान लीजिए अगर वह सक्षम भी हो तो इस अपराध से लड़ाई उसे क्यों लड़नी चाहिए। खास तौर पर उस हाल में, जबकि उसने अपने बेहद ताकतवर हथियार यानी वोट के माध्यम से मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए अपनी सरकार को ही अधिकृत कर दिया हो।

गंभीर मसला यह नहीं है कि सरकार उस पत्रकार, राजनेता, विचारक या किसी आलोचक के हक की हिफाजत कर पाएगी या नहीं। महत्वपूर्ण तो यह है कि क्या भारतीय सरकारी तंत्र भी इस जुर्म में शरीक है। यदि ऐसा है तो इसकी क्या गारंटी है कि जिस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल सरकारी तंत्र ने अपने आकाओं के आलोचकों पर शिकंजा कसने के लिए किया है, कल के रोज उस सॉफ्टवेयर का निशाना भारतीय सुरक्षा से जुड़ी संवेदनशील सूचनाओं को समंदर पार भारत के शत्रु देशों तक पहुंचाने में नहीं होगा। एक प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री, सेनाप्रमुख और परमाणु कार्यक्रमों से जुड़े विशेषज्ञों की जानकारियां भी सुरक्षित नहीं रहेंगीं। यदि ऐसा हुआ तो सभ्य लोकतंत्र में निर्वाचित हुकूमत के लिए इससे बड़ी नाकामी और कुछ नहीं हो सकती। व्यक्ति के तौर पर एक संपादक अपने मौलिक अधिकारों का कुचला जाना एक बार बर्दाश्त कर सकता है, लेकिन जिस दिन देश कुचला जाएगा, उस दिन कोई हुकूमत भी नहीं बचेगी। कहने में हिचक नहीं कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इन दिनों जो साजिशें चल रही हैं, उनका मुकाबला करने के लिए भारत की तैयारी अभी अत्यंत कच्ची और कमजोर है।

यक्ष प्रश्न है कि क्या दुनिया भर की सरकारों की तरह भारत सरकार के इशारे पर यह खुफियागीरी कराई गई है? भारतीय लोकतंत्र में यह कोई नई और अनूठी बात नहीं है। अतीत में इसकी कुछ मिसालें हैं। एक प्रधानमंत्री तो इस मुद्दे पर अपनी सरकार ही खो चुके हैं। इस तरह की जासूसी को भारतीय समाज ने कभी भी मान्यता नहीं दी है। जिस सरकार या व्यक्ति ने ऐसा किया, उसे इस हरकत से क्षति पहुंची है। लाभ कुछ नहीं हुआ। भारतीय संविधान इसकी अनुमति नहीं देता कि चुनी हुई सरकार लोगों की जीवन शैली, आस्था, लोक व्यवहार, गुप्त क्रियाओं, धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक उत्सवों की खुफिया निगरानी करे। यह निहायत जंगली, अभद्र, अशालीन और अमर्यादित आचरण है। भारतीय समाज इसे जायज नहीं मानेगा।

दुनिया के तमाम देश इस पर क्या करते हैं, चर्चा बेमानी है। वैसे भारतीय कानून इस बात की इजाजत तो देता है कि वह किसी की जासूसी अथवा फोन की रिकॉर्डिंग कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति या संस्था ऐसे अपराधों में लिप्त है, जो भारतीय अखंडता-एकता को नुकसान पहुंचा सकता है तो उसे उजागर करने से कौन रोकना चाहेगा। यदि कोई आतंकवादी षड्यंत्र का भंडाफोड़ होता है तो उस पर किसे एतराज़ हो सकता है।

भारत के वित्तीय, सामाजिक और राजनीतिक ढांचे को कोई ताकत क्षतिग्रस्त करना चाहे तो उसके खिलाफ सारा देश अपनी सरकार का साथ देगा। लेकिन संदेह की सुई उस तंत्र की ओर इशारा कर रही हो, जो हमारे हित संरक्षण के लिए बनाया गया है तो फिर अंजाम की कल्पना की जा सकती है। इसके बावजूद भारत में जासूसी षड्यंत्र के पीछे के इरादों की जानकारी अवाम को पाने का अधिकार है। मुल्क इस पर केंद्र सरकार से स्पष्टीकरण की मांग करता है। ऐसा नहीं करने पर उसे लोगों की जलती निगाहों का सामना करना पड़ेगा।

(साभार: लोकमत समाचार)

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निजी हित के नाम पर पेशे की पवित्रता को ताक में नहीं रखा जा सकता मिस्टर मीडिया!

चंद रोज पहले मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने ‘कानून का राज’ विषय पर एक कार्यक्रम को संबोधित किया। उन्होंने इस दौरान एक बात बड़े मार्के की कही।

राजेश बादल by
Published - Monday, 12 July, 2021
Last Modified:
Monday, 12 July, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

चंद रोज पहले मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने ‘कानून का राज’ विषय पर एक कार्यक्रम को संबोधित किया। उन्होंने इस दौरान एक बात बड़े मार्के की कही। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कई बार सोशल मीडिया पर लोगों की भावनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। लेकिन न्यायपालिका को यह ध्यान रखना चाहिए कि इस मंच पर अभिव्यक्त शोर इस बात का सबूत नहीं है कि वह सही है और बहुमत क्या मानता है? ऐसे में यह चर्चा करना आवश्यक है कि कहीं सोशल मीडिया पर प्रस्तुत होने वाले रुझान संस्थानों को तो प्रभावित नहीं करते। इन सबसे न्यायाधीशों को अपनी राय पर कोई असर नहीं पड़ने देना चाहिए। इस नजरिये से चीफ जस्टिस का बयान साहसिक है और समाज के समर्थन की मांग करता है। 

बात बिलकुल सही है। बीते एक दशक में हमने देखा है कि सोशल और डिजिटल मीडिया के तमाम अवतारों पर अनेक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इसके अलावा कुछ सामाजिक और सियासी मसलों पर सच्चाई से परे कहानियां गढ़कर भावनाओं को भड़काने वाले अंदाज में परोसा जाता है। यह सिलसिला अभी भी जारी है। पूर्वाग्रही लोगों की ओर से इतिहास की घटनाओं और चरित्रों के बारे में काल्पनिक घटनाएं और कथाएं रची जाती हैं।

इनका हकीकत से कोई नाता नहीं होता। फिर वे भावुक अंदाज में अपील करते हैं कि इसे देश भर में फैला दो। यह समूचे राष्ट्र,जाति या धर्म के हित में है। इसके बाद मीडिया के मंचों की रगों में ये झूठी, आधारहीन और शरारती सूचनाएं दौड़ने लगती हैं। समाज का एक बड़ा वर्ग उस पर अपनी राय या रुझान बना लेता है। यह घातक है। मुख्य न्यायाधीश ने ठीक ही कहा कि कपोल कल्पित रुझानों पर जजों को क्यों भरोसा करना चाहिए। उनकी जगह रद्दी की टोकरी ही है।

अब सवाल यह है कि सोशल मीडिया की इन सूचनाओं का क्या पत्रकारिता से कोई संबंध है? दुर्भाग्य से यह धारणा बनती जा रही है कि वॉट्सऐप विश्वविद्यालय, फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर और अन्य प्लेटफॉर्मों पर जो बातें कही या दिखाई जाती हैं, वे सीधे अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ती हैं और यह एक किस्म की पत्रकारिता ही है। पर यह सच नहीं है। कोई कितनी ही व्याख्या कर ले-इन विकृत-भ्रामक, अराजक सूचनाओं की जहरीली फसल को पत्रकारिता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

एक पानवाले से लेकर किराना व्यापारी तक और मजदूर से लेकर मालिक तक, डॉक्टर से लेकर वकील तक, अफसर से लेकर राजनेता तक लगभग सब इन माध्यमों का उपयोग-दुरुपयोग करते हैं। यह आवश्यक नहीं कि वे कूटनीति, इतिहास और राजनीतिक अतीत के जानकार हों। विडंबना है कि भारतीय शिक्षा पद्धति उन्हें अच्छा प्रोफेशनल तो बनाती है, पर देश के प्रति जिम्मेदार और इतिहास का जानकार नहीं बनाती। इसलिए आसानी से वे भ्रामक सूचनाओं के जाल में उलझ जाते हैं।

इस तरह यह जहर हमारे दिल, देह और दिमाग में दौड़ता रहता है। मुझे यह स्वीकार करने में भी कोई हिचक नहीं कि पत्रकारों का एक पूर्वाग्रही तबका भी इस झांसे में आ जाता है। कस्बाई और आंचलिक पत्रकारिता में ही नहीं,  महानगरों में भी तथ्यों की गहन जांच पड़ताल किए बिना कुछ पत्रकार इन नकली तथाकथित समाचारों को विस्तार देने का काम जाने-अनजाने कर जाते हैं। हो सकता है कि इसमें उनका कुछ निजी हित भी हो। मगर निजी हित के नाम पर पेशे की पवित्रता को ताक में नहीं रखा जा सकता मिस्टर मीडिया!        

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

इस तरह की आजादी ही असल जम्हूरियत की निशानी है, यह बात ध्यान में रखने की है मिस्टर मीडिया!

हमारी पत्रकारिता को यह कैसी सनसनी का रोग लग गया है मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: राजद्रोह की चाबुक अब बेमानी हो गई है!

पत्रकारिता में हो रही इस गंभीर चूक को कैसे रोका जाए मिस्टर मीडिया?

भारतीय पत्रकारिता को मुख्य न्यायाधीश को शुक्रिया तो कहना ही चाहिए मिस्टर मीडिया!

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'अधूरा रह गया दिलीप साहब के साथ वह इंटरव्यू...'

अनुभवी अभिनेता दिलीप कुमार जी के निधन के बारे में जानकर मन भर आया। उनके अभिनय की अनूठी शैली पीढ़ियों तक फिल्म प्रेमियों के बीच याद की जाती रहेगी

Last Modified:
Wednesday, 07 July, 2021
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निर्मलेंदु वरिष्ठ पत्रकार ।।

अनुभवी अभिनेता दिलीप कुमार जी के निधन के बारे में जानकर मन भर आया। उनके अभिनय की अनूठी शैली पीढ़ियों तक फिल्म प्रेमियों के बीच याद की जाती रहेगी। मैंने उनकी लगभग सभी फिल्में देखी हैं। ज्यादातर फिल्मों में एक आदर्शवान चरित्र को जीने वाले इस अभिनेता से मैंने बहुत कुछ सीखा है। उनकी फिल्मों की न केवल कहानी से मैं प्रेरित रहता था, बल्कि संवाद से भी मैं बहुत कुछ सीखता था। अभिनय के फील्ड में मेरे गुरु रहे दिलीप साहब। संगीत के क्षेत्र में मेरे गुरु रहे मोहम्मद रफी साहब और जीवन के कर्मकांड में मेरे गुरु रहे सुरेंद्र प्रताप सिंह, जिन्हें लोग प्यार से एसपी कहते थे। इन तीनों के कारण ही मैं आज यहां तक पहुंचा हूं। मैं इन्हीं लोगों को देखकर सीखता और आज भी सीख रहा हूं।

बात सन 1998 की है। शायद अगस्त या सितबर माह था। मैं उन दिनों अमर उजाला के मुंबई ब्यूरो का ब्यूरो चीफ था। मैं दिलीप साहब का फैन ही नहीं, मुरीद भी हूं। दीवाना हूं। ऐक्टिंग के फील्ड में मैं उन्हें अपना गुरु मानता हूं, इसलिए मुंबई पहुंचते ही मेरी उनसे मिलने की इच्छा बढ़ गई। उनसे मिलने की प्रक्रिया यही थी कि उन्हें मुझे फैक्स भेजना पड़ेगा। वह स्वीकृति देंगे और समय भी तय कर देंगे। लेकिन फैक्स यहां से तो उनके पास पहुंच गया, लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं आया। मैं विचलित था। समझ में नहीं आ रहा था कि किससे कहूं। तभी किसी ने मुझे कहा कि पाठक जी, जो कि पीआर का काम करते थे, उन्हें कहें। पाठक जी का पूरा नाम है आर.आर. पाठक। मुंबई में वह मेरे अच्छे दोस्त बन गये थे। वह मुझे 12 सालों से जानते थे। उनसे कहते ही बात बन गई। यह वाक्या आज से 23 साल पहले का है।

पाली हिल में उनके रिहाइशखाने में पहुंचे, तो दरवाजे पर दो पठान जैसे पहरेदार मिल गये। उन्हें देखते ही एहसास हो गया कि हम किसी खास व्यक्ति से मिलन आये हैं। पाठक जी को देखते ही उन्होंने मुस्कुराकर दरवाजा खोल दिया। दाहिने हाथ में एक बड़े से हॉल में ले गये और बिठा दिया। शायद पांच मिनट बाद ही सायरा बानो आयीं और झुककर नमस्ते करते हुए कहा, साहब अभी आ रहे हैं, तब तक आप चाय पीजिए। सायरा बानो से मिलकर लगा वह भी हमारी तरह आम इंसान ही हैं। कुछ सोच रहा था कि तभी चाय आ गई। चाय पी ही रहे थे कि एक आवाज आई, पाठक जी बहुत दिनों बाद आप तशरीफ ले आये। क्या बात है भाई, कभी मेरी गली में भी चक्कर लगा जाया करो। कहते हुए सामने बैठ गये। दिलीप साहब ने पाठक जी से पूछा, मेरी ओर इशारा करते हुए, इस शख्स का परिचय, पाठक जी ने जवाब दिया, आपका एक जबरदस्त फैन, जो कि पेशे से पत्रकार भी हैं। पत्रकार का नाम सुनते ही दिलीप साहब उछलते हुए बोले, अरे बाप रे बाप..., पता नहीं यह पत्रकार क्या क्या हमसे कुरेदकर ले जाएंगे। मैंने उनकी ओर देखा और अदब से झुक कर नमस्ते की और कहा, कुरेदेंगे नहीं, केवल यादों को टटोलेंगे। इस पर उनकी जो हंसी थी, वह इतनी तेजी से गूंजी कि मुझे राम और श्याम के एक किरदार की याद आ गई। श्याम का किरदार, जो कि हंसी ठिठोली करता, कभी मुस्कुराता, तो कभी गाता... कभी होटल में खा पीकर पैसे नहीं देता, कभी गाता... राम की लीला रंग लाई, श्याम ने बंसी बजाई... या फिर कभी गाता... आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले, कल तेरी बज़्म से दीवाना चला जाएगा...

दरअसल, जब इस गीत की चर्चा मैंने की, तो उन्होंने हंसते हुए जवाब दिया कि हां, गाने से पहले मेरा एक चांटे के साथ जोरदार स्वागत भी हुआ था। वहीदा ने कस के चाटा मारा था। फिर समझाते हुए कहा, हालांकि मैंने ही उन्हें कसकरके चांटा मारने के लिए कहा था, ताकि चांटों की गूंजी चारों ओर सुनाई दे। दिलीप साहब ने आगे कहा, हम कलाकार हैं, जब तक हम कैरेक्टर में नहीं घुसते, तब तक ऐक्टिंग नहीं निखरती। तभी मेरे मन में एक प्रश्न ने अंगड़ाई ली और मैंने पूछ ही लिया... आपने कभी विज्ञापन की दुनिया में काम क्यों नहीं किया? जवाब में उन्होंने कहा, मैं भाड़ नही हूं, एक्टर हूं जनाब, शुद्ध एक्टर और यह कहते हुए वह स्वयं गाने लगे... ये मेरा दीवानापन है, या मुहब्बत का सुरूर, तू न पहचाने तो है ये, तेरी नजरों का कुसूर। दरअसल, इस गीत के माध्यम से वह कहना ये ही चाह रहे थे कि यह उनकी मर्जी है। वह विज्ञापन के लिए काम करें या न करें, उनकी मर्जी।

मैंने इस गीत से संबंधित एक प्रश्न पूछ लिया कि आप तो रफी साहब से ही इस गीत को गवाना चाहत थे, लेकिन अंततः मुकेश को इस गीत को गाने का मौका कैसे मिल गया। उनका जवाब था, शंकर जयकिशन की कोशिश अच्छी थी। जब गाना मैंने सुना, तो मुझे लगा कि वही इस गीत के साथ न्याय कर सकते हैं। इसके बाद मैंने दिलीप साहब से पूछा कि आपने मदर इंडिया क्यों ठुकरा दी? प्रश्न पूछने के बाद पहले तो उन्होंने मुझे घूर कर देखा, थोड़ी देर तक मंद-मंद मुस्कुराते हुए बोले... बरखुरदार जो मेरी दो फिल्मों में पहले हीरोइन थीं, वह मेरी मां कैसे बन सकती हैं। मां बहुत बड़ी चीज होती हैं जनाब। मैं वह भावना कहां से लाता, मुझे लगा कि यह किरदार के साथ बेईमानी होगी। हां, यह सच है कि जब महबूब खान ने मुझे स्क्रिप्ट सुनाई, तो मैं हतप्रभ रह गया। लेकिन बेटे का रोल न बाबा न... एक्टिंग करते हुए कहा, कैसे मैं नरगिस को मां कहूंगा। दिल ने गंवारा नहीं किया। अब आप ही बताएं कि फिल्म मेला और बाबुल में नरगिस के साथ खुलेआम रोमांस करने के बाद लोग मुझे उस किरदार में एक्सेप्ट करते क्या। उनसे पूरी बातचीत नहीं हो पाई कि हमें लौट कर आना पड़ा, क्योंकि अचानक दिलीप साहब के घर में एक फोन आया कि उनके किसी जानने वाले का इंतकाल हो गया। तो हमारी इच्छा पूरी नहीं हुई और हम वापस दफ्तर लौट आये।

फिल्मों के प्राणाधार दिलीप साहब

एक तरफ जहां, ‘मधुमती’ में मुकेश, सुहाना सफर और यह मौसम हंसी, हमें डर हैं कि हम खो न जाए कहीं... गीत से दिलीप साहब की आवाज बनकर उभरे, तो वहीं जब जरूरत महसूस हुई, तो रफी साहब ने इस गीत को गाकर ... टूटे हुए ख्वाबों ने हमको यह सिखाया है, दिल ने जिसे चाहा था, ... अब समझने वाली बात है कि ये दोनों गाने अलग अलग जॉनर के हैं, लेकिन जब दिलीप साहब की आवाज बनती है, तो कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि दिलीप साहब नहीं गा रहे हैं।

नया दौर (1957), मधुमती (1958), यहूदी (1958), पैगाम (1959), मुगल-ए-आजम (1960), कोहिनूर (1960), गंगा-जमुना (1961) ये सब दिलीप कुमार के उत्कर्ष काल की फिल्में हैं। नया दौर में दिलीप साहब ने मधुबाला की जगह वैजयंतीमाला को रिप्लेस किया। मुगल-ए-आजम उनका चरमोत्कर्ष थी, जिसके लिए दिलीप-मधुबाला ने आपसी अनबन के बावजूद साथ में काम किया। गंगा-जमुना का निर्माण स्वयं दिलीप कुमार ने किया और इसके निर्देशक नितिन बोस थे। यह पूरबी (भाषा) में बनी पहली फिल्म थी और बाद में इसकी तर्ज पर भोजपुरी फिल्मों के निर्माण का एक नया सिलसिला ही चल पड़ा।

आत्मकथा में बचपन का जिक्र करते हुए लिखा है कि एक फकीर ने उनके बारे में ऐलान किया था कि ये कोई आम बच्चा नहीं है। उनकी दादी को बताया कि यह तो बेहद मशहूर होने और असाधारण ऊंचाइयों को छूने के लिए ही आया है। इसका खूब ध्यान रखना। अगर बुरी नजरों से बचा लिया, तो बुढ़ापे तक खूबसूरत रहेगा। हमेशा काला टीका लगाकर रखना। सच में उनके चेहरे की खूबसूरती का वही नूर आखिर तक झलकता रहा।

मेला, शहीद, अंदाज, जोगन, दीदार, दाग, शिकस्त, देवदास उनकी ट्रेजिक फिल्में थीं। डॉक्टर की सलाह पर उन्होंने आजाद, कोहिनूर, आन, नया दौर फिल्मों में खिलंदड़ प्रेमी की भूमिकाएं निभाईं। नया दौर फिल्म का गीत 'उड़े जब जब जुल्फें तेरी...' युवा दिलीप कुमार का सटीक चित्रण है। दर्शकों का उनके प्रति दीवानगी का यही आलम था। दाग और आन, देवदास और आजाद, मुगल-ए-आजम और कोहिनूर जैसी विपरीत स्वभाव वाली उनकी फिल्में आमने-सामने ही रिलीज हुई थीं। एक तरफ वे दर्शकों को पीड़ा की सुखानुभूति देते, तो वहीं दूसरी तरफ लोगों का मनोरंजन करते। दरअसल, अपने साथ वे नाटकीयता का एक तूफान लेकर आए थे। फिल्मों में उनके नए-नए रूप देखकर दर्शक दंग रह जाते थे। अभिनय के प्रति दिलीप कुमार का रवैया सदा पूर्णतावादी रहा। युवावस्था में वे फिल्मों के प्राणाधार होते थे, तो अपने दूसरे दौर की प्रौढ़ भूमिकाओं में भी उन्होंने नवीनताएं दी। बस ये ही है दिलीप साहब की खासियत।

(लेखक दैनिक भास्कर, नोएडा संस्करण के स्थानीय संपादक हैं)

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वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने बताया, कैसे विदेश नीति के चक्रव्यूह से निकले भारत

भारतीय विदेश नीति एक बार फिर चक्रव्यूह में उलझी है। पड़ोसी राष्ट्रों, यूरोप तथा पश्चिमी देशों के साथ संबंधों में जिस तरह के विरोधाभासी हालात बन रहे हैं

Last Modified:
Wednesday, 07 July, 2021
india5454

राजेश बादल वरिष्ठ पत्रकार ।।

भारतीय विदेश नीति एक बार फिर चक्रव्यूह में उलझी है। पड़ोसी राष्ट्रों, यूरोप तथा पश्चिमी देशों के साथ संबंधों में जिस तरह के विरोधाभासी हालात बन रहे हैं, वे इस बात पर जोर देते हैं कि आंतरिक राजनीतिक परिस्थितियों से कहीं अधिक परदेसी नीतियों के प्रति संवेदनशील होना जरूरी है। 

हिन्दुस्तान के भीतर तो उतार-चढ़ाव आते रहते हैं और यह देश काफी हद तक उनसे निपटने में भी सक्षम है। लेकिन वैदेशिक संबंधों के बारे में बेहद जिम्मेदार और जवाबदेह होने की आवश्यकता है। यदि इसे काम चलाऊ ढंग से लिया गया तो वैश्विक परिदृश्य में आने वाले दिन मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं। उनके परिणाम गंभीर हो सकते हैं।

अफगानिस्तान से अमेरिका और सहयोगी देशों के सैनिकों की वापसी के बाद इस मुल्क का भविष्य खतरनाक संकेत दे रहा है। दो राय नहीं कि तालिबान अब वहां अधिक ताकतवर और विराट आकार में प्रस्तुत होंगे। अफगानी सरकार उनका कब तक मुकाबला कर सकेगी-कहना कठिन है। बीस-पच्चीस बरस पहले उन्हें उग्रवादी कहा जा सकता था, पर अब इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वे अफगानिस्तान में अनुदार विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जिसके आगे उदारवादी समर्पण करते दिखाई देने लगे हैं। कमोबेश यही स्थिति दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के तमाम राष्ट्रों की है। 

उदार और मुक्त द्वार की नीति के चहेते हाशिये पर हैं। विडंबना यह कि यह विचारधारा वामपंथियों की उस सोच का समर्थन करती है कि बंदूक की नली से सत्ता की गली मिलती है। विचार के धरातल पर इस तरह के लोग साथ-साथ खड़े नजर आते हैं। दक्षिण एशिया के अफगानिस्तान, म्यांमार, पाकिस्तान इस श्रेणी में रखे जा सकते हैं। 

दूसरी श्रेणी वह है जहां लोकतांत्रिक मुखौटे के साथ अधिनायक पनप चुके हैं। चीन, श्रीलंका, बांग्लादेश और भूटान ऐसे ही देश हैं। तो इसका क्या अर्थ लगाया जाए कि तेज गति से भागते मौजूदा संसार की दिलचस्पी अब शासन प्रणालियों में या कहा जाए कि जम्हूरियत में नहीं रही है। एक मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि आम नागरिक को सामूहिक नेतृत्व-शासन शैली से कोई खास लगाव नहीं रहा है। यानी कि तानाशाही से भी उसे ऐतराज नहीं है। अपवादों को छोड़ दें तो वह अब अपने अधिकारों के लिए लड़ना नहीं चाहता।

लोकतांत्रिक हिन्दुस्तान अब तक तालिबान के साथ सीधे संवाद से बचता रहा है। लेकिन जब लोकतांत्रिक अमेरिका तालिबान से समझौते पर उतर आया तो हिन्दुस्तान के लिए भी झिझक क्यों होनी चाहिए। डोनाल्ड ट्रम्प भी सैनिकों की वापसी चाहते थे और जो बाइडेन भी। जाहिर है यह देश की मांग थी। 

अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में भारत का भारी पूंजीनिवेश दांव पर है। ईरान में चाबहार बंदरगाह के जरिये अफगानिस्तान से व्यापार की संभावनाओं पर भी खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। कोई नहीं जानता कि तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद उनका भारत के साथ कैसा व्यवहार रहेगा। पिछली पारी में उनकी प्राथमिकता मजहबी रही है। पर अब तालिबानी नेतृत्व भी वह नहीं रहा है। 

हमें आशा करनी चाहिए कि उनकी अक्ल पर पड़े पर्दे हट चुके होंगे। ऐसी स्थिति में भारत को अपनी विदेश नीति में लचीलापन तो लाना ही होगा। एक कारण यह भी है कि भारत नहीं चाहेगा कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान का रुतबा बढ़े और उसकी दशकों की पूंजी लूट ली जाए। याद रखना चाहिए कि जब पाकिस्तान में जनरल परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ की सरकार को हटाकर सैनिक शासन लगाया था तो हिन्दुस्तान ने ऐलान किया था कि वह पाकिस्तान में फौजी हुकूमत से कोई संवाद नहीं करेगा, पर वही मुशर्रफ सम्मान से आगरा शिखर वार्ता में आए थे। 

इसलिए एक बार फिर तालिबान के साथ कूटनीतिक संबंध बहाल करने के लिए यू-टर्न लेना पड़े तो कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। अच्छी बात है कि इमरान सरकार से तालिबान भी सहज नहीं है। जिस तरह पाकिस्तान ने अमेरिका-तालिबान समझौते के बाद गाल बजाए हैं और भारत को दूर रखने की बिन मांगी सलाह तालिबान को दी है, वह उन्हें रास नहीं आई है। 

इमरान हुकूमत तो यहां तक कह चुकी है कि वे तालिबान सरकार को पसंद ही नहीं करेंगे। वॉशिंगटन पोस्ट के हालिया आलेख में इमरान खान ने लिखा है कि यदि इस समझौते को तालिबान ने सैनिक विजय माना तो उनकी बड़ी भूल होगी। इससे वहां अंतहीन रक्तपात की शुरुआत होगी। इमरान खान का यह बड़बोलापन तालिबान को रास नहीं आया था।  

तालिबान के आने की आशंका से चीन भी कम परेशान नहीं है। उसे लगता है कि तालिबान शिनजियांग प्रांत में आजादी का समर्थन कर सकते हैं और उईगर मुस्लिम उग्रवादी गतिविधियों के लिए अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके अलावा खनिजों के उत्खनन में उसका पूंजी निवेश भी डूबने की आशंका है। अनेक परियोजनाएं चीन वहां संचालित कर रहा है।

यहां भले ही चीन और हिन्दुस्तान समान चिंताओं की जमीन पर खड़े हों पर हमारी सियासी प्राथमिकता चीन को अफगानिस्तान में अलग-थलग करने की होनी चाहिए न कि दो बाहरी कारोबारी साझेदारों जैसी। चीन सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है लेकिन आर्थिक झटके नहीं। 

पाकिस्तान में पहले ही उसका बहुत पैसा डूब चुका है। ऐसे में भारत को अफगानिस्तान में रौब की स्थिति बनानी चाहिए। याद रखिए कि इस खूबसूरत पहाड़ी मुल्क से हिन्दुस्तान के सदियों पुराने आध्यात्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक रिश्ते रहे हैं। उनकी उपेक्षा ठीक नहीं है।

(साभार: लोकमत समाचार)

 

 

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'मेनका गांधी के शब्दों पर सवाल उठाना आसान है, लेकिन उनके जैसा बनना नामुमकिन'

सोशल मीडिया पर मेनका गांधी के खिलाफ जंग छिड़ी हुई है। वेटनरी डॉक्टर उन्हें खुलकर निशाना बना रहे हैं। डॉक्टरों को मेनका गांधी के शब्दों पर आपत्ति है

नीरज नैयर by
Published - Tuesday, 29 June, 2021
Last Modified:
Tuesday, 29 June, 2021
menkagandhi5454

नीरज नैयर, युवा पत्रकार ।।

सोशल मीडिया पर मेनका गांधी के खिलाफ जंग छिड़ी हुई है। वेटनरी डॉक्टर उन्हें खुलकर निशाना बना रहे हैं। डॉक्टरों को मेनका गांधी के शब्दों पर आपत्ति है, जो उन्होंने वरिष्ठ डॉक्टर के खिलाफ इस्तेमाल किए। शब्दों की मर्यादा जब भी टूटती है, गुस्से का ज्वार फूटता है। न यह पहली बार हो रहा है और न आखिरी बार। ट्विटर पर बॉयकॉट मेनका गांधी ट्रेंड कर रहा है, जिसमें हर रोज सैंकड़ों ट्वीट शामिल हो रहे हैं। आवेश की इस वर्चुअल गंगा में ऐसे लोग भी अपने हाथ धो रहे हैं, जिनके खुद के हाथ कभी न कभी बेजुबानों के खून से रंगे होंगे। जाहिर, इस मुद्दे से लोगों को सांसद और पशुप्रेमी मेनका गांधी के खिलाफ जहर उगलने का मौका मिल गया है। निश्चित तौर पर विरोध में शामिल अधिकांश लोगों को यह भी नहीं पता होगा कि मामला क्या है और मेनका गांधी की नाराजगी की वजह क्या रही। अक्सर ऐसे मामलों में एक पक्षीय विचारधारा वाले एकजुट हो जाते हैं और यही एकजुटता किसी भी बात को बरगद के पेड़ जितना बड़ा कर देती है। 

जिस मामले पर बवाल हो रहा है वो दरअसल आगरा और गोरखपुर के वेटनरी डॉक्टरों को लेकर है। इसकी एक ऑडियो क्लिप भी वायरल हो रही है, जिसमें मेनका गांधी को तल्ख अंदाज में बात करते सुना जा सकता है। आज के आईटी युग में सोशल प्लेटफॉर्म पर आने वाली हर चीज को लेकर एक धारणा कायम कर ली जाती है और कोई नया व्यक्ति इस धारणा का हिस्सा बनेगा या नहीं ये वहां मौजूद ‘लाइक’, रीट्वीट और कमेंट आदि पर निर्भर करता है। यानी सीधे शब्दों में कहें तो लाइक-कमेंट सही को गलत और गलत को सही बनाने की ताकत रखते हैं। इसी वायरल क्लिपिंग में 70 हजार का जिक्र भी किया गया है, जो संभवतः डॉक्टरों ने कुत्ते के इलाज के लिए वसूले, लेकिन उसके बावजूद उसकी हालात खराब होती गई। क्या ये गौर करने लायक विषय नहीं है?     

अस्पताल में जब भारी भरकम फीस भरने के बावजूद लापरवाही से किसी मरीज की मौत हो जाती है, तो दुख से उपजे आक्रोश को सही करार देने वालों की फौज खड़ी हो जाती है। डॉक्टरों पर सवाल खड़े किए जाने लगते हैं, उनके लिए ‘पैसों के पुजारी’ जैसे शब्द गढ़े जाते हैं और जब बात बेजुबानों की आती है तो सबकुछ बदल जाता है। विरोध और गुस्से को लेकर ये दोगलापन किस लिए? मैं ये कतई नहीं कहता कि वेटरनरी डॉक्टरों की पूरी कौम खराब है। कई ऐसे डॉक्टर हैं, जो कार में आने वाले ब्रीड डॉग और सड़क पर घूमने वाले आवारा कुत्तों में कोई फर्क नहीं करते, क्योंकि उनकी संवेदनाएं पैसों के बोझ में दबी नहीं हैं। मैं खुद भी व्यक्तिगत तौर पर कई ऐसे डॉक्टर्स को जानता हूं। लेकिन ये कड़वी सच्चाई है कि अधिकांश वेटनरी डॉक्टर बेजुबानों को जेब भरने का साधन समझने लगे हैं और अपने पेट्स को लेकर इन डॉक्टरों के पास जाने वाले 10 में 8 लोगों को कभी न कभी इस सच्चाई का सामना करना पड़ा होगा। 

उन 8 लोगों में एक मैं भी हूं। कई मौकों पर मैंने वेटनरी डॉक्टरों की शपथ और उनके मिशन के बीच के अंतर को महसूस किया है। आगरा में कई सालों पहले एक रिटायर्ड वेटनरी डॉक्टर की वजह से मेरा जीता जागता डॉग बुत बनकर रह गया था। दरअसल, मैंने एक फीमेल डॉग रेस्क्यू किया था जिसका नाम था हैंसी। उसके पैर के पास सूजन ने मुझे विचलित किया और मैं उसे किसी बड़े खतरे से बचाने के लिए डॉक्टर के पास पहुंच गया। इससे अंजान की जिसे मैं खतरे से बचाने वाला समझ रहा हूं वो असल में खुद ही खतरा बन जाएगा। डॉक्टर ने मेरे पोमेरियन डॉग को तीन-चार काले पीले इंजेक्शन लगाए। उस समय न मुझमें इस विषय को लेकर खास समझ थी और न ही मैं डॉक्टर के अनुभव पर सवाल उठाना चाहता था। वापसी के कुछ घंटों बाद ही डॉग की हालत खराब होने लगी। जब मैं दोबारा क्लीनिक पहुंचा, तो डॉक्टर ने दो-तीन इंजेक्शन और लगा दिए गए। अगले 24 घंटों में हैंसी एक ऐसी बुत बन गई, जो सिर्फ कराह सकती थी। उसके हाथ-पैर अकड़ गए, जीभ मुंह से बाहर आ गई और उसने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया। उस स्थिति में क्या मुझसे डॉक्टर के साथ शालीनता की उम्मीद की जा सकती थी?

कुछ सालों बाद मैंने एक और डॉग रेस्क्यू किया और उसका नाम भी हैंसी रखा। पुणे में रहने के दौरान अचानक एक दिन उसका शरीर एक तरफ मुड़ गया। कुछ हद तक वैसी स्थिति जब डॉग अपनी पूंछ पकड़ने के प्रयास में मुड़ते हैं। लगभग 20-25 किमी का सफर तय करके मैं एक विख्यात वेटनरी डॉक्टर के पास पहुंचा, जहां पुन: ये अहसास हुआ कि बेजुबानों के अधिकांश डॉक्टरों की संवेदनाएं मर चुकी हैं। मेरे डॉग की पीड़ा से डॉक्टर साहब का कोई लेना-देना नहीं था। वो औपचारिकता के लिए आए और बगैर फिजिकल एग्जामिन के आश्वासन दिलाया कि सबकुछ ठीक हो जाएगा। इसके बाद वह अपना लैपटॉप लेकर शेयर बाजार की दुनिया में व्यस्त हो गए और उनके नौसिखए सहायक एक के बाद एक टेस्ट करते गए। मेरे डॉग की मूल समस्या को छोड़कर उन्होंने सबकुछ किया। करीब 4 घंटे तक ये चलता रहा और साहब एक बार भी देखने नहीं आये। अंत में तकरीबन 20 हजार का बिल थामकर कहा गया कल आना, तब देखते हैं। इसके कुछ दिन बाद हमारी हैंसी सीनियर भी हमें छोड़कर चली गई। क्या इस स्थिति में मुझसे डॉक्टर के साथ शालीनता की उम्मीद की जा सकती है?

भोपाल में रहने के दौरान हाल ही में जब मैं एक घायल स्ट्रीट डॉग को वेटनरी डॉक्टर के पास लेकर गया, तो वहां भी पिछली बार जैसा अनुभव हुआ। एक स्वस्थ पैसे वाले कुत्ते की ग्रूमिंग कर रहे डॉक्टर ने तड़प रहे स्ट्रीट डॉग को देखने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई। यहां तक कि उसे अंदर लाने भी नहीं दिया, वो काफी देर तक जमीन पर छटपटाता रहा। पैसे वालों से पैसा बनाकर जब साहब आए तो उसे हाथ से नहीं बल्कि अपने पैरों से एग्जामिन किया, जैसे वो कोई जीवित प्राणी नहीं बल्कि निर्जीव वस्तु है। क्या ऐसे डॉक्टरों के लिए सम्मान की उम्मीद की जानी चाहिए? 

मेनका गांधी के शब्दों पर आपत्ति जताकर उनके खिलाफ आपत्तिजनक शब्द इस्तेमाल करने वालों को पहले उस मालिक का दर्द भी समझना चाहिए, जिसके डॉग को मोटी फीस देने के बाद भी सही इलाज नहीं मिला। मेनका गांधी को मैं सालों से जानता हूं और उनसे मिलने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ है। सौभाग्य इसलिए कहूंगा, क्योंकि जितनी शिद्दत से वह बेजुबानों के लिए काम करती हैं, उनकी पीड़ा को अपनी पीड़ा समझती हैं, उतना कोई इंसानों के लिए भी नहीं कर सकता और ऐसी शख्सियत से मिलना मेरा सौभाग्य है। मेनका गांधी तक पहुंचना बाकी नेताओं तक पहुंचने जितना मुश्किल नहीं है, वह महज एक ई-मेल पर जानवरों की मदद के लिए उपलब्ध हो जाती हैं। दिन भर जानवरों के अधिकारों के लिए लड़ना, उन्हें क्रूरता से बचाने के प्रयास करना और व्यक्तिगत रूप से खुद एक-एक अपडेट लेना क्या कोई आसान काम है? संभव है कि इस आपा-धापी में गुस्से के ज्वार में शब्दों की सौम्यता कहीं बह गई हो, लेकिन इसके लिए मेनका गांधी के संपूर्ण जीवन, सामाजिक कार्यों पर प्रश्न चिन्ह लगाना। उनके लिए ‘घटिया’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना क्या जायज है? इस पर विचार किया जाना चाहिए। निसंदेह इस वर्चुअल तूफान का सामना भी वह बखूबी कर लेंगी। इसलिए नहीं कि वह सत्ताधारी पार्टी की सांसद हैं, बल्कि इसलिए कि उनके पास लाखों प्रशंसकों की शक्ति है। जो यह जानते हैं कि मेनका गांधी किसी बेजुबान के साथ गलत नहीं होने देंगी।

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इस तरह की आजादी ही असल जम्हूरियत की निशानी है, यह बात ध्यान में रखने की है मिस्टर मीडिया!

हिन्दुस्तान के पड़ोस से आ रहीं मीडिया से जुड़ी खबरें डराने वाली हैं। खास तौर पर पाकिस्तान और चीन में निष्पक्ष पत्रकारिता करना खतरे से खाली नहीं है।

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 23 June, 2021
Last Modified:
Wednesday, 23 June, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

हिन्दुस्तान के पड़ोस से आ रहीं मीडिया से जुड़ी खबरें डराने वाली हैं। खास तौर पर पाकिस्तान और चीन में निष्पक्ष पत्रकारिता करना खतरे से खाली नहीं है। इसलिए इस बार मिस्टर मीडिया में परदेसी पत्रकारिता के हाल और उससे देसी पत्रकारिता पर उमड़ते-घुमड़ते चिंता के बादलों के बारे में चर्चा। पहले संसार के सबसे ज्यादा आबादी वाले मुल्क चीन की चर्चा। वहां हॉन्गकॉन्ग के समाचारपत्र ‘एप्पल डेली’ पर चीनी सत्ता ने राजद्रोह का आरोप लगाया है। उसके प्रधान संपादक तथा चार अन्य आला अफसरों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।

अखबार की 17 करोड़ की संपत्ति भी जब्त कर ली गई। ‘एप्पल डेली‘ को निष्पक्ष और लोकतंत्र समर्थक माना जाता है। पिछले बरस हॉन्गकॉन्ग में लोकतंत्र के समर्थन में जो आंदोलन हुए थे, उसके बाद से यह पहली बड़ी कार्रवाई है। सरकारी चेतावनी है कि जो पत्रकार लोकतंत्र के समर्थन में लिखेगा, उसे राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का उल्लंघन माना जाएगा। अच्छी बात यह है कि अखबार इसके आगे झुका नहीं। उसने विरोध में अगले दिन पांच लाख प्रतियां छापीं। दिन भर लोग कतार में लगकर इस अंक को खरीदते रहे। आमतौर पर यह समाचार पत्र 80 हजार प्रतियां प्रकाशित करता है।

अब पाकिस्तान की बात। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, बीते साल में करीब डेढ़ सौ पत्रकारों के साथ मारपीट, हत्या, अपहरण या अन्य उत्पीड़न की वारदात हुईं। हाल ही में राजधानी इस्लामाबाद में पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चेयरमैन अबसार आलम को गोली मार दी गई। इस्लामाबाद में ही एक और लोकप्रिय पत्रकार असद अली तूर के घर में हमलावर घुसे। उनके साथ हाथ-पैर बांधकर देर तक मारपीट की और फौज की तारीफ में नारे लगवाए। जाहिर है कि असद अली सेना के आलोचक थे। अबसार आलम ने भी फौज और आईएसआई की आलोचना की थी।

इससे पहले देश के बेहद सम्मानित एंकर हामिद मीर ने लोकतंत्र पर फौजी दख़ल की निंदा की तो टीवी पर उनका चर्चित शो ही बंद कर दिया गया। समाचार पत्रों में उनके लिखने पर पाबंदी लगा दी गई। हामिद ने पाकिस्तान में पत्रकारों पर सेना के अत्याचारों का विरोध किया था और चेतावनी दी थी कि भले ही पत्रकार फौज की तरह मारपीट और हत्या नहीं कर सकते, लेकिन उनके पास सैनिक तानाशाही के खिलाफ सुबूत हैं। वे कभी भी अवाम के सामने रखे जा सकते हैं। इसी के बाद उन्हें सताया जाने लगा। उत्पीड़न यहां तक बढ़ा कि हामिद मीर को माफी मांगनी पड़ी। एक उदाहरण अजय लालवानी का है। वे सिंध के जुझारू पत्रकार थे। अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए लिखते थे। उनकी दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई। सिंध के सारे पत्रकार इस मामले में एकजुट हो गए, मगर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है?

पास-पड़ोस में अभिव्यक्ति की आजादी पर आक्रमण हिन्दुस्तान के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। जब-जब पत्रकारिता का निष्पक्ष सुर दबाने अथवा असहमति को कुचलने का प्रयास किया जाता है तो राष्ट्र के हित में नहीं होता। सरकार में बैठे नियंताओं के लिए यह सबक है कि स्वस्थ पत्रकारिता पर दबाव डालकर वे अपने देश का नुकसान तो करते ही हैं, निजी खामियाजा भी उन्हें भुगतना होता है। इंदिरा गांधी ने आपातकाल में प्रेस सेंसरशिप लगाईं थी। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके फैसले का ‘प्रेत’ अभी भी देश में जिंदा है। मूक मवेशियों और इंसानों के बीच यही फर्क है कि इंसान अपने सोच को स्वर दे सकता है- ताला लगा के आप हमारी जबान को/कैदी न रख सकेंगे जेहन की उड़ान को/

सोचने-विचार करने और उन्हें प्रकट करने की आजादी ही असल जम्हूरियत की निशानी है। यह बात ध्यान में रखने की है मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

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मिस्टर मीडिया: राजद्रोह की चाबुक अब बेमानी हो गई है!

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