होम / विचार मंच / सोशल मीडिया का अभिशाप: अश्लील कंटेंट से कमाई का खेल

सोशल मीडिया का अभिशाप: अश्लील कंटेंट से कमाई का खेल

मैं रणवीर अल्लाहबादिया से जुड़े हालिया विवाद के बारे में पढ़कर हैरान रह गया। समय रैना के शो पर उनका बयान सिर्फ एक खराब मजाक नहीं था, बल्कि यह एक पूरी तरह से आपत्तिजनक और अस्वीकार्य टिप्पणी थी

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 year ago

अनुप चन्द्रशेखरन, COO (रीजनल कंटेंट) - IN10 मीडिया नेटवर्क ।।

मैं रणवीर अल्लाहबादिया से जुड़े हालिया विवाद के बारे में पढ़कर हैरान रह गया। समय रैना के शो पर उनका बयान सिर्फ एक खराब मजाक नहीं था, बल्कि यह एक पूरी तरह से आपत्तिजनक और अस्वीकार्य टिप्पणी थी, जो सार्वजनिक मंच पर नहीं होनी चाहिए थी। इससे भी बुरी बात यह है कि ऐसी बातचीत को एंटरटेनमेंट के रूप में पेश किया जा रहा है। ये इंफ्लुएंसर, जिनकी खासकर युवाओं के बीच भारी संख्या में फॉलोइंग है, "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" के नाम पर अपने प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग करना जारी रखते हैं।

एक हफ्ते पहले, तमिलनाडु के दक्षिणी शहर श्रीविल्लिपुथुर में चार लोगों को पॉक्सो एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया था। वे YouTube का उपयोग करके नाबालिग लड़कों को बहकाने और समलैंगिक यौन शोषण के लिए ट्रैफिकिंग करने में लिप्त थे। यह एक बड़ा सांस्कृतिक झटका था, क्योंकि तमिलनाडु को पारंपरिक रूप से जड़ों से जुड़ा और रूढ़िवादी क्षेत्र माना जाता रहा है।

एक समय था जब यूट्यूब और इंस्टाग्राम रचनात्मकता, ज्ञान और सार्थक मनोरंजन के प्लेटफॉर्म थे। फिर टिकटॉक आया, जिसने आम लोगों द्वारा बनाई गई ग्लैमरस रीलों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। लाइक्स और सब्सक्राइबर्स की संख्या लोगों की आय निर्धारित करने लगी। अब इन कंटेंट क्रिएटर्स को "इंफ्लुएंसर" कहा जाता है और इन्हें फिल्मों के प्रमोशन के तहत प्रीव्यू शो में भी आमंत्रित किया जाता है। दुखद सच्चाई यह है कि वे अब बाजार को आकार देने लगे हैं, उपभोक्ताओं के व्यवहार को ऐसे तरीकों से प्रभावित कर रहे हैं जिसकी पहले कल्पना भी नहीं की गई थी।

यह चौंकाने वाला है कि यूट्यूब पर लाइव व्लॉग्स में अधूरे कपड़े पहने महिलाएं लुभावने अंदाज में बात करती हैं—इनमें से कुछ तो गृहिणियां भी हैं। यह साफ है कि वायरल होने की होड़ ने बुनियादी शालीनता को पीछे छोड़ दिया है। रणवीर अल्लाहबादिया, जिन्हें बीयरबाइसेप्स के नाम से भी जाना जाता है, इस बात का एक उदाहरण हैं कि वर्षों में सोशल मीडिया कंटेंट किस हद तक गिर चुका है।

लेकिन आखिर हम सीमा कहां तय करेंगे? कब तक हम सोशल मीडिया को ऐसा मंच बने रहने देंगे जहां शालीनता की सीमाएं लगातार लाइक्स, व्यूज और एंगेजमेंट के लिए लांघी जाती रहें? यह सिर्फ एक टिप्पणी या एक इन्फ्लुएंसर की बात नहीं है। असली समस्या यह है कि यूट्यूब और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर किस तरह का कंटेंट बनाया और देखा जा रहा है, जो अब तेजी से अश्लीलता, सस्ते हास्य और अनुचित सामग्री के गढ़ बनते जा रहे हैं।

आज इंस्टाग्राम को देखिए- कपल्स के सनसनीखेज वीडियो, अंतरंग नाटक और अतिरंजित रूप से कामुक डांस परफॉर्मेंस से भरा पड़ा है। जो कभी व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का मंच हुआ करता था, वह अब ऐसा प्लेटफॉर्म बन चुका है जहां व्यक्तिगत रिश्तों को यौन और विवाहेत्तर एंगेजमेंट के लिए भुनाया जा रहा है। पति-पत्नी दिखावे के लिए बढ़ाचढ़ाकर झगड़े और मेल-मिलाप के नाटक करते हैं, जिनमें ऐसे दृश्य होते हैं जो निजी जीवन का हिस्सा होने चाहिए, न कि सोशल मीडिया पर सार्वजनिक रूप से दिखाए जाने चाहिए।

वे जो अतिनाटकीयता (हाइपरड्रामा) रचते हैं, वह टीवी सीरियल्स में टीआरपी बढ़ाने के लिए दिखाए जाने वाले झूठे रिश्तों से कम जहरीली नहीं है। ये तथाकथित "रिलेशनशिप गोल्स" महज ध्यान आकर्षित करने वाले दिखावटी स्टंट हैं, जो असली रिश्तों के मूल सार को कमजोर कर रहे हैं। जब पूरी दुनिया को "कोई निजी स्थान नहीं" मान लिया जाता है, तो निजी रिश्तों का असली महत्व धीरे-धीरे सड़ने लगता है।

यूट्यूब पर दूसरी ओर ऐसा कंटेंट भरा पड़ा है, जो आपत्तिजनक चुटकुलों, यौन संकेतों और ऐसे प्रैंक्स (मजाक) पर आधारित है, जो कई बार उत्पीड़न की हद तक पहुंच जाते हैं। कई कंटेंट क्रिएटर्स ध्यान आकर्षित करने के लिए अभद्र भाषा, अश्लील हास्य और जरूरत से ज्यादा नाटकीय हरकतों का इस्तेमाल करते हैं। सबसे बुरी बात यह है कि यह कंटेंट लाखों युवा दर्शकों द्वारा देखा जा रहा है, जो यह मानने लगते हैं कि ऐसा व्यवहार सामान्य और यहां तक कि वांछनीय भी है। इसका असर बेहद खतरनाक है—बच्चे यह सोचकर बड़े हो रहे हैं कि बदतमीजी, असम्मान और अश्लीलता बातचीत के स्वीकार्य तरीके हैं।

लेकिन असली त्रासदी माता-पिता की भूमिका में छिपी है। दो महीने के बच्चे को नर्सरी राइम्स दिखाते हुए खिलाने से लेकर एक किशोर को बिना किसी रोक-टोक के वयस्क सामग्री तक पहुंच देने तक, हम एक खतरनाक पैटर्न देख रहे हैं। कई कामकाजी माता-पिता अपने बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों की निगरानी नहीं कर पाते, जिससे वे खतरनाक डिजिटल प्रभावों के शिकार हो जाते हैं। जो कभी-कभार एक सुविधा के रूप में शुरू होता है, वह जल्द ही एक लत में बदल जाता है। जानबूझकर या अनजाने में, माता-पिता ने अपने बच्चों को डिजिटल दुनिया के हवाले कर दिया है, बिना किसी नियंत्रण के।

वो समय चला गया जब परिवार एक साथ बैठकर टेलीविजन देखा करते थे, जहां कम से कम कंटेंट पर कुछ नियंत्रण था। अब हर बच्चे के पास एक निजी स्क्रीन है- सोशल मीडिया के अराजक माहौल में बिना किसी रोक-टोक के प्रवेश करने का एक सीधा रास्ता। माता-पिता शायद ही कभी इस बात पर ध्यान देते हैं कि उनके बच्चे क्या देख रहे हैं, जिससे वे ऐसी सामग्री के संपर्क में आ जाते हैं जो उनकी उम्र और परिपक्वता से कहीं आगे की होती है।

बच्चों के व्यवहार में यह खतरनाक बदलाव कभी सही तरीके से संबोधित नहीं किया गया है। स्कूलों को सख्त नीतियां लागू करनी चाहिए, जो स्कूल के घंटों के दौरान मोबाइल फोन के उपयोग को सीमित करें। ध्यान देने की क्षमता तेजी से घट रही है और बुनियादी सामाजिक कौशल—जैसे सार्थक बातचीत करना और रोजमर्रा की बातचीत में हास्य खोजना—कम हो रहे हैं। बच्चे अब धैर्य, एकाग्रता और वास्तविक जीवन की बातचीत में भी संघर्ष करते हैं क्योंकि वे लगातार छोटे और निरर्थक कंटेंट से उत्तेजित रहते हैं।

अब वे फोन नंबर, जन्मदिन या महत्वपूर्ण तिथियां याद नहीं रखते- आखिरकार, उनके डिवाइस यह सब उनके लिए कर देते हैं। यहां तक कि उनके हस्तलिखित लेखन कौशल भी खराब हो रहे हैं, क्योंकि वे लिखने की तुलना में टाइपिंग के ज्यादा आदी हो गए हैं।

यह सब आखिर जा कहां रहा है?

हम एक ऐसी पीढ़ी को बड़ा कर रहे हैं जो डिजिटल दुनिया में वास्तविक मानवीय बातचीत की तुलना में अधिक सहज महसूस करती है। वर्षों पहले, एक अमेरिकी अवधारणा "द सेकंड वर्ल्ड" लोकप्रिय हुई थी- एक डिजिटल ब्रह्मांड जहां कोई वैकल्पिक पहचान बना सकता था, एक अलग जीवन जी सकता था और वह सब कुछ हासिल कर सकता था जो वास्तविकता में संभव नहीं था। लोग इस आभासी दुनिया में शरण लेने लगे और वास्तविक जीवन के अनुभवों से कटते चले गए। खतरा यह है कि अब लोगों को असली दुनिया में जीवंत महसूस ही नहीं होता।

आज हमारे पास एक ऐसी पीढ़ी है जो भावनात्मक रूप से अलग-थलग है। वे शब्दों की जगह इमोजी के जरिए अपनी भावनाएं व्यक्त करते हैं, वास्तविक मानवीय रिश्तों की बजाय लाइक्स और शेयर के माध्यम से मान्यता प्राप्त करना चाहते हैं। अगर हम अभी कदम नहीं उठाते, तो हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जो डिजिटल प्रभाव को वास्तविक दुनिया के रिश्तों से अधिक महत्व देता है।

बेशक, कुछ लोग यह तर्क देंगे कि सोशल मीडिया स्वतंत्रता के बारे में है। लेकिन वास्तविक स्वतंत्रता जिम्मेदारी के साथ आनी चाहिए। अनियंत्रित कंटेंट को समाज के नैतिक मूल्यों को प्रभावित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, खासकर जब वह बच्चों को प्रभावित कर रहा हो। सोशल मीडिया के एल्गोरिदम सबसे अधिक आकर्षक कंटेंट को आगे बढ़ाते हैं, और दुर्भाग्य से, सबसे सनसनीखेज और अनुचित सामग्री को ही सबसे ज्यादा व्यूज और एंगेजमेंट मिलती है। यही कारण है कि हमें YouTube और Instagram जैसे प्लेटफॉर्म्स पर कड़े सेंसरशिप नियमों की सख्त जरूरत है।

अन्य देश पहले ही इस दिशा में कदम उठा चुके हैं। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया ने बच्चों को हानिकारक सामग्री से बचाने के लिए मजबूत सेंसरशिप नीतियां लागू की हैं। उन्होंने सख्त आयु प्रतिबंध, कंटेंट क्रिएटर्स के लिए कड़े नियम और एआई-आधारित मॉडरेशन सिस्टम पेश किए हैं, जो अनुचित वीडियो को युवा दर्शकों तक पहुंचने से पहले ही हटा देते हैं। अगर वे ऐसा कर सकते हैं, तो भारत क्यों नहीं कर सकता?

वर्तमान में, डिजिटल प्लेटफॉर्म बिना किसी सेंसरशिप के संचालित होते हैं। फिल्मों की तरह सोशल मीडिया पर कोई प्रमाणन बोर्ड नहीं होता, जो कंटेंट की जांच करे। कोई भी कुछ भी अपलोड कर सकता है, बिना किसी निगरानी के। और जब कोई विवाद खड़ा होता है, तो हल हमेशा एक जैसा होता है—एक माफीनामा, एक बयान, और फिर सब कुछ पहले जैसा चलता रहता है। लेकिन माफी से नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती। लाखों लोग पहले ही वह कंटेंट देख चुके होते हैं, और उसका प्रभाव आसानी से मिटाया नहीं जा सकता।

अब समय आ गया है कि हम सख्त नियम लागू करें, कंटेंट को दर्शकों तक पहुंचने से पहले फ़िल्टर करें और उन क्रिएटर्स को डिमोनेटाइज करें जो विवाद और भौंडेपन को एंगेजमेंट बढ़ाने की रणनीति के रूप में इस्तेमाल करते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्लेटफॉर्म्स को यह समझना होगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नैतिकता, संस्कृति और मूल्यों की कीमत पर नहीं चलाया जा सकता।

रणवीर अल्लाहबादिया का विवाद कोई अकेली घटना नहीं है—यह एक बहुत बड़ी समस्या का लक्षण मात्र है। असली सवाल यह है कि हमें यह समझने के लिए और कितने विवादों का इंतजार करना होगा कि कुछ बदलने की जरूरत है? अगर हमने कंटेंट को नियंत्रित करना, सीमाएं तय करना और यह निगरानी करना शुरू नहीं किया कि बच्चे क्या देख रहे हैं, तो हमारा समाज एक ऐसे पतन की ओर बढ़ रहा है, जहां से वापसी संभव नहीं होगी।

डिजिटल दुनिया यहां रहने के लिए आई है, लेकिन इसे किस दिशा में ले जाना है, यह अभी भी हमारे हाथों में है। सवाल यह है—क्या हम सही समय पर जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार हैं?

(यहां व्यक्त किए गए विचार पूरी तरह से लेखक के निजी विचार हैं)


टैग्स
सम्बंधित खबरें

गहरी खाई में क्यों गिरी टीम इंडिया की गाड़ी : नीरज बधवार

रिंकू को शुद्ध बल्लेबाज़ के रूप में टीम में रखा जाता है, लेकिन उन्हें सातवें क्रम पर तब भेजा जाता है जब या तो बहुत कम गेंदें बची होती हैं या साथ देने वाला कोई नहीं होता।

40 minutes ago

साहित्य से छंटती व्यक्तिगत विवादों की धुंध: अनंत विजय

क्या लेखक सत्ता की कांता होती है या गांव की सीमा पर भूँकता हुआ कुकुर ? प्रगतिशीलता के ध्वजवाहकों ने महिलाओं और साहित्यकारों पर घटिया टिप्पणी क्यों की थी?

1 day ago

टैरिफ पर टैरिफ नहीं चलेगा! पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी ट्रंप के पास टैरिफ़ लगाने के रास्ते हैं। पहले उन्होंने उसी कानून के तहत 10% टैरिफ़ लगा दिया, फिर 24 घंटे के भीतर बढ़ाकर 15% कर दिया। यह टैरिफ़ अस्थायी है।

1 day ago

भारत मंडपम में कांग्रेस विरोध, लेकिन भूल गए अपने फर्जीवाड़े: आलोक मेहता

हाल में एआई सम्मेलन के दौरान “चीनी मॉडल” को अपना बताने के आरोपों पर विश्वविद्यालय ने सफाई दी कि संबंधित रोबोट शैक्षणिक प्रयोग के लिए खरीदा गया था और प्रस्तुति में चूक हुई।

1 day ago

AI पर नियंत्रण करना भी बेहद आवश्यक: रजत शर्मा

प्रधानमंत्री मोदी ने कम शब्दों में कई बड़ी बातें कहीं। भारत एआई में विश्व का अग्रणी बनना चाहता है, हमारे देश के पास दिमाग़ भी है, युवा शक्ति भी है और सरकार का समर्थन भी है।

3 days ago


बड़ी खबरें

कर्नाटक में बच्चों के मोबाइल उपयोग पर लग सकती है रोक, सरकार कर रही मंथन

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार 16 साल से कम उम्र के छात्रों के लिए मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर रोक लगाने पर मंथन कर रही है।

22 hours ago

विज्ञापन जगत के भविष्य की झलक देगी पिच मेडिसन ऐडवर्टाइजिंग रिपोर्ट, कल होगा अनावरण

मुंबई में 24 फरवरी को विज्ञापन जगत की बड़ी रिपोर्ट पिच मेडिसन ऐडवर्टाइजिंग रिपोर्ट (PMAR) 2026 जारी होने जा रही है।

23 hours ago

निकुंज डालमिया ने लॉन्च किया नया बिजनेस प्लेटफॉर्म ‘The Broadview’

ET Now और ET Now Swadesh के एडिटर-इन-चीफ रह चुके निकुंज डालमिया अब अपना नया वेंचर ‘The Broadview’ लेकर आए हैं।

9 hours ago

‘BAG Convergence’ की बड़ी उपलब्धि, Google News Initiative में मिला स्थान

कंपनी की चेयरपर्सन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर अनुराधा प्रसाद ने इस उपलब्धि में योगदान देने वाली सभी टीमों को बधाई दी है और भविष्य में भी ऐसे ही नए कीर्तिमान स्थापित करने की उम्मीद जताई है।

10 hours ago

पद्मश्री आलोक मेहता की कॉफी-टेबल बुक 'Revolutionary Raj' का भव्य लोकार्पण

शुभी पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित यह कॉफी-टेबल बुक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों पर केंद्रित है। इसका भूमिका लेख (Foreword) केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने लिखा है।

1 day ago