रवीश कुमार बोले- मुझे पता है गुलाम की तरह काम करने वाले लोग भाजपा के समर्थक हैं

वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने मतगणना के दिन वॉट्सऐप पर मिले तीन तरह के मैसेज का किया जिक्र

Last Modified:
Friday, 24 May, 2019
Ravish Kumar

रवीश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार।।

क्या 2019 के चुनाव में मैं भी हार गया हूं?

23 मई 2019 के दिन जब नतीजे आ रहे थे, मेरे वॉट्सऐप पर तीन तरह के मैसेज आ रहे थे। अभी दो तरह के मैसेज की बात करूंगा और आख़िर में तीसरे प्रकार के मैसेज की। बहुत सारे मैसेज ऐसे थे कि आज देखते हैं कि रवीश कुमार की सूजी है या नहीं। उसका चेहरा मुरझाया है या नहीं। एक ने लिखा कि वह रवीश कुमार को ज़लील होते देखना चाहता है। डूबकर मर जाना देखना चाहता है। पंचर बनाते हुए देखना चाहता है। किसी ने पूछा कि बर्नोल की ट्यूब है या भिजवा दें। किसी ने भेजा कि अपनी शक्ल की फोटो भेज दो, ज़रा हम देखना चाहते हैं।

मैंने सभी को जीत की शुभकामनाएं दीं और लाइव कवरेज़ के दौरान इस तरह के मैसेज का ज़िक्र किया और ख़ुद पर हंसा। दूसरे प्रकार के मैसेज में यह लिखा था कि आज से आप नौकरी की समस्या, किसानों की पीड़ा और पानी की तकलीफ दिखाना बंद कर दीजिए। यह जनता इसी लायक है। बोलना बंद कर दो। क्या आपको नहीं लगता है कि आप भी रिजेक्ट हो गए हैं। आपको विचार करना चाहिए कि क्यों आपकी पत्रकारिता मोदी को नहीं हरा सकी। मैं मुग़ालता नहीं पालता। इस पर भी लिख चुका हूं कि बकरी पाल लें, मगर मुग़ालता न पालें।

2019 का जनादेश मेरे ख़िलाफ कैसे आ गया? मैंने जो पांच साल में लिखा-बोला है, क्या वह भी दांव पर लगा था? जिन लाखों लोगों की पीड़ा हमने दिखाई, क्या वह ग़लत थी? मुझे पता था कि नौजवान, किसान और बैंकों में गुलाम की तरह काम करने वाले लोग भाजपा के समर्थक हैं। उन्होंने भी मुझसे कभी झूठ नहीं बोला। सबने पहले या बाद में यही बोला कि वे नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं। मैंने इस आधार पर उनकी समस्या को खारिज नहीं किया कि वे नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं। उनकी समस्या वास्तविक थी, इसलिए दिखाई। आज एक सांसद नहीं कह सकता कि उसने पचास हज़ार से अधिक लोगों को नियुक्ति पत्र दिलवाया है। मेरी नौकरी सीरीज़ के कारण दिल्ली से लेकर बिहार तक में लोगों को नियुक्ति पत्र मिला है। कई परीक्षाओं के रिज़ल्ट निकले। उनमें से बहुतों ने नियुक्ति पत्र मिलने पर माफी मांगी कि वे मुझे गालियां देते थे। मेरे पास सैकड़ों पत्र और मैसेज के स्क्रीन शॉट पड़े हैं, जिनमें लोगों ने नियुक्ति पत्र मिलने के बाद गाली देने के लिए माफी मांगी है। इनमें से एक भी यह प्रमाण नहीं दे सकता कि मैंने कभी कहा हो कि नरेंद्र मोदी को वोट नहीं देना। यह ज़रूर कहा कि वोट अपने मन से दें, वोट देने के बाद नागरिक बन जाना।

पचास हज़ार से अधिक नियुक्ति पत्र की कामयाबी वो कामयाबी है, जो मैं मोदी समर्थकों के द्वारा ज़लील किए जाने के क्षण में भी सीने पर बैज की तरह लगाए रखूंगा। क्योंकि वे मुझे नहीं उन मोदी समर्थकों को ही ज़लील करेंगे, जिन्होंने मुझसे अपनी समस्या के लिए संपर्क किया था। नौकरी सीरीज़ का ही दबाव था कि नरेंद्र मोदी जैसी प्रचंड बहुमत वाली सरकार को रेलवे में लाखों नौकरियां निकालनी पड़ीं। इसे मुद्दा बनवा दिया। वर्ना आप देख लें कि पूरे पांच साल में रेलवे में कितनी वैकेंसी आईं और आखिरी साल में कितनी वैकैंसी आई। क्या इसकी मांग गोदी मीडिया कर रहा था या रवीश कुमार कर रहा था? प्राइम टाइम में मैंने दिखाया। क्या रेल सीरीज़ के तहत स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस जैसी ट्रेन को कुछ समयों के लिए समय पर चलवा देना मोदी का विरोध था? क्या बिहार के कालेजों में तीन साल के बीए में पांच-पांच साल से फंसे नौजवानों की बात करना मोदी विरोध था?

इन पांच सालों में मुझे करोड़ों लोगों ने पढ़ा। हज़ारों की संख्या में आकर सुना। टीवी पर देखा। बाहर मिला तो गले लगाया। प्यार दिया। उसमें नरेंद्र मोदी के समर्थक भी थे। संघ के लोग भी थे और विपक्ष के भी। बीजेपी के लोग भी थे, मगर वे चुपचाप बधाई देते थे। मैंने एक चीज़ समझी। मोदी का समर्थक हो या विरोधी, वह गोदी मीडिया और पत्रकारिता में फर्क करता है। चूंकि गोदी मीडिया के एंकर मोदी की लोकप्रियता की आड़ में मुझ पर हमला करते हैं, इसलिए मोदी का समर्थक चुप हो जाता है। भारत जैसे देश में ईमानदार और नैतिक होने का सामाजिक और संस्थागत ढांचा नहीं है। यहां ईमानदार होने की लड़ाई अकेले की है और हारने की होती है। लोग तंज करते हैं कि कहां गए सत्यवादी रवीश कुमार। कहां गए पत्रकारिता की बात करने वाले रवीश कुमार। मुझमें कमियां हैं। मैं आदर्श नहीं हूं। कभी दावा नहीं किया, लेकिन जब आप यह कहते हैं आप उसी पत्रकारिता के मोल को दोहरा रहे होते हैं, जिसकी बात मैं कहता हूं या मेरे जैसे कई पत्रकार कहते हैं।

मुझे पता था कि मैं अपने पेशे में हारने की लड़ाई लड़ रहा हूं। इतनी बड़ी सत्ता और कारपोरेट की पूंजी से लड़ने की ताकत सिर्फ गांधी में थी। लेकिन जब लगा कि मेरे जैसे कई पत्रकार स्वतंत्र रूप से कम आमदनी पर पत्रकारिता करने की कोशिश कर रहे हैं तब लगा कि मुझे कुछ ज़्यादा करना चाहिए। मैंने हिंदी के पाठकों के लिए रोज़ सुबह अंग्रेज़ी से अनुवाद कर मोदी विरोध के लिए नहीं लिखा था, बल्कि इस खुशफहमी में लिखा कि हिंदी का पाठक सक्षम हो। इसमें घंटों लगा दिए। मुझे ठीक ठीक पता था कि मैं यह लंबे समय तक अकेले नहीं कर सकता। मोदी विरोध की सनक नहीं थी। अपने पेशे से कुछ ज्यादा प्रेम था, इसलिए दांव पर लगा दिया। अपने पेश पर सवाल खड़े करने का एक जोखिम था, अपने लिए रोज़गार के अवसर गंवा देना। फिर भी जीवन में कुछ समय के लिए करके देख लिया। इसका अपना तनाव होता है, जोखिम होता है मगर जो सीखता है वह दुर्लभ है। बटुआ वाले सवाल पूछकर मैं मोदी समर्थकों के बीच तो छुप सकता हूं लेकिन आप पाठकों के सामने नहीं आ सकता।

मैंने ज़रूर सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ सबके बीच आकर बोला। आज भी बोलूंगा। आपके भीतर धार्मिक और जातीय पूर्वाग्रह बैठ गया है। आप मशीन बनते जा रहे हैं। मैं फिर से कहता हूं कि धार्मिक और जातीय पूर्वाग्रह से लैस सांप्रदायिकता आपको एक दिन मानव बम में बदल देगी। स्टूडियो में नाचते एंकरों को देख आपको भी लगता होगा कि यह पत्रकारिता नहीं है। बैंकों में ग़ुलाम की तरह काम करने वाली सैंकड़ों महिला अफसरों ने अपने गर्भ गिर जाने से लेकर शौचालय का भय दिखाकर काम कराने का पत्र क्या मुझसे मोदी का विरोध कराने के लिए लिखा था? उनके पत्र आज भी मेरे पास पड़े हैं। मैंने उनकी समस्या को आवाज़ दी और कई बैंक शाखाओं में महिलाओं के लिए अलग से शौचलय बने। मैंने मोदी का एजेंडा नहीं चलाया। वो मेरा काम नहीं था। अगर आप मुझसे यही उम्मीद करते हैं तब भी यही कहूंगा कि एक बार नहीं सौ बार सोच लीजिए।

ज़रूर पत्रकारिता में भी ‘अतीत के गुनाहों की स्मृतियां’ हैं, जिन्हें मोदी वक्त-बेवक्त ज़िंदा करते रहते हैं, लेकिन वह भूल जा रहे हैं कि उनके समय की पत्रकारिता का मॉडल अतीत के गुनाहों पर ही आधारित है। मैं नहीं मानता कि पत्रकारिता हारी है। पत्रकारिता ख़त्म हो जाएगी, वह अलग बात है। जब पत्रकारिता ही नहीं बची है तो फिर आप पत्रकारिता के लिए मेरी ही तरफ क्यों देख रहे हैं। क्या आपने संपूर्ण समाप्ति का संकल्प लिया है। जब मैं अपनी बात करता हूं तो उसमें वे सारे पत्रकारों की भी बातें हैं, जो संघर्ष कर रहे हैं। ज़रूर पत्रकारिता संस्थानों में संचित अनैतिक बलों के कारण पत्रकारिता समाप्त हो चुकी है। उसका बचाव एक व्यक्ति नहीं कर सकता है। ऐसे में हम जैसे लोग ही क्या कर लेंगे। फिर भी ऐसे काम को सिर्फ मोदी विरोध के चश्मे से देखा जाना ठीक नहीं होगा। यह अपने पेशे के भीतर आई गिरावट का विरोध ज्यादा है। यह बात मोदी समर्थकों को इस दौर में समझनी होगी। मोदी का समर्थन अलग है। अच्छी पत्रकारिता का समर्थन अलग है। मोदी समर्थकों से भी अपील करूगा कि आप गोदी मीडिया का चैनल देखना बंद कर दें। अख़बार पढ़ना बंद कर दें। इसके बग़ैर भी मोदी का समर्थन करना मुमकिन है।

बहरहाल, 23 मई 2019 को आई आंधी गुज़र चुकी है, लेकिन हवा अभी भी तेज़ चल रही है। नरेंद्र मोदी ने भारत की जनता के दिलो-दिमाग़ पर एकछत्र राज कायम कर लिया है। 2014 में उन्हें मन से वोट मिला था, 2019 में तन और मन से वोट मिला है। तन पर आई तमाम तक़लीफों को झेलते हुए लोगों ने मन से वोट किया है। उनकी इस जीत को उदारता के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए। मैं भी करता हूं। जन को ठुकरा कर आप लोकतांत्रिक नहीं हो सकते हैं। उस ख़ुशी में भविष्य के ख़तरे देखे जा सकते हैं लेकिन उसे देखने के लिए भी आपको शामिल होना होगा। यह समझने के लिए भी शामिल होना चाहिए कि आख़िर वह क्या बात है जो लोगों को मोदी बनाती है। लोगों को मोदी बनाने का मतलब है अपने नेता में एकाकार हो जाना। एक तरह से विलीन हो जाना। यह अंधभक्ति कही जा सकती है, मगर इसे भक्ति की श्रेष्ठ अवस्था के रूप में भी देखा जाना चाहिए। मोदी के लिए लोगों का मोदी बन जाना उस श्रेष्ठ अवस्था का प्रतीक है। घर-घर मोदी की जगह आप जन-जन मोदी कह सकते हैं।

मैं हमेशा से कहता रहा हूं कि 2014 के बाद से इस देश के अतीत और भविष्य को समझने का संदर्भ बिन्दु( रेफरेंस प्वाइंट) बदल गया है। चुनाव से पहले ही प्रधानमंत्री मोदी नए भारत की बात करने लगे थे। वह नया भारत उनकी सोच का भारत बन गया है। हर जनादेश में संभावनाएं और आशंकाएं होती हैं। इससे मुक्त कोई जनादेश नहीं होता है। जनता ने तमाम आशंकाओं के बीच अगर एक संभावना को चुना है तो इसका मतलब है कि उसमें उन आशंकाओं से निपटने का पर्याप्त साहस भी है। वह भयभीत नहीं है। न तो यह भय का जनादेश है और न ही इस जनादेश से भयभीत होना चाहिए। ऐतिहासिक कारणों से जनता के बीच कई संदर्भ बिंदु पनप रहे थे। दशकों तक उसने इसे अपने असंतोष के रूप में देखा। बहुत बाद में वह अपने इस अदल-बदल के असंतोष से उकता गई। उसने उस विचार को थाम लिया, जहां अतीत की अनैतिकताओं पर सवाल पड़े हुए थे। जनता ‘अतीत के असंतोषों की स्मृतियों’ से उबर नहीं पाई है। इस बार असंतोष की उस स्मृति को विचारधारा के नाम पर प्रकट कर आई है, जिसे नया भारत कहा जा रहा है।

मैंने हमेशा कहा है कि नरेंद्र मोदी का विकल्प वही बनेगा, जिसमें नैतिक शक्ति होगी। आप मेरे लेखों में नैतिक बल की बात देखेंगे। बेशक नरेंद्र मोदी के पक्ष में अनैतिक शक्तियों और संसाधनों का विपुल भंडार है, मगर जनता उसे ‘अतीत के असंतोष की स्मृतियों’ के गुण-दोष की तरह देखती है। बर्दाश्त कर लेती है। नरेंद्र मोदी उस ‘अतीत के असंतोष की स्मृतियों’ को ज़िंदा भी रखते हैं। आप देखेंगे कि वह हर पल इसे रेखांकित करते रहते हैं। जनता को ‘अतीत के वर्तमान’ में रखते हैं। जनता को पता है कि विपक्ष में भी वही अनैतिक शक्तियां हैं जो मोदी पक्ष में हैं। विपक्ष को लगा कि जनता दो समान अनैतिक शक्तियों में से उसे भी चुन लेगी। इसलिए उसने बची-खुची अनैतिक शक्तियों का ही सहारा लिया। नरेंद्र मोदी ने उन अनैतिक शक्तियों को भी कमज़ोर और खोखला भी कर दिया। विपक्ष के नेता बीजेपी की तरफ भागने लगे। विपक्ष मानव और आर्थिक संसाधन से ख़ाली होने लगा। दोनों का आधार अनैतिक शक्तियां ही थीं, लेकिन इसी परिस्थिति ने विपक्ष के लिए नया अवसर उपलब्ध कराया। उसे चुनाव की चिंता छोड़ अपने राजनीतिक और वैचारिक पुनर्जीवन को प्राप्त करना था, उसने नहीं किया।

विपक्ष को अतीत के असंतोष के कारणों के लिए माफी मांगनी चाहिए थी। नया भरोसा देना था कि अब से ऐसा नहीं होगा। इस बात को ले जाने के लिए तेज़ धूप में पैदल चलना था। उसने यह भी नहीं किया। 2014 के बाद चार साल तक घर बैठे रहे। जनता के बीच नहीं गए। उसकी समस्याओं पर तदर्थ रूप से बोले और घर आकर बैठ गए। 2019 आया तो बची-खुची अनैतिक शक्तियों के समीकरण से वह एक विशालकाय अनैतिक शक्तिपुंज से टकराने की ख्वाहिश पाल बैठा। विपक्ष को समझना था कि अलग-अलग दलों की राजनीतिक प्रासंगिकता समाप्त हो चुकी है। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी या राष्ट्रीय जनता दल के ज़रिये लोकतंत्र में जो सामाजिक संतुलन आया था उसकी आज कोई भूमिका नहीं रही।

बेशक इन दलों ने समाज के पिछड़े और वंचित तबकों को सत्ता-चक्र घुमाकर शीर्ष पर लाने का ऐतिहासिक काम किया, लेकिन इसी क्रम में वे दूसरे पिछड़े और वंचितों को भूल गए। इन दलों में उनका प्रतिनिधित्व उसी तरह बेमानी हो गया जिस तरह अन्य दलों में होता है। अब इन दलों की प्रासंगिकता नहीं बची है तो दलों को भंग करने का साहस भी होना चाहिए। अपनी पुरानी महत्वकांक्षाओं को भंग कर देना था। भारत की जनता अब नए विचार और नए दल का स्वागत करेगी तब तक वह नरेंद्र मोदी के विचार पर चलेगी।

समाज और राजनीति का हिंदूकरण हो गया है। यह स्थायी रूप से हुआ है, मैं नहीं मानता। उसी तरह जैसे बहुजन शक्तियों का उभार स्थायी नहीं था, इसी तरह से यह भी नहीं है। यह इतिहास का एक चक्र है, जो घूमा है। जैसे मायावती सवर्णों के समर्थन से मुख्यमंत्री बनी थी, उसी तरह आज संघ बहुजन के समर्थन से हिंदू राष्ट्र बना रहा है। जो सवर्ण थे वो अपनी जाति की पूंजी लेकर कभी सपा-बसपा और राजद के मंचों पर अपना सहारा ढूंढ रहे थे। जब वहां उनकी वहां पूछ बढ़ी तो बाकी बचा बहुजन सर्वजन के बनाए मंच पर चला गया।

बहुजन राजनीति ने कब जाति के ख़िलाफ़ राजनीतिक अभियान चलाया। जातियों के संयोजन की राजनीति थी तो संघ ने भी जातियों के संयोजन की राजनीति खड़ी कर दी। बेशक क्षेत्रिय दलों ने बाद में विकास की भी राजनीति की और कुछ काम भी किया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर के लिए अपनी भूमिका को हाईवे बनाने तक सीमित कर गए। चंद्रभान प्रसाद की एक बात याद आती है। वह कहते थे कि मायावती क्यों नहीं आर्थिक मुद्दों पर बोलती हैं, क्यों नहीं विदेश नीति पर बोलती हैं। यही हाल सारे क्षेत्रीय दलों का है। वह प्रदेश की राजनीति तो कर लेते हैं मगर देश की राजनीति नहीं कर पाते हैं।

बहुजन के रूप में उभरकर आए दल अपनी विचारधारा की किताब कब का फेंक चुके हैं। उनके पास अंबेडकर जैसे सबसे तार्किक व्यक्ति हैं लेकिन अंबेडकर अब प्रतीक और अहंकार का कारण बन गए हैं। छोटे-छोटे गुट चलाने का कारण बन गए हैं। हमारे मित्र राकेश पासवान ठीक कहते हैं कि दलित राजनीति के नाम पर अब संगठनों के राष्ट्रीय अध्यक्ष ही मिलते हैं, राजनीति नहीं मिलती है। बहुजन राजनीति एक दुकान बन गई है जैसे गांधीवाद एक दुकान है। इसमें विचारधारा से लैस व्यक्ति आज तक राष्ट्रीय स्तर पर एक राजनैतिक विकल्प नहीं बना पाया। वह दल नहीं बनाता है। अपने हितों के लिए संगठन बनाता है। अपनी जाति की दुकान लेकर एक दल से दूसरे दल में आवागमन करता है। उसके भीतर भी अहंकार आ गया। वह बसपा या बहुजन दलों की कमियों पर चुप रहने लगा।

वह अहंकार ही था कि मेरे जैसों के लिखे को भी जाति के आधार पर खारिज किया जाने लगा। मैं अपनी प्रतिबद्धता से नहीं हिला, लेकिन प्रतिबद्धता की दुकान चलाने वाले अंबेडकर के नाम का इस्तेमाल हथियार की तरह करने लगे। वे लोगों को आदेश देने लगे कि किसे क्या लिखना चाहिए। जिस तरह भाजपा के समर्थक राष्ट्रवाद का सर्टिफिकेट बांटते हैं, उसी तरह अंबेडकरवादियों में भी कुछ लोग सर्टिफिकेट बांटने लगे हैं। हमें समझ लेना चाहिए कि बहुजन पक्ष में कोई कांशीराम नहीं है। कांशीराम की प्रतिबद्धता का मुकाबला नहीं है। वह वैचारिक प्रतिबद्धता थी। अब हमारे पास प्रकाश आंबेडकर हैं जो अंबेडकर के नाम पर छोटे मकसद की राजनीति करते हैं। यही हाल लोहिया का भी हुआ है। जो अंबेडकर को लेकर प्रतिबद्ध हैं उनकी भी हालत गांधी को लेकर प्रतिबद्ध रहने वाले गाधीवादियों की तरह है। दोनों हाशिये पर जीने के लिए अभिशप्त हैं। विकल्प गठजोड़ नहीं है। विकल्प विलय है। पुनर्जीवन है। अगले चुनाव के लिए नहीं है। भारत के वैकल्पिक भविष्य के लिए है।

आपने देखा होगा कि इन पांच सालों में मैंने इन दलों पर बहुत कम नहीं लिखा। लेफ्ट को लेकर बिल्कुल ही नहीं लिखा। मैं मानता हूं कि वाम दलों की विचारधारा आज भी प्रासंगिक हैं मगर उनके दल और उन दलों में अपना समय व्यतीत कर रहा राजनीतिक मानवसंसाधन प्रासंगिक नहीं हैं। उसकी भूमिका समाप्त हो चुकी है। वह सड़ रहा है। उनके पास सिर्फ कार्यालय बचे हैं। काम करने के लिए कुछ नहीं बचा है। वाम दलों के लोग शिकायत करते रहते थे कि आपके कार्यक्रम में लेफ्ट नहीं होता है। क्योंकि दल के रूप में उसकी भूमिका समाप्त हो चुकी थी। बेशक महाराष्ट्र में किसान आंदोलन खड़ा करने का काम बीजू कृष्णन जैसे लोगों ने किया। यह उस विचारधारा की उपयोगिता थी। न कि दल की। दल को भंग करने का समय आ गया है। नया सोचने का समय आ गया है। मैं दलों की विविधता का समर्थक हूं, लेकिन उपयोगिता के बग़ैर वह विविधता किसी काम की नहीं होगी। यह सारी बातें कांग्रेस पर भी लागू होती है। भाजपा के कार्यकर्ताओं में आपको भाजपा दिखती है। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में आपको कांग्रेस छोड़ सबकुछ दिखता है। कांग्रेस चुनाव लड़ना छोड़ दे या चुनाव को जीवन-मरण के प्रश्न की तरह न लड़े। वह कांग्रेस बने।

कांग्रेस नेहरू का बचाव नहीं कर सकी। वह पटेल से लेकर बोस तक का बचाव नहीं कर सकी। आज़ादी की लड़ाई की विविधता और खूबसूरती से जुड़ी ‘अतीत की स्मृतियों’ को ज़िंदा नहीं कर पाई। गांधी के विचारों को खड़ा नहीं कर पाई। आज आप भाजपा के एक सामान्य कार्यकर्ता से दीनदयाल उपाध्याय के बारे में ग़लत टिप्पणी कर दीजिए वह अपनी तरह से सौ बातें बताएंगे, पांच साल में कांग्रेस पार्टी नेहरू को लेकर समानांतर विमर्श पैदा नहीं कर पाई, मैं इसी एक पैमाने से कांग्रेस को ढहते हुए देख रहा था। राजनीति विचारधारा की ज़मीन पर खड़ी होती है, नेता की संभावना पर नहीं। एक ही रास्ता बचा है। भारत के अलग अलग राजनीतिक दलों में बचे मानव संसाधान को अपना अपना दल छोड़ कर किसी एक दल में आना चाहिए। जहां विचारों का पुनर्जन्म हो, नैतिक बल का सृजन हो और मानव संसाधन का हस्तांतरण। यह बात 2014 में भी लोगों से कहा था। फिर खुद पर हंसी आई कि मैं कौन सा विचारक हूं जो यह सब कह रहा हूं। आज लिख रहा हूं।

इसके बाद भी विपक्ष को लेकर सहानुभूति क्यों रही। हालांकि उनके राजनीतिक पक्ष को कम ही दिखाया और उस पर लिखा बोला क्योंकि 2014 के बाद हर स्तर पर नरेंद्र मोदी ही प्रमुख हो गए थे। सिर्फ सरकार के स्तर पर ही नहीं, सांस्कृतिक से लेकर धार्मिक स्तर पर मोदी के अलावा कुछ दिखा नहीं और कुछ था भी नहीं। जब भारत का 99 प्रतिशत मीडिया लोकतंत्र की मूल भावना को कुचलने लगा तब मैंने उसमें एक संतुलन पैदा करने की कोशिश की। असहमति और विपक्ष की हर आवाज़ का सम्मान किया। उसका मज़ाक नहीं उड़ाया। यह मैं विपक्षी दलों के लिए नहीं कर रहा था बल्कि अपनी समझ से भारत के लोकतंत्र को शर्मिंदा होने से बचा रहा था। मुझे इतना बड़ा लोड नहीं लेना चाहिए था क्योंकि यह मेरा लोड नहीं था फिर भी लगा कि हर नागरिक के भीतर और लोकतंत्र के भीतर विपक्ष नहीं होगा तो सबकुछ खोखला हो जाएगा। मेरी इस सोच में भारत की भलाई की नीयत थी।

नरेंद्र मोदी की प्रचंड जीत हुई है। मीडिया की जीत नहीं हुई है। हर जीत में एक हार होती है। इस जीत में मीडिया की हार हुई है। उसने लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन नहीं किया। आज गोदी मीडिया के लोग मोदी को मिली जीत के सहारे ख़ुद की जीत बता रहे हैं। दरअसल उनके पास सिर्फ मोदी बचे हैं। पत्रकारिता नहीं बची है। पत्रकारिता का धर्म समाप्त हो चुका है। मुमकिन है भारत की जनता ने पत्रकारिता को भी खारिज कर दिया हो। उसने यह भी जनादेश दिया हो कि हमें मोदी चाहिए, पत्रकारिता नहीं। इसके बाद भी मेरा यकीन उन्हीं मोदी समर्थकों पर है। वे मोदी और मीडिया की भूमिका में फर्क देखते हैं। समझते हैं। शायद उन्हें भी ऐसा भारत नहीं चाहिए, जहां जनता का प्रतिनिधि पत्रकार अपने पेशेवर धर्म को छोड़ नेता के चरणों में बिछा नज़र आए। मुझे अच्छा लगा कि कई मोदी समर्थकों ने लिखा कि हम आपसे असहमत हैं, मगर आपकी पत्रकारिता के कायल हैं। आप अपना काम उसी तरह से करते रहिएगा। ऐसे सभी समर्थकों का मुझ में यकीन करने के लिए आभार। मेरे कई सहयोगी जब चुनावी कवरेज के दौरान अलग-अलग इलाकों में गए तो यही कहा कि मोदी फैन भी तुम्हीं को पढ़ते और लिखते हैं। संघ के लोग भी एक बार चेक करते हैं कि मैंने क्या बोला। मुझे पता है कि रवीश नहीं रहेगा तो वे रवीश को मिस करेंगे।

दो साल पहले दिल्ली में रहने वाले अस्सी साल के एक बुज़ुर्ग ने मुझे छोटी सी गीता भेजी। लंबा सा पत्र लिखा और मेरे लिए लंबे जीवन की कामना की। आग्रह किया कि यह छोटी सी गीता अपने साथ रखूं। मैंने उनकी बात मान ली। अपने बैग में रख लिया। जब लोगों ने कहा कि अब आप सुरक्षित नहीं हैं। जान का ख़्याल रखें तो आज उस गीता को पलट रहा था। उसका एक सूत्र आपसे साझा कर रहा हूं।

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि, तत: स्वधर्मं कीर्ति च हित्वा पापमवाप्स्यसि।।

मुझे प्यार करते रहिए। मुझे ज़लील करने से क्या मिलेगा। आपका ही स्वाभिमान टूटेगा कि इस महान भारत में आप एक पत्रकार का साथ नहीं दे सके। मेरे जैसों ने आपको इस अपराध बोध से मुक्त होने का अवसर दिया है। यह अपराध बोध आप पर उसी तरह भारी पड़ेगा, जैसे आज विपक्ष के लिए उसकी अतीत की अनैतिकताएं भारी पड़ रही हैं। इसलिए आप मुझे मज़बूत कीजिए। मेरे जैसों के साथ खड़े होइये। आपने मोदी को मज़बूत किया। आपका ही धर्म है कि आप पत्रकारिता को भी मज़बूत करें। हमारे पास जीवन का दूसरा विकल्प नहीं है। होता तो शायद आज इस पेशे को छोड़ देता। उसका कारण यह नहीं कि हार गया हूं। कारण यह है कि थक गया हूं। कुछ नया करना चाहता हूं। लेकिन जब तक हूं, तब तक तो इसी तरह करूंगा। क्योंकि जनता ने मुझे नहीं हराया है। मोदी को जिताया है। प्रधानमंत्री मोदी को बधाई।

साभार: https://naisadak.org/is-2019-mandate-is-against-me-also/

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मिस्टर मीडिया: आर्थिक मंदी के दौर में मीडिया कवरेज के लिए निकला है यह अनोखा ‘फॉर्मूला’

इसमें न किसी बदनामी का खतरा है और न इसे आप पीत पत्रकारिता कह सकते हैं। ऐसी स्थिति में पुरानी पीढ़ी के अनेक पत्रकारों में नई चिंता देखी गई है

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Friday, 15 November, 2019
Last Modified:
Friday, 15 November, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

इन दिनों मीडिया संस्थानों और मीडिया घरानों की ओर से इवेंट्स कराना आम होता जा रहा है। इसके संस्थान को दो लाभ हैं। वह खबर का उत्पादन करता है और धन भी कमाता है। आर्थिक मंदी के इस दौर में यह एक अनोखा फॉर्मूला निकला है। खबर की फसल पैदा करने का फायदा यह है कि वह उस संस्थान की अपनी संपत्ति होती है इसलिए एक्सक्लूसिव की मोहर लग जाती है। मीडिया समूह इवेंट के कंटेंट को कई दिन तक थोड़ा-बहुत फेरबदल करके पाठकों और दर्शकों तक पहुंचाता रहता है। नए-नए मुद्दे पक्ष और प्रतिपक्ष के राजनेताओं से सवालों के आधार पर उगते रहते हैं। चैनल समझते हैं कि इससे टीआरपी बढ़ती है।

इसके अलावा इवेंट को प्रायोजित करने वाले घरानों को धन देने के बदले में सामाजिक और राजनीतिक पहचान भी मिलती है। इसमें न किसी बदनामी का खतरा है और न इसे आप पीत पत्रकारिता कह सकते हैं। ऐसी स्थिति में पुरानी पीढ़ी के अनेक पत्रकारों में नई चिंता देखी गई है। बीते दिनों लगातार हो रहे मीडिया सेमिनारों में यह बात गंभीरता से उभरकर आई कि विज्ञापन के आवरण में समाचार का उत्पादन कितना जायज है?

मीडिया संस्थान जब ऐसा करते हैं तो वह एक तरह से विज्ञापन जैसी ही कोई श्रेणी होती है। विज्ञापन में अखबार/टेलिविजन चैनल/डिजिटल मीडिया संस्थानों का विज्ञापन के कंटेंट पर सीधा नियंत्रण नहीं होता, लेकिन उसका अपने इवेंट के कंटेंट पर पूरा नियंत्रण होता है। यानी इवेंट भी, विज्ञापन भी, विज्ञापन का कंटेंट भी और उसके बाद उससे निकली खबर पर भी सौ फीसदी एक्सक्लूसिव कंट्रोल। मीडिया संस्थान हेडलाइन भी बनाते हैं और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों के समकक्ष अपने विज्ञापननुमा इवेंट से उपजी खबरें बिठाते हैं। सवाल यह है क्या यह अपने बैनर या ब्रैंड का अनुचित इस्तेमाल है?

यह भी एक पहलू है कि अगर यह सिलसिला जिला और तहसील स्तर तक फैल गया तो हर छोटा और मंझोला मीडिया संस्थान धन कमाने के लिए अपने-अपने आयोजन करेगा और अपनी अपनी सुर्खियां रचेगा तो देश की मिट्टी से निकलने वाली वास्तविक खबरें कहां जाएंगी और गढ़ी तथा पकाई गई खबरें क्या पाठकों तथा दर्शकों के साथ अन्याय नहीं होंगी? मेरे जेहन में यह प्रश्न भी है।

एक सेमिनार में सुझाव आया कि मीडिया संस्थान को अपने इवेंट या कॉन्क्लेव दिखाते समय या अखबार के पन्नों पर परोसते समय उसे एडवर्टोरियल या इंपेक्ट फीचर लिखना चाहिए। इससे कोई नैतिक सवाल नहीं पनपेगा और अपने-अपने खबर लोक रचने का अवसर भी नहीं मिलेगा।

मैं स्वीकार करता हूं कि आजकल मीडिया संस्थान अत्यंत आर्थिक दबाव में हैं। अब उनके लिए विज्ञापन का बाजार पहले की तरह नहीं खुला है, लेकिन एक इवेंट से चार महीने चैनल या अखबार का खर्च निकालना और उसकी खबर खपाना कितना ठीक है। इवेंट के सह आयोजक ढूंढ़ना, उनसे धन लेना फिर उन्हीं के आला अफसरों या मैनेजमेंट से जुड़े व्यक्तियों को सम्मान या अवार्ड देना और उनके समाचार दिखाना या प्रकाशित करना क्या दूध में पानी मिला देने की तरह नहीं  है।

प्रादेशिक अखबारों में भी इस तरह की प्रवृति शुरू हो गई है। बीते दिनों  ग्वालियर में विकास संवाद और आईटीएम विश्वविद्यालय में एक विशेषज्ञ ने इंदौर का उदाहरण दिया कि किसी कार्यक्रम के लिए यदि आयोजक एक ही अखबार में विज्ञापन देता है तो अन्य सारे समाचारपत्र उस कार्यक्रम की खबर का बहिष्कार कर देते हैं। शहर को पता ही नहीं चलता कि ऐसा कोई आयोजन भी शहर में हुआ है। यह कौन सी पत्रकारिता है मिस्टर मीडिया?

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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‘बाहर पड़ी यह लाश वशिष्ठ बाबू की नहीं, सिस्टम की लाश है’

यकीन मानिए कि समाज में बहुत सारे आदर्श दोबारा जन्म लेंगे, लेकिन वशिष्ठ बाबू जैसा शख्स सदियों में कभी कभार ही धरती पर आता है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Thursday, 14 November, 2019
Last Modified:
Thursday, 14 November, 2019
Anuranjan Jha

अनुरंजन झा, वरिष्ठ पत्रकार।।

सुबह-सुबह सूचना मिली कि वशिष्ठ बाबू नहीं रहे। जो नहीं जानते, उनके लिए एक गणितज्ञ। जो जानते हैं, उनके लिए दूसरे रामानुजन और हमारे लिए ‘बिहार विभूति’ सर। यह भी गजब इत्तेफाक है कि कल ही यह सूचना आई कि उनके जीवन पर फिल्म बनाने के लिए जिन दो निर्माताओं के बीच कॉपीराइट को लेकर कानूनी विवाद फंसा हुआ था, उसे एक्सेल इंटरटेनमेंट ने जीत लिया है। रात ही हमने इनके मुद्दे पर कई लोगों से काफी बात की और थोड़ा सुकून था कि चलो इस विवाद के बाद अब सिनेमा पर काम शुरू होगा तो वशिष्ठ बाबू को दुनिया और ठीक से जान पाएगी।

दुनिया जान पाएगी कि चाणक्य की धरती बिहार में हाल के दिनों तक विश्व को गुरुमंत्र देने वाले लोग पैदा होते रहे हैँ। सोशल मीडिया का सूचना के मामले में जबरदस्त लाभ हुआ है। खबर सोशल मीडिया पर अगले एक घंटे में तैरने लगी। अपनी-अपनी सूचना और जानकारी के हिसाब से लोग उनको श्रद्धांजलि भी देने लगे। हम जितनी बार वशिष्ठ बाबू से मिले,  निश्चित तौर पर उनको कुछ भी याद नहीं रहा होगा, क्योंकि जबसे हमने होश संभाला है, तब से वो सिजोफ्रेनिया के शिकार हैँ, लेकिन हर मुलाकात हमें उत्साह और उर्जा से भर देती थी। निश्चित तौर पर हमारे लिए उनका जाना एक व्यक्तिगत क्षति है।

डिजिटल माध्यम पर उनके निधन की तैरती खबरों के बीच एक ऐसी खबर पर हमारी नजर पड़ी, जिसने हमें कुछ देर के लिए सुन्न कर दिया। उतने मर्माहत तो हम यह खबर सुनकर भी नहीं हुए कि वो नहीं रहे। एक रिपोर्ट देखी, जिसमें साफ-साफ दिखा कि पटना में निधन के बाद उनकी लाश अस्पताल से बाहर तकरीबन फेंक दी गई। उसे घर ले जाने के लिए एक अदद एंबुलेंस की व्यवस्था भी प्रशासन नहीं कर पाया।

आनन-फानन में सरकार ने सरकारी सम्मान से अंतिम संस्कार की घोषणा तो कर दी, लेकिन जिस तरीके का व्यवहार अस्पताल प्रशासन ने किया, वो वाकई शर्मसार करने वाला है। अस्पताल में अंतिम दिनों में कुछ राजनेता मिलने भी गए, क्योंकि उनको अपना फोटो कराना था। नहीं तो उनके जीवन से इन राजनेताओं का कोई लेना-देना नहीं रहा। क्यूंकि अगर रहा होता तो न तो वशिष्ठ बाबू की यह हालत होती और न ही वो गुमनामी की जिंदगी जीते हुए मरते।

जिस तरीके से वशिष्ठ बाबू की लाश बाहर रखी थी और समाज और राजनीति का कोई व्यक्ति नहीं पहुंचा था, उसे देखकर यही लगा कि यह लाश वशिष्ठ बाबू की नहीं, हमारे गौरव की लाश है। जिस शख्स ने 19 साल की उम्र में कैलिफोर्निया से पीएचडी करके एक वक्त में सबसे कम उम्र में यह डिग्री पाने का गौरव हासिल किया हो, यह उस गौरव की लाश है। जिस शख्स ने आइंस्टाइन जैसे वैज्ञानिक के सिद्धांतों तो चुनौती दी हो, यह उस चुनौती की लाश है। जो बीमार होने के बाद भी 40 से ज्यादा सालों तक हर दीवार पर गणित के फार्मूले लिखता रहा हो, यह उस फार्मूले की लाश है। जिसने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करने की शर्त पर नासा को ठुकरा कर देश के IIT में पढ़ाना पसंद किया हो, यह उस आत्मसम्मान की लाश है।

फिल्मकार नितिन चंद्रा ने ठीक ही तो कहा कि यह ये वशिष्ठ नारायण की लाश नहीं है, ये बिहारियों की बिहार के प्रति संवेदनशीलता की लाश है। यकीन मानिए समाज में बहुत सारे आदर्श दोबारा जन्म लेंगे, लेकिन वशिष्ठ बाबू जैसा शख्स सदियों में कभी कभार ही धरती पर आता है।

चूंकि मैं आशावादी हूं, इसलिए फिर कहता हूं कि अब भी समय है, चेत जाइए, सिस्टम बदलने का प्रयास कीजिए। अब भी अपने को बचाने की कोशिश कीजिए, धरोहरों का सम्मान कीजिए। भविष्य तभी ठीक होगा,  नहीं तो कभी दाना मांझी अपनों की लाश कंधों पर ढोकर घर ले जाएगा और कभी ये सिस्टम वशिष्ठ बाबू की लाश को झटके में सड़क पर पटक देगा।  वशिष्ठ बाबू को भावभीनी श्रद्धांजलि।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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‘जब टीएन शेषन को सुनने के लिए लोग हो गए थे बेकाबू’

सर्वश्रेष्ठ शहरी रिपोर्टिंग का पुरस्कार मुझे मिला था, इसके बावजूद मुझे और मेरे परिवार को एंट्री में जद्दोजहद करनी पड़ी

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Monday, 11 November, 2019
Last Modified:
Monday, 11 November, 2019
TN Seshan and Amitabh Shrivasta

टीएन शेषन नहीं रहे, जिन्होंने चुनाव आयोग के महत्व और अधिकारों को धरातल पर उतारा। ये स्मृति है तब की है, जब वे भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त थे। मौका था भोपाल के रवीन्द्र भवन में ‘भास्कर ग्रुप’ के द्वारका प्रसाद अग्रवाल स्मृति पुरस्कार का। सर्वश्रेष्ठ शहरी रिपोर्टिंग का पुरस्कार मुझे मिला था, इसके बावजूद मुझे और मेरे परिवार को एंट्री में जद्दोजहद करनी पड़ी, ये क्रेज था टीएन शेषन का।

रवीन्द्र भवन खचाखच भरा था, मध्यप्रदेश का मंत्रिमंडल, राजनीतिक हस्तियां, संपादक और तमाम जाने-माने लोग सिर्फ शेषन को देखने-सुनने आए थे। पास से एंट्री होने के बाद भी पास वाले बाहर खड़े थे। शेषन के आने के पहले ही हॉल भर चुका था। जब मैं पहुंचा तो सुरक्षाकर्मियों ने भीतर जाने से मना कर दिया। उनका कहना था कि आप अकेले जाएंगे, जबकि ‘भास्कर समूह’ की ओर से अपने परिवार सहित मुख्य पुरस्कार के लिए आमंत्रित था।

गेट पर मौजूद सुधीर अग्रवाल जी तक बात पहुंची और फिर वे आगे आकर हम सभी को भीतर ले गए। इस समारोह में देश के जाने-माने पत्रकार सूर्यकांत बाली को विचार लेखन के लिए पुरस्कार मिलना था। मुझे जो जानकारी मिली, उसके मुताबिक उन्होंने किसी राजनेता से सम्मानित होने से मना कर दिया था और इसलिए शेषन जी से ‘भास्कर ग्रुप’ ने संपर्क साधा।

ये ‘भास्कर ग्रुप’ का प्रभाव था कि वे इस प्रोग्राम में आने को तैयार हो गए और ये प्रोगाम सुपरहिट हो गया। रवीन्द्र भवन के बाहर जितनी लंबी कतार थी, वैसी मैंने इस तरह के प्रोग्राम में कभी नहीं देखी। हॉल के बाहर बड़े पर्दे पर लोग शेषन को देख-सुन सकते थे, लेकिन भीड़ उन तक पहुंचने को बेकाबू थी।

वही हुआ, जिसकी आशंका थी। हॉल के कांच तक टूट गए, लेकिन जल्द ही सब कुछ कंट्रोल हो गया। शेषन उसके पहले या बाद में शायद ही किसी कार्यक्रम में मुख्य चुनाव आयुक्त रहते हुए नजर आए होंगे। ये पहला द्वारिका प्रसाद अग्रवाल स्मृति पुरस्कार था और पता नहीं क्यों आखिरी भी। ‘भास्कर ग्रुप’ ने कई दिनों तक अखबार में जोर-शोर से इसका प्रचार किया था। देश के जाने-माने लोगों ने पुरस्कारों का चयन किया। जिन्हें पुरस्कार मिलना था, उनकी और अतिथियों की तस्वीरें कई दिनों तक प्रकाशित कीं। ‘रसरंग’ में इंटरव्यू भी छापे। तो ये था शेषन का जलवा। नमन।

(वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ श्रीवास्तव की फेसबुक वॉल से साभार)

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बिना मुस्कुराए न रह पाएंगे जब पढ़ेंगे- रामलला हम आएंगे TRP कमा के जाएंगे

दही ही दिखाओ और दही ही परोसो, रायता मत बनाओ। लेकिन ‘द शो मस्ट गो ऑन’ को ध्येय मानने वाले अब छन्नी से अयोध्या छान रहे हैं

प्रमिला दीक्षित by प्रमिला दीक्षित
Published - Monday, 11 November, 2019
Last Modified:
Monday, 11 November, 2019
Pramila Dixit

प्रमिला दीक्षित, वरिष्ठ पत्रकार।।

सबसे पहले तो मैं ये स्पष्ट कर दूं कि मुद्दा आस्था का है और संवेदनशील जरूर,लेकिन जब आप इस विश्लेषण को पढ़ें तो रोहित शेट्टी की मूवी जितना दिमाग लगाएं, सत्यजीत रे न बनें। ओ रामजी बड़ी टीआरपी  दीना...आस्था के जिस मुद्दे पर चैनलों को आज तक बड़ी टीआरपी मिलती आयी थी, शनिवार उसके चरम का दिन था। चैनल नहा धोकर तैयार थे, पहले दिक्कत ये रही कि अचानक तारीख आई और चैनलों के बड़े चेहरे जो दिल्ली में या बाहर थे, सब आपाधापी में अयोध्या दौड़ाए गए।

जैसे शैतान बच्चे को मम्मी-पापा बताते हैं कि शैतानी नहीं करनी है। फिर वो घर में आने वाले हर शख्स को जैसे बताता है कि वो कितना अच्छा  बच्चा है, शैतानी नहीं करता है, शैतानी नहीं करनी चाहिए। चैनल सुबह से ही शांति बनाए रखने और सौहार्द कायम रखने की अपील करते रहे। लेकिन शांति बनाए रखने की अपील आप सबसे तो कर सकते हैं, अरनब से अलग से करनी चाहिए थी। आवाज की बुलंदी तो आप फिर भी किसी मीटर पे माप सकते हो, लेकिन जोश का वो सांचा ही नहीं बना, जो रिक्टर स्केल पर अरनब का जोश तौल सके।

मौत पर रूदाली, चन्द्रयान पर एस्ट्रोनॉट, ओलंपिक मेडल पर खुद ही खेल-खिलाड़ी बन जाने वाले चैनल समझ ही नहीं पा रहे थे कि आज क्या बनें! ‘आजतक’ पर अंजना ओम कश्यप ने जोश को गरम कर के तरल बनाकर गंभीरता के रूप में धारण कर लिया। सधे लफ्जों में ठहर-ठहर (वैसे भी आजकल वो फिसली जुबान के लिए जानी जाती हैं) शांति बनाए रखने की अपील के साथ खबर बताती रहीं। ‘आम आदमी पार्टी’ के पूर्व नेता आशुतोष जब भी ‘आजतक’ पर होते हैं, वो भूल जाते हैं कि अब वो गेस्ट हैं, खुद मैनेजिंग एडिटर नहीं। वो एंकर को बताने लगे कि ऐसे मामलों में पूरा फैसला आने के बाद ही खबर दिखानी चाहिए, एक-एक बिंदु बताने में गड़बड़ी होगी।

‘एबीपी’ में सुमित अवस्थी ने मोर्चा संभाला, लेकिन फैसला आने से पहले उनकी आवाज और लहजे में पैमाना सेट होने की कशमकश दिखी। कम जोश से मामला बोझिल हो जाता है और ज्यादा जोश से गाइडलाइन के बाहर। ये दिक्कत कई चैनलों-एंकरों की रही। लेकिन काउंटडाउन पढ़ते हुए आप रोमाना की आवाज में खनक दिखाई दी।

‘एनडीटीवी’ अपने अनुभवी चेहरों के साथ स्टूडियो में भी था और मैदान में भी। अरे हां! अब समझ आया, इतनी देर मैंने ‘एनडीटीवी’ क्यूं देखा? क्यूंकि वहां पूरी खबर थी, पूरा विश्लेषण, कोई मातम नहीं। बेरोजगारी और भुखमरी को पूरी खबर में कहीं जबरदस्ती नहीं डाला गया था। मनोरंजन, नगमा, निधि कुलपति, आशीष भार्गव, कादम्बिनी शर्मा और हिमांशु सब बधाई के पात्र हैं। जितनी देर वो रहे, स्क्रीन पर कोई विलाप नहीं हुआ। मोदी जी का जिक्र नहीं हुआ। बस फैसले, बस खबर पर बात हुई और बहुत शानदार हुई।

कई बार जिन बच्चों के नोट्स कमजोर होते हैं, वो कॉपी इतनी सजा देते हैं कि देखने वाला लुक पर ही रुक जाए। सो सुधीर चौधरी विहीन सुबह के लिए ‘जी’ ने ग्राफिक्स पर ही सारी मेहनत झोंक दी। लाल-पीली स्क्रीन और रामजी की मूरत देख, एक पल के लिए तो कोई भी श्रद्धालु रुक ही जाएगा और फिर फैसला आने के बाद ‘जी’ ही पहला था, जिसने स्क्रीन पर बड़ा-बड़ा ‘मंदिर वहीं बनेगा’ लिखने की हिम्मत दिखाई।

‘एबीपी’ खबर के वक्त पेस पकड़ चुका था। निपुण सहगल की रिपोर्टिंग शानदार रही। खबर के बाद अब क्या? सोच-सोच कर ‘आजतक’ उतावला हुए जा रहा था। शांति बनाए रखने की अपील करने के साथ-साथ ओवैसी टाइप मसाला तो चाहिए ही था। सब तरफ से आती स्वागत की खबरों के बीच 'आजतक' ने ओवैसी को खबर की संभावना के तहत बराबर जगह दी। खैर, सलाह तो थी। 

खैर ये ऐसा दही है, बरसों बाद जमा है। दही ही दिखाओ और दही ही परोसो, रायता मत बनाओ। लेकिन ‘द शो मस्ट गो ऑन’ को ध्येय मानने वाले अब छन्नी से अयोध्या छान रहे हैं। कहीं राम जी खुद ही साक्षात टकरा जाएं और बोलें- ‘हे ब्रो आइ एम हियर’ और फिर चैनलवाले उनको पकड़ कर 'पीपली लाइव' का नत्था बना दें। 

(ये लेखिका के निजी विचार हैं।)

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‘SC के फैसले पर सटीक बैठती है अंग्रेजी की ये कहावत’

सच तो यही है कि इस समय देश में शांति और भाईचारा बनाये रखना ही हम देशवासियों का कर्तव्य है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Saturday, 09 November, 2019
Last Modified:
Saturday, 09 November, 2019
SC

निर्मलेंदु, वरिष्ठ पत्रकार।।

अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला। विवादित जमीन का मालिकाना हक रामलला विराजमान को, मस्जिद के लिए दी जाएगी दूसरी जगह। मेरी नजर में यह एक उत्तम और ऐतिहासिक फैसला जरूर है, लेकिन मुस्लिम पक्ष फैसले से संतुष्ट नहीं है। हालांकि ऐसी स्थिति में भी उन्होंने देशवासियों से अपील की कि पूरा देश शांति बनाये रखे। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मील का पत्थर है, शांति व सद्भाव बनाए रखें।

जी हां, देर आयद दुरुस्त आयद, अंग्रेजी में कहते हैं कि इज बेटर लेट, दैन एवर, यानी फैसला देर से जरूर आया, लेकिन दुरुस्त फैसला है यह। स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि सत्य को हजार तरीकों से बताया जा सकता है, फिर भी हर एक सत्य ही होगा। प्रधानमंत्री ने कहा, देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या पर अपना फैसला सुना दिया है। पीएम ने यह भी कहा कि फैसले को किसी की हार या जीत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि न्याय के मंदिर ने दशकों पुराने मामले का सौहार्दपूर्ण तरीके से समाधान कर दिया। केंद्रीय गृहमंत्री और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, अरविंद केजरीवाल और कुछ लोगों ने भी इस फैसले का स्वागत किया है।

कवि गुरु रबींद्रनाथ टैगोर ने कहा था कि तथ्य कई हो सकते हैं, लेकिन सत्य एक ही है और वह सत्य आज लोगों के सामने है। टैगोर ने यह भी कहा था कि जो अपना है, वह मिलकर ही रहेगा। अपना था, इसीलिए मिल गया। विदुर नीति में यह बात कही गयी है कि जिस व्यक्ति के पास ज्ञान है, वह समाधान निकाल ही लेता है। हमारे सुप्रीम कोर्ट के विचारकों के पास ज्ञान है, इसलिए उन्होंने समाधान निकाल ही लिया है। विदुर ने यह भी कहा था कि यदि बगैर किसी संघर्ष के आपको कोई चीज मिल जाती है, तो उसकी कीमत आपको समझ में नहीं आती है। वहीं, अगर आप अपने जीवन में किसी चीज को कड़ी मेहनत के बाद प्राप्त करते हैं, यानी उसे प्राप्त करने में बीस-तीस साल भी लग जाएं, तो उसका एक अलग ही महत्व आपके जीवन में होता है।

बापू यानी महात्मा गांधी ने कहा था, ‘आपको मानवता में विश्वास नहीं खोना चाहिए। मानवता सागर के समान है, यदि सागर की कुछ बूंदें गंदी हैं तो पूरा सागर गंदा नहीं हो जाता।’ गांधीजी ने यह भी कहा था कि विश्वास को हमेशा तर्क से तौलना चाहिए, क्योंकि जब विश्वास अंधा हो जाता है तो मर जाता हैं। जी हां, यहां भी विश्वास को तर्क के साथ तौला गया और इसीलिए वह विश्वास मरा नहीं। फैसला आया और ऐसा फैसला आया कि जिसकी कोई काट ही नहीं है। तर्क, कुतर्क और बोलवचन फेल हो गये और एक नया विश्वास पैदा हो गया, जो कि अटूट है, अकाट्य है, अमूल्य है और निश्छल है।

अब आइए जानते हैं कि ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने क्या कहा था? उन्होंने कहा था कि सबसे अनमोल धन है विद्या, क्योंकि इसके आने मात्र से ही सिर्फ अपना ही नहीं, अपितु पूरे समाज का कल्याण होता है। आज सुप्रीम कोर्ट के जजों ने यह साबित कर दिया कि उन्होंने सही विद्या हासिल की है। उन्होंने अपने इस निर्णय से पूरे समाज का कल्याण कर दिया। जी हां, समाज का कल्याण कर दिया है। इंसाफ के मंदिर के वे पांचों जज हीरो बन गये हैं। यह फैसला नहीं, एक नजीर, एक मिसाल है न्याय के मंदिर का। हमें सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले का मिल-जुलकर सम्मान व आदर करना चाहिए।

सच तो यही है कि इस समय देश में शांति और भाईचारा बनाये रखना ही हम देशवासियों का कर्तव्य है। हमें अफवाहों से भी सावधान व सजग रहना होगा। इस समय हमें किसी के बहकावे में नहीं आना चाहिए। अमन-चैन, शांति, आपसी भाईचारा, सद्भाव व सौहार्द हम बनाए रखेंगे, तो कोई भी हमारा नुकसान नहीं कर पाएगा। आज नफरत व वैमनस्य को परास्त करने का समय आ गया है।

हालांकि मुस्लिम पक्ष के वकीलों ने कहा, ‘हम फैसले से संतुष्ट नहीं हैं, कुछ गलत तथ्य पेश किए गए, हम उनकी जांच करेंगे।’ साथ ही उन लोगों ने यह भी कहा कि उच्चतम न्यायालय का फैसला है, इसलिए हम उसका सम्मान करते हैं। पूरे देश को शांति बनाए रखनी चाहिए। मुस्लिम पक्ष के एक वकील ने कहा, ‘फैसला हमें बाबरी मस्जिद नहीं देता, जो हमारे हिसाब से गलत है।‘ मुस्लिम पक्ष के दूसरे वकील ने कहा, ‘हमारे लिए पांच एकड़ जमीन के कोई मायने नहीं हैं। हम फैसले से जरा भी संतुष्ट नहीं हैं।‘ हालांकि साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हम नागरिकों से शांति बनाए रखने की अपील करते हैं।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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मिस्टर मीडिया: अगर इस तरह की खबरें सच हैं तो यह शुभ संकेत नहीं है

मेरा मानना है कि लोकतंत्र के गुलदस्ते में हर विचारधारा के फूल खिलते हैं

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Friday, 08 November, 2019
Last Modified:
Friday, 08 November, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

अगर राज्यसभा टेलिविजन और लोकसभा टेलिविजन के विलय की खबरें सच हैं तो यह शुभ संकेत नहीं है। देश के बजट का आकार देखते हुए सौ-पचास करोड़ रुपए बचा लेना कोई तर्कसंगत इसलिए भी उचित नहीं ठहराया जाना चाहिए, क्योंकि ये दोनों कोई विशुद्ध खबरिया चैनल नहीं हैं। न ही इनके कोई छिपे हुए राजनीतिक हित होते हैं। नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय लोकतंत्र के विराट आकार और प्राचीन महत्व को देखते हुए संसद के दोनों सदनों के अपने चैनलों ने संसार के तमाम लोकतांत्रिक देशों में भारत का मान बढ़ाया है। हिंदुस्तान के इन चैनलों की कामयाबी को देखते हुए अनेक देशों ने राज्यसभा टेलिविजन से सहयोग के लिए संपर्क भी किया था। इस चैनल का संस्थापक कार्यकारी निदेशक/संपादक होने के नाते मुझे यह अनुभव हुआ था।

सच तो यह है कि नई सदी में प्रवेश करने के साथ ही अनेक पश्चिमी और यूरोप के देशों की तर्ज पर भारत में भी संसद टीवी का विचार बहस के स्तर पर अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार के दरम्यान आया था। उसके बाद यूपीए सरकार आई तो लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने लोकसभा टीवी को हरी झंडी दी। सरकार उन्हीं दिनों राज्यसभा टीवी भी शुरू करना चाहती थी, लेकिन राज्यसभा के तत्कालीन सभापति भैरों सिंह शेखावत इसके पक्ष में नहीं थे। इसलिए यह मामला लटक गया।

यूपीए के दूसरे कार्यकाल में एक बार फिर यह बहस छिड़ी और 2010 में इसे शुरू करने का निर्णय हुआ। कार्यकारी संपादक के तौर पर मेरा अनुबंध हुआ। बाद में मेरा पदनाम कार्यकारी निदेशक कर दिया गया। 26 अगस्त 2011 को अत्यंत सीमित संसाधनों के साथ राज्यसभा टीवी शुरू हो गया। पहले दिन चार घंटे का प्रसारण किया। इसके बाद तो चैनल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। देखते ही देखते इसने आसमानी बुलंदियों को छुआ और इसके अनेक कार्यक्रम लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचे ।

मुझे लगता था कि एक तरफ तो भारतीय लोकतंत्र की तूती दुनिया में बोलती है, दूसरी ओर मुल्क के आम आदमी की संसद के कामकाज में दिलचस्पी घटती जा रही है। संसद के भीतर साल भर देश के भले के लिए अनेक समितियां किस तरह काम करती हैं, उसकी जानकारी भी लोगों तक पहुंचाने का कोई जरिया नहीं था। यह विरोधाभास था कि संसद को हम लोकतंत्र का सर्वोच्च मंदिर कहते हैं, पर उस मंदिर में होने वाली गतिविधियों से वाकिफ ही नहीं रहते। चैनल शुरू करते समय हमारा बड़ा सरोकार यही था।

मेरा मानना है कि लोकतंत्र के गुलदस्ते में हर विचारधारा के फूल खिलते हैं। जिस तरह संसद की राष्ट्रीय गंगा में हर विचारधारा की नदी शामिल हो जाती है। चुनाव आयोग सारी विचारधाराओं वाली पार्टियों को संरक्षण देता है तो संसद के चैनल में सभी दलों और सभी राजनीतिक विचारों को जगह मिलनी चाहिए। हमने वही किया। नतीजा यह कि देश के करोड़ों दर्शकों का परिवार हमारे साथ जुड़ा। उन्हें ताज्जुब होता था कि इस चैनल पर सरकार की सख्त आलोचना कैसे हो रही है। चाहे वह यूपीए सरकार रही हो या एनडीए। अगर सदन के भीतर पक्ष और विपक्ष बोल सकते हैं तो सदन के चैनल पर क्यों नहीं? मुझे गर्व है कि मेरे कार्यकाल में अनेक वर्षों तक यूपीएससी तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल हुए छात्र कहा करते थे कि परीक्षाओं की तैयारी के लिए उन्होंने केवल राज्यसभा टीवी देखा। अलग से पढ़ाई नहीं की ।

दरअसल, संसद एक तरह से देश की मां है। एक चैनल आठ सौ सांसदों की आवाज, उनके निर्वाचन क्षेत्र, उनके मुद्दे, जनता की आवाज, दोनों सदनों की कार्रवाई, स्थाई समितियों, लोकलेखा समिति, संयुक्त संसदीय समिति, प्रवर समिति तथा अनेक विभागीय समितियों का काम नहीं दिखा सकता। हमने राज्यसभा चैनल में फ़िल्में नहीं दिखाईं, फ़ूहड़ सीरियल नहीं दिखाए, विज्ञापन नहीं दिखाए, ब्रेक तक नहीं लिए।  हमारे समाचार तथ्यपरक और निष्पक्ष होने का पूरा प्रयास करते थे। हमारे एंकर अपने शो के लिए पूरी पढ़ाई करते थे। चीखपुकार और गाली गलौज संस्कृति को बढ़ावा नहीं देते थे और विषयों के विशेषज्ञ ही बुलाते थे ।

बहरहाल! अब यदि यह अतीत बनने जा रहा है तो भारत की संसदीय पत्रकारिता को बड़ा झटका है। वैसे भी अधिकतर पत्रकारिता शिक्षण संस्थानों में संसदीय पत्रकारिता नहीं पढ़ाई जाती। पत्रकारिता के छात्र इन चैनलों से काफी कुछ सीखते थे। पत्रकारिता के लिए ही नहीं, लोकतांत्रिक परिपक्वता के अनुष्ठान में भी बाधा पहुंचेगी मिस्टर मीडिया।

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: किसी पत्रकार को कवरेज का ऐसा दिन देखने का मौका न मिले तो अच्छा

मिस्टर मीडिया: यह विचार की जालसाजी अथवा धोखाधड़ी नहीं तो और क्या है?

मिस्टर मीडिया: राजदीप के विडियो और अजीत अंजुम के खुलासे के मायने भी समझिए

इन सवालों के जवाब आप खुद तलाशिये मिस्टर मीडिया

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दो खेमों में बंटी उप्र मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति

समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी और सचिव शिवशरण सिंह ने जारी किया अलग-अलग बयान

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Thursday, 07 November, 2019
Last Modified:
Thursday, 07 November, 2019
Committee

‘उप्र राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति’ के आधे पदाधिकारियों की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात के बाद संवाददाता समिति के दो फाड़ होने के आसार पैदा हो गये हैं। आज संवाददाता समिति के सचिव शिवशरण सिंह के नेतृत्व में समिति के चंद पदाधिकारियों ने मुख्यमंत्री से मुलाकात करके प्रदेश के पत्रकारों की जायज जरूरतों की मांग की थी। इनमें पत्रकारों के लिए सरकरी आवास और सुरक्षा की मांग प्रमुख थीं।

मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद सचिव शिवशरण सिंह ने एक विज्ञप्ति जारी कर इस मुलाकात का विवरण पत्रकारों के समक्ष प्रस्तुत किया। इसके बाद उ.प्र.मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने समिति के चंद पदाधिकारियों की मुख्यमंत्री से मुलाकात पर एतराज जताते हुए एक पत्र जारी किया। इसमें उन्होंने लिखा कि मुख्यमंत्री से समिति की मुलाकात आधिकारिक नहीं थी, बल्कि कुछ पदाधिकारी/सदस्य निजी एजेंडा पर मिले थे।

तिवारी ने समिति द्वारा जारी किए पत्र में लिखा कि उत्तर प्रदेश राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के निर्वाचित प्रतिनिधियों के किसी आधिकारिक प्रतिनिधि मंडल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बुधवार को मुलाकात नही की है। समिति के पदाधिकारियों को इस संदर्भ में न तो बुलाया गया था नही समिति की ओर से आधिकारिक तौर पर कोई ज्ञापन पत्रकारों से संबंधित मांगों का सौंपा गया है।

समिति अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने साफ किया है कि बुधवार को मुख्यमंत्री से समिति के मात्र चंद पदाधिकारी व्यक्तिगत स्तर पर मिले थे और अपनी निजी रुचि के अनुसार उन्होंने मांगों से संबंधित ज्ञापन सौंपा था। तिवारी ने बताया कि संवाददाता समिति के सभी निर्वाचित पदाधिकारियों ने एक साथ मुख्यमंत्री से मुलाकात के लिए समय मांगा है, जो अब तक नहीं मिल सका है। इन परिस्थितियों में महज चार-पांच पदाधिकारियों की मुलाकात व्यक्तिगत तो हो सकती है, पर समिति की आधिकारिक नही।

उन्होंने कहा कि समिति की ओर मुख्यमंत्री से मुलाकात होने की दशा में सभी निर्वाचित पदाधिकारी जाएंगे और सबकी सहमति से पत्रकारों की मांगों से संबंधित ज्ञापन उन्हें सौंपा जाएगा। समिति अध्यक्ष ने खेद जताया कि मुख्यमंत्री के एक मीडिया सलाहकार कुछ चहेते पदाधिकारियों की मुलाकात करवा कर पत्रकारों की एकता को खंडित करना चाहते हैं जो प्रदेश अथवा सरकार के हित में नहीं है।

उन्होंने कहा कि समिति में सभी पदाधिकारी बड़ी संख्या में पत्रकार साथियों का विश्वास व मत पाकर जीते हैं और सभी को मुख्यमंत्री के सामने अपनी बात रखने का समान हक होना चाहिए। उन्होंने प्रदेश सरकार को आगाह किया कि मीडिया सलाहकार को पत्रकारों के हितों के लिए कार्ययोजना बनाने और मुख्यमंत्री की छवि चमकाने के काम में गंभीरता से जुटना चाहिए न कि पत्रकारों के बीच गुटबाजी को प्रश्रय देने व अपनी मनमानी करने में। संवाददाता समिति अध्यक्ष ने सभी निर्वाचित पदाधिकारियों की ओर मुख्यमंत्री से मिलने का समय देने का अनुरोध करते हुए कहा कि पत्रकारों की कई समस्याओं पर विचार व उनकी मांगों का निराकरण अति आवश्यक है।

इससे पूर्व संवाददाता समिति के सचिव ने मुख्यमंत्री से मुलाकात के तुरंत बाद जो विज्ञप्ति जारी की वो इस प्रकार थी-

मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति ने पत्रकारों की समस्याओं को लेकर मुख्यमंत्री से की मुलाकात

उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति ने आज मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उनके आवास पर भेंट कर उन्हे एक अनुरोध पत्र सौंपा। इसमें पत्रकार की समस्याओं का उल्लेख किया गया। वार्ता के दौरान मुख्यमंत्री ने समिति के सदस्यों की बातों को ध्यानपूर्वक सुना और उनके निराकरण का आश्वासन दिया। समिति के सचिव शिवशरण सिंह के नेतृत्व में मिले इस शिष्टमंडल ने मुख्यमंत्री आवास पहुंचकर उनसे आग्रह किया कि राज्य मुख्यालय में कार्यरत पत्रकारों को आवास की भीषण समस्या का सामना करना पड़ रहा है। पूर्व में मुख्यमंत्री की तरफ से पत्रकारों को निजी आवास (फ्लैट) देने का मौखिक आश्वासन दिया गया था। जिस पर अब तक कोई कार्यवाही नहीं हो सकी है। इस पर मुख्यमंत्री जी ने समिति को आश्वासन दिया कि सरकार पत्रकारों की समस्याओं को लेकर गंभीर है लेकिन उन्ही पत्रकारों को यह सुविधा दी जाएगी जो इसके योग्य होंगे।

इसके अलावा समिति ने पत्रकारों के उत्पीडन को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की। इस पर मुख्यमंत्री ने कहा कि पत्रकार समाज के प्रति भी अपनी नैतिक जिम्मेदारी को निभाते हुए काम करें और आम जन के सरोकार से भी जुड़ें। उन्होंने कहा कि पत्रकारों की भूमिका सरकार के कामों को जन-जन तक पहुंचाना तथा जन समास्याओं को सरकार तक पहुंचाने की होती है। इसलिए इस पर वह प्रभावी ढंग से काम करें। प्रतिनिधिमंडल में समिति के सचिव शिवशरण सिंह, उपाध्यक्ष आकाश शेखर शर्मा, संयुक्त सचिव श्रीधर अग्निहोत्री, सदस्य कार्यकारिणी अभिषेक रंजन और दया बिष्ट शामिल थे। अब देखना ये है कि समिति के अध्यक्ष और सचिव के बीच खींचतानी में दो खेमों में बंटे पदाधिकारियों/सदस्यों का अलगाव किस नतीज़े पर पहुंचता है।

(वरिष्ठ पत्रकार नवेद शिकोह की फेसबुक वॉल से साभार)

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‘साइबर नीति की समीक्षा कर उसे प्रासंगिक बनाने का सही समय’

सोशल मीडिया के माध्यमों में वॉट्सऐप को सबसे सुरक्षित और निजता बनाए रखने वाला ऐप माना जाता रहा है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Saturday, 02 November, 2019
Last Modified:
Saturday, 02 November, 2019
Social Media

डॉ. बिजेंद्र कुमार।।

दो-तीन दिन पहले इस साल की सबसे बड़ी हैकिंग की खबर आई। खबर के अनुसार, 12 लाख से ज्यादा भारतीयों के डेबिट और क्रेडिट कार्ड के डाटा को चोरी कर लिया गया और इस डाटा को हैकर्स की वेबसाइट जोकर्स स्टेश पर बेचा जा रहा है। इससे भारतीय यूजर्स अभी उबर भी नहीं पाए थे कि वॉट्सऐप में सेंध लगने का मामला उजागर हो गया।

सोशल मीडिया के माध्यमों में वॉट्सऐप को सबसे सुरक्षित और निजता बनाए रखने वाला ऐप माना जाता रहा है। खुद वॉट्सऐप भी एंड टू एंड इंक्रिप्शन यानी संदेश के प्रेषक और प्राप्तकर्ता तक सीमित रहने का भरोसा देता है और दावा भी करता कि है वॉट्सऐप में जानकारी पूर्णतः सुरक्षित है। लेकिन 14 सौ से ज्यादा भारतीयों की जानकारी प्राप्त करने के लिए जासूसी सॉफ्टवेयर पेगासस के जरिये फोन हैक कर लिए गए।

जिन यूजर्स के वॉट्सऐप में सेंध लगी, उनमें सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार शामिल हैं। स्पाइवेयर, मैलवेयर और वायरस के जरिये साइबर अपराध करना अब आम होता जा रहा है। भारत में साइबर अपराध के बढ़ते आंकड़े इसका प्रमाण हैं। स्पाइवेयर अब यूजर्स की तमाम गतिविधियों पर नजर रकने के साथ यूजर्स की  महत्वपूर्ण जानकारियां को फोन हैक कर चुरा लेते हैं। ऐसे में यूजर्स को आर्थिक नुकसान के साथ-साथ उसके मौलिक अधिकारों का हनन होता है।

सोशल मीडिया कंपनियां विकासशील देशों में साइबर सिक्योरिटी को लेकर उतनी गंभीरता नहीं दिखातीं, जितनी यूरोपीय देशों और अमेरिका को लेकर दिखाती हैं। इन कंपनियों ने यूरोप और अमेरिका के लिए अलग कानून बनाए हुए हैं और भारत जैसे देशों के लिए अलग तरह का कानून है।

वॉट्सऐप जासूसी मामले में विपक्ष ने भी सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। सरकार ने भी वॉट्सऐप को तलब कर पूछा है कि सेंध कैसे लगी और उसने यूजर्स की जानकारियां सुरक्षित रखने के लिए क्या उपाय किए हैं? जाहिर है वॉट्सऐप में सेंध लगना निजता के उल्लंघन का मामला है। इसमें सरकार को निजता और मौलिक अधिकार दोनों को सुरक्षित रखने के लिए कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है। समय आ गया है सरकार साइबर नीति की समीक्षा कर उसे प्रासंगिक बनाएं।

(लेखक दिल्ली विश्विद्यालय से संबद्ध भीमराव अंबेडकर महाविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)

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‘वॉट्सऐप जासूसी कांड: याद आती है 32 साल पहले की वह घटना’

राजनीतिक गलियारों के अलावा सरकारी एजेंसियां और देश-विदेश की निजी एजेंसियां भी वर्षों से अधिकृत अथवा गैरकानूनी ढंग से भारत में जासूसी करती रही हैं

आलोक मेहता by आलोक मेहता
Published - Saturday, 02 November, 2019
Last Modified:
Saturday, 02 November, 2019
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।

एक बार फिर फोन से जासूसी पर हंगामा। कम से कम अनुभवी नेताओं और पत्रकारों को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। मुझे 32 वर्ष पहले की घटना याद आती हैI उस समय ज्ञानी जैल सिंह देश के राष्ट्रपति थे। उनके करीबी वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल के साथ राष्ट्रपति भवन में बातचीत हो रही थी। पहले हम उनके स्टडी रूम में ही बात कर रहे थे।  फिर राजनीतिक उठापटक पर बात शुरू होने पर ज्ञानीजी ने हमसे कहा कि चलो बाहर लॉन में बात करेंगे।  मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ। ज्ञानीजी ने बाहर निकलकर खुद ही बताया, ‘तुम्हें मालूम नहीं है,  आजकल दीवारों के कान भले ही न हों,  टेलिफोन उठाए बिना कोई दूर बैठा हमारी बात सुन लेगा या रिकॉर्ड भी कर लेगा।

उन दिनों ज्ञानीजी और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बीच मतभिन्नता और अविश्वास का दौर चल रहा था। उस दौरान इस तरह फोन टैपिंग से बचाव के रास्ते निकाले जाते रहे। राजनीतिक गलियारों के अलावा सरकारी एजेंसियां और देश-विदेश की निजी एजेंसियां भी वर्षों से अधिकृत अथवा गैरकानूनी ढंग से भारत में जासूसी करती रही हैं। 

अब इजरायल की एक कंपनी के आधुनिक उपकरण से दुनिया के 14 देशों के साथ भारत के भी लगभग 15 या उससे अधिक लोगों के फोन में सेंध लगाकर वॉट्सऐप के जरिये बातचीत अथवा दस्तावेजों की जासूसी का आधा अधूरा रहस्य मीडिया में उछला है। सरकार ने स्वयं इस मुद्दे पर वॉट्सऐप और एजेंसियों से जांच पड़ताल की घोषणा कर अपने हाथ झाड़ने का प्रयास किया है। दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी और प्रतिपक्ष के अन्य दलों, मीडिया समूहों तथा कानूनविदों ने इसे निजता में हस्तक्षेप ठहराते हुए आशंका व्यक्त की है कि प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से इस जासूसी में सरकार का हाथ हो सकता हैI

असली मुद्दा यह है कि किसी एजेंसी ने इन चुनिंदा लोगों के फोन में ही सेंध क्यों लगाई? जो नाम सामने आए, उनमें से कुछ पर नक्सल संगठनों, उनसे जुड़े संदिग्ध व्यक्तियों और देश विदेश में मानव अधिकारों के नाम पर सहायता देने वालों से संपर्क और संबंध होने के आरोप लगते रहे हैं। भारत सरकार भी वर्षों से ऐसे व्यक्तियों और संगठनों पर नजर रखती रही है। कांग्रेस गठबंधन की सरकार रही हो या भाजपा गठबंधन की, राष्ट्रीय अथवा प्रादेशिक सरकारों ने सुरक्षा व्यवस्था के लिए वैधानिक रूप से भी गुप्तचरी का इंतजाम किया है। लेकिन नए जासूसी कांड में बड़े पेंच हैं।

इजरायल की कंपनी एनएसओ ने कहा है कि वह आतंकवाद और गंभीर अपराधों के खिलाफ लड़ाई में मदद के लिए सरकारी खुफिया एजेंसियों को यह टेक्नोलॉजी देती है। यह टेक्नोलॉजी मानव अधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के खिलाफ इस्तेमाल के लिए डिजाइन नहीं की गई है। फिर भी जिन लोगों की जासूसी का मामला सामने आया है,  उनमें से कुछ भीमा कोरेगांव के हिंसक गंभीर मामलों के वकील अथवा मानव अधिकार कार्यकर्ता के रूप में चर्चित रहे हैं। रहस्य यह है कि  किसके कहने पर इनके फोन में सेंध लगाई गई। जासूसी भी 2019 के चुनाव से कुछ पहले की तारीखों में हुई है।

वॉट्सऐप यह दावा करता रहा है कि उसके संदेश पूरी तरह सुरक्षित होते हैं। दुनिया भर में उसके 150 करोड़ उपभोक्ता हैं। इनमें से करीब 40 करोड़ भारत में हैं। इसलिए वॉट्सऐप की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है और उसने बाकायदा अमेरिका की अदालत में इजराइल की कंपनी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया है। यह मामला आसानी से निपटने वाला नहीं है। सरकार के अलावा भारतीय अदालतों में भी यह मामला जांच और न्याय के लिए सामने आने के पूरे आसार हैं।

यूं मजेदार बात यह है कि इससे पहले भी परस्पर विरोधी संस्थानों और लोगों ने जासूसी के आरोपों पर बड़ी हायतौबा मचाई, लेकिन कभी किसी पर गंभीर कार्रवाई नहीं हो सकी। कांग्रेस गठबंधन की सरकार के दौरान एक प्रभावशाली मंत्री द्वारा अपनी ही सरकार के सबसे वरिष्ठ मंत्री के कक्ष में जासूसी के उपकरण लगाने का  आरोप लगा था। सरकार ने अपनी इज्जत बचाने के लिए इस मामले को दबा दिया। इसी तरह तत्कालीन थलसेना अध्यक्ष जनरल वीके सिंह की जासूसी का गंभीर मामला भी सामने आया था। बड़ी कारपोरेट कंपनियों, नेताओं और नामी पत्रकारों की महीनों तक फोन पर होती रही बातचीत की जासूसी के टेप सामने आने पर हंगामा मच गया था।

आज तक उस जासूसी के सूत्रधारों के नाम सामने नहीं आए और न ही किसी पर कोई कार्रवाई हुई। कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और पंजाब जैसे राज्यों में सत्ताधारियों द्वारा समय-समय पर अपने विरोधियों और अपने समर्थकों तक की जासूसी के आरोप सामने आते रहे हैं। शायद यही कारण है कि इस बार भी जासूसी कांड को लेकर राजनीतिक हंगामा हो रहा है।

इस विवाद से जुड़ा दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि नक्सली हिंसा अथवा आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े लोगों की प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष सहायता करने वालों पर सरकारी या गैर सरकारी स्तर पर नजर रखने की पूरी संभावना रहती है। लेकिन देर सवेर यह खतरा बन सकता है कि देश के अंदर या बाहर से सहायता देने वाले लोगों से संपर्क होने पर वह भी संदेह के पात्र हो जाते हैं। नक्सली हिंसा में कांग्रेस के भी शीर्ष नेताओं की हत्या हुई है। अपने सत्ता काल में वह भी ऐसे लोगों पर नजर रखती रही है।

भारत ही नहीं, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देशों में भी सत्ताधारियों अथवा कारपोरेट कंपनियों द्वारा जासूसी के मामले सामने आते रहे हैं। सार्वजनिक क्षेत्र में सक्रिय रहने पर अन्य खतरों के साथ इस तरह के खतरों का भी सामना करना होता है। बहरहाल यह उचित समय है, जब सरकार और संसद निजता के अधिकार की सीमाएं और किसी भी तरह की गुप्तचरी के नियमों को तय करे।

(लेखक पद्मश्री से सम्मानित है और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं।)

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मिस्टर मीडिया: किसी पत्रकार को कवरेज का ऐसा दिन देखने का मौका न मिले तो अच्छा

आज भी हमारे कई मीडिया शिक्षा संस्थान ऐसे मामलों की कवरेज का व्यावहारिक, नैतिक और सैद्धांतिक पक्ष नहीं पढ़ाते

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Thursday, 31 October, 2019
Last Modified:
Thursday, 31 October, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

वह 31 अक्टूबर 1984 की बेहद मनहूस सुबह थी। रात साढ़े तीन बजे अखबार का संस्करण प्रेस भेजा और गाड़ी मुझे घर छोड़ आई । सोते-सोते सुबह साढ़े चार बज गए। गहरी नींद में ही था कि दफ्तर की गाड़ी का भोंपू बजने लगा। उस गाड़ी का भोंपू ऐसी आवाज करता था कि घनघोर निद्रा भी उसके आगे दम तोड़ देती थी। आशंका हुई कि अखबार में कोई ब्लंडर तो नहीं हो गया। नौकरी बचेगी या नहीं? क्योंकि पहले कभी इतने सुबह प्रेस की गाड़ी लेने नहीं आई थी।

बाहर आया तो ड्राइवर ने कहा, ‘जैसी हालत में हों, तुरन्त चलिए।' मैंने पूछा, क्या हुआ? उसने कहा, ‘मुझे ज्यादा नहीं पता, पर दिल्ली में कुछ बड़ा हुआ है।’ शर्ट-पेंट पहनी। दफ्तर पहुंचा। न्यूजरूम खाली था। अकेले अखबार के प्रबंध संपादक अभय छजलानी टेलिप्रिंटर के पास खड़े थे। बदहवास। बोले, इंदिराजी को गोली मार दी। एक घंटे में छोटा अखबार निकालना है। टेलिप्रिंटर की घंटियां बज रहीं थीं। लाल रंग के रिबन से टाइप उभर रहे थे। मैं और वे खबर लिखने बैठे। कभी वे ले आउट रूम में जाते तो कभी मैं। एक घंटे में अठारह-बाइस साइज में हमारा अखबार बाजार में था-शीर्षक था इंदिराजी शहीद!

मेरी आंखों के सामने केवल एक सप्ताह पहले इंदिराजी की भीकन गांव की रैली की कवरेज याद आई। वह मध्य प्रदेश की अंतिम यात्रा थी और उसकी कवरेज करने तथा एक छोटा सा साक्षात्कार करने का मौका मुझे मिल गया था। उस रैली में भी उन्होंने कहा था कि मेरे खून का एक-एक कतरा देश के काम आएगा। हालांकि उससे पहले खजुराहो संसदीय क्षेत्र की दो चुनावी सभाओं को कवर करने और कुछ सवाल करने के अवसर आए थे, मगर भीकन गांव की कवरेज मेरे लिए यादगार है।

इसके बाद जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, बाकी संपादकीय सहयोगी भी आते गए। हम दिन भर छोटे संस्करण निकालते रहे। अखबार के गेट पर हॉकर्स की लंबी कतार लगी रही। शाम होते-होते देश अशांत हो गया। चारों तरफ हिंसा,लूट और आगजनी का दहशत भरा माहौल। ऐसे में शाम को हम लोग रिपोर्टिंग के लिए भेज दिए गए। उस रात घर नहीं जा सके। दिन भर पोहे-कचौरी और चाय चलती रही । अगले दिन स्थिति और बिगड़ गई। अगले दिन भी उसी हाल में रहे। शहर में कर्फ्यू था। तीसरे दिन घर जा पाए। रिपोर्टिंग और डेस्क वर्क एक साथ संभालना पड़ रहा था।

अपने ढंग का यह पहला अनुभव था। पत्रकारिता के नजरिये से काफी कुछ सीखने को मिला। खबर लिखने के नए अंदाज, धीरज और संयम की परीक्षा, संवेदनशील विषय पर सोच-समझकर शब्दों, भाषा और ले आउट की नसीहत हमारे वरिष्ठ सहकर्मी देते रहे। समाचार संपादक जयसिंह ठाकुर के हाथ में वह रिमोट था, जो हर कॉपी का एक-एक शब्द चेक करते थे। एक भी गलत शब्द का इस्तेमाल अर्थ का अनर्थ कर सकता था। कई तथ्य हमने बेहद अनुशासन का पालन करते हुए अखबार के पन्नों पर परोसे। आज वे नसीहतें, प्रशिक्षण और जिम्मेदारी की भावना का जगाए रखना याद आता है। लेकिन, किसी पत्रकार को कवरेज का ऐसा दिन देखने का अवसर न मिले तो अच्छा। आज भी आंखों के सामने वे अशांत दृश्य सिहरन पैदा कर देते हैं।

इस घटना को पैंतीस बरस बीत चुके हैं। मगर आज भी हमारे कई मीडिया शिक्षा संस्थान ऐसे अति संवेदनशील मामलों की कवरेज का व्यावहारिक, नैतिक और सैद्धांतिक पक्ष नहीं पढ़ाते। कम से कम बीस विश्वविद्यालयों के साथ उनके पाठ्यक्रमों का अध्ययन करने के बाद कह सकता हूं कि इनमें बहुत सुधार की जरूरत है। हमारे अनेक वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों को इस तरह की कवरेज का व्यापक अनुभव है। वे कम से कम इस मामले में पहल कर सकते हैं। मैं तो अपने स्तर पर काम कर ही रहा हूं। अप्रिय हालात में संयम और जवाबदेही के साथ खबर संकलन का काम सिखाना बहुत आवश्यक है मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: यह विचार की जालसाजी अथवा धोखाधड़ी नहीं तो और क्या है?

मिस्टर मीडिया: राजदीप के विडियो और अजीत अंजुम के खुलासे के मायने भी समझिए

इन सवालों के जवाब आप खुद तलाशिये मिस्टर मीडिया

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