रवीश कुमार बोले- मुझे पता है गुलाम की तरह काम करने वाले लोग भाजपा के समर्थक हैं

वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने मतगणना के दिन वॉट्सऐप पर मिले तीन तरह के मैसेज का किया जिक्र

Last Modified:
Friday, 24 May, 2019
Ravish Kumar

रवीश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार।।

क्या 2019 के चुनाव में मैं भी हार गया हूं?

23 मई 2019 के दिन जब नतीजे आ रहे थे, मेरे वॉट्सऐप पर तीन तरह के मैसेज आ रहे थे। अभी दो तरह के मैसेज की बात करूंगा और आख़िर में तीसरे प्रकार के मैसेज की। बहुत सारे मैसेज ऐसे थे कि आज देखते हैं कि रवीश कुमार की सूजी है या नहीं। उसका चेहरा मुरझाया है या नहीं। एक ने लिखा कि वह रवीश कुमार को ज़लील होते देखना चाहता है। डूबकर मर जाना देखना चाहता है। पंचर बनाते हुए देखना चाहता है। किसी ने पूछा कि बर्नोल की ट्यूब है या भिजवा दें। किसी ने भेजा कि अपनी शक्ल की फोटो भेज दो, ज़रा हम देखना चाहते हैं।

मैंने सभी को जीत की शुभकामनाएं दीं और लाइव कवरेज़ के दौरान इस तरह के मैसेज का ज़िक्र किया और ख़ुद पर हंसा। दूसरे प्रकार के मैसेज में यह लिखा था कि आज से आप नौकरी की समस्या, किसानों की पीड़ा और पानी की तकलीफ दिखाना बंद कर दीजिए। यह जनता इसी लायक है। बोलना बंद कर दो। क्या आपको नहीं लगता है कि आप भी रिजेक्ट हो गए हैं। आपको विचार करना चाहिए कि क्यों आपकी पत्रकारिता मोदी को नहीं हरा सकी। मैं मुग़ालता नहीं पालता। इस पर भी लिख चुका हूं कि बकरी पाल लें, मगर मुग़ालता न पालें।

2019 का जनादेश मेरे ख़िलाफ कैसे आ गया? मैंने जो पांच साल में लिखा-बोला है, क्या वह भी दांव पर लगा था? जिन लाखों लोगों की पीड़ा हमने दिखाई, क्या वह ग़लत थी? मुझे पता था कि नौजवान, किसान और बैंकों में गुलाम की तरह काम करने वाले लोग भाजपा के समर्थक हैं। उन्होंने भी मुझसे कभी झूठ नहीं बोला। सबने पहले या बाद में यही बोला कि वे नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं। मैंने इस आधार पर उनकी समस्या को खारिज नहीं किया कि वे नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं। उनकी समस्या वास्तविक थी, इसलिए दिखाई। आज एक सांसद नहीं कह सकता कि उसने पचास हज़ार से अधिक लोगों को नियुक्ति पत्र दिलवाया है। मेरी नौकरी सीरीज़ के कारण दिल्ली से लेकर बिहार तक में लोगों को नियुक्ति पत्र मिला है। कई परीक्षाओं के रिज़ल्ट निकले। उनमें से बहुतों ने नियुक्ति पत्र मिलने पर माफी मांगी कि वे मुझे गालियां देते थे। मेरे पास सैकड़ों पत्र और मैसेज के स्क्रीन शॉट पड़े हैं, जिनमें लोगों ने नियुक्ति पत्र मिलने के बाद गाली देने के लिए माफी मांगी है। इनमें से एक भी यह प्रमाण नहीं दे सकता कि मैंने कभी कहा हो कि नरेंद्र मोदी को वोट नहीं देना। यह ज़रूर कहा कि वोट अपने मन से दें, वोट देने के बाद नागरिक बन जाना।

पचास हज़ार से अधिक नियुक्ति पत्र की कामयाबी वो कामयाबी है, जो मैं मोदी समर्थकों के द्वारा ज़लील किए जाने के क्षण में भी सीने पर बैज की तरह लगाए रखूंगा। क्योंकि वे मुझे नहीं उन मोदी समर्थकों को ही ज़लील करेंगे, जिन्होंने मुझसे अपनी समस्या के लिए संपर्क किया था। नौकरी सीरीज़ का ही दबाव था कि नरेंद्र मोदी जैसी प्रचंड बहुमत वाली सरकार को रेलवे में लाखों नौकरियां निकालनी पड़ीं। इसे मुद्दा बनवा दिया। वर्ना आप देख लें कि पूरे पांच साल में रेलवे में कितनी वैकेंसी आईं और आखिरी साल में कितनी वैकैंसी आई। क्या इसकी मांग गोदी मीडिया कर रहा था या रवीश कुमार कर रहा था? प्राइम टाइम में मैंने दिखाया। क्या रेल सीरीज़ के तहत स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस जैसी ट्रेन को कुछ समयों के लिए समय पर चलवा देना मोदी का विरोध था? क्या बिहार के कालेजों में तीन साल के बीए में पांच-पांच साल से फंसे नौजवानों की बात करना मोदी विरोध था?

इन पांच सालों में मुझे करोड़ों लोगों ने पढ़ा। हज़ारों की संख्या में आकर सुना। टीवी पर देखा। बाहर मिला तो गले लगाया। प्यार दिया। उसमें नरेंद्र मोदी के समर्थक भी थे। संघ के लोग भी थे और विपक्ष के भी। बीजेपी के लोग भी थे, मगर वे चुपचाप बधाई देते थे। मैंने एक चीज़ समझी। मोदी का समर्थक हो या विरोधी, वह गोदी मीडिया और पत्रकारिता में फर्क करता है। चूंकि गोदी मीडिया के एंकर मोदी की लोकप्रियता की आड़ में मुझ पर हमला करते हैं, इसलिए मोदी का समर्थक चुप हो जाता है। भारत जैसे देश में ईमानदार और नैतिक होने का सामाजिक और संस्थागत ढांचा नहीं है। यहां ईमानदार होने की लड़ाई अकेले की है और हारने की होती है। लोग तंज करते हैं कि कहां गए सत्यवादी रवीश कुमार। कहां गए पत्रकारिता की बात करने वाले रवीश कुमार। मुझमें कमियां हैं। मैं आदर्श नहीं हूं। कभी दावा नहीं किया, लेकिन जब आप यह कहते हैं आप उसी पत्रकारिता के मोल को दोहरा रहे होते हैं, जिसकी बात मैं कहता हूं या मेरे जैसे कई पत्रकार कहते हैं।

मुझे पता था कि मैं अपने पेशे में हारने की लड़ाई लड़ रहा हूं। इतनी बड़ी सत्ता और कारपोरेट की पूंजी से लड़ने की ताकत सिर्फ गांधी में थी। लेकिन जब लगा कि मेरे जैसे कई पत्रकार स्वतंत्र रूप से कम आमदनी पर पत्रकारिता करने की कोशिश कर रहे हैं तब लगा कि मुझे कुछ ज़्यादा करना चाहिए। मैंने हिंदी के पाठकों के लिए रोज़ सुबह अंग्रेज़ी से अनुवाद कर मोदी विरोध के लिए नहीं लिखा था, बल्कि इस खुशफहमी में लिखा कि हिंदी का पाठक सक्षम हो। इसमें घंटों लगा दिए। मुझे ठीक ठीक पता था कि मैं यह लंबे समय तक अकेले नहीं कर सकता। मोदी विरोध की सनक नहीं थी। अपने पेशे से कुछ ज्यादा प्रेम था, इसलिए दांव पर लगा दिया। अपने पेश पर सवाल खड़े करने का एक जोखिम था, अपने लिए रोज़गार के अवसर गंवा देना। फिर भी जीवन में कुछ समय के लिए करके देख लिया। इसका अपना तनाव होता है, जोखिम होता है मगर जो सीखता है वह दुर्लभ है। बटुआ वाले सवाल पूछकर मैं मोदी समर्थकों के बीच तो छुप सकता हूं लेकिन आप पाठकों के सामने नहीं आ सकता।

मैंने ज़रूर सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ सबके बीच आकर बोला। आज भी बोलूंगा। आपके भीतर धार्मिक और जातीय पूर्वाग्रह बैठ गया है। आप मशीन बनते जा रहे हैं। मैं फिर से कहता हूं कि धार्मिक और जातीय पूर्वाग्रह से लैस सांप्रदायिकता आपको एक दिन मानव बम में बदल देगी। स्टूडियो में नाचते एंकरों को देख आपको भी लगता होगा कि यह पत्रकारिता नहीं है। बैंकों में ग़ुलाम की तरह काम करने वाली सैंकड़ों महिला अफसरों ने अपने गर्भ गिर जाने से लेकर शौचालय का भय दिखाकर काम कराने का पत्र क्या मुझसे मोदी का विरोध कराने के लिए लिखा था? उनके पत्र आज भी मेरे पास पड़े हैं। मैंने उनकी समस्या को आवाज़ दी और कई बैंक शाखाओं में महिलाओं के लिए अलग से शौचलय बने। मैंने मोदी का एजेंडा नहीं चलाया। वो मेरा काम नहीं था। अगर आप मुझसे यही उम्मीद करते हैं तब भी यही कहूंगा कि एक बार नहीं सौ बार सोच लीजिए।

ज़रूर पत्रकारिता में भी ‘अतीत के गुनाहों की स्मृतियां’ हैं, जिन्हें मोदी वक्त-बेवक्त ज़िंदा करते रहते हैं, लेकिन वह भूल जा रहे हैं कि उनके समय की पत्रकारिता का मॉडल अतीत के गुनाहों पर ही आधारित है। मैं नहीं मानता कि पत्रकारिता हारी है। पत्रकारिता ख़त्म हो जाएगी, वह अलग बात है। जब पत्रकारिता ही नहीं बची है तो फिर आप पत्रकारिता के लिए मेरी ही तरफ क्यों देख रहे हैं। क्या आपने संपूर्ण समाप्ति का संकल्प लिया है। जब मैं अपनी बात करता हूं तो उसमें वे सारे पत्रकारों की भी बातें हैं, जो संघर्ष कर रहे हैं। ज़रूर पत्रकारिता संस्थानों में संचित अनैतिक बलों के कारण पत्रकारिता समाप्त हो चुकी है। उसका बचाव एक व्यक्ति नहीं कर सकता है। ऐसे में हम जैसे लोग ही क्या कर लेंगे। फिर भी ऐसे काम को सिर्फ मोदी विरोध के चश्मे से देखा जाना ठीक नहीं होगा। यह अपने पेशे के भीतर आई गिरावट का विरोध ज्यादा है। यह बात मोदी समर्थकों को इस दौर में समझनी होगी। मोदी का समर्थन अलग है। अच्छी पत्रकारिता का समर्थन अलग है। मोदी समर्थकों से भी अपील करूगा कि आप गोदी मीडिया का चैनल देखना बंद कर दें। अख़बार पढ़ना बंद कर दें। इसके बग़ैर भी मोदी का समर्थन करना मुमकिन है।

बहरहाल, 23 मई 2019 को आई आंधी गुज़र चुकी है, लेकिन हवा अभी भी तेज़ चल रही है। नरेंद्र मोदी ने भारत की जनता के दिलो-दिमाग़ पर एकछत्र राज कायम कर लिया है। 2014 में उन्हें मन से वोट मिला था, 2019 में तन और मन से वोट मिला है। तन पर आई तमाम तक़लीफों को झेलते हुए लोगों ने मन से वोट किया है। उनकी इस जीत को उदारता के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए। मैं भी करता हूं। जन को ठुकरा कर आप लोकतांत्रिक नहीं हो सकते हैं। उस ख़ुशी में भविष्य के ख़तरे देखे जा सकते हैं लेकिन उसे देखने के लिए भी आपको शामिल होना होगा। यह समझने के लिए भी शामिल होना चाहिए कि आख़िर वह क्या बात है जो लोगों को मोदी बनाती है। लोगों को मोदी बनाने का मतलब है अपने नेता में एकाकार हो जाना। एक तरह से विलीन हो जाना। यह अंधभक्ति कही जा सकती है, मगर इसे भक्ति की श्रेष्ठ अवस्था के रूप में भी देखा जाना चाहिए। मोदी के लिए लोगों का मोदी बन जाना उस श्रेष्ठ अवस्था का प्रतीक है। घर-घर मोदी की जगह आप जन-जन मोदी कह सकते हैं।

मैं हमेशा से कहता रहा हूं कि 2014 के बाद से इस देश के अतीत और भविष्य को समझने का संदर्भ बिन्दु( रेफरेंस प्वाइंट) बदल गया है। चुनाव से पहले ही प्रधानमंत्री मोदी नए भारत की बात करने लगे थे। वह नया भारत उनकी सोच का भारत बन गया है। हर जनादेश में संभावनाएं और आशंकाएं होती हैं। इससे मुक्त कोई जनादेश नहीं होता है। जनता ने तमाम आशंकाओं के बीच अगर एक संभावना को चुना है तो इसका मतलब है कि उसमें उन आशंकाओं से निपटने का पर्याप्त साहस भी है। वह भयभीत नहीं है। न तो यह भय का जनादेश है और न ही इस जनादेश से भयभीत होना चाहिए। ऐतिहासिक कारणों से जनता के बीच कई संदर्भ बिंदु पनप रहे थे। दशकों तक उसने इसे अपने असंतोष के रूप में देखा। बहुत बाद में वह अपने इस अदल-बदल के असंतोष से उकता गई। उसने उस विचार को थाम लिया, जहां अतीत की अनैतिकताओं पर सवाल पड़े हुए थे। जनता ‘अतीत के असंतोषों की स्मृतियों’ से उबर नहीं पाई है। इस बार असंतोष की उस स्मृति को विचारधारा के नाम पर प्रकट कर आई है, जिसे नया भारत कहा जा रहा है।

मैंने हमेशा कहा है कि नरेंद्र मोदी का विकल्प वही बनेगा, जिसमें नैतिक शक्ति होगी। आप मेरे लेखों में नैतिक बल की बात देखेंगे। बेशक नरेंद्र मोदी के पक्ष में अनैतिक शक्तियों और संसाधनों का विपुल भंडार है, मगर जनता उसे ‘अतीत के असंतोष की स्मृतियों’ के गुण-दोष की तरह देखती है। बर्दाश्त कर लेती है। नरेंद्र मोदी उस ‘अतीत के असंतोष की स्मृतियों’ को ज़िंदा भी रखते हैं। आप देखेंगे कि वह हर पल इसे रेखांकित करते रहते हैं। जनता को ‘अतीत के वर्तमान’ में रखते हैं। जनता को पता है कि विपक्ष में भी वही अनैतिक शक्तियां हैं जो मोदी पक्ष में हैं। विपक्ष को लगा कि जनता दो समान अनैतिक शक्तियों में से उसे भी चुन लेगी। इसलिए उसने बची-खुची अनैतिक शक्तियों का ही सहारा लिया। नरेंद्र मोदी ने उन अनैतिक शक्तियों को भी कमज़ोर और खोखला भी कर दिया। विपक्ष के नेता बीजेपी की तरफ भागने लगे। विपक्ष मानव और आर्थिक संसाधन से ख़ाली होने लगा। दोनों का आधार अनैतिक शक्तियां ही थीं, लेकिन इसी परिस्थिति ने विपक्ष के लिए नया अवसर उपलब्ध कराया। उसे चुनाव की चिंता छोड़ अपने राजनीतिक और वैचारिक पुनर्जीवन को प्राप्त करना था, उसने नहीं किया।

विपक्ष को अतीत के असंतोष के कारणों के लिए माफी मांगनी चाहिए थी। नया भरोसा देना था कि अब से ऐसा नहीं होगा। इस बात को ले जाने के लिए तेज़ धूप में पैदल चलना था। उसने यह भी नहीं किया। 2014 के बाद चार साल तक घर बैठे रहे। जनता के बीच नहीं गए। उसकी समस्याओं पर तदर्थ रूप से बोले और घर आकर बैठ गए। 2019 आया तो बची-खुची अनैतिक शक्तियों के समीकरण से वह एक विशालकाय अनैतिक शक्तिपुंज से टकराने की ख्वाहिश पाल बैठा। विपक्ष को समझना था कि अलग-अलग दलों की राजनीतिक प्रासंगिकता समाप्त हो चुकी है। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी या राष्ट्रीय जनता दल के ज़रिये लोकतंत्र में जो सामाजिक संतुलन आया था उसकी आज कोई भूमिका नहीं रही।

बेशक इन दलों ने समाज के पिछड़े और वंचित तबकों को सत्ता-चक्र घुमाकर शीर्ष पर लाने का ऐतिहासिक काम किया, लेकिन इसी क्रम में वे दूसरे पिछड़े और वंचितों को भूल गए। इन दलों में उनका प्रतिनिधित्व उसी तरह बेमानी हो गया जिस तरह अन्य दलों में होता है। अब इन दलों की प्रासंगिकता नहीं बची है तो दलों को भंग करने का साहस भी होना चाहिए। अपनी पुरानी महत्वकांक्षाओं को भंग कर देना था। भारत की जनता अब नए विचार और नए दल का स्वागत करेगी तब तक वह नरेंद्र मोदी के विचार पर चलेगी।

समाज और राजनीति का हिंदूकरण हो गया है। यह स्थायी रूप से हुआ है, मैं नहीं मानता। उसी तरह जैसे बहुजन शक्तियों का उभार स्थायी नहीं था, इसी तरह से यह भी नहीं है। यह इतिहास का एक चक्र है, जो घूमा है। जैसे मायावती सवर्णों के समर्थन से मुख्यमंत्री बनी थी, उसी तरह आज संघ बहुजन के समर्थन से हिंदू राष्ट्र बना रहा है। जो सवर्ण थे वो अपनी जाति की पूंजी लेकर कभी सपा-बसपा और राजद के मंचों पर अपना सहारा ढूंढ रहे थे। जब वहां उनकी वहां पूछ बढ़ी तो बाकी बचा बहुजन सर्वजन के बनाए मंच पर चला गया।

बहुजन राजनीति ने कब जाति के ख़िलाफ़ राजनीतिक अभियान चलाया। जातियों के संयोजन की राजनीति थी तो संघ ने भी जातियों के संयोजन की राजनीति खड़ी कर दी। बेशक क्षेत्रिय दलों ने बाद में विकास की भी राजनीति की और कुछ काम भी किया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर के लिए अपनी भूमिका को हाईवे बनाने तक सीमित कर गए। चंद्रभान प्रसाद की एक बात याद आती है। वह कहते थे कि मायावती क्यों नहीं आर्थिक मुद्दों पर बोलती हैं, क्यों नहीं विदेश नीति पर बोलती हैं। यही हाल सारे क्षेत्रीय दलों का है। वह प्रदेश की राजनीति तो कर लेते हैं मगर देश की राजनीति नहीं कर पाते हैं।

बहुजन के रूप में उभरकर आए दल अपनी विचारधारा की किताब कब का फेंक चुके हैं। उनके पास अंबेडकर जैसे सबसे तार्किक व्यक्ति हैं लेकिन अंबेडकर अब प्रतीक और अहंकार का कारण बन गए हैं। छोटे-छोटे गुट चलाने का कारण बन गए हैं। हमारे मित्र राकेश पासवान ठीक कहते हैं कि दलित राजनीति के नाम पर अब संगठनों के राष्ट्रीय अध्यक्ष ही मिलते हैं, राजनीति नहीं मिलती है। बहुजन राजनीति एक दुकान बन गई है जैसे गांधीवाद एक दुकान है। इसमें विचारधारा से लैस व्यक्ति आज तक राष्ट्रीय स्तर पर एक राजनैतिक विकल्प नहीं बना पाया। वह दल नहीं बनाता है। अपने हितों के लिए संगठन बनाता है। अपनी जाति की दुकान लेकर एक दल से दूसरे दल में आवागमन करता है। उसके भीतर भी अहंकार आ गया। वह बसपा या बहुजन दलों की कमियों पर चुप रहने लगा।

वह अहंकार ही था कि मेरे जैसों के लिखे को भी जाति के आधार पर खारिज किया जाने लगा। मैं अपनी प्रतिबद्धता से नहीं हिला, लेकिन प्रतिबद्धता की दुकान चलाने वाले अंबेडकर के नाम का इस्तेमाल हथियार की तरह करने लगे। वे लोगों को आदेश देने लगे कि किसे क्या लिखना चाहिए। जिस तरह भाजपा के समर्थक राष्ट्रवाद का सर्टिफिकेट बांटते हैं, उसी तरह अंबेडकरवादियों में भी कुछ लोग सर्टिफिकेट बांटने लगे हैं। हमें समझ लेना चाहिए कि बहुजन पक्ष में कोई कांशीराम नहीं है। कांशीराम की प्रतिबद्धता का मुकाबला नहीं है। वह वैचारिक प्रतिबद्धता थी। अब हमारे पास प्रकाश आंबेडकर हैं जो अंबेडकर के नाम पर छोटे मकसद की राजनीति करते हैं। यही हाल लोहिया का भी हुआ है। जो अंबेडकर को लेकर प्रतिबद्ध हैं उनकी भी हालत गांधी को लेकर प्रतिबद्ध रहने वाले गाधीवादियों की तरह है। दोनों हाशिये पर जीने के लिए अभिशप्त हैं। विकल्प गठजोड़ नहीं है। विकल्प विलय है। पुनर्जीवन है। अगले चुनाव के लिए नहीं है। भारत के वैकल्पिक भविष्य के लिए है।

आपने देखा होगा कि इन पांच सालों में मैंने इन दलों पर बहुत कम नहीं लिखा। लेफ्ट को लेकर बिल्कुल ही नहीं लिखा। मैं मानता हूं कि वाम दलों की विचारधारा आज भी प्रासंगिक हैं मगर उनके दल और उन दलों में अपना समय व्यतीत कर रहा राजनीतिक मानवसंसाधन प्रासंगिक नहीं हैं। उसकी भूमिका समाप्त हो चुकी है। वह सड़ रहा है। उनके पास सिर्फ कार्यालय बचे हैं। काम करने के लिए कुछ नहीं बचा है। वाम दलों के लोग शिकायत करते रहते थे कि आपके कार्यक्रम में लेफ्ट नहीं होता है। क्योंकि दल के रूप में उसकी भूमिका समाप्त हो चुकी थी। बेशक महाराष्ट्र में किसान आंदोलन खड़ा करने का काम बीजू कृष्णन जैसे लोगों ने किया। यह उस विचारधारा की उपयोगिता थी। न कि दल की। दल को भंग करने का समय आ गया है। नया सोचने का समय आ गया है। मैं दलों की विविधता का समर्थक हूं, लेकिन उपयोगिता के बग़ैर वह विविधता किसी काम की नहीं होगी। यह सारी बातें कांग्रेस पर भी लागू होती है। भाजपा के कार्यकर्ताओं में आपको भाजपा दिखती है। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में आपको कांग्रेस छोड़ सबकुछ दिखता है। कांग्रेस चुनाव लड़ना छोड़ दे या चुनाव को जीवन-मरण के प्रश्न की तरह न लड़े। वह कांग्रेस बने।

कांग्रेस नेहरू का बचाव नहीं कर सकी। वह पटेल से लेकर बोस तक का बचाव नहीं कर सकी। आज़ादी की लड़ाई की विविधता और खूबसूरती से जुड़ी ‘अतीत की स्मृतियों’ को ज़िंदा नहीं कर पाई। गांधी के विचारों को खड़ा नहीं कर पाई। आज आप भाजपा के एक सामान्य कार्यकर्ता से दीनदयाल उपाध्याय के बारे में ग़लत टिप्पणी कर दीजिए वह अपनी तरह से सौ बातें बताएंगे, पांच साल में कांग्रेस पार्टी नेहरू को लेकर समानांतर विमर्श पैदा नहीं कर पाई, मैं इसी एक पैमाने से कांग्रेस को ढहते हुए देख रहा था। राजनीति विचारधारा की ज़मीन पर खड़ी होती है, नेता की संभावना पर नहीं। एक ही रास्ता बचा है। भारत के अलग अलग राजनीतिक दलों में बचे मानव संसाधान को अपना अपना दल छोड़ कर किसी एक दल में आना चाहिए। जहां विचारों का पुनर्जन्म हो, नैतिक बल का सृजन हो और मानव संसाधन का हस्तांतरण। यह बात 2014 में भी लोगों से कहा था। फिर खुद पर हंसी आई कि मैं कौन सा विचारक हूं जो यह सब कह रहा हूं। आज लिख रहा हूं।

इसके बाद भी विपक्ष को लेकर सहानुभूति क्यों रही। हालांकि उनके राजनीतिक पक्ष को कम ही दिखाया और उस पर लिखा बोला क्योंकि 2014 के बाद हर स्तर पर नरेंद्र मोदी ही प्रमुख हो गए थे। सिर्फ सरकार के स्तर पर ही नहीं, सांस्कृतिक से लेकर धार्मिक स्तर पर मोदी के अलावा कुछ दिखा नहीं और कुछ था भी नहीं। जब भारत का 99 प्रतिशत मीडिया लोकतंत्र की मूल भावना को कुचलने लगा तब मैंने उसमें एक संतुलन पैदा करने की कोशिश की। असहमति और विपक्ष की हर आवाज़ का सम्मान किया। उसका मज़ाक नहीं उड़ाया। यह मैं विपक्षी दलों के लिए नहीं कर रहा था बल्कि अपनी समझ से भारत के लोकतंत्र को शर्मिंदा होने से बचा रहा था। मुझे इतना बड़ा लोड नहीं लेना चाहिए था क्योंकि यह मेरा लोड नहीं था फिर भी लगा कि हर नागरिक के भीतर और लोकतंत्र के भीतर विपक्ष नहीं होगा तो सबकुछ खोखला हो जाएगा। मेरी इस सोच में भारत की भलाई की नीयत थी।

नरेंद्र मोदी की प्रचंड जीत हुई है। मीडिया की जीत नहीं हुई है। हर जीत में एक हार होती है। इस जीत में मीडिया की हार हुई है। उसने लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन नहीं किया। आज गोदी मीडिया के लोग मोदी को मिली जीत के सहारे ख़ुद की जीत बता रहे हैं। दरअसल उनके पास सिर्फ मोदी बचे हैं। पत्रकारिता नहीं बची है। पत्रकारिता का धर्म समाप्त हो चुका है। मुमकिन है भारत की जनता ने पत्रकारिता को भी खारिज कर दिया हो। उसने यह भी जनादेश दिया हो कि हमें मोदी चाहिए, पत्रकारिता नहीं। इसके बाद भी मेरा यकीन उन्हीं मोदी समर्थकों पर है। वे मोदी और मीडिया की भूमिका में फर्क देखते हैं। समझते हैं। शायद उन्हें भी ऐसा भारत नहीं चाहिए, जहां जनता का प्रतिनिधि पत्रकार अपने पेशेवर धर्म को छोड़ नेता के चरणों में बिछा नज़र आए। मुझे अच्छा लगा कि कई मोदी समर्थकों ने लिखा कि हम आपसे असहमत हैं, मगर आपकी पत्रकारिता के कायल हैं। आप अपना काम उसी तरह से करते रहिएगा। ऐसे सभी समर्थकों का मुझ में यकीन करने के लिए आभार। मेरे कई सहयोगी जब चुनावी कवरेज के दौरान अलग-अलग इलाकों में गए तो यही कहा कि मोदी फैन भी तुम्हीं को पढ़ते और लिखते हैं। संघ के लोग भी एक बार चेक करते हैं कि मैंने क्या बोला। मुझे पता है कि रवीश नहीं रहेगा तो वे रवीश को मिस करेंगे।

दो साल पहले दिल्ली में रहने वाले अस्सी साल के एक बुज़ुर्ग ने मुझे छोटी सी गीता भेजी। लंबा सा पत्र लिखा और मेरे लिए लंबे जीवन की कामना की। आग्रह किया कि यह छोटी सी गीता अपने साथ रखूं। मैंने उनकी बात मान ली। अपने बैग में रख लिया। जब लोगों ने कहा कि अब आप सुरक्षित नहीं हैं। जान का ख़्याल रखें तो आज उस गीता को पलट रहा था। उसका एक सूत्र आपसे साझा कर रहा हूं।

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि, तत: स्वधर्मं कीर्ति च हित्वा पापमवाप्स्यसि।।

मुझे प्यार करते रहिए। मुझे ज़लील करने से क्या मिलेगा। आपका ही स्वाभिमान टूटेगा कि इस महान भारत में आप एक पत्रकार का साथ नहीं दे सके। मेरे जैसों ने आपको इस अपराध बोध से मुक्त होने का अवसर दिया है। यह अपराध बोध आप पर उसी तरह भारी पड़ेगा, जैसे आज विपक्ष के लिए उसकी अतीत की अनैतिकताएं भारी पड़ रही हैं। इसलिए आप मुझे मज़बूत कीजिए। मेरे जैसों के साथ खड़े होइये। आपने मोदी को मज़बूत किया। आपका ही धर्म है कि आप पत्रकारिता को भी मज़बूत करें। हमारे पास जीवन का दूसरा विकल्प नहीं है। होता तो शायद आज इस पेशे को छोड़ देता। उसका कारण यह नहीं कि हार गया हूं। कारण यह है कि थक गया हूं। कुछ नया करना चाहता हूं। लेकिन जब तक हूं, तब तक तो इसी तरह करूंगा। क्योंकि जनता ने मुझे नहीं हराया है। मोदी को जिताया है। प्रधानमंत्री मोदी को बधाई।

साभार: https://naisadak.org/is-2019-mandate-is-against-me-also/

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विनोद दुआ का जाना दुख का सबब भी है और सबक भी: विनोद अग्निहोत्री

उन्होंने अपने विचारों, सिद्धांतों और मूल्यों से समझौता नहीं किया और आखिर तक उनके लिए वह लड़ते रहे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Sunday, 05 December, 2021
Last Modified:
Sunday, 05 December, 2021
Vinod Agnihotri Vinod Dua

विनोद अग्निहोत्री
सलाहकार संपादक, अमर उजाला समूह

बात उन दिनों की है, जब मैं ‘नवभारत टाइम्स‘ दिल्ली में बतौर उप संपादक काम करता था। एक दिन ‘नवभारत टाइम्स‘ के तत्कालीन कार्यकारी संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह से मिलने एक सज्जन आए। संयोग से मैं उस दिन एसपी सिंह के कमरे में ही बैठा था। एसपी ने मुझे उनसे मिलवाया कि ये विनोद दुआ हैं और दुआ से कहा कि ये आपके समान नाम वाले विनोद अग्निहोत्री हैं। विनोद दुआ से व्यक्तिगत रूप से मेरी वह पहली और सीधी मुलाकात थी। हालांकि, मैं उन्हें ‘दूरदर्शन‘ के तमाम कार्यक्रमों में देखता था और उनके बारे में जानता था। मुझे ‘दूरदर्शन‘ पर अपने नाम वाले को कार्यक्रम होस्ट करते देख बेहद आत्मतुष्टि मिलती थी और लगता था कि जैसे मैं ही यह कार्यक्रम कर रहा हूं। इसलिए विनोद दुआ से प्रत्यक्ष मिलकर बेहद खुशी हुई, क्योंकि उन दिनों ‘दूरदर्शन‘ पर जो चेहरे दिखते थे, वह सामान्य व्यक्ति के लिए फिल्मी सितारों की तरह ही होते थे। मेरे लिए विनोद दुआ से मिलना एक अविस्मरणीय अनुभव था, क्योंकि मुझे पत्रकारिता में आए कुछ साल ही हुए थे। इस मुलाकात में ही विनोद दुआ ने जिस बेतकल्लुफी से मुझसे बात की, उसने भी मुझे बेहद प्रभावित किया।

बाद में विनोद दुआ से मेरा मिलना-जुलना होता रहा। उनकी सहजता और अपनेपन ने मुझे बेहद प्रभावित किया। हालांकि उन दिनों राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और देश पर कांग्रेस का एकाधिकार था और मेरी वैचारिक पृष्ठभूमि समाजवादी होने के कारण मेरा उन सभी लोगों से मतभेद रहता था जो कांग्रेस के करीब दिखाई देते थे। इसके बावजूद विनोद दुआ के साथ मेरी आत्मीयता बढ़ती चली गई। पिछले करीब दो दशकों के दौरान मुझे कई बार कुछ कार्यक्रमों में उनके साथ मंच साझा करने का भी मौका मिला। ‘इंडिया इंटरनेशलन सेंटर‘ में उनसे अक्सर मुलाकात हो जाती थी। कुछेक ऐसी दावतों में भी मैंने शिरकत की, जहां विनोद दुआ का गाना सुनने का मौका भी मिला। वह बेहतरीन गायक थे। देश विभाजन के बाद उनके माता-पिता पाकिस्तान से दिल्ली आ गए थे और दिल्ली की एक रिफ्यूजी कालोनी से उठकर विनोद दुआ पत्रकारिता के शिखर पर सितारे की तरह चमके। हिंदी और अंग्रेजी में समान अधिकार रखने वाले विनोद दुआ के भीतर मैंने भारत-पाकिस्तान दोस्ती के प्रति एक खास तरह की तड़प देखी थी। दिल्ली वाला होते हुए भी उनके भीतर एक ठेठ पंजाबीपना भी था, जिसने उन्हें बेहद हंसमुख, बेपरवाह और मस्त इंसान बना दिया था।

‘दूरदर्शन‘ पर उनके कार्यक्रम जनवाणी, परख और चुनाव विश्लेषण तो भारतीय टीवी पत्रकारिता के लिए मील का पत्थर हैं, जिनमें तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था और सरकारी तंत्र के खोखलेपन को उजागर किया जाता था। ‘एनडीटीवी‘ में उनका विशेष शो जायका इंडिया का भी बेहद  लोकप्रिय रहा, जिसने देश के तमाम अंचलों के खान पान और पकवानों से दर्शकों को रूबरू कराया। इसके लिए उन्होंने पूरे देश में हर छोटे-बड़े शहर के गली-मुहल्लों में घूम-घूमकर वहां के खास पकवानों और व्यंजनों पर विस्तृत रिपोर्टिंग की। विनोद दुआ के समकालीन कई पत्रकारों ने अकूत संपत्ति बनाई, लेकिन अपनी तमाम योग्यता और ब्रैंड वैल्यू के बावजूद विनोद दुआ ने अपने पेशे को कारोबार नहीं बनाया। उन्होंने जिस संस्थान में भी काम किया, अपनी शर्तों पर किया और जब लगा कि संस्थान में उनके लिए काम करना मुश्किल हो रहा है तो उन्होंने बेहद शालीनता से उसे अलविदा कह दिया।

पिछले कुछ सालों से इंटरनेट पर उनका शो बेहद लोकप्रिय हुआ। हालांकि उसके लिए उन्हें मुकदमेबाजी के कानूनी झंझटों से भी उलझना पड़ा और आखिरकार उन्हें सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली। लेकिन उन्होंने अपने विचारों, सिद्धांतों और मूल्यों से समझौता नहीं किया और आखिर तक उनके लिए वह लड़ते रहे। विनोद दुआ उन बहादुर पत्रकारों में थे, जिनके भीतर किसी भी सरकार और बड़े से बड़े नेता से अनचाहा सवाल भी पूछने की हिम्मत थी। चाहे कांग्रेस की सरकार रही हो या गैर कांग्रेसी सरकार, हर बड़े नेता मंत्री और अधिकारी से उनके निजी रिश्ते भी थे, लेकिन इन संबंधों को उन्होंने कभी भी अपनी पत्रकारिता के आड़े नहीं आने दिया। इस सबके बावजूद पिछले कुछ वर्षों से विनोद दुआ अकेलेपन का शिकार हो गए थे। शायद मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों के इस दौर में उन्हें अपने-पराए की सही पहचान हो गई थी। तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया ने अपने इस दिग्गज से कन्नी काट ली और उन्हें सोशल मीडिया का सहारा लेना पड़ा। कोरोना काल में जब सब अपने घरों में एक तरह से कैद होकर रह गए थे, तब विनोद दुआ जैसे फराखदिल इंसान के लिए वह समय बेहद कठिन और चुनौती भरा रहा।

विनोद दुआ का यूं चले जाना एक सामान्य घटना नहीं है। कहा जा सकता है कि पिछले करीब एक साल से उनकी सेहत ठीक नहीं थी और करीब छह महीने पहले पत्नी के निधन के शोक ने उन्हें भीतर से और भी कमजोर कर दिया था, जो धीरे-धीरे उन्हें मौत के करीब ले गया। मैं उनकी इस मृत्यु को स्वाभाविक इसलिए नहीं मानता हूं कि एक तो 67 साल की आयु आम तौर पर ऐसी नहीं होती कि यह मान लिया जाए कि चलो उनका वक्त पूरा हो गया था, दूसरे विनोद दुआ जैसे जिंदादिल और खुशदिल इंसान के लिए शायद यह दुनिया अब घुटन भरी हो चुकी थी, जिसे उन्होंने हमेशा के लिए छोड़ दिया। इसलिए विनोद दुआ का निधन पूरे पत्रकारिता जगत या आधुनिक शब्दावली में मीडिया की दुनिया के लिए एक शोक का सबब तो है ही, एक बड़ा सबक भी है।

सबक यह कि जिस कदर हम सब अपने आप में एकाकी होते जा रहे हैं वह कहीं न कहीं हम सबको भीतर ही भीतर इतना कमजोर बना रहा है कि हम अपने बाहर जो कुछ भी अच्छा-बुरा घट रहा है, न सिर्फ उससे अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं बल्कि उससे लड़ने की हमारी ताकत भी घटती जा रही है। इसलिए अगर इस चुनौती भरे समय में हम सब अपने अपने घरौंदों से निकलकर एक बार फिर वैसे ही मिलना-जुलना, उठना-बैठना, लड़ना-झगड़ना, उलझना और फिर हाथ मिलाकर गले मिलकर अगले दिन मिलने का वादा करने का सिलसिला शुरु कर सकें तो शायद हम अपने एकाकीपन से भी लड़ पाएंगे और विनोद दुआ को यही सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी।

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अलविदा विनोद जी! आपकी पत्रकारिता का यह देश हमेशा ऋणी रहेगा: राजेश बादल

विनोद दुआ अब नहीं हैं। इस खबर पर यकीन नहीं करना चाहता, लेकिन यह सच है कि वे अब अपनी अनंत यात्रा पर चले गए हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Sunday, 05 December, 2021
Last Modified:
Sunday, 05 December, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।  

विनोद दुआ अब नहीं हैं। इस खबर पर यकीन नहीं करना चाहता, लेकिन यह सच है कि वे अब अपनी अनंत यात्रा पर चले गए हैं। बीते चार दशक से वे भारतीय टेलिविजन पत्रकारिता की मज़बूत रीढ़ थे। उमर भर दबाव आए, तमाम झंझावात आए पर वे अपने सिद्धांतों से डिगे नहीं। कोई भी सरकार रही हो, विनोद दुआ के आगे उसकी नही चली। कारण यही था कि विनोद दुआ को कोई भी लालच या प्रलोभन डिगा नहीं सकता था। आने वाली नस्लें शायद भरोसा भी न करें कि देश में कभी एक ऐसा पत्रकार  एंकर भी था, जो ताल ठोक कर कहता था, जो कहूंगा सच कहूंगा। सच के सिवा कुछ नहीं कहूंगा। उनसे मेरे रिश्ते की शुरुआत उन्नीस सौ पचासी से नब्बे के बीच हुई थी। 

मैं उन दिनों ‘नवभारत टाइम्स’ जयपुर में मुख्य उपसंपादक था। दिल्ली आना जाना लगा रहता था और शाम की किसी महफ़िल में हम साथ थे। उन्होंने और चिन्ना भाभी ने गाने गाए। कुछ मैंने भी साथ दिया। ब्रायन सिलास पियानो पर साथ दे रहे थे। सुबह चार साढ़े चार बजे तक महफ़िल चली। फिर जामा मस्जिद के पास पूड़ी सब्ज़ी खाने गए। उन्होंने निहारी खाई। हमारे रिश्ते की वह शुरुआत थी। इसके बाद तो कई साल तक उनसे बाबा बुल्लेशाह से लेकर बाबा फरीद, कबीर, तुलसी और जायसी जैसे महा-रचनाकारों की अनगिनत रचनाएं सुनी। पुराने गीत सुने और साथ में गाए भी। चिन्ना भाभी भी बहुत अच्छा गाती थीं। उनके घर का एक कमरा हम जैसों के लिए ही आरक्षित रहता था। उनकी मां भी हम लोगों को बेटे जैसा ही प्यार करती थीं। इसके बाद अख़बार के साथ साथ ‘दूरदर्शन’ से मेरा भी रिश्ता बन गया। हमारी दोस्ती परवान चढ़ी।

उन्नीस सौ बानवे में भारत की पहली समाचार पत्रिका ‘परख’ हम लोगों ने शुरू की। कर्ता धर्ता विनोद जी ही थे। ‘परख’ ने शीघ्र ही टीवी पत्रकारिता में झंडे गाड़ दिए। पत्रिका दूरदर्शन पर थी, लेकिन कोई दबाव हमारे ऊपर नहीं था। केंद्र और राज्य सरकारों की हम खुलकर आलोचना करते थे, पर कभी कोई दबाव नहीं आया। कभी कुछ ऐसा हुआ भी तो विनोद जी ने उसे कपूर की तरह उड़ा दिया। ‘परख’ की रिपोर्टिंग टीम में हम लोगों के साथ रजत शर्मा भी थे। वे पंजाब से रिपोर्टिंग करते थे। 

असल में सरकार और सत्ता प्रतिष्ठानों से सिद्धांतों पर टकराव विनोद जी के स्वभाव में था। परख से पहले ‘जनवाणी’ नामक एक कार्यक्रम प्रसारित होता था। इसमें विनोद जी एक शख्सियत का साक्षात्कार करते थे। सवाल इतने तीखे होते थे कि सामने वाले को उत्तर देना मुश्किल हो जाता था। उन दिनों राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। अशोक गहलोत नए नए केंद्रीय मंत्री बने थे। विनोद जी के सवालों का उत्तर तक वे नहीं दे पाए। एपिसोड प्रसारित हुआ तो उनकी बड़ी किरकिरी हुई। अगले दिन कुछ वरिष्ठ मंत्री और कांग्रेस नेता राजीव गांधी के पास पहुंचे और उनसे कहा कि सरकारी दूरदर्शन पर सरकार के ही मंत्री की छवि ख़राब की जा रही है। विनोद दुआ को हटाया जाए। राजीव गांधी ने कहा कि अगर कोई मंत्री टीवी पत्रकार के प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाए तो इसमें विनोद दुआ की क्या गलती? अगले दिन ही अशोक गहलोत का इस्तीफा हो गया। एक साक्षात्कार में रक्षा मंत्री शरद पवार आए। विनोद दुआ के सामने नहीं देखकर वे सवालों का उत्तर इधर-उधर देख कर दे रहे थे। टीवी पत्रकारिता में यह असभ्यता मानी जाती है। जब बहुत हो गया तो विनोद दुआ ने कहा, शरद पवार जी! मेरी तरफ देख कर उत्तर दीजिए। आप इधर-उधर देखते हैं तो ऐसा लगता है जैसे राष्ट्र के नाम संदेश दे रहे हैं और मैं अपना वक़्त बर्बाद  कर रहा हूं। यह टिप्पणी दूरदर्शन पर प्रसारित भी हुई। आज किसी पत्रकार में हिम्मत है? 

जब मोती लाल वोरा उत्तर प्रदेश के राज्यपाल थे तो मैनें ‘परख’ के संवाद स्तंभ में साक्षात्कार के लिए उनसे बात की। वोरा जी ने तब तक किसी भी राष्ट्रीय टीवी कार्यक्रम के लिए कोई साक्षात्कार नहीं दिया था। लेकिन विनोद दुआ के कारण पशोपेश में थे। मैनें उन्हें भरोसा दिया कि कुछ भी गड़बड़ नहीं होगी। वे तैयार हो गए। मैं उनके साथ लखनऊ से दिल्ली आया। रिकॉर्डिंग से पहले विनोद जी से मैंने वोरा जी की यह चिंता जताई और उनसे नरमी बरतने का अनुरोध किया। विनोद जी बोले, ‘राजेश जी! वे एक राज्यपाल हैं और संवैधानिक प्रमुख हैं। उनसे कहिए, निश्चिंत रहें। कम राजनेता ऐसे हैं, जिन्हें मैं पसंद करता हूं और उनमें से एक वोरा जी भी हैं।’ जैन स्टूडियो में यह साक्षात्कार रिकॉर्ड किया गया और बेहद पसंद किया गया। 

मेरी अपनी परख की अनेक विशेष समाचार रिपोर्टों के कारण सरकारें, बड़े राजनेता तक मुश्किल में पड़ जाते थे। उन रिपोर्टों पर विनोद दुआ की पैनी टिप्पणी सोने में सुहागे का काम करती थी। इसी तरह रजत शर्मा, विनोद दुआ, विजय त्रिवेदी और मुकेश कुमार की धारदार रिपोर्टिंग परख को धारदार बनाती थी। वैसी रिपोर्टिंग तो आज की पीढ़ी के लिए असंभव ही है। मगर दूरदर्शन को यह आज़ादी मिली रही। आज के दौर को देखते हुए तो शायद ही कोई इस पर भरोसा करेगा। परख का अपना राष्ट्रीय संवाददाता तंत्र था। उन दिनों दूरदर्शन के पास भी ऐसा तंत्र नहीं था। अस्सी के दशक में प्रणव राय और विनोद दुआ की जोड़ी ने चुनावों के दौरान जो विश्लेषण किए, वे हिन्दुस्तान ही नहीं, समूचे एशिया के लिए एक धरोहर से कम नहीं हैं। उन दिनों ईवीएम नहीं होती थी और मतगणना कई दिन चलती थी। उस दरम्यान यह जोड़ी किसी भी पार्टी या सरकार या राजनेता को नही छोड़ती थी। मुद्दों पर निष्पक्ष आलोचना की नींव तो इसी जोड़ी ने छोटे परदे पर डाली। 

लोग यह मानते हैं कि छोटे परदे पर बाहरी प्रड्यूसर की ओर से ‘डीडी मेट्रो’ पर दैनिक बुलेटिन ‘आजतक’ ने प्रारंभ किया था। पर यह सच नहीं है। ‘आजतक’ से पहले विनोद दुआ ने उसी समय पर ‘न्यूज वेब’ दैनिक बुलेटिन शुरू किया था। इस बुलेटिन ने एक सप्ताह में ही झंडे गाड़ दिए थे। अफ़सोस, यह कुछ महीनों बाद किन्ही कारणों से बंद हो गया। लेकिन विनोद दुआ ने शानदार पत्रकारिता के ज़रिए नए नए कीर्तिमान स्थापित किए। ‘सहारा’, ‘ऑब्जर्वर’, ‘चक्रव्यूह’ और ‘न्यूज़ ट्रैक’ पर विनोद दुआ की पत्रकारिता हरदम याद की जाएगी। ‘एनडीटीवी’ पर उनका दैनिक शो अपनी गुणवत्ता के लिए मशहूर था। लोग उसका बेताबी से इंतज़ार करते थे। ‘द वायर’ पर उनकी तीखी टिप्पणियों पर दर्शक रीझते थे क्योंकि वे उनके दिल की बात करते थे। 

विनोद जितने अच्छे सरोकारों को समर्पित पत्रकार थे, उससे अच्छे प्रस्तोता याने एंकर थे। जितने अच्छे प्रस्तोता थे, उससे अच्छे टीवी की बारीकियों के विशेषज्ञ और उससे भी अच्छे गायक। जितने अच्छे गायक, उससे बड़े जानकार थे मुल्क के तमाम हिस्सों के देशज खाने के बारे में। उनका देशभर का ज़ायके का सफ़र उतने ही चाव से देखा जाता था, जितनी गंभीरता से उनका न्यूज विश्लेषण। सबसे बड़ी बात, वे सबसे बेहतरीन इंसान थे। उनके मानवीय गुण बेमिसाल थे। उनकी टीम में सारे सदस्य बराबर थे, चाहे वे किसी भी पद पर हों। नए नए लोगों को खोजकर उन्हें टीवी पत्रकारिता सिखाने का उनका हुनर बेजोड़ था। कितने लोग जानते हैं कि आज इंडिया टीवी के मालिक रजत शर्मा ने ‘परख’ के साथ पंजाब से रिपोर्टिंग करते हुए टीवी पत्रकारिता का ककहरा सीखा था। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के पूर्व संपादक दिलीप पडगांवकर और बादशाह सेन भी विनोद दुआ के टीवी स्कूल में रहे थे। मैंने स्वयं उनसे बहुत सी नई बातें सीखी। मेरे साथी विजय त्रिवेदी, डॉक्टर मुकेश कुमार, लोकप्रिय एंकर संदीप चौधरी से लेकर उनसे टीवी पत्रकारिता समझने वालों की एक लंबी सूची है।

अफ़सोस! हालिया दौर में विनोद दुआ को अपनी स्वस्थ्य पत्रकारिता और सरोकारों पर डटे रहने के लिए परेशान किया गया। हालांकि इसका उन पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ा। वे अपने अंदाज़ में बेखौफ पत्रकारिता करते रहे। अलबत्ता उन्हें झटका ज़रूर लगा था। अक्सर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हमारी शाम को महफ़िल जम जाती थी और वे तब खेद प्रकट करते थे कि एक ज़माने में राजनीति दूरदर्शन जैसे सरकारी मंच से निष्पक्ष पत्रकारिता करने का अवसर प्रदान करती थी और आज दूरदर्शन किस तरह व्यवहार कर रहा है। एक नवोदित चैनल ने उनके साथ धोखा किया था। शो के लिए तय राशि नहीं दी। यह राशि लगभग पैंतालीस लाख थी। वे खिन्न थे। मुझसे फ़ोन पर बोले, मेरा पैसा तो मैं निकाल कर रहूंगा।

मेरे घर के सारे सदस्य उनके साथ वैसे ही जुड़े थे, जैसे एक पारिवारिक सदस्य होता है। मेरी मां और पत्नी से उनकी एकदम घरेलू बातचीत होती थी। जब मेरे घर दो जुड़वां बेटे आए तो उनका नाम विनोद जी ने मेघ-मल्हार रखा था। चूंकि मेरी बेटी का नाम मेघना है इसलिए अब भी लाड़ में उन्हें मेघना, मेघ मल्हार कहते थे। बच्चों की अपनी बातचीत में विनोद अंकल भी एक विषय होते थे। एक बार मैनें उन्हें लोक कवि ईसुरी की जीवन दर्शन पर आधारित एक रचना गाकर सुनाई। उनके अंतर्मन को छू गई। एक सप्ताह बाद रात साढ़े ग्यारह बजे उनका फोन आया। बोले, क्या कर रहे हैं? मैंने कहा सोने की तैयारी। बोले कुछ आवारागर्दी का मूड है। मैंने कहा, क्यों नहीं, वह तो टॉनिक है। उससे सेहत को कोई नुकसान नहीं होता। पंद्रह मिनट में ही वे मुझे लेने आ पहुंचे। बैठते ही उन्होंने कहा, उस दिन से ईसुरी की वह रचना मेरे दिमाग़ में छाई हुई है। आज वही गाते हैं। फिर हम लोग समवेत वह रचना गाते रहे। वह रचना थी-

‘अब न होबी यार किसी के, जनम-जनम खां सीके, यार करे की बड़ी बिबूचन, बिना यार के नीके...’ ईसुरी की प्रेम केंद्रित फागें भी उन्हें बेहद पसंद थीं। हम लोग सारी रात क़रीब सुबह साढ़े चार बजे तक ईसुरी गाते रहे। बीच बीच में बाबा बुल्ले शाह भी आ जाते थे तो शिव कुमार बटालवी भी। 

मेरे लिए जो क्षति है, वह तो है ही, सारी विश्व पत्रकार बिरादरी के लिए यह बड़ा आघात है। कुछ बरस पहले अमेरिका में था तो वॉशिंगटन में पाकिस्तान के ‘एआरवाई’ चैनल के प्रमुख मोहसिन भाई अक्सर कहते थे, ‘राजेश भाई बंटवारे के बाद कुछ हीरे ऐसे हैं जो पाकिस्तान में भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने हिन्दुस्तान में होंगे। इनमें लता मंगेशकर, जगजीत सिंह, मोहम्मद रफ़ी, खुशवंत सिंह और विनोद दुआ। आपका एक विनोद दुआ सौ-सौ पत्रकार के बराबर है। बाजू में खड़े नेपाल के पत्रकार रघु मैनाली, अफ़ग़ानिस्तान के पत्रकार इक़राम सिंघवारी और बांग्लादेश के पत्रकार (मैं नाम भूल रहा हूं) ने तुरंत इसका समर्थन किया। उनका कहना था कि विनोद जी उनके देशों में भी बड़े आदर से याद किए जाते हैं। 

अलविदा विनोद जी! आपके साथ बिताया समय अनमोल है। आपकी पत्रकारिता का यह देश हमेशा ऋणी रहेगा। 

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सिर्फ नाम के ही नहीं, बल्कि जीते-जागते ‘विनोद’ थे विनोद दुआ जी: कमर वहीद नकवी

वह 1991 का जून का महीना था, जब विनोद जी से मेरी पहली मुलाकात दिल्ली में हुई थी। तब तक वह खासे मशहूर और सेलिब्रिटी एंकर बन चुके थे। तीन दिनों तक मैं उनके साथ रहा।

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Published - Sunday, 05 December, 2021
Last Modified:
Sunday, 05 December, 2021
Qamar Waheed Naqvi

कमर वहीद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार।।

वह 1991 का जून का महीना था, जब विनोद जी से मेरी पहली मुलाकात दिल्ली में हुई थी। तब तक वह खासे मशहूर और सेलिब्रिटी एंकर बन चुके थे। तीन दिनों तक मैं उनके साथ रहा। 'बहुत बड़ा आदमी' होने की कोई रत्ती भर भी हनक उनमें नहीं दिखी। हुआ यूं कि ‘एनडीटीवी‘ को ‘दूरदर्शन‘ पर दसवीं लोकसभा की मतगणना का तीन दिनों तक लगातार सीधा प्रसारण करना था। उन दिनों वोट बैलट पेपर पर डाले जाते थे और लोकसभा चुनाव के वोटों की गिनती पूरी होने में तीन दिन लग जाया करते थे। प्रणय रॉय और विनोद दुआ इस शो के एंकर थे। विनोद जी हिंदी की एंकरिंग का जिम्मा संभाल रहे थे और मुझे उनके लिए हिंदी में इनपुट और रिसर्च का काम करना था।

टीवी पत्रकारिता के भारी-भरकम तामझाम, लकदक स्टूडियो, स्क्रीन पर कुलाँचे भरते ग्राफिक्स की चकाचौंध से यह मेरा पहला सामना था। मैं था निपट हिंदीभाषी और मेरे चारों तरफ पूरी की पूरी टीम फर्राटेदार अंग्रेजी वाली। विनोद जी ने शायद पहली ही नजर में मेरी परेशानी भांप ली और फिर इस बात का पूरा ख्याल रखा कि मैं कोई परेशानी महसूस न करूं, यहां तक कि यह भी उनकी चिंता में शामिल होता कि मैंने ठीक से नाश्ता कर लिया या नहीं।

विनोद जी बहुत बड़े पत्रकार तो थे ही, बहुत बड़े इंसान भी थे। वह नाम के ही विनोद नहीं थे, बल्कि जीते-जागते विनोद थे। उनसे दो मिनट की भी बातचीत हो, तो आप हंसे-मुस्कराए बिना लौट ही नहीं सकते। गजब की हाजिरजवाबी और उनकी चुटकियों की गजब की धार। अपने चार दशक से ज्यादा के पत्रकारीय जीवन में उन्होंने राजनीति की हर परत उधेड़ी, हर राजनीतिक दल, हर सरकार और हर बड़े नेता को अपने तीखे सवालों के कटघरे में खड़ा किया। उनके सवाल बड़े तीखे और चुटीले होते थे, ठीक निशाने पर जाकर लगते थे, लेकिन सवाल बड़ी मिठास से पूछे जाते थे, चुटकियां लेते हुए, मुस्कराते हुए। लेकिन, कभी किसी ने विनोद दुआ की पत्रकारीय ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं उठाया, कभी किसी ने यह लांछन नहीं लगाया कि वह किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं या इस या उस पार्टी के साथ पक्षपात करते हैं या किसी को जानबूझ कर बदनाम करते हैं। दुर्भाग्य है कि अभी हाल के एक-दो बरसों में उन पर देशद्रोह तक के फर्जी मुकदमे दर्ज किए गए।

अगर मैं कहूं कि विनोद दुआ हिंदी में टीवी पत्रकारिता के जनक थे, तो शायद अतिश्योक्ति न होगी। उनके कार्यक्रम 'जनवाणी' और उसके बाद 'परख' ने हिंदी के असंख्य पत्रकारों को टीवी रिपोर्टिंग और एंकरिंग का ककहरा सिखाया और देश के दूरदराज हिस्सों तक से टीवी पत्रकारों की बिलकुल नई पौध तैयार हुई। भारत में रंगीन टीवी तो 1982 के दिल्ली एशियाई खेलों के साथ ही शुरू हुआ था और जब 1985 में विनोद जी के कार्यक्रम 'जनवाणी' में केंद्र सरकार के मंत्रियों को सीधे जनता के सवालों का जवाब देना पड़ा, वह देखना अपने आप में अद्भुत था, वह भी एक सरकारी समाचार माध्यम पर! आज तो बहुतेरे प्राइवेट चैनलों पर ऐसे सवाल नहीं पूछे जाते! 1992 में उनके साप्ताहिक कार्यक्रम 'परख' में देश के कोने-कोने से आनेवाली टीवी रिपोर्ट्स तो बड़ी ही चर्चित रहीं।

विनोद जी टीवी पत्रकारिता के एक ऐसे प्रकाशस्तंभ थे, जिन्होंने अपने समय की पूरी की पूरी पीढ़ी के पथ को अपनी पत्रकारीय विश्वसनीयता, दायित्व-बोध, बेबाकी, और आचरण की शालीनता जैसे मूल्यों से सदा आलोकित किया। सादर नमन।

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अंग्रेजी के वरिष्ठ पत्रकारों ने कुछ यूं दी विनोद दुआ को श्रद्धांजलि

वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ के निधन के बाद उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा हुआ है। अंग्रेजी के तमाम बड़े पत्रकारों ने ईश्वर से दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करने की प्रार्थना की। 

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Sunday, 05 December, 2021
Last Modified:
Sunday, 05 December, 2021
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वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ के निधन के बाद उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा हुआ है। अंग्रेजी के तमाम बड़े पत्रकारों ने ईश्वर से दिवंगत आत्मा को शांति व शोकाकुल परिवार को इस दुःख की घड़ी को सहन करने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की है। 

‘एनडीटीवी’ (NDTV) के फाउंडर्स-प्रमोटर्स डॉ. प्रणॉय रॉय ने विनोद दुआ को श्रद्धांजलि देते हुए ट्वीट किया है, ‘विनोद दुआ को खोने का काफी गहरा दुख है। वह न सिर्फ महान लोगों में शामिल थे, बल्कि अपने समय की सबसे महान शख्सियत थे। वह सबसे बड़ी एक अद्भुत प्रतिभा थे, जिसकी मैंने हमेशा प्रशंसा की और सम्मान किया और जिनसे मैंने बहुत कुछ सीखा। हमने साथ मिलकर कई साल काम किया। अलविदा मेरे दोस्त, भगवान आपको अपने श्रीचरणों में स्थान दें।’

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने विनोद दुआ को श्रद्धांजलि देते हुए ट्वीट किया है। इस ट्वीट में उन्होंने लिखा है, ‘विनोद दुआ जैसी स्वभाविक टीवी पर्सनेलिटी कोई नहीं है। वह ट्रेंड स्थापित करने वाले पत्रकार थे, जिन्होंने पॉलिटिक्स, फूड, म्यूजिक आदि पर समान रूप से बेहतरीन कार्यक्रम पेश किए। 80-90 के दशक में दुआ-रॉय की इलेक्शन जुगलबंदी काफी खास थी। दूरदर्शन पर आम चुनाव को लेकर उनकी लाइव कवरेज कमाल की थी। भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें।’ 

जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार और लेखक वीर सांघवी ने विनोद दुआ को श्रद्धांजलि देते हुए ट्विटर पर लिखा है, ‘देश में टेलीविजन न्यूज के अग्रणी और शायद हमारे समय के सबसे महान टीवी प्रजेंटर विनोद दुआ के निधन से काफी दुखी हूं।’ पहली बार जब मैं टीवी पर आया तो विनोद जी एंकर थे और मैंने उनकी स्वाभाविक और खास स्टाइल की प्रशंसा की, जिसे आने वाले दशकों में हममें से कोई भी मैच नहीं कर सका। उनका निधन अपूरणीय क्षति है।

न्यूज एजेंसी ‘एएनआई’ (ANI) की एडिटर स्मिता प्रकाश ने ट्वीट किया है, 'अलविदा विनोद, तुम और चिन्ना वहां अपने गानों और व्यवहार से भगवान को भी अपना बना लोगे।’

एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा, ‘वैमनस्यता रोको। विनोद दुआ पर आज के घटिया ट्वीट्स उतने ही निंदनीय हैं, जितने रोहित सरदाना के निधन पर किए गए थे।’

वरिष्ठ पत्रकार और न्यूज एंकर स्मिता शर्मा ने विनोद दुआ को श्रद्धांजलि देते हुए अपने ट्वीट में लिखा है, ‘पत्रकारों की पीढ़ियों के वह प्रेरणास्रोत थे। हमें आईबीएन7 में कुछ साल तक साथी एंकर के रूप में काम करने का सौभाग्य मिला। हमें उनके साथ फूड, म्यूजिक, कला, आर्ट और उनके रोमांचक सफर के बारे में बात करना काफी अच्छा लगता था। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे। विनोद दुआ आप अनंत में चिन्ना जी के साथ जाकर मिल गए हैं। आपको हाथ जोड़कर नमन।‘

बता दें कि करीब 67 साल के विनोद दुआ पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। हालत ज्यादा गंभीर होने पर उन्हें दिल्ली के अपोलो अस्पताल में आईसीयू (ICU) में भर्ती कराया गया था, जहां पर शनिवार को उन्होंने अंतिम सांस ली। विनोद दुआ का अंतिम संस्कार रविवार दोपहर 12 बजे लोधी रोड श्मशान घाट में किया जाएगा।

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हिंदी टीवी पत्रकारिता को सम्मान दिलाने वाले विनोद दुआ को आखिरी सलाम: विजय त्रिवेदी

विनोद दुआ हिंदी टीवी पत्रकारिता का सबसे बड़ा नाम यूं ही नहीं थे। उनसे ज़्यादा कैमरा फ्रेंडली एंकर शायद ही कोई दूसरा रहा हो।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 04 December, 2021
Last Modified:
Saturday, 04 December, 2021
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विजय त्रिवेदी, वरिष्ठ पत्रकार ।।

मेरे पत्रकार और फ़िल्मकार मित्र जो एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, ने ट्विटर पर लिखा- ‘विनोद मरा नहीं, विनोद मरते नहीं।’ सच ही लिखा है, भले ही यह खबर सच हो कि वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ ने शनिवार को साढ़े चार बजे दिल्ली के अपोलो अस्पताल में आखिरी सांस ली, लेकिन विनोद दुआ, उनकी पत्रकारिता, उनकी जांबाज़ी, उनकी हिम्मत मर नहीं सकती। अपने 35 साल के करियर में उनका यह अंदाज़ सैकड़ों पत्रकारों में छूट गया है, जो खत्म नहीं हो सकता। उसे खत्म किया नहीं जा सकता।

विनोद दुआ हिंदी टीवी पत्रकारिता का सबसे बड़ा नाम यूं ही नहीं थे। उनसे ज़्यादा कैमरा फ्रेंडली एंकर शायद ही कोई दूसरा रहा हो। आज के दौर में जब ज़्यादातर एंकर टीवी प्रॉम्पटर के बिना नहीं चल सकते हों, उसमें विनोद दुआ ने कभी प्रॉम्पटर का इस्तेमाल नहीं किया, क्योंकि किसी भी कार्यक्रम या स्टोरी के लिए उनके दिमाग में तस्वीर साफ होती थी और वो वही बोलते थे, चाहे आपको पसंद आए या नहीं।

दुआ साहब यूं तो खुद को पत्रकार नहीं कहते थे, और प्रजेंटर बोलते थे, क्योंकि उस ज़माने में दूरदर्शन पर एंकर प्रजेंटर ही होते थे, लेकिन उनकी राजनीतिक समझ और पत्रकारिता की पैनी धार ऐसी रही, जिसका तोड़ पाना आसान काम नहीं था। कैमरे के सामने उनका दुस्साहस और बेलागमपन उन्हें सबसे अलग करता है, उनका अपना खास अंदाज़ था, बेफिक्री का अंदाज़। दूरदर्शन पर चुनाव विश्लेषणों ने उनको ऐसी पहचान दी कि वो हर हिन्दुस्तानी घर में सेलेब्रिटी हो गए। प्रणव रॉय और उनकी जोड़ी खूब जमती थी। दिल्ली के हंसराज कॉलेज से अंग्रेजी में स्नातक और दिल्ली विश्वविद्यालय से लिट्रेचर में एम ए कर चुके दुआ की अंग्रेजी और हिंदी दोनों पर जबरदस्त पकड़ थी। प्रणव रॉय के अंग्रेजी प्रजेंटेशन को भी वे तुरंत बड़ी खूबसूरती से हिंदी में समझा देते थे। हिंदी टीवी पत्रकारिता को सम्मान दिलाने में उनकी भूमिका को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकेगा।

क्या अब विनोद दुआ जैसी हिम्मत कोई एंकर दिखा सकता है

कम लोगो को याद होगा कि जिस जमाने में दूरदर्शन अकेला टीवी चैनल होता था और वो भी सरकार के अधीन, उस दूरदर्शन पर उनका प्रोग्राम जनवाणी खासा लोकप्रिय था। इस कार्यक्रम में वो सरकार के नुमाइंदों और मंत्रियों को बुलाते थे और जनता के सवाल भी शामिल करते थे। कुछ लोग अब भी चाहें तो उस प्रोग्राम से दुस्साहसी होने के लिए हिम्मत जुटा सकते हैं। उस कार्यक्रम में दुआ साहब मंत्रियों से जैसे सवाल पूछते, टिपप्णी करते, जनता को मौका देते, वो तब तो मुश्किल काम था ही, अब असंभव सा लगता है। क्या आज कोई प्राइवेट न्यूज चैनल पर भी किसी मंत्री के कामकाज पर टिप्पणी करते हुए, उसे दस में से तीन अंक देने की हिम्मत दिखा सकता है, वो काम उन्होंने सरकारी चैनल दूरदर्शन पर किया। दुआ साहब ने शायद कभी इस बात की परवाह नहीं की कि सत्ता का व्यवहार उनके साथ कैसा रहेगा। 2008 में जब मनमोहन सिंह सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित करने का ऐलान किया, उनकी सूची में कुछ और नाम भी थे। उस हिसाब से विनोद दुआ के लिए वो बहुत छोटा सम्मान था।

संवाददाताओं का देश भर में जाल बिछाया

दूरदर्शन पर प्राइवेट प्रॉडक्शन के तौर पर वह पहली साप्ताहिक पत्रकारिता थी– ‘परख’, नवम्बर 1992 में शुरू हुए इस कार्यक्रम के लिए लोग पूरे सप्ताह इंतज़ार करते थे। मेरा सौभाग्य है कि उस प्रोग्राम की शुरुआत से मैं उसमें जुड़ा रहा, पहले दिन से, पहले कार्यक्रम से। उस कार्यक्रम में भी हर सेगमेंट का नाम उन्होंने बेहद खूबसूरत तरीके से चुना था। वो उस कार्यक्रम के ना केवल निर्माता निर्देशक थे, बल्कि इसके माध्यम से उन्होनें देश भर में संवाददाताओं का ऐसा जाल बिछाया, जो बाद में आने वाले न्यूज चैनलों के आधार स्तम्भ बन गए। आज भी यह जानकार अच्छा महसूस होता है कि परख की टीम के उन पत्रकारों ने पत्रकारिता के मानदंडों को नहीं छोड़ा और आगे बढ़ाने की कोशिश ही की। देर रात तक उस कार्यक्रम पर चर्चाओं में उनका सहभागी और प्यार का हकदार बना। उन चर्चाओं के बीच इतिहास, विदेश नीति और संगीत पर उनका ज्ञान अदभुत था।

पढ़ने लिखने और गाने के शौकीन दुआ

पढ़ने लिखने और गाने के शौकीन। गाने के शौक और एक कार्यक्रम से ही उनकी मुलाकात बाद में उनकी जीवनसंगिनी बनी डॉ पद्मावती से हुई। प्यार से उन्हें लोग चिन्ना दुआ के नाम से जानते हैं और वो नेवीगेटर थीं विनोद दुआ की, शायद यही वजह रही कि इस साल कोरोना की वजह से जून में चिन्ना जी के जाने के बाद दुआ साहब ना केवल टूट गए, बल्कि शायद जीने की इच्छा ही छोड़ दी और वो बीमारी की इस लड़ाई से वैसे नहीं लड़ रहे थे, जैसे उन्होंने अपने करियर में बड़े बड़े लोगो से लड़ी थीं। नौकरी करना उन्हें पसंद नहीं था, बल्कि यूं कहना चाहिए कि उनका स्वभाव नही था। कोई ना तो उन्हें बांध सकता था और ना ही उनके विचारों को रोक सकता था, किसी गहरी और बड़ी नदी की तरह उनका विस्तार तो था ही, पत्थर उनका रास्ता नहीं रोक सकते थे, सिर्फ बहते रहे अपने अंदाज़ में।

लोकप्रियता के शिखर पर रहते वक्त भी वो ओढ़ी हुई गंभीरता के साथ नहीं रहते थे, एक जिंदादिल इंसान, जोश खरोश से भरा हुआ, अपने सहयोगियों को दोस्त मानने वाला। सड़क पर भुट्टा खाने, नमक मसाले वाली मूली खरीदने और गोल गप्पे खाने वाला दुआ साहब बनना मुश्किल काम है। लोकप्रियता जब दूसरों से दरवाज़े बंद करती हो, उस वक्त भी वो सबके लिए खुले हुए, हर चर्चा के लिए। हिंदी,उर्दू और अंग्रेजी साहित्य जितना पढ़ते थे, उतना ही ज्ञान उन्हें संगीत और नाटक में था। फ़िल्मों और गीतों के साथ सूफी संगीत उनका शौक था। सुनना भी, गाना भी और उसमें उनकी जबरदस्त जोड़ी सहयोगी चिन्ना दुआ। अक्सर बुल्ले शाह और बाबा फरीद का ज़िक्र और गीत उनकी बातचीत में शामिल होते थे। खाने खिलाने के शौकीन।

‘जायका’ शो आपको खाने का जायका महसूस कराता था

विनोद दुआ का मतलब पार्टियां, हर मौके, बेमौके पार्टियां लेकिन अनौपचारिक बिना दिखावे की। किस्से, लतीफे और चुटकियां, हंसना, हंसाना, और बेलौस जीना। उनकी बेटी स्टैंड-अप मल्लिका में यह गुण शायद उनसे ही आया होगा। पत्रकारिता से दूर जब उन्होंने हिन्दुस्तान की सड़कों और गलियों और ढाबों के लोकल फूड पर एनडीटीवी पर कार्यक्रम किया ज़ायका इंडिया का, तो उसे सिर्फ़ देखना नहीं होता था, आप उसमें उस फूड का ज़ायका महसूस कर सकते थे। उनकी दूसरी बेटी बकुल क्लिनिकल साइकोलोजिस्ट हैं, शायद वो किसी दिन बेहतर तरीके से समझा पाएं। विनोद दुआ का परिवार विभाजन के वक्त पाकिस्तान के डेरा इस्माइल खान से आया था। बचपन मुश्किलों में बीता। उनकी विनम्रता, उनकी हंसी, उनकी पत्रकारिता यदि आपने महसूस नहीं की, तो पक्का मानिए आप बहुत कुछ हासिल करने से रह गए हैं।

(साभार:  tv9hindi.com)

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वरिष्ठ पत्रकार मनोरंजन भारती ने अपने गुरु विनोद दुआ जी को यूं दी भावभीनी श्रद्धांजलि‍

विनोद दुआ जी ने IIMC से पास हुए एक बच्चे को सिखाई थी कि जैसे ही कैमरा और लाइट ऑन हो तो सवाल वही पूछना जो तुम पूछना चाहते हो और सवाल चिल्लाकर नहीं...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 04 December, 2021
Last Modified:
Saturday, 04 December, 2021
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मनोरंजन भारती, मैनेजिंग एडिटर, एनडीटीवी इंडिया

मैं कॉलेज के जमाने से 'परख' और World this week देखा करता था और एक सपना था कभी इनसे (विनोद दुआ जी से) मिलूं। फिर IIMC में चयन हो गया। साल 1994 की बात है IIMC से पास करने के बाद मौका था नौकरी ढूंढने का, पता चला कि विनोद दुआ और ‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ के दिलीप पडगांवकर ने मिलकर एक कंपनी बनाई है जो दूरदर्शन के लिए प्रोग्राम बनाएंगे।

विनोद दुआ और दिलीप पडगांवकर जैसे लेगों ने एक कंपनी बनाई थी APCA जो किन्‍हीं कारणों से चली नहीं। फिर मुझे मौका मिला दुआ सर के साथ काम करने का, जबकि मेरे कई दोस्त अलग-अलग जगह चले गए। मेरे रूम मेट नीरज भी पडगांवकर की नई कंपनी APCA में चले गए, लेकिन मैंने मन बनाया हुआ था कि हिंदी पत्रकारिता में काम करना है तो विनोद दुआ के साथ ही करूंगा और मैं ‘परख’ में आ गया।

पहले कई महीने रिसर्च करता रहा, फिर पहली स्टेरी मिली वो भी टाडा पर। मैंने पूरी मेहनत करके ऐसी स्टोरी की जो दूरदर्शन को पसंद नहीं आई। चूंकि 'परख' दूरदर्शन पर आता था इसलिए कहा गया कि काट छांट करें। फिर दुआ सर ने स्टोरी दोबारा एडिट की, फिर वो टेलीकास्ट हुई।

हर शुक्रवार को 'परख' का टेप जाने के बाद पार्टी होती थी। खाने के बड़े शौकीन थे। सबसे पहले निहारी खाने का सौभाग्य उनके पास ही मिला। घर भी बुलाते थे, खुद बना के खिलाते थे। संगीत के गुरु थे, खुद गाते थे साथ में चिन्ना मैम भी,  जो तमिलियन थीं। दोनों हिंदी गाने बहुत ख़ूबसूरत अंदाज में गाते थे। मैंने देखा जब नुसरत फतेह अली खान भारत आए थे, तो केवल परख को अनुमति थी, तीन गाने शूट करने की। फिर दुआ सर ने नुसरत फतेह अली खान के साथ एक अलग कॉन्‍सर्ट किया था जिसमें 'परख' के सभी लोगों को बुलाया। दुआ सर की वजह से नुसरत साहब को सामने से सुनने का सुखद अनुभव हुआ। पंजाबी और हिंदी गानों को खूब पसंद करते थे और बड़े सुर में गाते थे।

फिर जब 'परख' बंद हुआ तो मैं उनके साथ NDTV आ गया, Good Morning India में। यादों का सिलसिला खत्म नहीं हो रहा मगर उन्होंने IIMC से पास हुए एक बच्चे को सिखाई थी कि जैसे ही कैमरा और लाइट ऑन हो तो सवाल वही पूछना जो तुम पूछना चाहते हो और सवाल चिल्ला कर नहीं बातचीत के लहजे में मुस्कुराते हुए, जैसे तुम गेस्ट से बातचीत कर रहे हो। उनकी ये बात मैं अभी भी फॉलो कर रहा हूं। यही बात NDTV में भी सिखाई गई। दुआ सर, आज आप नहीं हैं मगर आप का नाम देश के टेलीविजन इतिहास में लिखा जाएगा। जो सफर 'जनवाणी' से शुरू हुआ वो जारी रहेगा। सवाल तो पूछना ही है, आपके शिष्य होने के नाते हम ये करते रहेंगे। आपके जाने के साथ पत्रकारिता के उस युग का अंत हो गया जो कठिन सवाल पूछने से डरता नहीं था, भले ही मुकदमे हो जाएं। गोदी मीडिया के इस युग में जब चाटुकारिता पत्रकारिता हावी है, दुआ सर आप बड़ी शिद्दत से याद किए जाएंगे। एक शिष्य होने के नाते आपको भावभीनी श्रद्धांजलि‍।

(साभार: एनडीटीवी डॉट इन)

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टीवी पत्रकारिता का एक शानदार पन्ना आज अलग हो गया: रवीश कुमार

भारत की टेलीविज़न पत्रकारिता में सवाल पूछने की यात्रा की पहचान विनोद दुआ से बनती है। पूछने की पहचान के साथ उनकी पत्रकारिता जीवन भर जुड़ी रही।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 04 December, 2021
Last Modified:
Saturday, 04 December, 2021
VinodDua9545

रवीश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ।।

भारत की टेलीविज़न पत्रकारिता में सवाल पूछने की यात्रा की पहचान विनोद दुआ से बनती है। पूछने की पहचान के साथ उनकी पत्रकारिता जीवन भर जुड़ी रही। आज हमें बताते हुए अच्छा नहीं लग रहा कि हमने भारतीय टेलिविज़न की एक शानदार हस्ती को खो दिया। यह साल उनके लिए बहुत भारी रहा। कोरोना के कारण उन्होंने अपनी जीवनसाथी पदमावती चिन्ना दुआ को खो दिया, उस समय विनोद अस्पताल में ही भर्ती थे। उसके बाद भी उनकी सेहत पटरी पर नहीं लौट सकी और आज दिल्ली में उनका निधन हो गया। विनोद दुआ हमारे चैनल से भी जुड़े रहे हैं और यहां उन्होंने कई शानदार कार्यक्रम किए। 'ख़बरदार' और 'ज़ायका इंडिया' चंद नाम हैं। ‘गुडमार्निंग इंडिया’ की यादें हम सबके मन में आज भी ताज़ा हैं जब उस कार्यक्रम के ज़रिए हम जैसे लोग ‘एनडीटीवी’ में पत्रकारिता के बहुत से अनुशासनों को सीख रहे थे।

क्या बोलना और कैसे बोलना है, इसे लेकर विनोद दुआ के पास जो एकाधिकार था कोई उस स्तर तक नहीं पहुंच सका। भाषा उनके स्वभाव में आसानी से आती थी लेकिन इसके बाद भी वे एक एक शब्द के लिए काफी मेहनत करते थे। अपने शब्दों को काफी सम्मान देते थे और उनके उच्चारण की जगह ख़ास तरीके से तय करते थे। उनकी भाषा माध्यम के हिसाब से सटीक थी, संक्षिप्त थी और शालीन थी। उनकी भाषा में अंग्रेज़ी, पंजाबी, हिन्दी और उर्दू का बेहतरीन समावेश था। उनके पिता विभाजन के बाद पाकिस्तान के डेरा इस्माइल ख़ां से भारत आ गए थे। अपने पुरखों के शहर की पंजाबीयत और उसकी ठाठ तब खूब झलकती थी जब वे पठान सूट पहनते थे। कैमरे के सामने उनकी सहजता लाजवाब थी। टीवी का पत्रकार पत्रकारिता के पैमानों के साथ टीवी के माध्यम के प्रति उसकी समझ और उसके बर्ताव को लेकर भी जाना जाता है। माध्यम के लिहाज़ से विनोद दुआ हमेशा ही श्रेष्ठ प्रस्तोता बने रहे।

विनोद दुआ के काम को समझना है तो कैमरे के सामने उनके हाव-भाव को देखिए। ऐसा लगता था कि दर्शक और उनके बीच कोई कैमरा ही नहीं है। दोनों आमने सामने बैठे हैं। किसी बात को कह कर और वहीं छोड़ कर आगे बढ़ जाने का फ़न उन्हें बहुत आसानी से आता था। ज़ायका इंडिया सफल नहीं होता अगर वे खाना खाने, खाना बनाने और खाना खिलाने में माहिर न होते। इस कार्यक्रम में विनोद को चलते फिरते देख आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उन्हे अपने माध्यम की कितनी गहरी समझ है। सब कुछ नपा तुला बोलना और सही जगह पर बोलना। राजनीतिक पत्रकारिता में दखल रखने वाले विनोद दुआ।

मसालों और व्यंजनों पर राजनीतिक और सांस्कृति रूप से इस तरह से बात कर जाएंगे किसी को यकीन नहीं था। अपनी पत्नी के निधन के बाद भी लिखते रहे कि वे वापस लौटेंगे। रिपोर्टिंग करेंगे।

दूरदर्शन के लिए उनका कार्यक्रम 'जनवाणी' और 'परख' आज भी यादगार माना जाता है। उस कार्यक्रम ने टीवी पत्रकारिता के लिए कई लोगों को प्रशिक्षित किया जो भविष्य में जाकर इस माध्यम का चेहरा बने। आपके इस ऐंकर को भी विनोद दुआ के साथ काम करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इस माध्यम के बारे में उनसे काफी कुछ सीखा है और जाना है।

काम के बीच में उनका गुनगुना देना और किसी पुराने गाने को यूं याद कर लेना सबको सहज कर देता था कि सीनियर हैं मगर सहयोगी वाले सीनियर हैं। अपनी पत्नी चिन्ना के साथ उनका गाना और अच्छा गाना उनके दोस्त कभी नहीं भूल सकते हैं। हाल के दिनों तक वे तलत महमूद, बड़े गुलाम अली ख़ां, पंडित जसराज की गायकी पोस्ट करते रहे थे। डॉ. प्रणय रॉय और उनकी जोड़ी चुनावी नतीजों के दिन पूरे देश को जगा देती थी और जगाए रखती थी। दोनों ने लंबे समय तक एक दूसरे के साथ काम भी किया। दोनों ने अलग-अलग भी काम किया और एनडीटीवी में भी एक साथ लंबे अर्से तक काम किया। टीवी पत्रकारिता का एक शानदार पन्ना आज अलग हो गया है। वो अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन इस माध्यम में इस कदर हैं कि लगता ही नहीं कि आज नहीं हैं। हाल के दिनों में हिमाचल प्रदेश के भाजपा नेता ने उन पर राजद्रोह का मामला दायर कर दिया। उस मुकदमे का सामना भी विनोद ने उसी निर्भिकता से किया। सुप्रीम कोर्ट ने विनोद के पक्ष में फैसला दिया।

विनोद दुआ हों और कुछ बोल न रहे हों, कुछ सख्त न हो बोल रहे हों तो फिर वे विनोद दुआ नहीं हो सकते। उनकी चाल ढाल में निर्भिकता भरी रहती थी। विनोद दुआ नहीं हैं तो आज वो दिल्ली भी नहीं है जो उनके टीवी पर आने पर पूरे देश की हो जाती थी। पत्रकारिता तो अब वैसी रही नहीं लेकिन विनोद दुआ ता उम्र वैसे ही रहे जैसे थे। बहुत सारे किस्से थे और बहुत सारे किस्से उन्हें लेकर थे।

(साभार: एनडीटीवी डॉट इन)

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टीवी प्रजेंटेशन के ‘हेडमास्टर’ थे विनोद दुआ जी: सतीश के.सिंह

विनोद जी का जाना, जीवंत पत्रकारिता के लिए अपूरणीय क्षति है। भाषा, सौम्यता, अध्ययन और प्रस्तुति के लिहाज से उन्हें मैं बहुत बड़ा मानता रहा।

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Published - Saturday, 04 December, 2021
Last Modified:
Saturday, 04 December, 2021
satish K Singh

सतीश के सिंह, वरिष्ठ पत्रकार।।

विनोद जी का जाना, जीवंत पत्रकारिता के लिए अपूरणीय क्षति है। भाषा, सौम्यता, अध्ययन और प्रस्तुति के लिहाज से उन्हें मैं बहुत बड़ा मानता रहा। चुटीले अंदाज में, मुहावरों के जरिये और मुस्कुराते हुए गंभीर टिप्पणी कर देना, जैसे उनके डीएनए में था और बहुत ही स्वभाविक लगता था। अगर टीवी पत्रकारों ने या खास तौर से एंकर्स ने उनसे कुछ नहीं सीखा तो कुछ नहीं सीखा। दुआ सर टीवी प्रजेंटेशन के हेडमास्टर थे।

मैंने विनोद दुआ सर को सबसे पहले 1984 में ‘डीडी‘ पर चुनाव प्रसारण में नोटिस किया था। अंग्रेजी का अनुवाद और हिंदी में सूचना कितनी सहजता और सटीक देते थे, क्या कहना। एक शब्द भी फालतू नहीं। ये खूबी और कला किसी में मैंने आज तक नहीं पाई ।

दुआ सर मेरी नजर में इतने बड़े थे कि एक ही संस्थान के लिए काम करते हुए पहली बार तो मैं उन्हें दूर से ही निहारता था, शायद बात 1996 या 1997 की है। लेकिन, दिसंबर 1999 में कुछ ऐसा हुआ कि वह भी मुझे जानने लगे, जब मैं एक रिपोर्टर के रूप में इस इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC 814 के हाईजैक पर रिपोर्टिंग कर रहा था और वह मैराथन एंकरिंग।

विनोद सर दूर से ही सही, लेकिन मुझे जानते-पहचानते थे। अक्सर वह खुद ही मुझे बुलाकर बात करते थे। लेकिन, बस IC 814 प्रकरण तक सीमित रहा। दरअसल, मैं उनसे इतना प्रभावित था कि दुआ सर के नजदीक जाने की हिम्मत ही नहीं हुई, जबकि उनका स्वभाव, शिष्टाचार किसी से मिलने, मिलाने का था ।

दुआ सर के साथ दूसरी बार एक दूसरे चैनल में काम करते वक्त वर्ष 2005 में संपर्क हुआ। वह शाम के वक्त आते थे, टोकते जरूर थे और  मजाक, हंसी उनके निरंतर स्वभाव का हिस्सा थी। ये सिलसिला लगभग दो साल चला ।

मैं ऐसा दावा तो नहीं कर सकता कि मैं उनका नजदीकी था, मगर ये कह सकता हूं कि उनके हुनर, ज्ञान, वाकपटुता, प्रजेंटेशन और टिप्पणियों का कायल जरूर था। विनोद जी ने जिंदगी अपनी शर्तो पर जी, नहीं तो वह भी एक मीडिया एम्पायर के महामानव होते, दरअसल, वह एक पत्रकार और प्रजेंटर ही रह गए, न बंधे और न बांधा।

एक मौका ऐसा भी आया जब मैंने उनसे एक चैनल के लिए डेली शो करना चाहा, बात भी हो गई, लेकिन वह चालू नहीं हो पाया। मुझे लगता है कि धर्मपत्नी के निधन के बाद दुआ सर टूट गए थे। इतने जीवंत आदमी ने जीने की तमन्ना ही छोड़ दी थी ।

सच कहूं तो संतोष भारतीय जी के साथ एक इंटरव्यू को देखकर मुझे ऐसा प्रतीत हुआ था। काफी कमजोर लग रहे थे। आवाज भी फंसी और रुंधी हुई, लेकिन वाणी बिल्कुल विनोद दुआ सिग्नेचर। दुआ सर चले गए, लेकिन पत्रकारों, एंकर्स, डिबेट करने और इंटरव्यू देने वालों नेताओं के लिए आईना, पाठ्यक्रम और मिसाल बनकर। दुआ साहब की तैयारी पूरी रहती थी,शायद वह दूसरे से भी यही अपेक्षा रखते थे। दुआ सर, विनम्र श्रद्धांजलि, रेस्ट इन पीस चीफ।

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वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने बताया, कुछ ऐसे थे हमारे मित्र विनोद दुआ

विनोद दुआ नहीं रहे। चिन्ना भाभी के पास चले गए। जीवन में साथ रहा। अस्पताल में साथ रहा। तो पीछे अकेले क्यों रहें।  

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Published - Saturday, 04 December, 2021
Last Modified:
Saturday, 04 December, 2021
VinodDua5454

ओम थानवी, वरिष्ठ पत्रकार ।।

विनोद दुआ नहीं रहे। चिन्ना भाभी के पास चले गए। जीवन में साथ रहा। अस्पताल में साथ रहा। तो पीछे अकेले क्यों रहें।  उनका परिवार डेरा इस्माइल ख़ान से आया था। मैं उन्हें पंजाबी कहता तो फ़ौरन बात काट कर कहते थे- हम सरायकी हैं, जनाब। दिल्ली शरणार्थी बस्ती से टीवी पत्रकारिता की बुलंदी छूने का सफ़र अपने आप में एक दास्तान है।

दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई (जैसी करते थे, करते थे) के साथ रंगमंच का तजुर्बा हासिल करते हुए टीवी की दुनिया में चले आए। कीर्ति जैन ने उनकी प्रतिभा को पहचाना, यह बात उन्हें हमेशा याद रही। दूरदर्शन सरकारी था। काला-सफ़ेद था। उन्होंने उसमें पेशेवराना रंग भर दिया। उनके मुंहफट अंदाज़ ने किसी दिग्गज को नहीं बख़्शा। जनवाणी केंद्रीय मंत्रिमंडल के रिपोर्ट-कार्ड सा बन गया, जिसे प्रधानमंत्री राजीव गांधी तक देखते थे।

कम लोगों को मालूम होगा कि विनोद कभी कार्यक्रम की स्क्रिप्ट नहीं तैयार करते थे। न प्रॉम्प्टर पर पढ़ते थे। बेधड़क, सीधे। दो टूक, बिंदास। कभी-कभी कड़ुए हो जाते। पर अमूमन मस्त अन्दाज़ में रहते। परख के लिए आतंकवाद के दिनों में पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह से बात की। उन्हें कुछ गाकर सुनाने को कहा। ना-ना-ना करते गवा ही बैठे।

विनोदजी का हिंदी और अंग्रेजी पर लगभग समान अधिकार था। प्रणय रॉय के साथ चुनाव चर्चा की रंगत ही और थी। बाद में विनोदजी ने अपनी कंपनी बनाई। उससे ‘परख’, ‘अख़बारों की राय’ जैसे अनेक कार्यक्रम बनाए। पर रहे उनके गिर्द ही।

फिर वे अपने पुराने मित्र के चैनल 'एनडीटीवी इंडिया' से आ जुड़े। चैनल की वे शान बने। राजनेताओं से उलझना उनकी फ़ितरत में था। चाहे किसी भी पार्टी के हों। चैनल ने बाद में उन्हें ‘ज़ायक़ा इंडिया का’ जैसा कार्यक्रम दे दिया। उन्हें खाने-पीने का शौक़ था। कार्यक्रम के लिए देश में घूमा किए। चाव से। हम देश के लिए खाते हैं, उनका लोकप्रिय जुमला बना।

पर दिल से वे राजनीति के क़रीब थे। उन्होंने ज़ायक़ा बदल लिया। नेटवर्क-18 का एक कार्यक्रम पकड़ा। मुझे मालूम था वहां निभेगी नहीं। सहारा से सुबह के अख़बारों वाले कार्यक्रम प्रतिदिन से काफ़ी पैसा मिलता था। किसी बात पर सहाराश्री से खटपट हुई। मेरे सामने (आईआईसी के बगीचे से) लखनऊ फ़ोन किया और गाली से बात की। क़िस्सा ख़त्म।

मगर सिद्धार्थ वरदराजन के साथ ‘द वायर’ में उनकी ख़ूब निभी। ‘जन की बात’ जबर हिट हुआ। मोदी सरकार पर इतना तीखा नियमित कार्यक्रम दूसरा नहीं था। पर मी-टू में वे एक आरोप मात्र से घिर गए। वायर ने नैतिकता के तक़ाज़े पर उनसे तोड़ ली। जो असरदार सिलसिला चला था, थम गया। बाद में सिद्धार्थ इससे त्रस्त लगे और विनोद भी। इसके बाद भी विनोद सक्रिय रहे। पर पहले अदालती संघर्ष, जिसमें वे जीते और फिर कोरोना से लड़ाई उससे भी वे निकल आए। लेकिन, जैसा कि कहते हैं, होनी को कुछ और मंज़ूर था।

मेरे क़रीबी मित्र थे। कितनी शामें आईआईसी में बिताईं। बेटे मिहिर के विवाह में जयपुर आए। चिन्ना भाभी के साथ गीत भी गाए। कुरजां की खोज में हमारे गांव फलोदी जा पहुंचे।

उनकी याद में आंखें नम हैं। कुछ लिखने का इरादा नहीं था। पर मृत्यु की ख़बर जान जयपुर के कॉफ़ी हाउस में बैठे कुछ इबारत अपने आप उतर आई।

(साभार: फेसबुक वाल से)

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हिंदी को व्यावसायिक बनाती इलेक्ट्रॉनिक मीडिया

एक धारणा के मुताबिक अंग्रेजी को ही व्यवसाय की भाषा कहा जाता है। वैश्वीकरण के दौर में जहां बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने व्यवसाय को विस्तार दिया है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 03 December, 2021
Last Modified:
Friday, 03 December, 2021
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आलोक राजा

एक धारणा के मुताबिक अंग्रेजी को ही व्यवसाय की भाषा कहा जाता है। वैश्वीकरण के दौर में जहां बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने व्यवसाय को विस्तार दिया है, वहीं अंग्रेजी की महत्वता को और अधिक बल मिला है। परन्तु हमारे देश की अर्थव्यवस्था में एंटरटेनमेंट और मीडिया ने हिंदी को नई दिशा देकर व्यापारिक बनाने में खासी भूमिका अदा की है। हिंदी को किताबी साहित्य से बाहर निकालकर उसे बाजार की भाषा बनाने में अगर सबसे बड़ा योगदान किसी का है तो वह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का है।

यह सवाल हिंदी साहित्यकारों एवं लेखकों के बीच में काफी चर्चित रहता है कि क्यों हिंदी के पाठकों में बढ़ोत्तरी अंग्रेजी के पाठकों की तरह नहीं होती है? लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जहां एक तरफ हिंदी भाषा को सरल, सहज एवं आम-जन की भाषा बनाकर परोसा है, वहीँ दूसरी तरफ लोगों को हिंदी पत्रकारिता की तरफ आकर्षित किया है। ऐसे में हिंदी की दुनिया को दुनिया के सामने बेहतर तरीके से प्रस्तुत करने में भी मदद मिली है। हिंदी धारावाहिक, हिंदी फिल्मों और हिंदी की किताबों को चर्चित करने के लिए भी आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मार्केटिंग इफैक्ट को हम इस तरह समझ सकते हैं कि बॉलीवुड की फिल्में भी बड़े पर्दे पर उतरने से पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से प्रमोशन करती हैं।

विदित है कि कोई भाषा केवल उसी स्थिति में विस्तार प्राप्त कर पाती है जब उसे व्यावसायिक बनाया जा सके और जब उस भाषा में रोजगार की संभावनाएं पैदा हो सकें। अगर किसी भाषा में आर्थिक गतिविधि कर पाना संभव न हो तो ऐसी भाषा सिर्फ एक संकुल तक सिमट कर ही रह जाती है और सिर्फ भावनाओं के सम्प्रेषण तक ही उसे सीमित रह जाना पड़ता है। आज जब हम संस्कृत भाषा की बात करते हैं तो भले ही संस्कृत को संस्कृति की भाषा कहा जाता हो लेकिन व्यवसायीकरण के दौर में संस्कृत आमजन की भाषा नहीं बन पायी है जिसका बहुत बड़ा कारण इसका व्यावसायिक न हो पाना है।

वहीँ अंग्रेजी, फ्रेंच और जर्मन जैसी भाषाओँ को विश्व में खासी अहमियत मिली है क्योंकि ये भाषाएं आर्थिक रूप से संपन्न देशों की भाषाएं हैं। लेकिन हिंदी को व्यवसाय की भाषा बना पाना संभव है। जिस तरह आज मीडिया में हिंदी का प्रयोग किया जाता है और उसे चमक दमक वाली भाषा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है उससे वह बाजार की भाषा बनने में काफी हद तक सफल हुई है। हिंदी के साहित्यकार ऐसा मानते हों कि आधुनिक हिंदी को बाजार ने तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया है। इस तथ्य में भले ही सच्चाई हो, लेकिन हमें यह समझना पड़ेगा कि बहु-भाषीय देश भारत में किसी भी क्लिष्ट भाषा को बाजार की भाषा नहीं बनाया जा सकता है। बाजार की भाषा बनाने के लिए भाषा का सहज, सरल और आम होना बेहद जरूरी होता है और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने हिंदी को आम व सरल रूप में प्रस्तुत किया है।

इसी का ही परिणाम है की आज बड़े अंग्रेजी के चैनल भी अपने दर्शकों की संख्या बढ़ाने के लिए हिंदी में उतर रहे हैं। यहां तक कि हॉलीवुड की फिल्मों को हिंदी में डब किया जाने लगा है। हमारे देश में हिंदी को विस्तार इस कदर मिल चुका है कि राजनीति की भाषा के रूप में हिंदी अब पूरी तरह स्थापित हो चुकी है। अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी हिंदी के पत्रकारों को रेमैन मेग्सेसे अवॉर्ड भी मिलने लगे हैं। यानि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के इस योगदान को सराहा जाना चाहिए की इसने हिंदी के व्यावसायिक रूप को गढ़ने में अपनी बड़ी भूमिका निभाई है।

(लेखक, ‘भारत समाचार’ न्यूज चैनल में सीनियर एंकर के तौर पर कार्यरत हैं और यह उनके निजी विचार हैं)

 

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