रवीश कुमार बोले- मुझे पता है गुलाम की तरह काम करने वाले लोग भाजपा के समर्थक हैं

वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने मतगणना के दिन वॉट्सऐप पर मिले तीन तरह के मैसेज का किया जिक्र

Last Modified:
Friday, 24 May, 2019
Ravish Kumar

रवीश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार।।

क्या 2019 के चुनाव में मैं भी हार गया हूं?

23 मई 2019 के दिन जब नतीजे आ रहे थे, मेरे वॉट्सऐप पर तीन तरह के मैसेज आ रहे थे। अभी दो तरह के मैसेज की बात करूंगा और आख़िर में तीसरे प्रकार के मैसेज की। बहुत सारे मैसेज ऐसे थे कि आज देखते हैं कि रवीश कुमार की सूजी है या नहीं। उसका चेहरा मुरझाया है या नहीं। एक ने लिखा कि वह रवीश कुमार को ज़लील होते देखना चाहता है। डूबकर मर जाना देखना चाहता है। पंचर बनाते हुए देखना चाहता है। किसी ने पूछा कि बर्नोल की ट्यूब है या भिजवा दें। किसी ने भेजा कि अपनी शक्ल की फोटो भेज दो, ज़रा हम देखना चाहते हैं।

मैंने सभी को जीत की शुभकामनाएं दीं और लाइव कवरेज़ के दौरान इस तरह के मैसेज का ज़िक्र किया और ख़ुद पर हंसा। दूसरे प्रकार के मैसेज में यह लिखा था कि आज से आप नौकरी की समस्या, किसानों की पीड़ा और पानी की तकलीफ दिखाना बंद कर दीजिए। यह जनता इसी लायक है। बोलना बंद कर दो। क्या आपको नहीं लगता है कि आप भी रिजेक्ट हो गए हैं। आपको विचार करना चाहिए कि क्यों आपकी पत्रकारिता मोदी को नहीं हरा सकी। मैं मुग़ालता नहीं पालता। इस पर भी लिख चुका हूं कि बकरी पाल लें, मगर मुग़ालता न पालें।

2019 का जनादेश मेरे ख़िलाफ कैसे आ गया? मैंने जो पांच साल में लिखा-बोला है, क्या वह भी दांव पर लगा था? जिन लाखों लोगों की पीड़ा हमने दिखाई, क्या वह ग़लत थी? मुझे पता था कि नौजवान, किसान और बैंकों में गुलाम की तरह काम करने वाले लोग भाजपा के समर्थक हैं। उन्होंने भी मुझसे कभी झूठ नहीं बोला। सबने पहले या बाद में यही बोला कि वे नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं। मैंने इस आधार पर उनकी समस्या को खारिज नहीं किया कि वे नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं। उनकी समस्या वास्तविक थी, इसलिए दिखाई। आज एक सांसद नहीं कह सकता कि उसने पचास हज़ार से अधिक लोगों को नियुक्ति पत्र दिलवाया है। मेरी नौकरी सीरीज़ के कारण दिल्ली से लेकर बिहार तक में लोगों को नियुक्ति पत्र मिला है। कई परीक्षाओं के रिज़ल्ट निकले। उनमें से बहुतों ने नियुक्ति पत्र मिलने पर माफी मांगी कि वे मुझे गालियां देते थे। मेरे पास सैकड़ों पत्र और मैसेज के स्क्रीन शॉट पड़े हैं, जिनमें लोगों ने नियुक्ति पत्र मिलने के बाद गाली देने के लिए माफी मांगी है। इनमें से एक भी यह प्रमाण नहीं दे सकता कि मैंने कभी कहा हो कि नरेंद्र मोदी को वोट नहीं देना। यह ज़रूर कहा कि वोट अपने मन से दें, वोट देने के बाद नागरिक बन जाना।

पचास हज़ार से अधिक नियुक्ति पत्र की कामयाबी वो कामयाबी है, जो मैं मोदी समर्थकों के द्वारा ज़लील किए जाने के क्षण में भी सीने पर बैज की तरह लगाए रखूंगा। क्योंकि वे मुझे नहीं उन मोदी समर्थकों को ही ज़लील करेंगे, जिन्होंने मुझसे अपनी समस्या के लिए संपर्क किया था। नौकरी सीरीज़ का ही दबाव था कि नरेंद्र मोदी जैसी प्रचंड बहुमत वाली सरकार को रेलवे में लाखों नौकरियां निकालनी पड़ीं। इसे मुद्दा बनवा दिया। वर्ना आप देख लें कि पूरे पांच साल में रेलवे में कितनी वैकेंसी आईं और आखिरी साल में कितनी वैकैंसी आई। क्या इसकी मांग गोदी मीडिया कर रहा था या रवीश कुमार कर रहा था? प्राइम टाइम में मैंने दिखाया। क्या रेल सीरीज़ के तहत स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस जैसी ट्रेन को कुछ समयों के लिए समय पर चलवा देना मोदी का विरोध था? क्या बिहार के कालेजों में तीन साल के बीए में पांच-पांच साल से फंसे नौजवानों की बात करना मोदी विरोध था?

इन पांच सालों में मुझे करोड़ों लोगों ने पढ़ा। हज़ारों की संख्या में आकर सुना। टीवी पर देखा। बाहर मिला तो गले लगाया। प्यार दिया। उसमें नरेंद्र मोदी के समर्थक भी थे। संघ के लोग भी थे और विपक्ष के भी। बीजेपी के लोग भी थे, मगर वे चुपचाप बधाई देते थे। मैंने एक चीज़ समझी। मोदी का समर्थक हो या विरोधी, वह गोदी मीडिया और पत्रकारिता में फर्क करता है। चूंकि गोदी मीडिया के एंकर मोदी की लोकप्रियता की आड़ में मुझ पर हमला करते हैं, इसलिए मोदी का समर्थक चुप हो जाता है। भारत जैसे देश में ईमानदार और नैतिक होने का सामाजिक और संस्थागत ढांचा नहीं है। यहां ईमानदार होने की लड़ाई अकेले की है और हारने की होती है। लोग तंज करते हैं कि कहां गए सत्यवादी रवीश कुमार। कहां गए पत्रकारिता की बात करने वाले रवीश कुमार। मुझमें कमियां हैं। मैं आदर्श नहीं हूं। कभी दावा नहीं किया, लेकिन जब आप यह कहते हैं आप उसी पत्रकारिता के मोल को दोहरा रहे होते हैं, जिसकी बात मैं कहता हूं या मेरे जैसे कई पत्रकार कहते हैं।

मुझे पता था कि मैं अपने पेशे में हारने की लड़ाई लड़ रहा हूं। इतनी बड़ी सत्ता और कारपोरेट की पूंजी से लड़ने की ताकत सिर्फ गांधी में थी। लेकिन जब लगा कि मेरे जैसे कई पत्रकार स्वतंत्र रूप से कम आमदनी पर पत्रकारिता करने की कोशिश कर रहे हैं तब लगा कि मुझे कुछ ज़्यादा करना चाहिए। मैंने हिंदी के पाठकों के लिए रोज़ सुबह अंग्रेज़ी से अनुवाद कर मोदी विरोध के लिए नहीं लिखा था, बल्कि इस खुशफहमी में लिखा कि हिंदी का पाठक सक्षम हो। इसमें घंटों लगा दिए। मुझे ठीक ठीक पता था कि मैं यह लंबे समय तक अकेले नहीं कर सकता। मोदी विरोध की सनक नहीं थी। अपने पेशे से कुछ ज्यादा प्रेम था, इसलिए दांव पर लगा दिया। अपने पेश पर सवाल खड़े करने का एक जोखिम था, अपने लिए रोज़गार के अवसर गंवा देना। फिर भी जीवन में कुछ समय के लिए करके देख लिया। इसका अपना तनाव होता है, जोखिम होता है मगर जो सीखता है वह दुर्लभ है। बटुआ वाले सवाल पूछकर मैं मोदी समर्थकों के बीच तो छुप सकता हूं लेकिन आप पाठकों के सामने नहीं आ सकता।

मैंने ज़रूर सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ सबके बीच आकर बोला। आज भी बोलूंगा। आपके भीतर धार्मिक और जातीय पूर्वाग्रह बैठ गया है। आप मशीन बनते जा रहे हैं। मैं फिर से कहता हूं कि धार्मिक और जातीय पूर्वाग्रह से लैस सांप्रदायिकता आपको एक दिन मानव बम में बदल देगी। स्टूडियो में नाचते एंकरों को देख आपको भी लगता होगा कि यह पत्रकारिता नहीं है। बैंकों में ग़ुलाम की तरह काम करने वाली सैंकड़ों महिला अफसरों ने अपने गर्भ गिर जाने से लेकर शौचालय का भय दिखाकर काम कराने का पत्र क्या मुझसे मोदी का विरोध कराने के लिए लिखा था? उनके पत्र आज भी मेरे पास पड़े हैं। मैंने उनकी समस्या को आवाज़ दी और कई बैंक शाखाओं में महिलाओं के लिए अलग से शौचलय बने। मैंने मोदी का एजेंडा नहीं चलाया। वो मेरा काम नहीं था। अगर आप मुझसे यही उम्मीद करते हैं तब भी यही कहूंगा कि एक बार नहीं सौ बार सोच लीजिए।

ज़रूर पत्रकारिता में भी ‘अतीत के गुनाहों की स्मृतियां’ हैं, जिन्हें मोदी वक्त-बेवक्त ज़िंदा करते रहते हैं, लेकिन वह भूल जा रहे हैं कि उनके समय की पत्रकारिता का मॉडल अतीत के गुनाहों पर ही आधारित है। मैं नहीं मानता कि पत्रकारिता हारी है। पत्रकारिता ख़त्म हो जाएगी, वह अलग बात है। जब पत्रकारिता ही नहीं बची है तो फिर आप पत्रकारिता के लिए मेरी ही तरफ क्यों देख रहे हैं। क्या आपने संपूर्ण समाप्ति का संकल्प लिया है। जब मैं अपनी बात करता हूं तो उसमें वे सारे पत्रकारों की भी बातें हैं, जो संघर्ष कर रहे हैं। ज़रूर पत्रकारिता संस्थानों में संचित अनैतिक बलों के कारण पत्रकारिता समाप्त हो चुकी है। उसका बचाव एक व्यक्ति नहीं कर सकता है। ऐसे में हम जैसे लोग ही क्या कर लेंगे। फिर भी ऐसे काम को सिर्फ मोदी विरोध के चश्मे से देखा जाना ठीक नहीं होगा। यह अपने पेशे के भीतर आई गिरावट का विरोध ज्यादा है। यह बात मोदी समर्थकों को इस दौर में समझनी होगी। मोदी का समर्थन अलग है। अच्छी पत्रकारिता का समर्थन अलग है। मोदी समर्थकों से भी अपील करूगा कि आप गोदी मीडिया का चैनल देखना बंद कर दें। अख़बार पढ़ना बंद कर दें। इसके बग़ैर भी मोदी का समर्थन करना मुमकिन है।

बहरहाल, 23 मई 2019 को आई आंधी गुज़र चुकी है, लेकिन हवा अभी भी तेज़ चल रही है। नरेंद्र मोदी ने भारत की जनता के दिलो-दिमाग़ पर एकछत्र राज कायम कर लिया है। 2014 में उन्हें मन से वोट मिला था, 2019 में तन और मन से वोट मिला है। तन पर आई तमाम तक़लीफों को झेलते हुए लोगों ने मन से वोट किया है। उनकी इस जीत को उदारता के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए। मैं भी करता हूं। जन को ठुकरा कर आप लोकतांत्रिक नहीं हो सकते हैं। उस ख़ुशी में भविष्य के ख़तरे देखे जा सकते हैं लेकिन उसे देखने के लिए भी आपको शामिल होना होगा। यह समझने के लिए भी शामिल होना चाहिए कि आख़िर वह क्या बात है जो लोगों को मोदी बनाती है। लोगों को मोदी बनाने का मतलब है अपने नेता में एकाकार हो जाना। एक तरह से विलीन हो जाना। यह अंधभक्ति कही जा सकती है, मगर इसे भक्ति की श्रेष्ठ अवस्था के रूप में भी देखा जाना चाहिए। मोदी के लिए लोगों का मोदी बन जाना उस श्रेष्ठ अवस्था का प्रतीक है। घर-घर मोदी की जगह आप जन-जन मोदी कह सकते हैं।

मैं हमेशा से कहता रहा हूं कि 2014 के बाद से इस देश के अतीत और भविष्य को समझने का संदर्भ बिन्दु( रेफरेंस प्वाइंट) बदल गया है। चुनाव से पहले ही प्रधानमंत्री मोदी नए भारत की बात करने लगे थे। वह नया भारत उनकी सोच का भारत बन गया है। हर जनादेश में संभावनाएं और आशंकाएं होती हैं। इससे मुक्त कोई जनादेश नहीं होता है। जनता ने तमाम आशंकाओं के बीच अगर एक संभावना को चुना है तो इसका मतलब है कि उसमें उन आशंकाओं से निपटने का पर्याप्त साहस भी है। वह भयभीत नहीं है। न तो यह भय का जनादेश है और न ही इस जनादेश से भयभीत होना चाहिए। ऐतिहासिक कारणों से जनता के बीच कई संदर्भ बिंदु पनप रहे थे। दशकों तक उसने इसे अपने असंतोष के रूप में देखा। बहुत बाद में वह अपने इस अदल-बदल के असंतोष से उकता गई। उसने उस विचार को थाम लिया, जहां अतीत की अनैतिकताओं पर सवाल पड़े हुए थे। जनता ‘अतीत के असंतोषों की स्मृतियों’ से उबर नहीं पाई है। इस बार असंतोष की उस स्मृति को विचारधारा के नाम पर प्रकट कर आई है, जिसे नया भारत कहा जा रहा है।

मैंने हमेशा कहा है कि नरेंद्र मोदी का विकल्प वही बनेगा, जिसमें नैतिक शक्ति होगी। आप मेरे लेखों में नैतिक बल की बात देखेंगे। बेशक नरेंद्र मोदी के पक्ष में अनैतिक शक्तियों और संसाधनों का विपुल भंडार है, मगर जनता उसे ‘अतीत के असंतोष की स्मृतियों’ के गुण-दोष की तरह देखती है। बर्दाश्त कर लेती है। नरेंद्र मोदी उस ‘अतीत के असंतोष की स्मृतियों’ को ज़िंदा भी रखते हैं। आप देखेंगे कि वह हर पल इसे रेखांकित करते रहते हैं। जनता को ‘अतीत के वर्तमान’ में रखते हैं। जनता को पता है कि विपक्ष में भी वही अनैतिक शक्तियां हैं जो मोदी पक्ष में हैं। विपक्ष को लगा कि जनता दो समान अनैतिक शक्तियों में से उसे भी चुन लेगी। इसलिए उसने बची-खुची अनैतिक शक्तियों का ही सहारा लिया। नरेंद्र मोदी ने उन अनैतिक शक्तियों को भी कमज़ोर और खोखला भी कर दिया। विपक्ष के नेता बीजेपी की तरफ भागने लगे। विपक्ष मानव और आर्थिक संसाधन से ख़ाली होने लगा। दोनों का आधार अनैतिक शक्तियां ही थीं, लेकिन इसी परिस्थिति ने विपक्ष के लिए नया अवसर उपलब्ध कराया। उसे चुनाव की चिंता छोड़ अपने राजनीतिक और वैचारिक पुनर्जीवन को प्राप्त करना था, उसने नहीं किया।

विपक्ष को अतीत के असंतोष के कारणों के लिए माफी मांगनी चाहिए थी। नया भरोसा देना था कि अब से ऐसा नहीं होगा। इस बात को ले जाने के लिए तेज़ धूप में पैदल चलना था। उसने यह भी नहीं किया। 2014 के बाद चार साल तक घर बैठे रहे। जनता के बीच नहीं गए। उसकी समस्याओं पर तदर्थ रूप से बोले और घर आकर बैठ गए। 2019 आया तो बची-खुची अनैतिक शक्तियों के समीकरण से वह एक विशालकाय अनैतिक शक्तिपुंज से टकराने की ख्वाहिश पाल बैठा। विपक्ष को समझना था कि अलग-अलग दलों की राजनीतिक प्रासंगिकता समाप्त हो चुकी है। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी या राष्ट्रीय जनता दल के ज़रिये लोकतंत्र में जो सामाजिक संतुलन आया था उसकी आज कोई भूमिका नहीं रही।

बेशक इन दलों ने समाज के पिछड़े और वंचित तबकों को सत्ता-चक्र घुमाकर शीर्ष पर लाने का ऐतिहासिक काम किया, लेकिन इसी क्रम में वे दूसरे पिछड़े और वंचितों को भूल गए। इन दलों में उनका प्रतिनिधित्व उसी तरह बेमानी हो गया जिस तरह अन्य दलों में होता है। अब इन दलों की प्रासंगिकता नहीं बची है तो दलों को भंग करने का साहस भी होना चाहिए। अपनी पुरानी महत्वकांक्षाओं को भंग कर देना था। भारत की जनता अब नए विचार और नए दल का स्वागत करेगी तब तक वह नरेंद्र मोदी के विचार पर चलेगी।

समाज और राजनीति का हिंदूकरण हो गया है। यह स्थायी रूप से हुआ है, मैं नहीं मानता। उसी तरह जैसे बहुजन शक्तियों का उभार स्थायी नहीं था, इसी तरह से यह भी नहीं है। यह इतिहास का एक चक्र है, जो घूमा है। जैसे मायावती सवर्णों के समर्थन से मुख्यमंत्री बनी थी, उसी तरह आज संघ बहुजन के समर्थन से हिंदू राष्ट्र बना रहा है। जो सवर्ण थे वो अपनी जाति की पूंजी लेकर कभी सपा-बसपा और राजद के मंचों पर अपना सहारा ढूंढ रहे थे। जब वहां उनकी वहां पूछ बढ़ी तो बाकी बचा बहुजन सर्वजन के बनाए मंच पर चला गया।

बहुजन राजनीति ने कब जाति के ख़िलाफ़ राजनीतिक अभियान चलाया। जातियों के संयोजन की राजनीति थी तो संघ ने भी जातियों के संयोजन की राजनीति खड़ी कर दी। बेशक क्षेत्रिय दलों ने बाद में विकास की भी राजनीति की और कुछ काम भी किया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर के लिए अपनी भूमिका को हाईवे बनाने तक सीमित कर गए। चंद्रभान प्रसाद की एक बात याद आती है। वह कहते थे कि मायावती क्यों नहीं आर्थिक मुद्दों पर बोलती हैं, क्यों नहीं विदेश नीति पर बोलती हैं। यही हाल सारे क्षेत्रीय दलों का है। वह प्रदेश की राजनीति तो कर लेते हैं मगर देश की राजनीति नहीं कर पाते हैं।

बहुजन के रूप में उभरकर आए दल अपनी विचारधारा की किताब कब का फेंक चुके हैं। उनके पास अंबेडकर जैसे सबसे तार्किक व्यक्ति हैं लेकिन अंबेडकर अब प्रतीक और अहंकार का कारण बन गए हैं। छोटे-छोटे गुट चलाने का कारण बन गए हैं। हमारे मित्र राकेश पासवान ठीक कहते हैं कि दलित राजनीति के नाम पर अब संगठनों के राष्ट्रीय अध्यक्ष ही मिलते हैं, राजनीति नहीं मिलती है। बहुजन राजनीति एक दुकान बन गई है जैसे गांधीवाद एक दुकान है। इसमें विचारधारा से लैस व्यक्ति आज तक राष्ट्रीय स्तर पर एक राजनैतिक विकल्प नहीं बना पाया। वह दल नहीं बनाता है। अपने हितों के लिए संगठन बनाता है। अपनी जाति की दुकान लेकर एक दल से दूसरे दल में आवागमन करता है। उसके भीतर भी अहंकार आ गया। वह बसपा या बहुजन दलों की कमियों पर चुप रहने लगा।

वह अहंकार ही था कि मेरे जैसों के लिखे को भी जाति के आधार पर खारिज किया जाने लगा। मैं अपनी प्रतिबद्धता से नहीं हिला, लेकिन प्रतिबद्धता की दुकान चलाने वाले अंबेडकर के नाम का इस्तेमाल हथियार की तरह करने लगे। वे लोगों को आदेश देने लगे कि किसे क्या लिखना चाहिए। जिस तरह भाजपा के समर्थक राष्ट्रवाद का सर्टिफिकेट बांटते हैं, उसी तरह अंबेडकरवादियों में भी कुछ लोग सर्टिफिकेट बांटने लगे हैं। हमें समझ लेना चाहिए कि बहुजन पक्ष में कोई कांशीराम नहीं है। कांशीराम की प्रतिबद्धता का मुकाबला नहीं है। वह वैचारिक प्रतिबद्धता थी। अब हमारे पास प्रकाश आंबेडकर हैं जो अंबेडकर के नाम पर छोटे मकसद की राजनीति करते हैं। यही हाल लोहिया का भी हुआ है। जो अंबेडकर को लेकर प्रतिबद्ध हैं उनकी भी हालत गांधी को लेकर प्रतिबद्ध रहने वाले गाधीवादियों की तरह है। दोनों हाशिये पर जीने के लिए अभिशप्त हैं। विकल्प गठजोड़ नहीं है। विकल्प विलय है। पुनर्जीवन है। अगले चुनाव के लिए नहीं है। भारत के वैकल्पिक भविष्य के लिए है।

आपने देखा होगा कि इन पांच सालों में मैंने इन दलों पर बहुत कम नहीं लिखा। लेफ्ट को लेकर बिल्कुल ही नहीं लिखा। मैं मानता हूं कि वाम दलों की विचारधारा आज भी प्रासंगिक हैं मगर उनके दल और उन दलों में अपना समय व्यतीत कर रहा राजनीतिक मानवसंसाधन प्रासंगिक नहीं हैं। उसकी भूमिका समाप्त हो चुकी है। वह सड़ रहा है। उनके पास सिर्फ कार्यालय बचे हैं। काम करने के लिए कुछ नहीं बचा है। वाम दलों के लोग शिकायत करते रहते थे कि आपके कार्यक्रम में लेफ्ट नहीं होता है। क्योंकि दल के रूप में उसकी भूमिका समाप्त हो चुकी थी। बेशक महाराष्ट्र में किसान आंदोलन खड़ा करने का काम बीजू कृष्णन जैसे लोगों ने किया। यह उस विचारधारा की उपयोगिता थी। न कि दल की। दल को भंग करने का समय आ गया है। नया सोचने का समय आ गया है। मैं दलों की विविधता का समर्थक हूं, लेकिन उपयोगिता के बग़ैर वह विविधता किसी काम की नहीं होगी। यह सारी बातें कांग्रेस पर भी लागू होती है। भाजपा के कार्यकर्ताओं में आपको भाजपा दिखती है। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में आपको कांग्रेस छोड़ सबकुछ दिखता है। कांग्रेस चुनाव लड़ना छोड़ दे या चुनाव को जीवन-मरण के प्रश्न की तरह न लड़े। वह कांग्रेस बने।

कांग्रेस नेहरू का बचाव नहीं कर सकी। वह पटेल से लेकर बोस तक का बचाव नहीं कर सकी। आज़ादी की लड़ाई की विविधता और खूबसूरती से जुड़ी ‘अतीत की स्मृतियों’ को ज़िंदा नहीं कर पाई। गांधी के विचारों को खड़ा नहीं कर पाई। आज आप भाजपा के एक सामान्य कार्यकर्ता से दीनदयाल उपाध्याय के बारे में ग़लत टिप्पणी कर दीजिए वह अपनी तरह से सौ बातें बताएंगे, पांच साल में कांग्रेस पार्टी नेहरू को लेकर समानांतर विमर्श पैदा नहीं कर पाई, मैं इसी एक पैमाने से कांग्रेस को ढहते हुए देख रहा था। राजनीति विचारधारा की ज़मीन पर खड़ी होती है, नेता की संभावना पर नहीं। एक ही रास्ता बचा है। भारत के अलग अलग राजनीतिक दलों में बचे मानव संसाधान को अपना अपना दल छोड़ कर किसी एक दल में आना चाहिए। जहां विचारों का पुनर्जन्म हो, नैतिक बल का सृजन हो और मानव संसाधन का हस्तांतरण। यह बात 2014 में भी लोगों से कहा था। फिर खुद पर हंसी आई कि मैं कौन सा विचारक हूं जो यह सब कह रहा हूं। आज लिख रहा हूं।

इसके बाद भी विपक्ष को लेकर सहानुभूति क्यों रही। हालांकि उनके राजनीतिक पक्ष को कम ही दिखाया और उस पर लिखा बोला क्योंकि 2014 के बाद हर स्तर पर नरेंद्र मोदी ही प्रमुख हो गए थे। सिर्फ सरकार के स्तर पर ही नहीं, सांस्कृतिक से लेकर धार्मिक स्तर पर मोदी के अलावा कुछ दिखा नहीं और कुछ था भी नहीं। जब भारत का 99 प्रतिशत मीडिया लोकतंत्र की मूल भावना को कुचलने लगा तब मैंने उसमें एक संतुलन पैदा करने की कोशिश की। असहमति और विपक्ष की हर आवाज़ का सम्मान किया। उसका मज़ाक नहीं उड़ाया। यह मैं विपक्षी दलों के लिए नहीं कर रहा था बल्कि अपनी समझ से भारत के लोकतंत्र को शर्मिंदा होने से बचा रहा था। मुझे इतना बड़ा लोड नहीं लेना चाहिए था क्योंकि यह मेरा लोड नहीं था फिर भी लगा कि हर नागरिक के भीतर और लोकतंत्र के भीतर विपक्ष नहीं होगा तो सबकुछ खोखला हो जाएगा। मेरी इस सोच में भारत की भलाई की नीयत थी।

नरेंद्र मोदी की प्रचंड जीत हुई है। मीडिया की जीत नहीं हुई है। हर जीत में एक हार होती है। इस जीत में मीडिया की हार हुई है। उसने लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन नहीं किया। आज गोदी मीडिया के लोग मोदी को मिली जीत के सहारे ख़ुद की जीत बता रहे हैं। दरअसल उनके पास सिर्फ मोदी बचे हैं। पत्रकारिता नहीं बची है। पत्रकारिता का धर्म समाप्त हो चुका है। मुमकिन है भारत की जनता ने पत्रकारिता को भी खारिज कर दिया हो। उसने यह भी जनादेश दिया हो कि हमें मोदी चाहिए, पत्रकारिता नहीं। इसके बाद भी मेरा यकीन उन्हीं मोदी समर्थकों पर है। वे मोदी और मीडिया की भूमिका में फर्क देखते हैं। समझते हैं। शायद उन्हें भी ऐसा भारत नहीं चाहिए, जहां जनता का प्रतिनिधि पत्रकार अपने पेशेवर धर्म को छोड़ नेता के चरणों में बिछा नज़र आए। मुझे अच्छा लगा कि कई मोदी समर्थकों ने लिखा कि हम आपसे असहमत हैं, मगर आपकी पत्रकारिता के कायल हैं। आप अपना काम उसी तरह से करते रहिएगा। ऐसे सभी समर्थकों का मुझ में यकीन करने के लिए आभार। मेरे कई सहयोगी जब चुनावी कवरेज के दौरान अलग-अलग इलाकों में गए तो यही कहा कि मोदी फैन भी तुम्हीं को पढ़ते और लिखते हैं। संघ के लोग भी एक बार चेक करते हैं कि मैंने क्या बोला। मुझे पता है कि रवीश नहीं रहेगा तो वे रवीश को मिस करेंगे।

दो साल पहले दिल्ली में रहने वाले अस्सी साल के एक बुज़ुर्ग ने मुझे छोटी सी गीता भेजी। लंबा सा पत्र लिखा और मेरे लिए लंबे जीवन की कामना की। आग्रह किया कि यह छोटी सी गीता अपने साथ रखूं। मैंने उनकी बात मान ली। अपने बैग में रख लिया। जब लोगों ने कहा कि अब आप सुरक्षित नहीं हैं। जान का ख़्याल रखें तो आज उस गीता को पलट रहा था। उसका एक सूत्र आपसे साझा कर रहा हूं।

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि, तत: स्वधर्मं कीर्ति च हित्वा पापमवाप्स्यसि।।

मुझे प्यार करते रहिए। मुझे ज़लील करने से क्या मिलेगा। आपका ही स्वाभिमान टूटेगा कि इस महान भारत में आप एक पत्रकार का साथ नहीं दे सके। मेरे जैसों ने आपको इस अपराध बोध से मुक्त होने का अवसर दिया है। यह अपराध बोध आप पर उसी तरह भारी पड़ेगा, जैसे आज विपक्ष के लिए उसकी अतीत की अनैतिकताएं भारी पड़ रही हैं। इसलिए आप मुझे मज़बूत कीजिए। मेरे जैसों के साथ खड़े होइये। आपने मोदी को मज़बूत किया। आपका ही धर्म है कि आप पत्रकारिता को भी मज़बूत करें। हमारे पास जीवन का दूसरा विकल्प नहीं है। होता तो शायद आज इस पेशे को छोड़ देता। उसका कारण यह नहीं कि हार गया हूं। कारण यह है कि थक गया हूं। कुछ नया करना चाहता हूं। लेकिन जब तक हूं, तब तक तो इसी तरह करूंगा। क्योंकि जनता ने मुझे नहीं हराया है। मोदी को जिताया है। प्रधानमंत्री मोदी को बधाई।

साभार: https://naisadak.org/is-2019-mandate-is-against-me-also/

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भारतीय संसदीय पत्रकारिता के नजरिये से यह एक बड़ा नुकसान है मिस्टर मीडिया!

तो फैसला हो ही गया। दो-ढाई बरस से इस पर कवायद चल रही थी कि भारत की संसद को आखिर दोनों सदनों के लिए अलग-अलग चैनल क्यों चाहिए?

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 02 March, 2021
Last Modified:
Tuesday, 02 March, 2021
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।  

तो फैसला हो ही गया। दो-ढाई बरस से इस पर कवायद चल रही थी कि भारत की संसद को आखिर दोनों सदनों के लिए अलग-अलग चैनल क्यों चाहिए? यह बहस सोलह बरस पहले भी चली थी, जब लोकसभा टेलिविजन प्रारंभ करने का निर्णय हुआ था। उस समय भी भारतीय जनता पार्टी का रुख राज्यसभा के अपने अलग चैनल के पक्ष में नहीं था। इसलिए भैरोंसिंह शेखावत के उप राष्ट्रपति रहते इसकी फाइल ठंडे बस्ते में पड़ी रही। वे राज्यसभा के सभापति भी थे। इस वजह से अंतिम निर्णय का हक भी उन्हीं का था। उनके बाद आए उप राष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने इसमें रुचि ली और भारत संसार के उन चंद मुल्कों में शुमार हो गया, जिनके दोनों सदनों के अपने अलग-अलग चैनल थे।

इन पंक्तियों के लेखक को संस्थापक, कार्यकारी संपादक और कार्यकारी निदेशक के रूप में राज्यसभा का अपना चैनल शुरू करने का सुअवसर मिला। बताने की जरूरत नहीं कि चैनलों के घटाटोप में यह बेहद चमकदार और धमाकेदार था। इसे करोड़ों दर्शकों का प्यार मिला और इसकी ख्याति समंदर पार जा पहुंची थी। आज जिस काम के लिए निजी चैनल साल भर में दो-ढाई सौ करोड़ रुपये खर्च करते हैं, वही काम सत्तर-अस्सी करोड़ रुपये साल में हम लोग करते रहे। राज्यसभा टीवी की चर्चाओं में सभी दलों का प्रतिनिधित्व होता था। इसके बुलेटिन प्रामाणिक थे। कला-संस्कृति पर इसके कार्यक्रम बेजोड़ थे और हिन्दुस्तान में पहली बार पंद्रह करोड़ से अधिक आदिवासियों को इस चैनल ने स्वर दिया था।

लेकिन यह वक्त अब इस चैनल के गीत गाने का नहीं है और न ही मातम का है। भारतीय शिक्षा प्रणाली की गाड़ी वैसे ही पटरी से उतरी हुई है और जीवन के हर क्षेत्र के पेशेवरों को गणतंत्र की कोई बुनियादी शिक्षा नहीं देती। ऐसी सूरत में लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर संसद की जिम्मेदारी बनती थी कि वह हिन्दुस्तान के संवैधानिक ढांचे के बारे में जन-जन को जागरूक करे और अपनी शासन प्रणाली की बारीकियों को गंभीरता से समझाए। यही काम लोकसभा और राज्यसभा टीवी कर रहे थे। संसद चैनल जब अस्तित्व में आएगा तो कई मुश्किलें बढ़ जाएंगी। दोनों सदनों के करीब आठ सौ सांसदों की आवाज के साथ न्याय कठिन हो जाएगा। इसके अलावा साल भर काम करने वाली दर्जनों समितियों का कामकाज आम नागरिक तक संप्रेषित करने में बाधा आएगी। जागरूक और जिम्मेदार लोकतंत्र बनाने की दिशा में उठाए गए कदम थम जाएंगे। क्या इससे आम अवाम को प्रशिक्षित करने की गति मंद नहीं पड़ जाएगी?

भारतीय संसदीय पत्रकारिता के नजरिये से यह एक बड़ा नुकसान है। अफसोस कि मौजूदा दौर में समाज की ओर से जायज, पेशेवर और नैतिक हस्तक्षेप भी बंद हो गया है। किसी भी लोकतंत्र में अगर सामाजिक भागीदारी नहीं हो तो उसके विकलांग होने में देर नहीं लगती। जागरूक नागरिक का कर्तव्य सिर्फ वोट डालना ही नहीं है। यह कोई किराने की दुकान नहीं है, जिसका कभी भी शटर गिरा दिया जाए। समाज का अंग होने के नाते पत्रकारिता का दखल भी इसमें होना जरूरी है मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

भारतीय पत्रकारिता को यह तथ्य समझने की आवश्यकता है मिस्टर मीडिया!

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इन प्रपंचों ने भी पत्रकारों की साख को बहुत धक्का पहुंचाया है मिस्टर मीडिया!

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एंटी सोशल मीडिया पर लगाम का पहला कदम है ये: आलोक मेहता

दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में मीडिया के लिए मार्गदर्शी नियम कानून हैं और उनका पालन बहुत हद तक होता है।

आलोक मेहता by
Published - Monday, 01 March, 2021
Last Modified:
Monday, 01 March, 2021
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आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।

मीडिया के नाम पर नंगे नाच और अराजकता के ढोल बजाने पर अंकुश के नए नियम सामने आने के कुछ घंटे बाद से हाहाकार मच गया। मानो पहाड़ टूट गया, जमीन फट गई, मीडिया को बेड़ियों से जकड़ दिया, लोकतंत्र खत्म और तानाशाही आ गई।  टीवी समाचार चैनलों पर कुछ गंभीर मुद्दे भी उठे, लेकिन मनमानी और स्वछंदता के कुछ समर्थक गुस्से और नकली रोने में सही बात न तो कहने देते हैं और सुनने का तो सवाल ही नहीं। जैसे मीडिया की आजादी को केवल वह समझते हैं और उसके उपयोग का एकाधिकार उनका ही है। चैनल पर समय सीमा है, इसलिए ट्विटर, इंस्टाग्राम, फेसबुक, वेबसाइट, यूट्यूब इत्यादि हैं और नए नियम तीन महीने बाद लागू हो सकते हैं। इस बीच इनमें से कुछ चतुर सुजान विदेशों से वैध या अवैध फंड जुटा लेंगे, ताकि नियम कानून के खिलाफ अभियान चला सकें। जो असहमत हों और नियमों को सही ढंग से लागू करने की हिमायत और आवश्यक सुधार के सकारात्मक सुझाव दें, उन्हें सत्ता के दलाल, चाटुकार आदि गालियां देकर अपने प्लेटफार्म पर रोएं-चिल्लाएं।

दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में मीडिया के लिए मार्गदर्शी नियम कानून हैं और उनका पालन बहुत हद तक होता है। नियम तोड़ने पर विश्व मीडिया सम्राट मर्डोक को लंदन में अपना एक अखबार तक बंद करना पड़ा, अमेरिका में गलत और मानहानि के मामलों पर करोड़ों डॉलर का जुर्माना देना पड़ता है। हमसे काबिल कथित मीडिया संपादक, प्रकाशक और विशेषज्ञ क्या पिछले सत्तर वर्षों में किसी मीडिया संस्थान द्वारा करोड़ों न सही लाखों का जुर्माना भरे जाने और तीन साल न सही, दस महीने जेल में रखे जाने का विवरण दे सकते हैं? प्राथमिकी, नोटिस, मुकदमे आदि में वर्षों लगने और न्याय पालिका की उदारता अथवा आपसी समझौते से मामला निपट जाता है। मानहानि के एक बेहद गंभीर मामले में भी सर्वोच्च अदालत ने प्रतीकात्मक एक रूपये का जुर्माना लगा दिया। शक्ति संपन्न आरोपी तो उस एक रुपये की सजा स्वीकारने को तैयार नहीं हैं। जब कानून के जानकार ही कानून और अदालत का सम्मान करने को तैयार नहीं होंगे, तो दूरदराज बंदूक लिए बैठा नक्सली कुछ भी लिखने बोलने और धमकी-हत्या करने से क्यों चूकेगा?

देश के सूचना-प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर प्रारंभिक काल में पत्रकार रहे है और भले राजनेता हैं, लेकिन लगता है कि इमरजेंसी, सेंसरशिप आदि के काल खंड से विचलित रहने के कारण उन्हें यह गलत धारणा और मंत्री के नाते गलत सूचना है कि वर्तमान प्रेस परिषद् के नियम और मार्गदर्शी आचार संहिता का पालन भारत का संपूर्ण प्रिंट मीडिया कर रहा है। तीन-चार दशक पहले कम से कम अखबार या पत्रिका प्रेस परिषद् द्वारा दोषी ठहराए गए निर्णय किसी पृष्ठ पर छाप देते थे। अब तो वह भी नहीं होता। प्रेस परिषद् के अध्यक्ष पूर्व न्यायाधीश होते हैं, विभिन वर्गों के प्रतिनिधि सदस्य होते हैं। दफ्तर, खर्चें, बैठकें व निर्णय होते भी हैं, लेकिन तमाम प्रभावशाली मीडिया कंपनियां कोई परवाह नहीं करतीं और जरूरत हो तो किसी जूनियर मैनेजर और वकील को औपचारिकता पूरी करने का दायित्व सौंप देती हैं।

एडिटर्स गिल्ड में वरिष्ठ संपादकों की सलाह से बनी आचार संहिता का लोकार्पण तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ, एपीजे अब्दुल कलाम ने किया था। इसका ध्यान अब भी कई संपादक और प्रकाशन रखते हैं, लेकिन सूचना मंत्रालय कृपया एक सही सर्वेक्षण करवा ले तो पता चल जाएगा कि देश के हजारों प्रकाशनों में से कितनों को प्रेस परिषद् के नियमों और आचार संहिता की जानकारी तक है? आजादी की लड़ाई 73 साल पहले खत्म हो गई, लेकिन आजादी के नाम पर आज भी एक साधारण कागजी खानापूर्ति करके कोई भी संपादक प्रकाशक बन जाता है और छापने के लिए स्वच्छंदता का इस्तेमाल कर रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने महीनों तक विभिन्न देशी-विदेशी संस्थानों, विशेषज्ञों, विधिवेत्ताओं से विचार विमर्श के बाद आधुनिक डिजिटल मीडिया के लिए आचार संहिता और आवश्यक मार्गदर्शी नियमावली की घोषणा की है। इसलिए यह आलोचना अजीब लगती है कि महीने भर पहले लाल किले पर हुए अपराध और किसान आंदोलन के नाम पर सोशल मीडिया में हुए कुप्रचार अथवा उत्तेजक असत्य सूचनाओं के अंतरराष्ट्रीय प्रसार के कारण यह नियम लादे जा रहे हैं। भारत ही नहीं, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जापान जैसे देशों में भी डिजिटल युग में नए नियम कानूनों पर विचार विमर्श ही नहीं हो रहा, पहले से तय नियम सही ढंग से लागू करने के प्रयास हो रहे हैं।

मोदी सरकार ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के संरक्षण के संकल्प के साथ उसमें कोई संवैधानिक संशोधन नहीं किया है, लेकिन उस अधिकार के साथ भारत की सम्प्रभुता, जवाबदेही और समाज से उठने वाली शिकायतों के निवारण, सुधार के लिए स्वायत्तशासी नियामक बनाने का प्रावधान किया गया है। जिस तरह अन्य अपराधों के लिए दंड का प्रावधान है, डिजिटल मीडिया-देशी-विदेशी कंपनी में उत्तरदायी व्यक्ति का नाम तय होने पर सजा दिए जाने की व्यवस्था की जा रही है।

विदेशी कंपनियों को तो फिर भी कड़ाई से नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन महानगर से लेकर सुदूर जंगल में बैठकर वेबसाइट या वीडियो बनाकर सच-झूठ मिलाकर प्रसारित करने वालों की जानकारी भी किसी राज्य, केंद्र सरकार के पास नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि हाल के वर्षों में नए संचार साधनों और  सोशल मीडिया को जिम्मेदारी से उपयोग करने वाले लोगों से समाज में जागरूकता लाने, सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने की सुविधाएं हुई हैं| यही नहीं, इसके सकारात्मक और आर्थिक लाभ के रास्ते भी खुले हैं। डिजिटल टेक्नोलॉजी क्रांति से हाल के वर्षों में पचास हजार नए स्टार्टअप शुरू हुए हैं। हर साल लगभग 11 से 14 अरब डॉलर का पूंजी निवेश हो रहा है। करीब सत्तर करोड़ लोगों तक इंटरनेट सुविधा पहुंचने लगी है और डिजिटल मीडिया कंपनियों के दावों के अनुसार करीब पचास करोड़ लोग सोशल नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहे हैं।

आर्थिक पैमाने पर जरूर अमेरिका और चीन भारत से आगे हो सकते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक उपयोग की दृष्टि से भारत सबसे आगे है। वहीँ इस बात का ध्यान रखना होगा कि भारत में अब भी शिक्षा के क्षेत्र में बहुत काम होना है। अधिकार के साथ नैतिक और राष्ट्रीय सामरिक हितों को सुरक्षित रखना है। अमेरिका या चीन में सांप्रदायिक, जातीय, भाषाई, सीमावर्ती गंभीर समस्याएं नहीं हैं। जर्मनी या ब्रिटेन में उग्रवादी संगठन और सीमा से घुसपैठ और आतंकवादी गतिविधियों के खतरे भारत की तरह नहीं हैं। कुछ घटनाएं होती हैं तो उनके लड़ाकू विमान सीमा पार कर हमले तक कर देते हैं। वे मानव अधिकार की दुहाई भले ही देते हों, सामान्य केमिकल फॉर्मूले या डिजिटल टेक्नोलॉजी के आरोप में एक-दो साल तक नजरबंद और पांच दस साल तक की सजा हो जाती हैं। रक्षा सौदों में घोटालों पर भारत में मीडिया, राजनीतिक दल और कई संगठन निरंतर आवाज उठाते हैं, लेकिन छोटे प्रकाशन या वेबसाइट अथवा सोशल मीडिया की आड़ में हथियारों की खरीदी या दलाली के बारे में सरकार के पास भी आधिकारिक जानकारी का तंत्र नहीं है। नए नियम से क्या ऐसे लोगों का रिकार्ड सार्वजनिक हो सकेगा?

डिजिटल मीडिया की नई आचार संहिता में अश्लीलता और हिंसा की सारी सीमाओं का उल्लंघन करने वाले सीरियल, फिल्म, गाने आदि का प्रदर्शन करने वाले प्लेटफार्म पर अंकुश की व्यवस्था की गई है। दुनिया भर में बच्चों को इस तरह के डिजिटल दुष्प्रभाव से बचाने के अभियान चल रहे हैं। यह कहना कि आप स्वयं उसे रिमोट से बंद कर न देखें, लेकिन अपने देश में तो सरकारें ही गांवों तक मुफ्त आईपेड, मोबाइल, लैपटॉप बच्चों को बांट रही हैं। वहां मां-बाप चौबीस घंटे कैसे पहरेदारी कर सकेंगे? हाल के वर्षों में बलात्कार, आत्महत्या और अन्य अपराधों की घटनाओं में वृद्धि का एक कारण स्वछंद सोशल डिजिटल मीडिया भी है। इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सरकार की आलोचना और विरोध की पूरी छूट के साथ समाज को पतन के गर्त से बचाने और भविष्य को अधिक स्वस्थ्य, सुखी व सुरक्षित रखने के लिए उचित समय और सही ढंग से आचार संहिता लागू होनी चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह विषय अदालतों के सामने जाने पर न्यायाधीश आवश्यक सलाह दें व इसे और प्रभावी ढंग से लागू किए जाने का पथ प्रशस्त करें।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक पद्मश्री से सम्मानित संपादक और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष हैं)

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भारतीय पत्रकारिता को यह तथ्य समझने की आवश्यकता है मिस्टर मीडिया!

22 बरस की दिशा रवि को दिल्ली की एक अदालत से जमानत सुखद खबर है। यह असहमति के सुरों की रक्षा के लिए सही समय पर आया सही फैसला है।

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 24 February, 2021
Last Modified:
Wednesday, 24 February, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

22 बरस की दिशा रवि को दिल्ली की एक अदालत से जमानत सुखद खबर है। यह असहमति के सुरों की रक्षा के लिए सही समय पर आया सही फैसला है। इससे एक तरफ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संरक्षण मिलता है तो दूसरी ओर यह भी सुनिश्चित होता है कि हिंदुस्तान की जम्हूरियत का मजबूत खंभा न्यायपालिका अभी भी किसी किस्म के दबाव से मुक्त है।

कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि इस लोकतांत्रिक अंग के बारे में कुछ समय से तनिक तकलीफदेह अहसास हो रहा था। यह धारणा घर करने लगी थी कि वाकई न्यायपालिका दबाव में तो काम नहीं कर रही? असल में कई बार इनसान कुछ दबाव तो अपने हित या स्वार्थों के चलते भी ओढ़ता दिखाई देता है। अगर वह ठान ले कि किसी प्रकार के दबाव में नहीं आएगा तो फिर वाकई वह मुक्त होकर काम करता है। हो सकता है कि फौरी तौर पर उसका कुछ नुकसान भी हो जाए, लेकिन अंततः वह विजेता की शक्ल में सामने आता है। भारतीय पत्रकारिता को यह तथ्य समझने की आवश्यकता है। असहमत होना किसी भी  जिम्मेदार और सभ्य लोकतंत्र की पहली शर्त है और इसको संरक्षण मिलना ही चाहिए।

माननीय न्यायालय ने दिशा रवि के मामले में साहसिक और संवैधानिक टिप्पणियां की हैं। भारतीय संस्कृति में वेदों को सर्वोच्च प्रतिष्ठा प्राप्त है और ऋग्वेद की ऋचाओं का संदर्भ इस देश के चरित्र को स्थापित करता है। कोर्ट का यह कथन पूरी तरह सटीक है कि हुकूमत के जख्मी गुरूर पर मरहम लगाने के लिए किसी को राजद्रोह के आरोप में कारागार नहीं पहुंचाया जा सकता। इस व्यवस्था से हिंदुस्तान की पत्रकारिता पर इन दिनों मंडरा रहे अवसाद और निराशा के वे बादल भी छंट सकते हैं, जो आम अवाम को यह धारणा बनाने का अवसर देते हैं कि इन दिनों मुल्क का मीडिया अपनी साख खो रहा है। सत्ता पक्ष की चिरौरी करते रहना अथवा चौबीसों घंटे उसकी निंदा करना यकीनन स्वस्थ्य पत्रकारिता की निशानी नहीं है। ऐसी करतूतों से संतुलित और निष्पक्ष पत्रकारिता को झटके लगते हैं। संसार में कोई सभ्य समाज पत्रकारिता का अपनी राह से विचलित होना पसंद नहीं करेगा।

बीते दिनों भारत के संपादकों की प्रतिष्ठित संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने राष्ट्र के अशांत क्षेत्रों में पत्रकारिता पर एक ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित किया था। जाहिर सी बात थी कि उसमें सरकार के गीत तो नहीं ही गाए जाने वाले थे। लेकिन असहमति और निंदा को स्थान नहीं देने वालों ने इसमें इस कदर तकनीकी बाधा डाली कि अंततः कार्यक्रम ही रद्द करना पड़ा। इसकी व्यापक भर्त्सना की गई थी।

असल में आज ऐसे तत्वों का चारों तरफ बोलबाला दिख रहा है, जो अपनी आलोचना पसंद नहीं करते। इस प्रवृति से वे खुद को और लोकतंत्र दोनों को क्षति पहुंचाते हैं। उन्हें तात्कालिक लाभ भले ही मिल जाए, मगर वे अपने ही देशवासियों से असुरक्षित महसूस करते हैं। भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के लिए जरूरी है कि वह इनको बेनकाब करे-ताला लगाके आप हमारी जबान को/ कैदी न रख सकेंगे जेहन की उड़ान को/असहमति के सुरों की रक्षा करना ही असली राष्ट्रीय कर्तव्य है। इस हकीकत को जान लीजिए मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: आजादी के बाद पहली बार बनी है पत्रकारिता के लिए ऐसी स्थिति

इन प्रपंचों ने भी पत्रकारों की साख को बहुत धक्का पहुंचाया है मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: कुछ इस तरह की चाहिए एक मीडिया काउंसिल!

यह कैसी पत्रकारिता का नमूना हम प्रस्तुत कर रहे हैं मिस्टर मीडिया!

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यूपी सरकार के बजट का पूरन डावर ने कुछ यूं किया विश्लेषण

उत्तर प्रदेश सरकार का यह बजट कुल मिलाकर गरीबों, किसानों और इंफ्रॉस्ट्रक्चर को समर्पित है।

पूरन डावर by
Published - Tuesday, 23 February, 2021
Last Modified:
Tuesday, 23 February, 2021
Puran Dawar

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

उत्तर प्रदेश सरकार का यह बजट कुल मिलाकर गरीबों, किसानों और इंफ्रॉस्ट्रक्चर को समर्पित है। धार्मिक एवं अध्यात्मिकता को पर्यटन का केंद्र मानकर वाराणसी, अयोध्या और गोरखपुर को संवारने के लिए बजट में पर्याप्त धनराशि का प्रावधान किया गया है। निश्चित रूप से इनका विकास वैटिकन सिटी और मक्का मदीना से कमतर नहीं होना चाहिए। सरकार बधाई की पात्र है। विकास को गति देने के लिए बजट अच्छा है। स्टार्टअप के लिए 100 करोड़ का प्रावधान है, जो काफी तो नहीं, लेकिन कोविड-19 के कारण सरकार की आय भी सीमित है।

अर्थव्यस्था की रीढ़ उद्योगों के लिए कोई विशेष बजट आवंटित नहीं है। वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रॉडक्ट (ODOP) योजना के लिए पूरे प्रदेश के 75 जिलों के लिए 250 करोड़ नाकाफी हैं। इस अद्भुत योजना को साकार करने में कठिनाई आ सकती है। सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल पर विकास की बड़ी संभावनाएं हैं। सरकार को पर्यटन के विकास के लिए विकल्प तलाशने होंगे। इंफ्रॉस्ट्रक्चर पर गरीब घर पर बजट आवंटन से विकास को गति मिलेगी।

जेवर व अयोध्या एयरपोर्ट निश्चित रूप से विकास को गति देंगे, लेकिन आगरा जैसे विश्वप्रसिद्ध पर्यटन को नकारना महंगा पड़ सकता है। आवश्यकता थी बजट में ब्रज एवं आगरा के पर्यटन पर एक बड़ी लकीर की। यमुना पर वाटर पार्क, यमुना के उस पार वल्लभ भाई पटेल की तथा शिवाजी या गुरु गोबिंद सिंह जी की प्रतिमा, थीम पार्क की भूमि पर कृष्णा थीम पार्क की। सरकार के पास संसाधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन व्यवस्थाएं पीपीपी पर हो सकती हैं। अभी भी समय रहते समग्र भौगोलिक विकास पर ध्यान देना आवश्यक है। कुल मिलाकर गरीब किसान के लिए राहत भरा बजट है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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ऐसे तो हम जैसों को तलवार-बंदूक के बल पर लिखने-बोलने को कहा जा सकता है: आलोक मेहता

अमिताभ बच्चन और अक्षय कुमार को लेकर कांग्रेस नेता नाना भाऊ फाल्गुन राव पटोले के ऐलान पर वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने रखी अपनी बात

आलोक मेहता by
Published - Monday, 22 February, 2021
Last Modified:
Monday, 22 February, 2021
alokmehta45454

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।  

सचमुच क्या मुंबई जाने से पहले दस बार सोचना होगा? क्या अपनी जान बचाने का इंतजाम करके प्रवेश करना होगा? लेकिन आजकल बाल ठाकरे या उनसे बिछुड़े सत्ताधारी भाई उद्धव ठाकरे और उनके हथियारबंद साथी तो उत्तर भारतीयों को सार्वजनिक रूप से धमकियां नहीं दे रहे हैं। फिर क्यों डरना? जी नहीं, डरना होगा। उनसे अधिक शक्तिशाली कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नाना भाऊ फाल्गुन राव पटोले ने खुलेआम ऐलान कर दिया है कि फिल्मी दुनिया के विश्वविख्यात बादशाह कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन और हाल के दशकों में सफल अभिनेता अक्षय कुमार यदि उनके आदेशानुसार नहीं लिखे-पढ़े और बोलेंगे तो महाराष्ट्र में न उनकी फिल्म चलने दी जाएगी और न ही उनकी किसी फिल्म की शूटिंग होने दी जाएगी।

अब मेरे जैसे लाखों लोगों के लिए यह धमकी क्या चिंताजनक नहीं होगी? यदि इतने बड़े लोकप्रिय अभिनेताओं की ऐसी फजीहत हो सकती है तो हम जैसों को तो दादा पटोले, उनकी कांग्रेस पार्टी और साथी शिवसेना के सैनिक तलवार या बंदूक के निशाने पर बोलने-लिखने को कह सकते हैं। खासकर जब वह पहले दल-बदल और फिर पद बदलने के बाद प्रदेश पार्टी अध्यक्ष से मुख्यमंत्री बनने की तैयारी में लगे हैं।

गनीमत है कांग्रेस ने उनकी अद्भुत क्षमताओं को ध्यान में रखकर पार्टी सौंप दी है, वरना विधान सभा अध्यक्ष के पास अवमानना के विशेषाधिकार के नाते आदेश की अवहेलना पर अमिताभ तो क्या, भारत रत्न आदरणीय लता मंगेशकरजी को सदन में हाजिर करवाकर दो-चार दिन जेल भेजने का आदेश जारी कर देते। वैसे मेरे जैसे अज्ञानी लोगों को उनके इस बयान से उनकी पृष्ठ्भूमि का ज्ञान भी प्राप्त हुआ। अपने लंबे पत्रकारिता जीवन में मुझे तमाम बड़ी राजनीतिक हस्तियों से मिलने, बात करने, उनकी राजनीति के बारे में कभी मीठा-कभी कड़वा लिखने-बोलने के अवसर मिले हैं। लेकिन श्रीमान पटोले जब भारतीय जनता पार्टी के सम्मानित सांसद थे, तब भी उनका नाम सुनने या उनसे मिलने का अवसर नहीं मिला।

हां, दल बदलुओं की बारात में शामिल होने पर नाम सुनने को मिला। नानाभाऊ पटोले ने अमिताभ बच्चन को मनमोहन सिंह के सत्ता काल में पेट्रोल-डीजल के मूल्य बढ़ने पर ट्वीट करने की याद दिलाई है। लेकिन मिस्टर पटोले को शायद याद नहीं या देर से अपने साथी शिवसेना के सामना में (जुलाई 2012) आदरणीय बाल ठाकरे का संपादकीय ध्यान में लाया जाए, जिसमें बाला साहेब ने मनमोहन सिंह, कांग्रेस पार्टी, सरकार और सोनिया गांधी पर कितने गंभीरतम आरोप लगाए थे। अब क्या वह शिवसेना से उसी शैली में कांग्रेस पर वार करने को कहना चाहेंगे। वैसे कह भी सकते हैं। भाजपा से कांग्रेस में आए थे, अब बड़ा पद पाने को देर-सबेर शिवसेना में शामिल हो जाएं, लेकिन तब एक समस्या होगी-अमिताभ के संबंध बाला साहेब से बहुत अच्छे थे।  यों राजीव गांधी के बाल सखा होने के कारण कांग्रेस से भी उनके संबंध रहे थे और जब पटोले 23 साल के नादान युवक थे, तब अमिताभ उसी पार्टी से लोकभा का चुनाव भी जीते थे। इसलिए उनकी राजनीतिक सोच समझ के लिए पटोले पाठ या राहुल क्लास की आवश्यकता नहीं होगी।

लोकतंत्र में पटोले मंडली को भी आलोचना का अधिकार है। अमिताभ-अक्षय कुमार या किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति की गलती या अपराध पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है। इसी तरह उनके किसी वक्तव्य या टिपण्णी पर पटोले महाशय मानहानि का मुकदमा दर्ज कर सकते हैं, लेकिन न बोलने और उनके आदेश पर काम न करने पर पटोले कैसे जबरदस्ती कर सकते हैं। नेता गण और सामान्य पाठक बंधु भी कृपया सोचिये-संभव है कि कुछ महीने बाद यही दादा पटोले की मंडली टाटा, अंबानी, गोदरेज, मित्तल जैसे उद्यमियों को आदेशानुसार बोलने, चंदा देने की धमकी देने लगे। हां, उनके सहयोगी दल के पचासों पट्ठे मुंबई में हफ्ता वसूली के लिए बदनाम रहे हैं।

आश्चर्य और दुखद बात यह है कि पटोले की जहरीली धमकी पर कांग्रेस के शीर्ष नेताओं और अनुभवी वरिष्ठ नेता शरद पवार ने तत्काल सार्वजनिक रूप से फटकार नहीं लगाई। आप कह सकते हैं कि इस तरह की धमकी की परवाह न की जाए। लेकिन यह तो सोचें कि जब पार्टी अध्यक्ष ऐसा करेगा तो जिला, ग्रामीण स्तर के नेता कार्यकर्ता समाज के अन्य लोगों को इसी तरह बोलने, काम करने के लिए धमकाने लगेंगे। उनको कौन बचाएगा? पार्टी या किसी भी संगठन का नाम लेकर विभिन्न राज्यों में होने वाली किसी भी गतिविधि का कड़ाई और कानूनी ढंग से प्रतिकार होना चाहिए। अन्यथा नक्सली अदालत की तरह समाज में कोई भी गिरोह गैरकानूनी आदेश और सजा देने लगेगा। अभी सड़कों, रेल मार्गों पर जबरन कब्जा करके व्यवस्था और सामान्य जनों को निरंतर संकट में डाला जा रहा है। देर सबेर किसी दफ्तर या घरों पर कब्जा जमाने की हिमाकत होने लगेगी। सत्ता और विपक्ष की लड़ाई अराजकता की ओर ले जाना सबके लिए घातक होगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक पद्मश्री सम्मानित और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष हैं)

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आने वाले समय में रेडियो रियल गेम चेंजर साबित होगाः  प्रो. के.जी. सुरेश

लोक प्रसारक के रूप में रेडियो की भूमिका सबसे अहम है और आने वाले समय में यह रियल गेमचेंजर साबित हो सकता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 18 February, 2021
Last Modified:
Thursday, 18 February, 2021
Radio5454

लोक प्रसारक के रूप में रेडियो की भूमिका सबसे अहम है और आने वाले समय में यह रियल गेमचेंजर साबित हो सकता है। रेडियो की लोकप्रियता बढ़ाने में प्रधानमंत्री जी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम का भी बहुत बड़ा योगदान है। एफएम चैनलों ने भी रेडियो की प्रासंगिकता को बनाए रखने और लोगों के दिलों स्थापित करने में महती भूमिका निभाई है। यह बात बुधवार को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. के.जी. सुरेश ने पीआईबी भोपाल सभागार में विश्व रेडियो दिवस के संदर्भ में, ‘मन का रेडियो’ विषय पर आयोजित सेमिनार में कही।

आयुक्त एवं सचिव जनसंपर्क सुदाम खाड़े ने कहा कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में रेडियो हमें खुद को सुनने का मौका देता है। यह खुद से कनेक्ट करने का बेहतर माध्यम है। उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान भोपाल में फेक न्यूज पर लगाम लगाने में रेडियो द्वारा निभाई गई भूमिका को भी याद किया।

पीआईबी, भोपाल के अपर महानिदेशक प्रशांत पाठराबे ने कहा कि रेडियो का देश के दूराज इलाकों में रहने वाले लोगों के साथ एक मजबूत रिश्ता है। यह बेहद ही आसान तरीके और जनता की भाषा में लोगों तक बातों को पहुंचाता है। उन्होंने कहा कि कोरोना काल में राजस्व के मामले में रेडियो को नुकसान तो हुआ पर कोरोना के बाद रेडियो ने काफी बेहतर तरीके से वापसी की है और इसका राजस्व 5 गुना बढ़ा है।

शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक मनोज कुमार ने कहा कि रेडियो प्रामाणिक एवं विश्वसनीय माध्यम है। बदलते समय में दूर दराज में रहने वाले समुदाय के लिये सामुदायिक रेडियो सबसे प्रभावशाली माध्यम के रूप में उभरा है। वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार ने सामुदायिक रेडियो के क्षेत्र में किए गए अपने कार्यों को याद किया और कहा कि कम्युनिटी रेडियो भविष्य का रेडियो है। उन्होंने कम्युनिटी रेडियो खोलने की पूरी प्रकिया के बारे में भी बताया और इस बारे में सरकारी गाइडलाइन की भी जानकारी दी। उन्होंने कहा कम्युनिटी रेडियो शिक्षा की रोशनी फैलाने में अहम योगदान देता है।

आकाशवाणी, भोपाल के कार्यक्रम प्रमुख विश्वास केलकर ने लोक प्रसारक के रूप में रेडियो की भूमिका पर प्रकाश डाला। आकाशवाणी समाचार भोपाल के पूर्व संवाददाता और आरओबी, भोपाल के सहायक निदेशक शारिक नूर ने खबरों की दुनिया में रेडियो की विश्वसनीयता के बारे में बात की।

‘माय एफएम’ के कार्यक्रम प्रमुख विकास अवस्थी ने कहा कि रेडियो आपका दोस्त बनकर आपके साथ चलता है और आपकी सकारात्मकता को बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाता है।

वहीं, ‘बिग एफएम’ की रेडियो जॉकी अनादि ने कहा कि रेडियो साधारण और बहुत ही आसान माध्यम है। रेडियो की सबसे अच्छी बात यह है कि यह हमें कानों से देखना सिखाता है। हम काम करते हुए भी रेडियो से जुड़ सकते हैं।

इस अवसर पर शोध पत्रिका समागम का सामुदायिक रेडियो पर केंद्रित विशेषांक का लोकार्पण अतिथियों ने किया।

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यह एक ऐसी फांस है, जो लंबे समय तक मुल्क को चुभती रहेगी: राजेश बादल

डोनाल्ड ट्रंप का इस बेहद गंभीर आरोप से बरी होना अमेरिकी लोकतंत्र की एक ऐसी फांस है, जो लंबे समय तक पूरे मुल्क को चुभती रहेगी।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 17 February, 2021
Last Modified:
Wednesday, 17 February, 2021
Trump6

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

महाभियोग के बाद अमेरिकी लोकतंत्र की साख

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर महाभियोग से साफ बच निकले। इसलिए नहीं कि कैपिटल हिल की हिंसा में उनका कोई हाथ नहीं था बल्कि इसलिए कि सीनेट में हुए मतदान में उनके खिलाफ दो तिहाई मत नहीं पड़े। यह अलग बात है कि उनकी अपनी ही रिपब्लिकन पार्टी के कई सांसद खुलकर पूर्व राष्ट्रपति के विरोध में और महाभियोग के समर्थन में सामने आए और उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप को सार्वजनिक रूप से हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया। डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी के चंद और सांसद यदि उनके विरोध में वोट डालते तो विश्व इतिहास में लोकतंत्र का एक नया अध्याय लिखा जाता। ऐसा हो सकता था, क्योंकि प्रस्ताव के विरोध में मतदान करने वाले रिपब्लिकन पार्टी के अनेक सदस्य इसके समर्थन में थे। लेकिन अगर वे ऐसा करते तो उनकी अपनी पार्टी के माथे राजनीतिक कलंक का स्थाई टीका लग जाता। आने वाले चुनाव में पार्टी की अपनी साख दांव पर लग जाती। इसलिए दल की खातिर उन्हें उस झूठ का समर्थन करना पड़ा, जिसे अमेरिका का एक-एक मतदाता जानता था।

कह सकते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप का इस बेहद गंभीर आरोप से बरी होना अमेरिकी लोकतंत्र की एक ऐसी फांस है, जो लंबे समय तक पूरे मुल्क को चुभती रहेगी। अब इस विशाल देश को अपने दो सौ बरस पुराने संविधान के अनेक प्रावधानों पर पुनर्विचार करना होगा। अगर महाभियोग को बहुमत का समर्थन था तो स्पष्ट था कि ट्रंप लोकतंत्र के एक बड़े उपकरण के पैमाने पर खरे साबित नहीं हुए हैं। प्रसंग के तौर पर भारतीय लोकतंत्र की एक घटना का सन्दर्भ आवश्यक है, जब केवल एक मत से प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिर गई थी। 

दरअसल किसी भी जागरूक जम्हूरियत का तकाजा यही है कि वह जिन राजनेताओं को हुकूमत करने का अवसर दे, उन पर कड़ी निगरानी भी रखे ताकि देश की देह में तानाशाही का घुन नहीं लगे। यह एक आदर्श स्थिति मानी जा सकती है। विडंबना है कि इन दिनों समूचे विश्व पर अधिनायक वादी घुड़सवार चढ़ाई करते दिखाई दे रहे हैं। इसलिए भले ही ट्रंप की करतूत पर उनके ही दल के सांसदों ने खिलाफ होते हुए भी बचा लिया हो, पर वे जाने-अनजाने लोकतंत्र और अपने राष्ट्र को गंभीर क्षति पहुंचा चुके हैं। इसका अफसोस उन्हें हमेशा रहना चाहिए। यह इतिहास के पन्नों में लिखा जाएगा कि लोकतंत्र पर संकट की घड़ी में वे दल के साथ खड़े हुए, देश के साथ नहीं। आने वाले दिनों में अमेरिका को इसका खामियाजा भुगतना ही होगा। डोनाल्ड ट्रंप तो इससे क्या सबक लेंगे। अलबत्ता उनकी पार्टी यदि इस अवसर पर नैतिक साहस दिखाती और महाभियोग को समर्थन देती तो विश्व इतिहास में यह प्रसंग स्वर्ण अक्षरों में लिखा जा सकता था।

लेकिन इसी आधार पर अमेरिकी लोकतंत्र की परिपक्वता को खारिज नहीं किया जा सकता। असहमति के अधिकार का वहां सम्मान होता है और किसी तरह की व्हिप जारी करके व्यक्तिगत मान्यताओं को क्षति पहुंचाने का काम नहीं किया जाता। अंतरात्मा की आवाज का आदर भी इस व्यवस्था का अनिवार्य अंग है। डोनाल्ड ट्रंप से असहमत उनके दल के सदस्य खिलाफ वोट करने के बाद पिछले दरवाजे से चुपचाप नहीं निकल गए। उन्होंने बाकायदा सार्वजनिक तौर पर ट्रंप के बच निकलने पर दुःख प्रकट किया। वरिष्ठ सीनेटर मिच मैककोनेल ने इस प्रक्रिया पर अपनी टिप्पणी में कहा, ‘मेरा अडिग मानना है कि ट्रंप ने अपना संवैधानिक दायित्व निभाने के बजाए संसद में हथियारों के साथ हिंसा के लिए अपने समर्थकों को उकसाया था। वे इसके अपराधी हैं। लेकिन हमारे हाथ बंधे हुए थे। हमारे पास इतनी ताकत नहीं थी कि राष्ट्रपति के पद पर बैठकर ट्रंप की करतूतों के लिए अयोग्य ठहरा सकते।’

तनिक सोचिए। क्या भारत में यह संभव है? भारतीय लोकतंत्र के हितैषियों के बीच यकीनन यह चर्चा का विषय होना चाहिए कि किसी दागदार नेता का दल के समर्थन से बेदाग बरी होना कितना जायज है। यही नहीं, व्हिप की आड़ में उसके खिलाफ मतदान करने वालों पर कार्रवाई की तलवार भी चल सकती है। किसी भी सूरत में यह उचित नहीं माना जा सकता। एक तरह से लोकतंत्र की डाल को अपने हाथों तोड़ने जैसा है और सियासी पार्टी को अधिनायक की तरह व्यवहार करने का अवसर देता है। क्या भारतीय मतदाता और नियंता अमेरिका की इस घटना से कोई सबक लेंगे?

दूसरी ओर इसे स्वीकार करने में भी हिचक नहीं होनी चाहिए कि जनतांत्रिक प्रणाली में जिसके साथ बहुमत है, उसे दण्डित नहीं किया जाए। यदि अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्य डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ दो तिहाई बहुमत नहीं जुटा सके तो सन्देश है कि पूर्व राष्ट्रपति के व्यवहार को राजनेताओं का एक वर्ग सही तथा उचित मानता है। उचित और अनुचित के बीच की सीमा रेखा कई बार धुंधली हो जाती है। इस स्थिति में कभी निर्दोष भी दंड का भागी बन सकता है और दोषी भी आरोप से मुक्त हो सकता है। ऐसे में न्याय का यह सिद्धांत संतुलित माना जा सकता है कि सौ दोषी भले ही छूट जाएं मगर एक निर्दोष को प्रताड़ना नहीं मिलनी चाहिए। यही लोकतान्त्रिक मर्यादा है। इस मर्यादा की आड़ लेकर डोनाल्ड ट्रंप जैसे शातिर कारोबारी बच न सकें, यह व्यवस्था भी अमेरिका के सभी जम्हूरियत पसंद लोगों को बनानी होगी।

(साभार: लोकमत समाचार)

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विश्व रेडियो दिवस: कम्युनिटी रेडियो को लेकर आज भी भ्रमजाल में है समाज

मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचलों में कम्युनिटी रेडियो की गूंज सुनाई दे रही है। राज्य के सुदूर आदिवासी अंचलों के आठ जिलों में कम्युनिटी रेडियो की स्थापना की गई है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 12 February, 2021
Last Modified:
Friday, 12 February, 2021
CommunityRadio5

मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ।।

मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचलों में कम्युनिटी रेडियो की गूंज सुनाई दे रही है। राज्य के सुदूर आदिवासी अंचलों के आठ जिलों में कम्युनिटी रेडियो की स्थापना की गई है। इन रेडियो स्टेशनों के माध्यम से ग्रामीण एवं आदिवासी समुदाय में सूचना, शिक्षा एवं मनोरंजन के बुनियादी जरूरतों को पूरा किया जा रहा है।

कम्युनिटी रेडियो में निहित उद्देश्यों अनुरूप ‘रेडियो वन्या’ समुदाय के द्वारा समुदाय के लिए, समुदाय से कार्यक्रम निर्माण कराने एवं प्रसारण करने की जवाबदारी भी समुदाय को सौंप रखा है। इसके अलावा मध्यप्रदेश शासन का संस्कृति विभाग का ‘रेडियो आजाद हिन्द’ आजादी के तराने सुना रहा है। राजधानी भोपाल में स्थित रेडियो आजाद हिन्द देश के स्वाधीनता संग्राम से जुड़े प्रसंगों को सुनाता है। हालांकि मध्यप्रदेश का पहला कम्युनिटी रेडियो चंदेरी में स्थापित हुआ था। वर्तमान में कम्युनिटी रेडियो एवं कैम्पस रेडियो की संख्या अन्य राज्यों की तुलना में संतोषजनक है। इसके अलावा विदिशा, सीहोर, उज्जैन के साथ ही राज्य के प्रमुख जिलों में सामुदायिक रेडियो का संचालन किया जा रहा है।

कम्युनिटी रेडियो के माध्यम से शासन की कल्याणकारी योजनाओं के साथ साथ उनके दैनंदिनी जीवन में काम आने वाली सूचना का लाभ भी समुदाय को मिल रहा है। इसके साथ ही इन रेडियो स्टेशनों पर समुदाय की जीवनशैली, संस्कृति, परम्परा, साहित्य एवं विभिन्न संस्कारों का दस्तावेजीकरण किया जा रहा है। स्थानीय बोली में कार्यक्रम के प्रसारण होने के कारण समुदाय को समझने और सुनने में आसानी होती है। 

रेडियो साक्षी रहा है पराधीन भारत से स्वाधीन भारत की यात्रा का। रेडियो गवाह बना हुआ है वर्तमान और युवा भारत का। रेडियो की यात्रा समाज में सूचना, शिक्षा और मनोरंजन को आगे बढ़ाती है। भारतीय समाज की धडक़न है रेडियो। रेडियो संचार का ऐसा प्रभावी माध्यम है जिसे साथ रखने में ना तो टेक्रालॉजी आड़े आती है और ना ही शिक्षित होने की शर्त। जैसे किसी समय हर घर की मेज पर टेलीफोन हुआ करता था, वैसे ही हर भारतीय के घर में रेडियो सेट मिल जाता था। रेडियो के साथ ट्रांजिस्टर भी हुआ करता था। कोई ग्रामीण, कोई मजदूर कांधे में डाले गीत गुनगुनाता आगे बढ़ जाता था। समय बदला, टेक्रालॉजी बदली और रेडियो-ट्रांजिस्ट्रर के विकल्प के तौर पर मोबाइल आ गए। अब हर हाथ में रेडियो था। वैसे ही जैसे टेलीफोन सेट की जगह मोबाइल फोन ने ले ली। संचार के दूसरे माध्यम भी विकसित और परामार्जित हुए। टेलीविजन के आगमन के बाद कहा जाने लगा कि अखबार का समय अब खत्म होने वाला है और सोशल मीडिया के विस्तार के बाद टेलीविजन को लेकर भी यही बात कही जाने लगी। लेकिन रेडियो का ना तो कोई विकल्प आया और ना उसके असामायिक हो जाने की कोई चर्चा हुई। 

संचार के विभिन्न माध्यम पर जब विश्वसनीयता को लेकर सवाल खड़े हुए तो रेडियो निरपेक्ष भाव से सबको सुन रहा था, गुन रहा था। उसकी प्रामाणिकता उसकी पहचान थी। ऐसा भी नहीं है कि रेडियो के दिन बीते नहीं लेकिन हर बार वह चेहरा बदलकर आ जाता था। आकाशवाणी पूर्णत: शासकीय  नियंत्रण का प्रसारण सेवा है तो मनोरंजन का खजाना लेकर एफएम रेडियो आ धमका। एफएम शहरी लोगों के बीच में अपनी पैठ बना चुका है तो ग्रामीण समुदाय के लिए कम्युनिटी रेडियो का आगमन हुआ। भारत जैसे विशाल जनसंख्या और भौगोलिक ताना-बाना वाले इस महादेश के लिए कम्युनिटी रेडियो एक आवश्यकता है। सूचना का विस्फोट हो रहा है लेकिन गांव और आदिवासी अंचलों में रहने वाले अधिसंख्य लोगों सूचनाविहिन थे। ऐसे में कम्युनिटी रेडियो ने उन्हें जोड़ा। ना केवल जोड़ा बल्कि उनकी जीवनशैली, साहित्य-संस्कृति, परम्परा का दस्तावेजीकरण करने में सहायता की। कम्युनिटी रेडियो के भारत में आगमन के समय शैक्षिक परिसरों तक सीमित था लेकिन भारत सरकार ने इसे व्यापक बनाया और गांव तथा ग्रामीणों की आवाज बनने में सहायता की। हालांकि अभी कम्युनिटी रेडियो विस्तार के दौर में है लेकिन जल्द ही वह हर गांव, हर ग्रामीण की आवाज बन चुका होगा।

कम्युनिटी रेडियो को लेकर समाज आज भी भ्रमजाल में है। इसका एक बड़ा कारण है कि इससे संबंधित साहित्य एवं जानकारी का अभाव होना। हालांकि सामुदायिक रेडियो के विस्तार के लिए भारत सरकार अनेक स्तरों पर प्रयास कर रही है कि लोगों को अधिकाधिक जानकारी मिल सके ताकि वे कम्युनिटी रेडियो की स्थापना एवं संचालन सहजता से कर सकें। कम्युनिटी रेडियो एक ऐसा जीवंत माध्यम है। 

कम्युनिटी रेडियो की स्थापना की दिशा में मध्यप्रदेश सरकार की पहल अनोखा है। संभवत: देश का एकमात्र राज्य है जहां सुदूर आदिवासी अंचलों में आठ रेडियो संचालित हैं। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की संकल्पना को साकार करते हुए 9 सामुदायिक रेडियो की स्थापना की गई। इनमें से 8 कम्युनिटी रेडियो रेडियो आदिमजाति कल्याण विभाग मध्यप्रदेश शासन की नवाचारी संस्था ‘वन्या’ द्वारा संचालित किया जाता है। एक अन्य  कम्युनिटी रेडियो रेडियो स्वाधीनता संग्राम पर केन्द्रित प्रथम कम्युनिटी रेडियो रेडियो ‘रेडियो आजाद हिन्द’ भी मध्यप्रदेश शासन द्वारा संचालित किया जाता है। राज्य के सुदूर आदिवासी अंचलों में सूचना, शिक्षा और मनोरंजन पहुंचाने की दृष्टि और सोच के साथ स्थानीय बोली में सामुदायिक रेडियो का प्रसारण आरंभ किया गया। वर्तमान में राज्य के आदिवासी बहुल जिला झाबुआ, चंद्रशेखर आजाद नगर, जिला अलीराजपुर, खालवा जिला खंडवा, चिचोली जिला बैतूल, पातालकोट जिला छिंदवाड़ा, सेसइपुरा जिला श्योपुर, चाड़ा जिला डिंडोरी एवं नालछा जिला धार में संचालित है। सामुदायिक रेडियो के संचालन के लिए निहित उद्देश्यों को पूर्ण करते हुए स्थानीय युवाओं को रेडियो संचालन की जिम्मेदारी दी गई है। इन केन्द्रों से स्थानीय बोलियों में सूचनाओं का आदान-प्रदान, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक गतिविधियों का दस्तावेजीकरण किया जाता है। 

सामुदायिक रेडियो सुदूर ग्रामीण एवं आदिवासी अंचलों में सूचना, शिक्षा एवं मनोरंजन की बुनियादी जरूरतों को पूर्ण करने का माध्यम है। राज्य के बड़े शहरों में स्थित विभिन्न शैक्षिक परिसरों में भी कैम्पस रेडियो संचालित है। एफएम रेडियो में आरजे शिक्षित एवं प्रशिक्षित होते हैं और वे शहरी समुदाय से आते हैं जबकि सामुदायिक रेडियो के आरजे ठेठ समुदाय के बीच से आते हैं। इनके पास प्रशिक्षण तो होता है लेकिन व्यवहारिक होता है। शैक्षिक योग्यता बहुत कम होती है लेकिन ये लोग अपने समुदाय को, समुदाय की जरूरतों को और उनकी भाषा-बोली को बेहतर ढंग से समझते हैं और उसका प्रतिनिधित्व ठीक से कर पाते हैं। यही कारण है कि भारत जैसे विशाल देश में समुदाय का यह रेडियो सूचना और शिक्षा के मान से बेहद जरूरी बन गया है। मध्यप्रदेश में जिस तरह राज्य की कल्याणकारी योजनओं को सुदूर अंचल तक पहुंचाने के लिए सामुदायिक रेडियो की स्थापना की गई है, वह अन्य राज्यों के लिए एक उदाहरण की तरह है। आने वाले समय में समुदाय का यह रेडियो जन-जन की आवाज बनेगा। सामुदायिक रेडियो फैशन का नहीं बल्कि पैशन बन चुका है। 

(ये लेखक के निजी विचार हैं और वे शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं) 

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'माधवराव सप्रे के बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं ये बात'

अपने जमाने के मूर्धन्य पत्रकार माधवराव सप्रे की कर्मस्थली छत्तीसगढ़ के पेंड्रा में उनकी स्मृति में आयोजित सप्रे संवाद में मुख्य वक्ता के तौर पर हिस्सा लेने का अवसर मिला।

राजेश बादल by
Published - Thursday, 11 February, 2021
Last Modified:
Thursday, 11 February, 2021
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

अपने जमाने के मूर्धन्य पत्रकार माधवराव सप्रे की कर्मस्थली छत्तीसगढ़ के पेंड्रा में उनकी स्मृति में आयोजित सप्रे संवाद में मुख्य वक्ता के तौर पर हिस्सा लेने का अवसर मिला। हममें से कितने लोग यह जानते हैं कि महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका से 1915 में आने के कई साल पहले सप्रे जी स्वराज और स्वदेशी को स्वीकार और विदेशी का बहिष्कार आंदोलन छेड़ चुके थे। गांधी जी जिन लोगों से प्रेरित थे, उनमें से एक सप्रे जी भी थे।

दादा माखनलाल चतुर्वेदी, सेठ गोविंददास और द्वारिका प्रसाद मिश्र जैसे महानुभावों को उन्होंने संस्कारित करने का काम किया। उनके हिंदी केसरी पत्र से गोरी हुकूमत इतना खौफ खाती थी कि धोखे से पत्र के छह हजार पाठकों के पते लिए गए और उन पर दबाव डाला गया कि हिंदी केसरी खरीदना बंद करें। बाकायदा एक आदेश निकला कि हिंद केसरी पढ़ने वाले लोगों के रिश्तेदारों को नौकरी से निकाल दिया जाएगा, उनकी पेंशन बंद कर दी जाएगी और उन्हें जेल की हवा खानी पड़ेगी।

उनकी हिंदी ग्रंथमाला तो गजब की थी। जून 1908 में उन्होंने एक लेख छापा-अंगरेजी राज से हिंदुस्तान का सत्यानाश। एक अन्य लेख प्रकाशित हुआ, जिसका शीर्षक था-स्वदेशी आंदोलन और बायकॉट। इसमें लिखा था कि ईस्ट इंडिया कंपनी से भारत को कितना नुकसान हुआ। इस अंक को जब्त कर लिया गया। याद रखिए कि तब तक महात्मा गांधी भारत नहीं आए थे।

वे एक ऐसे अनोखे संपादक थे, जिन्होंने भारत में आर्थिक पत्रकारिता की नींव डाली। उन्होंने अर्थशास्त्र की प्रामाणिक शब्दावली हम लोगों को सौंपी। आर्थिक विषयों पर उनके बीस से अधिक आलेख ऐसे हैं, जो आज एक सौ पंद्रह बरस बाद भी उपयोगी हैं।

सप्रे जी के सरोकार और आज पत्रकारिता की चुनौतियों पर यह एक सार्थक संवाद रहा। रायपुर से जाने-माने पत्रकार भाई गिरीश पंकज और सुधीर शर्मा को भी गहराई से सुनने का अवसर प्राप्त हुआ। बिलासपुर के पुराने मित्र राजेश दुआ और साथी पत्रकार राजेश अग्रवाल इस यात्रा के सबब बने। पेंड्रा के जिला शिक्षा अधिकारी मनोज राय से भी शानदार मुलाकात हुई।

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मिस्टर मीडिया: आजादी के बाद पहली बार बनी है पत्रकारिता के लिए ऐसी स्थिति

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वछंदता का अंतर अब भारत का सुप्रीम कोर्ट समझा रहा है।

राजेश बादल by
Published - Friday, 29 January, 2021
Last Modified:
Friday, 29 January, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वछंदता का अंतर अब भारत का सुप्रीम कोर्ट समझा रहा है। आजादी के बाद पहली बार ऐसी स्थिति बनी है, जब पत्रकारिता पर नियंत्रण के लिए मुल्क का सर्वोच्च न्यायालय इतना संवेदनशील दिखाई दे रहा है। कुछ दिनों से लगभग रोजाना ही किसी न किसी प्रसंग में वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरुपयोग पर तीखी टिप्पणियां कर रहा है। गुरुवार को उसने 26 जनवरी की घटना के संदर्भ में सरकार से पूछा कि अगर वह इंटरनेट पर पाबंदी लगा सकती थी तो टीवी चैनलों के भड़काऊ प्रसारण को क्यों नहीं रोका गया? विचार प्रकट करने का अधिकार समाज में नफरत फैलाने की छूट नहीं देता।

इससे पहले बुधवार को उसने टीवी पत्रकारिता में कंटेंट के गिरते स्तर पर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया। इस पर चार हफ्ते में हुकूमत को उत्तर देना है। कोर्ट ने पूछा है कि अगर सरकार कोई कार्रवाई नहीं कर पा रही है तो मीडिया के लिए अलग से स्वतंत्र ट्रिब्यूनल क्यों नहीं बना देती। न्याय की इस शिखर संस्था ने इन दिनों एक याचिका पर सुनवाई के दौरान यह बात कही। इसमें कहा गया कि टेलिविजन चैनलों पर पेड न्यूज, हेट न्यूज, प्रचार समाचार और मीडिया ट्रायल का जो रूप देखने को मिल रहा है, वह खतरनाक है। इस पर नियम कानून होते हुए भी सरकार की तरफ से कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। इससे टीवी पत्रकारिता निरंकुश हो रही है।

इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय ने एक वेब सीरीज में भारतीय धार्मिक आस्था और प्रतीकों पर अभद्र टिप्पणियों पर भी गुस्सा दिखाया है। दो दिन पहले ही उसने यहां तक कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब यह नहीं है कि कोई कुछ भी बोलने के लिए आजाद है। कुछ इसी तरह की भावना इंदौर हाई कोर्ट ने भी प्रकट की है। उसने कहा कि संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी को दी है, लेकिन समाज में सद्भाव बिगाड़ने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती।

इन टिप्पणियों का क्या अर्थ निकलता है? यही कि पत्रकारिता में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का लाभ असीमित नहीं हो सकता। इसे स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं कि तमाम भारतीय खबरिया टीवी चैनल हालिया दिनों में ग़ैर जिम्मेदार हुए हैं। उनकी संपादकीय सामग्री इकतरफा और दर्शकों की प्रतिनिधि राय के खिलाफ है। वे अपनी विचारधारा की भौंडी नुमाइश करते नजर आते हैं। इससे हिन्दुस्तान के बहुरंगी ढांचे को चोट पहुंचती है। बताने की जरूरत नहीं कि ऐसे प्रसारण सरकार और न्यायपालिका को पाबंदी लगाने पर बाध्य कर रहे हैं।

पत्रकारिता अगर सरकारी धुनों पर नाचती रहे तो किसी भी हुकूमत को क्या एतराज हो सकता है। मगर न्यायपालिका की ओर से विभिन्न स्तरों पर यदि राय, व्यवस्था, निर्देश, आदेश, सुझाव और टिप्पणी की जाती है तो वह एक दस्तावेज बन जाती है और आने वाले दिनों में उस दस्तावेज का हवाला अनेक मामलों में दिया जा सकता है। उन मामलों में भी, जहां इन निर्देशों का उल्लेख आवश्यक नहीं होता। यह एक बेहद गंभीर प्रवृति की ओर इशारा है। राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर आज चैनलों के प्रबंधकों-संपादकों को संकल्प लेना होगा कि वे इस पर तत्काल सतर्कता से कार्रवाई करें मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

इन प्रपंचों ने भी पत्रकारों की साख को बहुत धक्का पहुंचाया है मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: कुछ इस तरह की चाहिए एक मीडिया काउंसिल!

यह कैसी पत्रकारिता का नमूना हम प्रस्तुत कर रहे हैं मिस्टर मीडिया!

किसान आंदोलन को पत्रकारिता से प्रमाणपत्र नहीं चाहिए मिस्टर मीडिया! 

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