रवीश कुमार बोले- मुझे पता है गुलाम की तरह काम करने वाले लोग भाजपा के समर्थक हैं

वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने मतगणना के दिन वॉट्सऐप पर मिले तीन तरह के मैसेज का किया जिक्र

Last Modified:
Friday, 24 May, 2019
Ravish Kumar

रवीश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार।।

क्या 2019 के चुनाव में मैं भी हार गया हूं?

23 मई 2019 के दिन जब नतीजे आ रहे थे, मेरे वॉट्सऐप पर तीन तरह के मैसेज आ रहे थे। अभी दो तरह के मैसेज की बात करूंगा और आख़िर में तीसरे प्रकार के मैसेज की। बहुत सारे मैसेज ऐसे थे कि आज देखते हैं कि रवीश कुमार की सूजी है या नहीं। उसका चेहरा मुरझाया है या नहीं। एक ने लिखा कि वह रवीश कुमार को ज़लील होते देखना चाहता है। डूबकर मर जाना देखना चाहता है। पंचर बनाते हुए देखना चाहता है। किसी ने पूछा कि बर्नोल की ट्यूब है या भिजवा दें। किसी ने भेजा कि अपनी शक्ल की फोटो भेज दो, ज़रा हम देखना चाहते हैं।

मैंने सभी को जीत की शुभकामनाएं दीं और लाइव कवरेज़ के दौरान इस तरह के मैसेज का ज़िक्र किया और ख़ुद पर हंसा। दूसरे प्रकार के मैसेज में यह लिखा था कि आज से आप नौकरी की समस्या, किसानों की पीड़ा और पानी की तकलीफ दिखाना बंद कर दीजिए। यह जनता इसी लायक है। बोलना बंद कर दो। क्या आपको नहीं लगता है कि आप भी रिजेक्ट हो गए हैं। आपको विचार करना चाहिए कि क्यों आपकी पत्रकारिता मोदी को नहीं हरा सकी। मैं मुग़ालता नहीं पालता। इस पर भी लिख चुका हूं कि बकरी पाल लें, मगर मुग़ालता न पालें।

2019 का जनादेश मेरे ख़िलाफ कैसे आ गया? मैंने जो पांच साल में लिखा-बोला है, क्या वह भी दांव पर लगा था? जिन लाखों लोगों की पीड़ा हमने दिखाई, क्या वह ग़लत थी? मुझे पता था कि नौजवान, किसान और बैंकों में गुलाम की तरह काम करने वाले लोग भाजपा के समर्थक हैं। उन्होंने भी मुझसे कभी झूठ नहीं बोला। सबने पहले या बाद में यही बोला कि वे नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं। मैंने इस आधार पर उनकी समस्या को खारिज नहीं किया कि वे नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं। उनकी समस्या वास्तविक थी, इसलिए दिखाई। आज एक सांसद नहीं कह सकता कि उसने पचास हज़ार से अधिक लोगों को नियुक्ति पत्र दिलवाया है। मेरी नौकरी सीरीज़ के कारण दिल्ली से लेकर बिहार तक में लोगों को नियुक्ति पत्र मिला है। कई परीक्षाओं के रिज़ल्ट निकले। उनमें से बहुतों ने नियुक्ति पत्र मिलने पर माफी मांगी कि वे मुझे गालियां देते थे। मेरे पास सैकड़ों पत्र और मैसेज के स्क्रीन शॉट पड़े हैं, जिनमें लोगों ने नियुक्ति पत्र मिलने के बाद गाली देने के लिए माफी मांगी है। इनमें से एक भी यह प्रमाण नहीं दे सकता कि मैंने कभी कहा हो कि नरेंद्र मोदी को वोट नहीं देना। यह ज़रूर कहा कि वोट अपने मन से दें, वोट देने के बाद नागरिक बन जाना।

पचास हज़ार से अधिक नियुक्ति पत्र की कामयाबी वो कामयाबी है, जो मैं मोदी समर्थकों के द्वारा ज़लील किए जाने के क्षण में भी सीने पर बैज की तरह लगाए रखूंगा। क्योंकि वे मुझे नहीं उन मोदी समर्थकों को ही ज़लील करेंगे, जिन्होंने मुझसे अपनी समस्या के लिए संपर्क किया था। नौकरी सीरीज़ का ही दबाव था कि नरेंद्र मोदी जैसी प्रचंड बहुमत वाली सरकार को रेलवे में लाखों नौकरियां निकालनी पड़ीं। इसे मुद्दा बनवा दिया। वर्ना आप देख लें कि पूरे पांच साल में रेलवे में कितनी वैकेंसी आईं और आखिरी साल में कितनी वैकैंसी आई। क्या इसकी मांग गोदी मीडिया कर रहा था या रवीश कुमार कर रहा था? प्राइम टाइम में मैंने दिखाया। क्या रेल सीरीज़ के तहत स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस जैसी ट्रेन को कुछ समयों के लिए समय पर चलवा देना मोदी का विरोध था? क्या बिहार के कालेजों में तीन साल के बीए में पांच-पांच साल से फंसे नौजवानों की बात करना मोदी विरोध था?

इन पांच सालों में मुझे करोड़ों लोगों ने पढ़ा। हज़ारों की संख्या में आकर सुना। टीवी पर देखा। बाहर मिला तो गले लगाया। प्यार दिया। उसमें नरेंद्र मोदी के समर्थक भी थे। संघ के लोग भी थे और विपक्ष के भी। बीजेपी के लोग भी थे, मगर वे चुपचाप बधाई देते थे। मैंने एक चीज़ समझी। मोदी का समर्थक हो या विरोधी, वह गोदी मीडिया और पत्रकारिता में फर्क करता है। चूंकि गोदी मीडिया के एंकर मोदी की लोकप्रियता की आड़ में मुझ पर हमला करते हैं, इसलिए मोदी का समर्थक चुप हो जाता है। भारत जैसे देश में ईमानदार और नैतिक होने का सामाजिक और संस्थागत ढांचा नहीं है। यहां ईमानदार होने की लड़ाई अकेले की है और हारने की होती है। लोग तंज करते हैं कि कहां गए सत्यवादी रवीश कुमार। कहां गए पत्रकारिता की बात करने वाले रवीश कुमार। मुझमें कमियां हैं। मैं आदर्श नहीं हूं। कभी दावा नहीं किया, लेकिन जब आप यह कहते हैं आप उसी पत्रकारिता के मोल को दोहरा रहे होते हैं, जिसकी बात मैं कहता हूं या मेरे जैसे कई पत्रकार कहते हैं।

मुझे पता था कि मैं अपने पेशे में हारने की लड़ाई लड़ रहा हूं। इतनी बड़ी सत्ता और कारपोरेट की पूंजी से लड़ने की ताकत सिर्फ गांधी में थी। लेकिन जब लगा कि मेरे जैसे कई पत्रकार स्वतंत्र रूप से कम आमदनी पर पत्रकारिता करने की कोशिश कर रहे हैं तब लगा कि मुझे कुछ ज़्यादा करना चाहिए। मैंने हिंदी के पाठकों के लिए रोज़ सुबह अंग्रेज़ी से अनुवाद कर मोदी विरोध के लिए नहीं लिखा था, बल्कि इस खुशफहमी में लिखा कि हिंदी का पाठक सक्षम हो। इसमें घंटों लगा दिए। मुझे ठीक ठीक पता था कि मैं यह लंबे समय तक अकेले नहीं कर सकता। मोदी विरोध की सनक नहीं थी। अपने पेशे से कुछ ज्यादा प्रेम था, इसलिए दांव पर लगा दिया। अपने पेश पर सवाल खड़े करने का एक जोखिम था, अपने लिए रोज़गार के अवसर गंवा देना। फिर भी जीवन में कुछ समय के लिए करके देख लिया। इसका अपना तनाव होता है, जोखिम होता है मगर जो सीखता है वह दुर्लभ है। बटुआ वाले सवाल पूछकर मैं मोदी समर्थकों के बीच तो छुप सकता हूं लेकिन आप पाठकों के सामने नहीं आ सकता।

मैंने ज़रूर सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ सबके बीच आकर बोला। आज भी बोलूंगा। आपके भीतर धार्मिक और जातीय पूर्वाग्रह बैठ गया है। आप मशीन बनते जा रहे हैं। मैं फिर से कहता हूं कि धार्मिक और जातीय पूर्वाग्रह से लैस सांप्रदायिकता आपको एक दिन मानव बम में बदल देगी। स्टूडियो में नाचते एंकरों को देख आपको भी लगता होगा कि यह पत्रकारिता नहीं है। बैंकों में ग़ुलाम की तरह काम करने वाली सैंकड़ों महिला अफसरों ने अपने गर्भ गिर जाने से लेकर शौचालय का भय दिखाकर काम कराने का पत्र क्या मुझसे मोदी का विरोध कराने के लिए लिखा था? उनके पत्र आज भी मेरे पास पड़े हैं। मैंने उनकी समस्या को आवाज़ दी और कई बैंक शाखाओं में महिलाओं के लिए अलग से शौचलय बने। मैंने मोदी का एजेंडा नहीं चलाया। वो मेरा काम नहीं था। अगर आप मुझसे यही उम्मीद करते हैं तब भी यही कहूंगा कि एक बार नहीं सौ बार सोच लीजिए।

ज़रूर पत्रकारिता में भी ‘अतीत के गुनाहों की स्मृतियां’ हैं, जिन्हें मोदी वक्त-बेवक्त ज़िंदा करते रहते हैं, लेकिन वह भूल जा रहे हैं कि उनके समय की पत्रकारिता का मॉडल अतीत के गुनाहों पर ही आधारित है। मैं नहीं मानता कि पत्रकारिता हारी है। पत्रकारिता ख़त्म हो जाएगी, वह अलग बात है। जब पत्रकारिता ही नहीं बची है तो फिर आप पत्रकारिता के लिए मेरी ही तरफ क्यों देख रहे हैं। क्या आपने संपूर्ण समाप्ति का संकल्प लिया है। जब मैं अपनी बात करता हूं तो उसमें वे सारे पत्रकारों की भी बातें हैं, जो संघर्ष कर रहे हैं। ज़रूर पत्रकारिता संस्थानों में संचित अनैतिक बलों के कारण पत्रकारिता समाप्त हो चुकी है। उसका बचाव एक व्यक्ति नहीं कर सकता है। ऐसे में हम जैसे लोग ही क्या कर लेंगे। फिर भी ऐसे काम को सिर्फ मोदी विरोध के चश्मे से देखा जाना ठीक नहीं होगा। यह अपने पेशे के भीतर आई गिरावट का विरोध ज्यादा है। यह बात मोदी समर्थकों को इस दौर में समझनी होगी। मोदी का समर्थन अलग है। अच्छी पत्रकारिता का समर्थन अलग है। मोदी समर्थकों से भी अपील करूगा कि आप गोदी मीडिया का चैनल देखना बंद कर दें। अख़बार पढ़ना बंद कर दें। इसके बग़ैर भी मोदी का समर्थन करना मुमकिन है।

बहरहाल, 23 मई 2019 को आई आंधी गुज़र चुकी है, लेकिन हवा अभी भी तेज़ चल रही है। नरेंद्र मोदी ने भारत की जनता के दिलो-दिमाग़ पर एकछत्र राज कायम कर लिया है। 2014 में उन्हें मन से वोट मिला था, 2019 में तन और मन से वोट मिला है। तन पर आई तमाम तक़लीफों को झेलते हुए लोगों ने मन से वोट किया है। उनकी इस जीत को उदारता के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए। मैं भी करता हूं। जन को ठुकरा कर आप लोकतांत्रिक नहीं हो सकते हैं। उस ख़ुशी में भविष्य के ख़तरे देखे जा सकते हैं लेकिन उसे देखने के लिए भी आपको शामिल होना होगा। यह समझने के लिए भी शामिल होना चाहिए कि आख़िर वह क्या बात है जो लोगों को मोदी बनाती है। लोगों को मोदी बनाने का मतलब है अपने नेता में एकाकार हो जाना। एक तरह से विलीन हो जाना। यह अंधभक्ति कही जा सकती है, मगर इसे भक्ति की श्रेष्ठ अवस्था के रूप में भी देखा जाना चाहिए। मोदी के लिए लोगों का मोदी बन जाना उस श्रेष्ठ अवस्था का प्रतीक है। घर-घर मोदी की जगह आप जन-जन मोदी कह सकते हैं।

मैं हमेशा से कहता रहा हूं कि 2014 के बाद से इस देश के अतीत और भविष्य को समझने का संदर्भ बिन्दु( रेफरेंस प्वाइंट) बदल गया है। चुनाव से पहले ही प्रधानमंत्री मोदी नए भारत की बात करने लगे थे। वह नया भारत उनकी सोच का भारत बन गया है। हर जनादेश में संभावनाएं और आशंकाएं होती हैं। इससे मुक्त कोई जनादेश नहीं होता है। जनता ने तमाम आशंकाओं के बीच अगर एक संभावना को चुना है तो इसका मतलब है कि उसमें उन आशंकाओं से निपटने का पर्याप्त साहस भी है। वह भयभीत नहीं है। न तो यह भय का जनादेश है और न ही इस जनादेश से भयभीत होना चाहिए। ऐतिहासिक कारणों से जनता के बीच कई संदर्भ बिंदु पनप रहे थे। दशकों तक उसने इसे अपने असंतोष के रूप में देखा। बहुत बाद में वह अपने इस अदल-बदल के असंतोष से उकता गई। उसने उस विचार को थाम लिया, जहां अतीत की अनैतिकताओं पर सवाल पड़े हुए थे। जनता ‘अतीत के असंतोषों की स्मृतियों’ से उबर नहीं पाई है। इस बार असंतोष की उस स्मृति को विचारधारा के नाम पर प्रकट कर आई है, जिसे नया भारत कहा जा रहा है।

मैंने हमेशा कहा है कि नरेंद्र मोदी का विकल्प वही बनेगा, जिसमें नैतिक शक्ति होगी। आप मेरे लेखों में नैतिक बल की बात देखेंगे। बेशक नरेंद्र मोदी के पक्ष में अनैतिक शक्तियों और संसाधनों का विपुल भंडार है, मगर जनता उसे ‘अतीत के असंतोष की स्मृतियों’ के गुण-दोष की तरह देखती है। बर्दाश्त कर लेती है। नरेंद्र मोदी उस ‘अतीत के असंतोष की स्मृतियों’ को ज़िंदा भी रखते हैं। आप देखेंगे कि वह हर पल इसे रेखांकित करते रहते हैं। जनता को ‘अतीत के वर्तमान’ में रखते हैं। जनता को पता है कि विपक्ष में भी वही अनैतिक शक्तियां हैं जो मोदी पक्ष में हैं। विपक्ष को लगा कि जनता दो समान अनैतिक शक्तियों में से उसे भी चुन लेगी। इसलिए उसने बची-खुची अनैतिक शक्तियों का ही सहारा लिया। नरेंद्र मोदी ने उन अनैतिक शक्तियों को भी कमज़ोर और खोखला भी कर दिया। विपक्ष के नेता बीजेपी की तरफ भागने लगे। विपक्ष मानव और आर्थिक संसाधन से ख़ाली होने लगा। दोनों का आधार अनैतिक शक्तियां ही थीं, लेकिन इसी परिस्थिति ने विपक्ष के लिए नया अवसर उपलब्ध कराया। उसे चुनाव की चिंता छोड़ अपने राजनीतिक और वैचारिक पुनर्जीवन को प्राप्त करना था, उसने नहीं किया।

विपक्ष को अतीत के असंतोष के कारणों के लिए माफी मांगनी चाहिए थी। नया भरोसा देना था कि अब से ऐसा नहीं होगा। इस बात को ले जाने के लिए तेज़ धूप में पैदल चलना था। उसने यह भी नहीं किया। 2014 के बाद चार साल तक घर बैठे रहे। जनता के बीच नहीं गए। उसकी समस्याओं पर तदर्थ रूप से बोले और घर आकर बैठ गए। 2019 आया तो बची-खुची अनैतिक शक्तियों के समीकरण से वह एक विशालकाय अनैतिक शक्तिपुंज से टकराने की ख्वाहिश पाल बैठा। विपक्ष को समझना था कि अलग-अलग दलों की राजनीतिक प्रासंगिकता समाप्त हो चुकी है। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी या राष्ट्रीय जनता दल के ज़रिये लोकतंत्र में जो सामाजिक संतुलन आया था उसकी आज कोई भूमिका नहीं रही।

बेशक इन दलों ने समाज के पिछड़े और वंचित तबकों को सत्ता-चक्र घुमाकर शीर्ष पर लाने का ऐतिहासिक काम किया, लेकिन इसी क्रम में वे दूसरे पिछड़े और वंचितों को भूल गए। इन दलों में उनका प्रतिनिधित्व उसी तरह बेमानी हो गया जिस तरह अन्य दलों में होता है। अब इन दलों की प्रासंगिकता नहीं बची है तो दलों को भंग करने का साहस भी होना चाहिए। अपनी पुरानी महत्वकांक्षाओं को भंग कर देना था। भारत की जनता अब नए विचार और नए दल का स्वागत करेगी तब तक वह नरेंद्र मोदी के विचार पर चलेगी।

समाज और राजनीति का हिंदूकरण हो गया है। यह स्थायी रूप से हुआ है, मैं नहीं मानता। उसी तरह जैसे बहुजन शक्तियों का उभार स्थायी नहीं था, इसी तरह से यह भी नहीं है। यह इतिहास का एक चक्र है, जो घूमा है। जैसे मायावती सवर्णों के समर्थन से मुख्यमंत्री बनी थी, उसी तरह आज संघ बहुजन के समर्थन से हिंदू राष्ट्र बना रहा है। जो सवर्ण थे वो अपनी जाति की पूंजी लेकर कभी सपा-बसपा और राजद के मंचों पर अपना सहारा ढूंढ रहे थे। जब वहां उनकी वहां पूछ बढ़ी तो बाकी बचा बहुजन सर्वजन के बनाए मंच पर चला गया।

बहुजन राजनीति ने कब जाति के ख़िलाफ़ राजनीतिक अभियान चलाया। जातियों के संयोजन की राजनीति थी तो संघ ने भी जातियों के संयोजन की राजनीति खड़ी कर दी। बेशक क्षेत्रिय दलों ने बाद में विकास की भी राजनीति की और कुछ काम भी किया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर के लिए अपनी भूमिका को हाईवे बनाने तक सीमित कर गए। चंद्रभान प्रसाद की एक बात याद आती है। वह कहते थे कि मायावती क्यों नहीं आर्थिक मुद्दों पर बोलती हैं, क्यों नहीं विदेश नीति पर बोलती हैं। यही हाल सारे क्षेत्रीय दलों का है। वह प्रदेश की राजनीति तो कर लेते हैं मगर देश की राजनीति नहीं कर पाते हैं।

बहुजन के रूप में उभरकर आए दल अपनी विचारधारा की किताब कब का फेंक चुके हैं। उनके पास अंबेडकर जैसे सबसे तार्किक व्यक्ति हैं लेकिन अंबेडकर अब प्रतीक और अहंकार का कारण बन गए हैं। छोटे-छोटे गुट चलाने का कारण बन गए हैं। हमारे मित्र राकेश पासवान ठीक कहते हैं कि दलित राजनीति के नाम पर अब संगठनों के राष्ट्रीय अध्यक्ष ही मिलते हैं, राजनीति नहीं मिलती है। बहुजन राजनीति एक दुकान बन गई है जैसे गांधीवाद एक दुकान है। इसमें विचारधारा से लैस व्यक्ति आज तक राष्ट्रीय स्तर पर एक राजनैतिक विकल्प नहीं बना पाया। वह दल नहीं बनाता है। अपने हितों के लिए संगठन बनाता है। अपनी जाति की दुकान लेकर एक दल से दूसरे दल में आवागमन करता है। उसके भीतर भी अहंकार आ गया। वह बसपा या बहुजन दलों की कमियों पर चुप रहने लगा।

वह अहंकार ही था कि मेरे जैसों के लिखे को भी जाति के आधार पर खारिज किया जाने लगा। मैं अपनी प्रतिबद्धता से नहीं हिला, लेकिन प्रतिबद्धता की दुकान चलाने वाले अंबेडकर के नाम का इस्तेमाल हथियार की तरह करने लगे। वे लोगों को आदेश देने लगे कि किसे क्या लिखना चाहिए। जिस तरह भाजपा के समर्थक राष्ट्रवाद का सर्टिफिकेट बांटते हैं, उसी तरह अंबेडकरवादियों में भी कुछ लोग सर्टिफिकेट बांटने लगे हैं। हमें समझ लेना चाहिए कि बहुजन पक्ष में कोई कांशीराम नहीं है। कांशीराम की प्रतिबद्धता का मुकाबला नहीं है। वह वैचारिक प्रतिबद्धता थी। अब हमारे पास प्रकाश आंबेडकर हैं जो अंबेडकर के नाम पर छोटे मकसद की राजनीति करते हैं। यही हाल लोहिया का भी हुआ है। जो अंबेडकर को लेकर प्रतिबद्ध हैं उनकी भी हालत गांधी को लेकर प्रतिबद्ध रहने वाले गाधीवादियों की तरह है। दोनों हाशिये पर जीने के लिए अभिशप्त हैं। विकल्प गठजोड़ नहीं है। विकल्प विलय है। पुनर्जीवन है। अगले चुनाव के लिए नहीं है। भारत के वैकल्पिक भविष्य के लिए है।

आपने देखा होगा कि इन पांच सालों में मैंने इन दलों पर बहुत कम नहीं लिखा। लेफ्ट को लेकर बिल्कुल ही नहीं लिखा। मैं मानता हूं कि वाम दलों की विचारधारा आज भी प्रासंगिक हैं मगर उनके दल और उन दलों में अपना समय व्यतीत कर रहा राजनीतिक मानवसंसाधन प्रासंगिक नहीं हैं। उसकी भूमिका समाप्त हो चुकी है। वह सड़ रहा है। उनके पास सिर्फ कार्यालय बचे हैं। काम करने के लिए कुछ नहीं बचा है। वाम दलों के लोग शिकायत करते रहते थे कि आपके कार्यक्रम में लेफ्ट नहीं होता है। क्योंकि दल के रूप में उसकी भूमिका समाप्त हो चुकी थी। बेशक महाराष्ट्र में किसान आंदोलन खड़ा करने का काम बीजू कृष्णन जैसे लोगों ने किया। यह उस विचारधारा की उपयोगिता थी। न कि दल की। दल को भंग करने का समय आ गया है। नया सोचने का समय आ गया है। मैं दलों की विविधता का समर्थक हूं, लेकिन उपयोगिता के बग़ैर वह विविधता किसी काम की नहीं होगी। यह सारी बातें कांग्रेस पर भी लागू होती है। भाजपा के कार्यकर्ताओं में आपको भाजपा दिखती है। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में आपको कांग्रेस छोड़ सबकुछ दिखता है। कांग्रेस चुनाव लड़ना छोड़ दे या चुनाव को जीवन-मरण के प्रश्न की तरह न लड़े। वह कांग्रेस बने।

कांग्रेस नेहरू का बचाव नहीं कर सकी। वह पटेल से लेकर बोस तक का बचाव नहीं कर सकी। आज़ादी की लड़ाई की विविधता और खूबसूरती से जुड़ी ‘अतीत की स्मृतियों’ को ज़िंदा नहीं कर पाई। गांधी के विचारों को खड़ा नहीं कर पाई। आज आप भाजपा के एक सामान्य कार्यकर्ता से दीनदयाल उपाध्याय के बारे में ग़लत टिप्पणी कर दीजिए वह अपनी तरह से सौ बातें बताएंगे, पांच साल में कांग्रेस पार्टी नेहरू को लेकर समानांतर विमर्श पैदा नहीं कर पाई, मैं इसी एक पैमाने से कांग्रेस को ढहते हुए देख रहा था। राजनीति विचारधारा की ज़मीन पर खड़ी होती है, नेता की संभावना पर नहीं। एक ही रास्ता बचा है। भारत के अलग अलग राजनीतिक दलों में बचे मानव संसाधान को अपना अपना दल छोड़ कर किसी एक दल में आना चाहिए। जहां विचारों का पुनर्जन्म हो, नैतिक बल का सृजन हो और मानव संसाधन का हस्तांतरण। यह बात 2014 में भी लोगों से कहा था। फिर खुद पर हंसी आई कि मैं कौन सा विचारक हूं जो यह सब कह रहा हूं। आज लिख रहा हूं।

इसके बाद भी विपक्ष को लेकर सहानुभूति क्यों रही। हालांकि उनके राजनीतिक पक्ष को कम ही दिखाया और उस पर लिखा बोला क्योंकि 2014 के बाद हर स्तर पर नरेंद्र मोदी ही प्रमुख हो गए थे। सिर्फ सरकार के स्तर पर ही नहीं, सांस्कृतिक से लेकर धार्मिक स्तर पर मोदी के अलावा कुछ दिखा नहीं और कुछ था भी नहीं। जब भारत का 99 प्रतिशत मीडिया लोकतंत्र की मूल भावना को कुचलने लगा तब मैंने उसमें एक संतुलन पैदा करने की कोशिश की। असहमति और विपक्ष की हर आवाज़ का सम्मान किया। उसका मज़ाक नहीं उड़ाया। यह मैं विपक्षी दलों के लिए नहीं कर रहा था बल्कि अपनी समझ से भारत के लोकतंत्र को शर्मिंदा होने से बचा रहा था। मुझे इतना बड़ा लोड नहीं लेना चाहिए था क्योंकि यह मेरा लोड नहीं था फिर भी लगा कि हर नागरिक के भीतर और लोकतंत्र के भीतर विपक्ष नहीं होगा तो सबकुछ खोखला हो जाएगा। मेरी इस सोच में भारत की भलाई की नीयत थी।

नरेंद्र मोदी की प्रचंड जीत हुई है। मीडिया की जीत नहीं हुई है। हर जीत में एक हार होती है। इस जीत में मीडिया की हार हुई है। उसने लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन नहीं किया। आज गोदी मीडिया के लोग मोदी को मिली जीत के सहारे ख़ुद की जीत बता रहे हैं। दरअसल उनके पास सिर्फ मोदी बचे हैं। पत्रकारिता नहीं बची है। पत्रकारिता का धर्म समाप्त हो चुका है। मुमकिन है भारत की जनता ने पत्रकारिता को भी खारिज कर दिया हो। उसने यह भी जनादेश दिया हो कि हमें मोदी चाहिए, पत्रकारिता नहीं। इसके बाद भी मेरा यकीन उन्हीं मोदी समर्थकों पर है। वे मोदी और मीडिया की भूमिका में फर्क देखते हैं। समझते हैं। शायद उन्हें भी ऐसा भारत नहीं चाहिए, जहां जनता का प्रतिनिधि पत्रकार अपने पेशेवर धर्म को छोड़ नेता के चरणों में बिछा नज़र आए। मुझे अच्छा लगा कि कई मोदी समर्थकों ने लिखा कि हम आपसे असहमत हैं, मगर आपकी पत्रकारिता के कायल हैं। आप अपना काम उसी तरह से करते रहिएगा। ऐसे सभी समर्थकों का मुझ में यकीन करने के लिए आभार। मेरे कई सहयोगी जब चुनावी कवरेज के दौरान अलग-अलग इलाकों में गए तो यही कहा कि मोदी फैन भी तुम्हीं को पढ़ते और लिखते हैं। संघ के लोग भी एक बार चेक करते हैं कि मैंने क्या बोला। मुझे पता है कि रवीश नहीं रहेगा तो वे रवीश को मिस करेंगे।

दो साल पहले दिल्ली में रहने वाले अस्सी साल के एक बुज़ुर्ग ने मुझे छोटी सी गीता भेजी। लंबा सा पत्र लिखा और मेरे लिए लंबे जीवन की कामना की। आग्रह किया कि यह छोटी सी गीता अपने साथ रखूं। मैंने उनकी बात मान ली। अपने बैग में रख लिया। जब लोगों ने कहा कि अब आप सुरक्षित नहीं हैं। जान का ख़्याल रखें तो आज उस गीता को पलट रहा था। उसका एक सूत्र आपसे साझा कर रहा हूं।

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि, तत: स्वधर्मं कीर्ति च हित्वा पापमवाप्स्यसि।।

मुझे प्यार करते रहिए। मुझे ज़लील करने से क्या मिलेगा। आपका ही स्वाभिमान टूटेगा कि इस महान भारत में आप एक पत्रकार का साथ नहीं दे सके। मेरे जैसों ने आपको इस अपराध बोध से मुक्त होने का अवसर दिया है। यह अपराध बोध आप पर उसी तरह भारी पड़ेगा, जैसे आज विपक्ष के लिए उसकी अतीत की अनैतिकताएं भारी पड़ रही हैं। इसलिए आप मुझे मज़बूत कीजिए। मेरे जैसों के साथ खड़े होइये। आपने मोदी को मज़बूत किया। आपका ही धर्म है कि आप पत्रकारिता को भी मज़बूत करें। हमारे पास जीवन का दूसरा विकल्प नहीं है। होता तो शायद आज इस पेशे को छोड़ देता। उसका कारण यह नहीं कि हार गया हूं। कारण यह है कि थक गया हूं। कुछ नया करना चाहता हूं। लेकिन जब तक हूं, तब तक तो इसी तरह करूंगा। क्योंकि जनता ने मुझे नहीं हराया है। मोदी को जिताया है। प्रधानमंत्री मोदी को बधाई।

साभार: https://naisadak.org/is-2019-mandate-is-against-me-also/

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

मिस्टर मीडिया: जिंदगी का गणित नहीं, अर्थशास्त्र भी समझना जरूरी है

अक्सर हम जिंदगी में रिश्तों का गणित नहीं समझ पाते, उमर भर पेट के भूगोल में उलझे रहते हैं

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Wednesday, 26 June, 2019
Last Modified:
Wednesday, 26 June, 2019
Rajesh-Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

अक्सर हम जिंदगी में रिश्तों का गणित नहीं समझ पाते। उमर भर पेट के भूगोल में उलझे रहते हैं। अलबत्ता अर्थशास्त्र से बचते रहते हैं। पैसा कमाना चाहते हैं, लेकिन उसे खर्च करने और एक और एक मिलाकर ग्यारह करना अथवा दो दूनी चार करना सबके बस की बात नहीं।

हममें से कई लोग जीवन भर बेशुमार दौलत कमाते हैं, लेकिन हथेली हरदम खाली रहती है और कुछ ऐसे भी हैं, जो कम कमाते हैं, मगर उनकी अंटी में आड़े वक्त के लिए मुद्राएं भरपूर होती हैं। कारण हमारा समाज है, जो हमें जीवन में गणित का ज्ञान तो देता है, लेकिन जेब में बंद जिंदगी का तिलिस्म दिमाग से दूर रहता है। इसी कारण अर्थ नीति, बजट और आर्थिक चुनौतियों की बारीकियां बड़े-बड़े पत्रकारों के ऊपर से निकल जाती हैं।

इस बार इस कॉलम की शुरुआत भले ही आपको दार्शनिक अंदाज में लग रही होगी, पर यह सच्चाई है। हमारी इस बुनियादी मानसिक संरचना का असर पत्रकारिता के पेशे पर भी पड़ता है। अखबारों का व्यापार पन्ना हम चलताऊ अंदाज में देखकर पलट देते हैं और टेलिविजन पर कारोबारी खबरों को हम बिजनेस चैनलों की ठेकेदारी मान लेते हैं। आम खबरिया चैनलों में अर्थ जगत के समाचार बड़े बेमन से लिए जाते हैं। रेडियो पर भी मनी मंत्र जैसे कार्यक्रम उपेक्षित ही होते हैं। ऐसी सूरत में देश के बजट को गहराई से समझने वाले पत्रकार रेडियो, समाचारपत्र और टेलिविजन चैनलों के न्यूजरूम में न के बराबर ही होते हैं। मुल्क की आर्थिक सेहत पर इसका कितना नुकसान होता है, हम नहीं जानते।

चंद रोज बाद देश का बजट संसद में पेश होगा। दुनिया भर के देशों की इस बजट पर नजर है। बीते कुछ बरस भारत की आर्थिक सेहत के मद्देनजर बड़े मुश्किल भरे थे। सारे संसार की धुरी पर इन दिनों कारोबारी चकरी घूम रही है और हमारे मीडिया के तमाम रूपों में इस बजट को लेकर अभी तक कोई चिंता नहीं दिखाई देती। किसी किस्म का गंभीर और सिलसिलेवार मंथन नहीं होता दिखता।

देश का किसान, खेती के अलग-अलग रूप,  मध्यवर्ग, सरकारी कर्मचारी, बड़े उद्योगपति, मंझोले कारोबारी, छोटे दुकानदार, गरीब, अमीर, शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, पर्यावरण, सुरक्षा, बेरोजगारी, महिलाओं और नौजवानों के मसले, आयात, निर्यात, बैंक, कर्ज़, खेल, विज्ञान, अंतरिक्ष, हथियार, टीवी इंडस्ट्री, अख़बार, औद्योगिक उत्पादन, सब कुछ इस बजट से नियंत्रित-प्रभावित होता है। फिर भी छोटे परदे और अखबारों में कोई धारावाहिक बजट श्रृंखला अभी तक नहीं दिखाई दे रही है।

बरसों से ऐसा ही देख रहा हूं। अपने राष्ट्र की जेब के हाल से हम इतने उदासीन क्यों हैं? क्या मीडिया के मूर्धन्य संपादक-मालिक इसे नहीं जान रहे? नहीं कहता कि हर पत्रकार को आर्थिक जानकार होना चाहिए, मगर अपने वित्तीय चेहरे की चमक को लेकर इतनी उदासीनता भी खतरे से खाली नहीं। इसे आपको समझना पड़ेगा मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: अब तो हमारे मीडिया महारथियों को भी लाज नहीं आती

मिस्टर मीडिया: यह भारतीय कानून का पुलिस-प्रशासन और सियासत के लिए फरमाइशी चेहरा है

मिस्टर मीडिया: ग़ैरज़िम्मेदारी के 3 उदाहरण भारतीय मीडिया के औसत चरित्र को उजार करते हैं

मिस्टर मीडिया: सरोकारों वाले सफर पर साख का विकराल संकट

आप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

 

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

पत्रकारों की दुनिया में ये 3 शब्द बहुत मायने रखते हैं, पर अब इनका मतलब ही खत्म हो गया

बहुत सारे वरिष्ठ पत्रकार अब अपने को नए माहौल में ढाल नहीं पा रहे हैं

संतोष भारतीय by संतोष भारतीय
Published - Monday, 24 June, 2019
Last Modified:
Monday, 24 June, 2019
Santosh Bhartiya

संतोष भारतीय, वरिष्ठ पत्रकार।।

पत्रकारिता की परिभाषाएं और उदाहरण अब बिल्कुल बदल गए हैं। बहुत सारे पत्रकार अब अपने को नए माहौल में ढाल नहीं पा रहे हैं, क्योंकि उन्होंने जो सीखा, वह आज बेकार हो गया है। अपनी पूरी जिंदगी उनके सामने सिद्धांतों का पीछा करने की कहानी है और वह सिद्धांत बहुत साधारण हैं। हमारी यानी पत्रकारों की दुनिया में 3 शब्द बहुत मायने रखते हैं। रिपोर्ट, ब्रेकिंग न्यूज और स्कूप। आज पत्रकारों के संस्थानों में या फिर जो लोग टीवी पत्रकारिता कर रहे हैं, वे इन शब्दों का अलग-अलग मतलब समाप्त कर चुके हैं।

रिपोर्ट वह होती है, जिसके तथ्य सभी के लिए उपलब्ध होते हैं। यह पत्रकारों के ऊपर होता है कि वह सभी तथ्य अपनी रिपोर्ट में शामिल करें या फिर कुछ को शामिल करें और कुछ को छोड़ दें। लेकिन अक्सर देखते हैं कि रिपोर्ट में बहुत से तथ्य निर्मित किए जाते हैं, जो वास्तविकता से थोड़े अलग होते हैं। कभी-कभी यह तथ्य पत्रकार की राजनीतिक विचारधारा के नजदीक होते हैं। होना यह चाहिए कि रिपोर्ट सत्य पर आधारित हो और विचारधारा के आधार पर एडिट पेज का लेख हो।

दूसरा शब्द है ब्रेकिंग न्यूज़। इसका मतलब होता है कि कोई खबर यदि सबसे पहले किसी न्यूज चैनल के पास आए तो वह उसे सबसे पहले दिखाए और उसे ब्रेकिंग न्यूज कहे। लेकिन एक ही खबर किसी एक चैनल पर आई और अचानक वह चैनल की ब्रेकिंग न्यूज़ बन गई। शाम तक वह खबर ब्रेकिंग न्यूज के रूप में ही अधिकांश चैनल्स पर आती रही। दर्शक यह समझ ही नहीं पाता कि किस चैनल ने न्यूज ब्रेक की है और किस पत्रकार के हिस्से में इसका श्रेय जाता है। सभी चैनल एक साथ खबर को ब्रेक करने का श्रेय लेते हैं। शाम तक एक ही खबर को ब्रेकिंग न्यूज में चलाना दर्शकों के साथ अन्याय है, जिसका ध्यान कोई न्यूज चैनल नहीं रखता।

तीसरा शब्द है स्कूप। इस शब्द का आजकल कोई महत्व नहीं रह गया। अब ऐसे पत्रकार खासकर न्यूज चैनल में नहीं हैं, जो स्कूप कर सकें, क्योंकि इसके लिए जिस मेहनत, जैसा ज्ञान और जैसी विधा चाहिए, वह कहीं छिप गई है। प्रिंट के अलावा टेलिविजन में तो पत्रकार का कोई महत्व रह गया है, ऐसा लगता नहीं है। न्यूज एंकर ही पत्रकार की परिभाषा हो गया है। अगर हम देखें कि कितने न्यूज एंकर हैं, जिनके खाते में 10 या 20 रिपोर्ट भी हैं, तो यह संख्या काफी कम है, इसीलिए उनके सवाल भी बहुत ही हल्की और सतही होते हैं। इनका एक ही काम होता है कि इन्होंने यह कहा, अब आपका इसके ऊपर क्या कहना है। दुर्भाग्य की बात है कि अब विषय का ज्ञान, विषय के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पहलू के बारे में जानना अब आवश्यक नहीं है।

20 साल पहले तक पत्रकार अपने ज्ञान, अपनी मेहनत और अपनी रिपोर्ट की सारगर्भित के लिए जाना जाता था, अब वह अपनी वाकपटुता के लिए जाना जाता है। इसलिए पत्रकारिता अब लोकतंत्र के चौथे खंभे की जगह मनोरंजन के लिए ज्यादा जानी जाती है। पहले अगर हम गलती से गलत रिपोर्ट कर देते थे तो पाठक से क्षमा मांगते थे, लेकिन अब बहुत सारे न्यूज चैनल घंटों के हिसाब से गलत रिपोर्ट खासकर तथ्यात्मक गलती करते रहते हैं और एक बार भी दर्शक से क्षमा नहीं मांगते, बल्कि अपनी उस गलती को बार-बार दोहराकर उसे और पुख्ता करते हैं।

शायद इसलिए अब किसी भी रिपोर्ट का उतना असर नहीं होता, जितना होना चाहिए। फॉलोअप रिपोर्ट तो अब सपना हो गई है। पत्रकारिता में इतनी ज्यादा जलन हो गई है कि किसी दूसरे पत्रकार का या किसी रिपोर्ट का अस्तित्व मानना ही बंद हो गया है। मैं जानता हूं कि इन बातों का लिखना अब कोई महत्व नहीं रखता, क्योंकि आज पत्रकारिता की परिभाषा नए सिरे से लिखी जा रही है और नए सिरे से लिखी जाने वाली यह परिभाषा बहस का केंद्र बनने वाली नहीं है। कभी पीआर जर्नलिज्म को बहुत ही हेय दृष्टि से देखा जाता था, लेकिन अब यह सबसे ज्यादा इज्जतदार और रसूखदार शब्द है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

आप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

अजीत अंजुम ने माना कि ICU में जाने से बचा जाना चाहिए था

बिहार में खतरनाक बीमारी से कई बच्चों की हो चुकी है मौत

Last Modified:
Friday, 21 June, 2019
Ajit Anjun

एक लाइन में कहूं तो मुझे आईसीयू  में नहीं जाना चाहिए था। मैं गया भी नहीं था। मैं अपने कैमरामैन को Sri Krishna Medical College and Hospital (SKMCH) के निचले फ्लोर पर छोड़कर आईसीयू का हाल देखने गया था। जैसे ही दरवाजे के पास पहुंचा, एक नर्स ये कहते हुए तेजी से बाहर निकली और बाहर खड़े गार्ड को पूछती दिखी कि क्या तमाशा है, बच्चा मर गया, डॉक्टर साहब कहां हैं?

नर्स की बात सुनकर मेरा माथा ठनका। भीतर से जोर-जोर से रोने की आवाज आ रही थी। वो बच्चे की मां थी। मैंने तुरंत मोबाइल निकाला और बाहर कॉरिडोर में डॉक्टर को खोज रही नर्स का विडियो बनाना शुरू किया (वो विडियो इस पोस्ट के साथ है)। ये विडियो ही इस बात का सबूत है कि मैं वहां कैमरा लेकर भी नहीं गया था। मोबाइल से शूट करने के दौरान ही इशारों से रिपोर्टर को कैमरामैन बुलाने को कहा। नर्स बचाव की मुद्रा में आई। फिर मैं आईसीयू की तरफ गया। मोबाइल से ये विडियो रिकॉर्ड किया। पांच मिनट तक दरवाजे पर कैमरे का इंतजार करता रहा। भीतर से आ रहीं रोने की आवाजें मुझे विचलित करती रहीं। कैमरा आने के बाद जब मैंने डॉक्टर की गैरमौजूदगी पर रिकॉर्ड करना शुरू किया, तभी डॉक्टर आ गए। उनसे सवाल-जवाब के दौरान ही पता चला कि दूसरे आईसीयू में भी बच्चे की मौत हुई है।

डॉक्टर एश्वर्य ने जो बातें बताईं, वो हैरान करने वाली थीं। उन्होंने दवा, डॉक्टर, नर्स से लेकर सुविधाओं की कमी धाराप्रवाह होकर बताई। उन्होंने कहा कि एक सीनियर डॉक्टर के जिम्मे चार आईसीयू हैं,  जबकि इससे काफी ज्यादा डॉक्टरों की तैनाती होनी चाहिए। उन्होंने कुछ दवाओं के नाम बताए, जो दूसरे और तीसरे लेवल की जरूरी दवा हैं, लेकिन यहां नहीं हैं। उन्होंने ये भी कहा कि मैनेजर से इन दवाओं की मांग की है, लेकिन नहीं मिली हैं। नर्स के बारे में उन्होंने कहा कि यहां ट्रेंड नर्स होनी चाहिए, जबकि ये सब स्टूडेंट्स नर्स हैं।

इतना सब बताने के लिए मैंने डॉक्टर एश्वर्य की तारीफ की और ये सोचकर वहां से निकल ही रहा था कि अब मेडिकल सुपरिटेंडेंट से किल्लतों के बारे में बात करूंगा, तभी एक शख्स की दनदनाते हुए आईसीयू में इंट्री हुई। वो शख्स एक बेड पर अपने बच्चे के इलाज के लिए शोर कर रही महिला को जोर-जोर से डांटने लगा। वो कह रहा था-चुप हो जाओ, नहीं तो उठाकर फिंकवा देंगे। मुझसे फिर रहा नहीं गया। मैंने कैमरा ऑन करवाया। उस शख्स के आखिरी शब्द मेरे कैमरे में रिकार्ड हैं। मैंने उस शख्स से पूछा कि आप इस महिला को क्यों डांट रहे हैं? ये भी पूछा कि आप कौन हैं? मेरे सवाल का जवाब उस शख्स ने नहीं दिया और कैमरा बंद कराने की कोशिश की। वहां मौजूद दो परिजनों ने रोते हुए अव्यवस्था की शिकायत की। ये जानकर और देखकर मेरे भीतर थोड़ा गुस्सा था। बाद में किसी ने बताया कि वो साहब स्थानीय पत्रकार हैं और अक्सर वहां देखे जाते हैं।

आईसीयू से मैं सीधा मेडिकल सुपरिटेंडेंट के कमरे में गया। उनसे अस्पताल की कमियों पर सवाल-जवाब किया। वो मानने को तैयार नहीं थे कि किसी तरह की कोई कमी है। उल्टे डॉक्टर एश्वर्य के खिलाफ गलतबयानी के लिए कार्रवाई की बात कहने लगे। मैंने उनसे कहा कि आप मेरे साथ आईसीयू चलिए और देखिए-सुनिए कि आपके डॉक्टर ही क्या कह रहे हैं। वो मेरे साथ चलने को तैयार हुए। उनके साथ हम दो आईसीयू तक गए। दोनों में उस वक्त भी डॉक्टर नहीं थे। आईसीयू में तैनात चार में से किसी भी नर्स को ये तक नहीं पता था कि किस डॉक्टर की यहां ड्यूटी है। ये सब देखकर मेडिकल सुपरिटेंडेंट ने भी कैमरे पर माना कि ऐसी आपात स्थिति में हर हाल में डॉक्टर को होना चाहिए था। ये गलत बात है। उन्होंने ये भी माना कि अस्पताल में डॉक्टरों की कमी है। मैंने उनसे बार-बार कहा कि आप सरकार से और यहां आ रहे मंत्रियों से क्यों नहीं कह रहे कि अतिरिक्त नर्सेज और डॉक्टर यहां भेजे जाएं। उन्होंने कहा भी कि इस बारे में बात की है और डॉक्टर व नर्स आने वाले हैं।

मेरा गु्स्सा इस बात को लेकर था कि डॉक्टर, दवा और नर्स की कमी का जो काम सबसे आसानी से हो सकता है, वो अब तक क्यों नहीं हुआ है। जिस अस्पताल में सत्तर-अस्सी बच्चों की मौत हो चुकी हो, केंद्रीय मंत्रियों के दौरे हो चुके हों, वहां का आईसीयू इंचार्ज अगर कहे कि बच्चों की जान बचाने के लिए जरूरी दवा और वेंटिलेटर जैसी सुविधाएं नहीं हैं, तो गुस्सा नहीं आना चाहिए?

मुझे तब तक पता चल चुका था कि अगले दिन केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन आने वाले हैं। मैं उनसे यही सब सवाल करने के लिए रुका रहा। डॉक्टर हर्षवर्धन के मुआयने के दौरान उन्हें ये सब बताने और पूछने के लिए पांच घंटे तक अस्पताल के बरामदे में मैं खड़ा रहा। डॉक्टर एश्वर्य ने जिन दवाओं की कमी का जिक्र किया था, वो सब मैंने उनके विडियो देखकर नोट किए। हर्षवर्धन मुझे अच्छी तरह से जानते हैं, लेकिन उस वक्त मेरे लिए वो सिर्फ स्वास्थ्य मंत्री थे,  जिनसे सीधा सवाल पूछा जाना चाहिए था। मैंने उनसे पूछा भी, लेकिन उन्होंने नहीं माना। तब मैंने कहा कि आप अपने पीछे बैठे मेडिकल सुपरिटेंडेंट से पूछिए। जो सुपरिटेंडेंट साहब कल तक डॉक्टरों की कमी कबूल कर चुके थे, वो कोई भी कमी मानने को तैयार नहीं हुए।

मैं चाहता तो बहस कर सकता था, लेकिन मैंने प्रेस कॉन्फ़्रेंस की मर्यादा का ख्याल रखते हुए बात खत्म कर दी, वरना कहा जाता कि आप कोई एजेंडा लेकर आए हैं। वैसे भी ये कोई इंटरव्यू नहीं था कि मैं दस काउंटर सवाल पूछता। मैं मायूस भी हुआ कि आईसीयू के डॉक्टर से मिली जानकारी पर संज्ञान लेने की बजाय उसे हल्के में उड़ा दिया गया। मैं बदमगजी नहीं करना चाहता था, इसलिए चार-पांच सवालों के बाद चुप हो गया कि अब बाकी रिपोर्टर पूछें। वहां से चलने के बाद भी अफसोस करता रहा कि मैंने मोबाइल से विडियो निकालकर क्यों नहीं दिखाया, हंगामा होता तो होता।

खैर, अब आखिरी बात! इतना सब होने के बाद भी मैं ये मानता हूं कि मुझे आईसीयू में जाने से बचना चाहिए था। एक दिन पहले ही कई चैनलों पर आईसीयू से रिपोर्टर के वाकथ्रू चले थे। तब मुझे लगा था कि सही नहीं है। मुजफ्फरपुर जाने से पहले जब मेरे शो के दौरान आईसीयू की तस्वीरें प्ले की गई थीं, तो ऑनएयर मैंने कहा था कि आईसीयू की ऐसी तस्वीरें हम नहीं देखना चाहते, ये भी ऑनरिकॉर्ड है।

मैं जानता हूं कि आईसीयू का क्या प्रोटोकॉल होता है, लेकिन मुजफ्फरपुर जाकर लगा कि ये आईसीयू वो है ही नहीं, जिसकी छवि आपके दिमाग में है। मेरे जाने के पहले भी पचासों लोग बेरोकटोक वहां जा रहे थे और मेरे आने के बाद भी। रही बात ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों की, तो मैं नहीं कह रहा कि वो अपनी ड्यूटी में कोई कमी छोड़ रहे होंगे। कमी है तो डॉक्टरों की, नर्स की। अगर चार आईसीयू पर एक सीनियर डॉक्टर होगा तो वो कहां-कहां भागेगा। वो भी तब, जब हर बेड पर दो-दो बीमार बच्चे हों।

मेरी शिकायत, मेरा गुस्सा सिस्टम और सरकार से है कि बच्चों की मौतों का सिलसिला शुरू होने के बीस दिन बाद भी उस मेडिकल कॉलेज-अस्पताल की ऐसी हालत क्यों थी? क्यों नहीं पटना, दिल्ली या कहीं और से अतिरिक्त डॉक्टर बुला लिए गए? क्यों नहीं वहां दवा और वेंटिलेटर के पर्याप्त इंतजाम हुए? क्यों नहीं दस-बीस एंबुलेंस की तैनाती हुई? क्यों नहीं आपात स्थिति को देखते हुए दो-चार अस्थाई आईसीयू बना दिये गये?

ऐसे बीसियों सवाल मेरे जेहन में आज भी हैं। मैंने उन बच्चों के परिजनों को देखा है। वो इतने गरीब लोग थे कि कई के पास अपने बच्चे के बेजान जिस्म को घर ले जाने के लिए वाहन खर्च तक नहीं था। इसी से आप सोचिए कि जिनके पास अपने बीमार बच्चे को बचाने के लिए अस्पताल तक लाने के लिए दो-चार सौ रुपए नहीं होते, वो किस तबके के होंगे? करीब डेढ़ सौ बच्चों की मौत के बाद भयंकर गर्मी से त्रस्त वार्ड में कल कूलर लगा है। क्या कूलर के इंतजाम में बीस दिन लगने चाहिए था?

ये तो उत्तर बिहार के सबसे बड़े अस्पताल का हाल है, बाकी छोटे सरकारी अस्पतालों और पीएचसी की हालत पर अभी बात करना भी बेमानी है। इतना सब होने के बाद भी मैं आईसीयू में अपने जाने को जस्टीफाई नहीं कर रहा। आखिरी बात तो यही है कि बचा जाना चाहिए था।

(वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम की फेसबुक वॉल से)

अजीत अंजुम द्वारा रिकॉर्ड किया गया विडियो आप यहां देख सकते हैं-

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

संवेदनशीलता की बात करते संवेदन शून्य पत्रकार

मेरे प्यारे वरिष्ठ पत्रकारों, लाखों की तनख्वाह में से एक हजार के ओआरएस खरीद कर बांट दो

Last Modified:
Thursday, 20 June, 2019
Media

अतुल गुप्ता, पत्रकार।।

यहां सब कुशल मंगल है और मुजफ्फरपुर में सब कुशल मंगल हो जाने की आशा और ईश्वर से प्रार्थना करता हूं। क्योंकि आपसे, आपके चैनल से ऐसी आशा करना तो खैर व्यर्थ है ही। फिर भी एक निवेदन है कि अस्पताल में रिपोर्टिंग और वॉक थ्रू करके आप और दूसरे चैनल के लोग उन डॉक्टरों पर दबाव न बनाएं कि डॉक्टर कम हैं, वो सुनते नहीं, इलाज नहीं कर रहे, लापरवाह हैं आदि इत्यादि। उन्हें अपना काम करने दीजिए, ताकि वो समस्या पर काबू कर पाएं, न कि अपनी नौकरी बचाने में और आपके गैर संवेदनशील सवालों के जवाब देने में अपनी ऊर्जा लगाएं। अपनी टीआरपी बढ़ाने और चैनल को स्टेबल करने की कोशिश में कम से कम डाक्टरों की पेशेगत विवशताओं को समझिए। वो डाक्टर कम से कम पांच घंटे कुछ लाइनें नियमित सुनता है।

डॉ. साब देख लीजिए, सब ठीक तो है, बहुत तेज बुखार है, जल्दी सूई लगाइए। ज्यादा खून बह गया है, जल्दी करिए, हमारे मरीज को पहले देखिए आदि। कई बार लोग मारपीट पर उतर आते हैं। कई बार डॉक्टर नाराज होते हुए भी मन मसोसकर इलाज करता है। उस पर स्थानीय लोगों, नेताओं, पत्रकारों की सिफारिशें भी देखनी होती हैं। जरा सोचिए! एक डॉक्टर के साथ ये समस्याएं सामान्य हैं, लेकिन डॉक्टर दबता या डरता कब है, उखड़ता कब है, नाराज कब होता है? बड़े विचारणीय प्रश्न हैं।

इन प्रश्नों का उत्तर मेरे पास है और इसलिए है कि मुझे सरकारी डॉक्टरों पर प्राइवेट से ज्यादा भरोसा है। जब कोई पत्रकार या रसूखदार कहता है कि मैं तुम्हें देख लूंगा या लगाता हूं तुम्हारी खबर! या व्यावसायिक हितों के चलते अपनी मानवता को बेच देता है। वह भूल जाता है कि सवाल पूछना किससे है! दोषी किसे कहना है! एक डॉक्टर को, व्यवस्था को या फिर लाशों पर फैली टीआरपी बढ़ाने की भूख को! वो कहता है कि देश की संवेदना मर गई है और खुद इतना असंवेदनशील!!

बताते हैं कि एक चील एक बच्चे की मौत का इंतजार कर रही थी, फोटो पत्रकार ने उसकी फोटो क्लिक की और पुलित्जर अवॉर्ड जीत गया, लेकिन उस बच्चे की मौत से वो पत्रकार इतना द्रवित हुआ कि उसने आत्महत्या कर ली! और आप कर रहे हैं संवेदना की बात!! आपकी संवेदना कहां मर गई सरकार? और फिर क्या आपकी हिम्मत हुई कि एक बार भी सरकार से यही सवाल कर सकें? क्यों नहीं कर सके। क्या आपकी रिपोर्टिंग के बाद समस्या खत्म हो गई! या उस राज्य से विज्ञापन बंद होने के डर से आप सवाल नहीं कर सकते हैं?

एक आंकड़ा बाबू बैठकर बता रहे हैं कि 2014 में यही हुआ था। केंद्रीय मंत्री ने छल किया, कुछ नहीं किया। पर बाबू साहेब आप तो बिहार की माटी के हैं! आपने क्या किया? एक पैकेट ओआरएस भिजवा देते। एक साहेब केंद्रीय मंत्री से सवाल करके विडियो शेयर करके दम किए हैं कि उन्होंने सवाल किया और पत्रकारिता बचा ली और पता नहीं क्या-क्या!

मेरे प्यारे वरिष्ठ पत्रकारों, बच्चों की मौत को कम से कम न बेचो? वहां गए हैं आप तो लाख रुपए की तनख्वाह में से एक हजार के ओआरएस खरीद कर बांट दो। किसी मां-बाप को ढांढस बंधा दो। एक सवाल है, हिम्मत हो तो जवाब दीजियेगा। खुदा न खास्ता कि अगर उसी अस्पताल में आप अपने बच्चे को लेकर जाते और उन मृतकों के परिवार का कोई पत्रकार आपसे ऐसे बेहूदे सवाल पूछता और बच्चे के इलाज में मदद के बजाय देरी करवाता तो आप क्या करते? हां! आपसे ये नहीं हो पा रहा तो कृपा करके आप वो न करो, जो आप कर रहे हो।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो करने के लिए यहां क्लिक कीजिए

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

LSTV का ये शो आपको आपके 'अस्तित्व' से कराता है रूबरू

लोक सभा टीवी पर आने वाले साप्ताहिक कार्यक्रम अस्तित्व-आपका, हमारा,सबका को पूरे हुए चार साल

Last Modified:
Friday, 21 June, 2019
Abhilash Khandekar

अभिलाष खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।।

पर्यावरण का महत्व अब वे लोग भी काफी अच्छी तरह समझ रहे होंगे, जो स्वयं पर्यावरणविद नहीं हैं। इस वर्ष जिस तरह की अत्यधिक गरमी की मार ने देश को झिंझोड़कर रख दिया, उसके चलते मैं मानता हूं कि जनमानस में अब जल-संरक्षण, प्रकृति की चिंता या पर्यावरण को शुद्ध रखने के महत्व को अलग से रेखांकित करने की जरूरत (शायद) नहीं होगी। किंतु डर यह भी है कि जैसे ही वर्षा का खुशनुमा मौसम शुरू हुआ, सूर्य देवता की 'नाराजी' दूर हुई तो हम लोग फिर पर्यावरण को लगातार हो रही हानि की तरफ बेरुखी से पीठ फेर लेंगे। चर्चाए थम जाएंगी, अगली गरमी तक!

मेरे दृष्टिकोण में मीडिया में इसके लिए गंभीर और लंबे समय तक चलने वाली मुहिम की परम-आवश्यकता है। वर्ष 2015 दुनिया में पर्यावरण की दृष्टि से एक बड़ा और महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ था। उसी वर्ष पेरिस में वैश्विक जलवायु परिवर्तन की संधि हुई और दुनिया के लगभग सभी देशों ने बढ़ते तापमान और उसके दुष्परिणामों पर गंभीर चिंतन किया था। भारत ने भी इसमें बड़ी भूमिका अदा की थी।

उसी वर्ष पर्यावरण पर एक साप्ताहिक कार्यक्रम प्रस्तुत करने का मुझे अवसर मिला, जो 'अस्तित्व-आपका, हमारा, सबका' नाम से काफी लोकप्रिय साबित हुआ। जून 2015 से लोक सभा टेलिविजन पर प्रसारित हिंदी के आधा घंटे के इस कार्यक्रम ने अब चार वर्ष पूरे कर लिए हैं, जिसके दौरान करीब 150-200 एपिसोड प्रसारित हुए और सराहे गए। स्पीकर सुमित्रा महाजन के पर्यावरण के निजी प्रेम और चिंता के कारण यह टीवी शो संभव हो सका।

एक एंकर के नाते मुझे इन चार वर्षों में यह अनुभव हुआ कि पर्यावरण के बारे में लोगों के मन में उत्सुकताएं तो खूब हैं, पर उन्हें क्या करना है, इसके बारे में अधिकतर लोग अनभिज्ञ हैं। पानी बचाने का मुद्दा ही लें तो जनमानस में यह भावना ही नहीं है कि पीने के शुद्ध पानी, जिसकी भयानक समस्या मुंह बाये खड़ी हैं, को हम कैसे बचा सकते हैं। क्या रोजाना हम एक गिलास पानी, जिसे अक्सर हम पीकर झूठा छोड़ देते हैं, बचाने की जहमत नहीं उठा सकते?

जल संरक्षण पर 'अस्तित्व' कार्यक्रमों में मैंने एक बाल्टी या एक गिलास पानी एक परिवार या व्यक्ति प्रतिदिन बचा सकता है, इस पर जोर दिया। उद्देश्य यही रहा कि घर-घर में पानी बचाने की मुहिम रोजाना होती रहे और वह कारगर साबित हो। हां, नदियां, तालाब, पोखर आदि के संरक्षण पर भी कई गंभीर कार्यक्रम भी मैंने किए।

मुझे 'अस्तित्व' पर्यावरण श्रृंखला की महत्ता उस समय अधिक पता चली, जब मैंने हर वर्ष वन्य जीव सप्ताह (2-8 अक्टूबर) के दौरान कई विशेषज्ञों से ऐसे जानवरों के बारे में मेरे शो पर बात की, जिनके जीवन, उन पर मंडराने वाले खतरे, लुप्तप्रायः प्रजातियों के संरक्षण के उपाय से जुड़ी जानकारी के बारे में दर्शकों को बहुत ही सीमित जानकारी थी। लेकिन शहरों से दूरदराज के गांवों तक काफी चाव से सारे एपिसोड देखे गए। लोग ईमेल या व्यक्तिगत रूप से सकारात्मक संदेश भेजते थे। वन्यजीव यानी सिर्फ बाघ या हाथी नहीं, वरन, गोड़ावन चिड़िया (Great Indian Bustard) या सरीसर्प या फिर रंग-बिरंगी छोटी तितलियां या शर्मिला पैंगलिन भी होता हैं, जिन्हें संरक्षण की तीव्र आवश्यकता है। इस मुद्दे को तमाम दर्शकों तक प्रभावी रूप से ले जाने में 'अस्तित्व' कामयाब रहा। पर्यावरण पत्रकारिता के हिसाब से यह एक मील का पत्थर साबित हुआ, ऐसा कहा जा सकता है।

दो केंद्रीय पर्यावरण मंत्रियों ने (प्रकाश जावड़ेकर एवं स्वर्गीय अनिल दवे) 'अस्तित्व' पर आकर न सिर्फ इस तरह की पर्यावरणीय श्रृंखला की आवश्यकता पर बल दिया, वरन सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं को दर्शकों के साथ साझा किया। दवे ने तो टेरी(पर्यावरण) विश्वविद्यालय में आयोजित अस्तित्व कार्यक्रम में मेरे द्वारा पूछे प्रश्नों के बजाय छात्रों के प्रश्नों की बौछार का सामना करना पसंद किया। 'अस्तित्व' जैसा पर्यावरणीय कार्यक्रम आदर्श स्थिति में घने वनों में, नदियों के किनारे या प्रदूषित शहरों के गंदे इलाक़ों में ही होना अपेक्षित था, किंतु अधिकतर एपिसोड लोक सभा टेलिविजन के स्टूडियो में ही हुए। कुछ सीमायें जो थीं, किंतु जो चुनिंदा कार्यक्रम नर्मदा नदी, हिंडन नदी, यमुना या पुणे की मूला-मुठा नदियों के किनारे या महाराष्ट्र या मध्य प्रदेश के जंगलों में चित्रित किए गए, उनका प्रभाव दर्शकों पर काफी लंबे समय तक रहा।

वैसे छोटे पर्दे पर सुनीता नारायण या प्रो. वार्ष्णेय जैसे जानेमाने पर्यावरणविद खबरों में अक्सर दिखते हैं, किंतु अलग-अलग विषयों के जानकार जैसे अक्षिमा घाटे (शहरी यातायात), बी.सी चौधरी (कछुआ), विवेक मेनन(हाथी), डॉक्टर सतीश पांडे(पक्षियों का स्थलांतरण),  अनमोल कुमार(वन प्रबंधन), मनु भटनागर (प्राकृतिक विरासत), जगन शाह (शहरीकरण), डॉक्टर विनोद तारे (निर्मल-अविरल गंगा) या फिर रवि सिंह, डॉक्टर रणजीतसिंह और राजेश गोपाल जैसे वरिष्ठ वन्यजीव विशेषज्ञों के विचार और सुझाव सुनना दर्शकों या पर्यावरण प्रेमियों के लिए आसान नहीं होता हैं। 'चिपको' आंदेलन के नेता सुंदरलाल बहुगुणा (90) और चण्डीप्रसाद भट्ट (85) के साक्षात्कार तो लोगों ने खूब सराहे, वैसे ही जैसे मशहूर अदाकारा दिया मिर्जा का हाथी संरक्षण संबंधी शो। दिया मिर्जा वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के साथ काम करती हैं।

'अस्तित्व' पर्यावरण श्रृंखला वह एक गुलदस्ता था, जिसने एक से बढ़कर एक विशेषज्ञों को एक जगह गूंथा था और पर्यावरण संरक्षण के विभिन्न राष्ट्रीय आंदोलनों को एक सार्थक संबल प्रदान किया। मुझे लगता है कि सैकड़ों निजी टेलिविजन चैनलों की चिल्ल-पौं के बीच एक सरकारी-टाइप चैनल 'लोक सभा टीवी' ने बहुत ही संयत, शांत और गंभीर तरीके से पर्यावरण की सेवा की है।

आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो करने के लिए यहां क्लिक कीजिए

 

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

आलोक मेहता बोले, यह निरंकुशता क्या राजनीतिक सत्ता व्यवस्था के लिए शर्मनाक नहीं कही जाएगी?

समय का पहिया आगे बढ़ने के साथ सरकार और समाज द्वारा बुरी बातें ही नहीं, कई बार अच्छी सलाह भी भुला दी जाती हैं

आलोक मेहता by आलोक मेहता
Published - Thursday, 20 June, 2019
Last Modified:
Thursday, 20 June, 2019
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।

भारत के लोकतांत्रिक चुनाव एवं प्रगति की रफ्तार से जहां संपूर्ण विश्व में भारत की सराहना तथा एक तरह की ईर्ष्यानुमा प्रतियोगिता हो रही है, वहीं उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे प्रदेशों में पुलिस अधिकारियों अथवा सिपाहियों द्वारा मनमाने एवं गैर कानूनी ढंग से अमानवीय अत्याचार से देश कलंकित हो रहा है। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में शामली के रेलवे स्टेशन पर पुलिस वर्दीधारी दरोगा और उसके साथियों ने माफिया सरगना की तरह अंशकालिक पत्रकार पर हमला किया। हवालात में कपड़े उतारकर पिटाई एवं पेशाब पिलाने तक का जघन्य अपराध किया।

यह निरंकुशता क्या राजनीतिक सत्ता व्यवस्था के लिए शर्मनाक नहीं कही जाएगी? पत्रकार की किसी गलती या गैरकानूनी रिपोर्टिंग पर प्रशासन और न्यायालय निश्चित रूप से उचित कार्रवाई कर सकता है। मान लीजिए पुलिस इस व्यक्ति को अधिकृत पत्रकार नहीं मानती, फिर भी संविधान एवं भारतीय कानूनों के अंतर्गत सामान्य निहत्थे नागरिक को किसी आपराधिक कारण के बिना इस तरह मारपीट के बाद घसीटकर हवालात में बंद करने का अधिकार किसी पुलिस अधिकारी को नहीं है। यहां तक कि भारतीय सेना के अधिकारी भी ऐसा काम नहीं करते। फिर शामली का यह सक्रिय अंशकालिक पत्रकार रेलवे स्टेशन पर लाइसेंस के बिना अवैध धंधा होने और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उन धंधेबाजों से पुलिस की साठगांठ और भ्रष्टाचार को उजागर कर रहा था।

उसकी रिपोर्ट न्यूज चैनल पर आने के बाद प्रशासन अपनी आपत्ति या मानहानि संबंधी कानूनी कार्रवाई कर सकता था। प्रदेश में अपराधियों पर कठोर कार्रवाई के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देशों का क्या ऐसा दुरुपयोग होने दिया जा सकता है?  वैसे यह अकेली घटना नहीं है। इन्हीं दिनों पुलिस ने मुख्यमंत्री की अवमानना के मामले में नियम-कानून की प्रक्रिया अपनाए बिना एक पत्रकार को रातोंरात गिरफ्तार कर लिया तो सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस को दोषी ठहराते हुए पत्रकार को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया। हां, मानहानि या अन्य आरोपों पर अदालती कार्य आगे जारी रहने की व्यवस्था भी सुप्रीम कोर्ट ने दी।

असल में पुलिस ज्यादती का एक कारण सत्ता में बैठे नेताओं के अहंकार, यदा-कदा स्वयं गैरकानूनी निर्देश, असामाजिक तत्वों को प्रश्रय एवं भ्रष्टाचार भी रहा है। मंत्री और विधायक स्वयं पत्रकारों को धमकाते रहते हैं। दो दिन पहले उत्तराखंड के भाजपा विधायक कैमरे के सामने पत्रकार को गोली मारने की धमकी देते हुए मिले। बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड, तमिलनाडु, केरल, मणिपुर जैसे राज्यों में पत्रकारों पर पुलिस-प्रशासन की गैरकानूनी कार्रवाई और अत्याचार की घटनाएं प्रकाश में आई हैं। यह भारत सरकार के लिए चिंता का विषय होना चाहिये।

आतंकवादी और अपराधिक घटनाओं से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि ध्वस्त होती है। फिर गुजरात, महाराष्ट्र हिमाचल प्रदेश, दिल्ली या अन्य क्षेत्रों में आने वाले पर्यटक और पूंजी निवेशक भी सशंकित होकर भारत से दूर रहने लगते हैं। यों पत्रकारों के साथ पुलिस की ज्यादातियों का सिलसिला पुराना है। सरकारों, अदालतों, संपादकों के संगठन-एडिटर्स गिल्ड, प्रेस परिषद ने भी समय-समय पर जांच समितियों का गठन किया। उनकी रिपोर्ट पर उस समय गंभीरता से चर्चा हुई, लेकिन सिफारिशों पर कभी अमल नहीं हुआ। सरकार और समाज समय का पहिया आगे बढ़ने के साथ बुरी बातें ही नहीं, कई बार अच्छी सलाह भी भुला देता है।

इस संदर्भ में लगभग 30 वर्ष पहले धनबाद में पत्रकारों पर पुलिस ज्यादती, मारपीट और हथकड़ी लगाकर घुमाने की भयावह आपराधिक घटना पर जस्टिस सरवर अली की अध्यक्षता में बने जांच आयोग की रिपोर्ट का उल्लेख करना उचित होगा। बात 1989 की है। तब मैं नवभारत टाइम्स के पटना संस्करण का संपादक था। धनबाद झारखंड का क्षेत्र बिहार का ही हिस्सा था। धनबाद में कोयला माफिया, राजनेताओं और पुलिस के गठजोड़ व भ्रष्टाचार को स्थानीय पत्रकार उजागर कर रहे थे। हमारा एक युवा संवाददाता अशोक वर्मा भी निर्भीक ढंग से तथ्यात्मक रिपोर्टिंग कर रहा था और न केवल बिहार में, बल्कि नवभारत टाइम्स के राष्ट्रीय संस्करण में भी उसकी खबरें और मेरी टिप्पणियां छप रही थीं। इससे उत्तेजित धनबाद पुलिस के गैरजिम्मेदार अधिकारियों ने नियम-कानूनों की परवाह न कर अशोक वर्मा सहित पत्रकारों के साथ बर्बर ज्यादतियां कीं।

तब हमारे प्रधान संपादक राजेन्द्र माथुर की पहल पर एडिटर्स गिल्ड ने जोरदार आवाज उठाई। मजबूरन बिहार सरकार ने न्यायमूर्ति सरवर अली की अध्यक्षता में जांच आयोग का गठन किया। आयोग में गिल्ड की ओर से स्टेट्समैन के तत्कालीन संपादक एस. सहाय, वरिष्ठ संपादक महेन्द्र देसाई और बिहार के वरिष्ठ संपादक शंभूनाथ झा भी शामिल थे। आयोग ने धनबाद, रांची और पटना में इस कांड की गहरी पड़ताल की और निष्पक्ष रिपोर्ट दी। राज्य सरकार ने दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई भी की, लेकिन धनबाद जांच रिपोर्ट में भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए की गई सिफारिशों को किसी प्रदेश में लागू नहीं किया गया।

यों न्यायमूर्ति सरवर अली आयोग ने प्रदेश या जिला स्तर पर रिपोर्टिंग में या अखबारों में टिप्पणियों में अतिरेक पर सावधानी बरतने की सलाह दी। सरकार, पुलिस-प्रशासन और मीडिया के बीच सही संवाद, पारदर्शिता और सूचनाओं की उपलब्धता एवं प्रशासकीय पक्ष के प्रकाशन की सलाह भी दी। प्रदेश तथा जिला स्तर पर समितियों के गठन की सिफारिशें की। कुछ सरकारों ने खानापूर्ति या पसंदीदा पत्रकारों की समितियां भी बनाईं, लेकिन इसका कोई लाभ नहीं हुआ। अब टेलिविजन, वेब, फेसबुक, यू-ट्यूब, ट्विटर इत्यादि सोशल मीडिया आने के बाद मीडिया का विस्तार हो गया है। प्रिंट और टी.वी न्यूज चैनलों के लिए गिल्ड, प्रेस परिषद, टी.वी. ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन तथा ओम्बुड्समैन (लोकपाल) तक ने कुछ सीमाओं वाली आचार संहिता बना रखी है, लेकिन केवल जिम्मेदार संस्थान, संपादक या पत्रकार उनका पालन करते हैं। सरकार का नियंत्रण कोई नहीं चाहता, लेकिन राजनेताओं की तरह, पुलिस-प्रशासन और पत्रकारों के लिए आचार संहिता के पालन के मुद्दे पर गंभीरता से विचार होना चाहिये।

(लेखक एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष हैं)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

राजीव सचान का TV9 से सवाल, फर्जी खबर को शरारतपूर्ण तरीके से चलाने का क्या मतलब?

डिजिटल पत्रकारिता के जरिए न्यूज चैनल अपनी वेबसाइट के जरिए कुछ ऐसी खबरें चलाते रहते हैं

Last Modified:
Thursday, 20 June, 2019
rajeev sachan

डिजिटल पत्रकारिता के जरिए न्यूज चैनल अपनी वेबसाइट के जरिए कुछ ऐसी खबरें चलाते रहते हैं, जिसकी हेडलाइन ऐसी हो तो लोग उसे तुरंत क्लिक कर लें। चाहे खबर का अंदर का कंटेंट उतना गंभीर न हो, जितनी गंभीर वो हेडलाइन दिखे। 

ऐसी की एक खबर टीवी9 भारतवर्ष की वेबसाइट ने भी चलाई, पर इस पर जब दैनिक जागरण के वरिष्ठ पत्रकार राजीव सचान की नजर पड़ी तो उन्होंने पत्रकारिता के अपने दायित्व को निभाते हुए इस पर सवाल उठाया है। उनका सवाल उठाना जायज भी है क्योंकि कई बार डिजिटल पत्रकार हिट्स के चक्कर में एथिक्स को किनारे कर देते हैं, ऐसे में जब कोई वरिष्ठ पत्रकार हमें इसकी याद दिलाता है तो वो मार्गदर्शक का काम करता है। 

उम्मीद है कि टीवी9 भारतवर्ष की डिजिटल टीम भी राजीव सचान की टिप्पणी को सकारात्मत तौर पर लेते हुए इस खबर की हेडलाइन बदल देंगे। 

देखें किस खबर को राजीव सचान ने किया ट्वीट-
 

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

‘स्वनामधन्य संपादकों के मानसिक उपचार के लिए भी बने एक ICU’

बिहार में हर साल गर्मी के मौसम में एक्यूट इनसेफलोपैथी सिंड्रोम से कई बच्चों की हो जाती है मौत

Last Modified:
Thursday, 20 June, 2019
Abhiranjan Kumar

बिहार के मुजफ्फरपुर और आसपास के जिलों में हर साल गर्मी के मौसम में मासूम बच्चों पर कहर बरपाने वाली बीमारी इनसेफलाइटिस या एक्यूट इनसेफलोपैथी सिंड्रोम को लेकर हर कोई सवालों के घेरे में है। केंद्र सरकार, बिहार सरकार, स्थानीय प्रशासन, अस्पतालों का प्रशासन और यहां तक कि आज इस पर हो-हल्ला मचा रहा मीडिया भी।

मीडिया इसलिए, क्योंकि मीडिया भी तभी जागता है, जब हमारे सौ-पचास बच्चे असमय काल के गाल में समा जाते हैं। इससे पहले किसी भी बड़े मीडिया प्लेटफॉर्म पर इन इलाकों के हालात और आसन्न खतरे को लेकर प्रायः कोई रिपोर्टिंग देखने को नहीं मिलती। यूं भी गरीबों के दो-चार बच्चे कहीं मर जाएं, तो मेनस्ट्रीम मीडिया हाउसेज के लिए यह तूल देने लायक खबर नहीं होती, क्योंकि इन खबरों से टीआरपी नहीं आती। भारतीय मीडिया के द ग्रेट संपादकों को लगता है कि सैफ अली खान के बेटे तैमूर का अंगूठा चूसना भी एक महान खबर है और शाहरुख खान की बेटी की एक झलक पर तो गरीबों की सौ-सौ बेटियां भी कुर्बान की जा सकती हैं।

इन संपादकों के टेलिविजन ज्ञान के मुताबिक, सुबह आप गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत नहीं दिखा सकते, क्योंकि लोग उस वक्त सोकर उठे होते हैं। नाश्ता करते-करते टीवी देखते हैं। गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत देखकर उनका जायका बिगड़ सकता है। दोपहर को भी आप गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत नहीं दिखा सकते, क्योंकि वह वक्त सास-बहू नाम और थीम वाले मनोरंजक कार्यक्रमों का होता है। आमतौर पर उस वक्त मिडिल क्लास घरेलू महिलाएं टीवी देख रही होती हैं। उस वक्त अगर आप गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत दिखाएंगे तो सास-बहुओं के कुटिलता भरे हथकंडे दुनिया के सामने नहीं आ पाएंगे।

शाम को भी आप गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत नहीं दिखा सकते, क्योंकि वह वक्त प्रमुख पार्टियों के प्रवक्ताओं और हिंदू-मुस्लिम प्रतिनिधियों के बीच चिल्ला-चिल्ली कराने और टीवी स्टूडियो में हाथापाई के अभ्यास का होता है। उस वक्त अगर आप गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत दिखाएंगे तो देश का लोकतंत्र ही खतरे में पड़ जाएगा। रात को भी आप गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत नहीं दिखा सकते, क्योंकि वह वक्त लोगों के डिनर करने का होता है। लोग अच्छी-अच्छी खबरें देखकर चैन की नींद सोना चाहते हैं, इसलिए उस वक्त अगर आप गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत दिखाएंगे तो लोगों को बुरे-बुरे सपने आएंगे। वे अनिंद्रा के शिकार हो जाएंगे और अगली सुबह उठेंगे तो ताजगी महसूस नहीं करेंगे।

यही वजह है कि चाहे बिहार के मुजफ्फरपुर और आसपास के इलाके हों या उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और आसपास के इलाके, यहां बच्चों पर बरपने वाले कहर का पता बाकी देश को तभी चल पाता है, जब बीमारी सुरसा राक्षसी की तरह अपना मुंह पूरा खोल चुकी होती है और अनगिनत बच्चों को निगल चुकी होती है। इन इलाकों में हर साल यह बीमारी फैलती है, लेकिन किसी साल आपने इन इलाकों में बीमारी फैलने से पहले अस्पतालों के प्रबंध का रियलिटी चेक देखा है? या किसी इंटरव्यू में किसी संबंधित नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रशासनिक अधिकारी को इस बात के लिए रगड़े जाते हुए देखा है कि इस बार आपने अमुक बीमारी से बचाव के लिए क्या इंतजाम किए हैं?

इसीलिए यह अकारण नहीं है कि इस बार भी जब मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत का आंकड़ा 100 को पार कर गया है, तब जाकर दिल्ली के कुछ टीआरपी-लोलुप संपादक अपना चेहरा चमकाने और चैनल के लिए टीआरपी बटोरने के मकसद से एसकेएमसीएच अस्पताल के आईसीयू में आतंक मचाने पहुंचे हैं। करीब 14 साल से प्रदेश की सत्ता पर काबिज मुख्यमंत्री और केंद्र व राज्य के स्वास्थ्य मंत्रियों को रगड़ने की हैसियत या हिम्मत नहीं है तो इस त्रासद घड़ी में उन ट्रेनी डॉक्टरों और नर्सों को ही रगड़े जा रहे हैं, जो अपने सीमित ज्ञान और सुविधा के हिसाब से मरते हुए बच्चों को बचाने के लिए पल-पल जूझ रहे हैं।

जरा इन टीआरपी-लोलुप संपादकों का मानसिक दिवालियापन तो देखिए-

1.ट्रेनी डॉक्टरों और नर्सों को रगड़ा जा रहा है कि अस्पताल में डॉक्टरों की कमी क्यों है?

2. ट्रेनी डॉक्टरों और नर्सों को रगड़ा जा रहा है कि अस्पताल में बेड की कमी क्यों है और एक-एक बेड पर दो-दो तीन-तीन बच्चों का इलाज क्यों किया जा रहा है?

3. आईसीयू में बच्चों के इलाज में लगे डॉक्टरों और नर्सों को इलाज से भटकाकर उनके साथ डांट-फटकार की जा रही है।

4. जिन बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता पहले ही खतरनाक रूप से कम हो चुकी है, उनकी जान से खेलते हुए आईसीयू में पूरे लाव-लश्कर के साथ घुसा जा रहा है, इस बात की परवाह किए बिना कि इससे उन बच्चों में इंफेक्शन का खतरा भी हो सकता है।

5. नेताजी के चमचों को तो रगड़ा जा रहा है कि आप आईसीयू में जूता पहनकर कैसे घुस गए, लेकिन टीआरपी-लोलुप संपादकों को इसी कृत्य के लिए कौन रगड़े?

6. अस्पताल में इलाज की मारामारी के बीच भाजपा और कांग्रेस के नेताओं की राजनीतिक बहस कराई जा रही है।

7. आईसीयू की पोल-खोलते ऐसे प्रचार-लोलुप संपादक पल-पल अपने विडियोज वॉट्सऐप ग्रुपों में शेयर करना नहीं भूल रहे और व्यक्तिगत प्रचार में कोई कमी नहीं रह जाए,  इसके लिए संस्थान के सोशल और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर इसे भी अपने मातहतों के ज़रिए सुनिश्चित करा रहे हैं।

हालांकि, ऐसी बेवकूफाना हरकतें सभी संपादक नहीं कर रहे, बल्कि वही संपादक कर रहे हैं, जिनके पास या तो पत्रकारिता की औपचारिक डिग्री भी नहीं है या जो सनसनीछाप क्राइम शोज बनाते-बनाते हर घटना, दुर्घटना, त्रासदी और मौत में सनसनी ढूंढ़ने के आदी हो गए हैं या जिनका चैनल टीआरपी की रेस में काफी पीछे है और नौकरी बचाने के लिए जिन पर टीआरपी लाने का जबर्दस्त दबाव है या प्राइम टाइम डिबेट्स करते-करते जिन्हें बात-बात पर हल्ला-हंगामा करने की आदत लग चुकी है। इनकी समझ यह है कि जब भी ये किसी को रगड़ते हैं तो जनता ताली बजाती है।

ये लोग पत्रकारिता की मर्यादा भूल चुके हैं। इनकी मानवीय संवेदनाओं को लकवा मार चुका है। कायदे से एक सर्व-सुविधा-संपन्न आईसीयू तो इन लोगों के मानसिक दिवालियापन के उपचार के लिए भी इस देश में होना चाहिए। इन स्वनामधन्य संपादकों ने हमें बताया कि मासूमों की लाशों पर केवल सियासत ही नहीं चमकाई जा सकती, बल्कि पत्रकारिता भी चमकाई जा सकती है और अपना चेहरा तो निश्चित रूप से चमकाया जा सकता है।

लब्बोलुआब ये कि ‘चमकी’ बुखार के कवरेज में भी चेहरा न ‘चमका’ तो शायद ‘चमकने’ का मौका ये चूक न जाएं! इसीलिए त्रासदी के विकराल रूप धारण करने से पहले ये अपने सियासी आकाओं की चाशनी चाटकर देश में सरकार बनाने-गिराने के खेल में जुटे हुए थे और अब त्रासदी के विकराल रूप धारण कर लेने के बाद ये अपना विकराल मानवीय चेहरा प्रस्तुत करने के लिए बेसब्र हुए जा रहे हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार की फेसबुक वॉल से)

आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो करने के लिए यहां क्लिक कीजिए

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

मिस्टर मीडिया: अब तो हमारे मीडिया महारथियों को भी लाज नहीं आती

पाकिस्तान को तो हम 1992 से हराते आए हैं, आगे भी हराते रहेंगे

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Wednesday, 19 June, 2019
Last Modified:
Wednesday, 19 June, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

हम इन दिनों मीडिया का एक क्रूर, असंवेदनशील और खौफनाक चेहरा पेश कर रहे हैं। यह हिंदुस्तान की पाकिस्तान पर क्रिकेट विजय का जश्न मनाता है और आम अवाम बिहार के नौनिहालों की अकाल मौतों के मातम में डूबी है। बिहार का अमानवीय स्वास्थ्य मंत्री जीत पर मुबारकबाद देता है तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उसकी बलैयां लेते हैं। एक-एक बच्चे की हत्या बिहार की हुकूमत के लिए सार्वजनिक शोक का भी सबब नहीं बनती। बिहार के इस प्रादेशिक शोक का असर दूसरे राज्यों तथा मीडिया में कितना दिखाई देता है? हम यह कैसे पथरीले समाज की रचना कर रहे हैं? अजीत अंजुम की अन्वेषणात्मक ख़बरें छोड़ दें तो किस चैनल ने बेहद संजीदगी और गहराई से इस मसले की पड़ताल की?

सत्ता प्रतिष्ठान भले ही रागरंग में डूबे रहें, मगर मीडिया पर आनंद की इन नशीली हवाओं का असर क्यों होना चाहिए? अपनी मौत की भविष्यवाणी करने वाले पंडित कुंजीलाल का ड्रामा दिखाने के लिए मीलों दूर अपनी ओबी वैन और कैमरा टीमें दौड़ाने वाले कितने चैनलों ने बिहार की इस भयावह त्रासदी पर गंभीरता से कवरेज़ की? उसके कारणों की तीखी और पैनी पड़ताल की। अखबारों के पन्नों पर कितनी जगह मिली? सरकारी रेडियो एक-एक सांसद की शपथ का आंखों देखा हाल सुनाता रहा, पर घरों के चिराग बुझने से हुए अँधेरे पर किस प्रसारण में पर्याप्त जगह मिली? मीडिया का यह कौन सा जिम्मेदारी भरा रूप है?  पाकिस्तान को तो हम 1992 से हराते आए हैं। आगे भी हराते रहेंगे। उसे सातवीं बार भी शिकस्त दे दी तो ऐसा उन्माद कितना जायज है? अब तो हमारे मीडिया महारथियों को भी लाज नहीं आती। घंटों तक परदे पर गाल बजाने वाले स्वनाम धन्य एंकर सरोकारों के साथ पत्रकारिता कब सीखेंगे?

क्या पत्रकार याद करेंगे कि इस देश ने एक दौर ऐसा भी देखा था, जब भागलपुर के आँख फोड़ कांड पर कवरेज से सत्ता हिल गई थी। क्या पत्रकार याद करेंगे कि कभी सिलिकोसिस से तिल तिलकर मरने वाले भी पत्रकारिता के जरिए सरकार का सिरदर्द बन जाते थे। क्या पत्रकार याद करेंगे कि छत्तीसगढ़ के रिवई पंडों की भूख से मौत की खबरों ने प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया था। क्या पत्रकार याद करेंगे कि कभी कालाहांडी की बदहाली भी कवरस्टोरी बनती थी। क्या पत्रकार याद करेंगे कि कभी बुंदेलखंड के अपहरण भी आमुख कथा का विषय होते थे। क्या पत्रकार याद करेंगे कि देश की इकलौती ध्रुपद गायिका असगरीबाई के बीड़ी बनाकर गुजारा करने की खबरों के छपने पर उन्हें पद्मश्री से विभूषित किया गया था।

क्या पत्रकार याद करेंगे कि कभी राजस्थान में बाल विवाह को मानने के लिए बेटी को मजबूर करने पर मंत्री को पद छोड़ना पड़ा था, क्योंकि मीडिया ने उसे प्रमुखता दी थी। क्या पत्रकार याद करेंगे कि दिवराला के सती कांड के बाद मीडिया के ग़ुस्से ने ही सती निरोधक नए कानून के लिए सरकार को मजबूर कर दिया था। आखिर कितनी घटनाएँ याद दिलाऊँ? क्या अचानक हिंदुस्तान में राम राज्य आ गया है? क्या अचानक हमारे सारे दुःख हवा हो गए हैं? क्या अब भारतीय समाज से सारी विसंगतियाँ, विद्रूपताएँ, असमानता, अत्याचार और व्यवस्था को निशाने पर लेने वाले मुद्दे दूर कहीं यूरोप या अमेरिका में जाकर बैठ गए हैं?

सरोकारों से मुँह मोड़ना मीडिया को बहुत महंगा पड़ेगा। एक ऐसे रोबोटिक पत्रकार की रचना करना कितना जायज होगा, जो सिर्फ़ अप मार्केट खबरों से रिश्ता रखता हो। आज की तथाकथित 'डाउन मार्केट' हिंदुस्तानी खबरें यानी आंचलिक खबरें उसे उद्वेलित न करती हों। व्यवस्था की आलोचना करने वाला भाव कहीं दम तोड़ चुका हो तो यकीन मानिए देश से लोकतंत्र को बिखरते देर नहीं लगेगी। इसे गहराई से समझिए मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: यह भारतीय कानून का पुलिस-प्रशासन और सियासत के लिए फरमाइशी चेहरा है

यह भी पढ़ें: मिस्टर मीडिया: ग़ैरज़िम्मेदारी के 3 उदाहरण भारतीय मीडिया के औसत चरित्र को उजार करते हैं

यह भी पढ़ें: मिस्टर मीडिया: सरोकारों वाले सफर पर साख का विकराल संकट

यह भी पढ़ें: मिस्टर मीडिया! ऐसी भी हकीकत रही है एग्जिट पोल की

आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो करने के लिए यहां क्लिक कीजिए

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

'गुप्ता बंधुओं की ‘कोर्ट’ मैरिज पर सीएम को लेकर कही गई ये बात अच्छी नहीं लगी'

उत्तराखंड के औली में होने जा रही है 200 करोड़ रुपए की शाही शादी

उमेश कुमार by उमेश कुमार
Published - Wednesday, 19 June, 2019
Last Modified:
Wednesday, 19 June, 2019
Umesh Kumar

उमेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार।।

‘सुना है कि सीएम साहब भी शादी में आने वाले हैं।’ ‘हां, हां। जो जूते सालियां चुराएंगी, उनको लाने का जिम्मा गुप्ता बंधुओं ने राज्य के कई जिम्मेदार लोगों को ही सौंपा है!’ नाम नहीं लेना चाहूँगा। उत्तराखंड हाई कोर्ट के बाहर चाय पर 200 करोड़ रुपए की बहुचर्चित शादी को लेकर चर्चा चल रही थी। जितनी मुंह,उतनी बातें। मैं खामोशी से सबकी बात सुन रहा था। मन उन केसों में उलझा हुआ था, जो रावत सरकार ने मेरे खिलाफ किए हैं। वही सीएम और उनके करीबियों के खिलाफ स्टिंग ऑपरेशन का मसला। हाई कोर्ट में मेरे केस की लगातार सुनवाई हो रही है। उसी सिलसिले में मैं हाई कोर्ट पहुंचा था। अपने वकील का इंतजार करते हुए शाही शादी को लेकर लोगों की राय सुन रहा था। सीएम को लेकर कही गई आखिरी बात मुझे अच्छी नहीं लगी।

‘अरे भाई, अपने राज्य के मुख्यमंत्री के बारे में तो इस तरह न बोलो’। ‘उमेश भाई, आप भी गजब करते हो। जो सीएम सीधे-सीधे गुप्ता ब्रदर्स के हाथों में औली को गिरवी रख रहा है। तमाम कायदे कानून को ताक पर रखकर औली में शाही शादी करा रहा है, उसके बारे में आप ही बताओ और क्या कहा जाए?’

‘बात आपकी ठीक है बंधु, लेकिन सीएम साहब का सम्मान’, सीएम के खिलाफ मोर्चा खोले उस वकील ने मेरी बात पूरी भी नहीं होने दी। बीच में ही शाही शादी को लेकर हाई कोर्ट के आदेश को ले आया। बोला, ‘हाई कोर्ट ने किया है न सीएम का सम्मान! कैसी जबरदस्त फटकार लगाई है रावत सरकार को। मैं तो कहता हूं कि कुछ दिनों के लिए हाई कोर्ट को ही राज्य का जिम्मा सौंप दिया जाए। रावत सरकार के सब कल-पुर्जे अदालत टाइट कर देगी।’

यहां आपको बता दूं कि गुप्ता ब्रदर्स के बेटों की हाईप्रोफाइल शादी को लेकर हाई कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने औली में शादी समारोह के लिए बनाये गये 8 हैलीपैड के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। इन हैलीपैड का इस्तेमाल वो 200 हेलीकॉप्टर करने वाले थे, जो गुप्ता ब्रदर्स के मेहमानों को लाने-ले जाने के लिए तैनात किये गये हैं। हाई कोर्ट ने पर्यावरण को पहुंचने वाली क्षति की भरपाई और औली की साफ सफाई के लिए गुप्ता ब्रदर्स को 5 करोड़ रुपए जमा करने का भी आदेश दिया है।

हाईकोर्ट ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इस शादी पर नजर रखने के लिए कहा है और ये रिपोर्ट देने के लिए कहा है कि इस आयोजन से पर्यावरण को अब तक कितना नुकसान पहुंचा है और पूरे शादी समारोह से कितना नुकसान पहुंच सकता है। दूसरी तरफ 200 करोड़ की कथित शादी को लेकर हाई कोर्ट ने रावत सरकार को फटकार लगाते हुए पूछा है कि जब कोर्ट ने बुग्यालों में इस तरह के शादी समारोहों पर रोक लगा रखी है, तब फिर कैसे सरकार ने औली में इस हाई प्रोफाइल शादी की इजाजत दे दी?

‘उमेश भाई, ये हाई कोर्ट ही है जो इस रावत सरकार से राज्य को बचाए हुए है। वरना त्रिवेंद्र सिंह रावत की चलती तो ये अब तक पूरे राज्य को बरबाद कर चुके होते।’ ‘यहां जंगल में आग लगी हुई है। पहाड़ का तापमान मैदान को मात देने पर तुला हुआ है। बदरीनाथ-केदारनाथ रोड पर भयानक जाम लगा हुआ है। पेट्रोल नहीं मिल रहा है, लेकिन त्रिवेंद्र रावत पर कोई फर्क नहीं। सब कुछ भुलाकर अपने गुप्ता ब्रदर्स की खातिरदारी में जुटे हैं!!’ ‘अब जो कुछ उम्मीद है, वो कोर्ट से ही है।’

चाय के ढाबे पर कुछ इसी अंदाज में चर्चा चलती रही। मैं चुपचाप सुनता रहा। पूरे राज्य में इस वक्त गुप्ता ब्रदर्स की शाही शादी की ही चर्चा हो रही है। 200 करोड़ से ज्यादा की शादी! मेहमानों को लाने-ले जाने के लिए 200 हेलीकॉप्टर! हाईप्रोफाइल गेस्टों की लंबी लिस्ट। राज्य सरकार की तरफ से दावा किया जा रहा है कि इस शादी से राज्य को फायदा होगा। बड़े-बड़े लोग शादी के लिए उत्तराखंड आएंगे। स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा, लेकिन चर्चा में शामिल ज्यादातर लोगों की राय कुछ और थी।

‘असली कमाई तो बाहर वाले करेंगे। स्विटजरलैंड का वो नर्सरी मालिक कितना खुश होगा, जिससे गुप्ता ब्रदर्स 5 करोड़ के फूल खरीद रहे हैं।’ ‘और शामियाना, पंडाल, खाने-पीने के सब आइटम तो बाहरवालों के हैं। लोकल लोगों के हिस्से क्या?’ ‘500 रुपये रोज की दिहाड़ी। एक मजदूर का यही रेट तय हुआ है।’‘बोल देना सब लेबर एडवांस ले लेंगे। गुप्ता ब्रदर्स के बारे में मशहूर है कि दक्षिण अफ्रीका में अपने सिक्योरिटी गॉर्डस का भी पैसा मारकर वहां से फरार हुए हैं।’

उम्मीद के विपरीत लोग गुप्ता ब्रदर्स को लेकर काफी अपडेट दिखे। कई लोग गूगल खोलकर गुप्ता ब्रदर्स की हिस्ट्री खंगाल रहे थे। वहीं से उन्हें जानकारी मिली थी कि गुप्ता ब्रदर्स पर ये भी आरोप है कि इन्होंने दक्षिण अफ्रीका के अपने निजी सुरक्षाकर्मियों की भी सैलरी नहीं दी और अब ये वहां से फरार होकर दुबई में रह रहे हैं।

गौरतलब है कि गुप्ता ब्रदर्स-अजय गुप्ता, अतुल गुप्ता और राजेश उर्फ टोनी गुप्ता मूलरूप से पश्चिमी यूपी के सहारनपुर के हैं और ये लोग कारोबार के लिए 1994 में दक्षिण अफ्रीका गए। वहां पर उन्होंने सत्ता और अधिकारियों के साथ ऐसा गठजोड़ कायम किया कि दक्षिण अफ्रीका का पूर्व राष्ट्रपति जैकब जुमा भी उनकी जेब में रहने लगा। गुप्ता ब्रदर्स के बारे में यहां तक कहा जाने लगा कि सत्ता का चेहरा बेशक जैकब जुमा हैं, लेकिन शासन असल में यही गुप्ता ब्रदर्स चलाते हैं।

गुप्ता बंधुओं के खिलाफ मार्च 2018 में अचानक तब हवा बहने लगी, जब देश के पूर्व उप वित्त मंत्री मसोबीसी जोनास ने दावा किया कि गुप्ता बंधुओं ने फाइनेंस मिनिस्टर को पद से हटाने के लिए सौदेबाजी की है। जोनास के बयान के बाद वहां भूचाल आ गया, क्योंकि जैकब जुमा और गुप्ता बंधुओं के बीच पहले से साठगांठ की खबर आ रही थी। जो बात दक्षिण अफ्रीका में दबी जुबां में कही जाती थी, वो बात जोनास ने खुलकर कह दी और इसी के बाद पूरे देश में जैकब जुमा और गुप्ता ब्रदर्स के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। गुप्ता ब्रदर्स की गिरफ्तारी और उनकी अकूत संपत्ति जब्त करने की मांग होने लगी। माहौल खराब देखकर गुप्ता ब्रदर्स दक्षिण अफ्रीका से फरार होकर दुबई पहुंच गये। उनके खिलाफ इंटरपोल का रेड कॉर्नर नोटिस तक जारी हुआ।

दूसरी तरफ दक्षिण अफ्रीका के स्टॉक एक्सचेंज और वहां के स्थानीय बैंकों ने गुप्ता बंधुओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए उनकी कई संपत्तियों को जब्त कर लिया। इनकी संपत्ति का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि साल 2016 में अतुल गुप्ता दक्षिण अफ्रीका के सबसे अमीर अश्वेत बन गए थे। तब उनकी संपत्ति करीब 55 अरब रुपए बताई गई थी। ये बस एक भाई की दौलत है। बाकी दोनों भाइयों का अलग है ।

अब इन्हीं गुप्ता बंधुओं में से अजय गुप्ता और अतुल गुप्ता के बेटों की शादी उत्तराखंड के औली में होने जा रही है। पहली शादी अजय गुप्ता के बेटे सूर्यकांत की है। दूसरी शादी अतुल गुप्ता के बेटे शशांक की है। दोनों शादी के लिए पांच करोड़ रुपए के फूल स्विटजरलैंड से मंगाये जा रहे हैं, वहीं मेहमानों को औली तक लाने-ले जाने के लिए करीब 200 हेलीकॉप्टर किराए पर लिए गए हैं। इस शादी के लिए 100 पंडित बुक किए गए हैं । शादी का कार्ड चांदी से बना है, जिसका वजन करीब साढ़े 4 किलो है। इस पूरी शादी पर करीब 200 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है।

राज्य सरकार की दलील है कि ऐसी हाईप्रोफाइल शादी से राज्य को कमाई होगी लेकिन जोशीमठ के प्रकाश रावत की राय कुछ और दिखी। उनका कहना है, ‘आप ही बताइए कि इस शादी से उत्तराखंड का कैसे भला होगा? गुप्ता ब्रदर्स ने कोर्ट में कहा है कि उन्होंने शादी के लिए स्थानीय प्रशासन को 30 लाख रुपए दिए हैं, लेकिन जरा ये सोचिए कि इस शादी से औली में नुकसान कितना होगा? पर्यावरण का क्या होगा?’

दो दिन पहले जोशीमठ गया था, तब कई लोगों के मुंह से ऐसी ही बातें सुनने को मिलीं। दरअसल इस शाही शादी से पर्यावरण को जो नुकसान पहुंच रहा है, उससे स्थानीय लोग खासे नाराज हैं। इसके अलावा इस शादी की वजह से स्थानीय लोगों के सामान्य कामकाज प्रभावित हुए हैं, जिससे वो नाराज हैं। स्थानीय लोगों की नाराजगी की खबर शायद गुप्ता ब्रदर्स तक भी पहुंच चुकी है। यही वजह है कि वो स्थानीय लोगों की नाराजगी दूर करने में जुटे हैं।

औली में जहां शादी हो रही है, उसी से सटा है सुनील गांव। सोमवार को गुप्ता ब्रदर्स की तरफ इस गांव के सभी लोगों को भोज दिया गया। शादी समारोह के दौरान भी भोज का वादा किया गया है। खबर यहां तक है कि समारोह के दौरान पूरे औली में गुप्ता ब्रदर्स की तरफ से मुफ्त चाय-नाश्ता का प्रबंध रहेगा और औली में लगने वाले हाईप्रोफाइल ग्रामीण हॉट और स्टॉल में बिकने वाला सामान स्थानीय लोगों और मेहमानों को फ्री में मिलेगा। उसी सुनील गांव का एक युवक कल मुझसे टकाराया था।

युवक का कहना था, ‘ये गुप्ता ब्रदर्स गांववालों को एक टाइम का फ्री खाना खिलाकर आखिर क्या साबित करना चाहते हैं? पहाड़ हमारे, नदी हमारी, औली हमारा। जब वो अपने बेटों की शादी में इसका इस्तेमाल कर रहे हैं तो इसकी वाजिब कीमत चुकाएं। स्थानीय लोगों को कमाई का मौका दें। क्या आप सोच सकते हैं कि केवल 30 लाख रुपए में औली जैसी जगह उन्हें दुनिया के किसी कोने में मिल सकती थी?’

गौरतलब है कि बीजेपी की फायरब्रैंड नेता उमा भारती भी इस शाही शादी को लेकर अपनी नाराजगी जता चुकी हैं। राज्य में बीजेपी की ही सरकार है, इसके बावजूद उन्होंने कहा, ’भारत में अमीर और गरीब के बीच गहरी खाई है। अभी जोशीमठ जैसी जगह पर जहां पेयजल का घोर संकट है और आसपास के गांवों में गरीबी फैली हुई है, वहां ऐसी शादी गरीबों का अपमान है। यह शादी अमीर और गरीब की खाई को और गहरा कर देगी। शादी में इस तरह के खर्चों की वजह से ही माओवाद और नक्सलवाद पैदा हुआ है।’

जोशीमठ नगरपालिका अध्यक्ष शैलेंद्र पंवार उमा भारती की बात को आगे बढ़ाते हैं, ‘ये गुप्ता ब्रदर्स तो शादी के बाद यहां से चले जाएंगे। पीछे छोड़ जाएंगे ढेर सारा कचरा। उसे साफ कराने का जिम्मा नगरपालिका के मत्थे। राज्य सरकार ने इतनी बड़ी शादी को लेकर न तो पहले से कोई सूचना दी, न ही कोई प्लानिंग की है। सारे कायदे कानून को ताक पर रखकर गुप्ता ब्रदर्स को शादी की इजाजत मिली है।’

त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार के लिए ये कोई नई बात नहीं हैं। जब से त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री बने हैं, तब से वो इसी अंदाज में शासन चला रहे हैं। कई मामलों में दिखा है कि संवैधानिक कायदे-कानून उनके लिए खास मायने नहीं रखते हैं। वो अपना खुद का कायदा कानून तय करते हैं। पिछले दिनों देहरादून में जिस आईजी की गाड़ी का इस्तेमाल चोरी में हुआ था, उन आईजी साहब के खिलाफ अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। मेरे मामले में रावत सरकार की जमकर किरकिरी हो रही है, लेकिन हाई कोर्ट में भी वो अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। जो लोग अपनी काली करतूतों के साथ मेरी टीम के कैमरे में कैद हुए हैं, कायदे से उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन रावत सरकार ने उन सबको सरकारी गवाह बना दिया है!

‘उमेश सर, हाई कोर्ट में आपके मामले की जो सुनवाई चल रही है, उस पर आपका क्या कहना है?’ उत्तराखंड के एक लोकल चैनल का रिपोर्टर मेरे सामने खड़ा था। उसके सवालों से मैं अपने ख्यालों से बाहर निकला। ‘मेरे केस की छोड़ो, ये बताओ गुप्ता ब्रदर्स की शाही शादी को लेकर क्या अपडेट है?’ इस पर इस रिपोर्टर ने कहा, ‘हाई कोर्ट में मामले की सुनवाई चल रही है सर। आपके केस की तरह इस मामले में भी रावत सरकार बैकफुट पर है।’

उस रिपोर्टर की तरह मुझे भी हाई कोर्ट के फैसले का इंतजार है। अपने केस को लेकर भी, गुप्ता ब्रदर्स की शाही शादी को लेकर भी।

गुप्ता बंधुआ पर आरोप:

1: साउथ अफ्रीका के सभी बड़े बैंकों ने गुप्ता फ़ैमिली के सभी खाते बंद कर दिए थे।

2: आरोप यहाँ तक हैं (जिनकी जाँच चल रही है) कि ग्रामीण डेरी विकास के लिए लिए लिये गए फंड्स को भी गुप्ता बंधुओं ने अपनी एक ऐसी ही 200 करोड़ वाली शादी में लगा डाला।

3: साउथ अफ्रीका द्वारा एक आयोग का गठन किया गया है, जो अब इनके द्वारा किए गए काले कारनामों की जाँच कर रहा है। इसके सामने गुप्ता बंधुओं को पेश होना है।

4: ब्रिटेन के एक अखबार द्वारा ये भी खुलासा किया गया था कि गुप्ता बंधुओं द्वारा जो कालाधन साउथ अफ़्रीका से बाहर भेजा गया है, उसकी जाँच अमेरिका की सबसे बड़ी एजेंसी FBI भी कर रही है। वॉशिंगटन पोस्ट के हवाले से एक खबर ये भी आयी थी कि कनाडा के आयात-निर्यात बैंक द्वारा लोन पर लिया गया प्लेन नम्बर sporting tail number ZS-OAK, Canada गुम हो गया है यानी गुप्ता बंधुओं ने गायब कर दिया है। खबर के लिए क्लिक करें।

5: साउथ अफ्रीका की सबसे बड़ी जाँच एजेंसी HAWK ने गुप्ता बंधुओं के साउथ अफ्रीका वाले घर पर रेड की, लेकिन गुप्ता बंधु समय उससे पहले ही रफूचक्कर हो चुके थे।

6: गुप्ता बंधुओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते साउथ अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा को अपने पद से हाथ धोना पड़ा।

आप धन्य है त्रिवेंद्र जी।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए