तमाम अखबारों को देखें, टीवी चैनल्स के पर्दों पर देखें या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के कंटेंट पर नजर दौड़ाएं तो पाते हैं कि उन्मादी बयानों को प्रमुखता देकर पत्रकारिता ने भी अपने को कठघरे में खड़ा कर लिया है।
by
राजेश बादल