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मीडिया में सबसे बड़ा संकट विश्वसनीयता का है: क़मर वहीद नक़वी

जिसे हम मुख्यधारा का मीडिया कहते या मानते हैं, उसकी बात करें तो उसके लिए 2022 भी कमोबेश वैसा ही रहा, जैसा कि उसके पहले के कुछ साल रहे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 3 years ago

क़मर वहीद नक़वी, वरिष्ठ पत्रकार ।।

जिसे हम मुख्यधारा का मीडिया कहते या मानते हैं, उसकी बात करें तो उसके लिए 2022 भी कमोबेश वैसा ही रहा, जैसा कि उसके पहले के कुछ साल रहे। 2021 के कोविड के भयानक दौर को अगर छोड़ दें तो मुख्यधारा का प्रिंट और टीवी न्यूज़ मीडिया कुछेक अपवादों को छोड़कर अपनी चाल, चरित्र और चेहरे में लगभग जस का तस बना रहा, जैसा वह पिछले कुछेक वर्षों से है और जिसे मीडिया के अन्दर और बाहर के सारे लोग अच्छी तरह जानते-समझते हैं।

2021 के कोविड का समय हर प्रकार के मीडिया के लिए ज़रूर अभूतपूर्व चुनौतियों का समय था, जब बेहद संकटों का सामना करते हुए और अपनी जान पर खेल कर मीडिया धर्म का पालन करते हुए सैकड़ों पत्रकारों ने अपनी जान गंवायी। लेकिन अब सब कुछ ढर्रे पर है। कुछेक मामलों में कभी-कभार मीडिया कंपनियों पर सरकारी एजेंसियों के छापे वग़ैरह पड़ जाने का सिलसिला भी 2022 आते-आते थम ही चुका है। इसलिए 2023 में मीडिया के सामने कोई बड़ी चुनौती होगी, ऐसा लगता नहीं।

बस 2022 आते-आते पूरे मीडिया जगत में एक बड़ा फ़र्क़ यह आया कि डिजिटल दुनिया में एक वैकल्पिक मीडिया का उभार सतह पर दिखने लगा है। कॉरपोरेट मीडिया के मुक़ाबले बाज़ार के दबावों से मुक्त एक वैकल्पिक मीडिया का सपना पिछले चालीस-पचास वर्षों से देखा जा रहा था, इस दिशा में अनेक पत्र-पत्रिकाएं निकलीं भी और जल्दी ही काल-कवलित हो गयीं। लेकिन अब इंटरनेट क्रांति ने इस वैकल्पिक मीडिया को एक मज़बूत आधार और आकार दे दिया है। हज़ारों छोटे-बड़े पत्रकार और तमाम छोटी मीडिया कंपनियां डिजिटल मीडिया में एक सशक्त हस्ताक्षर के तौर पर अपनी जगह बना चुकी हैं।

लेकिन मुख्यधारा के मीडिया को इस वैकल्पिक मीडिया से 2023 या उसके आगे के कुछ वर्षों में कोई बड़ी चुनौती मिल पायेगी, इसकी अभी कोई सम्भावना नहीं दिखती। मेटावर्स के आने के बाद कैसे हालात होंगे, इसका अनुमान अभी लगाया नहीं जा सकता है।

समूचे मीडिया के सामने अभी सबसे बड़ा संकट विशवसनीयता का है। लेकिन क्या मीडिया को इसकी परवाह है? जनवरी 2022 के ही सीएसडीएस-लोकनीति-कोनराड ऐडेनावा स्टिफ़टूंग के सर्वे के मुताबिक़ दूरदर्शन के न्यूज़ चैनलों को लोग सबसे ज़्यादा भरोसेमंद मानते हैं, इसके बाद अख़बारों का नंबर आता है और फिर प्राइवेट न्यूज़ चैनलों का। इस सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक़ दूरदर्शन न्यूज़ पर 34%, अख़बारों पर 31% और निजी न्यूज़ चैनलों पर केवल 13% लोग ही 'पक्का भरोसा' करते हैं, जबकि 'कुछ हद तक भरोसा' करने के मामले में डीडी न्यूज़ पर 30%, अख़बारों पर 29% और निजी न्यूज़ चैनलों पर 28% लोग ही सहमति जताते हैं।

इस सर्वे का एक और पहलू तो और भी चिंताजनक है। वह है मीडिया का राजनीतिक 'परसेप्शन'। जो लोग बीजेपी के समर्थक हैं, उनमें 48% ने दूरदर्शन न्यूज़ चैनलों पर, 45% ने अख़बारों पर और केवल 11% ने निजी न्यूज़ चैनलों को 'भरोसेमंद' माना। लेकिन कांग्रेस व अन्य राजनीतिक दलों के समर्थकों में यह आंकड़ा काफ़ी घट गया। ग़ैर-बीजेपी राजनीतिक दलों के समर्थकों में केवल 34% दूरदर्शन न्यूज़ चैनलों और 27 से 29% लोग ही अख़बारों को 'भरोसेमंद' मानते हैं। निजी न्यूज़ चैनलों को कांग्रेस समर्थकों में से केवल 1% लोग ही और अन्य राजनीतिक दल समर्थकों में से केवल 8% लोग ही 'भरोसेमंद' मानते हैं। क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में मीडिया का और ख़ासकर निजी न्यूज़ चैनलों का ऐसा 'परसेप्शन' होना चाहिए?

इस सर्वे का एक और पहलू है। वह यह कि बहुसंख्यक हिन्दुओं के मुक़ाबले मीडिया पर मुसलमानों का भरोसा बहुत ही कम है। ऐसा क्यों है? इसके लिए एक ही उदाहरण काफ़ी होगा। अप्रैल 2022 में भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने यूक्रेन-रूस युद्ध और उत्तर-पश्चिम दिल्ली में जहांगीरपुरी हिंसा पर कवरेज को लेकर निजी न्यूज़ चैनलों को एक बेहद कड़ी 'एडवाइज़री' जारी कर साफ़-साफ़ कहा था कि 'न्यूज़ चैनल ऐसी उत्तेजनात्मक और कभी-कभी तो मनगढ़ंत हेडलाइन और भड़काऊ तरीक़े से हिंसा के वीडियो दिखा रहे हैं, जिससे सांप्रदायिक घृणा भड़क सकती है, एक ख़ास समुदाय के बारे में ऐसी फ़ुटेज दिखायी जा रही है, जिससे सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है, डिबेट शो में भी भड़काऊ भाषा, सांप्रदायिक और अभद्र टिप्पणियां हो रही हैं....।'

इस 'एडवाइज़री' में पूरे विस्तार से कई न्यूज़ चैनलों की कवरेज का हवाला दिया गया था। लेकिन ऐसी गम्भीर 'एडवाइज़री'  पर न्यूज़ चैनलों के संपादकों के बीच या चैनल मालिकों के संगठनों के भीतर क्या कोई चर्चा हुई, क्या सुधार के लिए कोई क़दम उठाये गये? और क्या वाक़ई उनकी कवरेज में कोई सुधार हुआ? हुआ हो तो लोगों को बताया जाना चाहिए। सवाल यह है कि मीडिया के लिए क्या यह गम्भीर चिन्ता की बात नहीं है कि एक लोकतंत्र में उसे समाज के सभी वर्गों का विश्वास क्यों प्राप्त नहीं है?

विश्वसनीयता का यह संकट नये-नये उभर रहे ऑनलाइन मीडिया के लिए भी चिन्ताजनक रूप से बहुत गंभीर है। ऐसा इसलिए कि दूरदर्शन, अख़बार और निजी चैनलों के मुक़ाबले सबसे कम यानी केवल 11% लोग ही ऑनलाइन न्यूज़ वेबसाइटों को भरोसेमंद और 23% लोग 'कुछ हद तक भरोसेमंद' मानते हैं। ज़ाहिर है कि अपनी विशवसनीयता स्थापित करने के लिए इन्हें भी बहुत कुछ करने की ज़रूरत है। विशवसनीयता के अलावा डिजिटल मीडिया के सामने संसाधनों की कमी, बाज़ार के दबाव और बड़े मीडिया समूहों के सामने टिक पाने की पहाड़ जैसी चुनौतियां हैं।

अन्त में एक बात और। आज देश में बहुत बड़ी-बड़ी मीडिया कंपनियां हैं, जिनका सालाना मुनाफ़ा सैकड़ों करोड़ में है। लेकिन वे अपने पत्रकारों के प्रशिक्षण और कार्यशालाओं पर, अपनी संपादकीय गुणवत्ता सुधारने और पत्रकारिता पर वैचारिक संगोष्ठियों, सम्मेलनों, सेमिनारों पर क्यों कुछ भी ख़र्च नहीं करतीं?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)


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