‘विश्वविद्यालयों में एक्टिविज्म को लेकर हमें समझनी होगी ये अहम बात’

प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी का यह मंत्र देश के राजनेताओं के साथ-साथ हर सियासतदान को ध्यान में रखना होगा। यही मंत्र देश की उन्नति का पहिया होगा

डॉ. सिराज कुरैशी by
Published - Wednesday, 27 November, 2019
Last Modified:
Wednesday, 27 November, 2019
Dr. Siraj Qureshi

डॉ. सिराज कुरैशी, वरिष्ठ पत्रकार।।

आगरा के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय अधिवेशन में आए उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा ने बीएचयू में होने वाले आंदोलन पर कटाक्ष करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि भाषा को जाति-वर्ग से दूर रखते हुये समझा जाये कि विश्वविद्यालय-कॉलेज और स्कूल ही राष्ट्रीय निर्माण की प्रयोगशाला होते हैं। इन संस्थानों में भाषा और जाति-वर्ग को लेकर जो विद्यार्थी आंदोलन करते हैं, उन्हें यह समझना चाहिये।

इसी तरह की बात एक सीनियर सिटीजन ने छात्रों से कही। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का तात्पर्य केवल एक निश्चित भूभाग में स्थित किसी भौतिक अवसंरचना से नहीं होता और न ही हम इसका मूल्यांकन वहां मिलने वाली आर्थिक सुविधाओं से कर सकते हैं, जैसा कि वर्तमान में दिखाई देता है। यह सौ प्रतिशत सच है कि जब किसी विश्वविद्यालय में सस्ती शिक्षा की वकालत की जाती है तो उसका अर्थ किसी चैरिटी को संचालित करना नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की परियोजना के सबसे महत्वपूर्ण उपकरण को धार देने के समान कहा जा सकता है। अगर बीएचयू या एएमयू की गतिविधियों पर विशेष गौर किया जाये तो यह इस तरह के शिक्षा संस्थान कहे जा सकते हैं, जहां पढ़ाई कम तथा ‘एक्टिविज्म’ पर अधिक ध्यान देते हैं। हमें ऐसे विश्वविद्यालयों की गतिविधियों को देखने के बाद समझना होगा कि जिसको हम ‘एक्टिविज्म’ कहकर उपहास उड़ाते हैं, वह दरअसल शिक्षा का ही रूप होता है, जो अपनी परिस्थितियों के विरुद्ध संघर्ष के रूप में व्यक्त होता है।

ऐसी परिस्थिति से अनुमान लगाया जाता है कि इस तरह की ‘एक्टिविज्म’ परिस्थितियां सुधार की वाहक न होकर कहीं पूर्व निर्धारित राजनीतिक विचारों की पुनरावृत्ति बनकर न रह जाएं। दिल्ली स्थित जेएनयू की गतिविधियों को उदाहरण के रूप में कहा जा सकता है। यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि बीएचयू, एएमयू, जेएनयू आदि विश्वविद्यालयों को जो सुविधायें मिल रही हैं और उनके बदले मिलने वाले अनुदान का संतुलन बिगड़ा हुआ है। ऐसे विश्वविद्यालयों के उद्देश्यों का एक बार अवश्य स्मरण करना चाहिये।

एक समाजशास्त्री ने जब मुझसे कहा कि एक विश्वविद्यालय, चाहे वह कितना भी उपयोगितावादी क्यों न हो, यदि वह अपने आदर्श, मौलिक सच, सौंदर्य और मानव मस्तिष्क को सुसंस्कृत करने के लिये अपनी खोज को छोड़ देता है, तो उसे विश्वविद्यालय ही नहीं कहा जा सकता। अगर इसी को सरल रूप में कहें तो रोजगार उत्पन्न करना, विश्वविद्यालय नहीं रह जाता, जबकि व्यावहारिकता का निषेध नहीं बल्कि इसे परिष्कार के उदात्त स्तर पर ले जाना ही एक विश्वविद्यालय की विशेषता होनी चाहिये। इसी को कह सकते हैं कि हम विश्वविद्यालय कैम्पस को सिर्फ रोजगार की आस से ही नहीं देखें, बल्कि उसके सभ्यतागत विकास की शक्ति को भी चिन्हित करें।

यह भी पूरी तरह सच है कि हम किसी भी तर्क से एक गरीब देश में महंगी उच्च शिक्षा का पक्ष-पोषण नहीं कर सकते, वर्तमान शिक्षा ही वह सीढ़ी है, जिसके सहारे आसानी से ऊपर चढ़ा जा सकता है, इसलिये राज्यों की भी जिम्मेदारी है कि देश के गरीब एवं वंचित नागरिकों की पहुंच इस पीढ़ी तक सुनिश्चित कराएं। उच्च शिक्षा केवल मुट्ठी भर लोगों की जागीर नहीं है, बल्कि समावेशी विकास का एक टूल है, इसका स्वरूप बने रहना ही बेहतर होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी का यह मंत्र देश के राजनेताओं के साथ-साथ हर सियासतदान को ध्यान में रखना होगा कि ‘सबका साथ, सबका विश्वास और सबका विकास।‘  यही मंत्र देश की उन्नति का पहिया होगा। अगर व्यक्ति ने उच्च शिक्षा ग्रहण कर ली और अच्छी नौकरी भी पा ली, परन्तु मोदीजी का मंत्र दिमाग में नहीं रखा तो मेरा विश्वास है कि न ही वह व्यक्ति उन्नति नहीं कर सकता और न ही देश-प्रदेश एवं अपने जिले को आगे बढ़ा सकता है। यही वजह है कि स्वयं मेादीजी इस मंत्र को ही लेकर देश को विश्व पटल की प्रथम पंक्ति में ला रहे हैं।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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दिल्ली चुनाव को लेकर वरिष्ठ पत्रकार अमर आनंद ने यूं भिड़ाया ‘गणित’

यह वाराणसी नहीं है और न ही 2014, लेकिन यह चुनावी रण है और इस चुनावी रण में आमने-सामने दिख रहे वही दो चेहरे हैं, जो वाराणसी के चुनावी रण में 2014 में दिख रहे थे

Last Modified:
Monday, 13 January, 2020
Amar Anand

अमर आनंद, वरिष्ठ पत्रकार।।

यह वाराणसी नहीं है और न ही 2014, लेकिन यह चुनावी रण है और इस चुनावी रण में आमने-सामने दिख रहे वही दो चेहरे हैं, जो वाराणसी के चुनावी रण में 2014 में दिख रहे थे। फर्क इतना है कि यह लोकसभा नहीं, विधान सभा चुनाव है और वाराणसी की जगह दिल्ली है। फर्क यह भी है कि उस वक्त मोदी के चमकते चेहरे के सामने काफी कम चमक के साथ अपनी धमक लिए केजरीवाल मौजूद थे और यहां मुख्यमंत्री केजरीवाल की चमकती छवि के सामने अपनी दूसरी पारी में प्रधानमंत्री के रूप में चमक खोते जा रहे मोदी हैं। वही नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री के रूप में जिनकी लोकप्रियता देश के किसी भी पीएम और नेता से ज्यादा रही है। वही नरेंद्र मोदी जो अनुच्छेद 370, 35ए और मुस्लिम महिलाओं के लिए बनाए गए तलाक कानून की वजह से देश के हीरो के रूप में माने जाते रहे हैं और वो नरेंद्र मोदी, जिनकी पार्टी को दो बार से दिल्ली की जनता सातों सीटें समर्पित करती रही हैं। यही नहीं जिन मोदी के खिलाफ दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल से एक भी शब्द दिल्ली की जनता सुनना पसंद नहीं करती रही है और जनता का रुख देखकर केजरीवाल को मोदी की सार्जनिक आलोचना से परहेज करना पड़ा, उन्हीं मोदी को चुनावी रण में केजरीवाल के खिलाफ बीजेपी की ओर से ला खड़ा किया गया है।

दिल्ली में काम किया है तो वोट देना कहने वाले सीएम के सामने काम के मामले में सवाल झेलने वाले पीएम की छवि का होना ये सीएम के कद को वजनदार बनाता है और पीएम के कद को कम करता है। जाहिर सी बात, बीजेपी के पास केजरीवाल के सामने मोदी से बढ़िया कोई जवाब नजर नहीं आया और मजबूरी में उन्हें इस नतीजे पर पहुंचना पड़ा। पीएम से नजदीकियों, बिहारी बहुल वोट बैंक की मजबूरी या कुछ भी कहें, कई मौकों और वाकयों के दौरान ऐसा लगा कि दिल्ली के सीएम बनने का सपना पालने वाले रील लाइफ के हीरो और गायक मनोज तिवारी अपने सपनों की रियल लाइफ की तरफ ले जाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन अब इसकी संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखाई पड़ रही है। दरअसल मनोज तिवारी की सपनों की राह में उनके खुद का कलाकार ज्यादा और नेता कम होना तो है ही, पार्टी में हर्षवर्धन, विजय गोयल, प्रवेश वर्मा जैसे नेताओं का उनके नाम पर असहमति-असहयोग भी नजर आता है। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव में विपक्ष से मोदी के मुकाबाले पीएम उम्मीदवार का चेहरा पूछने वाली बीजेपी दिल्ली में केजरीवाल के खिलाफ सीएम उम्मीदवार का चेहरा नहीं पेश कर पाई है।

पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने ट्वीट कर कहा है, ‘मुझे पूरा भरोसा है कि लोकतंत्र के इस महापर्व में लोग उसी सरकार को चुनेंगे, जो उनकी आकांक्षाओं को पूरा करता हो। दिल्ली की जनता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उन लोगों को हराएगी जो पिछले पांच साल से जनता को सिर्फ गुमराह कर रहे हैं।‘ पिछले दिनों अमित शाह ने बूथ कार्यकर्ताओं की मीटिंग में केजरीवाल को निशाने पर तो लिया, लेकिन केजरीवाल के मुताबिक, वह सिर्फ उन्हें गाली देते नजर आए, उनकी कमियां नहीं बता पाए। अमित शाह केजरीवाल को अर्बन नक्सल भी कहते रहे हैं और उन्हें जेएनयू की विचारधारा से जोड़ते रहे हैं। जेएनयू में छात्रों के साथ हुई गुंडागर्दी के ठीक बाद हो रहे चुनाव की तारीख के ऐलान के भले ही कोई तार न जुड़े हों, मगर इस आग की लपटें भी चुनाव में असर डालेंगी।

केजरीवाल को अर्बन नक्सल बताने वाले अमित शाह और उनकी पार्टी जहां जेएनयू की पुरानी घटनाओं और सरकार के खिलाफ हुए प्रदर्शनों से केजरीवाल को जोड़कर देखती रही है, वहीं केजरीवाल के केंद्र विरोध को भी जेएऩयू से ‘खाद-पानी’ मिलता रहा है या फिर वो सरकार के विरोध में अपने लिए समर्थन की तलाश में जेएनयू के साथ खड़े नजर आते रहे हैं। 

मोहल्ला क्लीनिक को और सरकारी स्कूलों की तालीम को लेकर अक्सर विरोधियों के निशाने पर रहने वाले केजरीवाल की सरकार से सेहत, बिजली-पानी और प्राइवेट स्कूलों की ‘दादागीरी’ के मामले में दिल्ली की  अधिकतर जनता तकरीबन संतुष्ट नजर आती है और बीजेपी के पास केजरीवाल की इस कारीगरी का जवाब फिलहाल जनता को तो नहीं दिखेगा। बीजेपी को अभी सोचना पड़ेगा कि वो किस तरीके से केजरीवाल से बेहतर विकल्प के रूप में खुद को साबित करेगी और वह भी पीएम नरेंद्र मोदी के चेहरे को सामने लेकर। रोजी रोटी और आर्थिक मसलों पर परेशान दिल्ली की ज्यादातर जनता को सिर्फ रोजमर्रा के सवालों का जवाब चाहिए और ये बात उनको बीजेपी की कार्यशैली से ज्यादा केजरीवाल की कार्यशैली में नजर आती है। तमाम विरोध, सहमतियों और असहमतियों के बावजूद केजरीवाल में दिल्ली की ज्यादातर जनता को आम आदमी और आम आदमी के लिए काम करने वाला नेता नजर आता है।

आर्थिक मंदी और बेरोजगारी के लिए जिम्मेदार मानी जाने वाली बीजेपी ने जिस तरह से एनआरसी, सीएए, एनपीआर जैसे मुद्दों को आगे करने का काम किया है उससे न तो चुनाव जीतने में उसे सफलता मिलने वाली है और न ही इन मुद्दों पर विरोध में कमी आने वाली है। यही वजह है अनुच्छेद 370. 35A, मुस्लिम महिलाओं के लिए तलाक कानून और आखिरकार राम मंदिर जैसे मामलों में अपने ग्राफ को बढ़ाती हुई नजर आने वाली बीजेपी का असर धीरे-धीरे जनमानस में कम हो रहा है और वह जनाधार खो रही है।

महाराष्ट्र और झारखंड को खो चुकी बीजेपी के हाथ में दिल्ली आएगी, उसकी कोई गारंटी फिलहाल नहीं दिखाई दे रही है और हां अगर पार्टी हारती है तो उसका एक कारण उनके नेताओं का आपसी अंतर्विरोध भी माना जाएगा।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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विस्तार के साथ ही कवरेज का दायरा सिकुड़ रहा है, परिणाम सोच लीजिए मिस्टर मीडिया!

अगर हमारी मानसिक सीमाएं सिकुड़कर केवल टीआरपी की होड़ पर टिक जाएंगीं तो इसका खामियाजा कौन भुगतेगा?

राजेश बादल by
Published - Thursday, 09 January, 2020
Last Modified:
Thursday, 09 January, 2020
mrmedia

राजेश बादल , वरिष्ठ पत्रकार ।।

अटपटा सा लगता है। अपने चैनल और अखबार देखिए। जिन्हें हम राष्ट्रीय कहते हैं, क्या वे वाकई पूरे हिन्दुस्तान का प्रतिनिधित्व करते हैं? उनका बड़ा हिस्सा स्थानीय और चंद प्रदेशों की खबरों में सिमट जाता है। तुलनात्मक रूप से उत्तर पूर्व, पूरब, पश्चिम और दक्षिण के प्रदेशों की आंतरिक खबरों को कोई खास तरजीह नहीं मिलती। कभी कभार कुछ बहुत बड़ी घटना इन बीस से अधिक राज्यों में घट जाए तो थोड़े समय के लिए बिजली की तरह वहां के समाचार कौंध जाते हैं। सामान्य होते ही फिर उन राज्यों के समाचार नदारद हो जाते हैं। दिनों दिन हमारे मीडिया का विस्तार हो रहा है, कारोबार बढ़ रहा है, तकनीक के कारण संचार साधनों की पहुंच एकदम स्थानीय स्तर पर होती जा रही है। लेकिन कवरेज का दायरा सिकुड़ता जा रहा है। ऐसा क्यों है? क्या इससे हम अपने पाठकों और दर्शकों के साथ न्याय कर रहे हैं? शायद नहीं। 

एक जमाना था, जब आज़ादी के बाद भारतीय राज्यों के निवासी अपने घरों से बाहर निकलकर नौकरी करने अथवा व्यापार करने के लिए दूर दूर छलांग लगाने में एक बार नहीं, दस बार सोचते थे। आज स्थिति बदली हुई है। बड़ी संख्या में दक्षिण भारत के लोग उत्तर भारत में रहते हैं तो उत्तर के लोग दक्षिण में बसे हैं। पूरब के बाशिंदे पश्चिम में हैं और पश्चिमवासी पूरब में डटे हुए हैं। ऐसे में सब अपने अपने प्रांत के समाचार देखना, सुनना और पढ़ना चाहते हैं। मगर उनकी यह मानसिक खुराक पूरी नहीं होती। वे अपनी जमीन की खबरों के लिए तरसते हैं। दुनिया भर में फैले भारत के लोग उपग्रह- संचार सुविधा के जरिए अपने मुल्क़ के ताज़ातरीन घटनाक्रम से वाक़िफ़ रहना चाहते हैं। वे निराश हो जाते हैं, जब उन्हें भारत के प्रतिनिधि चैनल राष्ट्र की समग्र तस्वीर नहीं परोसते। वे किसी एक ऐसे चैनल या समाचारपत्र की तलाश में रहते हैं, जो उन्हें जानकारियों के स्तर पर संतुष्ट कर सके। क्या उन लोगों के प्रति भी हम अन्याय नहीं कर रहे हैं?

जब अखबारों और टेलिविजन के परदे पर संपूर्ण राष्ट्रीय चरित्र नहीं उभरता तो अंतरराष्ट्रीय समाचारों और सम सामयिक प्रसंगों की चर्चा करना ही क्या। विदेश नीति, व्यापार, रक्षा, वन और पर्यावरण, अंतरिक्ष विज्ञान, साहित्य और संस्कृति ऐसे ही क्षेत्र हैं। इनके  अंतरराष्ट्रीय कवरेज से वंचित करने की गैर इरादतन साजिश का मुकाबला कैसे हो? एक ही नमूना पर्याप्त होगा। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के समाचार सिर्फ तीसरे विश्वयुद्ध की आहट पर सिमट गए। दोनों मुल्कों के हथिया भण्डार की तुलना होने लगी। ऐसा लगा, जैसे दोनों देश जंग छेड़ने के लिए भारतीय मीडिया के इशारे का इंतजार कर रहे हैं। अपवाद छोड़ दीजिए। क्या किसी चैनल या अखबार ने इस बात पर अपने कवरेज को फोकस किया कि डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका में दूसरी पारी खेलने के लिए चुनाव मैदान में हैं। जब वे पहली पारी के लिए प्रचार अभियान कर रहे थे तो लगातार अपने ट्वीट करके अमेरिका में खलबली मचा दी थी। इन ट्वीट में कहा गया था कि बराक ओबामा अपने सियासी हित में ईरान पर पक्के तौर पर हमला करेंगे। क्या यही बात  अब ट्रंप पर भी लागू नहीं होती? इसके अलावा वे महाभियोग का सामना कर रहे हैं। क्या ईरान पर हमले से उन्हें इस मामले में कोई राजनीतिक फायदा मिल सकता है? इन सवालों की पड़ताल पत्रकारिता के किस अंग ने की? यही नहीं, भारत को अमेरिकी दबाव में ईरान से रिश्ते कमजोर बिंदु पर ले जाने पड़े हैं। इसके क्या दूरगामी नुकसान होंगे? चाबहार बंदरगाह से कारोबार में रुकावटें बढ़ी हैं। पाकिस्तान को अमेरिका ने फिर फौजी ट्रेनिंग देने का फैसला किया है। हमारे लिए क्या चेतावनी है- इस पर भी शायद ही कहीं गंभीर बहस हुई हो। 

अगर हमारी मानसिक सीमाएं सिकुड़कर केवल टीआरपी की होड़ पर टिक जाएंगीं तो इसका खामियाजा कौन भुगतेगा? आज का नौजवान तो पहले ही अखबारों और टेलिविजन के खबरिया चैनलों से अपना फासला बना चुका है। परिणाम सोच लीजिए मिस्टर मीडिया! 

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: साल भर जहरीली सांसें छोड़ता रहा मीडिया!

मिस्टर मीडिया: समय का संकेत नहीं समझने का है ये नतीजा

मिस्टर मीडिया: दंड तो यही बनता था, लेकिन क्या ये 'एनकाउंटर' है?

मिस्टर मीडिया: इसलिए उचित और जायज है मीडिया ट्रायल

 

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यूनिवर्सिटी में जब जब नारा लगेगा ‘हम देखेंगे’ न्यूज चैनल से आवाज आएगी ‘कीप वाचिंग’

वैसे तो हिंदुस्तान की परम्परा है कि बच्चे लड़ रहे हों तो बड़े बीच में नही पड़ते

प्रमिला दीक्षित by
Published - Wednesday, 08 January, 2020
Last Modified:
Wednesday, 08 January, 2020
Pramila Dixit

प्रमिला दीक्षित, वरिष्ठ पत्रकार।।

वैसे तो हिंदुस्तान की परम्परा है कि बच्चे लड़ रहे हों तो बड़े बीच में नही पड़ते। बच्चे लड़-भिड़कर एक हो जाते हैं, लेकिन बड़ों के बीच में पड़ने से परिवार का सौहार्द खत्म हो जाता है। लेकिन जब से मोहल्ले में टीआरपी लोभी डायरेक्टरों के शातिर सीरियलों की एंट्री हुई है, परिवार के लोग ही बच्चों को प्यादों की तरह इस्तेमाल करने लगे हैं। उन्हें सिखाते हैं हिंदुस्तान किसी के बाप का नहीं है, लेकिन धीमे से उनके मन में बीज बो जाते हैं कि यूनिवर्सिटी तुम्हारे बाप की ही है। प्रेमचंद के हीरा-मोती को दुलत्ती मारकर फैज के लिए लड़ मरने की प्रेरणा देते हैं। अब नौजवान ‘हम देखेंगे’ कहकर ही पिटे जा रहा है। अबे देखोगे तो तब जब आंख-कान दोनों खुले रखोगे। विडियो में कोई दूसरा ऑडियो भरकर आंखों के सामने ठेल देगा तो देखकर भी का कर लोगे?

वीसीआर में रोज नए कैसेट भरे जा रहे हैं। आप बाएं कान से सुनते हो? लीजिए आप ये विडियो लीजिए। आप राइट मैन हो? तो आपके लिए ये दो विडियो! आज़ादी के बाद से ये क्रांति-व्रांति चतुर आदमी के चोंचले होते हैं। हमाई ना मानो तो अन्ना से पूछ लो। जेएनयू इस वक्त यूनिवर्सिटी नहीं है। किसी का कंधा है, किसी का मौका, किसी की प्रयोगशाला! और यहां आम आदमी इत्ता कन्फ्यूज कि यार असल में मसला क्या है, फीस या सीएए?  क्यूंकि हो सकता है कि दोनों को लेकर लोग आपके पक्ष में ना हों, लेकिन किसी एक पर हो सकते हैं।

बॉलिवुड में कोई खास दिलचस्पी या किसी से दुश्मनी नहीं है, लेकिन बाय गॉड इंडस्ट्री में जिस वक्त जिसका सितारा बुलंद होता है, इतने निहायत प्रोफेशनल होते हैं कि निर्भया जैसे मौके पर भी बोलने से पहले सोचते हैं कि  वक्त, छवि, पैसे का कोई नफा-नुकसान तो नहीं हो रहा? इसलिए जब जेएनयू में छपाक एंट्री होती है तो संशय होता है। इसमें रीढ़ दिखाने जैसा कुछ नहीं है। रीढ़ तब दिखती, जब मुंह से कुछ शब्द फूटते। लेकिन चूंकि वो स्क्रिप्ट में था नहीं और लिखा हुआ पढ़ने के आदी लोग इतने अबोध हैं कि वो जानते ही नहीं वो किसी मसले में कहां खड़े हैं!

कुछ पत्रकार दीपिका के समर्थन में लिख रहे हैं ब्रेव! लगे हाथों अपने प्रोग्राम की टाइमिंग भी बताए दे रहे हैं कि इत्ते बजे हमारा प्रोग्राम भी देख लीजिए, आज ही आएगा, दीपिका की पिक्चर आने में तो अभी टाइम है! वैसे, ‘हम देखेंगे’ का सही मजा तो चैनल वाले ले रहे हैं। जब-जब यूनिवर्सिटी से आवाज आएगी ‘हम देखेंगे’,  चैनल दुहराएंगे ‘कीप वाचिंग’!

बाकी आईआईटी कानपुर अब नज्मों पर शोध करेगा तो जाहिर है पानी से चलने वाली कार अब जावेद अख्तर ही खोजेंगे। और कित्ती आजादी चाहिए बे, इत्ती आजादी लेकर जाओगे कहां?

(ये लेखिका के निजी विचार हैं।)

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अखबारों को साख बचाने के लिए करना होगा ये काम

भारत, चीन और जापान में आज भी प्रिंट मीडिया की तूती बोल रही है। भारत में तो डिजिटल ही संकट में दिखता है

Last Modified:
Friday, 03 January, 2020
newspaper

प्रो. संजय द्विवेदी

बदलेंगे, बचेंगे और बढ़ेंगे भारत के अखबार ।।

डिजिटल मीडिया की बढ़ती ताकत, मोबाइल क्रांति और सोशल मीडिया की उपलब्धता ने पढ़ने की दुनिया को काफी प्रभावित किया है। पढ़े जाने वाले अखबार, अब पलटे भी कम जा रहे हैं। केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने एक बार रायपुर में ‘मीडिया विमर्श’ पत्रिका के आयोजन में कहा था कि ‘पहले एक अखबार पढ़ने में मुझे 40 मिनट लगते थे अब उतनी देर में दर्जन भर अखबार पलट लेता हूं।’ वे ठीक कह रहे हैं, किंतु पढ़ने का समय घटने के लिए अखबार अकेले जिम्मेदार नहीं हैं। अखबारों को देखें तो वे पुराने अखबारों से बहुत सुदर्शन हुए हैं। आज वे बेहतर प्रस्तुति के साथ, अच्छे कागज पर, उन्नत टेक्नोलॉजी की मशीनों पर छप रहे हैं। वे मोटे भी हुए हैं। उनकी प्रस्तुति टीवी से होड़ करती दिखती है। उनके शीर्षक बोलने लगे हैं, कई बार टीवी की भाषा ही उनकी भाषा है। उनका कलेवर बहुत आकर्षक हो चुका है। बावजूद इसके पठनीयता के संकट को देखते हुए यह जरूरी है कि अखबार नए तरीके से प्रस्तुत हों और ज्यादा ‘लाइव प्रस्तुति’ के साथ आगे आएं। तमाम समाचार पत्र ऐसे प्रयोग कर भी रहे हैं। अखबारों को चाहिए कि वे तटस्थता से हटकर एकात्मता की ओर बढ़ें। पूरे अखबार में एक लय और एक स्वर या संगीत की तरह एक सुर हो। ताकि उस भावभूमि का पाठ सीधा उस अखबार से अपना भावनात्मक रिश्ता जोड़ सके।

विशिष्टता की ओर बढ़ें-

एक समय में अखबार का सर्वग्राही होना उसकी सफलता की गारंटी होता था। वह सब कुछ साथ लेकर चलता था। किंतु अब समय है कि अखबार अपने आप में विशिष्टता पैदा करें कि आखिर वे किस पाठक वर्ग के साथ जाना चाहते हैं। इसका आशय यह भी है कि अखबार को अब अपना व्यक्तित्व विकसित करना होगा। उन्हें खास दिखना होगा। उसको किसे संबोधित करना है, इसका विचार करना होगा। उन्हें झुंड से अलग दिखना होगा। एक समर्पित संस्था की तरह काम करना होगा। अब वे सिर्फ खबर देकर मुक्त नहीं हो सकते, उन्हें अपने सरोकारों को स्थापित करने के लिए आगे आना होगा। सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया की हर हाथ में उपलब्धता के बाद खबर देने का काम अब अकेला अखबार नहीं करता। अखबार जब तक छपकर आता है, तब तक खबरें वायरल हो चुकी होती हैं। टीवी, डिजिटल माध्यम और सोशल मीडिया खबरें ब्रेक कर चुके होते हैं। यानि अब अखबार का मुख्य उत्पाद खबर नहीं है। उसका सरोकार, उसकी विश्लेषण शक्ति, उसकी खबरों के पीछे छिपे अर्थों को बताने की क्षमता, व्याख्या की शैली यहां महत्वपूर्ण हैं। अखबार को स्थानीय जनों से एक रिश्ता बनाना पड़ेगा जिसके मूल में खबर नहीं स्थानीय सामाजिक सरोकार होंगे। सामाजिक सरोकारों से गहरी संलग्नता ही किसी अखबार की स्वीकार्यता में सहायक होगी। शायद इसीलिए अब अखबार इवेंट्स और अभियानों का सहारा लेकर लोगों के बीच अपनी पैठ बना रहे हैं। इससे ब्रांड वैल्यू के साथ स्थानीय सरोकार भी स्थापित होते हैं।

डेस्क नहीं सीधे मैदान से-

अखबारों को अगर अपनी उपयोगिता बनाए रखनी है, तो उन्हें मैदानी रिर्पोटिंग पर ध्यान देना होगा। टीवी, डिजिटल सोशल मीडिया और हर जगह ज्ञान देने वाले की फौज है पर मैदान में उतरकर वास्तविक चीजें और खबरें करने वाले लोग कम हैं। एक ही ज्ञान इतने स्थानों से कॉपी होकर निरंतर प्रक्षेपित हो रहा है कि अब लोग नए विचारों की प्रतीक्षा में हैं। नई खबरों की प्रतीक्षा में हैं। ये खबरें डेस्क पर लिखी और रची हुई नहीं होंगी। इसमें माटी की महक और जमीन हो रहे संघर्षों की धमक होगी। इन खबरों में आम लोगों की जिंदगी होगी जो अपने पसीने की खुशबू से इस दुनिया बेहतर बनाने में लगे हैं। यहां सपने होंगे, उम्मीदें होंगी और असंभव के संभव बनाते भागीरथ होंगे। इसके लिए हमें बोलने के बजाए सुनने का अभ्यास करना होगा। इसे ही ‘इंटरेक्टिव’ होना कहते हैं। यह मंच एकतरफा बात के बजाए संवाद का मंच होगा। अपने पाठकों और उनकी भावनाओं का विचार यहां प्रमुख होगा। उन पर चीजें थोपी नहीं जाएंगी, उन्हें बतायी जाएंगी, समझायी जाएंगी और उस पर उनकी राय का भी आदर किया जाएगा।

लोकतांत्रिक विमर्शों के मंच बनकर ही अखबार अपनी साख बना और बचा पाएंगे। अखबार विचारों को थोपने के बजाए, विमर्श के मंच की तरह काम करेगें। सब पक्षों और सभी राय को जगह देते हुए एक सुंदर दुनिया के सपने को सच बनाते हुए दिखेंगे। समाचार और विचार पक्ष अलग-अलग हैं और उन्हें अलग ही रखा जाएगा। खबरों में विचारों की मिलावट से बचने के सचेतन प्रयास भी करने होंगे। विचार के पन्नों पर पूरी आजादी के साथ विमर्श हों, हर तरह की राय का वहां स्वागत हो। विचारों की विविधता भी हो और बहुलता भी हो। पत्रकार अपनी पोलिटिकल लाइन तो रखें तो लेकिन पार्टी लाइन से बचें यह भी ध्यान रखना होगा। क्योंकि अखबार की विश्वसनीयता और प्रामणिकता इससे ही स्थापित होती है।

समस्या नहीं समाधान बनें-

हमारे समाज की एक प्रवृत्ति है कि हम समस्याओं की ओर बहुत आकर्षित होते हैं और समाधानों की ओर कम सोचते हैं। अखबारों ने भी अरसे से मान लिया है कि उनका काम सिर्फ संकटों की तरफ इंगित करना है,उंगली उठाना है।हमारा समाज भी ऐसा मानता है कि हमसे क्या मतलब ? जबकि यह हमारा ही समाज है, हमारा ही शहर है और हमारा ही देश है। इसके संकट, हमारे संकट हैं। इसके दर्दों का समाधान ढूंढना और अपने लोगों को न्याय दिलाना हमारी भी जिम्मेदारी है। एक संस्था के रूप में अखबार बहुत ताकतवर हैं। इसलिए उन्हें सामान्यजनों की आवाज बनकर उनके संकटों के समाधान के प्रकल्प के रूप में सामने आना चाहिए। वे सहयोग के लिए हाथ बढ़ाएं और एक ऐसा वातावरण बनाएं जहां अखबार सामाजिक उत्तरदायित्वों का वाहक नजर आए। मजलूमों के साथ खड़ा नजर आए। ऐसे में पत्रकार सिर्फ घटना पर्यवेक्षक नहीं, कार्यकर्ता भी है। जिसे हम ‘जर्नलिस्टिक एडवोकेसी’ कह सकते हैं। ऐसे अभियान अखबार की जड़ें समाज में इतनी गहरी कर देते हैं कि वे ‘भरोसे का नाम’ बन जाते हैं।

मीडिया कन्वर्जेंस एक अवसर-

आज के समय में एक मीडिया में काम करते हुए आप दूसरे मीडिया का सहयोग लेते ही हैं। एक अखबार चलाने वाला संस्थान आज निश्चित ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय है तो वहीं वह डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी उसी सक्रियता के साथ उपस्थित है। इस तरह हम अपने संदेश की शक्ति को ज्यादा प्रभावी और व्यापक बना सकते हैं। हमें यह ध्यान रखना होगा कि प्रिंट पर लोग कम आ रहे हैं, या उनका ज्यादातर समय अन्य डिजिटल माध्यमों और मोबाइल पर गुजर रहा है। ऐसे में इस शक्ति को नकारने के बजाए उसे स्वीकार करने में ही भलाई है।

आपके अखबार की ‘ब्रांड वैल्यू’ है, सालों से आप खबरों के व्यवसाय में हैं, इसकी आपको दक्षता है, इसलिए आपने लोगों का भरोसा और विश्वास अर्जित किया है। इस भीड़ में अनेक लोग डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म पर खबरों का व्यवसाय कर रहे हैं। किंतु आपकी यात्रा उनसे खास है। आपका अखबार पुराना है, आपके अखबार को लोग जानते हैं, भरोसा करते हैं। इसलिए आपके डिजिटल प्लेटफॉर्म को पहले दिन ही वह स्वीकार्यता प्राप्त है, जिसे पाने के लिए आपके डिजिटल प्रतिद्वंदियों को वर्षों लग जाएंगें। यह एक सुविधा है, इसका लाभ अखबार को मिलता ही है। अब कटेंट सिर्फ प्रिंट पर नहीं होगा। वह तमाम माध्यमों से प्रसारित होकर आपकी सामूहिक शक्ति को बहुत बढ़ा देगा। आज वे संस्थान ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं, जो एक साथ आफलाइन ( प्रिंट), आनलाइन( पोर्टल,वेब, सोशल मीडिया), आन एयर(रेडियो), मोबाइल(एप) आनग्राउंट( इवेंट) पर सक्रिय हैं। इन पांच माध्यमों को साधकर कोई भी अखबार अपनी मौजूदगी सर्वत्र बनाए रख सकता है। ऐसे में बहुविधाओं में दक्ष पेशेवरों की आवश्यकता होगी, तमाम पत्रकार इन विधाओं में पारंगत होंगे। उनके विकास का महामार्ग खुलेगा। मल्टी स्किल्ड पेशेवरों के साथ एकीकृत विपणन और ब्रांडिग सेल्युशन की बात भी होगी। कन्वरर्जेंस से मानव संसाधन का अधिकतम उपयोग संभव होगा और लागत भी कम होगी। अचल संपत्ति की लागत और समाचार को एकत्र करने की लागत भी इस सामूहिकता से कम होगी।

प्रिंट मीडिया ही है लीडर-

सारे तकनीकी विकास और डिजिटिलाइजेशन के बावजूद भी भारत जैसे बाजार में प्रिंट ही कमा रहा है। एशिया और लैटिन अमरीका में प्रिंट के संस्करण विकसित हो रहे हैं। भारत, चीन और जापान में आज भी प्रिंट मीडिया की तूती बोल रही है। भारत में तो डिजिटल ही संकट में दिखता है क्योंकि उसने मुफ्त की आदत लगा दी है। जबकि प्रिंट मीडिया ने इसका खासा फायदा उठाया। सारी प्रमुख न्यूज वेबसाइट्स अपने प्रिंट माध्यमों की प्रतिष्ठा का लाभ लेकर अग्रणी बनी हुई हैं। भारत जैसे देश में क्षेत्रीय व भाषाई पत्रकारिता में विकास के अपार अवसर हैं। राबिन जेफ्री ने प्रिंट मीडिया के विकास के तीन चरण बताए थे- रेयर, एलीट और मास। अभी भारत ने तो ‘मास’ में प्रवेश ही लिया है।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में मास कम्युनिकेशन के प्रोफेसर हैं।)

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बहुत याद आएंगे वरिष्ठ पत्रकार राधेश्याम शर्मा...

आज की पत्रकारिता में वैचारिक आस्थाएं जिस तरह कट्टरता में बदली हैं और अखाड़ों में पहलवानों की तरह खम ठोंके जा रहे हों वहां राधेश्याम जी जैसे पत्रकार की मौजूदगी एक दीपस्तंभ की तरह थी

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 02 January, 2020
Last Modified:
Thursday, 02 January, 2020
radheshyam

प्रो. संजय द्विवेदी ।।

इस साल का दिसंबर महीना जाते-जाते एक ऐसा आघात दे गया है जिसे हमारे जैसे तमाम लोग अरसे तक भूल नहीं पाएंगे। यह 28 दिसंबर, 2019 का दिन था, शनिवार का दिन, इसी दिन शाम को हमारे प्रिय पत्रकार-संपादक और अभिभावक राधेश्याम शर्मा ने पंचकूला में आखिरी सांसें लीं। साल के आखिरी दिन 31 दिसंबर को भोपाल के माधवराव सप्रे संग्रहालय में नगर के बुद्धिजीवी पत्रकार और संपादक जुटे, उन्हें अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि देने। इस शोकसभा की खासियत यह थी कि यहां सभी धाराओं के बुद्धिजीवियों ने राधेश्याम शर्मा को जिस रूप में याद किया वह दुर्लभ है।

इस महती सभा में रघु ठाकुर से लेकर विजयदत्त श्रीधर, कैलाशचंद्र पंत, महेश श्रीवास्तव, लज्जाशंकर हरदेनिया, राजेंद्र शर्मा, राकेश दीक्षित, दविंदर कौर उप्पल, गिरीश उपाध्याय, विजयमनोहर तिवारी और लाजपत आहूजा तक की मौजूदगी बताती है कि राधेश्याम जी का संपर्कों का संसार कितना व्यापक था। एक पत्रकार जिसकी अपनी वैचारिक आस्थाएं बहुत प्रकट हों, जिसने अपने विचाराधारात्मक आग्रहों को कभी छिपाया नहीं, किंतु उसकी राजनीति के सभी धाराओं के नायकों से ‘भरोसे वाली दोस्ती हो’ यह संभव कहां है?

आज की पत्रकारिता में वैचारिक आस्थाएं जिस तरह कट्टरता में बदली हैं और अखाड़ों में पहलवानों की तरह खम ठोंके जा रहे हों वहां राधेश्याम जी जैसे पत्रकार की मौजूदगी एक दीपस्तंभ की तरह थी। जहां विचारों के साथ मनुष्यता और संवेदना जगह पाती थी। उन्होंने अपनी वैचारिक और व्यावसायिक प्रतिबद्धता को हमेशा अलग रखा।

अपने विद्यार्थी जीवन में काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी में पढ़ते हुए ही वे पत्रकारिता से जुड़ गए थे। 1956 में उन्होंने पूरी तरह अपने आपको पत्रकारीय कर्म में समर्पित कर दिया। तब से लेकर आजतक मध्यप्रदेश से लेकर पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली की पत्रकारिता में उन्होंने अपने उजले पदचिन्ह छोड़े। एक नगर प्रतिनिधि से काम प्रारंभ कर वे विशेष संवाददाता और फिर दैनिक ट्रिब्यून, चंडीगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण अखबार के संपादक बने। इतने बड़े अखबार के संपादक पद पर रहते हुए ही उन्होंने उसे छोड़कर मीडिया शिक्षा के लिए खुद को समर्पित कर दिया और 1990 में भोपाल में स्थापित हुए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पहले महानिदेशक (अब पदनाम कुलपति है) बने। इसके बाद वे हरियाणा साहित्य अकादमी के निदेशक भी बने। अपनी पूरी जीवन यात्रा में उन्होंने कभी मूल्यों से समझौता नहीं किया।

सक्रिय पत्रकार, योग्य संपादकः

भोपाल के तमाम लोग उनकी पत्रकारिता के गवाह हैं, जिन्होंने एक रिर्पोटर के रूप में उनकी सक्रियता भरे दिन देखे हैं। राजनेताओं से उनकी निकटता जगजाहिर थी। दैनिक युगधर्म के संवाददाता के रूप में वे भोपाल में पदस्थ थे। उनका अखबार जबलपुर से निकलता था, कुछ प्रतियां ही भोपाल आती थीं। किंतु उनका संपर्क और व्यवहार ऐसा था कि लोग उनपर भरोसा करते थे। कांग्रेस, भाजपा, सोशलिस्ट,कम्युनिस्ट सब उनके दोस्त थे। दोस्ती भी ऐसी कि ‘राज की बातें’ उन्हें बताते, जिसकी गवाही सुबह उनका अखबार देता था। राजनीतिक गलियारों में उन दिनों भोपाल के वीटी जोशी, लज्जाशंकर हरदेनिया, सत्यनारायण श्रीवास्तव, दाऊलाल साखी, तरूण कुमार भादुड़ी जैसे पत्रकारों की तूती बोलती थी। किंतु राधेश्याम जी इन सबमें अपनी संपर्कशीलता, सरल स्वभाव और पारिवारिक रिश्तों के चलते एक अलग स्थान रखते थे। आज भी भोपाल के लोग उन्हें याद कर भावुक हो उठते हैं।

बाद के दिनों में वे ‘युगधर्म’ के संपादक होकर जबलपुर चले गए और उसके बाद वे चंडीगढ़ चले गए। इन सारे प्रवासों के बीच भी भोपाल उनका एक घर बना रहा। वे आते तो सबकी हाल लेते, सबसे मिलते और परिवारों में जाते। अपने साथियों और अधीनस्थों के परिजनों, बच्चों की स्थिति, प्रगति,पढ़ाई और विवाह सब पर उनकी नजर रहती थी। अपने लंबे पत्रकारीय जीवन में उन्होंने अनेक सर्वोच्च नेताओं, प्रधानमंत्रियों, राष्ट्रपतियों और समकालीन विविध क्षेत्रों के लोगों से लंबे इंटरव्यू किए। मुलाकातें कीं। किंतु उन्हें दादा माखनलाल चतुर्वेदी के साथ उनकी भेंटवार्ता सबसे प्रेरक लगती थी। वे उसे बार-बार याद करते थे। इस भेंट में माखनलाल जी ने उनसे कहा था – “पत्रकार की कलम न अटकनी चाहिए, न भटकनी चाहिए, न रुकनी चाहिए, न झुकनी चाहिए।” राधेश्याम जी ने इसे अपना जीवन मंत्र बना लिया। अपने संवादों में वे अक्सर इस बात को रेखांकित करते थे। यह संयोग ही था कि वे बाद में दादा के नाम पर बने विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति भी बने। उनके मीडिया चिंतन पर पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल ने ‘मीडियाः क्रांति या भ्रांति’ शीर्षक से पुस्तक का प्रकाशन भी 2015 में किया, जिसमें मीडिया को लेकर उनके विमर्शों से हम परिचित हो सकते हैं। सही मायनों में संपादकों की विलुप्त हो रही पीढ़ी में वे एक ऐसे नायक हैं, जिन-सा होना बहुत कठिन है। अपने पद के वैभव और प्रभाव के परे वे बेहद संवेदनशील इंसान थे, जिसने सबका भला चाहा और किया।

पत्रकारिता विश्वविद्यालय की बगिया के मालीः

उनके हिस्से एक ऐतिहासिक उपलब्धि है- भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की स्थापना और उसका पहला महानिदेशक नियुक्त होना। एक-एक व्यक्ति को जोड़कर उन्होंने इस विश्वविद्यालय को खड़ा किया और उसकी प्रगति की हर सूचना पर हर्षित होते थे। वे जब भी मिलते तब कहते मैं तो इस ‘बगिया का माली’ रहा। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे हर छोटे से छोटे व्यक्ति को यह अहसास कराते कि वह कितना महत्त्वपूर्ण है। उनकी इसी विशेषता को रेखांकित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शर्मा ने लिखा-“वे केवल राजनेताओं के ही नहीं, अपितु भोपाल के श्रेष्ठ पत्रकारों को एक माला में पिरोने वाले व्यक्ति भी थे।पारिवारिकता उनका वैशिष्ठ्य थी।”  पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पुराने छात्र जो आज मीडिया में शिखर पदों पर हैं, उन्हें एक पिता के रूप में याद करते हैं। उनका अभिभावकत्व इतना प्रखर था कि वे इसके अलावा किसी और संज्ञा से नवाजे भी नहीं जा सकते थे। आज जबकि यह विश्वविद्यालय देश में मीडिया शिक्षा का सबसे बड़ा और स्थापित केंद्र बन चुका है, राधेश्याम जी की स्मृति बहुत स्वाभाविक और मार्मिक हो उठती है। उनके महानिदेशक रहते हुए ही मैंने भी स्नातक के छात्र रूप में विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया था। मैं लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक करके आया था और कुलपति के पद की गरिमा को जानता था। किंतु राधेश्याम जी ने एक स्नातक के छात्र से न सिर्फ परिचय प्राप्त किया बल्कि अपने घर पर बुलाकर चाय-नाश्ता कराया और बेहद वात्सल्यमयी अपनी धर्मपत्नी से मिलाया। उनके उस दुलार को  सोचकर आज हैरत होती है कि पत्रकारिता के शिखरों पर रहे शर्मा सर इतनी आत्मीयता कहां से लाते हैं? वे बहुत बड़े थे, जीवन से, मन से और कृति से भी। इसका अहसास उनकी स्नेहछाया में बैठकर होता था।

बाद के दिनों में वे चंड़ीगढ़ चले गए और मैं अखबारों में काम करते हुए रायपुर, बिलासपुर, मुंबई की परिक्रमा कर भोपाल वापस आ गया। इन दिनों में कोई ऐसा समय नहीं था, जब उन्होंने हमें याद न किया हो। मैं बिलासपुर गया तो बोले मेरे भाई वहां डाक्टर हैं, उनसे मिलो। रायपुर में भी उनके दोस्तों की एक पूरी दुनिया थी। वे बोलते मिलते-जुलते क्यों नहीं ? हमेशा कहते थे “रोज अपने तीन पूर्व परिचितों से मिलो और एक नया संपर्क रोज बनाओ।” पत्रकारिता में आ रहे लोगों के लिए एक पाठ है यह। हम अमल नहीं कर पाए पर मानते हैं कि कर पाते तो दुनिया ज्यादा बड़ी और बेहतर होती। मेरी शादी से लेकर जीवन के हर प्रसंग उन्होंने चिठ्ठियां भेजीं, फोन किए। आज भी जब तक वे बहुत अस्वस्थ नहीं हो गए, फोन करते हालचाल पूछते। हालचाल मेरा, विश्वविद्यालय का, परिवार का, अपने दोस्तों का। कई बार यह लगता है कि वे इतनी आत्मीयता क्यों देते थे, ऐसा क्या था जो उन्हें हम जैसों से जोड़ता था। वे क्यों हमारी यह खुशफहमियां बनाए रखना चाहते थे कि हम बहुत खास हैं।

देश में ऐसे न जाने कितने लोग ऐसे थे जो मानते थे कि वे शर्मा जी के बहुत करीबी हैं। एक महापरिवार उन्होंने खुद बनाया था जिसके वे मुखिया थे। वे प्यार से बड़ी से बड़ी और कड़ी से कड़ी बात कहते जो हमेशा हमारे भले के लिए होती। ‘मीडिया विमर्श’ पत्रिका का प्रकाशन जब 13 साल पहले रायपुर से प्रारंभ किया तब उन्होंने इसके स्तंभ ‘मेरा समय’ के लिए अपनी पत्रकारीय यात्रा की पूरी कहानी लिखी। पत्रिका के बारे में बराबर पूछताछ करते और अच्छे सुझाव भी देते। उनके लिए हर व्यक्ति बहुत खास था या वे उसे इसका अहसास कराकर छोड़ते। बहुत गहरी आत्मीयता, वात्सल्य और संवेदना से उन्होंने जो दुनिया रची थी, हमें संतोष है कि हम भी उसके नागरिक थे और उनके साथ उंगलियां पकड़कर उस रास्ते पर थोड़ा चल सके, जिस पर वे पूरी जिंदगी चलते रहे। उस विचार पर भी, उस व्यवहार पर भी जो उन्होंने जिया और हमें जीने के लिए प्रेरित किया। उनका जाना एक सच्चाई है किंतु वे बने रहेंगे हमारी यादों में यह उससे बड़ी सच्चाई है, क्योंकि उन्हें भूलना खुद को भूलना होगा, अपनी जड़ों को भूलना होगा, आत्मीयता और औदार्य को भूलना होगा। रिश्तों की गरमाहट को भूलना होगा।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में प्रोफेसर हैं।)

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मिस्टर मीडिया: साल भर जहरीली सांसें छोड़ता रहा मीडिया!

सत्ता के शिखरों ने अपने हित साधने में पत्रकारों और पत्रकारिता का भरपूर इस्तेमाल किया और हम खड़े-खड़े ग़ुबार देखते रहे

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 31 December, 2019
Last Modified:
Tuesday, 31 December, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

साल का आखिरी दिन। हम 2019 के पल-पल का मूल्यांकन कर सकते हैं। कुछ मित्र यकीनन खफा हो सकते हैं कि मेरे जेहन में इस साल पत्रकारिता के नजरिये से कोई सकारात्मक छवि नहीं उभर रही है। कहने में कोई हिचक नहीं है कि पूरे बरस हमने जहरीली सांसें छोड़ने के अलावा कोई काम नहीं किया। सियासी दावपेंचों के हम शिकार रहे। सत्ता के शिखरों ने अपने हित साधने में पत्रकारों और पत्रकारिता का भरपूर इस्तेमाल किया और हम खड़े-खड़े ग़ुबार देखते रहे। सारे साल हर महीने कुछ-कुछ पत्रकारिता चटकती रही और दरार चौड़ी होती गई।

जब किसी इमारत की नींव के कुछ पत्थर हिलते या खिसकते हैं तो फौरन पता नहीं चलता। वे पत्थर दिखते नहीं, क्योंकि जमीन में दबे रहते हैं। जब जानकारी मिलती है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है। इमारत को बचाना मुश्किल हो जाता है। इस साल खबरनवीसी की नींव दरकती रही, हमें पता भी चलता रहा और हम असहाय इमारत को कमजोर होते देखते रहे। सवाल यह है कि क्या पेशेवर पत्रकार इस दिशा में कुछ कर सकते थे?

मेरा उत्तर है-हां! हम बहुत कुछ कर सकते थे। हम नहीं कर सके। इस बरस लोकसभा चुनाव हुए। इसके बाद हरियाणा,  महाराष्ट्र और झारखंड में विधान सभा चुनाव हुए। महंगाई जस की तस रही। बेरोजगारी में कमी नहीं आई। आर्थिक मोर्चे पर तनाव साल भर था। कश्मीर से 370 की ऐतिहासिक विदाई हुई। नागरिक संशोधन कानून आया और उसके बाद अनेक प्रदेशों में आंदोलन,हिंसा तथा अशांति की लपटें तेज होती गईं। पाकिस्तान पूरे साल हमें तिली लिली...करते हुए चिढ़ाता रहा। सब कुछ करने के बाद भी चीन के रवैये में कोई तब्दीली नहीं दिखी। अमेरिका ने हमसे दूरी नहीं बनाई तो निकटता भी नजर नहीं आई। ईरान जैसे पुराने शुभचिंतक से कारोबार में कमी करनी पड़ी। नेपाल और श्रीलंका ठंडे-ठंडे रहे तो म्यांमार की आंग सान सू की के चेहरे पर मुस्कराहट नहीं रही।

बांग्लादेश से साल की शुरुआत में बेहद मधुर और गहरे रिश्ते थे, लेकिन साल के अंत में उसका भी मुंह सूज गया। अफगानिस्तान के साथ तटस्थता बनी रही और भूटान ने खामोशी ओढ़े रखी। हिंदुस्तान के इन सरोकारों में हम कहां थे?  क्या कोई अखबार, रेडियो या टेलिविजन चैनल अपने खाते में कुछ दिखा सकता है? अपवाद के तौर पर इक्का-दुक्का चैनल हो सकते हैं, लेकिन सच तो यही है कि  हमारे चैनल अपनेःअपने राजनीतिक आग्रहों,पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों के कारण परदे पर अत्यंत विकृत चेहरा पेश करते रहे। पत्रकार बेरोजगारी की मार झेलते रहे और इधर-उधर लुढ़कते रहे। बेशक शिखर पर बैठे संपादकों या पत्रकारों को बहुत परेशान नहीं होना पड़ा, मगर जनवरी से दिसंबर तक हर पत्रकार सीने में जलन और आंखों में तूफान लिए परेशान सा था। कुल मिलाकर पेशेवर सरोकारों के लिए पूरे साल बड़ी गंभीर चुनौतियां रहीं। इससे हमारी छवि को भी धक्का लगा है। सियासी गठजोड़ घातक है।

दूर थे जब तक सियासत से तो हम भी साफ थे, खान में कोयले की पहुंचे तो हम भी काले हो गए। अगला साल कुछ नए संकल्प, जिद और कुछ कुछ प्रो-एक्टिव अप्रोच मांगता है। इस पर ध्यान देना होगा मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: समय का संकेत नहीं समझने का है ये नतीजा

मिस्टर मीडिया: दंड तो यही बनता था, लेकिन क्या ये 'एनकाउंटर' है?

मिस्टर मीडिया: इसलिए उचित और जायज है मीडिया ट्रायल

मिस्टर मीडिया: महाराष्ट्र में क्यों चूके मीडिया के महारथी?

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‘बस पापाजी और कोई एडवेंचर न देना अब’

फिल्म की तर्ज पर देश के हालात भी कुछ ऐसे ही हो गए हैं। लोग तौबा कर रहे हैं,खासतौर पर पत्रकार

प्रमिला दीक्षित by
Published - Tuesday, 31 December, 2019
Last Modified:
Tuesday, 31 December, 2019
Pramila Dixit

प्रमिला दीक्षित, वरिष्ठ पत्रकार।।

फिल्म ‘जब वी मेट’ में करीना कपूर का एक डायलॉग है-‘बस पापाजी, अब और एडवेंचर न देना इस रात में’। देश के हालात भी कुछ ऐसे ही हो गए हैं। लोग तौबा कर रहे हैं,खासतौर पर पत्रकार। हे मोदी जी, बस अब कोई और खबर न हो इस साल में।

किसी भी चैनल में जब ईयर एंडर यानी साल के आखिरी दिन चलाने के लिए पूरे साल का हिसाब-किताब दिखाने वाला प्रोग्राम बनता है तो साल की पांच-दस बड़ी खबरों को छांटा जाता है और उस पर डिटेल पैकेजिंग होती है। कभी-कभी पांच-छह खबरों के भी लाले हो जाया करते थे, लेकिन जब से ये हैपनिंग सरकार आई है, बाई गॉड, पत्रकारों का सोना भी मुहाल हो गया है। बेचारे पत्रकार को जरा नींद लगी नहीं कि पता चला कि कहीं सरकार बन गई। जल्दी उठ भी गए तो बाथरूम में ही पता पड़ता है कि चार लोग निपटा दिए गए एनकाउंटर में।  

मिसाल अजीब हो सकती है, लेकिन मुझे ठेठ देसी मिसालों में मजा आता है। जो दुर्गति नई-नवेली मां की होती है न,  बच्चे को फीड करा के डकार दिलाकर आराम की सोचती ही है कि बच्चा पॉटी कर देता है। पॉटी साफ करा के आराम करने की सोचती ही है कि बच्चा भूख से फिर बिलखने लगता है। फिर दूध पिलाकर डकार दिलाती है कि फिर पॉटी...और ये सिलसिला अनवरत चलता है।

यही हाल मोदी सरकार में टीवी चैनल्स और पत्रकारों का है। जब तक एक मुद्दे से मुक्त होते हैं, दूसरा मुंह बाए सामने होता है। क क से करतारपुर...र र से रामलला...म म से महाराष्ट्र... सा...रा तीन सौ पैंसठ दिन में तीन सौ सत्तर का भी काम कर दिया! 

कड़ी निंदा की निंदा तो होती थी, लेकिन निंदा के काम में कम से कम कुछ ब्रेक्स/इंटरवल की गुंजाइश तो थी। सर्जिकल स्ट्राइक हिट हुई तो सरकार ने सीक्वल भी बना दिया!

बची खुची कसर साल के आख़िरी धमाके सीएए और एनआरसी ने पूरी कर दी। अब पत्रकार बेचारा कोई विपक्षी दल का नेता भी नहीं है, जो इतने बवाल के बीच में भी विदेश निकल ले छुट्टियों पर। उसकी नियति मोदीजी की नीतियों को जनता तक सबसे पहले पहुंचाना है। इस चक्कर में उसका खुद का परिवार भले ही कोपभवन में चला जाए!

जिस देश में ‘समय बिताने के लिए करना है कुछ काम’ मूल मंत्र हो, वहां सरकार लगातार कड़े-खड़े-पड़े-लड़े, सब तरह के फैसले लेती जा रही है। अक्सर मोदीजी के फैन सोशल मीडिया पर कहते हैं–‘एक ही तो दिल है मोदीजी, कितनी बार लूटोगे!’ लेकिन मीडियाकर्मियों की गुजारिश तो यही होगी मोदीजी से, ‘एक ही वीकेंड है मोदी जी, कितनी बार नासोगे?’

अगर यही हाल रहा तो ये भी सत्तर साल के इतिहास में पहली बार होगा, जब किसी प्रधानमंत्री के चक्कर में पत्रकारों के घर गृहयुद्ध होगा!

(ये लेखिका के निजी विचार हैं।)

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‘हमेशा हौसला देते हैं दादीमां के ये शब्द’

इसी 20 दिसंबर को तकरीबन 88 साल की उम्र में दादी मां ने हम सबका साथ छोड़ दिया

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 27 December, 2019
Last Modified:
Friday, 27 December, 2019
Anuranjan Jha

अनुरंजन झा, वरिष्ठ पत्रकार।।

सीताराम, सीताराम, सीताराम कहिए! जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए! शायद यही वो शब्द होंगे जो हमारे कानों में होश संभालने के बाद सबसे पहले पड़े होंगे। ये शब्द हमें हमेशा हौसला देते हैं। तमाम कठिनाइयों में जूझने का जज्बा देते हैं, मुश्किलों में संभलने की हिम्मत देते हैं और खुशी में आनंद का अनुभव कराते हैं। ये शब्द हमारे लिए एक मंत्र की तरह है। सुबह इन शब्दों की धुन कान में पड़ती, तभी नींद खुलती। यह सिलसिला वर्षों तक चलता रहा, जब तक हम गांव में रहे। ये शब्द हर सुबह मेरी दादीमां गुनगुनाती थीं, बिना नागा। मेरी दादीमां, मेरी पहली गुरु, मां से बढ़कर मां और सनातनी परंपरा का निर्वहन करते हुए दीक्षा देने वाली मेरी ‘गुरुमां’। मेरी दादीमां अब नहीं हैं। इसी 20 दिसंबर को तकरीबन 88 साल की उम्र में दादी मां ने हम सबका साथ छोड़ दिया।

आज से तकरीबन 33 साल पहले अप्रैल 1987 में जब बाबा एक सड़क दुर्घटना में अचानक हम सबको छोड़ गए, तब हमने देखा था कि कई दिनों तक दादीमां न रोई थीं, न कुछ बोली थीं। बिल्कुल चुप हो गईं, लेकिन फिर अचानक जैसे उनको यह अहसास हुआ हो कि बाबा का अधूरा काम उन्हीं को करना है। फिर वो करती रहीं, बिना अपनी परवाह किए। शिक्षक थीं मेरी दादीमां, पहले प्राथमिक और बाद में माध्यमिक विद्यालय की प्रधानाध्यापिका। बाबा भी प्रधानाध्यापक थे, बाबा यानी ‘दिनेश जी माट साहेब’ दिनेश चंद्र झा और यही दोनों हमारे गुरु। हम सबकी सारी बुनियादी शिक्षा इन्हीं दोनों की देखरेख में हुई। लिखने की प्रेरणा मिली कविजी बाबा यानी बाबा के बड़े भाई रमेश चंद्र झा जी से, अब तीनों में से कोई नहीं है हमारे पास। कोई ऐसा दिन नहीं होता जब दादीमां, बाबा को याद नहीं करती रही हों, उनके किस्से नहीं सुनाती रही हों। आखिरी दिनों तक।

घर के ठीक सामने स्कूल था, जो अब भी है। उसी स्कूल में दादीमां बहाल हुईं और रिटायर भी। वो स्कूल दादीमां के नाम से ही इलाके में जाना गया। आसपास के कई गांवों की लड़कियां पढ़ने आतीं। बाबा ने अपने मित्रों के साथ मिलकर एक संपूर्ण कन्या विद्यालय बनवाया था, क्योंकि वो चाहते थे कि इलाके की लड़कियां शिक्षित हों, बाबा अक्सर कहते कि पिता से ज्यादा घर में मां का शिक्षित होना जरूरी है। पिता शिक्षित होंगे तो बच्चे शिक्षित होंगे, लेकिन अगर मां शिक्षित होगी तो बच्चे संस्कारी होंगे। हमारे गांव समेत आसपास के तमाम गांवों की वो महिलाएं जो अब दादी-नानी बन गई हैं, सबकी गुरु थीं मेरी दादीमां। ‘बहिनजी’ सबके लिए एकसमान। अक्सर हमने देखा है कि गांव की लड़कियां जब नाती-पोतों के साथ मायके आतीं तो दादीमां से मिलने जरूर आतीं। ‘बहिनजी’ कहकर दरवाजे से आवाज लगातीं और दादीमां बड़े आदर से सबका ख्याल रखतीं। पीढ़ी दर पीढ़ी गांव की लड़कियों को पढ़ाया, शिक्षित और संस्कारी बनाया। हालांकि 27-28 साल पहले वो रिटायर हो गईं, लेकिन कई सालों तक लगातार स्कूल जाती रहीं, बच्चों को पढ़ाती रहीं। बाद में घर के दरवाजे पर भी बच्चे पढ़ने आते रहे। धीरे-धीरे सब रुक गया। अपने परपोते-परपोतियों में व्यस्त रहने लगीं,  लेकिन सुबह की धुन जारी रही।

कैसा भी मौसम हो, सुबह 4 बजे के आसपास जग जाना, बिस्तर से उठने से पहले हाथ में घड़ी का बांधना,  बच्चे जगें, उससे पहले उनके नाश्ते की तैयारी में जुट जाना उऩकी आदत में शुमार था। जब वो स्कूल जाती रहीं तो अक्सर पूजा-पाठ कर स्कूल चली जातीं और टिफिन टाइम में घर आकर खाना खातीं। शाम में छुट्टी के बाद जब घर लौटतीं तो शाम की चाय के साथ अखबार बारीकी से पलटतीँ। रिटायर होने के बाद अखबार पढ़ने का रुटीन शाम से सुबह शिफ्ट हो गया। हमने गांवों में अक्सर औरतों को गॉसिप में मशगूल देखा है, लेकिन दादीमां को यह बिल्कुल पसंद नहीं था, हमने सिर्फ बड़ी दादी से उनको खूब बातें करते देखा था लेकिन 1990 में उनके अचानक निधन के बाद से तो दादीमां अपने स्कूल और घर तक सीमित रह गईं।

दादीमां हम सब भाई-बहनों को खूब प्यार करतीं। उनके बच्चों की शिकायत कोई करे, उनको पसंद नहीं था। उनके बच्चे गलती करें, ये भी उनको नागवार गुजरता। मुझ पर खूब प्यार लुटातीं, जब हम दिल्ली पढ़ने चले आए, दादीमां रिटायर नहीं हुई थीं, लेकिन उनकी नौकरी का आखिरी दौर चल रहा था। हम जैसे ही नौकरी में आए, दादीमां मेरे पास आ गईं। महीनों रहीं, दिल्ली के मेरे कई दोस्त उनके इतने आत्मीय हुए कि उनके बारे में अक्सर बातें करतीं। जब मेरे बेटे का जन्म हुआ तो फिर दिल्ली आकर काफी समय रहीं, चौथी पीढ़ी के साथ उनके आनंद की सीमा नहीं रहती। कभी दिल्ली, कभी मुंबई सभी परपोतों-पोतियों की भी जमकर परवरिश की। पतली-दुबली काया की मेरी दादीमां कभी थकती नहीं थीं। निश्चित तौर पर परपोतों-पोतियों को देखकर वो अपना दुख भूल जातीं, उनके सामने भी ये जरूर कहती कि बाबा उनको छोड़ गए, ताकि वो सब जिम्मेदारी निभा सकें।

जिम्मेदारी और वो भी ऐसी जिसके बारे में अब सिर्फ कहानियां ही कहीं जा सकती हैं। 14 साल की उम्र में शादी,  आजादी से पहले आजादी के परवानों के भरे-पूरे परिवार की बहू बनना, जिसका पति कलकत्ता (अब कोलकाता) के प्रेसीडेंसी कॉलेज में शिक्षा ले रहा हो और फिर 16 साल की उम्र में मां बन जाना। देश की आजादी के अगले साल मेरे पिताजी का जन्म हुआ, 28 साल की उम्र तक चार बच्चों को जन्म देना औऱ फिर 32 साल की उम्र में शिक्षक की नौकरी शुरू करना, यह सोचकर लगता है कि ऐसा कोई दैवीय शक्ति ही कर सकती है और दादीमां थी हीं देवी, महालक्ष्मी देवी।

मेरे परदादा अक्सर कहते थे कि मैं लक्ष्मी (लक्ष्मीनारायण झा) हूं और मेरी बहू महालक्ष्मी। सोचिए जरा, मेरी दादीमां महज 38 साल की उम्र में दादीमां बन गईं थी, मेरे बड़े भाई का जन्म हुआ तो मेरी दादीमां महज 38 साल की थीं यानी जिस उम्र में आज की लड़कियां मां बनने के सपने संजो रही होती हैं। दादी बनने के बाद पचास साल तक अपने पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठाती रहीं। हाथ खोलकर दिया, सबको दिया, पूरे परिवार को दिया, पूरे समाज को दिया कभी किसी से एक रुपया नहीं लिया। साठ साल की उम्र तक तनख्वाह परिवार पर खर्च करती रहीं, बाद में पेंशन की रकम भी बेटे-पोते को ऐसे हर महीने थमा देतीं जैसे पेंशन उनकी नहीं, उनके बच्चों की ही है। अपने लिए उनको कुछ नहीं चाहिए था, अपने लिए उनको जो चाहिए था वो थी जिम्मेदारियां, जिसे बाबा छोड़ गए थे।

पिछले एक साल में उनका स्वास्थ्य अचानक खराब होता चला गया। पिछले साल छठ व्रत किया और काफी मान मनौव्वल के बाद इस साल से व्रत नहीं करने पर राजी हुईँ, लेकिन पिछले छह महीने में भूलने लगीं। जो पास है वो याद है, जो दूर गया, उसे भूल गईँ। सामने आने पर पहचानतीं। कोई बीमारी नहीं, कोई परेशानी नहीं लेकिन अब वो संतुष्ट नजर आती थीं। शायद उनको अब लगता था कि उनकी जिम्मेदारियां पूरी हो गई हैं और यही एहसास उनकी जिजीविषा पर भारी पड़ने लगा शायद। वो जब तक जिम्मेदारियों के बोझ तले खुद को खड़ा करती रहीं, जीवित रहीं और जैसे ही उनको लगा कि उनकी जिम्मेदारियां पूरी हो गईं, उन्होंने आखें मूंद लीं।

दादीमां से जुड़े मेरे पास चार दशक से ज्यादा के किस्से हैं। लिखने लगूं तो न जाने कब तक लिखता रहूं, बस इतना ही कहूंगा कि आज जो कुछ भी हूं, उसमें मेरी दादीमां का एक बड़ा हिस्सा है। जब मैं उनको आखिरी बार कंधा दे रहा था तो बार-बार मेरे होश संभालने के बाद का यह चार दशक फ्लैश बैक की तरह आंखों से गुजर रहा था। इसी महीने की 30-31 तारीख को उनका अंतिम कर्म है। ईश्वर से मेरी प्रार्थना है कि उनको अपने चरणों में जगह दें और हर किसी को ऐसी ही दादीमां। दादीमां को विनम्र श्रद्धांजलि।

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'इन 10 वजहों से रद्द कर देनी चाहिए पत्रकारिता विवि में नए कुलपति की चयन प्रक्रिया'

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने रायपुर के पत्रकारिता विश्वविद्यालय में नए कुलपति के चयन पर उठाया सवाल

राजेश बादल by
Published - Friday, 20 December, 2019
Last Modified:
Friday, 20 December, 2019
KTU

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के ताजा घटनाक्रम से छत्तीसगढ़ के कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय की नई कुलपति के लिए की गई चयन प्रक्रिया रद्द करनी चाहिए।

1.माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के जिन दो शिक्षकों के विरुद्ध प्रदर्शन हुए, वे कुलपति पद की होड़ में हैं।

2.एक शिक्षक का स्पष्ट आरोप है कि उसे रोकने के लिए एक तीसरे प्रत्याशी ने इस घटनाक्रम की योजना बनाई। इसकी सघन जांच होनी चाहिए।

3.कुलपति पद के एक चौथे दावेदार जिनका नाम सूची में है, वे पोस्ट ग्रेजुएट नहीं हैं।

4. पांचवे दावेदार को शिक्षण का कोई अनुभव ही नहीं है।

5.अनेक योग्य प्रत्याशियों को चयन समिति ने छोड़ दिया, जो सूची में शामिल लोगों से अधिक योग्य हैं।

6.चयन समिति की सूची उजागर हो चुकी है। गोपनीयता भंग हो चुकी है।

7.चयन समिति की सिफारिशों में जातिगत, राजनीतिक और समूहगत निष्ठाओं का ख्याल रखा गया है।

8.बिलासपुर हाई कोर्ट में मामला लंबित है। उसने सरकार और राजभवन को नोटिस जारी किए हैं।

9.क्यों नहीं अब यूजीसी की सीधी निगरानी में कुलपति का चुनाव हो।

10.छत्तीसगढ़ के कुलपति के चुनाव में मध्यप्रदेश के राजनेता दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं?

(वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की फेसबुक वॉल से)

 

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'मुशर्रफ को सजा-ए-मौत गलत, इन वजहों से मिल सकता है क्षमादान'

इस फैसले का बस एक ही फायदा है। वह यह कि अब पाक में शायद फौजी तख्तापलट बंद हो जाएं

डॉ. वेद प्रताप वैदिक by
Published - Thursday, 19 December, 2019
Last Modified:
Thursday, 19 December, 2019
VEDPRATAP VAIDIK

डॉ. वेदप्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार।।

जनरल परवेज मुशर्रफ को देशद्रोह के अपराध में सजा-ए-मौत हो गई। यह अनहोनी है। क्यों है? क्योंकि, आज तक पाकिस्तान की किसी अदालत की यह हिम्मत नहीं हुई कि वह अपने किसी फौजी तानाशाह को देशद्रोही कहे और उसे मौत के घाट उतारने की हिम्मत करे।

जनरल अयूब खान, जनरल याह्या खान और जनरल जिया-उल-हक ने जब तख्ता पलट किया तो पाकिस्तान की न्यायपालिका ने उसे यह कहकर उचित ठहरा दिया कि वह उस समय की मांग थी। मजबूरी थी। उसे ‘डॉक्ट्रीन ऑफ नेसेसिटी’ कहा गया। लेकिन आप पूछ सकते हैं कि जनरल मुशर्रफ को यह सजा क्यों सुनाई गई? इसका एक जवाब तो यह है कि वे मूलतःपाकिस्तानी नहीं हैं। वे मुहाजिर हैं। हिंदुस्तानी हैं। दिल्ली में पैदा हुए हैं। बाकी जनरल पठान और पंजाबी थे।

इस दलील में कोई खास दम नहीं है, लेकिन मेरी राय है कि जनरल मुशर्रफ के साथ पाकिस्तान के जजों ने अपना बदला निकाला है। जैसा ‘दंगल’ पाकिस्तान के जजों और वकीलों के साथ मुशर्रफ का हुआ, वैसा किसी भी राष्ट्रपति के साथ नहीं हुआ। मुशर्रफ को यह सजा 1999 में तख्तापलट के लिए नहीं दी गई है, बल्कि 2007 में आपातकाल थोपने के लिए दी गई है। यह वह समय है, जब मुशर्रफ और पाकिस्तान की न्यायपालिका के बीच तलवारें खिंच गई थीं।

मुख्य न्यायाधीश इफ्तिकार मुहम्मद चौधरी को बर्खास्त करने पर राष्ट्रपति मुशर्रफ तुल गए थे। यह घटना भी 2007 की ही है। उन्होंने पहले सेनापति का पद छोड़ा और फिर 2008 में राष्ट्रपति का पद भी, ताकि उन पर महाभियोग न चले। मुशर्रफ आजकल दुबई में रहते हैं। बहुत बीमार हैं। उन्हें 30 दिन का समय मिला है, वे अपील कर सकते हैं।

मुझे पूरा विश्वास है कि पाकिस्तान के वर्तमान राष्ट्रपति उनको क्षमादान दे देंगे। एक तो पाकिस्तान की फौज ने अदालत के इस फैसले पर दो-टूक शब्दों में आपत्ति की है। दूसरा, इमरान सरकार भी उनके प्रति सहानुभूति दिखाना चाहेगी। फौज और इमरान का आपसी संबंध काफी घनिष्ट है। वे उसके विरुद्ध क्यों जाएंगे? तीसरा,नवाज शरीफ इस बात को भूले नहीं हैं कि तख्तापलट के बाद उन्हें जुल्फिकार अली भुट्टो की तरह फांसी नहीं दी गई बल्कि मुशर्रफ ने उन्हें सऊदी अरब में शरण लेने दी। चौथा, पाकिस्तान की जनता यह जानती है कि मुहाजिर होने के बावजूद मुशर्रफ ने हिंदुस्तान की नाक में दम करने की कोई कसर नहीं छोड़ी थी। ऐेसे राष्ट्राध्यक्ष को देशद्रोही कहकर फांसी देना पाकिस्तान का लोकप्रिय कदम नहीं हो सकता। पांचवां, अदालत ने मुशर्रफ को पूरा मौका नहीं दिया कि वे अपना पक्ष उसके सामने रख सकें। इस फैसले का बस एक ही फायदा है। वह यह कि अब पाक में शायद फौजी तख्तापलट बंद हो जाएं।

मैं खुद कहता हूं कि मुशर्रफ को अभी कुछ साल और जिंदा रहना चाहिए। कुछ माह पहले जब दुबई में मेरी उनसे दो घंटे लंबी भेंट हुई तो मैंने पाया कि वह मुशर्रफ का नया अवतार था। कश्मीर पर पहले अटलजीके साथ और बाद में मनमोहनजी के साथ चार-सूत्री समझौतों को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने बड़ा उत्साह दिखाया। उन्होंने एक विदेशी प्रधानमंत्री से मेरी बात करवाने की कोशिश भी की। यदि भारत-पाक शांति के मामले को आगे बढ़ाने में वे अपना शेष जीवन लगाएं तो शायद असंभव भी संभव हो जाए।  

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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