सनक में बदलता सार्वजनिक संवाद: प्रो.संजय द्विवेदी

ये लोग एक अनियंत्रित भीड़ की तरह सरकार के पक्ष या विपक्ष में कूद पड़ते हैं। पुलिस की ‘विवेचना’ के पहले ही ‘विश्लेषण’ कर डालते हैं। किसी को भी स्वीकार या खारिज कर देते हैं।

Last Modified:
Friday, 13 February, 2026
sanjaydwivedi


प्रो.संजय द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक। भारतीय राजनीति और समाज में संवाद के गिरते स्तर और संवाद माध्यमों पर भीड़ के मुखर हो उठने का यह विचित्र समय...
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