तब की सेंसरशिप में डर था, आज इसका नाम बदल गया है: अनुरंजन झा

25 जून 1975. आधी रात को भारत के लोकतंत्र को बिना अंतिम संस्कार के दफना दिया गया था। प्रेस की आजादी, नागरिकों की स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही- सबकुछ एक सिग्नेचर से ‘निलंबित’ कर दिया गया।

Last Modified:
Wednesday, 25 June, 2025
AnuranjanJha87489


अनुरंजन झा, वरिष्ठ पत्रकार ।। “जब अखबारों में आलू-बैंगन छपा करते थे” (Emergency Then, Algorithms Now: Journalism in Two Shades of Silenc...
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