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'पीएम मोदी के इस कदम ने विपक्ष के सामने लोकसभा चुनावों के लिए एक लंबी लकीर खींच दी'

आने वाले दिनों में राहुल गांधी के जनपथ और नीतीश कुमार के विपक्ष पथ का नरेंद्र मोदी के कर्तव्य पथ से कड़ा सियासी मुकाबला देखने को मिलेगा

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 10 September, 2022
Last Modified:
Saturday, 10 September, 2022
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विनोद अग्निहोत्री, वरिष्ठ पत्रकार ।।

राहुल गांधी भारत जोड़ो पदयात्रा के जनपथ पर हैं और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विपक्ष पथ पर चल चुके हैं। उन्हें राहुल गांधी समेत तमाम विपक्षी नेताओं से इस मुहिम के लिए हरी झंडी भी मिल चुकी है। उधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडिया गेट पर नेता जी सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति के अनावरण, सेंट्रल विस्टा के लोकार्पण और राजपथ का नाम कर्तव्य पथ करके विपक्ष के सामने 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए एक लंबी लकीर खींच दी है। आने वाले दिनों में राहुल गांधी के जनपथ और नीतीश कुमार के विपक्ष पथ का नरेंद्र मोदी के कर्तव्य पथ से कड़ा सियासी मुकाबला देखने को मिलेगा, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कर्तव्य पथ से विदेशी गुलामी के निशान मिटाने का जो नया राजनीतिक विमर्श शुरू किया है, उसका मकसद भाजपा के राष्ट्रवाद को नई धार देने के साथ इस मुद्दे पर कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष को सवालों के घेरे में खड़ा करना भी है।

राहुल गांधी जहां अपनी कन्याकुमारी से कश्मीर तक 3750 किलोमीटर लंबी पदयात्रा के जरिए कांग्रेस को उसकी खोई जमीन और जन मानस में अपनी स्वीकार्यता बनाने की कवायद में जुट गए हैं तो नीतीश कुमार अलग अलग सुर वाले विपक्षी दलों और उनके नेताओं को एक मंच पर लाकर 2024 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के सामने कड़ी चुनौती पेश करने के सियासी पथ पर हैं। राहुल को जहां जन मानस में अपनी स्वीकार्यता बनानी है तो वहीं नीतीश कुमार को विपक्षी दलों के बीच सर्व स्वीकार्य होना है।

भारत जोड़ो यात्रा से पहले राहुल गांधी और नीतीश कुमार की दिल्ली में मुलाकात भी हुई और सूत्रों का यह भी कहना है कि दोनों की यह मुलाकात बेहद सौहार्दपूर्ण और कई मुद्दों पर सहमति वाली रही है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि राहुल ने नीतीश से कहा है कि वह कांग्रेस को मजबूत करने में जुटे हैं और नीतीश विपक्षी खेमें को गोलबंद करने मे जो भी प्रयास कर रहे हैं उनका उसे पूरा समर्थन है।

राहुल गांधी यानी कांग्रेस की हरी झंडी मिलने से उत्साहित नीतीश कुमार ने विपक्षी खेमें के दिग्गजों के.चंद्रशेखर राव शरद पवार, अरविंद केजरीवाल, सीताराम येचुरी, अखिलेश यादव, ओम प्रकाश चौटाला और शरद यादव से भेंट करके अपने विपक्ष पथ पर पहला पड़ाव लगभग पूरा कर लिया है। हालांकि उन्हें अभी एम.के.स्टालिन नवीन पटनायक उद्धव ठाकरे और ममता बनर्जी से भी मिलना है। 

नीतीश के दाहिने हाथ माने जाने वाले जद(यू) के प्रधान महासचिव के.सी.त्यागी कहते हैं कि नीतीश कुमार की जो साख और वरिष्ठता है उसका सम्मान सारे राजनीतिक दल करते हैं और अगर नीतीश जी कोई पहल कर रहे हैं तो निश्चित रूप से उसे सभी विपक्षी नेताओं ने बेहद गंभीरता से लिया है और उनकी सभी नेताओं के साथ बेहद सौहार्दपूर्ण मुलाकात सकारात्मक बातचीत हुई है जिसके जल्दी ही उत्साहवर्धक नतीजे देखने को मिलेंगे।खुद नीतीश कुमार ने बार बार कहा है कि उनका एजेंडा प्रधानमंत्री बनना नहीं बल्कि भाजपा के खिलाफ सभी गैर भाजपा दलों को एकजुट करना है जिससे 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा और मोदी को केंद्र से हटाया जा सके।

इसमें कोई शक नहीं है कि पाला बदल कर नीतीश कुमार ने निराश विपक्ष में जान डाल दी है। नीतीश भले ही प्रधानमंत्री पद की अपनी दावेदारी या उम्मीदवारी से इनकार करें लेकिन तमाम विपक्षी दल और गैर भाजपा ताकतें नरेंद्र मोदी के मुकाबले उन्हें ही विपक्ष के चेहरे के रूप में देखती हैं। उनकी ईमानदारी की साख, प्रशासनिक अनुभव परिवारवाद से दूर और पिछड़े वर्ग से होना नीतीश कुमार की ताकत है। 

लेकिन उनकी सबसे बड़ी चुनौती है फिलहाल में 2024 तक बिहार में सरकार को मजबूत और स्थिर बनाए रखना और 2024 में प्रधानमंत्री पद के अघोषित दावेदारों राहुल गांधी, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और के.चंद्रशेखर राव को एक मोर्चे में साथ लाकर उनके बीच अपनी स्वीकार्यता बनवाना। नीतीश की दूसरी चुनौती है कि वह ममता और वाम दलों, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी और टीआरएस,जगन रेड्डी और कांग्रेस जैसे धुर विरोधियों और प्रतिदंव्दियों को एक साथ लाना। 

इस लिहाज से नीतीश कुमार को 1989 के चौधरी देवीलाल और विश्वनाथ प्रताप सिंह दोनों की भूमिका निभानी है। जैसे देवीलाल ने तब विपक्ष के तमाम दिग्गजों चंद्रशेखर, बीजू पटनायक, एनटी रामराव, रामकृष्ण हेगड़े, अजित सिंह, जार्ज फर्नांडीस, एम.करुणानिधि और वाम दलों राजीव गांधी सरकार के खिलाफ एकजुट किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह के नाम पर उन्हें राजी किया उसी तरह नीतीश कुमार को सारे भाजपा विरोधी दलों को एक मोर्चे में लाने की जिम्मेदारी निभानी है। 

साथ ही जैसे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने पूरे देश में घूम घूम कर जनमत अपने पक्ष में करके सभी विपक्षी दिग्गजों को अपने समर्थन के लिए मजबूर कर दिया था, नीतीश कुमार को जन मानस में भी अपनी वही स्वीकार्यता बनाने की चुनौती भी है। अगर नीतीश इन दोनों भूमिकाओं में कामयाब हो गए तो निश्चित रूप से वह भाजपा विरोधी खेमे का चेहरा बनकर न सिर्फ उभर सकते हैं बल्कि 2024 के लोकसभा चुनावों में मोदी और भाजपा के लिए एक चुनौती पेश कर सकते हैं।इसके लिए नीतीश कुमार को अपने साथ एक ऐसी टीम रखनी होगी, जिसके सदस्यों के संबंध और संपर्क सभी गैर भाजपा दलों में हों और जो मीडिया और शहरी मध्यवर्ग के बीच नीतीश कुमार की सकारात्मक छवि बना सकें। इनमें एक बड़ा नाम के सी त्यागी का हो सकता है जो न सिर्फ नीतीश कुमार के लंबे समय से वैचारिक साथी हैं बल्कि बेहद भरोसेमंद भी हैं और 1977, 1989 और 1996 में सियासी जोड़तोड़ के महारथी रहे हैं। दिल्ली में वह जनता दल (यू) का जाना पहचाना चेहरा हैं।

उधर, राहुल गांधी देश की अब तक की सबसे लंबी पदयात्रा पर निकल चुके हैं। सात सितंबर को कन्याकुमारी से चलकर वह पांच महीनों बाद कश्मीर में अपनी पद यात्रा पूरी करेंगे। एक तरफ जब कांग्रेस पार्टी के कई दिग्गज नेता पार्टी छोड़ चुके हैं और ज्यादातर ने कांग्रेस की दुर्दशा और अपने पार्टी छोड़ने के लिए राहुल गांधी को ही जिम्मेदार ठहराया है।उधर कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया भी शुरु हो चुकी है और 19 अक्टूबर को नए अध्यक्ष का नाम घोषित होगा, लेकिन राहुल इससे बेपरवाह अपने सबसे बड़े राजनीतिक मिशन में जुट गए हैं।

वह पार्टी से नहीं जनता से सीधे जुड़ना चाहते हैं।वह नेताओं का घेरा तोड़कर सीधे आम कार्यकर्ता तक पहुंचना चाहते हैं। विपक्षी गोलबंदी का काम उन्होंने नीतीश कुमार के जिम्मे छोड़ दिया है और खुद सांप्रदायिक नफरत की राजनीति, बेरोजगारी, महंगाई, सीमा पर चीनी अतिक्रमण, आतंकवाद, अर्थव्यवस्था और किसानों की बदहाली के मुद्दों पर मोदी सरकार, भाजपा और आरएसएस के खिलाफ लोगों को एकजुट करने के अभियान पर निकल पड़े हैं। राहुल के करीबी एक कांग्रेस नेता के मुताबिक राहुल गांधी और नीतीश कुमार में सहमति बनी है कि राहुल जी जनता को एकजुट करेंगे और नीतीश जी विपक्षी दलों को एक साथ लाएंगे। दोनों की भूमिकाएं अलग अलग हैं लेकिन मिलाकर नतीजा विपक्ष के पक्ष में होगा।

राहुल चल पड़े हैं नीतीश निकल पड़े हैं लेकिन इनके सामने अब सीधे नरेंद्र मोदी आ खड़े हैं।आठ सितंबर को राजधानी दिल्ली के सेंट्रल विस्टा के प्रथम चरण के उद्घाटन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो काम किए।पहला इंडिया गेट की उस छतरी के नीचे जहां कभी इंग्लैंड के सम्राट किंग जार्ज पंचम की मूर्ति होती थी, जिसे 1967 में हटा लिया गया था और तब से वह जगह खाली थी,उस जगह उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की भव्य प्रतिमा का अनावरण किया। 

दूसरा राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट को जोड़ने वाले मार्ग जिसे अंग्रेजी राज में किंग्सवे कहा जाता था और आजादी के बाद राजपथ का नाम दिया गया, उसका नया नामकरण कर्तव्य पथ कर दिया।इन दो कामों से मोदी ने 2024 के लिए अपना सियासी एजंडा तय कर दिया जब उन्होंने कहा कि यह देश से गुलामी की निशानियों को मिटाने की शुरुआत है। यानी अगले लोकसभा चुनावों में भाजपा विपक्ष को अपने प्रखर राष्ट्रवाद के मुद्दे से घेरेगी। 

अब लगातार यह सवाल भाजपा की तरफ से उछाला जाएगा कि आजादी के 75 सालों तक आजाद हिंद फौज की स्थापना करके अंग्रेजी राज के खिलाफ सशस्त्र क्रांति का बिगुल बजाने वाले महानायक नेताजी सुभाषचंद्र बोस की प्रतिमा अब तक कांग्रेस सरकारों ने क्यों नहीं स्थापित की। यह अलग बात है कि इन 75 सालों के कालखंड में दस साल से ज्यादा गैर कांग्रेसी सरकारें भी केंद्र में रहीं जिनमें अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा गठबंधन की सरकार भी शामिल है। 

लेकिन इस सवाल पर कांग्रेस और उसके साथ जुड़ने वाले दलों को ही घेरा जाएगा। दूसरा राजपथ का नाम कर्तव्य पथ करके जनमानस में यह धारणा भी मजबूत करने का प्रयास भाजपा करेगी कि सिर्फ वही अकेला ऐसा दल है जो सही मायनों में स्वदेशी प्रतीकों और राष्ट्रवाद का प्रतिनिधित्व करता है। इसके साथ ही आईएनएस विक्रांत राष्ट्र को समर्पति करते हुए नौसेना के पुराने प्रतीक चिन्ह को बदलकर जो नया चिन्ह बनाया गया है, उसमें छत्रपति शिवाजी की नौसेना का उल्लेख भी भाजपा और मोदी के राष्ट्रवादी एजेंडे का ही एक विस्तार है।

इनका उल्लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडिया गेट के समारोह में अपने भाषण में जिस भाव से किया वह भी आने वाले दिनों में बनने वाले नए राजनीतिक वैचारिक विमर्श का आगाज है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहीं नहीं रुक रहे हैं। आठ सितंबर को ही लद्दाख में भारत चीन सीमा पर एक बड़ी सफलता यह मिली कि लंबी बातचीत के बाद रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील क्षेत्र गोगरा स्प्रिंग में दोनों देशों की सेनाओं के बीच पीछे हटने पर सहमति बन गई। 

इस क्षेत्र पर चीनी सेना ने पिछले करीब दो साल से अतिक्रमण कर रखा था और जवाब में भारतीय सेना ने भी अपने पांव जमा लिए थे, जबकि ये पेट्रोलिंग क्षेत्र है। यह मोदी सरकार का विपक्ष खासकर कांग्रेस के उन हमलों का जवाब है जो सीमा पर चीनी अतिक्रमण को लेकर लगातार किए जा रहे हैं।नरेंद्र मोदी के तूणीर और भाजपा के शस्त्रागार में अभी और भी कई राष्ट्रवादी तीर हैं जिनमें हिंदुत्व की धार भी है, जिन्हें एक एक करके छोड़ा जाएगा और 2024 से पहले होने वाले तमाम विधानसभा चुनावों में उनके प्रभाव का परीक्षण भी होगा और जो कारगर साबित होंगे उन्हें लोकसभा चुनावों ज्यादा जोरदार तरीके से आजमाया जाएगा।

मोदी के इस कर्तव्य पथ का जवाब राहुल के जन पथ और नीतीश के विपक्ष पथ की मिली जुली ताकत कितना और कैसे दे पाएगी यह विपक्ष के सामने एक बड़ी चुनौती है।कांग्रेस को उम्मीद है कि राहुल गांधी की यात्रा उन्हें जनता से और कांग्रेस कार्यकर्ताओं से सीधे जोड़ेगी और जनता उनकी बात सुनेगी समझेगी,राहुल भी जनता से बहुत कुछ सीखेंगे। कांग्रेस मीडिया विभाग के प्रमुख जयराम रमेश लगातार कहते हैं कि मीडिया खास कर टीवी चैनलों पर भाजपा सरकार ने ऐसा अंकुश लगा दिया है कि वो सच दिखाने की बजाय गैर जरूरी मुद्दों पर बहस करके जनता का ध्यान बांटने का काम कर रहे हैं।

राहुल गांधी अब सीधे लोगों तक अपनी बात पहुंचा रहे हैं और लोग उन्हें सुनने भी आ रहे हैं। कांग्रेस नेताओं को उम्मीद है कि पांच महीने बाद जब 3750 किलोमीटर की भारत जोड़ो यात्रा पूरी करके राहुल गांधी वापस लौटेंगे तो वह न सिर्फ बदले हुए नेता होंगे बल्कि पूरे देश में उनकी स्वीकार्यता हो जाएगी। कांग्रेस के पूर्व सचिव प्रकाश जोशी के मुताबिक राहुल गांधी की यात्रा से सबसे ज्यादा बेचैनी भाजपा में है और इसीलिए ऊल जलूल मुद्दे उठाकर वह यात्रा से लोगों का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है लेकिन उसके मंसूबे सफल नहीं होंगे।

दूसरी तरफ जनता दल(यू) के प्रधान महासचिव के.सी.त्यागी एक बार फिर 1989, 1996 और 2004 जैसी परिस्थिति बनते देख रहे हैं जब तत्कालीन केंद्रीय सत्ता के खिलाफ सभी प्रमुख विपक्षी दल एकजुट हो गए थे और केंद्र में सरकारें बदल गईं थीं। के.सी.त्यागी कहते हैं कि नीतीश कुमार के प्रयास रंग लाएंगे और जल्दी ही जो भी क्षेत्रीय दल जहां मजबूत है वहां भाजपा को हराने का काम करेगा।उनका कहना है कि 1977 से अब तक जब जब विपक्ष एकजुट हुआ है तब केंद्र में सत्तारूढ़ दल हारा है।

वहीं भाजपा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, गृह मंत्री अमित शाह की रणनीति और अध्यक्ष जेपी नड्डा की मेहनत पर पूरा भरोसा है। भाजपा प्रवक्ता प्रेम शुक्ला कहते हैं कि दिन में सपने कोई भी देख सकता है लेकिन ये सपने सिर्फ दिवास्वप्न होकर रह जाते हैं। शुक्ला के मुताबिक देश बदल चुका है और अब जोड़ तोड़ के पुराने घिसे पिटे फार्मूले नहीं चलेंगे। विपक्ष के पास मोदी के मुकाबले न कोई नेता है न नीति है और न ही नीयत है। शुक्ला का दावा है कि 2024 में भाजपा और एनडीए को 2014 और 2019 से भी ज्यादा सीटें देकर जनता लोकसभा में भेजेगी। अब देखना है कि 2024 लोकसभा चुनावों जिसकी बिसात बिछ चुकी है, में जनता राहुल गांधी के जन पथ और नीतीश कुमार के विपक्ष पथ तो चुनेगी या नरेंद्र मोदी के कर्तव्य पथ पर पहले की तरह चलती रहेगी।

(साभार: अमर उजाला)

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विदेशी मीडिया को एस जयशंकर की फटकार, कहा- दूसरे देशों की सरकारों के लिए यूज करोगे ऐसे शब्द

बता दें कि एस जयशंकर ने अपनी अंग्रेजी किताब ‘द इंडिया वे: स्ट्रैटेजीज फॉर एन अनसर्टेन वर्ल्ड’ के मराठी संस्करण के विमोचन के दौरान यह बात कही।

Last Modified:
Monday, 30 January, 2023
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विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भारत सरकार के लिए ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने के लिए विदेशी समाचार पत्रों को जमकर फटकार लगाई। उन्होंने कहा कि यदि आप विदेशी समाचार पत्र पढ़ते हैं, तो आप जानते होंगे कि वे हमारी सरकार के लिए ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका और यूरोप की सरकारों को कभी क्रिश्चियन राष्ट्रवादी नहीं कहा जाता। ऐसे शब्द केवल हमारे लिए ही इस्तेमाल किए जाते हैं।

बता दें कि एस जयशंकर ने अपनी अंग्रेजी किताब ‘द इंडिया वे: स्ट्रैटेजीज फॉर एन अनसर्टेन वर्ल्ड’ के मराठी संस्करण के विमोचन के दौरान यह बात कही। किताब का विमोचन पुणे में किया गया। इस किताब का मराठी में 'भारत मार्ग' के रूप में अनुवाद किया गया है। जयशंकर की किताब के मराठी संस्करण का विमोचन महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने किया।

इस कार्यक्रम के दौरान विदेश मंत्री ने कहा वे यह नहीं समझते हैं कि यह देश दुनिया के साथ और अधिक साझेदारी करने के लिए तैयार है। एस जयशंकर ने कहा कि उन्हें राष्ट्रवादी कहलाने पर गर्व है और उन्हें नहीं लगता कि माफी मांगने जैसी कोई बात है।

उन्होंने आगे कहा कि यदि हम पिछले 9 सालों को देखें, तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज की सरकार और राजनीति दोनों ही अधिक राष्ट्रवादी है। मुझे नहीं लगता कि इसके बारे में क्षमा करने की कोई बात है।  

अगर हम पिछले 9 सालों को देखें, तो इसमें कोई संशय नहीं है कि आज की सरकार और राजनीति दोनों ही राष्ट्रवादी है। इसमें कुछ गलत नहीं है। विदेशों में राष्ट्रवादी लोगों ने ही अपने देशों को आगे बढ़ाया है और बुरे हालातों से बाहर निकाला है और आपदा के समय में दूसरे देशों की मदद की है।

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सुकुमार रंगनाथन ने समझाया पत्रकारिता का ‘फ्यूचर प्लान’, दिए ये टिप्स

‘e4m-DNPA Future of Digital Media Conference’ के दौरान ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के एडिटर-इन-चीफ सुकुमार रंगनाथन ने ‘The Future of Journalism’ टॉपिक पर रखी अपनी बात

Last Modified:
Monday, 23 January, 2023
Sukumar Ranganathan

‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ (Hindustan Times) के एडिटर-इन-चीफ सुकुमार रंगनाथन का कहना है कि भविष्य की पत्रकारिता को मजबूत आचार संहिता की जरूरत है। दिल्ली के हयात रीजेंसी होटल में शुक्रवार को हुई ‘e4m-DNPA Future of Digital Media Conference’ के दौरान सुकुमार रंगनाथन ने यह बात कही।  

कार्यक्रम के दौरान ‘The Future of Journalism’ टॉपिक पर अपने वक्तव्य में सुकुमार रंगनाथन का कहना था कि पत्रकारिता को एक नए स्वामित्व मॉडल की आवश्यकता है, क्योंकि मौजूदा मॉडल टूट चुका है और निश्चित रूप से आगे काम नहीं करेगा।

सुकुमार रंगनाथन के अनुसार, ‘हमारे पास अभी जो स्वामित्व मॉडल है, वह अतीत में काम कर सकता है और हम में से कई के लिए यह अभी भी काम कर सकता है, लेकिन यह टूट गया है और यह आगे काम नहीं करेगा। मुझे लगता है कि यह एक गति है जो हमें आगे बढ़ा रही है। हमें वास्तव में एक नए मॉडल की जरूरत है।’

रंगनाथन ने अपने अनुभव के आधार पर पत्रकारिता के कई दृष्टिकोण सामने रखे और पत्रकारिता का भविष्य कैसा होगा, इस पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि इनमें एक स्वामित्व वाला है। रंगनाथन ने जोर देकर कहा कि आज पत्रकारिता में एक नए स्वामित्व मॉडल, नए प्रबंधन और नेतृत्व की आवश्यकता है, खासकर इसके व्यावसायिक पक्ष में। उनका कहना था, ‘आपको एक न्यूज़रूम को एक न्यूज़रूम की तरह मैनेज करना होगा, क्योंकि इसी तरह आप ब्रैंड बनते हैं और पत्रकारिता का भविष्य उसी से जुड़ा होता है।’

पत्रकारिता में आचार संहिता के बारे में रंगनाथन ने कहा कि भविष्य के न्यूजरूम्स और पत्रकारिता को नैतिकता की एक मजबूत संहिता और विकसित डिजिटल परिदृश्य के अनुकूल नई तकनीकों को सीखने की इच्छा की आवश्यकता है।

इस बारे में रंगनाथन का कहना था, ‘आप बिना आचार संहिता के काम नहीं कर सकते और इसमें पत्रकारिता के हर पहलू को शामिल करना होगा। भविष्य के किसी भी न्यूज़ रूम की अपनी प्राथमिकताएं सही होनी चाहिए, यानी उसे तय करना होगा कि उसे क्या करना है। पत्रकारिता या भविष्य के लिए पत्रकारों को नए कौशल सीखने की आवश्यकता होगी, उन्हें विशेषज्ञता की आवश्यकता होगी, उन्हें डेटा पर ध्यान देने की आवश्यकता है और डेटा पर कैसे काम करना है, समेत विज़ुअलाइज़ेशन और कोडिंग को समझना होगा।’

रंगनाथन ने कहा कि भविष्य की पत्रकारिता को टेक्नोलॉजी का महत्व समझना होगा और जो भी नए प्लेटफॉर्म्स आते हैं, उन्हें अपनाना होगा। रंगनाथन का कहना था, ‘हम जो बड़ी गलती कर रहे हैं वह यह है कि हम मानते हैं कि ये प्लेटफॉर्म्स पत्रकारिता हैं, लेकिन यह पत्रकारिता नहीं है, क्योंकि पत्रकारिता मूल में रहती है और प्लेटफॉर्म बदलता रहेगा।’

इसके साथ ही उन्होंने बताया कि नई पत्रकारिता के लिए किस तरह का बिजनेस मॉडल काम करेगा। कार्यक्रम में अपने संबोधन के आखिर में रंगनाथन ने कहा कि भविष्य की पत्रकारिता न्यूज़रूम्स से करनी होगी, जो सभी कंटेंट क्रिएटर्स, पत्रकारों, कोडर, विज़ुअलाइज़र, डेटा प्रदाताओं और फ्रीलान्सर्स के साथ मिलकर निष्पक्षता में विश्वास करते हैं।

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e4m-DNPA: जानें, विजेताओं की चयन प्रक्रिया पर क्या बोले सुनील अरोड़ा

‘e4m-DNPA डिजिटल इम्पैक्ट अवॉर्ड्स 2023’ कार्यक्रम के दौरान पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने सभी विजेताओं को बधाई दी

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 21 January, 2023
Last Modified:
Saturday, 21 January, 2023
SunilArora45784

डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में आ रही नई तकनीकों, नियामक और नीतिगत चुनौतियों और उनके समाधान को लेकर डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन यानी DNPA ने एक्सचेंज4मीडिया के सहयोग से शुक्रवार को दिल्ली में एक कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया। इस दौरान देश-दुनिया के तमाम दिग्गजों ने डिजिटल मीडिया के भविष्य, चुनौतियों और उनके समाधान को लेकर अपनी राय रखी।

इस कार्यक्रम के बाद डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने ‘e4m-DNPA डिजिटल इम्पैक्ट अवॉर्ड्स 2023’ के विजेताओं को शुक्रवार यानी 20 जनवरी, 2023 को दिल्ली के होटल हयात रीजेंसी में सम्मानित किया। इस कार्यक्रम के विजेताओं का चुनाव देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त और सूचना-एवं प्रसारण मंत्रालय के पूर्व सचिव सुनील अरोड़ा के नेतृत्व में गठित जूरी द्वारा किया गया। अवॉर्ड वितरण समारोह से पहले इस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सुनील अरोड़ा ने कहा कि वह इस चर्चा के दौरान विजेताओं के चयन पर सहमत होने के लिए सभी जूरी मेंबर्स का आभार व्यक्त करते हैं।

उन्होंने कहा कि सही वजहों के चलते यह कार्यक्रम अब बहुत अधिक लोकप्रिय हो रहा है। चर्चा करने के लिए मेरे हिसाब से करीब तीन से चार घंटे का पर्याप्त समय था। चर्चा के दौरान जूरी मेंबर्स के बीच कई लोग ऐसे भी थे, जो पहली बार एक-दूसरे से मिले थे। मेरी खुद इस ऑडियंस और जूरी में कई लोगों से पहली मुलाकात है। इस दौरान उन्होंने डॉ. अनुराग बत्रा की तारीफ करते हुए कहा कि डॉ.बत्रा एक ऐसे शख्स हैं, जिनकी एनर्जी कमाल की है और वह अपने समय का खास ध्यान रखते हैं।

उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि यहां बैठे तमाम लोग, विशेषकर सम्माननीय जूरी मेंबर्स जिन्होंने विजेताओं के नाम का चयन किया, मैं उनको दोबारा से धन्यवाद देना चाहता हूं। उन्होंने बहुत ही बेहतरीन चर्चा की और एक निर्णायक नतीजे पर पहुंचने की पूरी कोशिश की। मैं ऑर्गनाइजर्स को भी धन्यवाद देना चाहता हूं और टीम के उन सदस्यों को भी जिन्होंने मुझसे संपर्क किया और इसका हिस्सा बनाया, क्योंकि जूरी के तहत काम करना मेरे लिए बेहद ही दिलचस्‍प रहा। विजेताओं का चयन करना बहुत ही कठिन काम था। हम यह मानते हैं कि जिस कैटेगरी के लिए विजेताओं का चयन किया गया है, उसके लिए किसी ने बहुत मेहनत की होगी। उन्होंने कहा कि विजेताओं का चयन हमने इनोवेशन, सर्टेनिटी, स्‍केलेबिलिटी व सोशल इम्‍पैक्‍ट जैसे प्रमुख मापदंड के आधार पर किया।

अंत में विजेताओ को फिर से बधाई देते हुए के उन्होंने कहा कि उम्मीद करते हैं इस तरह के प्रयास आगे भी होते रहेंगे।

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टेक कंपनियों को रेवेन्यू का कुछ हिस्सा डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स को देना चाहिए: अपूर्व चंद्रा

‘e4m DNPA Digital Media Conference 2023’ के दौरान लिखित में भेजे गए अपने संदेश में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव अपूर्व चंद्रा ने उम्मीद जताई कि इस आयोजन में महत्वपूर्ण सुझाव निकलकर सामने आएंगे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 21 January, 2023
Last Modified:
Saturday, 21 January, 2023
Apurva Chandra MIB

‘डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन’ (DNPA) ने एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media) के सहयोग से शुक्रवार को ‘e4m DNPA Digital Media Conference 2023’ का आयोजन किया। दिल्ली के होटल हयात रीजेंसी में हुए इस कार्यक्रम के दौरान डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में आ रहीं नई तकनीकों, नियामक व नीतिगत चुनौतियों और उनके समाधान को लेकर देश-दुनिया के तमाम दिग्गज जुटे और अपनी बात रखी।

कार्यक्रम के दौरान लिखित में एक संदेश भेजकर अपनी बात रखते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव अपूर्व चंद्रा ने कहा कि बड़ी टेक्नोल़ॉजी कंपनियों को अपने रेवेन्यू का कुछ हिस्सा न्यूज पब्लिशर्स के डिजिटल प्लेटफॉर्म को भी देना चाहिए।

इस कदम को ‘पत्रकारिता के भविष्य’ से जोड़ते हुए उन्होंने प्रिंट और डिजिटल की कमजोर आर्थिक सेहत का हवाला दिया और कहा कि ऐसे सभी पब्लिशरों जो असली कंटेट क्रिएटर हैं, के डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म को ऐसी बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों से रेवेन्यू का एक बड़ा हिस्सा मिले, जो दूसरे के क्रिएट किए गए कंटेट की एग्रीगेटर हैं।

अपने इस लिखित संदेश में अपूर्व चंद्रा का कहना था कि ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस व यूरोपीय संघ ने तमाम कदम उठाकर यह सुनिश्चित किया है कि कंटेंट क्रिएटर्स और एग्रीगेटर के बीच रेवेन्यू का उचित बंटवारा हो। इसके साथ ही उन्होंने उम्मीद जताई कि इस आयोजन में भारत के संदर्भ में महत्वपूर्ण सुझाव निकलकर सामने आएंगे।   

अपूर्व चंद्रा का अपने इस मैसेज में कहना था कि डिजिटल मीडिया का तेज गति से विस्तार हो रहा है और देश के समावेशी डिजिटल विकास में इसकी अहम भूमिका है। चंद्रा ने कहा कि यह साफ है कि यदि पारंपरिक न्यूज इंडस्ट्री पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता रहा, तो पत्रकारिता का भविष्य भी प्रभावित होगा। इस प्रकार, यह पत्रकारिता और विश्वसनीय कंटेंट का भी सवाल है।

बता दें कि डीएनपीए दिल्ली स्थित संगठन है। देश के 17 शीर्ष डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स का संगठन है। यह संगठन ऐसा निष्पक्ष निकाय है, जो डिजिटल परिवेश में समाचार संगठनों और बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों के बीच समानता और निष्पक्षता को बढ़ावा देता है।

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राजीव चंद्रशेखर ने डिजिटल डेटा संरक्षण विधेयक लाने की बताई वजह, कही ये बात

कौशल विकास और उद्यमशीलता मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने भी वर्चुअली रूप इस कार्यक्रम को संबोधित किया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 21 January, 2023
Last Modified:
Saturday, 21 January, 2023
RajeevChandrashekhar54512

डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में आ रही नई तकनीकों, नियामक और नीतिगत चुनौतियों और उनके समाधान को लेकर डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन यानी DNPA ने एक्सचेंज4मीडिया के सहयोग से शुक्रवार को दिल्ली में एक कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया। इस दौरान देश-दुनिया के तमाम दिग्गजों ने डिजिटल मीडिया के भविष्य, चुनौतियों और उनके समाधान को लेकर अपनी राय रखी। वहीं कौशल विकास और उद्यमशीलता मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने भी वर्चुअली रूप इस कार्यक्रम को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि हम देश में ट्रिलियन डॉलर की डिजिटल अर्थव्यवस्था बनाने की कवायद में है, लिहाजा इसके लिए कुछ कानून भी बनाए जाने जरूरी हैं और हम इसके लिए डिजिटल डेटा संरक्षण विधेयक लेकर आए हैं, ताकि सभी तरह की अथॉरिटी की इसमें जवाबदेही तय हो और इससे नागरिकों को अपने डेटा के संरक्षण का अधिकार मिल सके।

इतना ही नहीं हम दूसरा जो सबसे महत्‍वपूर्ण कदम है वह है मौजूदा आईटी एक्ट, जोकि आने वाले समय में नए और प्रासंगिक डिजिटल इंडिया एक्ट में तब्दील हो जाएगा। इन्हीं प्रयासों की बदौलत ही देश में डिजिटल अर्थव्यवस्था और डिजिटल के पारिस्थितिक तंत्र को मजबूत बनाने का काम करेगा।

उन्होंने कहा कि आईटी क्षेत्र को मैंने करीब से देखा है, यहां मैंने कई वर्ष गुजारे हैं, लेकिन इस समय हम सबसे बेहतर दौर में है। डिजिटल मीडिया बदलाव की ओर है, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी चीजें काफी मायने रखती हैं। देश में 80 करोड़ लोग आज इंटरनेट से जुड़े हुए हैं, लेकिन आने वाले तीन-चार सालों में 100 करोड़ लोगों तक इंटरनेट की पहुंच होने की संभावना है। इंटरनेट में बदलाव तेजी से हो रहे हैं और भविष्य को देखते हुए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, आधुनिक उपकरण, क्लाउड, डिजिटल इकोनॉमी जैसी चीजों ही इसके विकास का हिस्सा होंगे।

चंद्रशेखर ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि डिजिटल मीडिया का दायरा काफी बड़ा हो चुका है। 2014 से पहले हम इसे जिस तरह से देखते थे, आने वाले सालों में अब इसकी तस्वीर और बदल जाएगी। बड़े समूहों का दबदबा इसके लिए बड़ी चुनौती के तौर पर उभरा है। सुरक्षा को लेकर भी चिंताएं बढ़ी हैं।  वैसे  ज्यादा से ज्यादा लोगों तक सबसे पहले सूचनाएं इसी प्लेटफॉर्म से पहुंचती हैं। इसलिए देखें तो पक्षपातपूर्ण और गलत खबरें सही और सटीक खबरों की तुलना में तेजी से फैलती हैं। इसलिए यह यूजर्स के साथ-साथ सरकार के लिए भी एक चुनौती बनी हुई है। वैसे हमारी जिम्मेदारी ज्यादा है कि हमें फेक न्यूज को रोकना है। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में मॉनेटाइजेशन का मुद्दा है, जिसे दूर किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि ऐडवर्टाइजमेंट से होने वाली आमदनी और मॉनेटाइजेशन ने पूरे सिस्टम को बिगाड़ दिया है। छोटे समूहों और डिजिटल कंटेंट निर्मित करने वाले लोगों को इससे नुकसान हो रहा है और अभी इसके मॉनेटाइजेशन पर उनका कंट्रोल भी नहीं है। लिहाजा उम्मीद है कि डिजिटल इंडिया कानून में हम इस मुद्दे पर फोकस करेंगे। इसके चलते इससे कंटेंट निर्मित करने वाले की आर्थिक जरूरतों के मुकाबले ऐडटेक कंपनियों व प्लेटफॉर्म्स की ताकत से पैदा होने वाला असंतुलन भी खत्म हो जाएगा।

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डिजिटल मीडिया की ग्रोथ बढ़ाना व ईकोसिस्टम तैयार करना हमारा मकसद: तन्मय माहेश्वरी

डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) के चेयरमैन व अमर उजाला के मैनेजिंग डायरेक्टर तन्मय माहेश्वरी ने भी अपनी बात रखी।

Last Modified:
Friday, 20 January, 2023
TanmayMaheshwari451

डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में आ रही नई तकनीकों, नियामक और नीतिगत चुनौतियों पर विचार-विमर्श करने के लिए डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन यानी DNPA एक्सचेंज4मीडिया के सहयोग से शुक्रवार को दिल्ली में एक कार्यक्रम का आयोजन कर रहा है। इस दौरान डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) के चेयरमैन व अमर उजाला के मैनेजिंग डायरेक्टर तन्मय माहेश्वरी ने भी अपनी बात रखी।

डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन के बारे में बताते हुए तन्मय माहेश्वरी ने कहा कि DNPA का कार्य देश में डिजिटल मीडिया की ग्रोथ को बढ़ावा देना और  डिजिटल न्यूज का ईकोसिस्टम तैयार करना है, क्योंकि हम मानते हैं कि  वैरिफाइड न्यूज ईकोसिस्टम हमारे लोकतंत्र का मूलभूत अधिकार है और इसे विकसित करने के लिए हमें पूरा प्रयास करना चाहिए। इसे निर्मित करने के पीछे यही एक मकसद है कि डिजिटल न्यूज ईकोसिस्टम को इस तरह से बढ़ाया जाए, ताकि इसकी मदद से वैरिफाइड न्यूज कल्चर प्रमोट हो सके और फेक न्यूज पर लगाम लगायी जा सके।

माहेश्वरी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि डिजिटल ईकोसिस्टम की रक्षा करना ही सिर्फ हमारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रिंट व टेलीविजन ईकोसिस्टम की तरह ही डिजिटल को भी बढ़ावा देना हमारी जिम्मेदारी का अहम हिस्सा होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि DNPA शुरू करने का यही मकसद था और इस वजह से ही इसका उदय हुआ। उन्होंने कहा कि डिजिटल इनोवेशन करना भी इसका एक मकसद ताकि नए अंदाज में देश का निर्माण किया जा सके।

उन्होंने कहा कि हमारे संस्थान का असली मकसद ही सही पत्रकारिता है और इस दिशा में लगातार हम आगे बढ़ रहे हैं। इस इंडस्ट्री का हिस्सा होना हमारे लिए गर्व की बात है।



 

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अखबार आज भी लोगों की पहली पसंद बना हुआ है: डॉ अनुराग बत्रा

इस दौरान बिजनेस वर्ल्ड व एक्सचेंज4मीडिया के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने कार्यक्रम को संबोधित किया और कई अहम मुददों पर अपनी बात रखी।

Last Modified:
Friday, 20 January, 2023
DrAnnuragBatra541

डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में आ रही नई तकनीकों, नियामक और नीतिगत चुनौतियों पर विचार-विमर्श करने के लिए डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन यानी DNPA एक्सचेंज4मीडिया के सहयोग से शुक्रवार को दिल्ली में एक कार्यक्रम का आयोजन कर रहा है। इस दौरान बिजनेस वर्ल्ड व एक्सचेंज4मीडिया के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने कार्यक्रम को संबोधित किया और कई अहम मुददों पर अपनी बात रखी।

उन्होंने सबसे पहले कार्यक्रम में उपस्थित हुए सभी अतिथिगण का स्वागत किया और कहा कि डिजिटल मीडिया पिछले तीन सालों में कोरोना काल के दौरान आम लोगों की पहली पसंद बना हुआ है और इस दौरान यह भी सुनिश्चित किया कि लोगों तक अच्छा कंटेंट पहुंचता रहे, फिर चाहे वह टेक्स्ट फॉर्मेट में हो, ऑडियो फॉर्मेट में हो या फिर वीडियो फॉर्मेट में। उन्होंने कहा कि इस महामारी के दौरान प्रिंट मीडिया ने भी काफी बेहतर काम किया है, लेकिन उसे कई तरह की चुनौतियों से भी  गुजरना पड़ा है, जिसमें सबसे बड़ी चुनौती रही, तो वह है न्यूज प्रिंट की लागत में इजाफा होना। उन्होंने कहा कि वैसे तो रेवेन्यू के मामले में फिलहाल ज्यादा दिक्कत नहीं दिखाई दी, क्योंकि रेवेन्यू लगातार पिछले एक साल के दौरान बढ़ा है।  

इस दौरान उन्‍होंने कहा कि आज प्रिंट हो, डिजिटल हो या टीवी मीडिया, लगातार बढ़ती कीमतें सभी के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, बावजूद इसके किसी ने भी अपने रेवेन्‍यू पर असर नहीं आने दिया है। बल्कि इन सभी माध्यमों का रेवेन्यू  बढ़ा है।

उन्होंने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि वैसे देखा जाए तो भारत दूसरे देशों जैसा नहीं है। यहां हर चीज में ग्रोथ दर्ज की गई है। इस सेक्‍टर में पूरी इंडस्‍ट्री बेहतरीन काम कर रही है। अखबारों के पाठकों की संख्या बढ़ी है। अखबार आज भी लोगों की पहली पसंद बना हुआ है। ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ जैसे अखबार, ‘एबीपी’ जैसे टीवी ब्रॉडकास्ट लगातार अच्छा काम कर रहे हैं। वहीं, डिजिटल के मामले में ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ ने काफी अच्छा किया है।

डॉ. बत्रा ने कहा कि डीएनपीए का मकसद डिजिटल पब्लिशर्स को आगे बढ़ने में मदद करना है, ताकि सही पालिसीज तैयार की जा सके। आज की यह कॉन्फ्रेंस इस दिशा में एक छोटा-सा प्रयास है और उम्मीद है कि डीएनपीए कॉन्फ्रेंस हर साल बेहद बड़े स्तर पर आयोजित की जाएगी।'

डॉ. बत्रा ने कहा, इस साल डीएनपीए के तहत ई-फोरम की शुरुआत की जा रही है। साथ ही, डिजिटल गवर्नेंस अवॉर्ड भी दिए जाएंगे। अलग-अलग कैटिगरी में इन अवॉर्ड्स के विजेताओं को आज शाम को सम्मानित किया जाएगा, जिन्हें जूरी मेंबर्स द्वारा चुना गया है।

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सरकार ले न्यूज मीडिया से जुड़े फैसले, न कि टेक कंपनियां: पॉल फ्लेचर

दुनिया ने 2020 में ‘न्यूज मीडिया बार्गेनिंग कोड’ (News Media Bargaining Code) लाने के लिए ऑस्ट्रेलियाई सरकार के इस कदम की सराहना की।

Last Modified:
Friday, 20 January, 2023
PaulFletcher454

ऐसे समय में जब बड़ी टेक कंपनियों का एकाधिकार दुनियाभर के न्यूज मीडिया घरानों के कार्यों में बाधा डाल रहा है, तब एक ऐसा देश भी सामने आया, जिसने इस पर कानून बनाकर बड़ी टेक कंपनियों को नियमों को दायरे में ला दिया और यह देश है ऑस्ट्रेलिया। दुनिया ने 2020 में ‘न्यूज मीडिया बार्गेनिंग कोड’ (News Media Bargaining Code) लाने के लिए ऑस्ट्रेलियाई सरकार के इस कदम की सराहना की। डिजिटल न्यूज के प्रसार के लिए एक समान वातावरण तैयार कर यह कोड दुनिया के लिए एक स्वर्ण मानक बन गया।  

ऑस्ट्रेलिया और इस तरह के कानून को आकार देने में अहम भूमिका निभाई पॉल फ्लेचर ने, जोकि 2020 से 2022 तक ऑस्ट्रेलिया के संचार मंत्री रहे और उनका साथ मिला तत्कालीन प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन का। इनके बनाए न्यूज मीडिया बार्गेनिंग कोड का असर यह रहा कि ऑस्ट्रेलिया के डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स के लिए बड़ी टेक कंपनियों से मुनाफे में अपनी वाजिब हिस्सेदारी मांगना आसान हो गया। 

'डीएनपीए फ्यूचर ऑफ डिजिटल मीडिया कॉन्फ्रेंस 2023' में भाग लेने के लिए भारत आए ऑस्ट्रेलिया के पूर्व संचार मंत्री पॉल फ्लेचर ने कार्यक्रम के दौरान कोड विकसित करने के अपने अनुभव, भारत की डिजिटल क्रांति और बड़ी टेक कंपनियों को लेकर डीएनपीए की भूमिका के बारे में हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्सचेंज4मीडिया से बात की।

इस दौरान उन्होंने बताया कि कैसे ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने गूगल (Google) और फेसबुक (Facebook) के प्रतिरोध का सामना किया, जब कोड का मसौदा पहली बार उनके साथ साझा किया गया था। उन्होंने कहा, 'रास्ते में थोड़ी मुश्किलें थीं। एक पॉइंट पर आकर गूगल ने ऑस्ट्रेलिया में अपनी सर्च सर्विस को वापस लेने की धमकी दी थी। इसके जवाब में, प्रधानमंत्री और मैं माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) के ग्लोबल एक्सपर्ट्स से मिले, जिन्होंने कहा कि वे ऑस्ट्रेलिया में BING (माइक्रोसॉफ्ट का सर्च इंजन) को विस्तार देने में रुचि लेंगे। वैसे भी हमने बहुत सी धमकियों को नजरअंदाज कर दिया था। 

वहीं दूसरी ओर, फेसबुक ने जवाबी कार्रवाई में ऑस्ट्रेलियाई पुलिस, एंबुलेंस और रेड क्रॉस जैसी महत्वपूर्ण सामुदायिक सेवाओं के पेज बंद कर दिए। यह एक ऐसा कदम था, जो आम लोगों के हिसाब से अच्छा नहीं था, लेकिन हम मजबूती से खड़े रहे। हमारे पास जोश फ्राइडेनबर्ग (ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कोषाध्यक्ष) जैसे मजबूत राजनीतिक नेतृत्व था। इसके बाद कानून संसद में पारित हो गया।  मुझे यह कहते हुए प्रसन्नता हो रही है कि Google और Facebook दोनों ने न्यूज मीडिया पब्लिशर्स के साथ वाणिज्यिक सौदों पर बातचीत की। न्यूज मीडिया पब्लिशर्स आज गूगल से लगभग 20 गुना और मेटा से 13 गुना कारोबार करते हैं।

फ्लेचर ने दोहराया कि उनकी भारत यात्रा के दो उद्देश्य हैं: पहला कोड को अमल में लाने के अपने अनुभव को साझा करना और दूसरा, टीसीएस, इंफोसिस और विप्रो जैसी भारतीय तकनीकी कंपनियों की असाधारण सफलता के बारे में अधिक जानना। उन्होंने भारत के तकनीकी क्षेत्र की प्रशंसा की और उन्होंने इसे 'विश्व-अग्रणी' (world-leading) बताया। उन्होंने कहा कि यह असाधारण सफलता ही है कि जिन नागरिकों के पास केवल पांच या दस साल पहले तक मोबाइल सेवाएं या बैंक खाता भी नहीं था, आज वह इसका लाभ उठा रहे हैं। फ्लेचर ने इसके लिए भारत सरकार, देश के आईटी क्षेत्र और देश में डिजिटल क्रांति को बढ़ावा देने वाले दूरसंचार ऑपरेटर्स को इस सफलता का श्रेय दिया है।

उन्होंने कहा कि यह प्रतिस्पर्धा से जुड़ी नीतियों का मसला है। गूगल और फेसबुक ने डिजिटल विज्ञापनों के मामले में असाधारण सफलता हासिल की है और ऐसा करने के लिए वह डिजिटल न्यूज मीडिया से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। उन्हें विज्ञापनों से कमाई का हिस्सा साझा करना चाहिए। ये लोगों को आकर्षित करने के लिए जिस कंटेंट का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह न्यूज मीडिया द्वारा तैयार किया जाता है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि न्यूज प्रसार की असमानता से निपटने के लिए हर देश को अपने कानून बनाने की जरूरत है। संप्रभु देशों की सरकारों के लिए यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात है कि इससे जुड़े फैसले वहां की संप्रभु सरकारों द्वारा ही लिए जाने चाहिए,न कि फैसला लेने का नियंत्रण टेक कंपनियों के हाथ में होना चाहिए। एक उदार लोकतंत्र में, आपके पास विविध मीडिया होना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलिया में गूगल-फेसबुक और न्यूज पब्लिशर्स के बीच क्या संबंध होंगे, इसकी निगरानी सरकार ही करती है, न कि टेक कंपनियां। 

 

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अखबारों ने नहीं, आजकल TV चैनलों ने कमाल कर रखा है: डॉ. वैदिक

पाकिस्तान के आजकल जैसे हालात हैं, मेरी याददाश्त में भारत या हमारे पड़ौसी देशों में ऐसे हाल न मैंने कभी देखे और न ही सुने।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 17 January, 2023
Last Modified:
Tuesday, 17 January, 2023
pakistan45451

डॉ. वेदप्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

पाकिस्तान के आजकल जैसे हालात हैं, मेरी याददाश्त में भारत या हमारे पड़ौसी देशों में ऐसे हाल न मैंने कभी देखे और न ही सुने। हमारे अखबार पता नहीं क्यों, उनके बारे में न तो खबरें विस्तार से छाप रहे हैं और न ही उनमें उनके फोटो देखे जा रहे हैं, लेकिन हमारे टीवी चैनलों ने कमाल कर रखा है। वे जैसे-तैसे पाकिस्तानी चैनलों के दृश्य अपने चैनलों पर आजकल दिखा रहे हैं। उन्हें देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं, क्योंकि पाकिस्तानी लोग हमारी भाषा बोलते हैं और हमारे जैसे ही कपड़े पहनते हैं। वे जो कुछ बोलते हैं, वह न तो अंग्रेजी है, न रूसी है, न यूक्रेनी। वह तो हिन्दुस्तानी ही है। उनकी हर बात समझ में आती है। उनकी बातें, उनकी तकलीफें, उनकी चीख-चिल्लाहटें, उनकी भगदड़ और उनकी मारपीट दिल दहला देने वाली होती है।

गेहूं का आटा वहां 250-300 रु. किलो बिक रहा है। वह भी आसानी से नहीं मिल रहा है। बूढ़े, मर्द, औरतें और बच्चे पूरी-पूरी रात लाइनों में लगे रहते हैं और ये लाइनें कई फर्लांग लंबी होती हैं। वहां ठंड शून्य से भी काफी नीचे होती है। आटे की कमी इतनी है कि जिसे उसकी थैली मिल जाती है, उससे भी छीनने के लिए कई लोग बेताब होते हैं। मार-पीट में कई लोग अपनी जान से भी हाथ धो बैठते हैं।

पाकिस्तान के पंजाब को गेहूं का भंडार कहा जाता है लेकिन सवाल यह है कि बलूचिस्तान और पख्तूनख्वाह के लोग आटे के लिए क्यों तरस रहे हैं? यहां सवाल सिर्फ आटे और बलूच या पख्तून लोगों का ही नहीं है, पूरे पाकिस्तान का है। पूरे पाकिस्तान की जनता त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही है, क्योंकि खाने-पीने की हर चीज के दाम आसमान छू रहे हैं। गरीब लोगों के तो क्या, मध्यम वर्ग के भी पसीने छूट रहे हैं।

बेचारे शाहबाज़ शरीफ प्रधानमंत्री क्या बने हैं, उनकी शामत आ गई है। वे सारी दुनिया में झोली फैलाए घूम रहे हैं। विदेशी मुद्रा का भंडार सिर्फ कुछ हफ्तों का ही बचा है। यदि विदेशी मदद नहीं मिली तो पाकिस्तान का हुक्का-पानी बंद हो जाएगा। अमेरिका, यूरोपीय राष्ट्र और सउदी अरब ने मदद जरूर की है, लेकिन पाकिस्तान को कर्जे से लाद दिया है। ऐसे में कई पाकिस्तानी मित्रों ने मुझसे पूछा कि भारत चुप क्यों बैठा है? भारत यदि अफगानिस्तान और यूक्रेन को हजारों टन अनाज और दवाइयां भेज सकता है, तो पाकिस्तान तो उसका एकदम पड़ौसी है। मैंने उनसे जवाब में पूछ लिया कि क्या पाकिस्तान ने कभी पड़ौसी का धर्म निभाया है? फिर भी, मैं मानता हूं कि नरेंद्र मोदी इस वक्त पाकिस्तान की जनता (उसकी फौज और शासकों के लिए नहीं) की मदद के लिए हाथ बढ़ा दें, तो यह उनकी ऐतिहासिक और अपूर्व पहल मानी जाएगी। पाकिस्तान के कई लोगों को टीवी पर मैंने कहते सुना है कि ‘इस वक्त पाकिस्तान को एक मोदी चाहिए।’

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‘अतुल जी ने क्षेत्रीय पत्रकारिता को राष्ट्रीय फलक पर दिलाई विशिष्ट पहचान’

अतुल जी अखबार के भीतर संपादकीय स्वातंत्र्य के पक्षधर थे। उन्होंने जो कार्य संस्कृति विकसित की उसने विज्ञापन प्रसार और संपादकीय विभागों में समन्वय तो बनाया पर हर विभाग की अपनी स्वायत्तता भी बरकरार रखी।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 03 January, 2023
Last Modified:
Tuesday, 03 January, 2023
Atul Maheswari

विनोद अग्निहोत्री, कंसल्टिंग एडिटर, अमर उजाला।।

अतुल माहेश्वरी, जिन्हें हम सब आदर से अतुल जी या अतुल भाई साहब कहकर संबोधित करते थे, से मेरा परिचय 1986-87 में तब हुआ, जब मैं ‘नवभारत टाइम्स’ में बतौर उत्तर प्रदेश संस्करण डेस्क प्रभारी और फिर मेरठ कार्यालय प्रमुख कार्यरत था। अतुल जी उन दिनों मेरठ आ चुके थे और ‘अमर उजाला‘ के मेरठ कार्यालय में नियमित बैठते थे। मैं अक्सर शाम को अपना कामकाज निपटाकर उनसे मिलने चला जाता था। इसमें मेरा एक स्वार्थ ये भी था कि क्योंकि मैं ‘नवभारत टाइम्स‘ का पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जो तब उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा था, के समाचार कवरेज के लिए अकेला संवाददाता था, जबकि ‘अमर उजाला‘ पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में सर्वाधिक समाचार नेटवर्क और प्रसार संख्या वाला अख़बार था। इसलिए मैं ‘अमर उजाला‘ कार्यालय जाकर कई ऐसे समाचारों की जानकारी जुटा लेता था, जिन्हें भले ही ‘नवभारत टाइम्स‘ में उत्तर प्रदेश संस्करण के दो पन्नों में जगह मिले या न मिले, लेकिन मेरी जानकारी और सूचना में वृद्धि ज़रूर होती थी।

मेरी पत्रकारिता खासकर रिपोर्टिंग के वो शुरुआती वर्ष थे, जबकि अतुल जी के नेतृत्व में ‘अमर उजाला‘ लगातार आगे बढ़ रहा था। वो इस प्रमुख अख़बार के संपादक और मालिक थे। अनेक जाने-माने पत्रकार ‘अमर उजाला‘ में कार्यरत थे। लेकिन, अतुल जी की सहजता और विनम्रता गजब की थी। वो उम्र और हर लिहाज से मुझसे बड़े थे, लेकिन मेरे प्रति उनका व्यवहार बेहद सहज और प्यार भरा था। मैं शाम को जब उनके पास पहुंचता वो मुझे बिठाते, चाय पिलाते और मेरे पूछने से पहले ही दिन की सारी प्रमुख खबरें बता देते थे और कहते थे इनके जो आपके मतलब की हों उन्हें नोट कर लीजिए। कई बार उनके ही एसटीडी फोन से मैंने कोई जरूरी खबर ‘नवभारत टाइम्स‘ की डेस्क को लिखवाई। शुरू में मुझे संकोच होता था तो उन्होंने ही इसे यह कहकर दूर किया की जब हम एक धंधे में हैं तो प्रतिद्वंद्वी नहीं भाई बनकर रहें और एक-दूसरे की मदद करें। किसी अखबार मालिक की दूसरे अखबार के संवाददाता के प्रति ये सहृदयता अद्भुत है। उन दिनों के अतुल जी के साथ मेरे कई उल्लेखनीय अनुभव हैं, जिनकी याद आज भी मुझे उनके प्रति आदर से भर देती है।

आगे चलकर जब मैंने ‘अमर उजाला‘ दिल्ली में बतौर ब्यूरो प्रमुख काम किया तो अतुल जी नेतृत्व में मुझे काम करने का मौका भी मिला। हालांकि मेरी रिपोर्टिंग ‘अमर उजाला‘ के तत्कालीन कार्यकारी संपादक श्री राजेश रपरिया को थी, लेकिन कई बार अतुल जी के साथ भी बैठक होती थी। वो जब भी मेरठ से नोएडा-दिल्ली आते तो हम सबकी मीटिंग लेते थे। इसमें अख़बार को लेकर विस्तृत चर्चा होती थी। इसी दौरान मुझे उनकी पत्रकारीय दृष्टि और सोच की जानकारी करीब से हुई।

यह वो दौर था जब ‘अमर उजाला‘ अपनी उत्तर प्रदेश की क्षेत्रीय पहचान से बाहर निकल कर राष्ट्रीय फलक पर छा रहा था। अतुल जी पूरे मनोयोग से इसमें जुटे हुए थे। उनके सामने दो बड़ी चुनौतियां थीं। एक देश बड़े और साधन संपन्न मीडिया घरानों के बीच ‘अमर उजाला‘ को स्थापित करना और दूसरा ये कि ‘अमर उजाला‘ के पूरे कामकाज और कर्मचारियों की मानसिकता को बदलकर राष्ट्रीय स्वरूप की जरूरतों के मुताबिक ढालना। इसके लिए उन्होंने दो स्तर पर काम किया। संस्थान के भीतर ऐसे लोगों की पहचान की, जिनमें जोश जुनून के साथ खुद को बदलने का जज़्बा था। उन्हें आगे लाकर अहम दायित्व दिए गए। दूसरा, उन्होंने कई नए ऐसे लोगों को भी ‘अमर उजाला‘ से जोड़ा, जिन्हें बड़े और कारपोरेट क्षेत्र में काम करने का तजुर्बा था। जाने-माने पत्रकार उदयन शर्मा को उन्होंने इसी उद्देश्य से ‘अमर उजाला‘ से जोड़ा, लेकिन उदयन जी के असमय निधन से उनकी योजना को झटका लगा। आगे अतुल जी ने फिर सब ठीक कर लिया और ‘अमर उजाला‘ उन ऊंचाइयों पर पहुंच सका, जहां आज है।

अतुल जी अखबार के भीतर संपादकीय स्वातंत्र्य के जबरदस्त पक्षधर थे। उन्होंने जो कार्य संस्कृति विकसित की उसने विज्ञापन प्रसार और संपादकीय विभागों में समन्वय तो बनाया लेकिन हर विभाग की अपनी स्वायत्तता भी बरकरार रखी। संपादकीय स्वतंत्रता में किसी का कोई हस्तक्षेप नहीं है। ‘अमर उजाला‘ के संतुलित और सबका अखबार होने की नीति इसके संस्थापकों के समय से ही चली आ रही है और इसे अतुल जी ने और पुष्ट किया। अखबार की कार्य संस्कृति और संतुलित संपादकीय नीति  न सिर्फ जारी है, बल्कि मौजूदा प्रबंधन ने उसे स्थाई स्वरूप दे दिया है।

संपादकीय स्वतंत्रता और पत्रकारिता की मर्यादा के प्रति अतुल माहेश्वरी जी की प्रतिबद्धता के कई उदाहरण हैं, जिनमे एक प्रसंग का उल्लेख करना चाहूंगा। एक बार एक उत्तर भारतीय राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री अपने राज्य के ‘अमर उजाला‘ के ब्यूरो प्रमुख से इस कदर नाराज हो गए कि उन्होंने सरकारी विज्ञापनों के साथ साथ सरकारी विज्ञप्तियों, प्रशासनिक सूचनाओं के साथ-साथ अखबार के संवाददाताओं के सचिवालय प्रवेश पर भी रोक लगा दी।

उनसे जब इस पर बात की गई तो उनकी शर्त थी कि ब्यूरो प्रमुख को हटा दिया जाए। अतुल जी से विज्ञापन और प्रसार विभाग के प्रमुखों ने अनुरोध किया कि शर्त मान कर विवाद खत्म किया जाए। अतुल जी ने दो टूक कहा कि मुख्यमंत्री अपने पद पर हमेशा नहीं रहेंगे, लेकिन अखबार रहेगा और उसकी साख रहेगी। उससे समझौता नहीं किया जाएगा। वही हुआ। ब्यूरो प्रमुख नहीं हटाए गए, लेकिन चुनाव में मुख्यमंत्री का दल हार गया और राज्य को नया सीएम मिला।

‘अमर उजाला‘ संस्थान ने हमेशा अपने कर्मचारियों के प्रति कल्याणकारी नजरिया रखा है। इसमें अखबार के संस्थापकों की भावना को अतुल जी ने अमलीजामा पहनाया। शराब माफिया के हाथों मारे गए उत्तराखंड ‘अमर उजाला‘ के पत्रकार उमेश डोभाल के लिए लड़ी गई लड़ाई और उनके परिवार को दिया गया सरंक्षण इसका एक उदाहरण है।ऐस अनेक प्रसंग हैं। ‘अमर उजाला‘ के नवोन्मेषक स्वर्गीय अतुल माहेश्वरी को विनम्र श्रद्धांजलि।

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