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इन उम्मीदों व चुनौतियों के साये में गुजरेगा 2020 में टीवी इंडस्ट्री का सफर!
इन उम्मीदों व चुनौतियों के साये में गुजरेगा 2020 में टीवी इंडस्ट्री का सफर!
समाचार4मीडिया से बातचीत में टीवी इंडस्ट्री के दिग्गजों ने नए साल को लेकर रखे अपने विचार
समाचार4मीडिया ब्यूरो
6 years ago
तमाम उम्मीदों के साथ नए साल ने अपनी दस्तक दे दी है। मीडिया को भी नए साल से बहुत ज्यादा उम्मीदें हैं, लिहाजा इन्हीं सब को लेकर समाचार4मीडिया ने टीवी इंडस्ट्री से जुड़े वरिष्ठ टीवी पत्रकारों से जानना चाहा कि इंडस्ट्री के लिहाज से वे 2020 को किस रूप में देखते हैं। आइए, डालते हैं एक नजर:
‘टीवी9 भारतवर्ष’ (TV9 Bharatvarsh) में सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर और जाने-माने एंकर निशांत चतुर्वेदी का इस बारे में कहना है कि मीडिया के लिए दो चुनाव (दिल्ली और बंगाल) काफी महत्वपूर्ण होंगे। इसके अलावा मीडिया के लिए इस साल सबसे बड़ा चैलेंज यह है कि जैसे पिछले साल अमेरिका में टीवी न्यूज की व्युअरशिप में करीब 27 प्रतिशत की कमी आई है और लोग सोशल मीडिया और ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स पर ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं, वैसे ही भारत में इस साल यह देखना होगा कि भले ही ट्राई (TRAI) ने शुल्क में कटौती करके टीवी दर्शकों को राहत दी है, लेकिन क्या टीवी इंडस्ट्री ऐसे समय में सोशल मीडिया अथवा अन्य ओटीटी प्लेटफॉर्मस का दबाव झेल पाएगी अथवा नहीं। यह भी देखना होगा कि इस साल लोग टीवी ज्यादा देखेंगे या सोशल मीडिया व अन्य ओटीटी प्लेटफॉर्म्स। अब रेवेन्यू की बात करें तो इकनॉमी अभी बहुत अच्छी नहीं है। बड़े चैनल्स को छोड़कर किसी के पास भी ऐड रेवेन्यू बहुत अच्छे नहीं आ रहे हैं। अब देखना यह है कि मीडिया इन चुनौतियों से किस तरह निपट पाती है। इसके अलावा, 2020 में काफी चीजें बदलेंगी, क्योंकि अर्थव्यवस्था की वजह से मीडिया अपनी स्थिति मजबूत करना चाहेगी। इसके लिए कुछ चैनल्स में विलय (Merger) अथवा अधिग्रहण (acquisition) देखने को मिल सकते हैं। वहीं, इस साल चुनाव के अलावा ओलंपिक और टी-20 जैसे बड़े आयोजन हैं। हालांकि, ओलंपिक के लिहाज से हमेशा टीवी न्यूज की व्युअरशिप बहुत कम होती है, लेकिन टी-20 में अच्छे दर्शक देखने को मिल सकते हैं। अभी की बात करें तो आप देखेंगे टीवी पर स्पोर्ट्स एकदम कम हो गया है और प्रमुख चैनल्स स्पोर्ट्स की मात्रा को कम कर रहे थे। मुझे लगता है कि इस साल टीवी पर स्पोर्ट्स में फिर उछाल देखने को मिलेगा, क्योंकि अभी न्यूजीलैंड की सीरीज है, फिर आईपीएल (IPL) है और फिर टी-20 है। इस बीच ओलंपिक भी है। ऐसे में लगता है कि इस साल आपको टेलिविजन न्यूज पर फिर से क्रिकेट दिखना शुरू हो सकता है।
वरिष्ठ टीवी पत्रकार और ‘न्यूज नेशन’ चैनल में कंसल्टिंग एडिटर दीपक चौरसिया का मानना है कि मीडिया इंडस्ट्री के लिए वर्ष 2020 बहुत अच्छा रहेगा। उनका कहना है कि न्यूज इंडस्ट्री में ऐसी तमाम घटनाएं होती हैं, जिन्हें लोगों को देखना होता है। वर्ष 2019 में कई बड़ी घटनाएं हुईं और उम्मीद है कि 2020 भी ऐसा ही होगा। मोदी सरकार ने पिछले छह महीने के दौरान मीडिया को काफी सरप्राइज (खबरों के रूप में) किया है और मुझे लगता है कि वर्ष 2020 में ऐसे कई सरप्राइज हो सकते हैं, जो पत्रकारों के लिए काफी महत्वपूर्ण होंगे, क्योंकि उन्हें न्यूज ब्रेक करने को मिलेगी। रही बात न्यूज चैनल्स की व्युअरशिप की तो इस साल भी वह बनी रहेगी, क्योंकि लोग आज भी खबरों को टीवी पर देखना चाहते हैं। जहां तक क्रेडिबिलिटी की बात है तो वो दर्शक खुद तय करेंगे, क्योंकि उन्हें पता है कि उन्हें क्या देखना है। यदि लोगों को लगता है कि उन्हें सरकार के पक्ष में न्यूज देखनी है तो वे वही देखेंगे और सरकार के खिलाफ न्यूज देखनी है अथवा न्यूट्रल न्यूज देखनी है तो भी उनका मूड कोई नहीं बदल सकता है।
‘न्यूज18’ के एग्जिक्यूटिव एडिटर अमिश देवगन का मानना है कि न्यूज इंडस्ट्री के लिए डिजिटल काफी बड़ा चैलेंज है और इस साल भी डिजिटल से इसे चुनौतियां मिलती रहेंगी। ऐसे में टीवी चैनल्स को आगे बढ़ने व चुनौतियों का सामना करने के लिए कोई इनोवेटिव तरीका निकालना होगा। अब ‘ढाक के तीन पात’ वाली स्थिति नहीं चलने वाली है। जो चैनल जनता की बात करेगा और जनता की नब्ज पहचानकर चलेगा, वही व्युअरशिप की दौड़ में आगे रहेगा। पिछले साल भी यही हुआ था और इस बार भी यही स्थिति बरकरार रहेगी। रही बात क्रेडिबिलिटी की तो इस बारे में फैसला सिर्फ व्युअर्स करते हैं और रेटिंग तय करती है। जिस तरह से नेता की रेटिंग जनता तय करती है, उसी तरह टीवी चैनल्स की रेटिंग बार्क (BARC) करती है और इसी से क्रेडिबिलिटी तय होती है। इसलिए इस बारे में फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता है। मेरा मानना है कि टीवी में क्रेडिबिलिटी मापने का सबसे अच्छा तरीका बार्क रेटिंग है, जो हर हफ्ते मिल जाती है। इससे बेहतर रिजल्ट और क्या होगा। आप इसके लिए कोई तो पैमाना तय करेंगे। यदि चैनल अपने आप को अलग रखकर चलते रहेंगे तो फिर तो यही होगा कि अकेले रेस में भागे, अकेले जीते और अकेले ही अवॉर्ड लें। यदि टॉप थ्री और फोर चैनल की बात करें तो वाकई में वे टॉप थ्री और टॉप फोर हैं। इस बात को हमें समझना ही होगा। आखिर में मैं यही कहूंगा कि टीवी चैनल्स को इस साल भी डिजिटल से चुनौती मिलती रहेगी।
‘इंडिया न्यूज नेटवर्क’ (India News Network) के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत का कहना है कि कोई भी नया साल हो, उसमें कुछ घटनाएं तयशुदा होती हैं, जिन्हें कैलेंडर इवेंट्स कहते हैं जबकि कुछ घटनाएं होती रहती हैं, क्योंकि जीवन और यह पेशा ऐसा ही है। पिछले कुछ समय के दौरान मीडिया इंडस्ट्री का जमीनी सच्चाइयों से रिश्ता टूटा है और कुछ अलग-अलग ताकतों के जरिये जिनका अपना स्वार्थ निहित होता है, उनके द्वारा जो माहौल खड़ा किया जाता है, उसका मीडिया शिकार होती है और मीडिया में यह संकट इस साल कम नहीं होगा। दिल्ली और बिहार में होने वाले चुनावों पर मीडिया की नजर है और इसे राष्ट्रीय चुनाव के तौर पर भी देखा जा रहा है। ऐसे में मीडिया दो तरह की आवाजों में बंटी मीडिया हो गई है। एक तो यह कि वह किस दल विशेष के हक में आवाज उठाती है और दूसरी, वह किसी दल विशेष के विरोध में आवाज उठाती है। ये आवाजें जमीन से कोई रिश्ता नहीं रखती हैं। जमीन की सच्चाइयों और लोगों की परेशानियों से मीडिया की खबरों का लेना-देना लगभग खत्म हो गया है। इसलिए देश में जो माहौल पैदा होता है, जो बहस चलती है और जिस तरह से जहर बयानी होती है, वह सब कुछ बिना किसी मुद्दे के चलता है, क्योंकि उस पर लोग अपना फायदा देखते हैं। कहने का मतलब है कि मीडिया में अब दो तरह की मजबूत आवाज हैं, जो राजनीति या सत्ता के इधर या उधर हो गई हैं। इन दोनों तरफ की आवाजों का जमीन से कोई रिश्ता-नाता नहीं है। लोगों की मुसीबतों से इसका कोई सरोकार नहीं है। मीडिया के लिए चुनौती यह है कि वह इस हवा से उतरकर नीचे आए। रही बात मीडिया की क्रेडिबिलिटी की तो नए साल में इस क्रेडिबिलिटी को बढ़ाने की चुनौती होगी। इसके लिए मीडिया में शामिल लोगों को अपने निहित स्वार्थों को छोड़ना होगा। मुझे उम्मीद है कि नए साल में देश की जनता का मीडिया में भरोसा बढ़ेगा। मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स की बात करें तो कोई भी माध्यम कभी खत्म नहीं होगा और टीवी की व्युअरशिप भी बढ़ेगी।
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