वरिष्ठ पत्रकार सुप्रिय प्रसाद ने बताया, कुछ यूं एसपी ने लालू को कराया था चुप

उन खुशनसीब पत्रकारों में मेरा नाम भी शामिल है, जिन्हें एसपी के साथ काम करने का मौका मिला...

Last Modified:
Wednesday, 27 June, 2018
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सुप्रिय प्रसाद

मैनेजिंग एडिटर, टीवी टुडे ग्रुप

उन खुशनसीब पत्रकारों में मेरा नाम भी शामिल हैजिन्हें एसपी के साथ काम करने का मौका मिला। एसपी ने 1 जुलाई 1995 को 'आजतक' जॉइन किया था। लेकिन मैं उनसे ठीक बीस दिन पहले यानी 10 जून को ही 'आजतक' आ गया था। जॉइन करने के बाद एसपी ने कायदे से एंकरिंग का अभ्यास किया था। 17 जुलाई 1995 को दिल्ली दूरदर्शन पर 20 मिनट के न्यूज शो के रूप में आजतक शुरू हुआ था। एसपी के साथ काम करने का तजुर्बा अपनेआप में अनोखा था। खबरों के प्रति उनकी दीवानगी को देख हमलोग हैरान थे। वे रोज कई क्षेत्रीय अखबारों समेत 40 से 50 अखबार पढ़ते थे। कई बार तो खुद कई ब्यूरो चीफ को फोन कर बताते थे कि उनके शहर या इलाके में कौन सी खबर है और उसे कैसे कवर करना है।


आजतक में तब मुझे तीन महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर ट्रेनी रिपोर्टर के रूप में काम करने का मौका मिला था। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तब तकनीकी रूप से इतना समृद्ध भी नहीं था। मेरा कॉन्ट्रैक्ट 10 सितंबर को पूरा होने वाला था, उससे पहले ही मैं एसपी के पास पहुंच गया और पूछ बैठा कि सर तीन महीने पूरे होने वाले हैं अब बता दीजिए कि 10 सितंबर के बाद आना है या नहीं। एसपी हंस पड़े और बोले कि आपके काम से मैं बहुत खुश हूं और आप मेरे साथ काम कर रहे हैं। तभी मुझे असिस्टेंट न्यूज को-ऑर्डिनेटर का पद दिया गया।

एसपी के साथ काम करने में सबसे बड़ी सुविधा थी उनकी सहज उपलब्धता। उनसे हर कोई सहज ही मिल सकता था और कुछ भी पूछ सकता था। खेल हो या बिजनेसराजनीति हो या चुनाव, हर विषय पर उनकी पकड़ अद्भुत थी। आजतक के शुरुआती दौर में एसपी हर खबर की एक-एक लाइन पढ़ते थे, और फिर उस पर अपनी राय देते थे। खबरों को लेकर उनसे सीधा जुड़ाव होने के कारण ही मुझे उनसे इंटरैक्शन का पूरा मौका भी मिला।

शो की शूटिंग के दौरान कई मजेदार घटनाएं भी घटती रहती थीं। मुझे याद है एक ऐसी ही मजेदार घटना तब घटी थी जब लालू प्रसाद यादव गेस्ट के रूप में स्टूडियो आए थे। लालू यादव उस समय बिहार के मुख्यमंत्री थे। स्टूडियो में लालू यादव और एसपी के बीच सवाल-जवाब का दौर शुरू हो गया। इंटरव्यू रिकार्ड हो रहा था। उस समय किसी का भी इंटरव्यू चार मिनट से ज्यादा नहीं जा सकता था,  क्योंकि शो ही 20 मिनट का था। अब लालू ने पहले सवाल के जवाब में बोलना शुरू किया तो बोलते ही चले जा रहे थे। दूसरा सवाल पूछने के लिए एसपी उन्हें रुकने का इशारा करने लगे, लेकिन लालू उस समय कहां किसी का इशारा समझते थे। इधर जब एसपी ने देखा कि लालू को इशारा करना समय गंवाना है तो अंत में उन्होंने लालू के पैर पर ही अपना पैर जोर से मार दिया। तब जाकर लालू के बोलने पर ब्रेक लगा।

एसपी सिंह अपने आप में पत्रकारिता के विश्वविद्यालय थे। खबरों को लेकर उनका जुनून था तो विजन भी था। जो भी उनके साथ रहाबहुत कुछ सीख गया। एसपी के साथ काम करके ही मेरी बुनियाद मजबूत हो पाई, जिस पर आज मैं खड़ा हूं।

 

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पूण्य प्रसून का सवाल- न्यूज चैनलों के किसी पत्रकार को ये खबर पहले क्यों नहीं पता लगी?  

पुण्य प्रसून बाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार ।। किन्हें नाज है मीडिया पर आडवानी 35.00, खुराना 3.00, एसएस 18.94, के नाथ 7.00, एनडीटी 0.88, बूटा 7.50, एपी 5.00, एलपीए

Last Modified:
Thursday, 29 December, 2016
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पुण्य प्रसून बाजपेयी

वरिष्ठ पत्रकार ।।

किन्हें नाज है मीडिया पर

आडवानी 35.00, खुराना 3.00, एसएस 18.94, के नाथ 7.00, एनडीटी 0.88, बूटा 7.50, एपी 5.00, एलपीएस 5.50, एस यादव 5.00, ए एम 30.00, एएन 35.00, डी लाल 50.00, वीसीएस 47.00, एनएस 8.00 ...और इसी तरह कुछ और शब्द। जिन के आगे अलग अलग नंबर। यानी ना तो इनीशियल से पता चलता कि किसका नाम और ना ही नंबर से पता चलता कि ये रकम है या कुछ और। लेकिन पन्ने के उपर लिखा हुआ पीओई फ्राम अप्रैल 86 टू मार्च 90। और सारे नामों के आगे लिखे नंबर को जोडकर लिखा गया 1602.06800। और कागज के एक किनारे तीन हस्ताक्षर। और तीनों के नीचे तारीख 3/5/91 ....तो इस तरह के दो पन्ने जिसमें सिर्फ नाम के पहले अक्षर का जिक्र।

मसलन दूसरे पन्ने में एलकेए या फिर वीसीएस। और देखते देखते देश की सियासत गर्म होती चली गई कि जैन हवाला की डायरी का ये पन्ना है। जिसमें लिखे अक्षर नेताओं के नाम हैं, जिन्हें हवाला से पेमेंट हुई। और इस पन्ने को लेकर देश की सियासत कुछ ऐसी गर्म हुई कि लालकृष्ण आडवाणी ने ये कहकर लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया कि जब तक उनके नाम पर लगा हवाला का दाग साफ नहीं होता, वह संसद में नहीं लौटेंगे। बाकी कांग्रेस-बीजेपी के सांसद जिनके भी नाम डायरी के पन्नों पर लिखे शब्द को पूरा करते उनकी राजनीति डगमगाने लगी और पूरे मामले की जांच शुरू हो गई।

उस वक्त प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने सीबीआई के हवाले जैन हवाला की जांच कर दी। लेकिन बीस बरस पहले 1996 में डायरी का ये पन्ना किसी नेता ने हवा में नहीं लहराया। ना ही किसी सीएम ने विधानसभा में डायरी के इस पन्ने को लहराकर किसी से इस्तीफा मांगा, बल्कि तब के पत्रकारों ने ही डायरी के इस पन्ने के जरिए क्रोनी कैपटिलिज्म और नेताओं का जैन बंधुओं के जरिए हवाला रैकेट से रकम लेने की बात छापी। जनसत्ता ने नामों का जिक्र किया तो आउटलुक ने तो 31 जनवरी 1996 के अंक में कवर पेज पर ही डायरी का पन्ना छाप दिया और जैन हवाला की इस रिपोर्ट ने बोहरा कमेटी की उस रिपोर्ट को भी सतह पर ला दिया, जिसमें 93 के मुंबई ब्लास्ट के बाद नेताओं के तार अपराध-आतंक और ब्लैकमनी से जुड़े होने की बात कही गई। लेकिन तब जिक्र मीडिया के जरिए ही हो रहा था। सवाल पत्रकार ही उठा रहे थे। मीडिया संस्थान भी बेखौफ सत्ता-सियासत के भीतर की काई को उभार रहे थे।

अतीत के इन पन्नों को जिक्र इसलिए क्योंकि मौजूदा वक्त में जिन कागजों को लेकर हंगामा मचा है, उसमें पहली बार कोई भी सवाल पूछ सकता है कि आखिर ये कौन सा दौर है कि जिस दस्तावेज को केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा में उछाला, जिन कागजों को राहुल गांधी हर रैली में दिखा रहे हैं और जिन कागज-दस्तावेज के आसरे वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खठखटा रहे हैं और अब 11 जनवरी को सुनवाई होनी है। वह कागज मीडिया में पहले क्यों नहीं आये।

आखिर ये कैसे संभव है कि नेता ही नेताओं के खिलाफ कागज दिखा रहे हैं लेकिन किसी पत्रकार ने इन दस्तावेजों को पहले अखबार में क्यों नही छापा? किसी न्यूज चैनल के किसी पत्रकार को ये खबर पहले क्यों नहीं पता लगी? और अब जब राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाते हुए भूकंप लाने वाले हालात का जिक्र कर हवा में आरोपों को उछाल रहे हैं तो क्या वाकई किसी पत्रकार को भूकंप लाने वाली खबर की कोई जानकारी नहीं है या फिर मौजूदा दौर में जानकारी होते हुए भी पत्रकार कमजोर पड़ चुके हैं। मीडिया संस्थान किसी तरह की कोई ऐसी खबर ब्रेक करना नहीं चाहते, जहां सत्ता ही कटघरे में खड़ी हो जाए। तो क्या मौजूदा दौर में मीडिया की साख खत्म हो चली है या फिर सत्ता ने खुद पुरानी हर सत्ता से इतर कुछ इस तरह परिभाषित कर लिया है कि सत्ता की साख पर बट्टा लगाना लोकतंत्र के किसी भी खम्भे के बूते से बाहर हो चला है। या फिर लोकतंत्र के नाम पर लोकतंत्र को ही हड़प कर देशभक्ति का राग जिस तरह देश में गाया जा रहा है, उसमें मीडिया को भी पंचतंत्र के उस बच्चे का इंतजार का है जो भोलेपन से ही बोले लेकिन बोले और राजा को नंगा कह दे।

ये सवाल इसलिये बड़ा है क्योंकि जैन हवाला में तो सिर्फ निजी डायरी के पन्ने थे। लेकिन सहारा और बिरला के दस्तावेजों में बाकायदा खुले तौर पर या तो पूरे नाम हैं या फिर पद हैं। यानी किसी कंपनी की फाइल से निकाले गये कागज भर ही नहीं हैं बल्कि जिस अधिकारी ने छापा मार कागजों को जब्त किया उसके दस्तख्वत भी हैं। और चश्मदीद के तौर पर सहारा की तरफ से अधिकारी के भी हस्ताक्षर हैं। लेकिन मसला कागजों या दस्तावेजों से ज्यादा अपनी अपनी सुविधा से नेताओं का कागज का कुछ हिस्सा दिखाते हुये अपने अपने राजनीतिक लाभ के लिये कागजों की परिभाषा गढते हुये खुद को पाक साफ बताने या कहें सत्ता को कटघरे में खड़ाकर अपनी राजनीतिक जमीन बनाने की मशक्कत भी है।

मीडिया को लेकर असल सवाल यहीं से शुरू होता है कि जो भी देश का नामी अखबार या मीडिया हाउस आज की तारीख में राहुल गांधी के प्रधानमंत्री मोदी पर लगाये आरोपों को छापने-दिखाने की हिम्मत दिखा रहे हैं। क्या वाकई उन्हें पता ही नहीं था कि इस तरह के दस्तावेज भी हैं? या फिर ये कहें कि मौजूदाहालात ने हर किसी को इतना कमजोर बना दिया है कि वह सत्ता को लेकर कोई सवाल करना ही नहीं चाहता क्योंकि न्यायपालिका को लेकर भी उसके जहन में कई सवाल हैं। यानी ये भी सवाल है कि क्या न्याय का रास्ता भी सत्ता ने हड़प लिया है? क्योंकि प्रशांत भूषण भी जब सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस खेहर जो 3 जनवरी को चीफ जस्टिस बन जायेंगे। उन पर सुप्रीम कोर्ट में 14 दिसंबर को ये सवाल उठाने से नहीं चूकते कि, ‘ जब मामला पीएम को लेकर है और चीफ जस्टिस होने की फाइल पीएम के ही पास है तो उन्हें खुद को इस मामले से अलग कर लेना चाहिये।' तो क्या वाकई देश में ऐसा माहौल बन चुका है कि लोकतंत्र का हर पिलर पंगु हो चला है।

लेकिन यहां तो मामला लोकतंत्र के चौथे खम्भे यानी मीडिया का है। और चूंकि पहली बार केजरीवाल ने सहारा-बिरला के दस्तावेजों को नवंबर में विधानसभा में उठाया। नवंबर के शुरू में ही प्रशांत भूषण ने भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। और राहुल गांधी ने दस्तावेजों को दिसंबर में मुद्दा बनाकर प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधना शुरू किया। लेकिन मीडिया का सच तो यही है कि सारे दस्तावेज जून में ही मीडिया के सामने आ गये थे। और ऐसा भी नहीं है मीडिया अपने तौर पर दस्तावेजों को परख नहीं रहा था। और ऐसा भी नहीं है कि देश के जो राष्ट्रीय मीडिया इमरजेन्सी से लेकर जैन हवाला तक के दौर में कभी भी खबरों को लेकर सहमे नहीं।

सत्ता से लड़ते भिड़ते ही हमेशा नजर आये। और तो और मनमोहन सिंह के दौर के घपले घोटालों को भी जिस मीडिया हाउस ने खुलकर उभारा। वह सभी जून से नवंबर तक इन सहारा-बिरला के कागजों को दिखाने की हिम्मत दिखा क्यों नहीं पाये। जबकि सच यही है कि कागजों का पुलिंदा एक मीडिया हाउस के नकारने के बाद दूसरे मीडिया हाउस के दरवाजे पर दस्तक देता रहा। ऐसा भी नहीं है कि जून से नवंबर तक किसी मीडिया हाउस ने दस्तावेजों को परखा नहीं। हर मीडिया हाउस ने अपने खास रिपोर्टरों को दस्तावेजों के सच को जानने समझने के लिये लगाया।

बोफोर्स घोटालों को उजागर करने वाले मीडिया संस्धान ने सहारा के कागजों की जांच कर रहे अधिकारी को जयपुर में पकड़ा। जानकारी हासिल की, लेकिन फिर लंबी खामोशी। तो इमरजेन्सी के दौर मे इंदिरा की सत्ता से दो दो हाथ करने वाले मीडिया संस्थान ने तो कागजों को देख कर ही मान लिया कि देश के पहले तीन को छोड़कर कुछ भी छापा जा सकता है। लेकिन उन्हें छुआ नहीं जा सकता। जैन हवाला की डायरी के पन्नों को छापकर रातों रात देश में पत्रकारिता की साथ ऊंचा करने वाले मीडिया संस्थान ने तो कागज पर दस्तख्त करने वाले इनकम टैक्स अधिकारी से भी बात की और कांग्रेस के एक नेता के प्राइवेट सेकेट्री से भी बात कर कागजों की सच्चाई को परखा। लेकिन उसके बाद खामोशी ही बरती गई। एक रिपोर्टर ने तो वित्त मंत्रालय के भीतर सहारा के दस्तावेजों को लेकर चल क्या रहा है, उसे भी परखा। लेकिन अखबार के पन्नों पर कुछ भी नहीं आया। और तो और दस्तावेजों में जिन नेताओं को सहारा के जिन कारिंदो ने पैसा पहुंचाया, जब उनका नाम तक दर्ज है तो उन नामों तक भी कई मीडिया हाऊस पहुंचे।

यानी सहारा के कागजों में सहारा के ही जिन नामों का उल्लेख है....जो अलग अलग नेताओं को ब्रीफकेस पहुंचा रहे थे। वह नाम भी असली है और कोई दिल्ली में तो कोई लखनऊ में तो कोई मुंबई में सहारा दफ्तर का कर्मचारी है ये भी सामने आया लेकिन जून से नवंबर तक किसी मीडिया हाउस ने खबर को छुआ तक नहीं। मसलन जो ब्रीफकेस पहुंचा रहे थे या जिनके निर्देश पर ब्रीफकेस देने का जिक्र सहारा के कागजो में है, उसमें उदय , दारा , सचिन , जैसवाल , डोगरा का ही जिक्र सबसे ज्यादा है। और ये सारे नाम लखनऊ में सहारा सेक्रटियट से लेकर दिल्ली दफ्तर और सहारा के मुंबई गिरगांव दफ्तर में काम करने वाले लोगों के नाम हैं।

ये भी सच निकल कर आया। लेकिन फिर भी खबर मीडिया में क्यों नहीं आई। इतना ही नहीं मुंबई के एक मीडिया संस्थान ने भी दस्तावेजों को खंगाल कर मुंबई के जिस पते से करोड़ों रुपये खाते में आ रहे थे, उसे भी खंगाला। यानी कोई खास इन्वेस्टिगेटिव पत्रकारिता करने भी जरुरत नहीं रही। सिर्फ कागज में दर्ज उस पते पर रिपोर्टर पहुंचा। जानकारी हासिल की। लेकिन खबर कहीं नहीं आई। तो क्या मीडिया की लंबी खामोशी सिर्फ मौजूदा वक्त की नब्ज बताने वाली है या फिर पहली बार देश के सिस्टम को ही कागजों में दर्ज राजनीतिक हमाम में बदल दिया गया है। क्योंकि कागजों में तो राजनीतिक दलों को रुपया बांटने में समाजवाद बरता गया। यानी सहारा दफ्तर से कुछ हाथों से लिखे पन्ने। कुछ कंप्यूटर से निकाले गये पन्ने तो कुछ नेताओं के नाम वाले पन्नो के पुलिन्दे बताते हैं कि कैसे चिटफंड के जरिये अरबों का टर्नओवर जब कोई कंपनी पार कर मजे में है तो सिर्फ गरीबों के पैसो से सपने बेचने भर का खेल नहीं होता बल्कि राजनीतिक व्यवस्था ही उसके दरवाजे पर कतार लगाये कैसे खड़ी रहती है।

ये दस्तावेज उसी का नजारा भर है। और यहीं से भारतीय मीडिया का वह सच उभरता है कि अगर जून से नवंबर तक तमाम मीडिया को अगर ये कागज फर्जी लग रहे थे तो नवंबर के बाद से राजनीतिक गलियारे में ही जब ये कागज हवा में लहराये जा रहे है तो कोई मीडिया ये कहने की हिम्मत क्यों नहीं दिखा पा रहा है कि उसकी जांच में तो सारे कागजात फर्जी थे। और चूंकि ऐसा हो नहीं रहा। होगा भी नहीं। तो क्या करप्शन या क्रोनी कैपटिलिज्म के कटघरे को ही देश का सिस्टम बना दिया गया है। और पहली बार मीडिया का मतलब सिर्फ मीडिया घराने नहीं बल्कि पत्रकारिता करते संपादक समूह भी अपाहिज सा हो चला है। या फिर देश में वातावरण ही 2014 के सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक शून्यता का कुछ ऐसा बना है कि जो सत्ता में है वह खुद को पूर्व तमाम सत्ता से अलग पेश कर राष्ट्रीय हित में सत्ता चलाने का दावा कर रहा है। सत्ता पार्टी या संवैधानिक संस्थाओं तक को खारिज कर मॉस कम्युनिकेशन/सोशल मीडिया के जरिये जनता से सीधे संवाद कर इस एहसास को जनता के बीच जगा रही है जहां संस्थानों की जरुरत ही ना पड़े। और जनता की आवाज ही कानूनी जामा पहने हुये दिखायी दे। और मीडिया या उसमें काम कर रहे पत्रकारों को अगर ये लग भी रहा है कि सत्ता राष्ट्रीयता के नाम को ही भुना रही हैं तो भी उसकी आवाज नहीं निकल पा रही है क्योंकि या तो देश में कोई राजनीतिक विकल्प कुछ है ही नहीं। या फिर नैतिकता की जिस पीठ पर सवार हो कर सत्ता देश को हांक रही है उसमें बाजार व्यवस्था में लोकतंत्र के हर पाये ने बीते दौर में नैतिकता ही गंवा दी है तो वह कुछ बोले कैसे। ऐसे में लोकतंत्र मतलब ही यही है कि करप्शन देश का मुद्दा हो सकता है। करप्शन के नाम पर सत्ता पलट सकती है। जनता की भावनाओं को राजनीतिक दल अपने पक्ष में कर सकते है लेकिन जो भ्रष्ट हैं, वह सभी मिले हुये है। यानी एक सरीखे हैं। और लोकतंत्र का हर पाया भी दूसरे पाये की कमजोरियों को ढंकने के ही काम आता है। और लोकतंत्र की निगरानी रखने वाला मीडिया भी उसी कतार में जा खड़ा हुआ है। तो क्या 1996 के जैन हवाला के डायरी के पन्नों से निकली सियासत और मीडिया की बुलंद आवाज बीस बरस बाद 2016 में सहारा-बिरला के दस्तावेजों तले दफन हो चली है। यहां से आगे का रास्ता अब सिर्फ लोकतंत्र के राग को गाते हुये जयहिन्द बोलने भर का बचा है। ये सवाल है। मनाइये कि यह सवाल जवाब ना बन जाये। और इसके लिये 11 जनवरी 2017 का इंतजार करना होगा। क्योंकि इसी दिन सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि सहारा-बिरला वाले कागजात फर्जी है या जांच होनी चाहिये। लेकिन चाहे अनचाहे ये तो तय हो गया कि 2016 मीडिया के रेंगने के लिये याद किया जायेगा।

(साभार: फेसबुक वॉल से)

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एसपी किसी नंदन, जितेंद्र या आलोक श्रीवास्तव के सर्टिफिकेट के मोहताज नहीं...

जयशंकर गुप्ता एग्जिक्यूटिव एडिटर, देशबन्धु ।। 

Last Modified:
Friday, 01 July, 2016
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जयशंकर गुप्ता

एग्जिक्यूटिव एडिटर, देशबन्धु ।। 

jaishankar-guptaराजेश बादल जी, एसपी यानी सुरेंद्र प्रताप सिंह पर सामग्री और संसाधनों के अभाव के बावजूद बेहतरीन बायोपिक फिल्म तैयार करने और उनकी पुण्य तिथि पर इसके प्रसारण के लिए आपको और राज्यसभा टीवी को कोटिशः धन्यवाद। इस फिल्म को लेकर आपकी पोस्ट पर आई कुछ टिप्पणियों-कटूक्तियों को देखकर कम से कम मुझे तो कोई आश्चर्य नहीं हुआ। धर्मयुग, रविवार, नवभारत टाइम्स, देव फीचर्स, दि टेलिग्राफ के जरिए प्रिंट माध्यम तथा ‘आजतक’ के जरिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र में एसपी सिंह के योगदान को लेकर इस देश की राजनीति, पत्रकारिता और आम लोगों के बीच उनके समर्थकों और प्रशंसकों का एक बहुत बड़ा संसार है तो उनके आलोचक भी अपने-अपने कारणों से बहुतेरे मिल जाएंगे।

अगर आज भी और खासतौर से नब्बे के दशक में खबरिया चैनलों पर कहा जाने वाला अगर सबसे लोकप्रिय और आम लोगों की जुबान पर छा जाने वाला एक ही वाक्य था, ‘ये थीं खबरें आज तक इंतजार कीजिए कल तक’ या फिर ‘ये थीं खबरें आजतक, इंतजार कीजिए सोमवार तक।’ और लोग, जिनमें एसपी के प्रशंसकों से लेकर कटु आलोचक भी होते थे, वाकई सरकारी दूरदर्शन पर बीस मिनट के आजतक के प्रसारण का इंतजार करते थे। हम रामहित नंदन जी जैसे विद्वान और पारखी लोगों की बात नहीं कर सकते लेकिन एसपी से असहमत रहने वाले लोग भी उनकी तथ्य और कथ्य की समझदारी और शैली के कायल थे।

हमें भी एसपी सिंह के साथ रविवार और नवभारत टाइम्स में काम करने का अनुभव है। कहने की जरूरत नहीं कि उनके रहते रविवार और नवभारत टाइम्स की लोकप्रियता चरम पर थी। रविवार में रहते हिंदी की बात तो छोड़ ही दें अंग्रेजी और बांग्लाभाषी बड़े-बड़े पत्रकार राजनीति से लेकर खेल तक के विषयों में तथ्य चेक करने अथवा परामर्श करने एसपी के पास ही आते थे।

एक वृतांत बताता हूं। 1984 के लोकसभा चुनाव हो रहे थे। हम सारे लोग रिपोर्टर्स, रिटेनर्स और डेस्क के कई साथी भी फील्ड में जाकर रिपोर्ट कर रहे थे। हम सबने प्रायः अपने अपने हिसाब से  स्थानीय मुद्दों और सामाजिक समीकरण को सामने रखकर रिपोर्टिंग की। हमने इलाहाबाद में हेमवतीनंदन बहुगुणा और अमिताभ बच्चन के बीच के चुनावी महाभारत पर बड़ी रिपोर्ट लिखी थी जिसे एमजे अकबर ने टेलिग्राफ में भी पूरे एक पन्ने पर ‘बैटिल ऑफ इलाहाबाद, बहुगुणा वर्सेज बच्चन' के नाम से प्रकाशित की थी। एसपी सिंह भी केंद्रीय उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में घूम कर लौटे थे। आपस की बैठक में उन्होंने कहा कि उन्होंने सबकी रिपोर्ट देख ली है लेकिन उनका अपना मानना है कि इस चुनाव में कांग्रेस को 400 से अधिक सीटें मिलने वाली हैं और इलाहाबाद में बच्चन की जीत पक्की है। हम सब सकते में थे। हमने कुछ ज्यादा ही तैश में आकर कह दिया कि लगता है कि डीपीटी ने आपको पट्टी पढ़ा दी है और आपका कांग्रेसीकरण हो गया है। एक पल के लिए झेंपने के बाद उन्होंने कहा कि हो सकता है कि गलत हो लेकिन यह मेरा आंकलन है और जयशंकर तुमसे तो मैं एक बोतल रम की बाजी लगा सकता हूं। जब चुनावी नतीजे आए तो हम सारे नतमस्तक थे। संभवतः यह केवल एसपी सिंह और समाजवादी नेता मधुलिमए ही थे जिन्होंने 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 400 से अधिक सीटें मिलने का पूर्वानुमान लगाया और उसे सार्वजनिक भी किया था।

इस तरह के तमाम तथ्य हैं जो तथ्य और कथ्य की एसपी सिंह की समझदारी को लेकर उन पर कटुक्तियां करने वालों को बहुत बौना साबित करती हैं। उनके आलोचकों में कई तरह के लोग हैं। एक तो वे लोग हैं जिन्हें वह किन्हीं कारणों से अपने साथ काम करने का मौका नहीं दे सके, दूसरे वे लोग हैं जिन्हें उनकी कार्यशैली में एसपी के करीबी कहे जानेवाले लोगों की अपेक्षा कम महत्व मिला और तीसरी श्रेणी के लोग वे हैं जिनकी विचारधारा एसपी की पत्रकारिता को कभी पसंद कर ही नहीं सकती। संघ की विचारधारा में दीक्षित लोगों के पास स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर राजनीति और पत्राकारिता के क्षेत्र में भी महानायकों की बात तो छोड़ ही दें नायक भी दूरबीन लगाकर खोजने से भी नहीं मिलते।

ऐसे संघनिष्ठ लोग अंग्रेजों से माफी मांगने वाले सावरकर में अपना नायक तलाशते हैं, हालांकि जीवित रहते सावरकर और संघ के लोगों में कभी नहीं बनी। इसी तरह उनके नायकों में बालासाहेब देवरस हैं जिन्होंने आपातकाल में इंदिरा गांधी के पास माफीनामा भेजकर उनके बीस सूत्री कार्यक्रमों का समर्थन करने की ख्वाहिश जाहिर की थी। रामहित नंदन जी ने शायद एसपी सिंह के साथ काम नहीं किया लेकिन उनके सहयोगियों के साथ काम करने के उनके अनुभव शायद बहुत अच्छे नहीं रहे। हालांकि बाद के दिनों में वह जहां जिस चैनल में भी गए कोई ऐसा कीर्तिमान नहीं खड़ा कर सके जिसके लिए उनकी अपनी कोई पहचान बन सकी हो।

यह मेरी कमी हो सकती है, लेकिन उनकी विद्वता और अनुभव के लाभ से मैं वंचित ही रहा हूं। उन्हें यह कहने का पूरा हक है कि एसपी सिंह पत्रकारिता के नायक-महानायक नहीं बल्कि औसत दर्जे के पत्रकार थे। अब मुश्किल यही है कि उस ‘औसत दर्जे के पत्रकार’ के अधितकतर सहयोगी ही, जिन्हें रामहित चेले कहते हैं, आज हिंदी की प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सिरमौर बने हैं।

राज्यसभा टीवी के द्वारा ‘पत्रकारिता के महानायक एसपी सिंह’ पर बनाने और दिखाई जानेवाली फिल्म को लेकर ही नहीं बल्कि इसकी और भी बहुत सारी बातों को लेकर हमारे संघनिष्ठ भाइयों को तीखी आपत्ति है। उनकी मुश्किल है कि अन्य टीवी चैनलों की तरह राज्यसभा टीवी को भी नियंत्रित कर निक्करधारियों-माफ कीजिएगा अब फुल पैंट धारण करने की छूट मिलने लगी है-द्वारा संचालित करने के मंसूबे पूरे नहीं हो पा रहे।

रही बात हमारे प्रिय मित्र जितेंद्र की तो उन्होंने एसपी सिंह के सामाजिक सरोकारों के बरक्स नौकरी देने के मानदंडों, भाषा-भूषा और शिक्षा को लेकर सवाल उठाए हैं। और यहां तक कह दिया है कि एसपी सिंह नहीं चाहते थे कि पढ़े लिखे और समझदार लोग उनके साथ काम करें। अब इसका फैसला तो एसपी सिंह की रविवार और नवभारत टाइम्स से लेकर टेलिग्राफ और आजतक की टीम के सदस्यों की शिक्षा-दीक्षा, भाषा और पहनावे की पड़ताल करने के बाद ही हो सकेगा। भाई जितेंद्र सामाजिक सरोकारों को लेकर चिंतित और सामाजिक न्याय के पक्षधर, विचारों से अति वाम क्रांतिकारी पत्रकार हैं और अगर शब्दों और भाषणों से ही क्रांति संभव हो तो यह काम वह निमित तौर पर करते रहते हैं। लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में जब कभी और जहां जहां उन्हें अपनी प्रतिभा और प्रतिबद्धता साबित करने के अवसर मिले, वह कुछ ज्यादा नहीं कर सके। वह कह सकते हैं कि मौजूदा व्यवस्था में उनके जैसों के लिए खस कुछ कर पाने की स्थितियां हैं ही नहीं।

जितेंद्र की मानें तो एसपी सिंह अपने इर्द गिर्द मूर्खों और मूर्खाओं को ही रखते थे जो उनकी हर बात मानें और अंधानुकरण करें। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि उनकी इस जमात में रविवार से लेकर नवभारत टाइम्स तक हम जैसे मूर्ख और अशिक्षित भी शामिल रहे हैं। मुझे नहीं मालूम कि जब इस देश में मंडल कमंडल को लेकर विवाद चरम पर था, पूरी हिंदी पत्रकारिता ‘सवर्ण हिंदू पत्रकारिता के रूप में बदल गई थी, उस समय जितेंद्र कहां थे? तब अकेले राजेंद्र माथुर और एसपी सिंह के नेतृत्व में नवभारत टाइम्स ही अकेला ऐसा अखबार था जो सवर्ण मनुवादियों और सांप्रदायिक ताकतों के निशाने पर था। एसपी सिंह को कुर्मी, नभाटा के मुख्य संवाददाता शैलेश को दलित और मुझे तेली कहा जाता था, जबकि हममें से तीनों ही सवर्ण थे।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की अपनी आवश्यकताएं और विडंबनाएं भी हैं। एसपी सिंह जब आजतक के साथ जुड़े थे तब वह देश में और खासतौर से हिंदी में इलेकट्रानिक मीडिया का शुरुआती दौर था। बहुत कुछ बाजार और मालिकान भी तय करते थे। एसपी सिंह बाजार की दशा-दिशा को बहुत पहले ही भांप चुके थे और यह मानने लगे थे कि इस विधा में उनके जैसे लोगों के टिके रहना मुश्किल होते जाएगा। एक तरह क विरक्ति का भाव सा जग रहा था उनमें। और उनकी प्रस्तुति पर सवाल करनेवाले मित्र शायद भूल जाते हैं कि वह किस हद तक अपने विषय की गहाइयों के साथ जुड़े होते थे। उपहार कांड पर उनकी भावुक प्रस्तुति को कौन भुला सकता है। आप उन्हें नायक महानायक माने अथवा नहीं मानें, आपकी मर्जी, लेकिन उस समय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक ही ब्रैंड था और उसका नाम था सुरेंद्र प्रताप सिंह जिसे देखने और सुनने के लिए लोग ‘आजतक’ का इंतजार करते थे। आप उनसे सहमत हों या असहमत, यह दीगर बात है लेकिन वह किसी नंदन या जितेंद्र अथवा आलोक श्रीवास्तव के सर्टिफिकेट के मोहताज तो कतई नहीं थे।

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'एसपी की एक थपकी ने मुझे कितना कुछ दिया, शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता'

डॉ.वीरेन्द्र आजम ।।

Last Modified:
Wednesday, 29 June, 2016
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डॉ.वीरेन्द्र आजम ।।

Veerendra Azam‘ये थी खबरें आज तक- इंतजार कीजिए कल तक’ यही वो वाक्य है जिसने हिंदी पत्रकारिता में क्रांति का सूत्रपात किया, यही वो वाक्य है जो टीवी समाचार सुनने वालों के दिल में कहीं गहरे तक उतर गया था, यही वो वाक्य है जिसने टीवी समाचारों के प्रति लोगों में आकर्षण पैदा किया, यही वो वाक्य है जिसने इलेक्ट्रिानिक मीडिया को लोकप्रियता दी। इस वाक्य के जन्मदाता थे, हिंदी पत्रकारिता के नायक सुरेंद्र प्रताप सिंह यानी एसपी। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अपनी अमिट छाप छोड़ने और हिंदी पत्रकारिता को नई दिशा देने वाले इस मनीषी ने अपनी सशक्त लेखनी और प्रखर प्रतिभा के बल पर बहुत जल्द पत्रकारिता जगत में अपनी पहचान बना ली थी। व्यवहार से शिष्ट, कार्य से विशिष्ट।

एसपी ने अपनी ढाई दशक की पत्रकारिता में हिंदी पत्रकारिता को नए तेवर, नए आयाम दिए। सच तो यह है कि उन्होंने हिंदी पत्रकारिता की दिशा भी बदली और दशा भी। भला ‘रविवार’ को कोई कैसे भूल सकता है? उनके सम्पादन में ‘रविवार’ ने हिंदी पत्रकारिता का उस समय जो इतिहास लिखा वह आज भी गौरवपूर्ण है। 'स्कूप' और 'रिर्पोटिंग' में उन्होंने अंग्रेजी पत्रकारिता को बार-बार आइना दिखाया। ग्रामीण क्षेत्रों, विशेषकर महिलाओं व दलित अत्याचारों को ‘रविवार’ ने तथ्यों सहित प्रमुखता से प्रकाशित करके न केवल समाज का वास्तविक चेहरा देश के सामने रखा बल्कि लोकतंत्र के इस चतुर्थ स्तम्भ की शक्ति का भी अहसास कराया। बागपत का मायात्यागी काण्ड हो या देहुली हत्याकाण्ड, बीहड़ों की दस्यु सुंदरी फूलनदेवी का प्रथम साक्षात्कार हो या तराई के आदिवासियों का शोषण, सभी में ‘रविवार’ ने अंग्रेजी पत्रकारिता को पटकी देते हुए बाजी मारी।

साम्प्रदायिक दंगों की रिपोर्टिंग में तो ‘रविवार’ ने हिंदी पत्रकारिता का ट्रेंड ही बदल दिया था। उस समय के मेरठ, संभल, मुरादाबाद, अलीगढ़, वाराणसी, रांची और हैदराबाद दंगों की रिपोर्टिंग इसके प्रमाण हैं। दरअसल एसपी अपने देहात और छोटे शहरों के रिपोर्टर पर पूरा भरोसा करते थे। अपने प्रशिक्षण काल में डॉ. धर्मवीर भारती, खुशवंत सिंह और कमलेश्वर जैसे दिग्गजों से जो दिशा, स्नेह, सहयोग और विश्वास उन्हें मिला वह उन्होंने आगे बांटा भी। वह युवाओं को आगे बढ़ाने के लिए न केवल उन्हें प्रोत्साहित करते बल्कि उनके साथ अपने अनुभव भी बांटते थे।

मुझे याद है कि वर्ष 1989 का लोकसभा चुनाव। मैं सहारनपुर जिला मुख्यालय पर 'नवभारत टाइम्स' का संवाददाता था। एक दिन नवभारत टाइम्स के तत्कालीन उत्तर प्रदेश संस्करण प्रभारी अरुण दीक्षित का मुझे टेलिग्राम मिला-‘तुम्हें कुछ दिन उत्तर प्रदेश डेस्क पर कार्य करना है, तुरन्त दिल्ली आओ, एसपी का निर्देश है।’ यह था उनका भरोसा। एक दिन जब मैं डेस्क पर बैठा एक खबर को ‘सब’ कर रहा था तो न जाने कब मेरे पीछे आकर खड़े हो गए और मुझे कार्य करते देखते रहे, बाद में मेरी पीठ थपथपाई और आगे बढ़ गए। यह था उनका प्रोत्साहन। तब की एक थपकी ने मुझे कितना कुछ दिया, मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता।

3 दिसम्बर 1948 को गाजीपुर जिले के पातेपुर गांव में जन्मे एसपी सिंह को गांव के एक स्कूल में चौथी कक्षा तक पढ़ाई करने के बाद आठ वर्ष की उम्र में कोलकता भेज दिया गया। वहीं उन्होंने बी.ए.किया और फिर वहीं से हिंदी में एम.ए. किया। एसपी सुरेंद्रनाथ कॉलेज में वामपंथी राजनीति में सक्रिय हो भाकपा के संगठन ए.आई.एस.एस से जुड़े और यूनियन की पत्रिका के संपादक बन गए। एम.ए.के बाद फैलोशिप मिला, पी.एच.डी. की और सुरेंद्रनाथ कॉलेज में ही लेक्चरर हो गए। एस.पी.का 1972 में पत्रकारिता में प्रवेश तब हुआ, जब उन्हें मुम्बई के नवभारत टाइम्स में प्रशिक्षु पत्रकार चुना गया।

‘माधुरी’ में कुछ समय के प्रशिक्षण के बाद उन्हें ‘धर्मयुग ’ का सम्पादक बनाया गया। अपने लेखन, लगन व पत्रकारिता में प्रतिबद्धता के कारण शीघ्र ही उन्होंने अपनी पहचान कायम कर ली और जब मार्च 1977 में ‘रविवार’ का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ तो उन्हें उसके सम्पादन का दायित्व सौंपा गया। फरवरी 1985 में नवभारत टाइम्स के बम्बई संस्करण के स्थानीय सम्पादक बनाए गए। लेकिन एक वर्ष बाद ही 1986 में नवभारत टाइम्स का कार्यकारी सम्पादक बनाकर दिल्ली बुला लिया गया। दिसम्बर 1991 में नवभारत टाइम्स छोड़कर 1994 तक उन्होंने स्वतंत्र पत्रकारिता की।

अक्टूबर 1994 में वे अंग्रेजी दैनिक ‘द टेलिग्राफ’ के राजनीतिक सम्पादक बने। जुलाई 1995 में वे ‘इंडिया टुडे’ से जुड़े। पहले वह पत्रकारिता के भाषाई संस्करणों के कार्यकारी सम्पादक और फिर ‘आजतक ’ के प्रारम्भ होने पर उन्हें उसका अस्थाई प्रभार दिया गया। एक वर्ष बाद ही ‘टीवी टुडे’ के कार्यकारी निर्माता बने और ‘आजतक’ का काम स्थाई रूप से देखने लगे।

सामाजिक पहलुओं पर एसपी की गहरी पकड़ थी। वह समाज के प्रत्येक व्यक्ति को सम दृष्टि से देखते और सम्मान देते थे। उनकी सहजता, सरलता, मृदु व्यवहार और आम आदमी के प्रति उनकी सोच को समझने के लिए एक उदाहरण पर्याप्त होगा। नवभारत टाइम्स में देहात के एक संवाददाता की खबर पर एक ग्रामीण ने मुकदमा दर्ज कर दिया। कार्यकारी सम्पादक होने के नाते उन्हें भी सहारनपुर न्यायालय में तारीख पर आना पड़ा। न्यायालय में उपस्थिति के बाद उन्होंने मुझसे उक्त मुकदमे की पूरी जानकारी ली और बोले- ‘मुझे उससे मिलवाओ जिसने मुकदमा किया है।’ नवभारत टाइम्स के वकील ने कहा- ‘अरे सर! वह तो गांव का साधारण सा ग्रामीण है।’ एसपी बात काट कर बीच में ही बोल पड़े, ‘आदमी साधारण हो या असाधारण, ग्रामीण हो या शहरी, सब की इज्जत और सम्मान होता है, यदि मेरे संवाददाता ने गलती की है तो हमें खेद छापना चाहिए था।’ बाद में जब वह उस ग्रामीण से मिले तो उन्होंने कहा- ‘भाई मुझे खेद है कि मेरे रिपोर्टर ने तुम्हें कष्ट पहुंचाया।’ यह सुनकर वह ग्रामीण हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और बाद में उसने अपना मुकदमा वापस ले लिया। यह थी एसपी के व्यक्तित्व की विशालता।

एसपी ने सिद्धांतों से भी समझौता नहीं किया और अपने पेशे के प्रति सदैव प्रतिबद्ध रहे। उन्होंने एक साक्षात्कार में एक अखबार से कहा भी था- ‘मैंने कभी किसी मिशन के तहत पत्रकारिता नहीं की, मेरी प्रतिबद्धता पत्रकारिता के प्रति है।’ लेकिन साथ ही बाजार की सच्चाई को भी समझा और उस पर कभी मुंह नहीं बिचकाया। हिंदी पत्रकारिता का अवसान मान उस पर रुदन करने वालों के तर्क से वह कभी सहमत नहीं हुए। वह यह मानने को तैयार नहीं थे कि हिंदी अखबार संकट के दौर से गुजर रहे हैं।

‘जनसत्ता’ को दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा भी था- ‘ऐसा मानना घोर अज्ञान की अभिव्यक्ति है, यह तो हिंदी पत्रकारिता का स्वर्ण युग है। हिंदी और भाषाई अखबारों की पाठक संख्या पूंजी विज्ञापन और मुनाफा लगातार बढ़ रहा है।’ शायद काल के कपाल पर लिखा हिंदी पत्रकारिता का भविष्य उन्होंने पढ़ लिया था और सचमुच आज हिंदी पत्रकारिता का विस्तार बहुत तीव्रता से हो रहा है। निरंतर नए भाषाई अखबारों का प्रकाशन हो रहा है और जो पहले से स्थापित हैं उनके नये संस्करण भी निकल रहे हैं।

‘आजतक’ की शुरुआत हुई तो वह हिंदी पत्रकारिता के एक नए नायक के रूप में उभरे। एसपी ने उस समय ‘आजतक’ में भाषा के स्तर पर सहज, सरल और मुहावरेदार हिंदी का प्रयोग किया, जिसे हर किसी ने न केवल स्वीकार किया बल्कि सराहा भी। यहीं वह भाषा थी जिससे लोगों का टीवी की खबरों के प्रति रुझान बढ़ा। समाचारों के चयन में भी उन्होंने एहतियात बरती और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी खबरों को प्राथमिकता दी। ‘आजतक’ के उस समय के समाचारों को सुनना सुखद होता था। एसपी का समाचार वाचन और प्रस्तुतिकरण टीवी समाचारों के इतिहास में आज भी मील का पत्थर है।

16 जून 1997 को एसपी ब्रेन हेमरेज के कारण अस्पताल में भर्ती हुए और 27 जून 1997 की सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से हिंदी पत्रकारिता में जो स्थान रिक्त हुआ उसकी भरपाई आज भी नहीं हुई है। एसपी एक सशक्त लेखक, एक प्रखर पत्रकार, एक दमदार वाचक, एक मंजे हुए संचालक और एक कुशल सम्पादक के अतिरिक्त एक श्रेष्ठ इंसान थे।

(लेखक सहारनपुर से प्रकाशित होने वाली हिन्दी त्रैमासिक पत्रिका 'शीतलवाणी' के संपादक हैं )   समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।
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आपमें खबर को समझने-समझाने की गजब शक्ति थी, पर इंसान नहीं पहचान पाए: चंदन प्रताप

कई दिनों से आपसे बात करने को जी चाह रहा था। सोचा कि आज कर लूं। क्योंकि आज आपकी बरसी पर बहुतों को मर्सिया पढ़ते देख रहा हूं...

Last Modified:
Tuesday, 27 June, 2017
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चंदन प्रताप सिंह

न्यू मीडिया जर्नलिस्ट ।।

कई दिनों से आपसे बात करने को जी चाह रहा था। सोचा कि आज कर लूं, क्योंकि आज आपकी बरसी पर बहुतों को मर्सिया पढ़ते देख रहा हूं। खैर, हम अपनी बातें करते हैं। मुझे अब आपकी वो नसीहत बहुत याद आती है, जब आप बार-बार मुझे पत्रकार बनने से रोकते थे। निर्मल दा के जरिए बहुत सारी बातें समझाई थीं। तब मुझे आपकी नसीहतें और बहुत सारी बातें समझ में नहीं आई। लेकिन आज समझ में आ रही है, जब आप नहीं हैं।

मुझे उस समय आपकी बहुत याद आई, जब मैं बहुत बीमार था। अस्पताल में बार-बार आपका चेहरा घूमता था। आप हमेशा कहते थे ना कि दुनिया में खून से भी बड़े तीन तरह के रिश्ते होते हैं। एक पैसे का, दूसरा मतलब का और तीसरा दिल का। सच कहता हूं आपसे अब मुझे तीनों रिश्तों की पहचान हो गई है।

उस समय आपसे कह नहीं पाता। लेकिन आज मैं कह सकता हूं। आपमें खबर को समझने और समझाने की गजब की शक्ति थी, लेकिन आप इंसान नहीं पहचान पाए। जिन लोगों को आपने गढ़ा। जो लोग आपके सामने धर्म, जाति और लालच से ऊपर उठकर होने का दावा किया करते थे, आज उन्हीं लोगों को उन्हीं कीचड़ों में लथपथ देखता हूं। तब पता नहीं क्यों लगता है कि आप शायद ऐसे लोगों को पहचान नहीं पाए या पहचान कर भी अनजान बने रहे।

आपका मैं कभी एकलव्य तो नहीं बन पाया। लेकिन यकीन मानिए कि एकलव्य से कम भी नहीं हूं। पच्चीस बरस की पत्रकारिता में मैंने भी बहुत पापड़ बेल लिए। आज मुझे कहने में कोई संकोच नहीं और ना ही किसी का खौफ कि आपके दौर की पत्रकारिता स्वर्णिम दौर की थी। तब पत्रकार पार्टी के अध्यक्ष तो क्या प्रधानमंत्री से भी तीखे सवाल पूछने में रत्ती भर नहीं डरते थे। आज के पत्रकारों की प्रवक्ताओं और धनबल-बाहुबल में चूर नेताओं से सवाल पूछने में सांसें फूल जाती हैं। स्टूडियो में बिठाकर मंत्रियों से ऐसे सवाल करते हैं मानों या तो ककहरा सीख रहे हों या फिर कटोरा भर तेल और मक्खन लेकर मालिकों ने उन्हें इसी काम के लिए एयर किया हो।

आज तो मुझे कुकुरमुत्ते की तरह उग आए चैनलों में ऐसे कई प्रधान संपादक और सीईओ भी टकराए लेकिन जो हिंदी वर्तनी में अपना नाम भी शुद्ध नहीं लिख सकते। फिर आपकी याद आती है। आप बचपन  में एक किस्सा सुनाया करते थे कि कैसे जैन घरानें में बाटा कंपनी से एक जीएम आया था। वो उस घराने के बड़े संपादकों पर छड़ी फिराने का शौक रखता था और बड़े शान से कहता था कि आई डोंट नो इवन दा का, खा, गा ऑफ हिंदी। बट आई हेडिंग हिंदी मैगजीन्स। फिर आप लोगों ने कैसे उसे चलता किया। सोचता हूं कि एक दिन ये लोग भी चलते होंगे।

आपने कई बार सार्वजनिक मंचों से कहा कि अब कई पत्रकारों ने इस पेशे को बदनाम कर दिया है। वसूली और रिश्वतखोरी की वजह से लोग पत्रकारों से भी उसी तरह डरने लगे हैं, जैसे कि वो पुलिसवालों से डरते हैं। आपकी बात सोलहों आने सच साबित हो रही है। पहाड़ पर वसूली का धंधा चलाते हैं। फिर कानून के डर से भागकर मैदान में आ जाते हैं और ये सब हो रहा है पत्रकारिता के नाम पर।

आपसे बहुत सारी बातें करनी हैं। कुछ घर की, कुछ परिवार की, कुछ नाते-रिश्तदारों की और कुछ पत्रकारिता की भी। वो तमाम बातें आपसे खुलकर और बिना डरे हुए करना चाहता हूं, जो इस जन्म में नहीं कर पाया। बहुत जल्द मिलूंगा आपसे। आपके पास आकर। फिर करुंगा अपनी मन की बात। इस बार आप सिर्फ सुनेंगे। और हां, इस बार आप जो कहेंगे, मैं उस पर अमल करुंगा।


 

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एसपी में भगवान शंकर के सारे गुण थे: संतोष भारतीय, प्रधान संपादक, चौथी दुनिया

कुछ व्यक्तित्व इस तरह की दुनिया में आते हैं जिनकी तरह का फिर कभी कोई हमें नहीं दिखाई देता है...

Last Modified:
Wednesday, 27 June, 2018
Samachar4media

संतोष भारतीय,

प्रधान संपादक, चौथी दुनिया ।।

कुछ व्यक्तित्व इस तरह की दुनिया में आते हैं जिनकी तरह का फिर कभी कोई हमें नहीं दिखाई देता है। सुरेन्द्र प्रताप सिंह दुनिया में आए और पैतालिस साल पूरे किए बिना यहां से चले गए। इस पैतालिस साल की जिंदगी में उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को वो दिया जिसने हिंदी पत्रकारिता की दिशा और दशा बदल दी।

सुरेन्द्र प्रताप यदि नहीं होते तो पत्रकारिता में नौजवानों को वो स्थान नहीं मिलता जिसकी वजह से आज की पत्रकारिता नौजवानों के नाम दिखाई देती है। अगर सुरेन्द्र प्रताप नहीं होते तो हिंदी पत्रकारिता को ग्लैमर नहीं मिलता, वो शक्ति नहीं मिलती जो आज दिखाई देती है। सुरेन्द्र प्रताप नहीं होते तो हम हिंदी पत्रकारिता में खोजी पत्रकारिता के नाम से शायद अपरिचित ही रह जाते। ये सब होता जरूर पर उस तरह से नहीं होता जैसा हुआ। एसपी ने सिद्धान्त दिए, पत्रकारिता की ऐसा बीज गणित और रेखा गणित बनाया, जोकि हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा है और बीतते समय के साथ उसकी आभा और बिखरेगी।


एसपी ने प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों विधाओं में ऐसे व्यक्तित्व पैदा किए जो आज के हिंदी पत्रकारिता जगत के सिरमौर बनें हैं। ये अलग बात है कि इनमें से कई एसपी द्वारा नियमों, सिद्धान्तों के विपरीत चलते हैं शायद बाजार के प्रभाव के कारण। लेकिन उन्हें एसपी का आजीवन ऋणि होना पड़ेगा। उन्होंने ये स्थान एसपी की वजह से ही पाया है।

मैं जब एसपी को याद करता हूं तो मुझे एसपी में भगवान शंकर के सारे गुण दिखाई देते हैं। एसपी ऑन्गड़ थे, एसपी बिंदास, एसपी बेबाक थे, एसपी के साहस के पुतले थे और एसपी हिंदी पत्रकारिता की शान थे। एसपी के बाद किसी एक व्यक्ति में इतने सारे गुण अब तक तो नहीं दिखाई दिए।

एसपी बड़ी बेतकलुफी से अपने आस-पास ऐसे लोगों को जगह दे देते थे जो बाद में उन्हें ही डंक मारते थे। दरअसल एसपी उस साधू कर तरह ही थे, जिसकी कहानी हमनें पढ़ी है कि साधू नदी में नहा रहा था और उसे वहां एक बिच्छू डूबता हुआ दिखा उसने उस बिच्छू को बचाया और उसने उसे ही डंक मार दिया।

एसपी जीवन में ऐसे कई लोगों को अवसर देते रहे हैं जिन्होंने उन्हें ही बाद में डंक मारा। ऐसा बड़प्पन सिर्फ मुझे एसपी में ही दिखाई देता है।

एसपी सूत्र बनाने में माहिर थे। एक पत्रकार के जीवन की सबसे बड़ी ताकत उसके सूत्र होते हैं। एसपी इस कला में निपुण थे। खबरें उनके पास तैर कर आती थीं उन खबरों की सच्चाई परखने का एसपी का तरीका आज तक किसी संपादक में नहीं दिखा।

एसपी अपने पत्रकार साथियों के साथ जीने मरने की हद तक खड़े रहते थे। इसलिए जिस संपादक में ये गुण लंच मात्र भी आ जाता है तो वो बड़ा संपादक मान लिया जाता है। पर एसपी बड़प्पन की जीती जागती मिशाल हैं।

आज जब पत्रकारिता की दुनिया को चारों तरफ देखता हूं तो वह शून्य कपकपी पैदा कर देता है। आज के संपादकों और पत्रकारों को एसपी की पत्रकारिता की शैली जिसमें रविवार में उनकी पत्रकारिता और जिसमें आजतकके शुरुआती दिनों की पत्रकारिता शामिल हैं, उन्हें अनिवार्य पाठ्य पुस्तक की पढ़ना, समझना और जानना चाहिए। हम जब एसपी के दिनों को आज तक याद करते हैं और आज की टीवी पत्रकारिता को देखते हैं तो आज की पत्रकारिता में खोखलापन से मौजूद नजर आता है।

एसपी विजुअल्स की कमी को अपने शब्दों की ताकत से भर देते थे। एसपी जब टीवी पर बोलते थे तो दर्शक के सामने एक तरफ आजतक की स्क्रीन दिखाई देती थी और दूसरी तरफ उसके दिमाग में एसपी के शब्द चलते थे। एसपी ने टीवी में जो ताकत पैदा की दुर्भाग्य है कि वह ताकत आज नहीं दिखाई देती। इसीलिए एसपी एसपी थे और बाकी सब उनसे पीछे कतार में बहुत दूर हैं।

एसपी एक चुनौती छोड़ गए हैं कोई तो प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ऐसा आए जो उनके द्वारा खींची गईं सीमा-रेखा को पार कर सके। जिस दिन ऐसा होगा उस दिन एसपी की आत्मा उस सीमा रेखा पार करने वाले को हृदय से आभार कहेंगी, ऐसा मेरा विश्वास है।

 

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एसपी को टेलिविजन के खाके में रखकर आज भी बेचा जा सकता है: पुण्य प्रसून

27 जून को को एसपी सिंह को याद किया गया। एसपी की मृत्यु 21 बरस पहले हुई...

Last Modified:
Wednesday, 27 June, 2018
Samachar4media

'एसपी सिंह ने तो कभी अपने 20 मिनट के बुलेटिन में विज्ञापनों की बाढ़ के बावजूद साढ़े चार मिनट से ज्यादा जगह नहीं दी। दस सेकेंड के विज्ञापन की दर को बढ़ाते बढ़ाते नब्बे हजार तक जरूर कर दिया। लेकिन अब तो उल्टा चलन है। विज्ञापन बटोरने की होड़ में 10 सेकेंड का विज्ञापन घटते घटते 10 हजार या उससे कम तक आ चुका है।' 2012 में ऐसा अपने ब्लॉग (prasunbajpai.itzmyblog.com) के जरिए वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी ने लिखा था। उन्होंने उसी साल एसपी की याद में आयोजित एक कार्यक्रम के बाद जिस तरह महसूस किया, उस पर भी अपनी कलम चलाई। उनका ये पुराना ब्लॉग कई मायनों में आज भी पत्रकारिता की असलियत बयां कर रहा है। आप उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:


एसपी की पत्रकारिता क्यों पीछे छूट गई एसपी को याद करते हुए

27 जून को को एसपी सिंह को याद किया गया। एसपी की मृत्यु 21 बरस पहले हुई। लेकिन एसपी को टेलिविजन के खाके में रखकर आज भी बेचा जा सकता है, यह अहसास पहली बार एसपी सिंह को याद किए गए कार्यक्रम को देखकर लगा। नोएडा के फिल्म सिटी के मारवाह स्टूडियो में हुए इस कार्यक्रम के निमंत्रण कार्ड ने प्रायोजक और पत्रकारो की लकीर को मिटाया। वरिष्ठ पत्रकारों की लाइन में ही बिल्डरों का नाम छपा देखकर लगा हर वह शख्स मुख्य अतिथि बनने की काबिलियत रखता है, जो बाजार के नाम पर कुछ आयोजकों को दे सकता है। एक जाने माने पत्रकार की याद में अब के नायक बने पत्रकारों के जरिए मीडिया के मौजूदा रूप को देखने के लिए एक मीडिया वेबसाइट की पहल वाकई अच्छी होगी। लेकिन बाजार के ओहदेदार लंपट लोगों की कतार मुख्य अतिथि बन जाए। पैसा देकर कार्ड में अपना नाम छपा ले। और बाजार-बाजार का ढिंढोरा पीटते पत्रकारों को भी यह लगे कि यह तो आधुनिक चलन है, तो क्या कहेंगे?

दरअसल, बाजार शब्द की परिभाषा पत्रकारिता करते हुए हो क्या यह तमीज चेहरे के ऊपर जा नहीं पा रही है। चेहरा लिए घूमते पत्रकारों को सिल्वर स्क्रीन के कलाकारों से लेकर मॉडलिंग करने वालों की कतार में रखने का नया नजरिया ही खबर है। अब के नायक पत्रकारों को देखकर भविष्य में न्यूज चैनलों से जुड़ने वाले साथ में खड़े होकर तस्वीर खींचने या ऑटोग्राफ लेकर एक-दूसरे को ग्लैमर की जमीन पर खड़ा करने से नहीं हिचकते और खबरों को पेश करने के पीछे बाजार में बिकने की परिभाषा में खुद को ढालने से नहीं हिचकते। लेकिन एसपी सिंह ने तो कभी अपने 20 मिनट के बुलेटिन में विज्ञापनों की बाढ़ के बावजूद साढ़े चार मिनट से ज्यादा जगह नहीं दी। दस सेकेंड के विज्ञापन की दर को बढ़ाते बढ़ाते नब्बे हजार तक जरूर कर दिया। लेकिन अब तो उल्टा चलन है। विज्ञापन बटोरने की होड़ में 10 सेकेंड का विज्ञापन घटते घटते 10 हजार या उससे कम तक आ चुका है।

यह राष्ट्रीय हिन्दी न्यूज चैनलो का ही सच है। और अगर अब के नायक चेहरे एसपी सिंह को याद करते करते बाजार का रोना या हंसना ही देखकर खबरों की बात करने लगे तो सुनने वालो के जेहन में जाएगा क्या। और ऐसी बहसों को सुन-देख कर जो ब्लॉग-फेसबुक या कहें सोशल मीडिया में लिखा जाएगा, वह भी इसी तरह सतही होगा। इसलिए जरा पलट कर सोचें 27 जून के कार्यक्रम के बारे में सोशल मीडिया में जो लिखा गया, उससे पढ़ने वालो को क्या लगा। एक कार्यक्रम और हो गया। अब के दौर के नायक चेहरों का ग्लैमर आसमान छू रहा है। पहली बार कई चेहरे एक साथ एक मंच पर जमा हुए तो आयोजन सफल हो गया। हो सकता है। लेकिन पत्रकारिता की साख कभी भी लोकप्रिय अंदाज, बाजार के ग्लैमर, बिकने-दिखने या फिर एसपी सरीखे पत्रकारिता के गुणगान से नहीं बढ़ सकती।

मौजूदा दौर की पत्रकारिता को कठघड़े में खड़ाकर जायज सवालों को उठाकर उस पर बहस कराने से कुछ आग जरूर फैल सकती है। असल में मैं सोचता रहा कि एसपी सिंह को याद करने वाले कार्यक्रम के बार में रिपोर्टिंग करते सोशल मीडिया में कहीं भी वह सवाल क्यों नहीं उठे, जिसे पहली बार मैंने उठते हुए देखा। सवाल चेहरों के भाषण का नहीं है। सवाल सुनने वालों के जेहन में उठते सवालों का है। मैंने तो पहली बार नायक चेहरों को धारदार सवालों के सामने पस्त होते देखा। क्या यह सच नहीं है कि अगर वाकई हर मीडिया संस्थान में भर्ती को लेकर कोई मापदंड बन जाए तो लायक छात्र पत्रकारिता करने की दिशा में सफल होंगे। क्या यह सच नहीं है कि इंटर्नशिप को लेकर हर संस्थान अगर गंभीर हो जाए तो इंटर्न छात्र-छात्रा अपनी उपयोगिता को साबित भी करेगा और जो बैक-डोर एन्ट्री किए हुए संस्थान के भीतर पत्रकार बने बैठे हैं, उन्हें भी अहसास होगा कि काम तो करना होगा। न्यूज चैनलो में जा कर पत्रकारिता करने का माद्दा रखने वालों को क्या बाजार के ग्लैमर में खुद को बेवकूफ बनाकर पेश होने की मजबूरी आ गई है। क्योंकि पत्रकारिता बिकती नहीं। या फिर जो बिके वही पत्रकारिता है। है ना कमाल।

एसपी सिंह को याद करते हुए सुनने वाले छात्रों के सवाल ही अगर एसपी सिंह की याद दिला दें तो सच की जमीन भी नायक चेहरों के जरिए नहीं बल्कि अपने आसरे बनाने होगी। किसी भी पत्रकार के साथ तस्वीर या ऑटोग्राफ का ग्लैमर खत्म करना होगा। खबरों की फेहरिस्त हमेशा नायक चेहरों को थमानी होगी, जिसे कवर करने का दवाब ऐसे ही कार्यक्रम में सार्वजनिक तौर पर बनाना होगा। सवाल-जवाब के लिए हर नायक चेहरे से वक्त तय कर ठोस मुद्दों का जवाब मांगना चाहिये। जिससे मौजूदा पत्रकारिता का विश्लेषण हो सके। और तस्वीर और चेहरों की रिपोर्टिंग से बचते हुए जो मुश्किल मौजूदा पत्राकरिता को लेकर उभरे, उसके लिए रास्ता निकालने की दिशा में सोशल मीडिया से जुडे लेखकों को बहस चलानी चाहिए और कार्यक्रम कमाई का जरिया हो तो बॉयकॉट करने की तमीज भी आनी चाहिए।

(साभार: prasunbajpai.itzmyblog.com)

 

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एसपी को कुछ इस तरह याद किया वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने...

उन दिनों सारे हिन्दुस्तान में खुशी की लहर ने लोगों के दिलों को भिगोना शुरू कर दिया था...

Last Modified:
Wednesday, 27 June, 2018
Samachar4media

राजेश बादल

वरिष्ठ पत्रकार व पूर्व एग्जिक्यूटिव डायरेक्टरराज्यसभा टीवी ।। 

हिन्दुस्तान में जो स्थान संगीत में केएल सहगल, मोहम्मद रफ़ी या लता का है, क्रिकेट में सुनील गावस्कर या सचिन तेंदुलकर का है, हॉकी में मेजर ध्यानचंद का है, फिल्म अभिनय में दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन का है, वही स्थान हिंदी पत्रकारिता में राजेंद्र माथुर और हिंदी टीवी पत्रकारिता में एसपी का है। जब चैनल नहीं थे तो उस दौर में एसपी ने टीवी पत्रकारिता के जो कीर्तिमान या मानक तय किए, वे आज भी मिसाल हैं। इन्हीं महानायक एसपी की पुण्यतिथि सत्ताइस जून को है। मेरा उनके साथ क़रीब सत्रह साल तक क़रीबी संपर्क रहा।

उन दिनों सारे हिन्दुस्तान में खुशी की लहर ने लोगों के दिलों को भिगोना शुरू कर दिया था। आजादी की आहट सुनाई देने लगी थी। ये तय हो गया था कि दो चार महीने में अंग्रेज हिन्दुस्तान से दफा हो जाएंगे। इसलिए मोहल्लों में मिठाइयां बंटा करती थी, दिन रात लोग झूमते, नाचते, गाते नजर आते। ऐसे ही माहौल में बनारस के पड़ोसी जिले गाजीपुर से आधे घंटे के फासले पर बसे पातेपुर गांव में जगन्नाथ सिंह के आंगन से मिठाइयों के टोकरे निकले और बच्चों से लेकर बूढों तक सबने छक कर मिठाई खाई।


जगन्नाथसिंह के घर बेटा आया था। नाम रखा गया सुरेन्द्र। आगे चलकर इसी सुरेन्द्र ने भारतीय हिंदी पत्रकारिता को एक नई पहचान दी। प्राइमरी की पढ़ाई पातेपुर स्कूल में हुई। ठेठ गांव के माहौल में देसी संस्कार दिल और दिमाग में गहरे उतर गए। पिता जगन्नाथ सिंह रौबीले और शानदार व्यक्तित्व के मालिक थे। वैसे तो कारोबारी थे, लेकिन पढ़ाई लिखाई के शौकीन थे। कारोबार के सिलसिले में बंगाल के गारोलिया कस्बे में जा बसे। पातेपुर के बाद गारोलिया स्कूल में सुरेन्द्र की पढ़ाई शुरू हो गई। पढ़ने का जुनून यहां तक था कि जेब खर्च के लिए जो भी पैसे मिलते, किताबें खरीदने में खर्च हो जाते। फिर अपने पर पूरे महीने एक पैसा खर्च न होता। बड़े भाई नरेन्द्र को भी पढ़ने का शौक था। मुश्किल यह थी कि गारोलिया में किताबों की एक भी दुकान नहीं थी। दोनों भाई करीब तीन किलोमीटर दूर श्यामनगर कस्बे तक पैदल जाते। किताबें खरीदते और लौट आते।

सुरेन्द्र ने कोलकाता विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर प्रथम श्रेणी में और सुरेन्द्रनाथ कॉलेज से कानून में स्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद वो नौकरी की खोज में जुटे। दरअसल सुरेन्द्र के दोस्तों को यकीन था कि वो जहां भी अर्जी लगाएंगे तो वो नौकरी उन्हें मिल जाएगी। इसलिए जैसे ही कोई विज्ञापन निकलता, दोस्त सुरेन्द्र को घेर लेते और कहते कि वो आवेदन न करें क्योंकि इस नौकरी की ज्यादा जरूरत अमुक दोस्त को है। उसके घर की हालत अच्छी नहीं है। बेचारे सुरेन्द्र ने दोस्तों पर दया दिखाते हुए चार पांच नौकरियां छोड़ी। एक दो बार तो ऐसा हुआ कि नौकरी के लिए आवेदन सुरेन्द्र ने दिया और दोस्तों ने सिफारिश लगवाई सुरेन्द्र के पिताजी से। उनसे प्रार्थना की कि वो सुरेन्द्र से साक्षात्कार में न जाने के लिए कहें। सुरेन्द्र भला पिताजी की बात कैसे टाल सकते थे। क्या आज के जमाने में आप किसी नौजवान या उसके पिता से ऐसा आग्रह कर सकते हैं? बहरहाल इतनी दया दिखाने के बाद भी सुरेन्द्र बैरकपुर के नेशनल कॉलेज में हिंदी के व्याख्याता बन गए।

उन दिनों दिनमान देश की सबसे लोकप्रिय राजनीतिक पत्रिका थी। सुरेन्द्र को इसका नया अंक आने का बेसब्री से इंतजार रहता। आते ही एक बैठक में पूरा अंक पढ़ जाते। इन्ही दिनों दिनमान में प्रशिक्षु पत्रकारों के लिए विज्ञापन छपा। सुरेन्द्र ने आवेदन कर दिया। बुलावा आ गया। इन्टरव्यू लेने के लिए  रौबीले संपादक डॉक्टर धर्मवीर भारती बैठे थे। उनका खौफ ऐसा था कि दफ्तर में आ जाएं तो कर्फ्यू लग जाता। सुरेन्द्र पहुंचे तो उन्होंने  सवाल दागा,

आप नौकरी में हैं तो यहां क्यों आना चाहते हैं?

सुरेन्द्र का उत्तर भी उसी अंदाज में। बोले,

"ये नौकरी उससे बेहतर लगी"।

डॉक्टर भारती का अगला सवाल तोप के गोले जैसा,

"इसका मतलब कि अगली नौकरी इससे बेहतर मिलेगी तो ये भी छोड़ देंगे?

सुरेन्द्र का उत्तर भी तमतमाया सा। बोले,

"बेशक छोड़ दूंगा, क्योंकि मुझे पता नहीं था कि यहां नौकरी नहीं गुलामी करनी होगी"।

धर्मवीर भारती ने उन्हें दस मिनट इंतजार कराया और नियुक्ति पत्र थमा दिया। ये अंदाज था सुरेन्द्र प्रताप सिंह का। प्रशिक्षु पत्रकार के तौर पर धर्मयुग में नौकरी शुरू कर दी। जाते ही धर्मयुग के माहौल में क्रांतिकारी बदलाव। कड़क और फौजी अंदाज गायब। जिन्दा और धड़कता माहौल। डॉक्टर भारती परेशान। उन्होंने सुरेन्द्र का तबादला जानी मानी फिल्म पत्रिका माधुरीमें कर दिया। माधुरी में सुरेन्द्र क्या गए, धर्मयुग में धमाल बंद। सन्नाटा पसर गया। इन्ही दिनों सुरेन्द्र का लेख प्रकाशित हुआ- खाते हैं हिंदी का, गाते हैं अंग्रेजी का।

छपते ही सुरेन्द्र प्रताप सिंह की धूम मच गई। डॉक्टर भारती ने सुरेन्द्र को वापस धर्मयुग में बुला लिया। सुरेन्द्र सबके चहेते बन चुके थे। मित्र मंडली ने नाम रखा एसपी। इसके बाद सारी उमर वो सिर्फ एसपी के नाम से जाने जाते रहे। उन दिनों एसपी को हर महीने चार सौ सड़सठ रुपए मिलते थे। किताबों के कीड़े तो बचपन से ही थे इसलिए आधा वेतन किताबों पर खर्च हो जाता और आधा शुरू के पंद्रह दिनों में। बाद के पन्द्रह दिन कड़की रहती। एक-एक जोड़ी कपड़े पन्द्रह से बीस दिन तक चलाते। छुट्टी होती तो दिन भर सोते। एक दोस्त ने वजह पूछी तो बोले, ‘जागूंगा तो भूख लगेगी और खाने के लिए पैसे मेरे पास नहीं हैं।

पत्रकारिता धुआंधार; पत्रकारिता में पच्चीस बरस की पारी बहुत लंबी नहीं होती, लेकिन इस पारी में एसपी ने वो कीर्तिमान कायम किए, जो आइन्दा किसी के लिए हासिल करना मुमकिन नहीं। इन पच्चीस वर्षों में करीब सत्रह साल तक मैंने भी उनके साथ काम किया। प्रिंट में एसपी ने रविवार के जरिए पत्रकारिता का अद्भुत रूप इस देश को दिखाया तो बाद में टेलिविजन पत्रकारिता के महानायक बन बैठे। सिर्फ बाइस महीने की टेलिविजन पारी ने एसपी को इस मुल्क की पत्रकारिता में अमर कर दिया।

जब आनंद बाजार पत्रिका से रविवार निकालने का प्रस्ताव मिला तो एसपी ने शर्त रखी- पूरी आजादी चाहिए और उन्नीस सौ सतहत्तर में देश ने साप्ताहिक रविवार की वो चमक देखी कि सारी पत्रिकाएं धूमिल पड़ गईं। शानदार, धारदार और असरदार पत्रकारिता। मैं भी इस दौर में लगातार रविवार में एसपी की टीम का सदस्य था। करीब सात साल तक समूचे हिन्दुस्तान ने हिंदी पत्रकारिता का एक नया चेहरा देखा।

रविवार के पहले अंक की कवर स्टोरी थी- रेणु का हिन्दुस्तान। उस दौर की राजनीति, भारतीय लोकतंत्र की चुनौतियों और सरोकारों पर फोकस रविवार के अंक एक के बाद एक धूम मचाते रहे। ये मैगजीन अवाम की आवाज बन गई थी। बोलचाल में लोग कहा करते थे कि रविवार नेताओं और अफसरों को करंट मारती है। पक्ष हो या प्रतिपक्ष- एसपी ने किसी को नहीं बख्शा। खोजी पत्रकारिता का आलम यह था कि अनेक मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों की बलि रविवार  की समाचार कथाओं ने ली। कई बार तो ऐसा हुआ कि जैसे ही  नेताओं को भनक लगती कि इस बार का अंक उनके भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ कर रहा है तो सभी बुक स्टाल्स से मैगजीन गायब करा दी जाती और तब एसपी दुबारा मैगजीन छपाते और खुफिया तौर पर वो अंक घर घर पहुंच जाता। जी हां हम बात कर रहे हैं आजादी के तीस-पैंतीस साल बाद के भारत की। एक बार मेरी कवर स्टोरी छपी- अर्जुन सिंह पर भ्रष्टाचार के आरोप और हमारी निष्पक्ष जांच। अर्जुन सिंह उन दिनों मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे। जैसे ही रविवार का वो अंक बाजार में आया, चौबीस घंटे के भीतर सारी प्रतियां प्रदेश के सभी जिलों से गायब करा दी गईं। एसपी को पता चला तो दुबारा अंक छपा और गुपचुप बाजार में बंटवा दिया। अर्जुनसिंह सरकार देखती रह गई।

यूं तो एसपी भाषण देने से परहेज करते थे, लेकिन जब उन्हें बोलना ही पड़ जाता तो पेशे की पवित्रता हमेशा उनके जेहन में होती। पत्रकारों की प्रामाणिकता उनकी प्राथमिकताओं की सूची में सबसे ऊपर थी। एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा, ‘आज पत्रकारों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। छोटे शहरों में चले जाइए तो पाएंगे कि पत्रकार की इमेज अब पुलिस वाले की होती जा रही है। लोग उनसे डरते हैं। इस इमेज को तोड़ना पड़ेगाआज पत्रकारिता के जरिए कुछ लोग अन्य सुविधाएं हासिल करने में लगे हैं इसलिए पत्रकारों में चारित्रिक गिरावट आई है। पर यह गिरावट समाज के हर अंग में आई हैऐसे बहुत से लोग हैं जो पत्रकार रहते हुए नेतागीरी करते हैं और नेता बनने के बाद पत्रकारितादरअसल पत्रकार कोई देवदूत नहीं होता उनमें भी बहुत सारे दलाल घुसे हुए हैं और ये भी सच है कि समाज के बाहर रहकर पत्रकारिता नहीं हो सकती। यह कैसे हो सकता है कि समाज तो भारत का हो और पत्रकारिता फ्रांस की हो

एसपी के तेवर और अंदाज ने नौजवान पत्रकारों को दीवाना बना दिया था। उन दिनों हर युवा पत्रकार रविवार की पत्रकारिता करना चाहता था।

इसी दौरान उन्नीस सौ बयासी में एसपी की मुलाकात राजेंद्र माथुर से हुई, जो उन दिनों नईदुनिया इंदौर के प्रधान संपादक थे। पत्रकारिता के दो शिखर पुरुषों की इस मुलाकात ने आगे जाकर भारतीय हिंदी पत्रकारिता में एक नया अध्याय लिखा। उन्नीस सौ पचासी में एसपी राजेन्द्र माथुर के सहयोगी बन गए। तब राजेंद्र माथुर नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। वो एसपी को मुंबई संस्करण का स्थानीय संपादक बना कर मायानगरी ले आए। अगले ही साल एसपी राजेंद्र माथुर के साथ कार्यकारी संपादक के तौर पर दिल्ली में काम कर रहे थे, लेकिन मुंबई छोड़ने से पहले मायानगरी में बड़े परदे के लिए भी एसपी ने अदभुत काम किया। जाने माने फिल्मकार मृणाल सेन की जेनेसिस और तस्वीर अपनी अपनी फिल्मों की पटकथा लिखी। विजुअल मीडिया के लिए एसपी की यह शुरुआत थी। गौतम घोष की फिल्म महायात्रा और पार फिल्में भी उन्होंने लिखीं लेकिन सराहना मिली पार से। इस  फिल्म को अनेक पुरस्कार मिले।

पांच साल तक माथुर-एसपी की जोड़ी ने हिंदी पत्रकारिता में अनेक सुनहरे अध्याय लिखे। अखबार की भाषा, नीति और ले आउट में निखार आया। एसपी की नई भूमिका और राजेंद्र माथुर जैसे दिग्गज का मार्गदर्शन अखबार में क्रांतिकारी बदलाव की वजह बना। लखनऊ, जयपुर, पटना और मुंबई संस्करणों की पत्रकारिता से लोग हैरान थे। वो दिन देश के राजनीतिक इतिहास में उथल पुथल भरे थे। जाहिर है पत्रकारिता भी अछूती नहीं थी। दोनों संपादक मिलकर रीढ़वान पत्रकारिता का नमूना पेश कर रहे थे। यह मेरे जीवन का भी यादगार समय था क्योंकि मैं तब इन दोनों महापुरुषों के साथ नवभारत टाइम्स में काम कर रहा था। इन्ही दिनों जाने माने पत्रकार और संपादक प्रभाष जोशी ने जनसत्ता के जरिए एक नए किस्म की पत्रकारिता की मशाल जलाई थी। अखबार और पत्र पत्रिकाएं पढने वाले लोग नवभारत टाइम्स और जनसत्ता की ही चर्चाएं करते थे। उनके संपादकीय बहस छेड़ा करते थे। देश में संपादक के नाम पत्र लिखने वालों का आन्दोलन खड़ा हो गया था। तीन बड़े संपादक अपने अपने अंदाज में भारतीय हिंदी पत्रकारिता को आगे ले जा रहे थे। मेरी नजर में वैचारिक पत्रकारिता का यह स्वर्णकाल था।

सिंह और माथुर की जोड़ी लोकप्रियता के शिखर पर थी कि अचानक नौ अप्रैल उन्नीस सौ इक्यानवे को दिल का दौरा पड़ने से राजेंद्र माथुर का निधन हो गया। पत्रकारिता के लिए बड़ा झटका। इन दिनों पत्रकारिता पर तकनीक और बाजार के दबाव का असर साफ दिखने लगा था। एसपी ने इन दबावों से मुकाबला जारी रखा। वो पत्रकारिता में बाजार के दखल को समझते थे लेकिन पत्रकारिता के मूल्य और सरोकार उनके लिए सर्वोपरि थे। नतीजा कुछ समय बाद नवभारतटाइम्स से उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद एसपी ने स्वतंत्र पत्रकारिता का फैसला किया और फिर देश ने एसपी के गंभीर लेखन का नया रूप देखा। तमाम अखबारों में उनके स्तंभ छपते और चर्चा का विषय बन जाते। साम्प्रदायिकता के खिलाफ उनके लेखों ने लोगों को झकझोर दिया।

सिलसिला चलता रहा। एसपी लेखन को एन्जॉय कर रहे थे। इसी बीच कपिलदेव ने उनसे देव फीचर्स को नया रूप देने का अनुरोध किया। हालांकि यह पूर्णकालिक काम नहीं था ,मगर एसपी ने थोड़े ही समय में उसे शानदार न्यूज एंड फीचर एजेंसी में तब्दील कर दिया।बताना प्रासंगिक है कि देव फीचर्स में भी मैं उनका सहयोगी था। इसके बाद संक्षिप्त सी पारी टाइम्स टेलीविजन के साथ खेली। वहां उन्हें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बुनियादी बातें जानने  का मौका मिला। आलम यह था कि एसपी एक प्रस्ताव स्वीकार कर काम शुरू करते तो दूसरा प्रस्ताव आ जाता। इसी कड़ी में द टेलीग्राफ के राजनीतिक संपादक पद पर काम करने का न्यौता मिला। यहां भी एसपी ने निष्पक्ष पत्रकारिता की शर्त पर काम स्वीकार किया। आज के दौर में शायद ही कोई संपादक नौकरी से पहले इस तरह की शर्त रखता हो। वह अपने वेतन और अन्य सुविधाओं की शर्त रखता है ,लेकिन निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकारिता की आजादी की बात नहीं करता। अपनी नीति और प्रतिभा के चलते ही एसपी को इंडिया टुडे के सभी क्षेत्रीय संस्करणों के संपादन का आफर मिला। हर बार की तरह यहां भी उनकी शर्तें मान लीं गईं। इंडिया टुडे में उनके - मतान्तर और विचारार्थ बेहद लोकप्रिय कॉलम थे। इसके अलावा बीबीसी पर भारतीय अखबारों में प्रकाशित खबरों की समीक्षा का कॉलम भी शुरू हुआ। यह कॉलम इतना लोकप्रिय हुआ कि अनेक अख़बारों में उनकी समीक्षा को सुनकर ख़बरों की नीति तय की जाने लगी। यह भी अपने तरह का अनूठा उदाहरण है।

दिन अच्छे कट रहे थे। उन दिनों दूरदर्शन ही भारतीय टेलीविजन का चेहरा था। विनोद दुआ के लोकप्रिय समाचार साप्ताहिक परख और सिद्धार्थ काक की सांस्कृतिक पत्रिका सुरभि दर्शकों में अपनी पहचान बना चुकी थीं अलबत्ता निजी प्रस्तुतकर्ताओं को दैनिक समाचार पेश करने की अनुमति अभी नहीं मिली थी। चंद रोज बाद विनोद दुआ को शाम का दैनिक बुलेटिन न्यूज वेब पेश करने का अवसर मिला। भारतीय टीवी पत्रकारिता के इतिहास में यह ऐतिहासिक कदम था। कुछ दिनों बाद ये  बुलेटिन  बंद हो गया और इंडिया टुडे समूह को डी डी मेट्रो पर आजतक शुरू करने का  प्रस्ताव मिला। आजतक की टीम में भी मैं उनके साथ था। थोड़े ही दिनों में आजतक ने लोकप्रियता के  सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। शुरुआत में एसपी को टेलीविजन के लायक नहीं बताया जा रहा था ,लेकिन बाद में जब कभी एसपी एक दिन के लिए भी अवकाश लेते तो दर्शक बेचैन हो जाते। पूरब ,पश्चिम ,उत्तर ,दक्षिण - चारों तरफ उनकी लोकप्रियता समान थी।एक दिन देश भर में ये ख़बर फ़ैली कि सारे गणेश मंदिरों में गणेश जी दूध पी रहे हैं। फिर क्या था दफ्तरों में सन्नाटा छा गया। अंधविश्वास के कारण लाखों लीटर दूध बह गया। एसपी ने इसकी वैज्ञानिक व्याख्या की और पोल खोल कर रख दी।उन्होंने यह भी साफ किया कि आखिर गणेश जी के दूध पीने का प्रोपेगंडा करने की योजना कहां बनी थी। उन्नीस सौ छियानवे के लोकसभा चुनाव और उसके बाद केन्द्रीय  बजट पर अपने खास सीधे प्रसारण के जरिए एस पी ने घर घर में अपनी जगह बना ली थी। उनकी बेबाक टिप्पणियां लोगों का दिल खुश कर देतीं।

अंतिम विदाई; उस दिन की शक्ल बड़ी मनहूस थी। उपहार सिनेमा में लगी आग ने दिल्ली को झकझोर दिया था। मरने वालों की तादाद बढ़ती जा रही थी। कवरेज में लगे कैमरे एक के बाद एक दर्दनाक कहानियां उगल रहे थे। एसपी सहयोगियों को बुलेटिन के लिए निर्देश दे रहे थे, लेकिन अंदर ही अंदर उन्हें इस हादसे ने हिला दिया था। सुरक्षा तंत्र की नाकामी से अनेक घरों में भरी दोपहरी अंधेरा छा गया था। हर मिनट खबर का आकार और विकराल हो रहा था। एसपी ने तय किया कि पूरा बुलेटिन इसी हादसे पर केन्द्रित होगा। बुलेटिन भी क्या था दर्द भरी दास्तानों का सिलसिला। एसपी अपने को संभाल न पाए। जिन्दगी की क्रूर रफ्तार पर व्यंग्य करते हुए जैसे तैसे बुलेटिन खत्म किया और फूट फूट कर रो पड़े। उनके चाहने वालों के लिए एसपी का ये नया रूप था। अब तक उनके दिमाग में एसपी की छवि सख्त और मजबूत संपादक पत्रकार की थी। वो सोच भी नहीं सकते थे कि एसपी अंदर से  इतने नरम, भावुक और संवेदनशील होंगे। उस रात एसपी सो न पाए और सुबह होते होते उन्हें ब्रेन हेमरेज होने की खबर जंगल में आग की तरह देश भर में फैल गई। अस्पताल में चाहने वालों का तांता लग गया। उनके फोन अगले कई दिन तक दिन रात व्यस्त रहे। देश भर से एसपी के चाहने वाले उनकी तबियत का हाल जानना चाहते थे। सैकड़ों की तादाद में लोगों ने अस्पताल में ही डेरा डाल लिया था। हर पल उन्हें इंतजार रहता कि डॉक्टर अभी आएंगे और उनके अच्छे होने का समाचार देंगे। लेकिन ये न हुआ। एक के बाद एक दिन गुजरते रहे। एसपी होश में नहीं आए और आखिर वो दिन भी आ पहुंचा, जब एसपी अपने उस सफर पर चल दिए, जहां से लौटकर कोई नहीं आता।

उनके देहावसान की खबर सुनते ही हर मीडिया हाउस में सन्नाटा छा गया। देश भर के पत्रकार, संपादक, राजनेता, अधिकारी, छात्र, प्राध्यापकतमाम वर्गों के बुद्धिजीवी सदमे में थे। हर प्रसारण केंद्र ने एसपी के निधन की खबर को जिस तरह स्थान दिया, वो बेमिसाल है। राजेंद्र माथुर के अलावा किसी पत्रकार को समाज की तरफ से इस तरह की विदाई  नहीं मिली। एसपी अब नहीं  हैं, लेकिन अपनी पत्रकारिता की वजह से वो इस देश के करोड़ों दिलों में हमेशा धड़कते रहेंगे।

 


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वरिष्ठ पत्रकार अनुरंजन झा बोले, अजीब द्वंद है एसपी के शिष्यों और एसपी के चेलों के बीच...

‘राजधानी की सड़कों पर आज फिर हत्यारिन रेडलाइन ने दो नौजवानों की जान ले ली।’ देश के

Last Modified:
Tuesday, 27 June, 2017
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अनुरंजन झा

वरिष्ठ पत्रकार ।।

anuranjan-jha‘राजधानी की सड़कों पर आज फिर हत्यारिन रेडलाइन ने दो नौजवानों की जान ले ली।’ देश के पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग चैनल पर रात को इस अंदाज में खबर पढ़ने का असर यह हुआ अगले दिन दिल्ली की सरकार को एक बैठक बुलानी पड़ी थी और अगर आपको ठीक से याद हो तो उसके चंद दिनों के बाद ही प्राइवेट बसों के उस जखीरे का रंग बदल कर ब्लू कर दिया गया। उसके बाद एसपी ने कहा कि सरकार रंग बदलने की बजाय अगर ढंग बदले तो लोगों की जान बचाई जा सकती है। यह एक बानगी है हिंदी न्यूज टेलिविजन के उस पुरोधा के खबरों के पेश करने और उसके चयन के तरीके की।

हिंदी न्यूज टेलिविजन को एक नया आयाम देने के मामले में निस्संदेह सुरेंद्र प्रताप सिंह का नाम सबसे पहले लिया जाना चाहिए। एसपी की 20वीं पुण्यतिथि पर सबसे पहले उन्हें नमन और श्रद्धांजलि। मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि जिस तरह मेरे पत्रकारिता में आने के पीछे वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन प्रेरणा रहे हैं उसी तरह टेलिविजन न्यूज को अपने जीवन का हिस्सा बनाने के पीछे कहीं न कहीं एसपी की भूमिका रही है। हालांकि हमने उनके साथ कभी काम नहीं किया लेकिन दूरदर्शन पर उनके बीस मिनट के खबरों को पेश करने के तरीके ने दिलो-दिमाग पर काफी असर डाला।

अखबारों में लिखने के दौरान भी हमने टीवी में इस्तेमाल की जानी वाली भाषा का इस्तेमाल किया, मसलन छोटे वाक्य और बिना लाग-लपेट के अपनी बात कह जाना। यह सुरेंद्र प्रताप सिंह का तरीका था। हालांकि कई मामलों में उनसे मतभेद के तमाम कारण हैं लेकिन आज टीवी पत्रकारिता का जो बोलबाला है उसके पुरोधा होने का श्रेय तो एसपी सिंह को जाना ही चाहिए।

हमारी उनकी पहली मुलाकात काफी दिलचस्प है, दिल्ली विश्वविद्यालय के आखिरी दिनों में किसी राजनीतिक विवाद में हमारी तस्वीर दिल्ली से प्रकाशित होने वाले कुछ अखबारों में छप गई। दिल्ली के हमारे एक अभिभावक ने बुलावा भेजा, और जमकर डांट लगाई। जिस दिन हमारी पेशी हुई उस दिन उनके मित्र एसपी सिंह वहां मौजूद थे। एसपी ने कहा कि कुछ रचनात्मक करो और फिर छपो तो बात बने।

हालांकि उन दिनों तक मैंने अखबारों और पत्रिकाओं के लिए लिखना शुरू कर दिया था। फिर बोले, कल मेरे पास आओ, कुछ वक्त पहले ही उनका कार्यक्रम आजतक- दूरदर्शन पर आना शुरू हुआ था। मैं उनसे मिलने गया। कुछ रिसर्च का काम भी किया लेकिन पढ़ाई पूरी नहीं होने की वजह से मैं लगातार नहीं जा सका और उनके साथ काम करने का योग नहीं बन पाया। हां उनसे मुलाकात जरूर होती रही। कुछ इसी तरह से उनके साथ काफी लोग जुड़े।

टीवी न्यूज के उस दौर में एसपी ने काफी लोगों को तराशने का काम किया। लेकिन कई सारे ऐसे रहे जो उनके बेवक्त चले जाने से संवर नहीं पाए। उसमें से ज्यादातर बाद के दिनों में एसपी के साथ काम करने का ढोल पीटकर उनके चेले बन गए। कुछ उनके सच्चे शिष्य भी थे। यहां नाम लेना मैं उचित नहीं समझता लेकिन उस जनरेशन को मैं दो हिस्सों में बांटता हूं एक एसपी के शिष्य और दूसरे उनके चेले। उनकी बरसी पर याद करते हुए उनकी कुछ बातें आप लोगों को याद दिलाना चाहता हूं।

जरा सोचिएगा कि आज अगर एसपी जिंदा होते तो अपने इन तथाकथित चेलों को देखकर उनपर क्या बीत रही होती। किसी न किसी दल और विचारधारा से जुड़कर न्यूज परोसने वाले संपादकों में कई उनके चेले रहे हैं। एसपी अक्सर कहा करते थे कि पत्रकारिता के नाम पर दुकान चलाने वालों की स्वतंत्रता का पक्षधर नहीं हूं मैं। उनको आभास था कि उनके करीब कुछ ऐसे लोग हैं जो बाद में उनके चेले का चोला धारण कर अपनी दुकान चलाएंगे और अभिव्यक्ति की आजादी का ढोल भी पीटेंगे।

एक साक्षात्कार में एसपी सिंह ने कहा था कि जूता बनाने वाली कंपनी और डालडा बनाने वाली कंपनी का प्रबंधन एक जैसा नहीं हो सकता। अखबार (अब टेलिविजन) को उत्पाद के तौर पर देखना ही होगा लेकिन उसका उद्देश्य सिर्फ बेचना नहीं हो सकता। उनके शिष्यों ने उत्पाद के तौर पर देखा तबतक उनके चेलों ने बेच डाला। एक वक्त एसपी ने कहा था कि टेलिविजन में वे ज्यादा संतुष्ट पाते हैं अपने आपको क्योंकि यहां लफ्फाजी और छल नहीं है, आज एसपी जिंदा होते तो वो अपनी बात बेलाग तरीके से वापस लेते उनको लगता कि वो गलत थे आज तो टेलिविजन पत्रकारिता में सबसे ज्यादा और कारगर लफ्फाजी और छल का बाजार है।

बीस सालों में समाज बदला है, तकनीक बदली है, पत्रकारिता के मानदंड भी बदल गए हैं। अपने जीवन में एसपी ने जमकर लिखा, जमकर पत्रकारिता की, जमकर आलोचना की, अपनी बातों पर जमे रहे। खबरों और बाजार के बीच सामंजस्य बिठाया और बाजार यानी प्रबंधन को कभी खबरों पर हावी नहीं होने दिया। उनके साथ टेलिविजन की पीढ़ी जवान हुई, उनके बेवक्त चले जाने से नुकसान हुआ। आज उनकी कमी खलती है जब सामंजस्य का तरीका नजर नहीं आता। जब हर खबर पर बाजार हावी होता है। उनके शिष्यों के सीने में हूक उठती है और चेले बिंदास हैं। काश आप आ पाते। नमन

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