शुरुआत में एसपी को टेलीविजन के लायक नहीं बताया जा रहा था, पर ये है उनकी 'असली कहानी'

उन दिनों सारे हिन्दुस्तान में खुशी की लहर ने लोगों के दिलों को भिगोना शुरू कर दिया था...

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Thursday, 27 June, 2019
Samachar4media

राजेश बादल

वरिष्ठ पत्रकार । 

हिन्दुस्तान में जो स्थान संगीत में केएल सहगल, मोहम्मद रफ़ी या लता का है, क्रिकेट में सुनील गावस्कर या सचिन तेंदुलकर का है, हॉकी में मेजर ध्यानचंद का है, फिल्म अभिनय में दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन का है, वही स्थान हिंदी पत्रकारिता में राजेंद्र माथुर और हिंदी टीवी पत्रकारिता में एसपी का है। जब चैनल नहीं थे तो उस दौर में एसपी ने टीवी पत्रकारिता के जो कीर्तिमान या मानक तय किए, वे आज भी मिसाल हैं। इन्हीं महानायक एसपी की पुण्यतिथि सत्ताइस जून को है। मेरा उनके साथ क़रीब सत्रह साल तक क़रीबी संपर्क रहा।

उन दिनों सारे हिन्दुस्तान में खुशी की लहर ने लोगों के दिलों को भिगोना शुरू कर दिया था। आजादी की आहट सुनाई देने लगी थी। ये तय हो गया था कि दो चार महीने में अंग्रेज हिन्दुस्तान से दफा हो जाएंगे। इसलिए मोहल्लों में मिठाइयां बंटा करती थी, दिन रात लोग झूमते, नाचते, गाते नजर आते। ऐसे ही माहौल में बनारस के पड़ोसी जिले गाजीपुर से आधे घंटे के फासले पर बसे पातेपुर गांव में जगन्नाथ सिंह के आंगन से मिठाइयों के टोकरे निकले और बच्चों से लेकर बूढों तक सबने छक कर मिठाई खाई।


जगन्नाथसिंह के घर बेटा आया था। नाम रखा गया सुरेन्द्र। आगे चलकर इसी सुरेन्द्र ने भारतीय हिंदी पत्रकारिता को एक नई पहचान दी। प्राइमरी की पढ़ाई पातेपुर स्कूल में हुई। ठेठ गांव के माहौल में देसी संस्कार दिल और दिमाग में गहरे उतर गए। पिता जगन्नाथ सिंह रौबीले और शानदार व्यक्तित्व के मालिक थे। वैसे तो कारोबारी थे, लेकिन पढ़ाई लिखाई के शौकीन थे। कारोबार के सिलसिले में बंगाल के गारोलिया कस्बे में जा बसे। पातेपुर के बाद गारोलिया स्कूल में सुरेन्द्र की पढ़ाई शुरू हो गई। पढ़ने का जुनून यहां तक था कि जेब खर्च के लिए जो भी पैसे मिलते, किताबें खरीदने में खर्च हो जाते। फिर अपने पर पूरे महीने एक पैसा खर्च न होता। बड़े भाई नरेन्द्र को भी पढ़ने का शौक था। मुश्किल यह थी कि गारोलिया में किताबों की एक भी दुकान नहीं थी। दोनों भाई करीब तीन किलोमीटर दूर श्यामनगर कस्बे तक पैदल जाते। किताबें खरीदते और लौट आते।

सुरेन्द्र ने कोलकाता विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर प्रथम श्रेणी में और सुरेन्द्रनाथ कॉलेज से कानून में स्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद वो नौकरी की खोज में जुटे। दरअसल सुरेन्द्र के दोस्तों को यकीन था कि वो जहां भी अर्जी लगाएंगे तो वो नौकरी उन्हें मिल जाएगी। इसलिए जैसे ही कोई विज्ञापन निकलता, दोस्त सुरेन्द्र को घेर लेते और कहते कि वो आवेदन न करें क्योंकि इस नौकरी की ज्यादा जरूरत अमुक दोस्त को है। उसके घर की हालत अच्छी नहीं है। बेचारे सुरेन्द्र ने दोस्तों पर दया दिखाते हुए चार पांच नौकरियां छोड़ी। एक दो बार तो ऐसा हुआ कि नौकरी के लिए आवेदन सुरेन्द्र ने दिया और दोस्तों ने सिफारिश लगवाई सुरेन्द्र के पिताजी से। उनसे प्रार्थना की कि वो सुरेन्द्र से साक्षात्कार में न जाने के लिए कहें। सुरेन्द्र भला पिताजी की बात कैसे टाल सकते थे। क्या आज के जमाने में आप किसी नौजवान या उसके पिता से ऐसा आग्रह कर सकते हैं? बहरहाल इतनी दया दिखाने के बाद भी सुरेन्द्र बैरकपुर के नेशनल कॉलेज में हिंदी के व्याख्याता बन गए।

उन दिनों दिनमान देश की सबसे लोकप्रिय राजनीतिक पत्रिका थी। सुरेन्द्र को इसका नया अंक आने का बेसब्री से इंतजार रहता। आते ही एक बैठक में पूरा अंक पढ़ जाते। इन्ही दिनों दिनमान में प्रशिक्षु पत्रकारों के लिए विज्ञापन छपा। सुरेन्द्र ने आवेदन कर दिया। बुलावा आ गया। इन्टरव्यू लेने के लिए रौबीले संपादक डॉक्टर धर्मवीर भारती बैठे थे। उनका खौफ ऐसा था कि दफ्तर में आ जाएं तो कर्फ्यू लग जाता। सुरेन्द्र पहुंचे तो उन्होंने सवाल दागा,

आप नौकरी में हैं तो यहां क्यों आना चाहते हैं?

सुरेन्द्र का उत्तर भी उसी अंदाज में। बोले,

"ये नौकरी उससे बेहतर लगी"।

डॉक्टर भारती का अगला सवाल तोप के गोले जैसा,

"इसका मतलब कि अगली नौकरी इससे बेहतर मिलेगी तो ये भी छोड़ देंगे?

सुरेन्द्र का उत्तर भी तमतमाया सा। बोले,

"बेशक छोड़ दूंगा, क्योंकि मुझे पता नहीं था कि यहां नौकरी नहीं गुलामी करनी होगी"।

धर्मवीर भारती ने उन्हें दस मिनट इंतजार कराया और नियुक्ति पत्र थमा दिया। ये अंदाज था सुरेन्द्र प्रताप सिंह का। प्रशिक्षु पत्रकार के तौर पर धर्मयुग में नौकरी शुरू कर दी। जाते ही धर्मयुग के माहौल में क्रांतिकारी बदलाव। कड़क और फौजी अंदाज गायब। जिन्दा और धड़कता माहौल। डॉक्टर भारती परेशान। उन्होंने सुरेन्द्र का तबादला जानी मानी फिल्म पत्रिका माधुरीमें कर दिया। माधुरी में सुरेन्द्र क्या गए, धर्मयुग में धमाल बंद। सन्नाटा पसर गया। इन्ही दिनों सुरेन्द्र का लेख प्रकाशित हुआ- खाते हैं हिंदी का, गाते हैं अंग्रेजी का।

छपते ही सुरेन्द्र प्रताप सिंह की धूम मच गई। डॉक्टर भारती ने सुरेन्द्र को वापस धर्मयुग में बुला लिया। सुरेन्द्र सबके चहेते बन चुके थे। मित्र मंडली ने नाम रखा एसपी। इसके बाद सारी उमर वो सिर्फ एसपी के नाम से जाने जाते रहे। उन दिनों एसपी को हर महीने चार सौ सड़सठ रुपए मिलते थे। किताबों के कीड़े तो बचपन से ही थे इसलिए आधा वेतन किताबों पर खर्च हो जाता और आधा शुरू के पंद्रह दिनों में। बाद के पन्द्रह दिन कड़की रहती। एक-एक जोड़ी कपड़े पन्द्रह से बीस दिन तक चलाते। छुट्टी होती तो दिन भर सोते। एक दोस्त ने वजह पूछी तो बोले, ‘जागूंगा तो भूख लगेगी और खाने के लिए पैसे मेरे पास नहीं हैं।

पत्रकारिता धुआंधार; पत्रकारिता में पच्चीस बरस की पारी बहुत लंबी नहीं होती, लेकिन इस पारी में एसपी ने वो कीर्तिमान कायम किए, जो आइन्दा किसी के लिए हासिल करना मुमकिन नहीं। इन पच्चीस वर्षों में करीब सत्रह साल तक मैंने भी उनके साथ काम किया। प्रिंट में एसपी ने रविवार के जरिए पत्रकारिता का अद्भुत रूप इस देश को दिखाया तो बाद में टेलिविजन पत्रकारिता के महानायक बन बैठे। सिर्फ बाइस महीने की टेलिविजन पारी ने एसपी को इस मुल्क की पत्रकारिता में अमर कर दिया।

जब आनंद बाजार पत्रिका से रविवार निकालने का प्रस्ताव मिला तो एसपी ने शर्त रखी- पूरी आजादी चाहिए और उन्नीस सौ सतहत्तर में देश ने साप्ताहिक रविवार की वो चमक देखी कि सारी पत्रिकाएं धूमिल पड़ गईं। शानदार, धारदार और असरदार पत्रकारिता। मैं भी इस दौर में लगातार रविवार में एसपी की टीम का सदस्य था। करीब सात साल तक समूचे हिन्दुस्तान ने हिंदी पत्रकारिता का एक नया चेहरा देखा।

रविवार के पहले अंक की कवर स्टोरी थी- रेणु का हिन्दुस्तान। उस दौर की राजनीति, भारतीय लोकतंत्र की चुनौतियों और सरोकारों पर फोकस रविवार के अंक एक के बाद एक धूम मचाते रहे। ये मैगजीन अवाम की आवाज बन गई थी। बोलचाल में लोग कहा करते थे कि रविवार नेताओं और अफसरों को करंट मारती है। पक्ष हो या प्रतिपक्ष- एसपी ने किसी को नहीं बख्शा। खोजी पत्रकारिता का आलम यह था कि अनेक मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों की बलि रविवार  की समाचार कथाओं ने ली। कई बार तो ऐसा हुआ कि जैसे ही  नेताओं को भनक लगती कि इस बार का अंक उनके भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ कर रहा है तो सभी बुक स्टाल्स से मैगजीन गायब करा दी जाती और तब एसपी दुबारा मैगजीन छपाते और खुफिया तौर पर वो अंक घर घर पहुंच जाता। जी हां हम बात कर रहे हैं आजादी के तीस-पैंतीस साल बाद के भारत की। एक बार मेरी कवर स्टोरी छपी- अर्जुन सिंह पर भ्रष्टाचार के आरोप और हमारी निष्पक्ष जांच। अर्जुन सिंह उन दिनों मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे। जैसे ही रविवार का वो अंक बाजार में आया, चौबीस घंटे के भीतर सारी प्रतियां प्रदेश के सभी जिलों से गायब करा दी गईं। एसपी को पता चला तो दुबारा अंक छपा और गुपचुप बाजार में बंटवा दिया। अर्जुनसिंह सरकार देखती रह गई।

यूं तो एसपी भाषण देने से परहेज करते थे, लेकिन जब उन्हें बोलना ही पड़ जाता तो पेशे की पवित्रता हमेशा उनके जेहन में होती। पत्रकारों की प्रामाणिकता उनकी प्राथमिकताओं की सूची में सबसे ऊपर थी। एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा, ‘आज पत्रकारों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। छोटे शहरों में चले जाइए तो पाएंगे कि पत्रकार की इमेज अब पुलिस वाले की होती जा रही है। लोग उनसे डरते हैं। इस इमेज को तोड़ना पड़ेगाआज पत्रकारिता के जरिए कुछ लोग अन्य सुविधाएं हासिल करने में लगे हैं इसलिए पत्रकारों में चारित्रिक गिरावट आई है। पर यह गिरावट समाज के हर अंग में आई हैऐसे बहुत से लोग हैं जो पत्रकार रहते हुए नेतागीरी करते हैं और नेता बनने के बाद पत्रकारितादरअसल पत्रकार कोई देवदूत नहीं होता उनमें भी बहुत सारे दलाल घुसे हुए हैं और ये भी सच है कि समाज के बाहर रहकर पत्रकारिता नहीं हो सकती। यह कैसे हो सकता है कि समाज तो भारत का हो और पत्रकारिता फ्रांस की हो

एसपी के तेवर और अंदाज ने नौजवान पत्रकारों को दीवाना बना दिया था। उन दिनों हर युवा पत्रकार रविवार की पत्रकारिता करना चाहता था।

इसी दौरान उन्नीस सौ बयासी में एसपी की मुलाकात राजेंद्र माथुर से हुई, जो उन दिनों नईदुनिया इंदौर के प्रधान संपादक थे। पत्रकारिता के दो शिखर पुरुषों की इस मुलाकात ने आगे जाकर भारतीय हिंदी पत्रकारिता में एक नया अध्याय लिखा। उन्नीस सौ पचासी में एसपी राजेन्द्र माथुर के सहयोगी बन गए। तब राजेंद्र माथुर नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। वो एसपी को मुंबई संस्करण का स्थानीय संपादक बना कर मायानगरी ले आए। अगले ही साल एसपी राजेंद्र माथुर के साथ कार्यकारी संपादक के तौर पर दिल्ली में काम कर रहे थे, लेकिन मुंबई छोड़ने से पहले मायानगरी में बड़े परदे के लिए भी एसपी ने अदभुत काम किया। जाने माने फिल्मकार मृणाल सेन की 'जेनेसिस' और 'तस्वीर अपनी अपनी' फिल्मों की पटकथा लिखी। विजुअल मीडिया के लिए एसपी की यह शुरुआत थी। गौतम घोष की फिल्म 'महायात्रा' और 'पार' फिल्में भी उन्होंने लिखीं लेकिन सराहना मिली 'पार' से। इस फिल्म को अनेक पुरस्कार मिले।

पांच साल तक माथुर-एसपी की जोड़ी ने हिंदी पत्रकारिता में अनेक सुनहरे अध्याय लिखे। अखबार की भाषा, नीति और ले आउट में निखार आया। एसपी की नई भूमिका और राजेंद्र माथुर जैसे दिग्गज का मार्गदर्शन अखबार में क्रांतिकारी बदलाव की वजह बना। लखनऊ, जयपुर, पटना और मुंबई संस्करणों की पत्रकारिता से लोग हैरान थे। वो दिन देश के राजनीतिक इतिहास में उथल पुथल भरे थे। जाहिर है पत्रकारिता भी अछूती नहीं थी। दोनों संपादक मिलकर रीढ़वान पत्रकारिता का नमूना पेश कर रहे थे। यह मेरे जीवन का भी यादगार समय था क्योंकि मैं तब इन दोनों महापुरुषों के साथ नवभारत टाइम्स में काम कर रहा था। इन्ही दिनों जाने माने पत्रकार और संपादक प्रभाष जोशी ने जनसत्ता के जरिए एक नए किस्म की पत्रकारिता की मशाल जलाई थी। अखबार और पत्र पत्रिकाएं पढने वाले लोग नवभारत टाइम्स और जनसत्ता की ही चर्चाएं करते थे। उनके संपादकीय बहस छेड़ा करते थे। देश में संपादक के नाम पत्र लिखने वालों का आन्दोलन खड़ा हो गया था। तीन बड़े संपादक अपने अपने अंदाज में भारतीय हिंदी पत्रकारिता को आगे ले जा रहे थे। मेरी नजर में वैचारिक पत्रकारिता का यह स्वर्णकाल था।

सिंह और माथुर की जोड़ी लोकप्रियता के शिखर पर थी कि अचानक नौ अप्रैल उन्नीस सौ इक्यानवे को दिल का दौरा पड़ने से राजेंद्र माथुर का निधन हो गया। पत्रकारिता के लिए बड़ा झटका। इन दिनों पत्रकारिता पर तकनीक और बाजार के दबाव का असर साफ दिखने लगा था। एसपी ने इन दबावों से मुकाबला जारी रखा। वो पत्रकारिता में बाजार के दखल को समझते थे लेकिन पत्रकारिता के मूल्य और सरोकार उनके लिए सर्वोपरि थे। नतीजा कुछ समय बाद नवभारतटाइम्स से उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद एसपी ने स्वतंत्र पत्रकारिता का फैसला किया और फिर देश ने एसपी के गंभीर लेखन का नया रूप देखा। तमाम अखबारों में उनके स्तंभ छपते और चर्चा का विषय बन जाते। साम्प्रदायिकता के खिलाफ उनके लेखों ने लोगों को झकझोर दिया।

सिलसिला चलता रहा। एसपी लेखन को एन्जॉय कर रहे थे। इसी बीच कपिलदेव ने उनसे देव फीचर्स को नया रूप देने का अनुरोध किया। हालांकि यह पूर्णकालिक काम नहीं था ,मगर एसपी ने थोड़े ही समय में उसे शानदार न्यूज एंड फीचर एजेंसी में तब्दील कर दिया। बताना प्रासंगिक है कि देव फीचर्स में भी मैं उनका सहयोगी था। इसके बाद संक्षिप्त सी पारी टाइम्स टेलीविजन के साथ खेली। वहां उन्हें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बुनियादी बातें जानने  का मौका मिला। आलम यह था कि एसपी एक प्रस्ताव स्वीकार कर काम शुरू करते तो दूसरा प्रस्ताव आ जाता। इसी कड़ी में द टेलीग्राफ के राजनीतिक संपादक पद पर काम करने का न्यौता मिला। यहां भी एसपी ने निष्पक्ष पत्रकारिता की शर्त पर काम स्वीकार किया। आज के दौर में शायद ही कोई संपादक नौकरी से पहले इस तरह की शर्त रखता हो। वह अपने वेतन और अन्य सुविधाओं की शर्त रखता है ,लेकिन निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकारिता की आजादी की बात नहीं करता। अपनी नीति और प्रतिभा के चलते ही एसपी को इंडिया टुडे के सभी क्षेत्रीय संस्करणों के संपादन का आफर मिला। हर बार की तरह यहां भी उनकी शर्तें मान लीं गईं। इंडिया टुडे में उनके- मतान्तर और विचारार्थ बेहद लोकप्रिय कॉलम थे। इसके अलावा बीबीसी पर भारतीय अखबारों में प्रकाशित खबरों की समीक्षा का कॉलम भी शुरू हुआ। यह कॉलम इतना लोकप्रिय हुआ कि अनेक अख़बारों में उनकी समीक्षा को सुनकर ख़बरों की नीति तय की जाने लगी। यह भी अपने तरह का अनूठा उदाहरण है।

दिन अच्छे कट रहे थे। उन दिनों दूरदर्शन ही भारतीय टेलीविजन का चेहरा था। विनोद दुआ के लोकप्रिय समाचार साप्ताहिक 'परख' और सिद्धार्थ काक की सांस्कृतिक पत्रिका 'सुरभि' दर्शकों में अपनी पहचान बना चुकी थीं अलबत्ता निजी प्रस्तुतकर्ताओं को दैनिक समाचार पेश करने की अनुमति अभी नहीं मिली थी। चंद रोज बाद विनोद दुआ को शाम का दैनिक बुलेटिन न्यूज वेब पेश करने का अवसर मिला। भारतीय टीवी पत्रकारिता के इतिहास में यह ऐतिहासिक कदम था। कुछ दिनों बाद ये बुलेटिन बंद हो गया और इंडिया टुडे समूह को डी डी मेट्रो पर 'आजतक' शुरू करने का  प्रस्ताव मिला। आजतक की टीम में भी मैं उनके साथ था। थोड़े ही दिनों में आजतक ने लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। शुरुआत में एसपी को टेलीविजन के लायक नहीं बताया जा रहा था,लेकिन बाद में जब कभी एसपी एक दिन के लिए भी अवकाश लेते तो दर्शक बेचैन हो जाते। पूरब,पश्चिम,उत्तर,दक्षिण- चारों तरफ उनकी लोकप्रियता समान थी। एक दिन देश भर में ये ख़बर फ़ैली कि सारे गणेश मंदिरों में गणेश जी दूध पी रहे हैं। फिर क्या था दफ्तरों में सन्नाटा छा गया। अंधविश्वास के कारण लाखों लीटर दूध बह गया। एसपी ने इसकी वैज्ञानिक व्याख्या की और पोल खोल कर रख दी। उन्होंने यह भी साफ किया कि आखिर गणेश जी के दूध पीने का प्रोपेगंडा करने की योजना कहां बनी थी। उन्नीस सौ छियानवे के लोकसभा चुनाव और उसके बाद केन्द्रीय बजट पर अपने खास सीधे प्रसारण के जरिए एसपी ने घर-घर में अपनी जगह बना ली थी। उनकी बेबाक टिप्पणियां लोगों का दिल खुश कर देतीं।

अंतिम विदाई: उस दिन की शक्ल बड़ी मनहूस थी। उपहार सिनेमा में लगी आग ने दिल्ली को झकझोर दिया था। मरने वालों की तादाद बढ़ती जा रही थी। कवरेज में लगे कैमरे एक के बाद एक दर्दनाक कहानियां उगल रहे थे। एसपी सहयोगियों को बुलेटिन के लिए निर्देश दे रहे थे, लेकिन अंदर ही अंदर उन्हें इस हादसे ने हिला दिया था। सुरक्षा तंत्र की नाकामी से अनेक घरों में भरी दोपहरी अंधेरा छा गया था। हर मिनट खबर का आकार और विकराल हो रहा था। एसपी ने तय किया कि पूरा बुलेटिन इसी हादसे पर केन्द्रित होगा। बुलेटिन भी क्या था दर्द भरी दास्तानों का सिलसिला। एसपी अपने को संभाल न पाए। जिन्दगी की क्रूर रफ्तार पर व्यंग्य करते हुए जैसे तैसे बुलेटिन खत्म किया और फूट फूट कर रो पड़े। उनके चाहने वालों के लिए एसपी का ये नया रूप था। अब तक उनके दिमाग में एसपी की छवि सख्त और मजबूत संपादक पत्रकार की थी। वो सोच भी नहीं सकते थे कि एसपी अंदर से इतने नरम, भावुक और संवेदनशील होंगे। उस रात एसपी सो न पाए और सुबह होते होते उन्हें ब्रेन हेमरेज होने की खबर जंगल में आग की तरह देश भर में फैल गई। अस्पताल में चाहने वालों का तांता लग गया। उनके फोन अगले कई दिन तक दिन रात व्यस्त रहे। देश भर से एसपी के चाहने वाले उनकी तबियत का हाल जानना चाहते थे। सैकड़ों की तादाद में लोगों ने अस्पताल में ही डेरा डाल लिया था। हर पल उन्हें इंतजार रहता कि डॉक्टर अभी आएंगे और उनके अच्छे होने का समाचार देंगे। लेकिन ये न हुआ। एक के बाद एक दिन गुजरते रहे। एसपी होश में नहीं आए और आखिर वो दिन भी आ पहुंचा, जब एसपी अपने उस सफर पर चल दिए, जहां से लौटकर कोई नहीं आता।

उनके देहावसान की खबर सुनते ही हर मीडिया हाउस में सन्नाटा छा गया। देश भर के पत्रकार, संपादक, राजनेता, अधिकारी, छात्र, प्राध्यापकतमाम वर्गों के बुद्धिजीवी सदमे में थे। हर प्रसारण केंद्र ने एसपी के निधन की खबर को जिस तरह स्थान दिया, वो बेमिसाल है। राजेंद्र माथुर के अलावा किसी पत्रकार को समाज की तरफ से इस तरह की विदाई नहीं मिली। एसपी अब नहीं हैं, लेकिन अपनी पत्रकारिता की वजह से वो इस देश के करोड़ों दिलों में हमेशा धड़कते रहेंगे।

 

 

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पूण्य प्रसून का सवाल- न्यूज चैनलों के किसी पत्रकार को ये खबर पहले क्यों नहीं पता लगी?  

पुण्य प्रसून बाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार ।। किन्हें नाज है मीडिया पर आडवानी 35.00, खुराना 3.00, एसएस 18.94, के नाथ 7.00, एनडीटी 0.88, बूटा 7.50, एपी 5.00, एलपीए

Samachar4media Bureau by Samachar4media Bureau
Published - Thursday, 29 December, 2016
Last Modified:
Thursday, 29 December, 2016
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पुण्य प्रसून बाजपेयी

वरिष्ठ पत्रकार ।।

किन्हें नाज है मीडिया पर

आडवानी 35.00, खुराना 3.00, एसएस 18.94, के नाथ 7.00, एनडीटी 0.88, बूटा 7.50, एपी 5.00, एलपीएस 5.50, एस यादव 5.00, ए एम 30.00, एएन 35.00, डी लाल 50.00, वीसीएस 47.00, एनएस 8.00 ...और इसी तरह कुछ और शब्द। जिन के आगे अलग अलग नंबर। यानी ना तो इनीशियल से पता चलता कि किसका नाम और ना ही नंबर से पता चलता कि ये रकम है या कुछ और। लेकिन पन्ने के उपर लिखा हुआ पीओई फ्राम अप्रैल 86 टू मार्च 90। और सारे नामों के आगे लिखे नंबर को जोडकर लिखा गया 1602.06800। और कागज के एक किनारे तीन हस्ताक्षर। और तीनों के नीचे तारीख 3/5/91 ....तो इस तरह के दो पन्ने जिसमें सिर्फ नाम के पहले अक्षर का जिक्र।

मसलन दूसरे पन्ने में एलकेए या फिर वीसीएस। और देखते देखते देश की सियासत गर्म होती चली गई कि जैन हवाला की डायरी का ये पन्ना है। जिसमें लिखे अक्षर नेताओं के नाम हैं, जिन्हें हवाला से पेमेंट हुई। और इस पन्ने को लेकर देश की सियासत कुछ ऐसी गर्म हुई कि लालकृष्ण आडवाणी ने ये कहकर लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया कि जब तक उनके नाम पर लगा हवाला का दाग साफ नहीं होता, वह संसद में नहीं लौटेंगे। बाकी कांग्रेस-बीजेपी के सांसद जिनके भी नाम डायरी के पन्नों पर लिखे शब्द को पूरा करते उनकी राजनीति डगमगाने लगी और पूरे मामले की जांच शुरू हो गई।

उस वक्त प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने सीबीआई के हवाले जैन हवाला की जांच कर दी। लेकिन बीस बरस पहले 1996 में डायरी का ये पन्ना किसी नेता ने हवा में नहीं लहराया। ना ही किसी सीएम ने विधानसभा में डायरी के इस पन्ने को लहराकर किसी से इस्तीफा मांगा, बल्कि तब के पत्रकारों ने ही डायरी के इस पन्ने के जरिए क्रोनी कैपटिलिज्म और नेताओं का जैन बंधुओं के जरिए हवाला रैकेट से रकम लेने की बात छापी। जनसत्ता ने नामों का जिक्र किया तो आउटलुक ने तो 31 जनवरी 1996 के अंक में कवर पेज पर ही डायरी का पन्ना छाप दिया और जैन हवाला की इस रिपोर्ट ने बोहरा कमेटी की उस रिपोर्ट को भी सतह पर ला दिया, जिसमें 93 के मुंबई ब्लास्ट के बाद नेताओं के तार अपराध-आतंक और ब्लैकमनी से जुड़े होने की बात कही गई। लेकिन तब जिक्र मीडिया के जरिए ही हो रहा था। सवाल पत्रकार ही उठा रहे थे। मीडिया संस्थान भी बेखौफ सत्ता-सियासत के भीतर की काई को उभार रहे थे।

अतीत के इन पन्नों को जिक्र इसलिए क्योंकि मौजूदा वक्त में जिन कागजों को लेकर हंगामा मचा है, उसमें पहली बार कोई भी सवाल पूछ सकता है कि आखिर ये कौन सा दौर है कि जिस दस्तावेज को केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा में उछाला, जिन कागजों को राहुल गांधी हर रैली में दिखा रहे हैं और जिन कागज-दस्तावेज के आसरे वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खठखटा रहे हैं और अब 11 जनवरी को सुनवाई होनी है। वह कागज मीडिया में पहले क्यों नहीं आये।

आखिर ये कैसे संभव है कि नेता ही नेताओं के खिलाफ कागज दिखा रहे हैं लेकिन किसी पत्रकार ने इन दस्तावेजों को पहले अखबार में क्यों नही छापा? किसी न्यूज चैनल के किसी पत्रकार को ये खबर पहले क्यों नहीं पता लगी? और अब जब राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाते हुए भूकंप लाने वाले हालात का जिक्र कर हवा में आरोपों को उछाल रहे हैं तो क्या वाकई किसी पत्रकार को भूकंप लाने वाली खबर की कोई जानकारी नहीं है या फिर मौजूदा दौर में जानकारी होते हुए भी पत्रकार कमजोर पड़ चुके हैं। मीडिया संस्थान किसी तरह की कोई ऐसी खबर ब्रेक करना नहीं चाहते, जहां सत्ता ही कटघरे में खड़ी हो जाए। तो क्या मौजूदा दौर में मीडिया की साख खत्म हो चली है या फिर सत्ता ने खुद पुरानी हर सत्ता से इतर कुछ इस तरह परिभाषित कर लिया है कि सत्ता की साख पर बट्टा लगाना लोकतंत्र के किसी भी खम्भे के बूते से बाहर हो चला है। या फिर लोकतंत्र के नाम पर लोकतंत्र को ही हड़प कर देशभक्ति का राग जिस तरह देश में गाया जा रहा है, उसमें मीडिया को भी पंचतंत्र के उस बच्चे का इंतजार का है जो भोलेपन से ही बोले लेकिन बोले और राजा को नंगा कह दे।

ये सवाल इसलिये बड़ा है क्योंकि जैन हवाला में तो सिर्फ निजी डायरी के पन्ने थे। लेकिन सहारा और बिरला के दस्तावेजों में बाकायदा खुले तौर पर या तो पूरे नाम हैं या फिर पद हैं। यानी किसी कंपनी की फाइल से निकाले गये कागज भर ही नहीं हैं बल्कि जिस अधिकारी ने छापा मार कागजों को जब्त किया उसके दस्तख्वत भी हैं। और चश्मदीद के तौर पर सहारा की तरफ से अधिकारी के भी हस्ताक्षर हैं। लेकिन मसला कागजों या दस्तावेजों से ज्यादा अपनी अपनी सुविधा से नेताओं का कागज का कुछ हिस्सा दिखाते हुये अपने अपने राजनीतिक लाभ के लिये कागजों की परिभाषा गढते हुये खुद को पाक साफ बताने या कहें सत्ता को कटघरे में खड़ाकर अपनी राजनीतिक जमीन बनाने की मशक्कत भी है।

मीडिया को लेकर असल सवाल यहीं से शुरू होता है कि जो भी देश का नामी अखबार या मीडिया हाउस आज की तारीख में राहुल गांधी के प्रधानमंत्री मोदी पर लगाये आरोपों को छापने-दिखाने की हिम्मत दिखा रहे हैं। क्या वाकई उन्हें पता ही नहीं था कि इस तरह के दस्तावेज भी हैं? या फिर ये कहें कि मौजूदाहालात ने हर किसी को इतना कमजोर बना दिया है कि वह सत्ता को लेकर कोई सवाल करना ही नहीं चाहता क्योंकि न्यायपालिका को लेकर भी उसके जहन में कई सवाल हैं। यानी ये भी सवाल है कि क्या न्याय का रास्ता भी सत्ता ने हड़प लिया है? क्योंकि प्रशांत भूषण भी जब सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस खेहर जो 3 जनवरी को चीफ जस्टिस बन जायेंगे। उन पर सुप्रीम कोर्ट में 14 दिसंबर को ये सवाल उठाने से नहीं चूकते कि, ‘ जब मामला पीएम को लेकर है और चीफ जस्टिस होने की फाइल पीएम के ही पास है तो उन्हें खुद को इस मामले से अलग कर लेना चाहिये।' तो क्या वाकई देश में ऐसा माहौल बन चुका है कि लोकतंत्र का हर पिलर पंगु हो चला है।

लेकिन यहां तो मामला लोकतंत्र के चौथे खम्भे यानी मीडिया का है। और चूंकि पहली बार केजरीवाल ने सहारा-बिरला के दस्तावेजों को नवंबर में विधानसभा में उठाया। नवंबर के शुरू में ही प्रशांत भूषण ने भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। और राहुल गांधी ने दस्तावेजों को दिसंबर में मुद्दा बनाकर प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधना शुरू किया। लेकिन मीडिया का सच तो यही है कि सारे दस्तावेज जून में ही मीडिया के सामने आ गये थे। और ऐसा भी नहीं है मीडिया अपने तौर पर दस्तावेजों को परख नहीं रहा था। और ऐसा भी नहीं है कि देश के जो राष्ट्रीय मीडिया इमरजेन्सी से लेकर जैन हवाला तक के दौर में कभी भी खबरों को लेकर सहमे नहीं।

सत्ता से लड़ते भिड़ते ही हमेशा नजर आये। और तो और मनमोहन सिंह के दौर के घपले घोटालों को भी जिस मीडिया हाउस ने खुलकर उभारा। वह सभी जून से नवंबर तक इन सहारा-बिरला के कागजों को दिखाने की हिम्मत दिखा क्यों नहीं पाये। जबकि सच यही है कि कागजों का पुलिंदा एक मीडिया हाउस के नकारने के बाद दूसरे मीडिया हाउस के दरवाजे पर दस्तक देता रहा। ऐसा भी नहीं है कि जून से नवंबर तक किसी मीडिया हाउस ने दस्तावेजों को परखा नहीं। हर मीडिया हाउस ने अपने खास रिपोर्टरों को दस्तावेजों के सच को जानने समझने के लिये लगाया।

बोफोर्स घोटालों को उजागर करने वाले मीडिया संस्धान ने सहारा के कागजों की जांच कर रहे अधिकारी को जयपुर में पकड़ा। जानकारी हासिल की, लेकिन फिर लंबी खामोशी। तो इमरजेन्सी के दौर मे इंदिरा की सत्ता से दो दो हाथ करने वाले मीडिया संस्थान ने तो कागजों को देख कर ही मान लिया कि देश के पहले तीन को छोड़कर कुछ भी छापा जा सकता है। लेकिन उन्हें छुआ नहीं जा सकता। जैन हवाला की डायरी के पन्नों को छापकर रातों रात देश में पत्रकारिता की साथ ऊंचा करने वाले मीडिया संस्थान ने तो कागज पर दस्तख्त करने वाले इनकम टैक्स अधिकारी से भी बात की और कांग्रेस के एक नेता के प्राइवेट सेकेट्री से भी बात कर कागजों की सच्चाई को परखा। लेकिन उसके बाद खामोशी ही बरती गई। एक रिपोर्टर ने तो वित्त मंत्रालय के भीतर सहारा के दस्तावेजों को लेकर चल क्या रहा है, उसे भी परखा। लेकिन अखबार के पन्नों पर कुछ भी नहीं आया। और तो और दस्तावेजों में जिन नेताओं को सहारा के जिन कारिंदो ने पैसा पहुंचाया, जब उनका नाम तक दर्ज है तो उन नामों तक भी कई मीडिया हाऊस पहुंचे।

यानी सहारा के कागजों में सहारा के ही जिन नामों का उल्लेख है....जो अलग अलग नेताओं को ब्रीफकेस पहुंचा रहे थे। वह नाम भी असली है और कोई दिल्ली में तो कोई लखनऊ में तो कोई मुंबई में सहारा दफ्तर का कर्मचारी है ये भी सामने आया लेकिन जून से नवंबर तक किसी मीडिया हाउस ने खबर को छुआ तक नहीं। मसलन जो ब्रीफकेस पहुंचा रहे थे या जिनके निर्देश पर ब्रीफकेस देने का जिक्र सहारा के कागजो में है, उसमें उदय , दारा , सचिन , जैसवाल , डोगरा का ही जिक्र सबसे ज्यादा है। और ये सारे नाम लखनऊ में सहारा सेक्रटियट से लेकर दिल्ली दफ्तर और सहारा के मुंबई गिरगांव दफ्तर में काम करने वाले लोगों के नाम हैं।

ये भी सच निकल कर आया। लेकिन फिर भी खबर मीडिया में क्यों नहीं आई। इतना ही नहीं मुंबई के एक मीडिया संस्थान ने भी दस्तावेजों को खंगाल कर मुंबई के जिस पते से करोड़ों रुपये खाते में आ रहे थे, उसे भी खंगाला। यानी कोई खास इन्वेस्टिगेटिव पत्रकारिता करने भी जरुरत नहीं रही। सिर्फ कागज में दर्ज उस पते पर रिपोर्टर पहुंचा। जानकारी हासिल की। लेकिन खबर कहीं नहीं आई। तो क्या मीडिया की लंबी खामोशी सिर्फ मौजूदा वक्त की नब्ज बताने वाली है या फिर पहली बार देश के सिस्टम को ही कागजों में दर्ज राजनीतिक हमाम में बदल दिया गया है। क्योंकि कागजों में तो राजनीतिक दलों को रुपया बांटने में समाजवाद बरता गया। यानी सहारा दफ्तर से कुछ हाथों से लिखे पन्ने। कुछ कंप्यूटर से निकाले गये पन्ने तो कुछ नेताओं के नाम वाले पन्नो के पुलिन्दे बताते हैं कि कैसे चिटफंड के जरिये अरबों का टर्नओवर जब कोई कंपनी पार कर मजे में है तो सिर्फ गरीबों के पैसो से सपने बेचने भर का खेल नहीं होता बल्कि राजनीतिक व्यवस्था ही उसके दरवाजे पर कतार लगाये कैसे खड़ी रहती है।

ये दस्तावेज उसी का नजारा भर है। और यहीं से भारतीय मीडिया का वह सच उभरता है कि अगर जून से नवंबर तक तमाम मीडिया को अगर ये कागज फर्जी लग रहे थे तो नवंबर के बाद से राजनीतिक गलियारे में ही जब ये कागज हवा में लहराये जा रहे है तो कोई मीडिया ये कहने की हिम्मत क्यों नहीं दिखा पा रहा है कि उसकी जांच में तो सारे कागजात फर्जी थे। और चूंकि ऐसा हो नहीं रहा। होगा भी नहीं। तो क्या करप्शन या क्रोनी कैपटिलिज्म के कटघरे को ही देश का सिस्टम बना दिया गया है। और पहली बार मीडिया का मतलब सिर्फ मीडिया घराने नहीं बल्कि पत्रकारिता करते संपादक समूह भी अपाहिज सा हो चला है। या फिर देश में वातावरण ही 2014 के सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक शून्यता का कुछ ऐसा बना है कि जो सत्ता में है वह खुद को पूर्व तमाम सत्ता से अलग पेश कर राष्ट्रीय हित में सत्ता चलाने का दावा कर रहा है। सत्ता पार्टी या संवैधानिक संस्थाओं तक को खारिज कर मॉस कम्युनिकेशन/सोशल मीडिया के जरिये जनता से सीधे संवाद कर इस एहसास को जनता के बीच जगा रही है जहां संस्थानों की जरुरत ही ना पड़े। और जनता की आवाज ही कानूनी जामा पहने हुये दिखायी दे। और मीडिया या उसमें काम कर रहे पत्रकारों को अगर ये लग भी रहा है कि सत्ता राष्ट्रीयता के नाम को ही भुना रही हैं तो भी उसकी आवाज नहीं निकल पा रही है क्योंकि या तो देश में कोई राजनीतिक विकल्प कुछ है ही नहीं। या फिर नैतिकता की जिस पीठ पर सवार हो कर सत्ता देश को हांक रही है उसमें बाजार व्यवस्था में लोकतंत्र के हर पाये ने बीते दौर में नैतिकता ही गंवा दी है तो वह कुछ बोले कैसे। ऐसे में लोकतंत्र मतलब ही यही है कि करप्शन देश का मुद्दा हो सकता है। करप्शन के नाम पर सत्ता पलट सकती है। जनता की भावनाओं को राजनीतिक दल अपने पक्ष में कर सकते है लेकिन जो भ्रष्ट हैं, वह सभी मिले हुये है। यानी एक सरीखे हैं। और लोकतंत्र का हर पाया भी दूसरे पाये की कमजोरियों को ढंकने के ही काम आता है। और लोकतंत्र की निगरानी रखने वाला मीडिया भी उसी कतार में जा खड़ा हुआ है। तो क्या 1996 के जैन हवाला के डायरी के पन्नों से निकली सियासत और मीडिया की बुलंद आवाज बीस बरस बाद 2016 में सहारा-बिरला के दस्तावेजों तले दफन हो चली है। यहां से आगे का रास्ता अब सिर्फ लोकतंत्र के राग को गाते हुये जयहिन्द बोलने भर का बचा है। ये सवाल है। मनाइये कि यह सवाल जवाब ना बन जाये। और इसके लिये 11 जनवरी 2017 का इंतजार करना होगा। क्योंकि इसी दिन सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि सहारा-बिरला वाले कागजात फर्जी है या जांच होनी चाहिये। लेकिन चाहे अनचाहे ये तो तय हो गया कि 2016 मीडिया के रेंगने के लिये याद किया जायेगा।

(साभार: फेसबुक वॉल से)

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आपमें खबर को समझने-समझाने की गजब शक्ति थी, पर इंसान नहीं पहचान पाए: चंदन प्रताप

कई दिनों से आपसे बात करने को जी चाह रहा था। सोचा कि आज कर लूं। क्योंकि आज आपकी बरसी पर बहुतों को मर्सिया पढ़ते देख रहा हूं...

Samachar4media Bureau by Samachar4media Bureau
Published - Tuesday, 27 June, 2017
Last Modified:
Tuesday, 27 June, 2017
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चंदन प्रताप सिंह

न्यू मीडिया जर्नलिस्ट ।।

कई दिनों से आपसे बात करने को जी चाह रहा था। सोचा कि आज कर लूं, क्योंकि आज आपकी बरसी पर बहुतों को मर्सिया पढ़ते देख रहा हूं। खैर, हम अपनी बातें करते हैं। मुझे अब आपकी वो नसीहत बहुत याद आती है, जब आप बार-बार मुझे पत्रकार बनने से रोकते थे। निर्मल दा के जरिए बहुत सारी बातें समझाई थीं। तब मुझे आपकी नसीहतें और बहुत सारी बातें समझ में नहीं आई। लेकिन आज समझ में आ रही है, जब आप नहीं हैं।

मुझे उस समय आपकी बहुत याद आई, जब मैं बहुत बीमार था। अस्पताल में बार-बार आपका चेहरा घूमता था। आप हमेशा कहते थे ना कि दुनिया में खून से भी बड़े तीन तरह के रिश्ते होते हैं। एक पैसे का, दूसरा मतलब का और तीसरा दिल का। सच कहता हूं आपसे अब मुझे तीनों रिश्तों की पहचान हो गई है।

उस समय आपसे कह नहीं पाता। लेकिन आज मैं कह सकता हूं। आपमें खबर को समझने और समझाने की गजब की शक्ति थी, लेकिन आप इंसान नहीं पहचान पाए। जिन लोगों को आपने गढ़ा। जो लोग आपके सामने धर्म, जाति और लालच से ऊपर उठकर होने का दावा किया करते थे, आज उन्हीं लोगों को उन्हीं कीचड़ों में लथपथ देखता हूं। तब पता नहीं क्यों लगता है कि आप शायद ऐसे लोगों को पहचान नहीं पाए या पहचान कर भी अनजान बने रहे।

आपका मैं कभी एकलव्य तो नहीं बन पाया। लेकिन यकीन मानिए कि एकलव्य से कम भी नहीं हूं। पच्चीस बरस की पत्रकारिता में मैंने भी बहुत पापड़ बेल लिए। आज मुझे कहने में कोई संकोच नहीं और ना ही किसी का खौफ कि आपके दौर की पत्रकारिता स्वर्णिम दौर की थी। तब पत्रकार पार्टी के अध्यक्ष तो क्या प्रधानमंत्री से भी तीखे सवाल पूछने में रत्ती भर नहीं डरते थे। आज के पत्रकारों की प्रवक्ताओं और धनबल-बाहुबल में चूर नेताओं से सवाल पूछने में सांसें फूल जाती हैं। स्टूडियो में बिठाकर मंत्रियों से ऐसे सवाल करते हैं मानों या तो ककहरा सीख रहे हों या फिर कटोरा भर तेल और मक्खन लेकर मालिकों ने उन्हें इसी काम के लिए एयर किया हो।

आज तो मुझे कुकुरमुत्ते की तरह उग आए चैनलों में ऐसे कई प्रधान संपादक और सीईओ भी टकराए लेकिन जो हिंदी वर्तनी में अपना नाम भी शुद्ध नहीं लिख सकते। फिर आपकी याद आती है। आप बचपन  में एक किस्सा सुनाया करते थे कि कैसे जैन घरानें में बाटा कंपनी से एक जीएम आया था। वो उस घराने के बड़े संपादकों पर छड़ी फिराने का शौक रखता था और बड़े शान से कहता था कि आई डोंट नो इवन दा का, खा, गा ऑफ हिंदी। बट आई हेडिंग हिंदी मैगजीन्स। फिर आप लोगों ने कैसे उसे चलता किया। सोचता हूं कि एक दिन ये लोग भी चलते होंगे।

आपने कई बार सार्वजनिक मंचों से कहा कि अब कई पत्रकारों ने इस पेशे को बदनाम कर दिया है। वसूली और रिश्वतखोरी की वजह से लोग पत्रकारों से भी उसी तरह डरने लगे हैं, जैसे कि वो पुलिसवालों से डरते हैं। आपकी बात सोलहों आने सच साबित हो रही है। पहाड़ पर वसूली का धंधा चलाते हैं। फिर कानून के डर से भागकर मैदान में आ जाते हैं और ये सब हो रहा है पत्रकारिता के नाम पर।

आपसे बहुत सारी बातें करनी हैं। कुछ घर की, कुछ परिवार की, कुछ नाते-रिश्तदारों की और कुछ पत्रकारिता की भी। वो तमाम बातें आपसे खुलकर और बिना डरे हुए करना चाहता हूं, जो इस जन्म में नहीं कर पाया। बहुत जल्द मिलूंगा आपसे। आपके पास आकर। फिर करुंगा अपनी मन की बात। इस बार आप सिर्फ सुनेंगे। और हां, इस बार आप जो कहेंगे, मैं उस पर अमल करुंगा।


 

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वरिष्ठ पत्रकार सुप्रिय प्रसाद ने बताया, कुछ यूं एसपी ने लालू को कराया था चुप

उन खुशनसीब पत्रकारों में मेरा नाम भी शामिल है, जिन्हें एसपी के साथ काम करने का मौका मिला...

Samachar4media Bureau by Samachar4media Bureau
Published - Wednesday, 27 June, 2018
Last Modified:
Wednesday, 27 June, 2018
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सुप्रिय प्रसाद

मैनेजिंग एडिटर, टीवी टुडे ग्रुप

उन खुशनसीब पत्रकारों में मेरा नाम भी शामिल हैजिन्हें एसपी के साथ काम करने का मौका मिला। एसपी ने 1 जुलाई 1995 को 'आजतक' जॉइन किया था। लेकिन मैं उनसे ठीक बीस दिन पहले यानी 10 जून को ही 'आजतक' आ गया था। जॉइन करने के बाद एसपी ने कायदे से एंकरिंग का अभ्यास किया था। 17 जुलाई 1995 को दिल्ली दूरदर्शन पर 20 मिनट के न्यूज शो के रूप में आजतक शुरू हुआ था। एसपी के साथ काम करने का तजुर्बा अपनेआप में अनोखा था। खबरों के प्रति उनकी दीवानगी को देख हमलोग हैरान थे। वे रोज कई क्षेत्रीय अखबारों समेत 40 से 50 अखबार पढ़ते थे। कई बार तो खुद कई ब्यूरो चीफ को फोन कर बताते थे कि उनके शहर या इलाके में कौन सी खबर है और उसे कैसे कवर करना है।


आजतक में तब मुझे तीन महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर ट्रेनी रिपोर्टर के रूप में काम करने का मौका मिला था। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तब तकनीकी रूप से इतना समृद्ध भी नहीं था। मेरा कॉन्ट्रैक्ट 10 सितंबर को पूरा होने वाला था, उससे पहले ही मैं एसपी के पास पहुंच गया और पूछ बैठा कि सर तीन महीने पूरे होने वाले हैं अब बता दीजिए कि 10 सितंबर के बाद आना है या नहीं। एसपी हंस पड़े और बोले कि आपके काम से मैं बहुत खुश हूं और आप मेरे साथ काम कर रहे हैं। तभी मुझे असिस्टेंट न्यूज को-ऑर्डिनेटर का पद दिया गया।

एसपी के साथ काम करने में सबसे बड़ी सुविधा थी उनकी सहज उपलब्धता। उनसे हर कोई सहज ही मिल सकता था और कुछ भी पूछ सकता था। खेल हो या बिजनेसराजनीति हो या चुनाव, हर विषय पर उनकी पकड़ अद्भुत थी। आजतक के शुरुआती दौर में एसपी हर खबर की एक-एक लाइन पढ़ते थे, और फिर उस पर अपनी राय देते थे। खबरों को लेकर उनसे सीधा जुड़ाव होने के कारण ही मुझे उनसे इंटरैक्शन का पूरा मौका भी मिला।

शो की शूटिंग के दौरान कई मजेदार घटनाएं भी घटती रहती थीं। मुझे याद है एक ऐसी ही मजेदार घटना तब घटी थी जब लालू प्रसाद यादव गेस्ट के रूप में स्टूडियो आए थे। लालू यादव उस समय बिहार के मुख्यमंत्री थे। स्टूडियो में लालू यादव और एसपी के बीच सवाल-जवाब का दौर शुरू हो गया। इंटरव्यू रिकार्ड हो रहा था। उस समय किसी का भी इंटरव्यू चार मिनट से ज्यादा नहीं जा सकता था,  क्योंकि शो ही 20 मिनट का था। अब लालू ने पहले सवाल के जवाब में बोलना शुरू किया तो बोलते ही चले जा रहे थे। दूसरा सवाल पूछने के लिए एसपी उन्हें रुकने का इशारा करने लगे, लेकिन लालू उस समय कहां किसी का इशारा समझते थे। इधर जब एसपी ने देखा कि लालू को इशारा करना समय गंवाना है तो अंत में उन्होंने लालू के पैर पर ही अपना पैर जोर से मार दिया। तब जाकर लालू के बोलने पर ब्रेक लगा।

एसपी सिंह अपने आप में पत्रकारिता के विश्वविद्यालय थे। खबरों को लेकर उनका जुनून था तो विजन भी था। जो भी उनके साथ रहाबहुत कुछ सीख गया। एसपी के साथ काम करके ही मेरी बुनियाद मजबूत हो पाई, जिस पर आज मैं खड़ा हूं।

 

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