जानें, क्यों न्यूज चैनल्स पर मेहरबान हो रहे हैं एडवरटाइजर्स

एफएमसीजी सेक्टर की ओर से न्यूज चैनल्स पर दिए जाने वाले विज्ञापनों में आई है काफी बढ़ोतरी

Last Modified:
Friday, 17 May, 2019
News Channel

न्यूज चैनल्स की व्युअरशिप में इस साल काफी उछाल देखने को मिला है, फिर चाहे वो हिंदी चैनल हों, अंग्रेजी हों अथवा रीजनल चैनल ही क्यों न हों। दरअसल, इस साल कई ऐसी बड़ी घटनाएं हुई हैं, जिनकी वजह से न्यूज चैनल्स की व्युअरशिप में यह इजाफा हुआ है। इनमें हम पुलवामा में हुए आतंकी हमले, पाकिस्तान पर भारत की ओर से की गई एयर स्ट्राइक और अब लोकसभा चुनाव का उदाहरण ले सकते हैं। न्यूज चैनल्स ने इन सभी घटनाओं को काफी बड़े स्तर पर कवर किया है और व्युअरशिप बढ़ने से एडवर्टाइजर्स ने भी इस जॉनर में काफी रुचि दिखाई है। यही कारण है कि न्यूज चैनल्स पर ‘फास्ट मूविंग कंज्यूमर्स गुड्स’ (FMCG) ब्रैंड्स के विज्ञापनों में भी काफी बढ़ोतरी हुई है। यानी कह सकते हैं कि इसके पीछे सिर्फ चुनाव ही कारण नहीं है, बल्कि अन्य बड़ी घटनाओं के चलते भी ऐसा हुआ है।  

इस बारे में हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने इंडस्ट्री से जुड़े कुछ दिग्गजों से बात की, जिनका कहना है कि फ्रीडिश प्लेटफॉर्म से कुछ जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स (GECs) के हटने के कारण भी एफएमसीजी ब्रैंड्स की ओर से न्यूज चैनल्स को दिए जाने वाले विज्ञापन में बढ़ोतरी हुई है।

इस ट्रेंड के बारे में ‘रिपब्लिक टीवी’ (Republic TV) के सीईओ विकास खनचंदानी का कहना है, ‘न्यूज चैनल्स को बड़ी संख्या में एफएमसीजी ब्रैंड्स के विज्ञापन सिर्फ चुनाव की वजह से नहीं मिल रहे हैं, बल्कि इसके पीछे तमाम कारण है। ऐसा इसलिए हो रहा है कि हिंदी न्यूज खासकर ‘फ्री टू एयर’ (FTA) चैनल्स की पहुंच आज के दिनों में बहुत ज्यादा है। सबसे खास बात यह है कि बड़ी संख्या में ग्रामीण ऑडियंस भी इन चैनल्स से जुड़ रहे हैं, क्योंकि बड़े एंटरटेनमेंट चैनल्स फ्रीडिश प्लेटफॉर्म पर मौजूद नहीं हैं। हिंदी न्यूज चैनल्स पर एफएमसीजी ब्रैंड्स की मौजूदगी इसलिए भी बढ़ी है कि उनके पास ऑडियंस के लिए चुनिंदा प्लेटफॉर्म ही उपलब्ध हैं। फ्रीडिश पर चुनिंदा मूवीज, न्यूज और म्यूजिक चैनल ही उपलब्ध हैं, ऐसे में इन ब्रैंड्स की व्युअरशिप इस तरह के चैनल्स पर कम है और यही कारण है कि न्यूज चैनल्स की व्युअरशिप ज्यादा होने से ये ब्रैंड्स इस तरफ का रुख कर रहे हैं।’

एक रिपोर्ट्स के अनुसार, कई बड़े ब्रॉडकास्टर्स ने भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) के नए टैरिफ ऑर्डर लागू होने के बाद अपने हिंदी एंटरटेनमेंट चैनल्स को डीडी फ्रीडिश प्लेटफॉर्म से हटा लिया है। इनमें ‘कलर्स रिश्ते’ (Colors Rishtey) और ‘जी अनमोल’ (Zee Anmol) जैसे कई चैनल्स शामिल हैं।

इस बारे में ‘एबीपी न्यूज नेटवर्क’ (ABP News Network) के सीईओ अविनाश पांडे ने जोर देकर कहा, ‘एफएमसीजी ब्रैंड्स के लिए न्यूज जॉनर हमेशा से काफी फायदे का सौदा रहा है। जैसे- पतंजलि, इमामी, डाबर आदि न्यूज जॉनर पर काफी खर्च करने वालों में शामिल हैं। यहां तक कि कोलगेट ने भी पिछली साल और उससे भी पिछली साल न्यूज जॉनर में विज्ञापन पर काफी खर्च किया था।‘

हालांकि उन्होंने यह भी माना कि टियर-टू (Tier-II) शहरों में जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स की गैरमौजूदगी ने न्यूज चैनल्स के आगे बढ़ने में काफी मदद की है। अविनाश पांडे ने कहा, ‘यदि आप आजकल की टीवी की दुनिया को देखें तो डीडी फ्रीडिश के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में न्यूज देखने वालों की संख्या में बहुत ज्यादा वृद्धि हुई है। यदि हम डीडी फ्रीडिश के पैटर्न को देखें तो सबसे पहले इस पर न्यूज जॉनर ही आया था, ऐसे में उसी का विस्तार हुआ है। आखिर, कोई भी सर्विस प्रोवाइडर तभी अपना विस्तार करेगा, जब उसके पास कंटेंट होगा। इसके बाद टियर-टू (Tier-II) शहरों में इस प्लेटफॉर्म पर जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स शामिल हुए, जिन्हें अब हटा लिया गया है। यही कारण है कि इन जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स की पहुंच काफी घट गई है।’  

अविनाश पांडे का कहना है, ‘इन दिनों लोकसभा चुनाव की कवरेज के कारण न्यूज जॉनर में लगभग दोगुना इजाफा हुआ है, ऐसे में डीडी फ्रीडिश पर कुछ जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स की कमी के कारण एफएमसीजी समेत प्रॉडक्ट निर्माताओं के लिए हिंदी न्यूज काफी बेहतरीन माध्यम बन गया है। यही नहीं, जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स के मुकाबले न्यूज चैनल्स पर इन कंपनियों का खर्च भी कम आ रहा है। जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स पर किए जाने वाले खर्च के लगभग आधे में ही इन ब्रैंड्स की पहुंच 90 मिलियन से 100 मिलियन लोगों तक हो रही है। एडवर्टाइजर्स को यह समझना चाहिए कि यह काफी प्रभावी मॉडल है और निश्चित रूप में टियर टू (Tier-II) शहरों में जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स की गैरमौजूदगी ने न्यूज चैनल का शेयर बढ़ाने में काफी मदद की है।’

इस बारे में ‘इमामी लिमिटेड’ (Emami Ltd) के सीनियर वाइस प्रेजिडेंट (मीडिया) बशाब सरकार (Bashab Sarkar) ने बताया कि कैसे उनकी कंपनी के लिए यह एक वरदान की तरह रहा है। उन्होंने कहा, ‘यह बात सही है कि फरवरी के मध्य में हुई डीडी फ्रीडिश की नीलामी में कई बड़े चैनल नेटवर्क्स ने हिस्सा नहीं लिया, जिसका प्रभाव मार्च से उनके फ्री टू एयर जनरल एंटरटेमेंट चैनल की रेटिंग पर पड़ा। ऐसे में फ्रीडिश पर बचे चैनलों को फायदा हुआ। यह इमामी जैसे उन एडवर्टाइजर्स के लिए एक तरह से वरदान साबित हुआ, जो ग्रामीण क्षेत्रों पर फोकस करते हैं। दरअसल चुनाव और अन्य बड़ी घटनाओं के कारण इन क्षेत्रों में हिंदी न्यूज चैनल्स देखने वालों की संख्या काफी बढ़ने से उनके एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू में भी काफी इजाफा है।’

वहीं, ‘डाबर इंडिया लिमिटेड’ (Dabur India Ltd) के हेड (मीडिया) राजीब दुबे ने भी इस बात से सहमति जताई है कि डीडी फ्रीडिश से जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स के हटने का असर दिखा है। उन्होंने कहा, हम न्यूज जॉनर में निवेश करना जारी रखेंगे, क्योंकि बड़ी संख्या में लोग इसे देखते हैं। इससे बड़ी संख्या में व्युअरशिप मिलती है।

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प्रेस काउंसिल के सदस्यों का फूटा गुस्सा, चेयरमैन के इस कदम का किया विरोध

काउंसिल के कई सदस्यों ने कहा, 22 अगस्त को हुई बैठक में इस बारे में कोई निर्णय नहीं लिया गया था और न ही यह मामला एजेंडे में शामिल था

Last Modified:
Monday, 26 August, 2019
Press Council

कश्मीर में अनुच्छेद-370 खत्म करने के बाद मीडिया पर प्रतिबंध लगाने के सरकार के फैसले का प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) ने भी समर्थन किया है। काउंसिल ने इस बारे में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी दायर की है। वहीं, काउंसिल के इस कदम को लेकर कुछ सदस्यों ने अपनी नाराजगी जताई है। इन सदस्यों का कहना है कि इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने से पहले न तो उनसे सलाह ली गई और न ही उन्हें इस बारे में बताया गया।    

बता दें कि प्रेस काउंसिल ने सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका कश्मीर टाइम्स (Kashmir Times) की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन द्वारा दायर याचिका के खिलाफ दायर की है। अपनी याचिका में अनुराधा भसीन का कहना था कि घाटी में मीडिया पर प्रतिबंध लगाए गए हैं और पत्रकारों को उनका काम नहीं करने दिया जा रहा है।

पढ़ेंः मीडिया से जुड़े इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं महिला संपादक

वहीं, एडवोकेट अंशुमान अशोक की तरफ से शुक्रवार को दायर याचिका में पीसीआई ने मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंधों को यह कहते हुए सही ठहराया है कि सुरक्षा चिंताओं के मद्देनजर मीडिया पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। पीसीआई का कहना है कि चूंकि भसीन की याचिका में एक तरफ स्वतंत्र और निष्पक्ष रिपोर्टिंग के लिए पत्रकारों/मीडिया के अधिकारों पर चिंता जताई गई है, वहीं दूसरी ओर अखंडता और संप्रभुता का राष्ट्रीय हित है। ऐसे में काउंसिल का मानना है कि उसे शीर्ष अदालत के समक्ष अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करना चाहिए। पीसीआई की ओर से इस बारे में सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप करने की मांग की गई है।

इस बीच प्रेस एसोसिएशन के प्रेजिडेंट और प्रेस काउंसिल के मेंबर जयशंकर गुप्ता ने इस निर्णय को मनमाना बताते हुए कहा कि प्रेस काउंसिल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक संस्था है और यह सरकार का टूल नहीं बन सकती है। वहीं, अन्य सदस्यों का कहना है कि दिल्ली के पत्रकार पीसीआई की इस याचिका के खिलाफ हैं और वे चेयरमैन के साथ नहीं हैं।

सदस्यों का कहना है कि पीसीआई ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करने से पूर्व उन्हें औपचारिक रूप से कोई जानकारी नहीं दी और न ही यह विषय एजेंडा में शामिल था। नियमों के मुताबिक इस तरह का निर्णय लेने से पूर्व काउंसिल को सूचित किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्णय लेना चेयरमैन का अपना दृष्टिकोण हो सकता है, लेकिन यह काउंसिल का दृष्टिकोण नहीं है। इन सदस्यों का कहना है, ‘काउंसिल के सद्स्यों की 22 अगस्त को हुई बैठक में इस याचिका के बारे में कोई निर्णय नहीं लिया गया था।’

जयशंकर गुप्ता ने काउंसिल के एक अन्य सदस्य और प्रेस एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी सीके नायक के साथ एक बयान जारी करते हुए कहा कि याचिका दायर करने में प्रेस काउंसिल के चेयरमैन के कदम पर प्रेस एसोसिशशन ने गंभीर रुख अपनाया है। दोनों सदस्यों ने इस बात पर भी काफी आश्चर्य जताया है कि इस मामले में काउंसिल को भरोसे में नहीं लिया गया।

वहीं, प्रेस काउंसिल के चेयरमैन और सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस (रिटायर्ड) सीके प्रसाद का कहना है कि देश में पत्रकारिता की सुरक्षा के लिए काउंसिल ने यह कदम उठाया। काउंसिल के सदस्यों को इस बारे में भरोसे में न लिए जाने के बारे में उनका कहना था कि आवेदन 15 दिन पहले दायर किया गया था, क्योंकि यह मामला अदालत के सामने एक-दो दिन में आना था और इतनी जल्दी काउंसिल की बैठक बुलाना संभव नहीं था। उन्होंने कहा कि इमरजेंसी में चेयरमैन को यह अधिकार है कि वह इस तरह के निर्णय ले सकता है और यह जरूरी नहीं है कि हर समय काउंसिल की मीटिंग बुलाई जाए।

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बदमाशों के निशाने पर आया एक और पत्रकार, गई जान

दुनियाभर की मीडिया पर नजर रखने वाली संस्था ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ ने पीड़ित परिजनों के हवाले से बताया कि पिछले साल जून और नवंबर में पत्रकार को धमकी मिली थी

पंकज शर्मा by पंकज शर्मा
Published - Monday, 26 August, 2019
Last Modified:
Monday, 26 August, 2019
Murder

पत्रकारों को अपने काम के दौरान तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। आए दिन पत्रकारों पर हमले की घटनाएं सामने आती रहती हैं। अब मेक्सिको में एक न्यूज वेबसाइट के प्रमुख की चाकू घोंपकर हत्या करने का मामला सामने आया है। इस देश में इस साल अब तक 10 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। बताया जाता है कि 42 वर्षीय पत्रकार नेविथ कोंडेस जारमिलो स्थानीय न्यूज वेबसाइट 'तेजुपिल्को' के प्रमुख और सामुदायिक रेडियो स्टेशन के प्रेजेंटर थे। शनिवार की सुबह उनका शव बरामद हुआ।

दुनियाभर की मीडिया पर नजर रखने वाली संस्था ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ (Reporters Without Borders) ने मृतक पत्रकार के परिजनों के हवाले से बताया कि जारमिलो को पिछले साल जून और नवंबर में धमकी मिली थी। उन्होंने संघीय सरकार से अपने लिए सुरक्षा की मांग की थी, लेकिन नौकरशाही से जुड़ी प्रक्रियाओं के चलते उन्होंने सुरक्षा मानदंडों को मानने से इनकार कर दिया था। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2000 से अब तक मेक्सिको में करीब 100 पत्रकार मारे गए हैं।

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जानें, अचानक क्यों एम्बुलेंस के आगे भागने लगे CM के मीडिया सलाहकार

टोटल टीवी के वरिष्ठ पत्रकार विनोद लाम्बा ने इस पूरे घटनाक्रम को अपने कैमरे में कैद कर लिया और फेसबुक पर शेयर कर दिया

Last Modified:
Monday, 26 August, 2019
Media Advisor

हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर के मीडिया सलाहकार हैं अमित आर्या। अब जबसे सत्ता की राजनीति में कम अनुभवी खट्टर साहब ने हरियाणा के सीएम का पद संभाला है, गिनती के कुछ लोग उनकी आंख-कान की तरह काम कर रहे हैं, जिनमें अमित आर्या भी प्रमुख हैं। परदे के पीछे का ये खिलाड़ी अचानक से उस समय चर्चा में आ गया, जब सीएम के काफिले के चलते एक एम्बुलेंस अटक गई और पुलिस या सुरक्षाकर्मियों को ऑर्डर देने के बजाय वो खुद सड़क पर एम्बुलेंस के आगे भागने लगे, ताकि उसे जल्द से जल्द रास्ता मिल जाए।

हरियाणा में चुनाव सर पर हैं और खट्टर जन आशीर्वाद यात्रा निकाल रहे हैं। ऐसे में एक बड़ा काफिला उनके साथ चल रहा है। सालों तक मीडिया में काम कर चुके अमित आर्या ये बखूबी जानते समझते हैं कि मीडिया पॉजीटिव खबरों के बजाय नेगेटिव खबरों को ज्यादा तवज्जो देती है। इसलिए सीएम की इस पूरी यात्रा के दौरान काफिले पर नजर रख रही मीडिया को कोई ऐसी खबर न मिल जाए, जिससे सीएम की फजीहत हो, वो पूरी नजर रख रहे हैं।

तभी तो जब हरियाणा के गोहाना में एक एम्बुलेंस सीएम के काफिले के चलते अटकने लगी तो अमित आर्या ने कार में बैठे-बैठे इंतजार करना या ऑर्डर देना मुनासिब न समझा, बल्कि खुद सड़क पर दौड़ने लगे और एम्बुलेंस को रास्ता दिलाकर ही वापस लौटे। लेकिन टोटल टीवी के वरिष्ठ पत्रकार विनोद लाम्बा ने इस पूरे घटनाक्रम को अपने कैमरे में कैद कर लिया और फेसबुक पर शेयर कर दिया।

इस वाकए के बाद जब सोनीपत जिले के ही गन्नोर में सीएम खट्टर ने रोड पर ही सभा के वक्त एक एम्बुलेंस का साइरन सुना तो खुद ही माइक से एम्बुलेंस को रास्ता देने के लिए सभा खत्म करने का ऐलान कर दिया। हाल ही में सीएम खट्टर के कश्मीरी लड़कियों वाले बयान के बाद उठे बवाल को जिस तरह तेजी से थाम लिया गया, उसके लिए भी अमित आर्या की एम्बुलेंस वाली तेजी को ही क्रेडिट जाता है।  

अमित आर्या का वो एम्बुलेंस वाला विडियो विनोद लाम्बा ने अपनी फेसबुक वॉल पर शेयर किया है, जिसे आप यहां देख सकते हैं।

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‘कितना विशाल व्यक्तित्व समेटे हुए थे जेटली जी, उस दिन अहसास हुआ’

जेटली जी सामने हों और चर्चा-परिचर्चा न हो, ऐसा कैसे मुमकिन है? लेकिन आश्चर्य कि उस दिन बात राजनीति से हटकर हुई

Last Modified:
Sunday, 25 August, 2019
Rakhee Bakshee

राखी बख्शी, वरिष्ठ पत्रकार।।

दोपहर में जब अरुण जेटली के दुनिया से अलविदा कह देने की खबर चलने लगी तो अचानक एक छोटी सी मुलाकात आंखों में घूम आयी। एक प्रतिबद्ध राजनीतिज्ञ, एक बुद्धिजीवी और एक रणनीतिकार व्यक्तित्व। इतना विशाल कि शब्दों की शायद कमी पड़ जाए। एक बार जब जेटली जी से मुखातिब हुई थी तो अलग व्यक्तित्व ही सामने थे। किसी के आमंत्रण पर मैं ठीक समय पर पहुंची थी। सामने के सोफे पर अरुण जेटली बैठे हुए थे। जेटली जी सामने हों और चर्चा-परिचर्चा न हो, ऐसा कैसे मुमकिन है? लेकिन आश्चर्य कि उस दिन बात राजनीति से हटकर हुई। चर्चा का केंद्र बना संगीत। बात संतूर पर शुरू हुई और कौतूहल बढ़ता गया। एक स्पष्ट तर्कसंगत व्यक्तित्व की कोमलता की परत खुलने लगी।

अपनी राजनैतिक गतिविधियों और व्यस्तताओं को एक ओर रख एक मर्मज्ञ की तरह अरुण जेटली जी संतूर की परत दर परत खोलने लगे। शिवकुमार शर्मा की संतूर के साथ जादूगरी की प्रशंसा उनकी आंखों को चमकदार बनाती गई। मैं मंत्रमुग्ध अपने द्वंद्व से जूझती आश्चर्य से भरी हुई किसी अनछुए पहलू के अनायास ही सामने आने से विस्मृत थी। अभी कोई दूसरा पहुंचा नहीं था और जेटली जी ने बताया कि उन्हें शॉल बहुत पसंद है। जामावत शॉल उनकी पसंदीदा शॉल में से एक थी। कितना विशाल व्यक्तित्व समेटे हुए थे जेटली जी, उस दिन अहसास हुआ।

दिल्ली में छात्र राजनीति से शुरुआत, फिर इमरजेंसी का विरोध, उसके बाद वकालत की शुरुआत और नब्बे के दशक में भाजपा से जुड़ना। जेटली जी को उस मुलाकात के बाद जब-तब देखा सुना और समझा तो बार-बार ये लगा कि सिर्फ विषय की तह तक जाकर उसे तर्कसंगत बनाना ही जेटली जी का मकसद नहीं होता था। बल्कि पेश आईं समस्याओं के समाधान में उनकी रुचि होती थी और जन-सामान्य के लिए क्या बेहतर और कैसे बेहतर हो सकता है, ये उनका लक्ष्य था। भाव हमेशा स्थाई और गंभीर होने के बावजूद एक मानवीय पहलू ऐसा जो हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहता था। व्यक्तिगत क्षमता में भी जाकर उनका किसी दूसरे की मदद करना और किसी पद पर रहते हुए व्यक्ति को पीछे छोड़ संस्था व देश के कानून के साथ संतुलन साधना ये सार्वजनिक जीवन का सार है, जिसे उन्होने पूरी तरह से चरितार्थ किया।

राजनीति में सक्रिय होने के बाद उन्होंने संगठन से लेकर सरकार तक में कई पदों को संभाला, लेकिन पदभार को सिर्फ कर्तव्य मान उनका निर्वहन करना और सादगी के साथ कार्यकाल पूरा हो जाने पर उसे बिना हिचक छोड़ देना ये अनुशासित व्यक्तित्व ही कर सकता है। जेटली जी ने राष्ट्र के लिए जरूरी कानून में सुधारों तक जैसे कई आमूलचूल परिवर्तनों को अंजाम दिया। 2014 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था को दुनिया की पांच बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल कराना। ईज ऑफ डूइंग बिज़नेस रैंकिंग में भारत की छलांग, निवेश का बढ़ना, महंगाई दर पर गजब का नियंत्रण, बैंकिंग सेवाओं में सुधार और एनपीए के भस्मासुर को काबू में लगा सिर्फ और सिर्फ उनके जैसे साधक के वश में ही था। संघीय ढांचे को बनाए रखते हुए जीएसटी जैसा बड़ा कर सुधार लागू करवाना उन बड़े कदमों में से एक था, जिन्होंने एक-एक कर भारतीय अर्थव्यवस्था को एक औपचारिक बंधन में बांधा और आम लोगों की गाढ़ी कमाई को सुरक्षित बनाया।

अरुण जेटली जैसे कुशल राजनीतिज्ञ का जाना वाकई एक क्षति है, जिसे पूरा नहीं किया जा सकता। उनके सार्वजनिक जीवन के योगदान को देखकर कहा जा सकता है कि कोई व्यक्तित्व अपने जीवनकाल में किस तरह एक रणनीतिकार, एक संगठनकर्ता और एक ऊर्जावान पौध खड़ा करता है, जो राष्ट्र के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को बेहतर और भी बेहतर बनाते चले जाते हैं।

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ऐसे में बीस-पच्चीस साल पुराने अरुण जेटली याद आते थे, बोले वरिष्ठ पत्रकार आलोक जोशी

जान लगा देने का जज्बा ही था कि लंबी बीमारी के बावजूद वो मोदी सरकार में न सिर्फ महत्वपूर्ण मंत्रालय संभालते रहे, बल्कि तमाम मोर्चों पर संकट मोचक की भूमिका भी निभाते रहे

Last Modified:
Sunday, 25 August, 2019
Alok Joshi

आलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकार।।

मेरा अरुण जेटली से कभी कोई निजी रिश्ता नहीं रहा। पच्चीस साल पहले एक रिपोर्टर के तौर पर बड़े मुकदमों के सिलसिले में उनकी छोटी टिप्पणियां रिकॉर्ड करने से लेकर पिछले कुछ वर्षों में वित्तमंत्री के इंटरव्यू करने तक चंद औपचारिक मुलाकातें ही हैं। इनमें भी ज़्यादातर भागते दौड़ते, कट टू कट बातचीत। जिंदगी अक्सर सांस लेने का भी वक्त नहीं देती।

दो-चार मौकों पर संपादकों से बातचीत वाले औपचारिक भोज सत्रों में भी मुलाकातें हुईं, लेकिन पिछले कुछ सालों में ये साफ दिखता था कि सेहत उन्हें परेशान कर रही है। बैठक या इंटरव्यू के दौरान भी ये दबाव महसूस होने लगा था। ऐसे में बीस-पच्चीस साल पुराने अरुण जेटली याद आते ही आते थे। हंसते, मुस्कुराते, जिंदादिल अरुण जेटली। शुरुआती दिनों में जिसने भी उन्हें देखा, वो उनकी शख्सियत के जादू से अछूता नहीं रह सकता। मुस्कुराहट, हंसी, तर्क की ताकत और मुकदमों में जान लगा देने का जज्बा।

जान लगा देने का जज्बा ही था कि लंबी बीमारी के बावजूद वो मोदी सरकार में न सिर्फ महत्वपूर्ण मंत्रालय संभालते रहे, बल्कि तमाम मोर्चों पर संकट मोचक की भूमिका भी निभाते रहे। पार्टी के बाहर और राजनीति के बाहर भी अरुण जेटली बहुतों के दोस्त, हितैषी और मददगार थे। बैठकबाज भी थे। इसलिए पत्रकारों की एक मंडली भी थी, जो निरंतर उनके आसपास देखी जाती थी और इस नज़दीकी का फायदा भी उठाती थी। लेकिन किस्सा इस मंडली तक का नहीं है।

बहुत से पत्रकार हैं और गैर पत्रकार भी, जिनकी वक्त जरूरत जेटली जी ने मदद की। खासकर बुरे वक्त पर उनके पास जाने वाले निराश नहीं लौटते थे। मदद तो उन्होंने राजनीति में भी की। ऐसे लोगों की काफी मदद की जो फर्श से अर्श तक पहुंचे और उन्हें जेटली जी हमेशा मित्र और हितैषी दिखते रहे।

राजनीति में भी उन्होंने एक अलग अंदाज से ही अपना मुक़ाम बनाया। लोग सोचते रहे, कहते रहे और लिखते रहे कि अब जेटली कमजोर पड़ रहे हैं, लेकिन वो लगातार मजबूत होते रहे। नरेंद्र मोदी उन पर कितना भरोसा करते रहे, ये कम ही लोगों को पता है, मगर अब धीरे-धीरे ज्यादा लोगों को महसूस होगा, जैसे-जैसे उनके न रहने से पैदा हुआ खालीपन सामने आएगा।

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'जेटली जी ने वायदा पूरा करने का समय ही नहीं दिया'

मीडिया का अरुण जी बहुत संम्मान करते थे लेकिन अपने अंतिम इंटरव्यू में उन्होंने राफेल पर कुछ मीडिया समूहों की पत्रकारिता पर बहुत दुख जताते हुए कहा था कि आपके जीवन में विश्वस्नीयता आपकी सबसे बड़ी चीज

Last Modified:
Sunday, 25 August, 2019
Ashok Srivastava

अशोक श्रीवास्तव, वरिष्ठ एंकर, डीडी न्यूज

एक वायदा सुषमा स्वराज जी ने मुझसे किया था, जिसे उन्होंने पूरा नहीं किया और एक वायदा मैंने अरुण जेटली जी से किया था जिसे मैं पूरा नहीं कर पाया।  क्योंकि ये दोनों ही प्रखर राजनेता असमय ही हम सबको छोड़ कर चले गए। 

सुषमा जी से 2016 में मुझसे वायदा किया था कि जब भी वो टेलीविज़न चैनलों को इंटरव्यू देना शुरु करेंगी तो सबसे पहला इंटरव्यू मुझे ही देंगी। ये बात तब की है जब वो भारत की विदेश मंत्री थीं। विदेश मंत्री बनने के बाद से ही मैं डीडी न्यूज़ के लिए उनका इंटरव्यू करना चाहता था। भारत में ही नहीं एक बार न्यूयॉर्क में भी संयुक्त राष्ट्र की बैठक में जब वो हिस्सा लेने गईं थीं तब भी मैंने उनसे ऐसा अनुरोध किया था। 2016 में एक बार उन्होंने मुझे बुलाया और कहा कि वो किसी न्यूज़ चैनल को इंटरव्यू नहीं दे रहीं हैं पर साथ ही वायदा किया कि जब ये सिलसिला शुरू करेंगी, सबसे पहले मुझे बुलाएंगी।

विधि का विधान देखिए कि सुषमा जी का इंटरव्यू तो मैं नहीं कर पाया पर अरुण जेटली जी का अंतिम टीवी इंटरव्यू मैंने ही किया।

लोकसभा चुनावों के दौरान 23 मार्च को उनका समय मिला। शाम को जब मैं अपनी कैमरा टीम के साथ अरुण जी के घर पहुंचा तब मैंने अपनी पुस्तक "नरेन्द्र मोदी सेंसर्ड" की एक प्रति साथ रख ली और सोचा कि मौका मिला तो उनको पुस्तक भेंट कर दूंगा। हम लोग अरुण जी के स्टडी रूम में उनका इंतज़ार कर रहे थे। मैंने अपनी पुस्तक टेबुल पर रख दी। जैसे ही अरुण जी आये हम सब लोग एक-एक करके उनका अभिवादन करने लगे। हम लोग अरुण जी को देख रहे थे पर उनकी नज़र मेरी पुस्तक पर थी जो उनकी पहुंच से थोड़ी दूर पर थी। अचानक जेटली जी आगे बढ़े और पूरा हाथ बढ़ा कर पुस्तक उठा ली और बोले -ये क्या है?

मैंने कहा कि सर यह मेरी पुस्तक है अभी कुछ दिन पहले ही इसका लोकार्पण हुआ है। जेटली जी पुस्तक को पूरी दिलचस्पी के साथ उलट-पलट कर देखने लगे तो मैं उन्हें पुस्तक की विषय-वस्तु के बारे में बताने लगा। फिर उन्होंने पुस्तक हाथ में ली और बोले तस्वीर खींचों। मैं सकपका गया। फटाफट उनके साथ खड़ा हो गया और अपने प्रोड्यूसर तुमुल को कहा कि जल्दी से फोटो खींच लो। फोटो सेशन खत्म हुआ तो बोले -"मैं इसको पढूंगा ज़रूर, लेकिन हिन्दी में किताबें पढ़ने का अभ्यास छूट गया है। तुम इसको इंग्लिश में भी प्रकाशित करो। मैंने उनसे वायदा किया कि जल्द ही मैं "नरेन्द्र मोदी सेंसर्ड" का इंग्लिश अनुवाद प्रकाशित करूँगा। मैंने मन ही मन सोचा कि अंग्रेजी संस्करण का लोकार्पण अरुण जेटली जी के हाथों से ही कराऊंगा। लेकिन इससे पहले कि मैं पुस्तक का अनुवाद करवाता जेटली जी दुनिया को अलविदा कह गए। 

जितने साल से मैं पत्रकारिता कर रहा हूँ, जेटली जी से मेरा परिचय लगभग उतना ही पुराना है। क्योंकि मैंने बीजेपी बीट की रिपोर्टिंग के साथ अपने करियर की शुरुआत की इसलिए जेटली जी से परिचय तो होना ही था। उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस और औपचारिक पीसी के बाद पत्रकारों के साथ अनौपचारिक पीसी में बहुत कुछ जानने को मिलता था, सीखने को मिलता था। हालांकि मेरी उनसे बहुत निकटता कभी नहीं रही। क्योंकि वो बड़े-बड़े और खासकर अंग्रेज़ी के पत्रकारों से घिरे रहते थे तो मैं दूर से ही उन्हें सुनता था दूर से ही उनसे सवाल करता था।

पर वो मेरे जैसे युवा और नए पत्रकारों को भी पूरा सम्मान दिया करते थे। मुझे लगता था कि अरुण जी मुझे पहचानते नहीं होंगे लेकिन एक दिन अचानक उन्होंने जब मुझे नाम से पुकारा और मेरी एक रिपोर्ट पर चर्चा करने लगे तब मुझे अहसास हुआ कि वो बीजेपी कवर करने वाले सभी पत्रकारों को पहचानते थे और उनकी रिपोर्ट्स पढ़ते थे। 

हालांकि पत्रकारों का, मीडिया का अरुण जी बहुत संम्मान करते थे लेकिन अपने अंतिम इंटरव्यू में उन्होंने राफेल पर कुछ मीडिया समूहों की पत्रकारिता पर बहुत दुख जताते हुए कहा था कि आपके जीवन में विश्वस्नीयता आपकी सबसे बड़ी चीज होती है, जब आप इसे गंवा देते हैं तो कुछ नहीं बचता।"

2014 के लोकसभा चुनावों के बाद जब अरुण जेटली जी को सूचना प्रसारण मंत्रालय का दायित्व दिया गया उसके बाद कई बार मेरी उनसे निजी मुलाकात हुई और कई बार उनका इंटरव्यू करने का मौका मिला। ऐसा ही एक अवसर 2017 में बजट के बाद आया। जब मैंने और नीलम शर्मा दोनों ने मिल कर अरुण जी का इंटरव्यू लिया था। दुर्भाग्य देखिए पिछले शनिवार नीलम हम सबको छोड़ कर चली गईं और इस शनिवार अरुण जी !
 

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अरुण जेटली की यही खूबी उन्हें खास बनाती थी

अपनी पीढ़ी के नेताओं को बहुत पीछे छोड़ दिया था अरुण जेटली ने, अब उनके निधन से पुरानी और नई भाजपा के बीच का पुल टूट गया

Last Modified:
Sunday, 25 August, 2019
Arun Jail

विनोद अग्निहोत्री, कंसल्टिंग एडिटर, अमर उजाला।।

पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली भले ही लोकसभा का सिर्फ एक ही चुनाव लड़े और वो भी हार गए, तब जबकि पूरे देश में मोदी लहर थी, लेकिन राजनीति की पिच पर जेटली ने अपनी पीढ़ी के सभी नेताओं को बहुत पीछे छोड़ दिया। जेटली भाजपा में एक ऐसे शीर्ष नेता थे, जिन्हें भले ही अटल बिहारी वाजपेयी या नरेंद्र मोदी की तरह करिश्माई जन नेता न माना जाता रहा हो, लेकिन अपनी पार्टी के हर स्तर के कार्यकर्ताओं से उनका संपर्क और संवाद इतना सशक्त और जीवंत था कि आज अरुण जेटली के असमय चले जाने से भाजपा का हर कार्यकर्ता ऐसा महसूस कर रहा है कि मानो कोई उसका अपना चला गया हो। पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण हर राज्य में पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच अरुण जेटली की लोकप्रियता अपने समकक्ष नेताओं में सबसे ज्यादा थी।

जेटली उस युवा पीढ़ी के नेता थे, जिसका राजनीतिक शिक्षण प्रशिक्षण विश्वविद्यालयों की छात्र राजनीति में हुआ। जिससे निकलकर सत्तर-अस्सी के दशक में अनेक युवा छात्र नेताओं ने देश की राजनीति में आजादी के बाद के सबसे बड़े आंदोलन की इबारत लिखी थी। जेटली के असमय चले जाने से उस तत्कालीन युवा पीढ़ी की एक बड़ी कड़ी और टूट गई, जिसने राजनीति से संन्यास ले चुके बूढ़े जय प्रकाश नारायण के आह्वान पर उन इंदिरा गांधी की सर्वशक्तिमान सत्ता को चुनौती दी थी, जिन्हें 1971 में भारत पाकिस्तान युद्ध में जीत के बाद विपक्ष के दिग्गज नेताओं ने भी अपराजेय और भारतीय राजनीति की दुर्गा मान लिया था।

अरुण जेटली जब 1974 में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए, तब वह विद्यार्थी परिषद में थे और दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में कांग्रेस के छात्र संगठन की तूती बोलती थी, लेकिन अरुण के करिश्माई चेहरे ने यहां भाजपा के छात्र संगठन विद्यार्थी परिषद का झंडा गाड़ दिया,इसीलिए आज तक दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्षों में सबसे ज्यादा अगर किसी को याद किया जाता है तो अरुण जेटली को ही। यह भी सियासी बिडंबना है कि न जाने कितने भाजपा नेताओं-कार्यकर्ताओं को विधायक और सांसद बनवाने वाले जेटली छात्र संघ चुनाव के बाद सिर्फ एक सीधा चुनाव लड़े। 2014 में अमृतसर लोकसभा टिकट से पार्टी ने उन्हें उतारा, लेकिन पूरे देश में चल रही मोदी लहर के बावजूद कांग्रेस के कैप्टन अमरिंदर सिंह के हाथों उन्हें हारना पड़ा।

अरुण जेटली ने जब छात्र राजनीति में प्रवेश किया तब और उसके पहले देश और विशेषकर उत्तर भारत की छात्र राजनीति में समाजवादी युवजन सभा और कहीं कहीं सीपीआई व सीपीएम के छात्र संगठन एआईएसएफ और एसएफआई का दबदबा था। जयपुर से लेकर मेरठ, अलीगढ़, आगरा, कानपुर, लखनऊ, फैजाबाद, इलाहाबाद, बनारस, गोरखपुर, पटना तक ज्यादातर विश्वविद्यालयों के छात्रसंघों पर समाजवादी विचारधारा के छात्र एवं युवा संगठन समाजवादी युवजन सभा का कब्जा था। मेरठ विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति में सत्यपाल मलिक का दबदबा था, तो आगरा में उदयन शर्मा, कानपुर में रघुनाथ सिंह, प्रेम कुमार त्रिपाठी, इलाहाबाद में जगदीश दीक्षित, गोरखपुर में रवींद्र प्रताप सिंह, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में देवव्रत मजूमदार, पटना में शिवानंद तिवारी, लखनऊ में आलोक भारती और अलीगढ़ में मोहम्मद अदीब,जैसे छात्र नेता शिखर पर थे। उन दिनों आमतौर पर बीएचयू, एएमयू, इलाहाबाद, लखनऊ और पटना विश्वविद्यालयों को उत्तर भारत की छात्र राजनीति का गढ़ माना जाता था और बीएचयू छात्र संघ के अध्यक्ष का कद अन्य छात्र संघों के नेताओं की तुलना में ज्यादा बड़ा माना जाता था। हालांकि, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उसे चुनौती मिलती रहती थी।

1974 में जब छात्रों का बिहार आंदोलन शुरु हुआ, तब दिल्ली विश्वविद्यालय में अरुण जेटली छात्र संघ अध्यक्ष थे, जेएनयू में आनंद कुमार जो बीएचयू छात्र संघ के भी अध्यक्ष रह चुके थे, छात्र संघ की कमान संभाल रहे थे और बीएचयू में मोहन प्रकाश छात्र संघ अध्यक्ष थे, जबकि लालू प्रसाद यादव पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष थे और कानपुर में प्रेम कुमार त्रिपाठी, रामकृष्ण अवस्थी, शिवकुमार बेरिया छात्र राजनीति की कमान संभाले हुए थे। इसी दौर की छात्र राजनीति से देश की मुख्य राजनीति में आए अन्य बड़े नामों में प्रकाश करात, सीताराम येचुरी, नीतीश कुमार, अतुल कुमार अंजान, आरिफ मोहम्मद खान, रामविलास पासवान आदि शामिल हैं। जबकि जबलपुर विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके शरद यादव 1974 का उपचुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंचे थे।

इनमें से ज्यादातर नेता जेपी आंदोलन में शामिल हुए और पूरे उत्तर भारत में इंदिरा सरकार के खिलाफ छात्रों और युवाओं को आंदोलित करने में उनकी अहम भूमिका थी। इन्हें आपातकाल में गिरफ्तार करके जेल भी भेजा गया। फिर 1977 से सबने अपनी अपनी राह पकड़ी। जहां जेटली जनसंघ से जनता पार्टी और भाजपा की राजनीति में शिखर तक पहुंचे, वहीं सत्यपाल मलिक, शरद यादव, लालू यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, मोहन प्रकाश गैर कांग्रेस, गैर भाजपा राजनीति के तमाम ठिकानों पर रहते हुए इन दिनों अलग-अलग ठिकानों पर हैं। सत्यपाल मलिक भाजपा में आए और जम्मू कश्मीर के राज्यपाल हैं। शरद यादव लंबी राजनीतिक पारी खेल चुके हैं। लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री होते हुए जेल में हैं। मोहन प्रकाश कांग्रेस में हैं और आरिफ मोहम्मद खान सक्रिय राजनीति से दूर सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका में हैं। प्रकाश करात और सीताराम येचुरी माकपा के शीर्ष नेतृत्व में हैं। आनंद कुमार जेएनयू के प्रोफेसर रहे और कुछ दिनों तक आम आदमी पार्टी में भी सक्रिय रहे। रामविलास पासवान भाजपा के साथ केंद्रीय मंत्री हैं तो नीतीश कुमार बिहार में भाजपा के साथ साझा सरकार चला रहे हैं। शिवानंद तिवारी, मोहम्मद अदीब अब सिर्फ पूर्व सांसद हैं, वहीं दादा देवव्रत मजूमदार स्वर्गवासी हैं और चंचल कुमार सिंह अपने गांव में हैं।

कुल मिलाकर 1965 से 1975 के दशक के तमाम छात्र नेताओं में अरुण जेटली एक ऐसे नेता रहे, जिन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। जेटली ने अपनी विचारधारा और संगठन में अपना महत्व लगातार बढ़ाया और देश की राजनीति में शीर्ष पर पहुंचे। उनकी यही पृष्ठभूमि भाजपा में उन्हें खास बनाती थी। वह दिल्ली के सत्ता गलियारों और पेज थ्री वर्ग के बीच भी खप जाते थे तो दूसरी तरफ बिहार, उत्तर प्रदेश के खांटी भाजपा कार्यकर्ताओं की भी सुनते थे। जेपी आंदोलन की पृष्ठभूमि उन्हें गैर भाजपा दलों के नेताओं के साथ भी अच्छे निजी रिश्ते बनाने में काम आती थी, तो वकालत के पेशे ने उन्हें कानून की दुनिया में दिग्गज बनाया। अच्छी अंग्रेजी, हिंदी में समान अधिकार और अपनी बात को तार्किक तरीके से समझाने की उनकी शैली विपक्षियों को भी चित कर देती थी और इससे कई बार वह राजनीतिक विमर्श की दिशा बदल देते थे। 2004 और 2009 की लगातार पराजय से त्रस्त भाजपा के मनोबल को अगर जिन नेताओं ने गिरने नहीं दिया और तत्कालीन सत्ता पक्ष को लगातार घेरा, उनमें एक जेटली थे तो दूसरीं सुषमा स्वराज। यह दुर्योग है कि महज इसी अगस्त महीने में दोनों चिरनिद्रा में सो गए।

जेटली की राजनीतिक खुलेपन की पृष्ठभूमि भाजपा के तब बेहद काम आई, जब बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद देश की राजनीति में भाजपा लगभग अछूत हो गई थी। तब भाजपा के शीर्ष नेतृत्व अटल-आडवाणी-जोशी ने जेटली के युवा राजनीति के संपर्कों का पार्टी के लिए इस्तेमाल किया और वाजपेयी के एनडीए से लेकर मौजूदा मोदी के एनडीए के गठन और संचालन में अरुण जेटली की अति महत्वपूर्ण भूमिक रही। इसलिए उनके निधन से देश की राजनीति में साझा सरकारों के एक प्रमुख शिल्पकार की गैरमौजूदगी लंबे समय तक खलती रहेगी और भाजपा में भी आसानी से अरुण जेटली का विकल्प मिलता दिखता नहीं है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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पत्रकारिता की आड़ में कर रहे थे गलत काम, हुआ ये अंजाम

दो पत्रकार पूर्व में भी जेल जा चुके हैं, आरोपितों में लखनऊ का एक पत्रकार भी शामिल

पंकज शर्मा by पंकज शर्मा
Published - Saturday, 24 August, 2019
Last Modified:
Saturday, 24 August, 2019
Journalist

पत्रकारिता की आड़ में अवैध वसूली में लिप्त रहने के आरोप में चार पत्रकारों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। इनमें लखनऊ का भी एक पत्रकार शामिल हैं। इनकी गिरफ्तारी गाजियाबाद, लखनऊ और ग्रेटर नोएडा से की गई है। गिरफ्तार चार पत्रकारों में से दो पूर्व में भी जेल जा चुके हैं। नोएडा पुलिस ने बीटा 2 कोतवाली में इन पत्रकारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।

जिन पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया है, उनमें चंदन रॉय, नीतीश पांडेय, सुशील पंडित और उदित गोयल शामिल हैं। पांचवां आरोपित पत्रकार रमन ठाकुर फिलहाल फरार है। पुलिस ने उसकी तलाश शुरू कर दी है। गिरफ्तार पत्रकारों पर गैंगस्टर लगाया गया है।

नोएडा पुलिस के ट्विटर हैंडल पर एसएसपी वैभव कृष्ण ने इस पूरे मामले की जानकारी दी है।  

वहीं, मीडिया जगत में चर्चा है कि इन पत्रकारों की गिरफ्तारी नोएडा पुलिस और कप्तान के खिलाफ लगातार खबरें छापने को लेकर की गई है। बताया जाता है कि ये पूरा मामला दो आईपीएस अधिकारियों वैभव कृष्ण और अजयपाल शर्मा के बीच आपसी ‘जंग’ का नतीजा है। गिरफ्तार किए गए पत्रकारों को अजयपाल शर्मा के खेमे का माना जाता है जबकि वैभव कृष्ण इन दिनों नोएडा के एसएसपी हैं।

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कवरेज के लिए पहुंचीं पत्रकार मौसमी सिंह के साथ हुआ ये सलूक, देखें विडियो

श्रीनगर एयरपोर्ट पर हंगामा होने के बाद राहुल गांधी समेत अन्य 11 विपक्षी नेताओं को शनिवार को वापस लौटा दिया गया

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Saturday, 24 August, 2019
Last Modified:
Saturday, 24 August, 2019
Mausami Singh

श्रीनगर एयरपोर्ट पर हंगामा होने के बाद राहुल गांधी समेत अन्य 11 विपक्षी नेताओं को शनिवार को वापस लौटा दिया गया है। उन्हें श्रीनगर एयरपोर्ट से बाहर ही नहीं निकले दिया गया था। बताया जाता है कि इस दौरान मीडिया से बदसलूकी भी की गई। आरोप है कि स्थानीय पुलिस ने मौके पर कवरेज के लिए पहुंचीं हिंदी न्यूज चैनल आजतक की पत्रकार मौसमी सिंह समेत कई पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार किया।

इस दौरान मौसमी सिंह चिल्ला-चिल्लाकर कहतीं रहीं कि आप मुझे धक्का क्यों दे रहे हैं? आखिर आप ये क्या कर रहे हैं? आप मीडिया के साथ मारपीट नहीं कर सकते हैं, लेकिन पुलिस ने उनकी एक नहीं सुनी। इस छीनाझपटी में मौसमी सिंह के खरोंचें भी आई हैं। मौसमी सिंह के अनुसार, पुलिसकर्मियों ने मौसमी सिंह समेत पत्रकार से दुर्व्यवहार भी किया, जिसका विडियो भी वायरल हो गया है। इस विडियो को आप यहां देख सकते हैं।

गौरतलब है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी की अगुआई में कई विपक्षी दलों के नेता शनिवार को जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर पहुंचे थे। प्रशासन के मना करने के बावजूद ये नेता यहां आए थे। कश्मीर पहुंचने वाले नेताओं में राहुल गांधी, गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा के अलावा शरद यादव आदि शामिल थे।

न्यूज एजेंसी ANI की रिपोर्ट के अनुसार इन सभी नेताओं को वापस भेज दिया गया है।

इससे पहले जम्मू-कश्मीर सरकार ने शुक्रवार रात बयान जारी कर राजनेताओं से घाटी की यात्रा नहीं करने को कहा था, क्योंकि इससे धीरे-धीरे शांति और आम जनजीवन बहाल करने में बाधा पहुंचेगी। बयान में यह भी कहा गया था कि सियासतदानों की यात्रा पाबंदियों का उल्लंघन करेंगी जो घाटी के कई इलाकों में लगाई गई हैं।

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जानें, क्यों इस कार्यक्रम में आमंत्रित पत्रकारों को करना पड़ा अप्रिय स्थिति का सामना

कार्यक्रम की कवरेज के लिए पत्रकारों को इस महीने की शुरुआत में ही आमंत्रण पत्र के साथ ही नंबर टैग और पार्किंग पास तक बांट दिए गए थे

Last Modified:
Friday, 23 August, 2019
Media

दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में आमंत्रित पत्रकारों को उस समय काफी अप्रिय स्थिति का सामना करना पड़ा, जब उन्हें पता चला कि मीडिया को कार्यक्रम के कवरेज की अनुमति नहीं है। मीडियाकर्मियों के साथ इस तरह का व्यवहार भारतीय इंटेलिजेंस एजेंसी ‘रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’ (RAW) के मुख्यालय में 20 अगस्त को आयोजित आरएन काओ मेमोरियल लेक्चर के दौरान हुआ। कार्यक्रम को गृहमंत्री अमित शाह ने संबोधित किया।

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबर में बताया गया है कि इस कार्यक्रम की कवरेज के लिए पत्रकारों को इस महीने की शुरुआत में ही आमंत्रण पत्र के साथ ही नंबर टैग और पार्किंग पास तक बांट दिए गए थे। रविवार को रॉ के ऑफिस से फोन कर पत्रकारों को बताया गया कि मीडिया को इस कार्यक्रम को कवर करने की अनुमति नहीं है। इस बारे में रॉ अधिकारी ने जोर दिया कि उनकी लिस्ट में शामिल प्रत्येक पत्रकार से इस बारे में संपर्क किया जा रहा है।

बता दें कि इस एजेंसी के संस्थापक आरएन काओ की पुण्यतिथि पर वर्ष 2007 में लेक्चर सीरीज की शुरुआत की गई थी। सिर्फ इसी दिन मीडिया के एक वर्ग को लोदी रोड के निकट कड़ी सुरक्षा वाले रॉ मुख्यालय में प्रवेश की अनुमति दी जाती थी। यही नहीं, मीडिया को इस दौरान स्पीकर से सवाल पूछने के साथ ही वहां आमंत्रित व्यक्तियों से खुले तौर पर बातचीत की आजादी मिल पाती थी।

पूर्व में कई राजनयिक, अधिकारी और उद्यमी यहां लेक्चर दे चुके हैं। इनमें शशि थरूर, कुमारमंगलम बिड़ला, एनएन बोहरा, पियूष पांडे, रघुराम राजन, नरेश चंद्रा और प्रताप भानु मेहता आदि शामिल हैं। यह पहला मौका था, जब किसी मंत्री को यह लेक्चर देने के लिए आमंत्रित किए गया। गौरतलब है कि इससे पहले वित्त मंत्रालयन ने एक आदेश जारी किया था, जिसके तहत अब PIB एक्रिटेड पत्रकार भी बिना अपॉइंटमेंट के मंत्रालय में सीधे अंदर नहीं जा सकते हैं।

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