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मिस्टर मीडिया: उफ़! यह एक ऐसी चेतावनी है, जिसकी उपेक्षा बहुत भारी पड़ेगी...

Published At: Wednesday, 05 December, 2018 Last Modified: Thursday, 06 December, 2018

राजेश बादल

वरिष्ठ पत्रकार।।

क्या होता जा रहा है हमें? कुंद और संवेदनहीन होने की अवस्था की ओर। न हमें अपनी त्रासदियां याद आती हैं और न उपलब्धियों के भरे ख़ज़ाने नज़र आते हैं। सामाजिक विघटन का क्रूर दौर भी हमें नहीं डराता। कम से कम बीते दो-चार दिन ऐसे ही थे। छुटपुट अपवाद छोड़ दें तो मीडिया के हर प्लेटफॉर्म से अहसास के ये बिंदु ग़ायब थे। कौन सी अंधी सुरंग में समाते जा रहे हैं हम लोग?

दो-तीन दिसंबर, चौरासी की दरम्यानी रात हिन्दुस्तान ही नहीं, समूचे संसार के लिए भयावह थी। अमेरिकी कंपनी यूनियन कारबाइड के भोपाल में खाद कारख़ाने से ज़हरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस रिसी। हज़ारों लोग मौत के कुएं में पटक दिए गए। उसके बाद मुआवज़े की नपुंसक लड़ाई लड़ी गई, अपराधी सज़ा पाए बग़ैर इस लोक से चला गया और हमने हज़ारों मासूम लोगों को उनके हाल पर तिल-तिलकर मरने के लिए छोड़ दिया। आज भी गैस के शिकार और उनकी दूसरी-तीसरी पीढ़ी उस विषाक्त गैस का दंश भुगत रहे हैं। ज़िंदा लाशों की तरह ज़िंदगी का बोझ ढो रहे हैं। किसी चैनल या समाचार पत्र में न विशेष रिपोर्ट नज़र आई, न आमुख कथा। हम अपने न्यूज़रूम के पत्रकारों को सामाजिक सरोकारों के लिए किस तरह ज़िम्मेदार बनाएंगे-बड़ा सवाल है। इस हादसे पर हिन्दुस्तान से अधिक पश्चिम और यूरोप के देशों में वैज्ञानिक विश्लेषण मीडिया में स्थान पाते हैं और हमारे हक़ों की बात उठाते हैं। हम भोपाल के पीड़ितों के लिए बनाए गए अस्पताल की विकलांगता की चर्चा भी नहीं करते। यह हमारे लिए शर्म की बात नहीं तो और क्या है?

इन दिनों चुनाव प्रचार के कवरेज में आए दिन सर्जिकल स्ट्राइक का ज़िक्र होता है। किसी ने याद किया कि सैंतालीस बरस पहले तीन दिसंबर को पाकिस्तान ने हिन्दुस्तान पर ऐसा आक्रमण किया था, जिसमें भारत की ऐसी जीत हुई थी, जो समूची दुनिया की जंगों में मिसाल बन गई। ऐसी जीत आज तक किसी देश को नहीं मिली। हमारे लिए गर्व का यह पल था। पाकिस्तान के लिए चुल्लू भर पानी में डूब मरने वाली स्थिति। क़रीब-क़रीब एक लाख अफसरों और सैनिकों की फौज का आत्मसमर्पण। वीरता की एक विलक्षण गाथा। एक नए देश का जन्म। कहीं कोई दूसरा उदाहरण नहीं। मैं नहीं कहता कि हम पुरानी कहानियों के गीत गाते रहें, लेकिन अगली नस्लों को पुराने इतिहास की जानकारी देना भी हमारा कर्तव्य है। ख़ास तौर पर जब हम विध्वंस और बरबादी की वारदातों की बरसी भी धार्मिक भाव से मनाते हों। जो क़ौम अपने शहीदों की क़ुर्बानियों को भूल जाने का अपराध करती है, वह किसके सहारे अपने नसीब को संवारने का दावा करेगी? एक मीडियाकर्मी  के नाते अपने बच्चों को भी यह जानकारी देना क्या हमारा फ़र्ज़ नहीं बनता?

उत्तर प्रदेश कौन से आदम युग में जा रहा है? एक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या सरेआम हो जाती है। मीडिया ने अपनी राय किस तरह रखी? दिन भर चैनल ‘खेलते’ रहे। कितने अखबारों में इस पर संपादकीय लिखे गए? संपादकीय पन्ने पर कितने समाचार पत्रों ने आलेख प्रकाशित किए? और तो और वर्दी में तड़पते इंस्पेक्टर की तस्वीरें दिखाते हुए हमें संकोच भी नहीं हुआ। किसी उन्मादी भीड़ या सिरफिरे की गोली का निशाना हमारे पुलिस बल बनते हैं। हमारा समाज एक बर्बर और हिंसक मनोवृति के सामने घुटने टेक रहा है और चौथे स्तंभ के ख़ून में हरारत नहीं होती। यह एक ऐसी चेतावनी है, जिसकी उपेक्षा हमें बहुत भारी पड़ सकती है। अपराध रिपोर्टिंग में इस कोण की चूक के लिए क्या कोई संपादक माफी मांगेगा?

आग बरसाती है मित्रो! जो क्षितिज के छोर से/कितनी उम्मीदें जुड़ी थीं 

उस सुहानी भोर से/यूं तो संयम के मुखौटे में सभी लगते हैं सभ्य/

भीड़ के सन्दर्भ में देखो तो आदमखोर से/शहर में आए थे पशुता के विसर्जन के लिए/नग्न होने के लिए या जंगलों की ओर से।  

अदम गोंडवी को कम से कम सलाम तो करिए मिस्टर मीडिया।



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