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क्या बदलेगा ZEEL का भाग्य? आज शेयरधारकों की वोटिंग से तय होगा अगला कदम

Zee एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ZEEL) इस वक्त एक अहम मोड़ पर खड़ा है, जहां आज की शेयरधारकों की बैठक कंपनी की आने वाली दिशा और दशकों तक के संचालन की नींव तय कर सकती है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 7 months ago

Zee एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ZEEL) इस वक्त एक अहम मोड़ पर खड़ा है, जहां आज की शेयरधारकों की बैठक कंपनी की आने वाली दिशा और दशकों तक के संचालन की नींव तय कर सकती है। इस बैठक में सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव है प्रमोटर संस्थाओं को 132 रुपये प्रति मूल्य पर 16.95 करोड़ कन्वर्टिबल वारंट्स जारी करने की मंजूरी देना, जिससे कंपनी को 2,237 करोड़ रुपये का पूंजी निवेश प्राप्त होगा। यदि प्रस्ताव पारित होता है, तो प्रमोटरों की हिस्सेदारी बढ़कर 18.39% हो जाएगी।

हालांकि यह एक वित्तीय लेन-देन है, लेकिन असल में यह वोट Zee की दीर्घकालिक रणनीति और गवर्नेंस ट्रैक रिकॉर्ड को लेकर निवेशकों के भरोसे की परीक्षा भी है।

इस प्रस्ताव के मूल में Zee की यह महत्वाकांक्षा है कि वह तेजी से बदलते मीडिया परिदृश्य, खासकर JioStar जैसे उभरते दिग्गजों के मुकाबले, में खुद को मजबूत करे। कंपनी डिजिटल-फर्स्ट कंटेंट, तकनीकी इनोवेशन और वैश्विक विस्तार पर फोकस कर रही है और इसी के लिए वह अपना भविष्य फिर से गढ़ना चाहती है।

J.P. Morgan जैसे वैश्विक सलाहकारों के सहयोग से Zee के बोर्ड का मानना है कि यह पूंजी निवेश उसकी नई विकास योजना को गति देने के लिए जरूरी है। चेयरमैन आर. गोपालन ने इसे Zee को “भविष्य के लिए तैयार करने वाला एक अहम कदम” बताया है।

कंपनी पहले ही इस बदलाव की दिशा में कई कदम उठा चुकी है, जैसे नई सब्सिडियरी कंपनियों की स्थापना और संचालन को सुव्यवस्थित करना। लेकिन इस विजन को जमीन पर उतारने के लिए पूंजी की जरूरत है और यह प्रिफरेंशियल अलॉटमेंट उसी योजना का अहम हिस्सा है।

वैश्विक प्रॉक्सी एडवायजरी फर्म Glass Lewis ने इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट देने की सिफारिश की है, जो कि सार्वजनिक पेंशन फंड्स, जैसे- CalSTRS, Florida SBA और CalPERS जैसे बड़े निवेशकों के समर्थन के चलते और अधिक असरदार हो गई है।

एक सीनियर इंडस्ट्री एक्सपर्ट के अनुसार, वैश्विक निवेशक इस कदम को Zee की बुनियादी मजबूती में भरोसे का संकेत मान रहे हैं, खासकर कंपनी की ऐसी कंटेंट रणनीति जो स्केलेबल, कॉस्ट-इफिशिएंट और अच्छे रिटर्न की क्षमता रखती है।

प्रमोटर समूह ने भी यह तर्क दिया है कि यह निवेश उनके दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है। गौर करने वाली बात यह है कि उन्होंने यह निवेश उस वक्त करने की इच्छा जताई जब शेयर का दाम 106.35 रुपये था, जो कि प्रस्तावित प्राइस 132 रुपये से काफी नीचे है।

लेकिन हर कोई इससे सहमत नहीं है। देश की प्रॉक्सी एडवायजरी फर्मों (InGovern Research और IiAS) ने शेयरधारकों से इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट करने को कहा है।

इनकी आपत्तियां तीन प्रमुख बिंदुओं पर हैं: अल्पसंख्यक शेयरधारकों की हिस्सेदारी का कमजोर होना, फंड के इस्तेमाल को लेकर अस्पष्टता और प्रमोटरों की बढ़ती पकड़ से गवर्नेंस से जुड़ी समस्याओं की वापसी की आशंका।

हालांकि ये संस्थाएं Zee की रणनीतिक संभावनाओं को स्वीकार करती हैं, लेकिन उनका मानना है कि यह प्रस्ताव जिस तरह से पेश किया गया है, यानी प्रिफरेंशियल अलॉटमेंट के जरिए वह पारदर्शिता के मानकों पर सवाल उठाता है, खासकर Zee के जटिल गवर्नेंस इतिहास को देखते हुए।

InGovern ने अपनी टिप्पणी में खासतौर पर तीखी प्रतिक्रिया दी: “प्रमोटर की हिस्सेदारी को वारंट के जरिए बढ़ाना अल्पसंख्यक शेयरधारकों के हित में नहीं है।”

Zee एंटरटेनमेंट के टॉप 20 शेयरधारकों में घरेलू और वैश्विक निवेशकों का मिश्रण देखा जा सकता है। कनाडा स्थित Sprucegrove Investment Management Ltd के पास 5% हिस्सेदारी है, भारत की LIC के पास 4.63%, और नॉर्वे के Norges Bank के पास 3.95% हिस्सेदारी है। प्रमोटर से जुड़ी Essel Media के पास 3.45% शेयर हैं। अन्य प्रमुख भारतीय संस्थागत निवेशकों में ICICI प्रूडेंशियल (3.04%) और SBI लाइफ इंश्योरेंस (2.12%) शामिल हैं। कोटक महिंद्रा का 1.73% हिस्सा उसकी सिंगापुर शाखा के माध्यम से है। यह विविधता यह दिखाती है कि इस प्रस्ताव पर निवेशकों के दृष्टिकोण और प्राथमिकताएं भी विभिन्न होंगी।

एक इंडस्ट्री ऑब्जर्वर ने कहा, “भारतीय निवेशक अब भी Zee के पुराने गवर्नेंस मुद्दों से डरे हुए हैं, और उन्हें आशंका है कि प्रमोटरों का बढ़ता नियंत्रण भविष्य की पारदर्शिता को नुकसान पहुंचा सकता है।”

यह सिर्फ पूंजी जुटाने का मामला नहीं है। आज का निर्णय यह भी तय करेगा कि Zee को आगे कैसे संचालित किया जाएगा, और मीडिया कंपनियों में प्रमोटर की भागीदारी को लेकर निवेशकों की धारणा कैसी बनेगी।

यदि यह प्रस्ताव पास होता है, तो Zee को अपने बदलाव के एजेंडा को आक्रामक ढंग से आगे बढ़ाने की ताकत मिल सकती है। लेकिन यदि प्रस्ताव गिरता है, तो बोर्ड को वैकल्पिक फंडिंग स्रोत तलाशने होंगे और यह प्रक्रिया कंपनी की गति को धीमा कर सकती है, जबकि आज के दौर में तेजी से निर्णय लेना जरूरी है।


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