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मिस्टर मीडिया: परदे के पीछे की घटनाओं का भी विश्लेषण क्यों नहीं करते आप?

Published At: Wednesday, 06 March, 2019 Last Modified: Wednesday, 06 March, 2019

राजेश बादल
वरिष्ठ पत्रकार।।

स्थिति विकट है। बंटवारा खुलकर सामने आ गया है। यह मेरा चैनल, वह तेरा चैनल। यह एंकर प्रो कांग्रेस है,वह एंकर प्रो बीजेपी है। प्रो पत्रकारिता कौन बचा है? हर चैनल दावा करता है कि असली पत्रकारिता वही कर रहा है। उसी की ख़बर ख़बर है, बाक़ी सब बेकार। अपनी अपनी पसंद के गेस्ट हैं। जो सह लेते हैं, वे पसंदीदा। जो नहीं सहते, उन पर एंकर चढ़ बैठते हैं या बेचारे बोल ही नहीं पाते। अब यह ख़ालिस टीआरपी की होड़ नहीं रही है। इसमें राष्ट्रभक्ति की अपनी-अपनी परिभाषा भी घुल गई है। कभी-कभी महसूस होता है कि एंकर किसी विषय पर चर्चा करना चाहता था,ऐन वक़्त पर अंतरिक्ष से नए विषय की आकाशवाणी हुई। खेलो, आज इस पर खेलो। एंकर-पत्रकार-सारे प्रोफेशनल उस टॉपिक पर चले जाते हैं। कई बार न चाहते हुए भी। देशहित के अनेक मुद्दे बिना चर्चा के रह जाते हैं। ऐसा क्यों?

इन दिनों पाकिस्तान और उसके प्रति शत्रुभाव हॉट केक की तरह बिक रहा है। किसी रिसाले की सुर्खियों की चीरफाड़ जैसा। जो सुर्ख़ियों में नहीं, उस पर डिबेट क्या करना? एक मिसाल देता हूं। इस्लामिक सहयोग संगठन में सुषमा स्वराज के प्रभावी भाषण पर तो चर्चा स्वाभाविक थी। लेकिन अगले दिन हिंदुस्तान की निंदा के दो प्रस्ताव पारित हुए। उसी कमेटी ने ये प्रस्ताव पारित कराए। कश्मीर और पाकिस्तान के प्रति भारत के हालिया रवैए की भर्त्सना और इमरान ख़ान की तारीफ़। जिस देश ने भारत की मौजूदगी के विरोध में सम्मेलन का बायकॉट किया, उसी की तारीफ़। वजह? परदे के पीछे की कहानी? जिस यूएई को पिछले साल गणतंत्र दिवस की परेड पर हमने ख़ास मेहमान बनाया, उसी ने पाकिस्तान का समर्थन किया। इसके अंदर की सियासत पर कहां चर्चा हुई? अगर हुई तो कितने फ़ीसदी चैनलों ने की?

एक और नमूना। जिस पाकिस्तान में हिंदुओं की दुर्दशा जगजाहिर है, वहां के पंजाब में एक मंत्री को हिंदुओं की आलोचना करने पर इस्तीफ़ा देना पड़ा। अभी तक तो भारत की आलोचना और नफ़रत वहां राजनेताओं को लोकप्रिय बनाती थी। अब क्या हुआ? इसी तरह वहां के पंजाब में एक आला अफसर फिर पोस्ट किया गया, जो आतंकवादी समूहों के ख़िलाफ़ था और कट्टरपंथियों के दबाव में अभी तक हाशिए पर था। तो इमरान ख़ान के ये प्रयोग केवल पंजाब में ही क्यों हो रहे हैं? इसके कारण किसने पहचाने? पंजाब में इमरान की पार्टी बहुत कमज़ोर है। वहां नवाज़ शरीफ़ इसलिए भी लोकप्रिय हैं, क्योंकि वे भारत से दोस्ती के हामी हैं। पंजाब के लोग इसे पसंद करते हैं। इमरान एक तीर से दो निशाने साध रहे हैं। एक जानकारी यह है कि चीन के इशारे पर इमरान ख़ान इस तरह की कार्रवाई कर रहे हैं, जिससे चीन सुरक्षा परिषद् तथा अन्य मंचों पर पाकिस्तान के हक़ में खड़ा हो सके। तो इस तरह के मुद्दे चैनल में चर्चाओं का आधार क्यों नहीं बनते?

अमूमन प्रत्येक चैनल में रिसर्च विभाग होता है। इस विभाग की ज़िम्मेदारी रोज़ नए विषय सुझाना भी है। पर क्या यह खुलकर ऐसा कर पा रहा है? शायद नहीं। तो निवेदन यह है कि आज का दर्शक बेहद संजीदा और समझदार है। अनपढ़ दर्शक तक अनुमान लगा लेता है कि अमुक चैनल इस पार्टी का पक्ष लेता है और दूसरा चैनल किसी अन्य पार्टी का। इसलिए अब वह खुलकर रिमोट नामक हथियार का इस्तेमाल करने लगा है। आपकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती बनती जा रही है। जंगल में मोर नाचा किसी ने न देखा। अपने चैनलों पर ऐसा कंटेंट परोसने के लिए किसी डॉक्टर ने आपको नहीं कहा है। आप अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने पर क्यों उतारू हैं मिस्टर मीडिया!

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