भारत के सर्वोच्च न्यायालय की इस खबर ने आज मुझे बहुत खुश...
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
वरिष्ठ पत्रकार।।
शिक्षाः अदालतः खुश-खबर
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की इस खबर ने आज मुझे बहुत खुश कर दिया है। मेरे पास लगभग 20 अखबार रोज़ाना आते हैं। लेकिन यह खबर मैंने आज सिर्फ ‘दैनिक जागरण’ में देखी है। किसी भी अंग्रेजी अखबार ने इस खबर को नहीं छापा है।
खबर यह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव अनूपचंद्र पांडेय को अदालत की बेइज्जती करने का नोटिस भेजा है। उ.प्र. सरकार ने अदालत की बेइज्जती कैसे की है? इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 18 अगस्त 2015 को एक आदेश जारी किया था, जिसके मुताबिक प्रदेश के सभी चुने हुए जनप्रतिनिधियों, सरकारी कर्मचारियों और न्यायपालिका के सदस्यों के बच्चों को अनिवार्य रूप से सरकारी स्कूलों में ही पढ़ना पड़ेगा।
अदालत ने यह भी कहा था कि इस नियम का उल्लंघन करने वालों के लिए सजा का प्रावधान किया जाए। सरकार से वेतन पाने वाला कोई भी व्यक्ति अपने बच्चों को यदि किसी निजी स्कूल में पढ़ाता है तो वहां भरी जाने वाली फीस के बराबर राशि वह सरकार में जमा करवाएगा और उसकी वेतन वृद्धि और पदोन्नति भी रोकी जा सकती है।
इस आदेश का पालन करने के लिए अदालत ने छह माह का समय दिया था लेकिन साढ़े तीन साल निकल गए। न तो अखिलेश यादव और न ही योगी आदित्यनाथ की सरकार ने कोई कदम उठाया। अब शिवकुमार त्रिपाठी नामक एक प्रबुद्ध नागरिक की याचिका पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने उप्र के मुख्य सचिव को कठघरे में खड़ा किया है।
आप पूछ सकते हैं कि इस फैसले से मैं इतना खुश क्यों हूं? क्योंकि यह सुझाव 2015 में मैंने अपने एक लेख में दिया था। बाद में मुझे पता चला कि उस लेख को उन न्यायाधीशों ने भी पढ़ा था। उसमें मैंने सरकारी लोगों के इलाज के मामले में भी यही नियम लागू करने की बात कही थी। मैं हमेशा कहता हूं कि विचार की शक्ति परमाणु बम से भी ज्यादा होती है। यदि शिक्षा और स्वास्थ्य के मामलों में मेरे इस विचार को सरकारें लागू कर दें तो भारत के स्कूलों और अस्पतालों की हालत रातोंरात सुधर सकती है। शिक्षा से मन प्रबल होता है और स्वास्थ्य रक्षा से तन सबल होता है। ऐसे प्रबल और सबल राष्ट्र को विश्व की महाशक्ति बनने से कौन रोक सकता है?
सोशल मीडिया ने समाज में अलग तरह की स्पर्धा की छवियां प्रस्तुत की हैं। अपने सुखद, आनंद के क्षणों को वायरल करने की बीमारी दूसरे की पीड़ा का कारण बन जाती है।
by
Samachar4media Bureau
प्रो.संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष।
भारत युवाओं का देश है। जाहिर है ऐसे देश की चिंताएं बहुत अलग होती हैं। उसकी ज्यादातर आबादी को शिक्षा, रोजगार और सुंदर जीवन की कामना होती है। उनकी महत्वाकांक्षाएं, अवसरों की होड़ और दौड़, पाने की खुशी और न मिलने का आक्रोश सब साझा होते हैं। करियर में सफल होने, जल्दी और ज्यादा पाने की कामनाएं इस दौर का मूल्य हैं। ऐसे में शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को गहरी चुनौती है। संकट के बादल गहरे हैं, समाधान के सूत्र न्यूनतम। सरकारों में नौकरियों के दरवाजे सिकुड़ रहे हैं। ज्यादातर नौकरियां निजी क्षेत्रों में ही हैं।
नौ से पांच बजे की पक्की नौकरियां अब स्वप्न ही हैं। उनकी जगह गिग इकोनॉमी (फ्रीलांस, कॉन्ट्रैक्ट वर्क) ने ले ली है। आर्थिक स्वतंत्रता की तो छोड़िए, यह मॉडल भविष्य की अनिश्चितता और वित्तीय अस्थिरता भी ला रहा है, जिसके नाते बढ़ता मानसिक तनाव और अवसाद संकट को गहरा कर रहा है। हिंदुस्तान अलग तरह से चलता रहा है। परिवार इसकी प्राणवायु रहे हैं। परिवार का कोई एक आदमी नौकरी पर रहता था, शेष अपने घर-इलाके-गांव में बैठकर स्थानीय स्तर पर जो कर सकते थे, करते थे। परिवार की छाया में सुरक्षा थी, संरक्षण था, बच्चों को संस्कारित करने के पारिवारिक उपक्रम थे।
नई व्यवस्था ने एक परिवार में कई परिवार खड़े कर दिए हैं। इससे एक की जगह अब चार परिवार, चार चूल्हे और चार व्यवस्थाएं खड़ी करनी पड़ रही हैं। आप कितना भी कमा रहे हैं, वह कम ही है। इसने नई पीढ़ी को ईएमआई के दुष्चक्र में फंसा कर नई व्यवस्थाओं का गुलाम बना दिया है। परिवार व्यवस्था भारत की संस्कृति का आधार रही है। वह संस्कारशाला भी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने हमारे सामने नई चुनौतियां पेश की हैं। वे बेहतर सहायक से ज्यादा तनाव के वाहक हैं। युवाओं में एआई के कारण नौकरियां जाने और खुद के अप्रासंगिक हो जाने का भय बैठ गया है।
वे इस पूरे दृश्य को बहुत चिंता से देख रहे हैं। री-स्किलिंग का दबाव उन्हें गहरे भय में डाल रहा है। इससे मानसिक थकान होना स्वाभाविक ही है। इस समय सबसे बड़ी चिंता कार्य और जीवन संतुलन की है। वर्क फ्रॉम होम और डिजिटल कनेक्टिविटी ने सारा कुछ बदलकर रख दिया है। काम के घंटे अब प्रायः 24 घंटे ही हैं। देर रात तक ई-मेल, रिपोर्ट्स और मैसेज का जवाब देते हुए युवा ‘ऑलवेज ऑन’ मोड में रहते हैं, जिससे पारिवारिक जीवन, व्यक्तिगत समय और नींद सब प्रभावित हो रही है। बर्नआउट की बढ़ती दर, काम के अनिश्चित घंटे, स्पर्धा का वातावरण और टारगेट पूरे करने का दबाव साथ चलता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने बर्नआउट को प्रोफेशनल बीमारी मान लिया है। यह अब भारतीय कॉरपोरेट जगत में एक अनिवार्य समस्या बन गई है। सोशल मीडिया ने समाज में अलग तरह की स्पर्धा की छवियां प्रस्तुत की हैं। अपने सुखद, आनंद के क्षणों को वायरल करने की बीमारी दूसरे की पीड़ा का कारण बन जाती है। किसी की बड़ी पदस्थापना, उसकी पार्टियां, रील्स, पर्यटन की तस्वीरें, महंगी जीवनशैली का विज्ञापन करना, सफलताओं के हाइलाइट्स देखकर तुलना और स्पर्धा की बातें तेज होती हैं। इससे हीनभावना और तनाव का जन्म भी होता है।
परिजन और बच्चे भी अपने पालकों से ऐसी ही जीवनशैली की अपेक्षा करते हैं। ऐसे समय में युवाओं के लिए तनाव प्रबंधन की विधियां समझने और उन्हें जीवन की ठोस सच्चाइयों से जोड़ने की जरूरत है। योग, ध्यान के अनेक अभ्यास जीवन में शांति ला सकते हैं। जिंदगी के हमारे दृष्टिकोण में परिवर्तन ला सकते हैं। रील्स की तुरंतवादी जीवनशैली और जीवन के सतत संघर्ष को समझने की जरूरत है। सोशल मीडिया से प्रक्षेपित हो रही छवियों से प्रभावित होने के बजाय, लोगों के संघर्ष और उससे उपजी सफलताओं के पाठ भी पढ़े जाने चाहिए।
नए समय ने युवाओं को उद्यमिता के गुर दिए हैं। यह पीढ़ी जोखिम उठाने और सफलताओं के नए शिखर छूने वाली पीढ़ी है। इसके मंत्र अलग हैं। वे जल्दी से सफलताओं के नए क्षितिज को छूना चाहते हैं। छू भी रहे हैं। कम आयु में उनकी सफलताएं विस्मित करने वाली हैं। उनके स्टार्टअप धूम मचा रहे हैं। सफलता की बड़ी कहानियां लिख रहे हैं। प्रेरित कर रहे हैं। इसके दूसरे पक्ष का विचार भी जरूरी है।
हमें पता है कि 90 प्रतिशत से अधिक स्टार्टअप शुरुआती सालों में ही अन्यान्य कारणों से विफल हो जाते हैं। विफलता का डर, निवेशकों का दबाव, फंडिंग का संकट संस्थापकों और शुरुआती कर्मचारियों में मानसिक तनाव पैदा कर ही देता है। इतने बड़े देश में हर साल लाखों युवा हाथ काम मांगने के लिए खड़े हो जाते हैं। उनके पास डिग्रियां भी होती हैं, किंतु वे कौशलयुक्त नहीं होते। वे डिग्रीधारी हैं, किंतु किसी काम के नहीं हैं। बाजार की जरूरतें अलग हैं, उनके कौशल अलग हैं। ऐसे में बहुत योग्य लोगों को भी अपेक्षित नौकरी नहीं मिल पाती, अच्छे वेतन की तो जाने ही दीजिए।
युवाओं के ज्यादातर संकट वास्तविक हैं। वे जानकारी से भरपूर हैं, उनके पास अवसरों का जनतंत्र है। आकांक्षाओं की बाढ़ है। वे सूचनाओं से लदे-फंदे हैं। यह ज्यादा सूचनाएं भी दुख और भ्रम का कारण बन रही हैं। आकांक्षाओं का बड़ा आकाश उतनी ही गहरी निराशा लेकर लाता है। यह साधारण नहीं है कि आईआईटी के विद्यार्थी आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसे प्रतिभाशाली विद्यार्थियों का अवसान उनके परिवार, देश और समाज के लिए भी बड़ी क्षति है। परीक्षाओं में मिलती असफलताएं, लीक होते प्रश्नपत्र, परीक्षाओं की नष्ट होती शुचिता, सरकारी-प्रशासनिक तंत्र की कदाचार रोकने की विफलताओं ने युवाओं को गहरी चिंताएं दी हैं।
शिक्षा के निजीकरण और उससे उपजे बाजारीकरण ने हालात बहुत बदल दिए हैं। महंगी शिक्षा के लिए परिवार कर्ज में डूब रहे हैं। प्रतिभा पलायन का संकट तो है ही। समाज में यह बात बहुत गहरे पैठ रही है कि इस देश में प्रतिभाशाली युवाओं की जगह नहीं बची है। यह तथ्य नहीं, किंतु गहराई से फैलती धारणा है। आप बिना जुगाड़ के इस व्यवस्था में सफल नहीं हो सकते। किसी राष्ट्र जीवन में ऐसी धारणाएं ठीक नहीं हैं।
हमें समझना होगा कि राष्ट्र से हम सबकी सामूहिक आकांक्षाएं, साझा प्रयासों से ही फलीभूत होंगी। भारत की आजादी के आठ दशक अभूतपूर्व प्रगति, एकत्व और जीवंत लोकतंत्र के प्रमाण हैं। हर राष्ट्र जीवन में चुनौतियां होती हैं, उससे जूझकर हम अपने संकटों का हल खोजते हैं। देश की युवा पीढ़ी भी अपने संकटों के बीच इस राष्ट्र जीवन के समक्ष उपस्थित प्रश्नों के ठोस और वाजिब हल जरूर तलाशेगी। युवा शक्ति की तेजस्विता, नवाचारों और आत्मविश्वास को देखकर यह विश्वास सहज ही होता है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
अब आइए रोज़गार पर। सरकार के आँकड़े कहते हैं कि अगर 100 लोग लेबर फ़ोर्स में हैं तो सिर्फ़ 23 लोगों के पास सैलरी वाली नौकरी है, जबकि 43 लोग अब भी खेतों में काम कर रहे हैं।
by
Samachar4media Bureau
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
जीडीपी के आँकड़े पर बहस छिड़ी हुई है कि 2.6% हुई है या 7.8%? हफ़्ते भर पढ़ने-लिखने के बाद मैं इतना तो कह सकता हूँ कि 2.6% की गिनती ग़लत है। 7.8% के आँकड़े को भी ग़लत मानने का कोई कारण मुझे नहीं मिला। फिर भी सोशल मीडिया पर लोग मान नहीं रहे हैं कि 7.8% ग्रोथ हुई है? हिसाब-किताब में समझेंगे कि लोग विश्वास क्यों नहीं कर रहे हैं?
जीडीपी की बहस को ब्लैक एंड व्हाइट में देखेंगे तो समझ नहीं पाएँगे। सरकार के आँकड़े मोटे तौर पर सही हैं, लेकिन जनता महसूस नहीं कर रही है। इसका कारण यह ग़लतफ़हमी है कि जीडीपी ग्रोथ का मतलब इनकम ग्रोथ है। अच्छी ग्रोथ से इनकम बढ़ना चाहिए, लेकिन यह बढ़ोतरी असमान होती है। किसी को ज़्यादा मिलती है तो किसी को कम। फिर हमारी प्रति व्यक्ति आय भी कम है। हमारी और ब्रिटेन की जीडीपी लगभग बराबर है। जीडीपी अगर 12 इंच का पिज़्ज़ा है तो वो ब्रिटेन में एक आदमी खा रहा है, वहीं भारत में वो 20 लोगों में बंट जाता है। हरेक व्यक्ति के हिस्से में छोटा स्लाइस आ रहा है।
अब आइए रोज़गार पर। सरकार के आँकड़े कहते हैं कि अगर 100 लोग लेबर फ़ोर्स में हैं तो सिर्फ़ 23 लोगों के पास सैलरी वाली नौकरी है, जबकि 43 लोग अब भी खेतों में काम कर रहे हैं। बाकी लोग स्वरोज़गार कर रहे हैं या दिहाड़ी मज़दूरी। विकसित देशों में सैलरी पर काम करने वाले लोगों की संख्या 80-90 होती है। चीन आबादी के लिहाज़ से लगभग हमारे बराबर है, वहाँ खेतों में सिर्फ़ 22 लोग काम कर रहे हैं।
खेतों से लोगों को निकाले बिना समृद्धि नहीं आ सकती है। इसमें दिक़्क़त है कि सर्विस सेक्टर में उतनी ज़्यादा संख्या में नौकरियाँ नहीं हैं, जबकि मैन्युफ़ैक्चरिंग में हम पिछड़ गए हैं। मैन्युफ़ैक्चरिंग का जीडीपी में योगदान 16-17% पर अटका हुआ है, जबकि मेक इन इंडिया जैसी स्कीम लाई गई थी।
बात सिर्फ़ रोज़गार की नहीं है। सरकार के आँकड़े ही कहते हैं कि पिछले पाँच सालों में लोगों की आमदनी तो बढ़ी है, लेकिन बढ़ी हुई आमदनी महंगाई खा जा रही है। इससे लोगों को लगता है कि हम तो जहाँ थे, वहीं पर अटके पड़े हैं। यह भावना कोई नई नहीं है। पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा को हजारीबाग में उनके वोटरों ने कहा था कि हम जीडीपी को खाएँगे क्या? यह 2004 चुनाव की बात है। लोगों को आँकड़ों से मतलब नहीं है, उन्हें अपनी ज़िंदगी बेहतर करने से मतलब है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
खरगे की रैली के बाद कथित मंच शुद्धिकरण के प्रयास का मुद्दा उठाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस अपमान पर पुलिस में प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज किए जाने की मांग की।
by
Samachar4media Bureau
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड चुनाव से पहले राहुल गांधी और कांग्रेस ने दलित राजनीति के दांवपेंच शुरू कर दिए। हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद हुए कथित 'शुद्धिकरण' (हवन) विवाद पर मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी ने दोषियों पर एफआईआर दर्ज करने का अजीबोगरीब अभियान चला दिया। खरगे की रैली में क्या कोई हमला हुआ? अगले दिनों उसी मैदान में कार्यक्रम से पहले हुई सफाई, पूजा इत्यादि में खरगे के विरुद्ध गालियों या तंत्र-मंत्र की कोई रिकॉर्डिंग या अन्य सबूत राहुल के पास हैं?
अब तक तो सामने नहीं आए। फिर भी खरगे और उनके नेता राहुल गांधी लगातार दलित अपमान पर संसद से सड़क तक हाहाकार कर रहे हैं। राहुल ने तो प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया में इस मुद्दे को तूल देते हुए आरोप लगाया कि आज भी हर जगह दलितों का अपमान हो रहा। खरगे की रैली के बाद कथित मंच शुद्धिकरण के प्रयास का मुद्दा उठाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस अपमान पर पुलिस में प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज किए जाने की मांग की।
भारत में यह पहला अवसर है, जब प्रतिपक्ष का शीर्ष नेता एक दिन एफआईआर दर्ज कराने या दूसरे दिन दो सौ एफआईआर रद्द करने के लिए पीएम निवास तक धरना देने लगे, जैसे एफआईआर पीएम मंत्रियों के दफ्तरों में दर्ज होती हो। बाईस वर्षों की सांसदी और अदालतों में हाजिरी लगाने के बावजूद उन्हें नहीं पता कि प्राथमिकी शिकायत मात्र है, न सबूत है और न ही सजा? फैसला वर्षों बाद अदालत में होगा। मतलब जनता में भ्रम से भड़काने की राजनीति के अलावा कुछ नहीं।
दूसरी तरफ भाजपा का कहना है कि इस घटना का किसी जाति से कोई लेना-देना नहीं है। उनका दावा है कि रैली के बाद वहां गंदगी छोड़ी गई थी और कुछ लोगों ने केवल उस जगह की सफाई के उद्देश्य से धार्मिक प्रक्रिया की थी। वह संगठन भी पार्टी का नहीं है। इसके साथ ही, भाजपा ने कांग्रेस पर इस मुद्दे को लेकर विभाजनकारी राजनीति करने और दलित समाज को राजनीतिक टूल की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है।
यह मामला कानूनी रूप ले चुका है। अब तो हवन में शामिल दलित युवक ने ही राहुल गांधी द्वारा नफरत फैलाने के खिलाफ शिकायतें दर्ज करा दी हैं। स्वाभाविक है, इस तरह के मामले कानूनी गलियारों में वर्षों तक घूमते रह सकते हैं। इसीलिए पिछले दिनों वाराणसी से एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझे फोन करके कहा कि 'विपक्ष के लिए चुनाव में सदा गुंजाइश है, लेकिन राहुल और उनके सलाहकार इतना भी नहीं समझते कि दीवारों पर वर्षों पहले लगे दाग आसानी से नहीं हटते। और इस देश के गरीब दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक कम शिक्षित होने पर भी कांग्रेस राज में हुए अत्याचार आसानी से नहीं भूल पाते। दलितों पर हुए अत्याचार के रिकॉर्ड की रिपोर्ट्स और संपादकीय टिप्पणियां उपलब्ध हैं।'
सचमुच इस मुद्दे पर मुझे पिछले दशकों में अपनी रिपोर्ट्स और टिप्पणियों की फाइल का ध्यान आ गया। खरगे इस समय कांग्रेस के अध्यक्ष हैं और दलित नेता के मान-अपमान के मुद्दे पर कांग्रेस के ही शीर्ष दलित नेता माने जाने वाले बाबू जगजीवन राम को याद किया जाना चाहिए। वह भी सत्तर के दशक में पार्टी के अध्यक्ष थे और वरिष्ठ मंत्री रहे।
पत्रकार के नाते 1972 से लगातार उनसे मिलने, बात करने के अवसर मिले। आपातकाल की ज्यादतियों और दलितों की हालत से दुखी रहने के कारण 1977 में चुनाव की घोषणा के साथ उन्होंने विद्रोह कर दूसरे बड़े नेता हेमवतीनंदन बहुगुणा के साथ नई पार्टी बनाई। वहीं जनता पार्टी में भी पुरानी संगठन कांग्रेस के अधिकांश कांग्रेसी नेता थे। लेकिन उन कांग्रेसियों ने भी जगजीवन राम को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया।
उपप्रधानमंत्री पद दिलवाने के लिए कई दिनों तक उनके निवास के बाहर और अन्य ठिकानों पर समर्थकों के प्रदर्शनों की रिपोर्ट मेरी फाइल में आज भी रखी है। तब तो उन्हें इंदिरा कांग्रेस ने विद्रोही करार दिया था। लेकिन 1979 में जनता पार्टी के टूटने पर भी उपप्रधानमंत्री पद पर रहे सबसे अनुभवी नेता जगजीवन राम के बजाय इंदिरा कांग्रेस ने श्रीमती गांधी को जेल भिजवाने वाले चौधरी चरण सिंह को समर्थन देकर प्रधानमंत्री बनवाया।
चरण सिंह पर इंदिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गांधी के विरुद्ध चल रहे मामलों को लेकर दबाव था। चरण सिंह ने इन मामलों को वापस लेने से इनकार किया। परिणामतः इंदिरा कांग्रेस ने विश्वासमत से ठीक पहले समर्थन वापस ले लिया और चरण सिंह को इस्तीफा देना पड़ा। जगजीवन राम ने दावा किया कि वे बहुमत जुटा सकते हैं। वे विपक्ष/जनता गठबंधन के नेता थे और उनके पास काफी सांसदों का समर्थन था। तब जगजीवन राम को मौका क्यों नहीं मिला? इसलिए दलित नेताओं का उपयोग और अपमान का रिकॉर्ड क्या भुलाया जा सकता है? आज भी क्या कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी के बजाय खरगे को अगले प्रधानमंत्री की तरह पेश कर रही है?
जहाँ तक दलितों पर अत्याचार की बात है, दलितों के सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों का प्रश्न केवल संविधान और कानूनों का प्रश्न नहीं रहा है। प्रश्न है—जब इन घटनाओं के समय कांग्रेस की सरकार थी, तब प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व ने क्या किया? कांग्रेस सरकार के अधीन पुलिस प्रशासन ने दलित नागरिकों की रक्षा क्यों नहीं की और दोषियों को दंड दिलाने में कितनी सफलता मिली?
शायद 1978 के बाद बिहार में दलितों पर हुई हिंसा से जुड़े चर्चित बेलछी कांड के समय श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा सहानुभूति जताने और दोषियों को दंडित कराने की मांग से उनकी राजनीतिक वापसी होने की बात राहुल को समझाई गई होगी। लेकिन सत्ता की वापसी केवल एक घटना से नहीं हुई थी। बड़ा कारण जनता पार्टी का बिखरना और एक हद तक कांग्रेस की पुरानी संगठन क्षमता थी।
आज संगठन कहाँ है? अत्याचार में उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस राज में दलितों पर सर्वाधिक हिंसक हमले हुए और अपराधियों को कांग्रेस नेताओं के संरक्षण के आरोप रहे। पराकाष्ठा यहाँ तक रही है कि दलितों के हत्याकांड के पीछे कांग्रेस नेता के हाथ का आरोप रहते उस पूर्व सांसद को पार्टी ने राष्ट्रपति पर दबाव डालकर राज्यसभा में नामजद श्रेणी में फिर से सांसद तक बनवा दिया। राष्ट्रपति ने एक बार प्रस्ताव पर सहमति न देकर फाइल लौटा दी थी। तब दोबारा भेजी गई और उन्हें दस्तखत करना पड़े। तत्कालीन राष्ट्रपति ने स्वयं यह बात दुखी स्वर में बताई थी।
असल में दलितों के सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों का प्रश्न केवल संविधान और कानूनों का प्रश्न नहीं रहा है। शायद राहुल गांधी को 1978 में बिहार में दलित हिंसा के बेलछी कांड से इंदिरा गांधी की वापसी के रास्ते की बात समझाई जाती होगी। लेकिन उनकी वापसी एक घटना में सहानुभूति जताने से नहीं, बल्कि जनता पार्टी बिखरने और कांग्रेस की पुरानी संगठन क्षमता से हुई। आज क्या उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में कांग्रेस की संगठन क्षमता है? यही नहीं, दलित बस्तियों में आज भी कांग्रेस राज में हुई हिंसा की बातें दुःख से सुनाई-बताई जाती हैं।
1980 में कांग्रेस बिहार में सत्ता में लौटी। मुख्यमंत्री बने जगन्नाथ मिश्र। इसी दौर की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में पिपरा नरसंहार है। 25 फरवरी 1980 को जहानाबाद क्षेत्र के पिपरा गांव में दलित बस्ती पर हमला हुआ। अनेक घर जला दिए गए और महिलाओं तथा बच्चों सहित दलितों की हत्या की गई। रिपोर्ट में पांच महिलाओं, तीन वयस्क पुरुषों और छह बच्चों सहित 14 मृतकों का उल्लेख है। 1985–86 का दौर कांग्रेस शासन में मध्य बिहार के सबसे गंभीर जातीय संघर्षों में से था। 1987 में नोनाही-नगवां में दलितों की हत्या हुई। जून 1987 की घटना में 18 दलितों के मारे जाने का उल्लेख मिलता है।
2004 में केंद्र में यूपीए सरकार बनी। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह थे और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी। इस दशक में भी कई कांग्रेस-शासित राज्यों में दलित अत्याचार के बड़े मामले सामने आए। 29 सितंबर 2006 को महाराष्ट्र के भंडारा जिले के खैरलांजी गांव में भोतमांगे परिवार के चार सदस्यों की हत्या। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में परिवार के सदस्यों और उनकी अनुसूचित जाति पहचान का स्पष्ट उल्लेख है।
हरियाणा में कांग्रेस के सत्ता काल में 2005 का गोहाना कांड सामने आया। दलित/वाल्मीकि बस्ती के अनेक घरों को आग लगा दी गई। 21 अप्रैल 2010 को हिसार जिले के मिर्चपुर गांव में हिंसक भीड़ ने वाल्मीकि दलित बस्ती के घरों में आग लगा दी। दिल्ली की अदालत में दर्ज न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार 18 दलित घर जलाए गए और एक 60 वर्षीय व्यक्ति तथा उसकी दिव्यांग बेटी आग में जलकर मारे गए।
प्रश्न यह है कि कांग्रेस सरकार के अधीन पुलिस प्रशासन ने दलित नागरिकों की रक्षा क्यों नहीं की और दोषियों को दंड दिलाने में कितनी सफलता मिली? 2004 से 2014 तक अविभाजित आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की सरकार रही। 2004–14 के दौरान दलितों पर अत्याचार के अपराध के 42,060 मामले दर्ज हुए, जिनमें 539 हत्या और 1,084 बलात्कार के अपराध के रिकॉर्ड सरकारी अपराध ब्यूरो में दर्ज हैं। इस हिसाब-किताब को देखते हुए राहुल गांधी की दलित राजनीति से उनकी पार्टी के लिए होने वाले खतरों को देखा जा सकता है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
वरिष्ठ टीवी पत्रकार और लोकप्रिय न्यूज एंकर नग़मा सहर के एनडीटीवी से विदा लेने के बाद वरिष्ठ पत्रकार संजय किशोर ने उनके साथ करीब 20 साल तक काम करने के अनुभव साझा किए हैं।
by
Samachar4media Bureau
वरिष्ठ टीवी पत्रकार और लोकप्रिय न्यूज एंकर नग़मा सहर के एनडीटीवी से विदा लेने के बाद वरिष्ठ पत्रकार संजय किशोर ने उनके साथ करीब 20 साल तक काम करने के अनुभव साझा किए हैं। संजय किशोर ने सोशल मीडिया पर लिखी अपनी पोस्ट में नग़मा सहर की पत्रकारिता, एंकरिंग के अंदाज़ और उनके शांत एवं गरिमापूर्ण व्यक्तित्व को याद किया है। उन्होंने नग़मा के साथ अपने लंबे जुड़ाव के कई अनुभव साझा करते हुए उनके आगे के सफर के लिए शुभकामनाएं भी दी हैं।
संजय किशोर ने अपनी पोस्ट में लिखा है-
नग़मा ने भी उस ‘सहर’ को छोड़ दिया
नग़मा सहर। तक़रीबन बीस साल साथ काम किया। इतने लंबे साथ में किसी इंसान को सिर्फ़ सहकर्मी की तरह नहीं, उसकी शख़्सियत की कई परतों के साथ जानने का मौक़ा मिलता है। नग़मा को भी कुछ ऐसा ही जाना।
एक ऐसी शख़्सियत, जिसे न कभी आपा खोते देखा, न खुलकर ठहाके लगाते हुए। ग़म में ग़मगीन नहीं और ख़ुशी के मौक़े पर भी जश्न में अपनी गरिमा खोते हुए नहीं। शांत आवाज़, संयमित भाषा, बातों में ठहराव, चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान और वह ट्रेडमार्क डिंपल।
और फिर उनका एंकरिंग का अपना एक अलग अंदाज़ था।
जब भी स्पोर्ट्स की कोई बड़ी ख़बर होती, स्टूडियो जाने के ठीक पहले हमसे ब्रीफ़ लेना वह कभी नहीं भूलती थीं। हम अपनी तरफ़ से उन्हें जितना बताते, उतना ही लगता कि अब शायद उन्हें विषय की पूरी जानकारी हो गई होगी। लेकिन ऑन एयर होते ही जब वह डिबेट शुरू करतीं, तो कई बार मन में यही आता था, “हमने तो इन्हें थोड़ा-सा ही बताया था, इन्हें तो पहले से ही सब पता था!”
असल बात यह थी कि वह सिर्फ़ ब्रीफ़ नहीं लेती थीं, उसे आत्मसात करती थीं। सवाल पूछने से पहले विषय को समझती थीं। और यही एक अच्छे एंकर और सिर्फ़ सवाल पूछने वाले एंकर के बीच का फ़र्क़ था।
उनकी एक और बात मुझे हमेशा याद रहेगी। रिपोर्टर हो या कोई सहकर्मी, वह उसे बोलने का पूरा और पर्याप्त मौक़ा देती थीं। अपनी बात मनवाने या अपनी आवाज़ सुनाने की बेचैनी नहीं होती थी। आज के दौर के कई एंकरों की तरह लंबे-लंबे सवालों में ही आधा जवाब ठूँस देने की आदत नहीं थी। वह सवाल करती थीं, फिर सामने वाले को सुनती थीं। सचमुच सुनती थीं।
शायद इसलिए उनकी डिबेट में शोर कम और संवाद ज़्यादा होता था।
और शायद यही वजह थी कि उनकी आवाज़ सिर्फ़ सुनाई नहीं देती थी, ठहरती थी। न्यूज़रूम के शोर में भी उनकी आवाज़ का अपना एक सुकून था। ऊँची आवाज़ के बिना अपनी बात कह देना और बिना हावी हुए अपनी मौजूदगी दर्ज करा देना, यह हुनर हर किसी के पास नहीं होता।
आपने ऐसे समय में पत्रकारिता की अपनी पहचान बनाई, जब टेलीविज़न न्यूज़ धीरे-धीरे आवाज़ की ऊँचाई को पत्रकारिता की ताक़त समझने लगा था। लेकिन आपकी ताक़त हमेशा आपकी आवाज़ की ऊँचाई नहीं, उसका ठहराव और उसकी विश्वसनीयता रही।
पटना वीमेंस कॉलेज से शुरुआत, दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और फिर ‘हम लोग’ तथा ‘इंटरनेशनल एजेंडा’ जैसे यादगार कार्यक्रमों तक का सफ़र अपने आप में प्रेरणादायक है। लेकिन मेरे लिए आपकी सबसे बड़ी पहचान उन उपलब्धियों से कहीं आगे है।
आप उस दौर की याद हैं, जब न्यूज़ एंकर होना सिर्फ़ स्क्रीन पर दिखाई देना नहीं था। उसमें पढ़ना था, समझना था, सुनना था और सबसे बढ़कर, गरिमा के साथ अपनी बात रखना था।
टेलीविज़न न्यूज़ के उस सुनहरे दौर में आपके साथ इतने वर्षों तक काम करना और आपको इतने क़रीब से देखना मेरे लिए हमेशा एक विशेष अनुभव रहेगा।
और एक साथी पटना वाले के तौर पर, आपके सफ़र पर हमेशा एक अलग तरह का गर्व रहेगा।
नग़मा, आप सचमुच उस शांत, संयमित और गरिमापूर्ण आवाज़ की आख़िरी मज़बूत कड़ी थीं, जो आज के शोर में कहीं खोती जा रही है।
बहुत कुछ बदला, बहुत लोग आए और चले गए। लेकिन कुछ आवाज़ें सिर्फ़ याद नहीं रहतीं, एक दौर की पहचान बन जाती हैं।
आप भी ऐसी ही एक आवाज़ हैं।
आगे का सफ़र और भी ख़ूबसूरत हो, नग़मा।
उसी ठहराव, उसी गरिमा और उसी ट्रेडमार्क डिंपल के साथ।
(वरिष्ठ पत्रकार संजय किशोर की फेसबुक वॉल से साभार)
हल्ला मचने के बाद अब बैंक इस फैसले के खिलाफ अपील करने जा रहे हैं। बैंक Essel ग्रुप की कंपनियों से भी अलग से वसूली में लगे हैं, जिनकी गारंटी सुभाष चंद्रा ने ली थी।
by
Samachar4media Bureau
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
अरुण शौरी का करीब दस साल पुराना वीडियो वायरल हो रहा है। वो IBC के बारे में बात कर रहे हैं। तब IBC यानी Insolvency and Bankruptcy Code लागू ही हो रहा था। उन्होंने उदाहरण देकर बताया कि किसी कंपनी ने खुद को दिवालिया घोषित किया और फिर कंपनी के भाई की पत्नी ने आने-पौने दाम पर कंपनी खरीद ली। नए नियमों के तहत भाई की पत्नी को देनदार का रिश्तेदार नहीं माना जाता है। अब आइए Z टीवी के संस्थापक सुभाष चंद्रा के केस पर।
सुभाष चंद्रा पर करीब 22 हजार करोड़ रुपये का दावा NCLT में किया गया था। अगर कोई कंपनी लोन नहीं चुका रही है या गारंटी देने वाले से वसूली करनी है तो IBC के तहत केस NCLT (नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल) में चलता है। सुभाष चंद्रा का केस 6.5 करोड़ रुपये में निपट गया। ₹100 की देनदारी थी तो 3 पैसे देकर वो छूट गए। इसे फाइनेंस की भाषा में हेयर कट कहते हैं। 99.97% हेयर कट हो गया। हिसाब-किताब में समझेंगे कि ये खेल कैसे हुआ?
NCLT के सामने अगर किसी प्रस्ताव पर 75% से ज्यादा लेनदारों के वोट पड़ जाते हैं तो प्रस्ताव पास हो जाता है। सेटलमेंट के पक्ष में 80% वोट पड़े। जिन्होंने पक्ष में वोट दिया, उनमें से 35% सुभाष चंद्रा के भाई जवाहर गोयल की पत्नी की कंपनियों ने दिए, जबकि 27% वोट जिन कंपनियों ने दिया, उनके डायरेक्टर का Essel ग्रुप की कंपनियों से नाता रहा है। 62% वोट घर से ही मिलने का आरोप है, लेकिन NCLT ने यह आपत्ति नहीं मानी कि ये कंपनियां सुभाष चंद्रा की Associate हैं। LIC Housing, HDFC Bank समेत कई बैंकों के करीब 4 हजार करोड़ रुपये बकाया हैं, लेकिन उनके पास सिर्फ 20% ही वोट थे।
एक बात यह जान लीजिए कि सुभाष चंद्रा ने खुद 22 हजार करोड़ रुपये का लोन नहीं लिया था। लोन उनके Essel ग्रुप की कंपनियों ने लिया था। ये कंपनियां मुख्य तौर पर इंफ्रास्ट्रक्चर का काम करती थीं। यह Z टीवी से अलग बिजनेस है। इस लोन की गारंटी सुभाष चंद्रा ने ली थी। कंपनियां लोन नहीं चुका पाईं तो लेनदारों ने NCLT में केस कर दिया।
लेनदारों में LIC Housing, Indiabulls, HDFC Bank, Union Bank, Axis Bank, RBL Bank जैसी बड़ी कंपनियां शामिल थीं। इनका बकाया करीब 4 हजार करोड़ रुपये था। लेनदारों में वीणा इन्वेस्टमेंट ग्रुप कंपनियां (करीब 35%), Lemonade Capital और Corpcall Capital (27%) भी शामिल हो गए। इन कंपनियों का दावा था कि सुभाष चंद्रा ने जो गारंटी दी थी, उसमें उनका भी इस्तेमाल किया गया था।
मोटे तौर पर उनके शेयर गिरवी रखे थे। उन्होंने करीब 14 हजार करोड़ रुपये का दावा किया। बैंक कहते रहे कि ये कंपनियां सुभाष चंद्रा से जुड़ी हुई हैं। इनको लेनदार नहीं मानना चाहिए। वीणा इन्वेस्टमेंट ग्रुप कंपनियों की मालकिन सुशीला गोयल हैं। वो सुभाष के छोटे भाई जवाहर की पत्नी हैं। बाकी दोनों कंपनियों Lemonade Capital और Corpcall Capital के डायरेक्टर पहले Essel ग्रुप की कंपनियों में डायरेक्टर रह चुके हैं। ट्रिब्यूनल ने बैंकों की आपत्ति को खारिज कर दिया। कानूनन सुभाष चंद्रा की जीत हुई।
हल्ला मचने के बाद अब बैंक इस फैसले के खिलाफ अपील करने जा रहे हैं। बैंक Essel ग्रुप की कंपनियों से भी अलग से वसूली में लगे हैं, जिनकी गारंटी सुभाष चंद्रा ने ली थी। सरकारी सूत्रों का दावा है कि उनसे करीब 1400 करोड़ की वसूली हो सकती है, जबकि कुल लोन 4 हजार करोड़ रुपये का है। यह लंबी प्रक्रिया है।
अब अरुण शौरी के बयान पर लौटिए। लोन डूबाने के बाद आपके रिश्तेदार या जान-पहचान के लोग ही आपको सस्ते में छुड़वा सकते हैं, जैसा सुभाष चंद्रा के भाई की पत्नी ने दावा ठोककर किया। सवाल IBC पर भी उठ रहे हैं, जिसे सरकार बड़ा रिफॉर्म बताती रही है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी आधुनिक सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप संगठन के डिजिटल विस्तार की जरूरत स्वीकार की है।
by
Samachar4media Bureau
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने नई दिल्ली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय 'केशव कुंज' में एक पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में जेन जी और जेन अल्फा के हंगामी प्रचार पर बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया। उन्होंने इन दोनों श्रेणियों को पूरी तरह से "पश्चिमी और यूरोपीय अवधारणा" बताते हुए खारिज कर दिया। मुख्यमंत्री ने कहा, "हमारे देश में जेन जी या जेन अल्फा जैसा कोई कॉन्सेप्ट नहीं है। ये शब्द अमेरिका और यूरोप से आते हैं, उस संस्कृति से हमारा कोई लेना-देना नहीं है।" उन्होंने जोर देकर कहा, "मेरे लिए हमारे देश और असम के युवा कोई 'जेन जी' या 'जेन अल्फा' नहीं हैं, बल्कि वे हमारे अपने बेटे और बेटियां हैं। हम अपने बच्चों को किसी भी श्रेणी में नहीं बांटेंगे।"
उन्होंने कहा कि भारतीय समाज पारंपरिक रूप से पीढ़ियों को पारिवारिक रिश्तों (जैसे माता-पिता, दादा-दादी, बेटे-बेटी) के माध्यम से समझता है। इसलिए बच्चों को ऐसे पश्चिमी लेबलों में कैद करने के बजाय, हमें एक परिवार की तरह मिलकर रहना चाहिए और बच्चों के कल्याण व देश को आगे बढ़ाने के लिए काम करना चाहिए। पुस्तक विमोचन के बाद उन्होंने यह टिप्पणी गुजरात (सोमनाथ) और मीडिया के अन्य पत्रकारों के साथ बातचीत के दौरान भी साझा की।
हाल के वर्षों में हिमंत बिस्वा सरमा भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री के रूप में ही नहीं, भारतीय जीवन मूल्यों, संस्कारों, हिंदुत्व की संस्कृति पर प्रभावी ढंग से राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे हैं। वह संभवतः कभी संघ के स्वयंसेवक नहीं रहे होंगे, लेकिन कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता से शीर्ष नेता बनते हुए असम और संपूर्ण भारत के लिए विदेशी ताकतों-संगठनों से हुए नुकसान को गहराई से समझे हुए हैं। पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में भी उन्होंने अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक विनम्रता और दृढ़ता से अपनी बातें रखीं। जबकि संघ से जुड़े वक्ता जेन जी, जेन अल्फा का उल्लेख करते हुए औपचारिक भाषण देते रहे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी आधुनिक सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप संगठन के डिजिटल विस्तार की जरूरत स्वीकार की है। एक रिपोर्ट के अनुसार संघ जेन जी और डिजिटल संपर्क तंत्र पर ध्यान दे रहा है तथा स्वयंसेवकों को तकनीक के उपयोग का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। वहीं श्री भागवत ने चेतावनी दी कि संगठन को केवल प्रचारोन्मुख नहीं बनना चाहिए। यह बहुत दिलचस्प विरोधाभास है।
हाल के वर्षों में संघ-भाजपा में यह अंतर्विरोध चुनौतियों के साथ खतरा भी बन रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि संघ प्रमुख और उनके सहयोगी दत्तात्रेय होसबोले के साथ कई प्रचारक मूल संस्कारों और विचारधारा पर जोर दे रहे हैं। दोनों संगठनों में जहां समर्पित लोग हैं, वहीं सत्ता से पद और स्वार्थों की पूर्ति में लगे हैं। इससे छवि पर असर पड़ रहा है। हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच पार्टी के आंदोलन और उसके पीछे रही बाहरी ताकतों-संगठनों के दबाव से सरकार के कुछ नेताओं को जेन जी का राग गाना पड़ा है।
लेकिन सत्ता से लाभान्वित संघ-भाजपा के युवा संगठनों ने छात्रों की समस्याओं पर संघर्ष और सहयोग के लिए क्या कोई योगदान दिया? सही बात तो यह है कि भाजपा के कई नेताओं की तरह दूसरी-तीसरी पंक्ति के नेता-कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर प्रचार तक सीमित रहने लगे। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अधिकांश बैठकों में सांसदों, विधायकों और अन्य नेताओं को जनता के बीच घर-घर तक जाने की आवश्यकता बता रहे हैं। आखिरकार जनता से जुड़े होने के कारण उत्तर-पश्चिम भारत के साथ पूर्वोत्तर में संघ-भाजपा शक्तिशाली होकर सत्ता में आई।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी 'ग्रिट एंड ग्लोरी' नामक जिस पुस्तक का लोकार्पण किया, वह असम और पूर्वोत्तर भारत के उन लोगों के योगदान को रेखांकित करती है, जिन्होंने बहुत ही निष्ठा और निस्वार्थ भाव से संघ के साथ मिलकर काम किया और क्षेत्र में सामाजिक परिवर्तन लाने में अपना योगदान दिया। यह पुस्तक पूर्वोत्तर भारत के इतिहास, उसकी चुनौतियों और वहां हुए सामाजिक बदलावों पर केंद्रित है। इसमें विशेष रूप से आरएसएस के प्रचारकों और उससे जुड़े संगठनों के उन कार्यकर्ताओं के अनुभवों को संकलित किया गया है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में काम किया।
वे लोग बिना किसी स्थापित नेटवर्क या संसाधनों के बेहद सुदूर और अपरिचित क्षेत्रों में गए। उन्होंने कठिन जीवन परिस्थितियों, उग्रवादी समूहों की धमकियों, शारीरिक हमलों और अन्य कठिनाइयों का सामना करते हुए भी समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण का अपना काम जारी रखा। अक्सर इस क्षेत्र को केवल संघर्ष, अलगाववाद या उग्रवाद के चश्मे से देखा जाता रहा है। लेकिन यह पुस्तक दर्शाती है कि समाज केवल सरकारी नीतियों या संस्थाओं से नहीं बदलता, बल्कि जमीन पर चुपचाप काम करने वाले लोगों के साहस, दृढ़ता और सेवा भाव से बदलता है।
संघ में प्रचारक का अर्थ ही था—व्यक्तिगत सुविधा छोड़कर संगठन को पूरा समय देना। प्रचारक अक्सर साधारण जीवन जीता था, एक जगह से दूसरी जगह जाता था, कार्यकर्ताओं के घर रुकता था, साइकिल/बस/रेल से यात्रा करता था और स्थानीय समाज में लगातार व्यक्तिगत संपर्क बनाता था। उसकी सबसे बड़ी ताकत मोबाइल फोन, सोशल मीडिया या बड़ा कार्यालय नहीं, बल्कि व्यक्ति से व्यक्ति का संपर्क थी। इसीलिए पुराने प्रचारक किसी शहर में पहुंचते थे तो पत्रकार, शिक्षक, व्यापारी, किसान, विद्यार्थी, डॉक्टर, वकील और स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं के घर जाकर घंटों बातचीत करते थे। शाखा और छोटी बैठकों के माध्यम से धीरे-धीरे नेटवर्क बनता था।
दिल्ली के झंडेवाला स्थित पुराने संघ कार्यालय में पदों से प्रचारक अलग नहीं पहचाने जाते थे। एक पत्रकार के नाते 1972 से मुझे कई बार इस कार्यालय में जाने के अवसर मिले। वरिष्ठ प्रचारक चमनलालजी के माध्यम से सरसंघचालक तक से भेंट करना कठिन नहीं था। प्रोफेसर राजेंद्र सिंह (रज्जु भैया) और के.सी. सुदर्शनजी के लंबे इंटरव्यू छोटे से कमरे में सामान्य कुर्सियों पर बैठकर हो जाते थे। नई बिल्डिंग्स के टावर बनने से पहले प्रचारक अपने कमरों या हॉल में सामान्य ढंग से खाट पर सोते और जमीन पर बैठकर भोजन किया करते थे। पिछले सप्ताह पूर्वोत्तर पर पुस्तक लोकार्पण के कार्यक्रम के लिए पहली बार संघ के भव्यतम भवनों वाला कार्यालय देखने का अवसर मिला। बाहर सुरक्षा व्यवस्था किसी सरकारी मंत्रालय और कॉरपोरेट कंपनी से भी अधिक दिखी। पांच सितारा रंग-ढंग देखकर पता चला कि संघ कितना बदल गया है।
अपनी शताब्दी वर्ष की योजना में संघ ने हर गांव और हर घर तक पहुंचने तथा लगभग 58,964 मंडलों और 44,055 बस्तियों में हिंदू सम्मेलन आयोजित करने का लक्ष्य बताया था। लेकिन काम करने का तरीका निश्चित रूप से बदल रहा है। पहले प्रचारक का प्रभाव मुख्यतः स्थानीय संगठन और व्यक्तिगत संबंधों से बनता था। आज एक वरिष्ठ प्रचारक के पास बड़ा संगठनात्मक कार्यालय, यात्रा की बेहतर सुविधा, डिजिटल संचार, व्हाट्सऐप समूह, वीडियो कॉन्फ्रेंस, सोशल मीडिया टीम, मीडिया संपर्क, विभिन्न संगठनों के साथ समन्वय जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
आधुनिक भवन भी इसी बदलाव का प्रतीक है। ‘केशव कुंज’ को केवल कार्यालय भवन के रूप में नहीं, बल्कि संगठनात्मक गतिविधियों, प्रशिक्षण, आवास, प्रकाशन, अध्ययन और बड़े कार्यक्रमों के लिए एक बहुउद्देश्यीय परिसर के रूप में विकसित किया गया है। इसका पुनर्निर्माण लगभग 150 करोड़ रुपये की लागत से हुआ बताया जाता है। केशव कुंज परिसर में तीन टावर—‘साधना’, ‘प्रेरणा’ और ‘अर्चना’ हैं।
प्रत्येक टावर ग्राउंड फ्लोर के अलावा 12 मंजिल का है। कुल मिलाकर लगभग 300 कमरे और कार्यालय स्थान हैं। यहां तीन बड़े सभागारों की कुल क्षमता 1,300 से अधिक बताई गई है। इसी तरह हाल ही में नागपुर में भी संघ मुख्यालय के स्मृति मंदिर परिसर के लगभग ₹300 करोड़ के पुनर्विकास की प्रक्रिया शुरू की है। इसका प्रमुख उद्देश्य पुराने ढांचे को आधुनिक बनाना और 2027 में नागपुर में होने वाली अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के लिए बड़ी एवं आधुनिक सुविधाएं तैयार करना है। इस दृष्टि से नए रूप में संघ-भाजपा को पुराने संस्कारों, आधुनिक विचारों में समन्वय और जनता से जीवंत संपर्क की चुनौती सबसे अधिक रहने वाली है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
बहुत कुछ तो एआई कर ही रहा है। सीखते हुए बड़ी और समझदार हो रही मशीनें क्या हमें लिखने लायक भी छोंडेंगी? मशीनों पर बढ़ती निर्भरता क्या हमें मौलिक चिंतन के लायक छोड़ेगी?
by
Samachar4media Bureau
प्रो.संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष।
अब जब वह जमाना बीत रहा है जिसमें हम अपने पसंदीदा लेखकों को मुग्ध होकर पढ़ते थे, उनकी भाषा, उनकी शैली की दीवानगी हमें उनसे जोड़कर रखती थी। यह ऐसा रिश्ता था जो हमें किसी खास लेखक का पाठक बना देता था। क्या डिजिटल क्रांति के इस दौर में मशीनें जिस तरह लिख-पढ़ रही हैं, लेखकों का वजूद रह जाएगा? जनरेटिव एआई अब केवल तकनीकी टूल न रहकर भाषा, विचार और अभिव्यक्ति का माध्यम बन रही हैं, उससे चिंता की लकीरें गहरी हो गयी हैं। हमें आश्वासन दिए जा रहे हैं कि वे एक मशीनी भाषा लिखेंगीं, पर दिल कहां से लाएंगी? संवेदनाएं कहां से लाएंगीं? लेकिन दिमाग इस तरह से भी सोचता है कि अगर वे दिल और भावनाएं भी ला सकीं, हमारे आपके जैसा ही सोचने और लिखने लगीं तो क्या होगा?
हमारे लिए क्या छोड़ेंगी मशीनें?
बहुत कुछ तो एआई कर ही रहा है। सीखते हुए बड़ी और समझदार हो रही मशीनें क्या हमें लिखने लायक भी छोंडेंगी? मशीनों पर बढ़ती निर्भरता क्या हमें मौलिक चिंतन के लायक छोड़ेगी? ये बड़े सवाल हैं। एआई के अनेक टूल्स हिंदी और भारतीय भाषाओं में धाराप्रवाह लिख रहे हैं, कंटेट क्रिएट कर रहे हैं। यह हमारी भाषाई विविधता के लिए बड़ा अवसर है या भाषाई पहचान और भाषा से जुड़े व्यवसाय के लिए संकट के दिन, कहना कठिन है। माना जा रहा है कि ये प्रयोग डिजिटल खाइयों (डिजिटल डिवाइड) को कम करेंगें। अंग्रेजी न लिखने, बोलने और समझने वाले बड़े समाज के लिए बहुत कुछ पहुंच में आ जाएगा।
वे सरकारी योजनाओं, सेवाओं, सूचनाओं को अपनी भाषा में ग्रहण कर सकेंगें। भारतीय भाषाओं का ‘रीयल टाइम अनुवाद’ हमारी भाषाई सद्भावना को बढ़ाने का काम करेगा। हमारा संपूर्ण भारतीय साहित्य और ज्ञान परंपरा सब भाषा भाषियों तक पहुंच सकेगा। इसी के साथ लुप्त हो रही बोलियां, संवाद और लोक परंपराएं और प्रदर्शन कलाएं संरक्षित किए जाने की पहल भी हो सकती है। डिजिटल आकार्इव हमें यह सुविधा देगा कि हम अपना बहुत कुछ बचा सकें और अपनी-अपनी भाषाओं में उसे सुन सकें, पढ़ सकें।
क्या रूप, रस, गंध खो बैठेंगीं भाषाएं?
सबसे बड़ा संकट है भाषाओं की आत्मा का। उसकी चिति का। उसके मुहावरों- लोकोक्तियों का। उसके नाद का। मशीनी अनुवाद,मशीनी लेखन से भाषाएं क्या अपना मूल रस,स्वाद,गंध और भाव खो बैठेंगी। क्या उन्हें संवेदना के तल पर रिक्त छोड़ दिया जाएगा। क्या भाषाएं अब सूचना की वाहक तो होंगीं किंतु भावों का निर्वहन करने लायक नहीं बचेंगीं? हमारे एआई माडल्स मूलतः पश्चिमी या अंग्रेजी डेटासेट पर प्रशिक्षित हैं। वे भारतीय भाषाओं का सुंदर अनुवाद कर रहे हैं। लेकिन उसमें प्रयुक्त मुहावरों, लोकोक्तियों, मानवीय संस्पर्श की कोमल भावनाओं, व्यंग्य और भावनात्मक गहराई को छू नहीं पा रहे हैं। संभावना है कि वे भविष्य में इन्हें छूने और पकड़ने का प्रयास करें।
भाषाई समरूपता कई बार भाषा प्रवाह में ही बाधा बनती है। मशीनी अनुवाद की सीमाएं भी जाहिर ही हैं। इनके कारण लेखन में मशीनीपन और भाषा में भाव की कमी साफ दिखती है। भारतीय भाषाओं की डेटा आज भी बहुत कम है। वे समाज में गहरी पैठी हुई भाषाएं तो हैं किंतु डिजिटल दुनिया में उनकी उपस्थिति अभी सीमित है। ऐसे में स्थानीय डेटासेट बड़ी संभावनाओं के द्वार खोलता है। भारतीय भाषाओं के लिए स्वदेशी टूल्स (एलएलएम्स) का विकास जरुरी है, जिससे हमारी भाषाएं भी अपने सामर्थ्य का प्रदर्शन यहां कर सकें।
इससे हमारी संस्कृति, हमारी वाक् परंपरा और व्याकरण का संरक्षण भी होगा। सभी कहते हैं कि एआई को सहायक के रुप में देखें न कि लेखक के रूप में। लेकिन एआई पर बढ़ती निर्भरता क्या लेखक के विचारों और उसकी चिंतन प्रक्रिया को अनुकूलित नहीं करेगी? वह उन्हीं विषयों, विचारों और दायरों में कैद होकर रह जाएगा जहां एआई उसे ले जाएगी। स्वतंत्र चिंतन के लिए एआई का प्रयोग कितना उपयोगी है, यह सोचने की जरुरत है। आज हमारे पास कोई नीतिगत ढांचा और नैतिक निर्देश नहीं हैं। ऐसे में हम अपनी हदों और सरहदों को कैसे तय करें?
संस्कृति की वाहक है भाषा-
इसमें दो राय नहीं कि एआई के पास भाषा आ चुकी है। वह उसे लिखना, बोलना और व्यक्त करना जानता है। कई बार उसकी भाषा परिशुद्ध भी होती है, गलतियों के बिना और व्याकरणपरक भी। बावजूद इसके उसके मशीनीकृत रूप के भी कई रूप रचे जा सकते हैं। वह अनेक शैलियों में पारंगत हो रहा है। अनुवाद कुशल तो वह है ही। ऐसे में भाषा की आत्मा का क्या होगा, यह प्रश्न ज्यों का त्यों सामने खड़ा है। भाषा अकेली नहीं आती, वह किसी संस्कृति की वाहक होती है। स्थानीयता की भी वाहक होती है। संवेदना, विचार, संस्कृति और स्थानीय तत्वों से मिलकर भाषा अपने मुहावरे में ही मुक्ति पाती है। इससे उसकी दुनिया बड़ी होती है। उसका पाठक संसार खड़ा होता है। भारतीय भाषाओं के सामने सबसे बड़ा संकट यही है क्या वे अपनी मूल चेतना और रस-गंध को खो बैठेंगीं? वे सूचनाएं देंगी पर पर कुछ कहेंगीं नहीं। बतियाएंगी नहीं। उनमें बातें कहने की क्षमता हो सकती है पर वे संवाद नहीं कर पाएंगी।
सूचना का सुपर हाइवे मौलिकता की बलि न ले-
तकनीक की तेज रफ्तार के बीच में हमें भाषाई मौलिकता,मानवीय संस्पर्श को बचाए और बनाए रखने के सचेतन प्रयास करने होगें। डिजिटल क्रांति से भाषाओं का विस्तार तो हो किंतु उनकी मूल संवेदना, मुहावरे, लोकोक्तियां और संस्कृति न छूटें इसका प्रयास हम भाषाप्रेमियों को ही करना होगा। भाषाई दीवारें गिराने पर आमादा एआई हमारे लिए एक अवसर है, किंतु यह अवसर आत्मसमर्पण का कारण नहीं बने, इसके लिए हमें सोचना होगा। शब्द इंसान के हों किंतु भाषा मशीनी हो ऐसा तो हममें से कोई नहीं चाहेगा। सूचना का यह सुपर हाइवे हमारी मौलिकता की बलि न ले ले, इसकी जिम्मेदारी हर उस व्यक्ति की है जो अपनी भाषा से प्यार करता है।
यह लेखक के निजी विचार हैं।
'एक्सचेंज4मीडिया' के फाउंडर और 'BW बिजनेसवर्ल्ड' के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के जन्मदिन पर कम्युनिकेशन कंसल्टेंट और लेखक गणपति विश्वनाथन ने उनके व्यक्तित्व को शब्दों में पिरोया है
by
Samachar4media Bureau
गणपति विश्वनाथन, कम्युनिकेशन कंसल्टेंट और लेखक।
कुछ लोग बिजनेस खड़ा करते हैं, कुछ ब्रैंड बनाते हैं और कुछ खास लोग ऐसे होते हैं, जो संस्थान तैयार करते हैं। 'एक्सचेंज4मीडिया' (exchange4media) ग्रुप के फाउंडर और 'BW बिजनेसवर्ल्ड' के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ऐसे ही लोगों में शामिल हैं।
आज, जब डॉ. अनुराग बत्रा 54 साल के हो गए हैं, तो कम्युनिकेशन कंसल्टेंट और लेखक गणपति विश्वनाथन ने उनके अब तक के सफर को शब्दों में पिरोया है। गणपति विश्वनाथन के अनुसार, डॉ. अनुराग बत्रा की कहानी केवल उनकी उपलब्धियों की कहानी नहीं है, बल्कि उस तरीके की भी कहानी है, जिससे उन्होंने यह सब खड़ा किया—आस्था, जुनून, निरंतरता और सबसे बढ़कर भविष्य पर लगातार नजर रखते हुए।
गणपति विश्वनाथन लिखते हैं कि डॉ. अनुराग बत्रा एक बेहद आस्थावान व्यक्ति हैं, जिनके लिए काम ही पूजा है। उनकी आस्था उनके व्यक्तित्व का एक अहम हिस्सा है, लेकिन काम के प्रति उनकी असाधारण ऊर्जा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। वह ऐसे व्यक्ति हैं, जिनके मन में हमेशा कुछ न कुछ चलता रहता है। एक नया विचार, नया अवसर, नई संभावना या किसी चीज को और बेहतर बनाने का नया तरीका।
डॉ. अनुराग बत्रा ने अपने पार्टनर नवल आहूजा के साथ एक-एक ईंट जोड़ते हुए ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) को खड़ा किया। एक केंद्रित प्लेटफॉर्म के तौर पर शुरू हुआ यह सफर वर्षों में भारतीय मीडिया, मार्केटिंग और एडवरटाइजिंग इकोसिस्टम में एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली उपस्थिति के रूप में विकसित हुआ।
हालांकि, उनका सफर यहीं नहीं रुका। डॉ. अनुराग बत्रा ने लगातार अपने मीडिया विस्तार को आगे बढ़ाया और ‘बिजनेसवर्ल्ड’ (BusinessWorld) तथा ‘इम्पैक्ट’ (IMPACT) को समूह में शामिल किया। इसके साथ ही पब्लिकेशंस और प्लेटफॉर्म्स का एक बड़ा इकोसिस्टम तैयार हुआ। इस यात्रा की खास बात मीडिया के प्रति उनका 360 डिग्री दृष्टिकोण है। समूह ने बिजनेस, मार्केटिंग, एडवरटाइजिंग, मीडिया और इन इंडस्ट्रीज को आकार देने वाले लोगों, विचारों और चर्चाओं के बीच अपनी उपस्थिति बनाई है।
गणपति विश्वनाथन के अनुसार, डॉ. अनुराग बत्रा की सबसे बड़ी ताकतों में से एक यही है कि वह पब्लिशिंग को केवल कंटेंट तैयार करने का बिजनेस नहीं मानते, बल्कि इसे बातचीत और संवाद तैयार करने का माध्यम समझते हैं। यही बातचीत किसी भी इंडस्ट्री को जीवंत बनाए रखती है।
डॉ. अनुराग बत्रा हमेशा अपनी सोच में साहसी रहे हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनका दृष्टिकोण हमेशा भविष्य की ओर रहा है। उन्होंने यह समझा कि मीडिया बिजनेस केवल कल क्या हुआ, इसे देखकर नहीं चल सकता। उसे यह भी समझना होगा कि आने वाले समय में दर्शक और पाठक क्या चाहेंगे।
परिवर्तन को पहले से भांपने की इसी क्षमता ने उनके पब्लिकेशंस को समसामयिक, प्रासंगिक और अपने दर्शकों के लिए उपयोगी बनाए रखने में मदद की है। दिल से इनोवेटर डॉ. अनुराग बत्रा लगातार इस बात पर विचार करते रहते हैं कि उनके प्लेटफॉर्म्स को और अधिक जानकारीपूर्ण, समकालीन और दर्शकों के लिए उपयोगी कैसे बनाया जाए। वह केवल वही करते रहने में सहज नहीं हैं, जो हमेशा से होता आया है। उनके मन में हमेशा एक सवाल रहता है—‘अब आगे क्या?’
शायद यही सवाल उनके पूरे सफर की प्रमुख प्रेरक शक्तियों में से एक रहा है। आज भारत के मार्केटिंग और एडवरटाइजिंग इकोसिस्टम में किसी प्रमुख प्लेटफॉर्म का नाम आता है तो ‘एक्सचेंज4मीडिया’ का नाम स्वाभाविक रूप से सामने आता है। इस तरह की ब्रैंड पहचान रातोंरात नहीं बनती। इसके पीछे वर्षों की लगातार मेहनत, इंडस्ट्री से रिश्ते, विश्वसनीयता और यह समझ शामिल होती है कि लोग क्या जानना और किस बारे में बात करना चाहते हैं।
हालांकि, डॉ. अनुराग बत्रा की एक और खासियत है, जो गणपति विश्वनाथन को विशेष रूप से प्रभावित करती है। उन्होंने इतना कुछ बनाया है, लेकिन आज भी वह ऐसे व्यक्ति की तरह काम करते हैं, जैसे अभी भी कुछ बनाने की शुरुआत कर रहे हों।
उनमें मंजिल पर पहुंच जाने का कोई भाव नहीं है। इसके बजाय, आगे क्या है, इसे जानने की एक निरंतर जिज्ञासा है। शायद यही वजह है कि 54 की उम्र उन्हें केवल एक संख्या नहीं, बल्कि एक ऐसे पड़ाव के रूप में दिखाती है, जहां पीछे के अनुभव भी हैं और भविष्य की संभावनियां भी साफ दिखाई देती हैं।
गणपति विश्वनाथन के शब्दों में, यही वह अनुराग हैं, जिन्हें वह जानते हैं एक ऐसा व्यक्ति, जो आस्था से प्रेरित है, काम से ऊर्जा पाता है और जिसकी नजर लगातार आने वाले कल पर रहती है। 54 साल की उम्र में डॉ. अनुराग बत्रा एक महत्वपूर्ण विरासत बना चुके हैं। लेकिन गणपति विश्वनाथन का मानना है कि अनुराग बत्रा शायद पीछे मुड़कर अपनी विरासत को देखने में उतनी रुचि नहीं रखते। वह इससे ज्यादा इस बारे में सोचना पसंद करेंगे कि अगला क्या बनाया जा सकता है।
गणपति विश्वनाथन के अनुसार, डॉ. अनुराग बत्रा शायद अपने सफर को आगे मौजूद संभावनाओं से मापते रहेंगे। डॉ. अनुराग बत्रा के 54वें जन्मदिन पर गणपति विश्वनाथन ने उन्हें निरंतर सफलता, खुशी, अच्छे स्वास्थ्य और सबसे बढ़कर उसी जुनून और बेचैन ऊर्जा के लिए शुभकामनाएं दी हैं, जिसने उनके सफर को परिभाषित किया है। 54 साल की उम्र। पीछे एक लंबा और महत्वपूर्ण सफर। और आगे शायद उससे भी ज्यादा रोमांचक यात्रा इंतजार कर रही है। जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं, डॉ. अनुराग बत्रा।
Subramanian Krishnan की किताब ‘Guilty As Bought’ बताएगी आखिर भारतीय वही क्यों खरीदते हैं जो वे खरीदते हैं
by
Samachar4media Bureau
गणपति विश्वनाथन, कम्युनिकेशन कंसल्टेंट और लेखक।
“Helping. Challengers. Grow. At the intersection of business, brand and culture.” यानी ऐसे बिजनेस और ब्रैंड्स को आगे बढ़ने में मदद करना, जो कुछ नया करने की चुनौती लेते हैं और बिजनेस, ब्रैंड व कल्चर के बीच बेहतर तालमेल बनाते हैं। सुब्रमण्यम कृष्णन खुद को LinkedIn पर कुछ इसी तरह पेश करते हैं। उन्हें आमतौर पर 'सुबू' (Subu) के नाम से जाना जाता है। उन्होंने तीन दशक से ज्यादा समय रणनीति, प्लानिंग, ऐडवर्टाइजिंग और ब्रैंड बिल्डिंग की दुनिया में काम करते हुए बिताया है।
सुबू ने अपने करियर की शुरुआत सेल्स से की थी। इसके बाद उन्होंने ऐडवर्टाइजिंग की दुनिया में कदम रखा, जहां रणनीति और प्लानिंग उनकी खासियत बन गई। वर्षों के दौरान उन्होंने भारत के साथ-साथ इंटरनेशनल मार्केट्स में भी काम किया और एक थिंकर के तौर पर खुद के लिए लगातार नए मानक तय किए। साथ ही उन्होंने यह समझ विकसित की कि किसी ब्रैंड को मजबूत बनाने के लिए किन चीजों की जरूरत होती है।
अब तीन दशक से ज्यादा समय तक बिजनेस, ब्रैंड्स और कंज्यूमर्स को करीब से देखने के बाद उन्होंने अपने अनुभव और सोच को एक किताब का रूप दिया है। इस किताब का नाम है Guilty As Bought: The Hidden Forces Shaping Why Indians Buy.
इस किताब को कुछ हफ्ते पहले लॉन्च किया गया था और अब यह Amazon पर उपलब्ध है। व्यस्त प्रोफेशनल जिंदगी के बीच किसी किताब को पूरा करके उसे पाठकों तक पहुंचाना कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। हालांकि, रणनीति और प्लानिंग के क्षेत्र में सुबू के लंबे अनुभव ने उन्हें इस तरह की किताब लिखने के लिए जरूरी नजरिया और कई अहम ऑब्जर्वेशन दिए हैं।
आखिर भारतीय वही क्यों खरीदते हैं जो वे खरीदते हैं?
इस किताब के केंद्र में एक आसान लेकिन दिलचस्प सवाल है: भारतीय वही चीजें क्यों खरीदते हैं, जो वे खरीदते हैं?
सुबू के मुताबिक, इसका जवाब सिर्फ आज के ट्रेंड्स को देखकर नहीं मिल सकता। कंज्यूमर बिहेवियर कई दशकों में हुए छोटे-छोटे बदलावों से बनता है। सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और पीढ़ियों से जुड़े कई ऐसे बदलाव हैं, जो अक्सर सतह के नीचे काम करते रहते हैं और हमारे खरीदारी के फैसलों को प्रभावित करते हैं।
हमें लग सकता है कि हम अपनी पसंद से स्वतंत्र रूप से फैसले लेते हैं। लेकिन हम क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं, क्या देखते हैं, कौन सी गाड़ी चलाते हैं और क्या खरीदते हैं- इन सभी चीजों पर कई बड़े फैक्टर्स का असर होता है।हमारी परवरिश, हमारी महत्वाकांक्षाएं, बदलती लाइफस्टाइल, सामाजिक माहौल, संस्कृति और हमारे आसपास की दुनिया, सभी हमारी पसंद को प्रभावित करते हैं। यही बात Guilty As Bought को खास तौर पर दिलचस्प बनाती है।
यह किताब कंजम्पशन के 12 छिपे हुए ड्राइवर्स को समझने की कोशिश करती है। इसमें देखा गया है कि इन ड्राइवर्स ने अतीत और वर्तमान में भारतीय कंज्यूमर्स को किस तरह प्रभावित किया है और भविष्य में इनका क्या असर हो सकता है।
पिछले कुछ दशकों में काफी बदल गई भारतीय कंज्यूमर स्टोरी
पिछले कुछ दशकों में भारत की कंज्यूमर स्टोरी में बड़ा बदलाव आया है। जिस भारत में सुबू ने अपने प्रोफेशनल करियर की शुरुआत की थी, वह आज के भारत से काफी अलग है। लोगों की आकांक्षाएं बदली हैं। परिवारों का स्वरूप बदला है। मीडिया बदल गया है। टेक्नोलॉजी ने लोगों के प्रोडक्ट्स खोजने और खरीदारी से जुड़े फैसले लेने के तरीके को बदल दिया है।
हालांकि, इसके बावजूद कंजम्पशन को प्रभावित करने वाले कुछ गहरे कारण आज भी काफी हद तक वैसे ही बने हुए हैं। ब्रैंड्स के बारे में दशकों तक सोचने और काम करने वाले व्यक्ति के लिए ये बदलाव भारतीय कंज्यूमर को समझने का एक दिलचस्प नजरिया देते हैं।
Guilty As Bought सिर्फ इस पारंपरिक सवाल से आगे जाने की कोशिश करती है कि कंज्यूमर्स क्या खरीदते हैं, और इसके बजाय ज्यादा दिलचस्प सवाल पूछती है कि वे आखिर इसे खरीदते क्यों हैं।
मार्केटर्स के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह सवाल?
यह अंतर काफी मायने रखता है। मार्केटर्स और ब्रैंड बिल्डर्स के लिए कंज्यूमर को समझना सिर्फ सेल्स नंबर देखने या किसी नए ट्रेंड को पहचानने तक सीमित नहीं है। इसके लिए उन मोटिवेशन और सांस्कृतिक ताकतों को समझना भी जरूरी है, जो इन आंकड़ों के पीछे काम कर रही होती हैं।
कंज्यूमर बिहेवियर में जो बदलाव अचानक नजर आता है, वह वास्तव में कई वर्षों से धीरे-धीरे बन रहे किसी बदलाव का नतीजा हो सकता है। यहीं पर सुबू का प्रोफेशनल सफर इस किताब के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण हो जाता है।
सेल्स से ऐडवर्टाइजिंग तक, प्लानिंग से स्ट्रैटेजी तक और भारत के साथ-साथ विदेशी बाजारों में ब्रैंड्स पर काम करने से लेकर कंज्यूमर्स में हो रहे बदलावों को देखने तक, उनके करियर ने उन्हें बिजनेस, ब्रैंड और कल्चर के रिश्ते को कई अलग-अलग नजरियों से समझने का मौका दिया है।
उनका LinkedIn पर लिखा विवरण- “Helping. Challengers. Grow.”, शायद उनके इस सफर को काफी अच्छी तरह बताता है। लेकिन Guilty As Bought के साथ अब वह अपना फोकस एक और बुनियादी सवाल की ओर ले जा रहे हैं- वे कौन सी ताकतें हैं, जो कंज्यूमर की पसंद और खरीदारी के फैसले को प्रभावित करती हैं।
असली चुनौती यह समझना है कि कल कंज्यूमर क्या खरीदेगा
इस किताब का सबसे दिलचस्प हिस्सा शायद भविष्य की ओर देखने की इसकी कोशिश है। यह बताना अपेक्षाकृत आसान है कि कंज्यूमर्स ने कल क्या खरीदा। असली चुनौती यह समझने में है कि वे कल क्या खरीदना चाहेंगे। जैसे-जैसे भारत की महत्वाकांक्षाएं बढ़ रही हैं, लोग ज्यादा कनेक्टेड हो रहे हैं और देश पहले से ज्यादा विविध हो रहा है, वैसे-वैसे कंजम्पशन को प्रभावित करने वाली ताकतें भी और जटिल होने की संभावना है।
इन ताकतों को समझना सिर्फ मार्केटर्स और ब्रैंड मैनेजर्स के लिए ही उपयोगी नहीं हो सकता, बल्कि उन सभी लोगों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है जो तेजी से बदलते भारतीय कंज्यूमर को समझना चाहते हैं। तीन दशक से ज्यादा समय तक भारतीय कंज्यूमर्स, ब्रैंड्स और बिजनेस को बदलते हुए देखने के बाद सुबू ने अपने अनुभवों और इनसाइट्स को किताब के रूप में सामने रखा है।
Guilty As Bought: The Hidden Forces Shaping Why Indians Buy रोजमर्रा की खरीदारी की एक ऐसी तस्वीर सामने रखने की कोशिश करती है, जिसे हम शायद सामान्य नजर से नहीं देखते, क्योंकि शायद हम जो चीजें खरीदते हैं, वे हमारे बारे में और उस भारत के बारे में, जिसमें हम रहते हैं, हमारी सोच से कहीं ज्यादा कुछ बता रही होती हैं।
26 साल से ‘कौन बनेगा करोड़पति’ (KBC) ने भारत को एक बात बताई है- ज्ञान ही दौलत है। लेकिन इस साल 10 अगस्त को सीजन-18 के साथ KBC हमें कुछ अलग बता रहा है- सिर्फ ज्ञान काफी नहीं है।
by
Samachar4media Bureau
डॉ. संदीप गोयल, फाउंडर व चेयरमैन, Mogae Group ।।
26 साल से ‘कौन बनेगा करोड़पति’ (KBC) ने भारत को एक बात बताई है- ज्ञान ही दौलत है। लेकिन इस साल 10 अगस्त को सीजन-18 के साथ KBC हमें कुछ अलग बता रहा है- सिर्फ ज्ञान काफी नहीं है। ऊपर से देखने पर नई थीम लाइन ‘सोचना पड़ेगा’ एक और प्रमोशनल लाइन जैसी लगती है। लेकिन ऐसा नहीं है। अमिताभ बच्चन ने साल 2000 में पहली बार “लॉक किया जाए” कहा था, उसके बाद KBC में यह सबसे बड़ा बदलाव है।
यह सिर्फ कोई विज्ञापन संदेश नहीं है। यह प्रोडक्ट की री-पोजिशनिंग है।
सोनी ने आखिरकार एक कड़वी लेकिन अहम बात स्वीकार की है। अब सिर्फ ज्ञान रखने वाले व्यक्ति को नहीं, बल्कि मुश्किल समय में सही तरीके से सोचने और फैसला लेने वाले व्यक्ति को भी गेम में आगे बढ़ना चाहिए।
अमिताभ बच्चन के साथ बनाए गए तीन नए प्रोमो को देखें। पहले प्रोमो में वह कहते हैं:
“आजकल जवाब जो है ना, वो हर जगह मिलने लगा गया है, आपके जेब में भी। मतलब आपके फोन पे। इसलिए इस बार KBC में जवाब याद रखने से काम नहीं चलेगा।”
सोनी ने आधिकारिक तौर पर कहा है कि शो को ऐसे दौर के लिए दोबारा तैयार किया जा रहा है, जहां जानकारी बहुत ज्यादा उपलब्ध है, लेकिन उस जानकारी को सही तरीके से इस्तेमाल करने की क्षमता असली अंतर पैदा करती है।
साल 2000 में अगर आपको पेरू की राजधानी पता थी तो आप 1 करोड़ रुपये जीत सकते थे। लेकिन 2026 में मेरी 12 साल की भांजी ChatGPT से 0.4 सेकंड में इसका जवाब हासिल कर सकती है। अगर KBC सिर्फ याददाश्त का टेस्ट बना रहा तो वह हर जेब में मौजूद हर फोन से हार जाएगा।
इसलिए KBC वही कर रहा है जो आज AI के दौर में हर ब्रैंड को करना चाहिए- Knowledge से Applied Knowledge की तरफ बढ़ना।
सोनी ने भी कहा है, “KBC has become a cultural phenomenon... This season, with 'सोचना पड़ेगा', the conversation evolves to celebrate the power of applied knowledge and decision making.” यानी KBC अब Attention Marketing यानी “इस तथ्य को याद रखो” से Intention Marketing यानी “इस तथ्य का इस्तेमाल करो” की तरफ बढ़ रहा है।
यह KBC के लिए सिर्फ नई टैगलाइन नहीं है। गेम के काम करने के तरीके में भी बदलाव किया गया है।
पहले सवाल होते थे- “Discovery of India किसने लिखी?” अब सवाल इस तरह तैयार किए जा रहे हैं कि कंटेस्टेंट को अपनी जानकारी के साथ-साथ सिद्धांतों को लागू करने और क्रिटिकल थिंकिंग यानी तार्किक तरीके से सोचने की जरूरत पड़े।
फॉर्मेट अब सिर्फ याददाश्त और रटकर याद करने की क्षमता का टेस्ट नहीं रहेगा, बल्कि इसमें क्रिटिकल थिंकिंग को भी परखा जाएगा।
उदाहरण के लिए सवाल ऐसा हो सकता है:
“अगर Discovery of India आज लिखी जाती और सिर्फ क्विक-कॉमर्स के जरिए बेची जाती, तो इसकी सबसे अच्छी लॉन्च स्ट्रैटेजी क्या होती?” यानी सिर्फ यह जानना काफी नहीं होगा कि किताब किसने लिखी। अब यह भी सोचना होगा कि आप उस जानकारी का इस्तेमाल कैसे करेंगे।
यह बड़ा बदलाव है। ‘Fastest Finger’ शब्द को अब नाम से हटा दिया गया है। अब कंटेस्टेंट्स को चार विकल्पों को सही क्रम में लगाने की बजाय चार राउंड खेलने होंगे, जिसके जरिए वे Hot Seat तक पहुंचेंगे।
17 सीजन तक Hot Seat पर पहुंचने का रास्ता स्पीड पर निर्भर था। जो सबसे तेज था, वही ‘Fastest Finger’ जीतता था। इससे एक तरह की ट्यूशन और रटने वाली संस्कृति को बढ़ावा मिलता था- रट्टा मारो।
अब Hot Seat तक पहुंचने के लिए चार राउंड होंगे। इसका मतलब है कि रणनीति, निरंतरता और निर्णय लेने की क्षमता ज्यादा महत्वपूर्ण होगी। अब यह सिर्फ एक तेज रेस नहीं है। यह एक तरह की क्वालिफायर लीग है। और यह जिंदगी से भी ज्यादा मेल खाती है।
हाल के गोल्फ-कोर्स प्रोमो में अमिताभ बच्चन कहते हैं: “बचपन में हमें सिखाया गया था कि जो पहले जवाब दे, सबसे सही वही है। लेकिन जिंदगी में कई बार, पहला जवाब ही सही नहीं होता। तो इस बार KBC में, जवाब देने से पहले खुद को जरा रोकना पड़ेगा।”
क्या यह भारत की परीक्षा प्रणाली पर सीधा हमला है? हो सकता है।
हां। तीन वजहों से। पहली वजह यह है कि 26 साल बाद KBC उस एक चीज को बदल रहा है, जिसे उसने कभी नहीं बदला था- ‘Smart’ यानी होशियार होने की परिभाषा। 26 साल तक Smart का मतलब था G.K., यानी General Knowledge। अब Smart का मतलब Presence of Mind यानी मौके पर सही सोच और समझ है।
दूसरी वजह यह है कि इससे यह भी बदल सकता है कि आखिर कौन जीत सकता है। पहले Kota का 19 साल का कोई ऐसा क्विजर, जिसने 10 हजार तथ्य रट रखे हों, जीत सकता था। अब 45 साल का कोई किसान, जिसने अपनी जिंदगी में अपने ज्ञान का इस्तेमाल किया है, उसके पास भी बराबर का मौका हो सकता है। इससे कंटेस्टेंट का आधार ‘Students’ से बढ़कर ‘Thinkers’ तक हो जाता है।
तीसरी और शायद सबसे महत्वपूर्ण वजह है कि इससे शो के अप्रासंगिक होने का खतरा कम हो सकता है। Season 17 में Hot Seat पर आने वाले कंटेस्टेंट की औसत उम्र 34 साल थी। दर्शकों की उम्र भी बढ़ रही है। ऐसे Gen Z दर्शकों को जोड़ने के लिए, जो Google के साथ बड़े हुए हैं, आपको वही चीज टेस्ट करनी होगी जो Google नहीं कर सकता- सोचने की क्षमता।
कम समय में देखें तो यह जोखिम भरा है। लंबे समय के लिए देखें तो यह जरूरी है।
जोखिम क्या है?
KBC की खूबसूरती उसकी सरलता थी। घर पर बैठा कोई भी दर्शक सवाल का जवाब चिल्लाकर दे सकता था। अगर सवाल ज्यादा Analytical यानी विश्लेषणात्मक पहेली जैसे हो गए तो क्या इंदौर में बैठी आंटी अब भी साथ-साथ खेलेंगी?
अगर Fastest Finger की जगह चार राउंड आ गए तो क्या शुरुआती 10 मिनट का रोमांच कम हो जाएगा? ये सवाल महत्वपूर्ण हैं। लेकिन फायदा भी बड़ा है सही दर्शकों के लिए यह शो को और ज्यादा engaging बना सकता है।
विश्लेषणात्मक सवाल घर पर चर्चा पैदा करेंगे। अब चर्चा सिर्फ “जवाब क्या है?” तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह भी हो सकती है- “क्या उसे जोखिम लेना चाहिए था?” यही वह चीज है जो IPL को भी दर्शकों के लिए ज्यादा engaging बनाती है।
“सोचना पड़ेगा” सोनी Liv, Fintech Sponsors और Ed-tech Sponsors के लिए एकदम सही लाइन है। यह KBC को सिर्फ एक गेम शो की तरह नहीं, बल्कि Life-skills Show के रूप में पेश करती है।
समय के साथ अमिताभ बच्चन शो की भावनात्मक भाषा का हिस्सा बन चुके हैं। कंटेस्टेंट सवालों के जवाब देने की तैयारी करके आते हैं, लेकिन कुछ ही मिनटों में वे अपने सपनों और संघर्षों के बारे में बात करने लगते हैं। जब गेम में टेक्स्टबुक के ज्ञान से ज्यादा जीवन के अनुभव को महत्व मिलेगा तो अमिताभ बच्चन की एक संवेदनशील श्रोता के तौर पर भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाएगी।
‘सोचना पड़ेगा’ मार्केटर्स को असल में क्या संकेत देता है? KBC वही कर रहा है जो आज हर भारतीय ब्रैंड को करना चाहिए। Memory को पुरस्कृत करना बंद करें। Mindset को पुरस्कृत करना शुरू करें।
20 साल तक हमने जिंगल के जरिए चीजें बेचीं। अब हमें Logic के जरिए बेचना होगा। 20 साल तक हमने डिग्री देखकर लोगों को नौकरी दी। अब हमें Decision-making यानी फैसला लेने की क्षमता देखकर लोगों को चुनना होगा। 20 साल तक हमने Toppers का जश्न मनाया। अब हमें Thinkers का जश्न मनाना होगा।
KBC की नई लाइन सिर्फ किसी क्विज शो के बारे में नहीं है। यह भारत के बारे में है। ऐसे दौर में जब जवाब हर जगह मौजूद हैं, Hot Seat पर या जिंदगी में वही लोग जीतेंगे, जो जवाब लॉक करने से पहले थोड़ा रुककर सोचेंगे। और यही वजह है कि ‘सोचना पड़ेगा’ सिर्फ एक विज्ञापन लाइन नहीं है। यह एक चेतावनी, पोजिशनिंग और सर्वाइवल स्ट्रैटेजी है- सिर्फ दो शब्दों में। बहुत बढ़िया काम, गौरव बनर्जी और सोनी की पूरी टीम।
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)
Disclaimer: इस लेख में व्यक्त विचार पूरी तरह लेखक के अपने हैं और किसी भी तरह से exchange4media.com के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।