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मिस्टर मीडिया: एक सदी में कमाए प्रसारण के संस्कार कहां गए?

Published At: Wednesday, 13 February, 2019 Last Modified: Wednesday, 13 February, 2019

राजेश बादल
वरिष्ठ पत्रकार।।

बुधवार को सारी दुनिया रेडियो दिवस मना रही है। भारत में भी यह माध्यम एक सदी का सफ़र पूरा कर रहा है। ग़ुलामी के दिनों में रेडियो तरंगों के ज़रिए हम गोरों से लड़े, तुम मुझे ख़ून दो,मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा जैसे नारे को परदेसी ज़मीन से नेताजी ने तरंगों के ज़रिए हिन्दुस्तान भेजा और सारा मुल्क़ जोश-जज़्बे से भर गया।

इसी तरह गोरों की नज़र से बचते कांग्रेस रेडियो पर महात्मा गांधी की हुंकार गूँजी -अंगरेज़ों! भारत छोड़ो। महीनों तक अंगरेज़ पुलिस इसका ट्रांसमीटर तक नहीं खोज सकी। जब पता चला, तब तक उद्घोषिका ऊषा मेहता ने इस नारे को जनजन तक पहुंचा दिया था। हिन्दुस्तान में रेडियो प्रसारण के संस्कारों की यही नींव थी। आज़ादी के बाद भी अस्सी फ़ीसदी से भी अधिक निरक्षर आबादी की चेतना जगाने में इस माध्यम ने क्रांतिकारी काम कर दिखाया। आज अगर देश में रेडियो के करोड़ों दीवाने हैं तो उसके पीछे संस्कारों की इस बुनियाद को श्रेय दिया जाना चाहिए।

लेकिन सदी के सफ़र की दहलीज़ पर खड़ा यह माध्यम आज कहां है। उस पर कितने प्रश्नचिह्न लग रहे हैं? दो हज़ार छह से निजी क्षेत्र की तरंगें भारत के आसमान पर मंडरा रही हैं। ये तरंगें अराजकता की हद तक उमड़ती घुमड़ती श्रोताओं के दिलो दिमाग़ पर बरस रही हैं। रेडियो जॉकी और न्यूज़ कास्टर अपने ख़राब उच्चारण, सीमित शब्द ज्ञान, नक़ली लहज़े और अश्लील संवादों से सवालों के कठघरे में हैं। वे अब पढ़ते कम हैं, माइक पर चीख़ते अधिक हैं। लिखे जाने वाले और बोले जाने वाले शब्दों में फ़र्क़ नहीं कर पाते। सीधे प्रसारण में व्याकरण की शुद्धता और सही शब्दों का इस्तेमाल करना नहीं जानते। क्या इस पीढ़ी को जानकारी है कि इसी देश में कभी मेलविल डी मेलो,देवकीनंदन पांडे, जसदेव सिंह और अमीन सायानी ने भाषा के नए कीर्तिमान रचे थे?

नई नस्लों को माध्यम का प्रशिक्षण देने के लिए भारत में मीडिया संस्थान कुकुरमुत्तों की तरह उग आए हैं। मगर उनके पाठ्यक्रम व्यावहारिक ज्ञान के इस अध्याय से कोसों दूर हैं। उनके पास अच्छे प्रशिक्षक भी नहीं हैं। आवाज़ की अदायगी दो-चार दिन में नहीं आती। इसके लिए कठिन परिश्रम की ज़रूरत है। अगर प्रशिक्षक मिल भी जाएं तो क्या हमारे नौजवानों में वो ललक, ज़िद और धीरज है? शायद नहीं। अगर सौ बरस में भी हम इस संस्कृति का विकास नहीं कर पाए तो कब करेंगे। ऑल इंडिया रेडियो,निजी क्षेत्र की प्रसारक कंपनियों और उनके मालिकों के लिए यह एक बड़ी चुनौती है मिस्टर मीडिया? 

आप 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के कुछ लोकप्रिय कॉलम्स नीचे लिंक पर क्लिक करके भी पढ़ सकते हैं...

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