‘मीडिया में आने वालों के लिए सुझाव- यहां आएं तो एक बैकअप के साथ’

ये एक सवाल है जो हमारे सामने हैं। उन सभी लोगों के सामने हैं...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 11 April, 2018
Last Modified:
Wednesday, 11 April, 2018
Samachar4media

अमर आनंद

पूर्व कार्यकारी संपादक, चैनल वन ।।

अब यहां के कहां जाएं हम?

ये एक सवाल है जो हमारे सामने हैं। उन सभी लोगों के सामने हैं जो मीडिया की अनिश्चिचितता, अनियमितता और सरोकार से ज्यादा सरकार की तरफ मीडिया के झुकाव के बाद पैदा हुए हालात के बाद हमारे सामने आया है। एक तरफ फिल्मसिटी के चंद चमकते चैनल हमारे सामने हैं जिनके टोन से उनकी सत्ता उम्मुख होने का अंदाजा आपको हो जाएगा, तो दूसरी तरफ नोएडा सेक्टर-63 के वो चैनल जो या तो तमाम यत्नों-प्रयत्नों के बावजूद शहादत की तरफ बढ़े चले हैं। नोटबंदी और बाद से चरमराई हुई अपनी स्थिति से उबरने की कोशिश में और डूबते चले गए। खास तौर से यूपी/उत्तराखंड पर केंद्रित करीब दर्जन भर चैनलों में से ज्यादातर की यही स्थिति है। वो चैनल कहां जा रहे हैं, उनमें काम करने वाले हजारों लोगों का क्या भविष्य होगा, ये सोच कर डर लगने लगता है।

सबके सामने ईएमआई का सवाल है। बच्चों की पढ़ाई का सवाल है। अम्मा-बाबू जी की दवाई का सवाल है। सवाल कई हैं और सामने चक्रव्यूह है। सवालों के चक्रव्यूह के साथ अभिमन्यु। कई मीडियाकर्मी ऐसे ही सूरते हाल मे घिसट घिसट कर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं और कई  की उम्मीदें दम तोड़ चुकी हैं। वापस अपने गृह जिलें की तरफ का रुख कर लिया है और वहां पहुंच कर रोजी रोटी की नई योजना पर काम कर रहे हैं। लंबे समय तक आधी से ज्यादा उम्र तक एक काम को एक कल्चर और एक दायरे में जीने के बाद फिर से नया-नया 'रण' आसा नहीं होता है, लेकिन दौर की दिक्कतों पर काबू पाने के लिए उम्मीद की कोई और किरण दिखाई नहीं पड़ती। 

हमारे कई साथियों से इस मसले पर रोज बात होती है। 45 पार कर चुके हमारे एक सीनियर किसी एक बड़े निम्न मध्यम चैनल में बेरोजगारी के बाद कार्यरत थे। उसके बाद वो कहीं और गए लेकिन उनकी समस्याओं की विकरालता खत्म नहीं हुई और वो तभी खत्म होगी जब एक निश्चिच रकम तय समय पर उनके घर खर्च के लिए मिलेगी, जिसकी संभावना उन्हें दिखाई नहीं पड़ रही है। ऐसा नहीं है कि सीनियर ही नए पुराने टीवी चैनलों के माहौल और उसमें अपने लिए नाउम्मीदों से परेशान हैं बल्कि जूनियर और अपेश्राकृत कम उनुभव वाले भी नाउम्मीद हैं। ज्यादातर जूनियर्स को बड़े चैनलों में मौके ही नहीं मिल रहे हैं और बड़ी मुश्किल से जहां उन्हें काम करने के मौके मिल भी रहे हैं वहां का माहौल देखकर वो अपने भविष्य को लेकर भयभीत हैं। ऐसे कई नवांकुर पत्रकारों से रोज बात और संवाद का मौका मिलता है।

इन अनुभवों में उन लड़कियों के अनुभव तो थोड़े अलग हैं, जिन्हें उनके कार्यस्थल में बॉस और सहयोंगियों की गंदी नजर का शुरू से ही शिकार होना पड़ता है और बॉस की 'उम्मीद' पर फिट नहीं होने की वजह से उनकी बढ़त और तरक्की पर सवालिया निशान लग जाते हैं। पटना से दिल्ली आई एक टीवी एंकर पहले नौकरी नहीं मिलने से बहुत परेशान थी। अब मित्रों और शुभचिंतकों की मदद से दिल्ली से थोड़ी दूर पर हरियाणा के एक शहर में उसकी नौकरी लग गई, तो वहां वो पहले से ज्यादा परेशान हैं और एक तरह से बचाओं- बचाओं के अंदाज में फोन या वॉट्सऐप करती है।  

एक बहुत बड़े चैनल में काम कर रहे एक अनजान से फेसबुक फ्रेंड की पोस्ट देखी। मीडिया छोड़कर कुछ और करना चाहता हूं मेरा मार्गदर्शन करें। मैंने उस पत्रकार से संपर्क करने की कोशिश की और कहा कि आप मुझसे मिलो शायद मैं आपके लिए कुछ कर सकूं। एक और राष्ट्रीय चैनल में कार्यरत अपने सीनियर मित्र से हाल चाल के दौरान पता चला कि वो मीडिया के माहौल को तकरीबन मर्ज समझने लगे हैं और इसकी दवा की तलाश में दवाइयों का काम करने की योजना पर काम कर रहे हैं। 45 की उम्र में रोजगार नया जरिया वो जर्नलिज्म में इतने पुराने अनुभव के साथ ये कैसे संभव होगा?

दिल्ली के पास इंदिरापुरम में किराए के घर में रहने वाले दो स्कूली बच्चों के पिता का जवाब था, देखते हैं, करते हैं कुछ अपने लोग इसी फील्ड में हैं उनसे मदद मिल जाएगी। यानी तकरीबन 20 साल से ज्यादा काम करने के बाद देखते हैं करते हैं जैसी अनिश्चितता का आलम वो भी तब जब घर किराये का हो और बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे हों। सोचिए हम किधर जा रहे हैं और यहां से आगे कहां जाएं?

टीवी चैनलों के माहौल और कार्य पद्धति को कुछ अतिरिक्त होशियार पत्रकारों और कुछ अतिरिक्त मूर्ख लालाओं से ज्यादा नुकसान हुआ है और दोनों के बीच में पिसे हैं ऐसे हजारों लोग, जो चैनलों में सिर्फ नौकरी करने के लिहाज से काम करते रहे हैं। जब तक अतिरिक्त मूर्ख लाला को समझ में आता तब तक हो अतिरिक्त होशियार पत्रकार और उसके साथियों के आगे लुट चुका होता है और उस जंजाल से निकलने की जब वो कोशिश करता है तो दो से तीन सौ उन निरीह लोगों पर गाज गिरती है जो एम्प्लॉयी के रूप में वहां काम कर रहे होते हैं। ऐसा एक बार नहीं कई बार हो चुका है।

टीवीआई’, ‘वीओआई... कुछ हद तक लाइव इंडिया जाने कितने ऐसे नाम हैं, जो वीर गति को प्राप्त हुए है और जिनसे मिले जख्म ताजिंदगी वहां काम करने वालों का पीछा नहीं छोड़ेंगे। बंद हुए कई अखबारों में भी ऐसे ही हालातों का वहां के कर्मचारियों को सामना करना पड़ा है और ये सिलसिला अब भी जारी है। 

अब जब भी किसी मित्र या जूनियर का फोन आता है और नए चैनल और नए अखबार शुरू किए जाने की जानकारी मिलती है। तो ऐसा लगता है कि फिर एक नया क्रम और उपक्रम होगा। कुछ और लोगों का भविष्य दांव पर होगा। कुछ और लोग अपनी लगी नौकरियां छोड़कर ज्यादा की उम्मीद में आएंगे और अपना वर्तमान भी गवाएंगे। हम जिस पेशे में रहे हैं जहां से हमें रोजी रोटी मिली है जहां से देश और समाज में हमारा विस्तार हुआ है वो और बेहतर हो ये भला कौन नहीं चाहेगा, लेकिन बेहतर माहौल की तरफ हम बढ़ते हुए नजर नहीं आ रहे हैं ये एक कड़वा सच है।

करोड़ों बेरोजगारों की फौज वाले इस देश में काम करने वाले 'मीडिया मजदूरों' की एक लंबी फौज पर अलग-अलग कारणों से बेरोजगारी का खतरा मंडरा रहा है, चाहे वो किसी पद पर ही क्यों न हों। हां धन बल पर पत्रकारिता के उच्च पदों पर बैठे गैर पत्रकारों और उनकी परिक्रमा करने वाले परजीवी पत्रकारों की बात इससे थोड़ी अलग है। जब तक उनका जादू चल रहा है वो तब तक खुद को खुशनसीब समझ सकते हैं। 

एक समस्या विश्वसनीयता की आती है आपने खेत खाए गधा और मार खाए जो रहा वाली कहावत जरूर सुनी होगी। मीडिया एक हिस्से के काम काज और कुछ लोगों के अनुभवों से सारे लोगों को जोड़कर देखा जाता है। दिल्ली के अलावा दिल्ली से बाहर काम कर रहे पत्रकारों से बातचीत के दौरान विश्वसनीयता के सवालों के सामने डगमगाते हुए उनके आत्मविश्वास से अक्सर सामना होता है। ऐसा लगता है कि उनके सामने कोई रास्ता नजर आता तो वो फौरन उस पर चल पड़ते। पत्रकारिता को लेकर अविश्वसनीयता का माहौल तकरीबन पूरे देश के जनमानस में है और जौ के साथ घून भी पिस रहा है यानी अच्छे, कर्मठ और जुनूनी पत्रकार भी इसी धारणा की जद में आ जाते हैं। 

एनडीटीवी समेत आखिरी सांसे लेते चैनलों की लिस्ट लंबी होती जा रही है। इनमें से कई चैनलों में तीसरे-चौथे महीने भी सैलरी नहीं आ रही है। कब, क्या हो जाए कुछ पता नहीं। सोशल मीडिया के बोलबाला वाले इस दौर में 20 साल की उम्र की हो चुकी टीवी इंडस्ट्री की जो रंगत दिखाई पड़ रही है उसमें ये साफ नजर आ रहा है कि रोजी रोटी के लिए अगर आप इस फील्ड में आते हैं तो आपको खुद से बार-बार सवाल करना होगा कि आप कहां जा रहे हैं और क्यों जा रहे हैं? देश और सामाजिक मुद्दों को उठाने वाली मिशन पत्रकारिता की बात तो काफी पीछे जा चुकी है। चंद चमकते चेहरों की चमक ध्यान में रखकर मीडिया में रोजगार तलाशने की बात में भी दम नहीं है। सोचना बस इतना है कि जहां, जिस दिशा में आपको बढ़ना है उसे लेकर कहां तक पहुंच पाएंगे और आपके परिवार के नौनिहाल निहाल होंगे या निढाल।

22 साल के अनुभवों के बाद मैं एक नतीजे पर तो पहुंचा हूं कि अगर आप देश, समाज और इंसानियत के लिए कुछ करने की भावना रखते हैं तो मीडिया में इसके लिए बहुत कम संभावनाएं हैं। सरकार की तरफ झुका हुआ आज का मीडिया सरोकार से कोसों दूर नजर आता है। जाहिर तौर पर सत्ता जो मीडिया से चाहती है वो करा लेती है और चैनल को चलाने की मजबूरी में चैनल के कर्ता धर्ता सरकार के दबाव के आगे झुकते हुए नजर आते हैं। हां कई ऐसे मामले भी होते हैं जिसमें मीडिया सरोकार के साथ खड़ी दिखाई देती है मसलन यूपी के आरोपी विधायक के मसले को पूरा मीडिया जोर शोर से उठा रहा है। इनमें से वो चैनल भी हैं जिन पर सरकार के टोन में खबरें चलाने के आरोप हैं। 

जिंदगी सिर्फ और सिर्फ उम्मीद का नाम है और हमें उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। मेरे सुझाव मीडिया में आने वालों से सिर्फ इतना है कि अगर आपको लगता है कि आप मीडिया के लिए ही बने हैं और इसके सूरतेहाल में सरवाइव कर सकते हैं तो आप मीडिया में जरूर आएं, लेकिन अपने एक बैकअप के साथ वो बैकअप आपके घर का बिजनेस हो, आपकी पत्नी की नौकरी हो या कुछ और। एक बात और मीडिया में समय समय पर मिले अनुभवों से विश्लेषण जरूर करते रहें कि मीडिया में आपका रहना कितना फायदेमंद है आपके परिवार के भविष्य के लिए कितना सुरक्षित है?

(लेखक चैनल वन के पूर्व कार्यकारी संपादक, ईवेंट्स एंड प्लानिंग रहे हैं। ईवेट जर्नलिज्म की खुद की बनाई राह पर काम कर रहे हैं। हिन्दुस्तान, अमर उजाला, दैनिक भास्कर, इंडिया टीवी, लाइव इंडिया, कोबरापोस्ट, समाचार प्लस में काम कर चुके हैं। पत्रकारों की संस्था प्रेस फाउंडेशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय संयोजक की भी जिम्मेदारी संभाली है।)  

 

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इस धर्म या कर्तव्य को निभाने से किसने रोका है मिस्टर मीडिया?

शहर एक। दृश्य दो। एक में दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क के राष्ट्रपति तोपों की सलामी लेते हैं,उनकी पत्नी बच्चों के साथ खुशनुमा माहौल में वक्त बिताती हैं

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 25 February, 2020
Last Modified:
Tuesday, 25 February, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

शहर एक। दृश्य दो। एक में दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क के राष्ट्रपति तोपों की सलामी लेते हैं, उनकी पत्नी बच्चों के साथ खुशनुमा माहौल में वक्त बिताती हैं। दूसरे दृश्य में आंदोलन है, हिंसा, आगजनी, मरते हुए लोग, अचानक पहचान छिपाए पथराव करते कुछ नकाबपोश और स्थिति पर काबू पाने में अक्षम देश की सबसे सक्षम पुलिस। दिल्ली की कानून-व्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल।

इन दो विरोधाभासी तस्वीरों के बीच मीडिया की चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सारी दुनिया उपग्रह चैनलों के जरिये डोनाल्ड ट्रंप और उनके कुनबे की हिंदुस्तान यात्रा देख रही है। पत्रकारिता धर्म के नाते दिल्ली का घटनाक्रम छिपाया नहीं जा सकता और दिखाने पर आलोचक तथा शत्रु देश फायदा उठा सकते हैं। एक तरफ पेशेवर कर्तव्य है। दूसरी ओर राष्ट्रीय छवि को लग रहे झटके और उसका अनुचित लाभ लेते कुछ तत्व हैं। ऐसे में संतुलन का बारीक और महीन बिंदु खोजना अत्यंत संवेदनशील काम है।

कहने में कोई हिचक नहीं कि मीडिया के तमाम रूपों को जितने धीरज, संयम, गहराई और निष्पक्षता का परिचय देना चाहिए था,  नहीं दे पाए। दृश्य झूठ नहीं बोलते और कैमरे की आंख से कुछ छिपता नहीं। सब देख रहे थे कि हिंसक दृश्य प्रायोजित थे और पुलिस चुप थी। आंदोलनकारी चेहरे नहीं छिपा रहे और हमलावरों में इतना साहस नहीं कि वे अपनी पहचान उजागर करें। जो आंदोलन महीनों से शांत चल रहा था, उससे निपटने में व्यवस्था नाकाम रही। गांधी के देश में विरोध का स्वर हिंसा के जरिये दबाना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह तथ्य खुलकर किसी माध्यम पर उजागर नहीं हुआ। क्या पत्रकारिता में अब सच को सच कहने का साहस भी नहीं बचा है अथवा हमने अपने-अपने सच गढ़ लिए हैं और उन गढ़े रचे हुए आकारों को ही अंतिम सच मान लिया है। अगर ऐसा है तो यह बहुत खतरनाक प्रवृत्ति इस पेशे में पनप रही है।

अब हमें गांधी के सत्याग्रह के गीत गाने का अधिकार नहीं रहा है। समय आ गया है, जब चैनल प्रमुखों, संपादकों तथा पत्रकारिता के सरोकारों पर केन्द्रित संस्थानों को गंभीरता से इस पर विचार करना होगा। सरकारें अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं। आंदोलनकारियों पर तो सवाल उछाले जा रहे हैं कि वे यातायात रोके हुए हैं, लेकिन यह निर्वाचित प्रतिनिधियों की जिद या हठधर्मी नहीं है कि वे उन मतदाताओं से सीधे संवाद भी नहीं करना चाहते। जनता के सेवक अपना धर्म नहीं निभा रहे हैं तो ऐसी स्थिति में पत्रकारिता अपना धर्म निभाती है। इस धर्म या कर्तव्य को निभाने से किसने रोका है मिस्टर मीडिया?

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‘ट्रंप के भारत दौरे को हमें इस नजरिये से भी देखना चाहिए’

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का परिवार अपने देश का अतिथि है और हमें अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनका आतिथ्य बिना किसी अपेक्षा के करना चाहिये

पूरन डावर by
Published - Monday, 24 February, 2020
Last Modified:
Monday, 24 February, 2020
PURAN DAWAR

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का परिवार अपने देश का अतिथि है और हमें अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनका आतिथ्य बिना किसी अपेक्षा के करना चाहिये। जब विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्तियां नजदीक आती हैं तो विश्व के लिये सुखद परिणाम आना निश्चित है।

व्यावसायिक दृष्टि से देखें तो अमेरिका उपभोक्ता वस्तुओं में विश्व का सबसे बड़ा बाजार है। आबादी बेशक विश्व की तीन प्रतिशत है, लेकिन विश्व की 24 प्रतिशत खपत अमेरिका में है। ऐसे में सारे श्रम आधारित घरेलू उत्पाद, जिनमें अभी भारत का हिस्सा मात्र एक से 1.5% है, बढ़ाने की बड़ी गुंजाइश है। ऐसे में दोनों देश जितने नजदीक आएंगे, संभावनाएं उतनी बढ़ेंगी।

अमेरिका के राष्ट्रपति को मात्र अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में नहीं, बल्कि विश्व के राष्ट्रपति के रूप में देखा जाता है। अमेरिका एवं डालर का महत्व यूं ही नहीं है। विश्व में जितना रिसर्च पर खर्च होता है, उसमें केवल अमेरिका का हिस्सा 64% है। अमेरिका की आबादी विश्व की मात्र 3% है। पूरा विश्व उस रिसर्च का लाभ लेता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति के परिवार की यात्रा को मात्र पाकिस्तान के संदर्भ में देखना बेमानी है। विश्वशक्ति के साथ रिश्ते और व्यापारिक मजबूती अधिक महत्वपूर्ण है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वैदिक का पीएम मोदी से सवाल- आगे बढ़ने से क्यों डर रहे हैं आप?

मैं यह सोचता हूं कि मोदी को यह घोषणा करने की क्या जरूरत है कि वे धारा 370 और नागरिकता संशोधन कानून के मामले में अपने कदम पीछे नहीं हटाएंगे?

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 18 February, 2020
Last Modified:
Tuesday, 18 February, 2020
modi

डॉ. वेदप्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में अपनी सरकार की कई उपलब्धियां गिनाईं, जो उन्हें गिनानी ही चाहिए, क्योंकि वह उनका चुनाव क्षेत्र है। इसमें शक नहीं कि गंगा की सफाई, तीर्थ-यात्री एक्सप्रेस और राममंदिर का निर्माण-कार्य आदि इस सरकार की रचनात्मक उपलब्धियां हैं। मैं यह भी मानता हूं कि धारा 370 का खात्मा और कश्मीर का पूर्ण विलय भी एक साहसिक और यथार्थवादी कदम है। हमने ‘आजाद कश्मीर’ जैसा पाकिस्तानी ढोंग खड़ा नहीं कर रखा है और कश्मीर की जनता की सेवा में केंद्र सरकार पूरी तरह से लगी हुई है लेकिन फिर भी मैं यह सोचता हूं कि मोदी को यह घोषणा करने की क्या जरूरत है कि वे धारा 370 और नागरिकता संशोधन कानून के मामले में अपने कदम पीछे नहीं हटाएंगे?

कौन नेता, कौन पार्टियां, कौन संगठन मांग कर रहे हैं कि धारा 370 के मामले में आप अपना कदम पीछे हटाएं? विदेशों में भी दो-तीन राष्ट्रों के अलावा, जिन्होंने रस्मी बयान जारी कर दिए, लगभग सभी राष्ट्र धारा 370 के खात्मे को भारत का आतंरिक मामला मान रहे हैं। कश्मीर के मामले में दुनिया के बड़े राष्ट्र और भारत के मित्र राष्ट्र भी मांग कर रहे हैं कि कश्मीरियों के मानव अधिकारों की रक्षा हो, गिरफ्तार नेताओं की रिहाई हो और आम कश्मीरी को उसके रोजमर्रा की जीवन में राहत मिले। इसके विरुद्ध आप क्यों डटे रहना चाहते हैं? इस मामले में रियायत देना पांव पीछे हटाना नहीं है बल्कि आगे बढ़ाना है।

कश्मीरी नेताओं और शाहीन बागियों से सीधा संवाद कर आप आगे क्यों नहीं बढ़ते? इसी प्रकार नागरिकता संशोधन कानून की भावना नेक है और उसे आप ने संसद से पारित करवाया, यह भी ठीक है। इस बात का कौन विरोध कर रहा है कि पड़ोसी मुस्लिम देशों से आकर शरण मांगने वाले हिंदू, ईसाई, बौद्ध, जैन, सिख और पारसियों को आप शरण देना चाहते हैं? इसकी तारीफ तो पड़ोसी मुस्लिम देश भी अंदर ही अंदर कर रहे हैं, क्योंकि आप उनका ‘बोझ’ थोक में उतार रहे हैं। लेकिन देश और सारी दुनिया में विरोध सिर्फ एक छोटी-सी बात का हो रहा है। वह यह कि आपने इस सूची में से मुसलमान शरणार्थियों को बाहर क्यों कर दिया? मैं आपसे पूछता हूं शरणार्थियों कि उन छह नामों में सातवां नाम जोड़ना क्या पीछे हटना है? अरे भाई, 6 को 7 करना तो आगे बढ़ना है। आगे बढ़ने से नरेंद्र भाई आप क्यों डर रहे हैं? जो लोग अपनी भूल-सुधार कर लेते हैं वे बहुत आगे बढ़ते हैं। उनके प्रति लोगों का प्रेम और सम्मान भी बढ़ता है।

(साभार: फेसबुक)

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भारत के पत्रकार क्या इससे सबक लेंगे मिस्टर मीडिया!

यह नौबत भी आ गई। दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम आए तो मीडिया मुद्दों पर दो फाड़ हो गया

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 18 February, 2020
Last Modified:
Tuesday, 18 February, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

यह नौबत भी आ गई। दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम आए तो मीडिया मुद्दों पर दो फाड़ हो गया। एक वर्ग ऐसा था, जो खुलकर अरविंद केजरीवाल की जीत के लिए मतदाताओं को ही कोस रहा था। उसका कहना था कि अवाम आम आदमी पार्टी के मुफ्तखोरी के झांसे में आ गई। उसकी कवरेज को देखकर लगा कि जैसे दिल्ली के मतदाताओं ने कोई बहुत बड़ा जुर्म कर दिया है। उसे इस पार्टी के धोखे में नहीं आना चाहिए था। आज़ादी के बाद संभवतया यह पहली बार हुआ है कि दुनिया के सबसे विराट लोकतंत्र के संचालकों से कहा जा रहा है कि उन्हें सही निर्णय करना नहीं आता। नहीं भूलना चाहिए कि यही मतदाता हैं, जो हिन्दुस्तान पर तानाशाही के आक्रामक घुड़सवारों को अब तक रोकते रहे हैं। जम्हूरियत की सलामती इसलिए है कि भारत का अशिक्षित मतदाता भी अपने पास अच्छा-बुरा सोचने, समझने का हक रखता है और उसने 1977 और 1989 में भी अपना जनादेश इस देश को सौंपा था।

महान विचारक और संपादक राजेंद्र माथुर कहा करते थे कि पत्रकारिता में सौ फ़ीसदी निष्पक्षता संभव नहीं है। कभी पत्रकारों को महसूस हो कि किसी अप्रत्याशित स्थिति में उनके लिए निष्पक्ष रहना मुश्किल है तो उन्हें आंख मूंदकर अवाम के साथ खड़े हो जाना चाहिए, लेकिन दिल्ली प्रसंग में तो उल्टा हुआ है। ‘आम आदमी पार्टी’ (आप) को रिकॉर्ड मतों से प्रचंड जीत दिलाने वाले वोटरों को ही कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। इस मानसिकता का क्या किया जाए?

यह स्थापित तथ्य है कि प्रजातंत्र में तंत्र प्रजा के सेवक के रूप में होता है। प्रजा तंत्र का चुनाव करती है। ऐसे में मीडिया का एक वर्ग अगर लोक को नसीहत दे कि उसे तंत्र के हिसाब से मत देना चाहिए तो यह स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी नहीं है। एक मायने में तो यह पत्रकारिता की गणतांत्रिक समझ पर भी सवाल खड़े करता है। भारत ही क्या दुनिया के किसी देश में मतदाताओं को कोसना या गरियाना अच्छा नहीं माना जाता। यह ठीक वैसा ही है कि जिस डाल पर हम बैठे हैं, उसी को काट रहे हैं। इस जनादेश के लिए वोटरों को दोषी ठहराकर कहीं हम अपने पूर्वाग्रह तो दर्शकों या पाठकों पर नहीं थोप रहे हैं?

इसी सप्ताह न्यूयॉर्क टाइम्स ने पूरे दो पन्ने डोनाल्ड ट्रंप के पाखंड को उजागर करते हुए छापे हैं। इनमें अमेरिकी राष्ट्रपति के बोले गए झूठ तारीखवार प्रकाशित किए गए हैं। चुनाव से ठीक पहले इस खुलासे से लोग स्तब्ध हैं। पत्रकारिता का तकाजा सच के साथ खड़े होने का है। महात्मा गांधी की पत्रकारिता से इसी कारण सत्याग्रह शब्द निकला है। यानी सत्य का आग्रह ही सार्थक पत्रकारिता है। भारत के पत्रकार क्या इससे सबक लेंगे मिस्टर मीडिया!

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चुनाव कवरेज के सारे नियम-संतुलन टूट रहे हैं, मिस्टर मीडिया!

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अब तो यह भी कहने का समय हाथ से फिसल सा गया है कि संभल जाइए मिस्टर मीडिया!

 

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'13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाने के पीछे ये है वजह'

महान भारतीय वैज्ञानिक सर जगदीश चंद्र बोस ने सबसे पहले रेडियो की खोज की, परन्तु आर्थिक कठिनाइयों के कारण वह इसे व्यावहारिक रूप नहीं दे सके।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 13 February, 2020
Last Modified:
Thursday, 13 February, 2020
amita kamal

अमिता कमल, आरजे, आकाशवाणी, ज्ञान वाणी एफएम।।

हर दिन कोई न कोई दिवस होता ही है। वर्ष 2012 से पहले रेडियो का कोई दिवस नहीं था, तो इस कमी को पूरा करने की दृष्टि से 20 अक्टूबर 2010 में स्पेनिश रेडियो अकादमी के अनुरोध पर स्पेन ने संयुक्त राष्ट्र में रेडियो को समर्पित विश्व दिवस मनाने के लिए सदस्य देशों का ध्यान आकर्षित किया। जिसे स्वीकार कर लिया गया और संयुक्त राष्ट के शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को ने पेरिस में आयोजित 36वीं आमसभा में 3 नवंबर 2011 को घोषित किया कि प्रत्येक वर्ष 13 फरवरी का दिन 'विश्व रेडियो दिवस' के तौर पर मनाया जायेगा।

यह दिन इसलिए चुना गया, क्योंकि इसी दिन संयुक्त राष्ट्र संघ के 'रेडियो यूएनओ' की वर्षगांठ भी होती है। इसी दिन 13 फरवरी 1946 को यह रेडियो स्टेशन स्थापित हुआ था, उसी की याद में इस दिवस के तौर पर मनाया जाता है। विश्व के सभी देशों के रेडियो प्रसारकों और श्रोताओं को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से शुरू की गई यह पहल अपने उद्देश्यों में सफल रही है।

महान भारतीय वैज्ञानिक सर जगदीश चंद्र बोस ने सबसे पहले रेडियो की खोज की, परन्तु आर्थिक कठिनाइयों के कारण वह इसे व्यावहारिक रूप नहीं दे सके। आधुनिक रेडियो की खोज इटली के महान वैज्ञानिक मार्कोनी ने की। उन्होंने रेडियो का अविष्कार किया। मार्कोनी को उनके अविष्कार के लिए वर्ष 1909 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया था।

परन्तु टीवी के आविष्कार के बाद से रेडियो सुनने वाले श्रोताओं में कमी आई है। गांव में इसकी लोकप्रियता वैसी ही है। शायद यही कारण रहा कि माननीय प्रधानमंत्रीजी ने अपने मन की बात पहुंचाने का जरिया रेडियो को ही चुना।

कुछ देशों में रेडियो शिक्षा पहुंचाने का काम करता है। भारत में इसी बात को ध्यान में रखकर वर्ष 2000 में भारत का पहला शैक्षणिक रेडियो स्थापित किया गया। इसका उद्देश्य देश के जन-जन तक शिक्षा का प्रचार प्रसार करना है। इस रेडियो का नाम दिया गया 'ज्ञान वाणी।' ज्ञान वाणी अपने कई कार्यक्रमों के साथ लोगों का मनोरंजन तो कराता ही है, साथ ही शैक्षणिक जानकारी भी अपने श्रोताओं तक पहुंचाता है।

एक सर्वे के अनुसार सबसे ज्यादा रेडियो भारत के किसान और फौजी वर्ग के लोग सुनते हैं। इस बात की प्रमाणिकता उनके द्वारा आये फोन कॉल्स और संदेशों से होती है। यह एक मात्र ऐसा माध्यम है, जिसकी पहुंच अन्य माध्यमों के मुकाबले काफी अधिक है। सरकार को इस सुन्दर माध्यम की ओर ध्यान देना चाहिए।

आप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक,ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

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'लगता है कि मोदीजी सरकारी कागजी आंकड़ों पर भरोसा कर रहे हैं’

समय रहते ध्यान न दिया गया तो अगली बारी उत्तर प्रदेश की है। आज की स्थिति को बचाया नहीं जा सकता।

पूरन डावर by
Published - Monday, 10 February, 2020
Last Modified:
Monday, 10 February, 2020
Narendra Modi

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

भाजपा ने केजरीवाल (आप) को वाकओवर दिया है। सात-सात सांसद होते हुए भी दिल्ली, दिल्ली नेतृत्वविहीन है। एक समय होता था, जब देश के चुनिंदा सांसद दिल्ली से होते थे। बलराज मधोक, मनोहर लाल सोंधी, विजय कुमार मल्होत्रा, डॉ.भाई महावीर जैसे कद्दावर सांसद होते थे। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी भी दिल्ली से सांसद रहे। मदन लाल खुराना जैसे जुझारू नेता  मुख्यमंत्री रहे।

आखिर क्या कारण है कि आज दिल्ली जैसे प्रदेश या कहें कि देश की राजधानी में किराये के या गायकों/अभिनेताओं को ढूंढा जाता है। दिल्ली के कोर वोट जो पक्के भाजपाई हैं, को छोड़कर भोजपुरी,पूर्वांचल की गायकी से राजनीति हो रही है। अभिनेताओं और दलबदलुओं पर भरोसा किया जाता है। हद तो तब हो जाती है जब देश के कद्दावर नेता, दिल्ली के मूल निवासी, दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यक्ष रहे अरुण जेटली (अब दिवंगत) को दिल्ली छोड़कर अमृतसर से लड़ाया जाता है। क्या अच्छा होता कि परिचित कद्दावर चेहरों को दिल्ली से लड़ाया जाता।

दिल्ली की रही सही छवि दिल्ली नगर निगम ने समाप्त कर रखी है, जो देश के सर्वाधिक भ्रष्ट निगमों में से एक है। मोदीजी के नाम पर सांसद तो चुने जा सकते हैं। राज्य एक बार चुने जा सकते हैं, लेकिन दोबारा नहीं। राज्यों को कार्य करना ही होगा। समय रहते ध्यान न दिया गया तो अगली बारी उत्तर प्रदेश की है। आज की स्थिति को बचाया नहीं जा सकता। लगता है कि मोदीजी सरकारी कागजी आंकड़ों पर भरोसा कर रहे हैं। शौचालयों से लेकर, PMY आवास, मुद्रा ऋण, बिजली कनेक्शन सभी फ़र्जी आंकड़े हैं। ऐसे ही नसबंदी के आंकड़े अधिकारी संजय गांधी को दिया करते थे।

केंद्रीय मंत्रालयों को छोड़कर बाकी सभी भाजपा राज्यों में भ्रष्टाचार चरम पर है। आम जनता को घोटालों से सीधे अंतर नहीं पड़ता, लेकिन रोजमर्रा में राहत कतई नहीं है। कर विभाग फेसलेस में जाने के कारण आखिरी दिनो में खुलेहाथों से लूट रहे हैं। पर्यावरण लागू करने की प्रभावी नीति न बनाकर दोहन और उद्योगों को बंद किया जा रहा है और बेरोजगारी की समस्या बढ़ रही है।

जो दिखता है, वो बिकता है। उत्तराखंड को स्विट्जरलैंड बनाने की बात हो। जैसे- वॉटरफ़्रंट, गंगा की सफाई हो, अभी कोई दिशा या मॉड्यूल  ही नहीं है। स्मार्ट सिटी का जो हश्र है, समय रहते वास्तविक जामा न पहनाया गया तो केजरीवाल जैसा व्यक्ति आसानी से पछाड़ सकता है दिल्ली के चुनाव परिणाम सबक हैं। वैसे भी भारत की राजनीति संगठन आधारित कम नेतृत्व आधारित है। यहां चुनाव नेहरू जीतते थे, इंदिरा जीतती थीं, मायावती जीतती हैं, मुलायम जीतते हैं और आज मोदीजी जीत रहे हैं।

मोदीजी का नेतृत्व अदित्वीय है, निर्णय अभूतपूर्व है, लेकिन ये संवेदनशील मुद्दे लंबे समय तक तभी कारगर हो सकते हैं कि विकास सड़क पर दिखे। जो दिखता है वो बिकता है। उत्तर प्रदेश 30 जून तक गड्ढा मुक्त...से अधिक वीभत्स उदाहरण हो नहीं सकता। घोषणाएं और दावे नहीं, कार्य होने चाहिए। जब सड़कें गड्ढामुक्त होंगी तो दिव्यांग को भी दिखायी देंगी। उसकी लाठी भी गड्ढे में नहीं जाएगी।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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इस मानसिक दिवालिएपन पर क्या कहा जाए, मिस्टर मीडिया!

समाज में हर क्षेत्र के पूर्वजों के प्रति इतनी उदासीनता शायद ही किसी अन्य देश में होगी

राजेश बादल by
Published - Monday, 10 February, 2020
Last Modified:
Monday, 10 February, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

भारत के एक प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्र ने जाने-माने साहित्यकार और चर्चित उपन्यास ‘पहला गिरमिटिया’ के लेखक पद्मश्री गिरिराज किशोर के निधन की खबर प्रकाशित की तो उसमें विश्व हिंदू परिषद के गिरिराज किशोर की तस्वीर चस्पा थी। लाखों पाठकों के लिए यह झटका था। क्या इसके पीछे हिंदी के लेखकों को नहीं जानने की कमजोरी है अथवा अखबार के प्रकाशन में देरी न हो, इसलिए जल्दी-जल्दी में क्रॉस चेक करने की अनिवार्यता का नियम टूट गया।

दूसरी बात पर यकीन नहीं किया जा सकता, क्योंकि गिरिराज किशोर का देहांत सुबह साढ़े नौ बजे ही हो गया था और अखबार अगले दिन सुबह ही प्रकाशित होना था। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि छपते-छपते सूचना मिली थी। पहली बात ही सच है कि अखबार के पत्रकार ने लापरवाही की। विडंबना है कि इस तीन कॉलम की खबर में शीर्षक में लिटरेचर की स्पेलिंग भी गलत है। तुर्रा यह है कि अंग्रेजी समाचारपत्रों के पत्रकारों का वेतन हिंदी की तुलना में अधिक होता है।

लेकिन मैं इस आधार पर हिंदी के समाचारपत्रों को भी बरी नहीं कर सकता। हिंदी के अनेक रिसालों ने इसी समाचार के साथ न्याय नहीं किया है। महात्मा गांधी के डेढ़ सौवें साल पूरे होने पर भी इस खबर के साथ अन्याय अफसोसजनक है। महात्मा गांधी पर केंद्रित ‘पहला गिरमिटिया’ उनकी कलम से तीन दशक पहले निकला। उसे साहित्य अकादमी का सम्मान मिला। भारतीय साहित्य और इतिहास में इसे बेजोड़ रचना माना गया। इसके बाद भी हिंदी के पत्रकारों ने गिरिराज जी को यथोचित नहीं दिया। बहुत से लोग तो ऐसे भी होंगे, जिन्हें गिरमिटिया का मतलब ही पता न हो। इस मानसिक दिवालिएपन पर क्या कहा जाए? समाज में हर क्षेत्र के पूर्वजों के प्रति इतनी उदासीनता शायद ही किसी अन्य देश में होगी।

इसी तरह बरसों पहले बिहार के एक केंद्रीय मंत्री का निधन हुआ तो उनके स्थान पर उसी नाम के अन्य राजनेता की फोटो प्रकाशित हो गई थी। यह परंपरा केवल मुद्रित माध्यम में ही नहीं है। टेलिविजन और डिजिटल माध्यमों में भी इस तरह के कई उदाहरण हैं। टेलिविजन चैनलों में आपसी होड़ के चलते हड़बड़ी स्थाई भाव बन गया है। ऐसा अपराध होता है तो उसे भूल का प्रमाणपत्र दे दिया जाता है। पढ़ने-लिखने की छूटती जा रही आदत भी दूसरा बड़ा कारण है। चैनल संपादक अथवा अखबार संपादक भी अपने सहयोगियों के अल्पज्ञान के लिए जिम्मेदार हैं।  

नहीं भूलना चाहिए कि प्रकाशन के बाद कोई भी रिसाला एक दस्तावेज हो जाता है। अगले दिन के अंक में भूल सुधार या खंडन कितने लोग पढ़ते हैं। आज मेरे पुस्तकालय में आजादी से पहले की अनेक पत्र पत्रिकाएं हैं। इनमें कितनी सूचनाओं में तथ्यात्मक त्रुटियां हैं-कौन जानता है। मगर आने वाली पीढ़ियों के लिए यह प्रामाणिक संदर्भ सामग्री है। इसे ध्यान में रखिए मिस्टर मीडिया!

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चुनाव कवरेज के सारे नियम-संतुलन टूट रहे हैं, मिस्टर मीडिया!

पत्रकार पर हमला स्वीकार्य नहीं, लेकिन छिपी चेतावनी भी समझनी होगी मिस्टर मीडिया!

अब तो यह भी कहने का समय हाथ से फिसल सा गया है कि संभल जाइए मिस्टर मीडिया!

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चुनाव कवरेज के सारे नियम-संतुलन टूट रहे हैं, मिस्टर मीडिया!

दिल्ली चुनाव में अब लगभग सौ घंटे बचे हैं। डेढ़-दो महीने तक प्रचार की हड़बोंग में इस बार पत्रकारिता की अनेक परंपराएं और नियम टूट गए और आत्म अनुशासन के किले ढह गए

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 04 February, 2020
Last Modified:
Tuesday, 04 February, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

दिल्ली चुनाव में अब लगभग सौ घंटे बचे हैं। डेढ़-दो महीने तक प्रचार की हड़बोंग में इस बार पत्रकारिता की अनेक परंपराएं और नियम टूट गए और आत्म अनुशासन के किले ढह गए। मौजूदा तौर तरीकों को देखकर नहीं लगता कि कभी अखबारों के पन्नों और टेलिविजन के परदे पर समय का मीटर लगाकर कवरेज किया गया होगा।

याद आता है कि समाचार पत्रों में निर्देश जारी होते थे कि किसी विधानसभा क्षेत्र अथवा लोकसभा क्षेत्र का विश्लेषण एक ही उम्मीदवार या पार्टी के ब्यौरे से पूरा नहीं होगा। कम से कम तीन प्रत्याशियों की स्थिति किसी भी संवाददाता की कॉपी में शामिल होगी, तभी उसे जगह मिलेगी। इसी तरह ऐसा कोई संकेत नहीं दिया जाएगा, जिससे किसी भी उम्मीदवार के हारने या जीतने का संकेत मिले। राजनीतिक दल को दी जाने वाली लाइनें गिन-गिनकर प्रकाशित की जाती थीं।

कमोबेश यही हाल आकाशवाणी का था। पार्टियों के सेकंड गिने जाते थे। बुलेटिन की लाइनें और कॉपी दो-तीन बार चेक होती थी। उसके बाद ही ऑन एयर होती थी। संतुलन का अतिरेक यहां तक होता था कि कई बार मूल खबर का रूप रंग ही बदल जाता। आकाशवाणी के संवाददाता कवरेज के लिए निर्वाचन क्षेत्रों में जाते तो राजनीतिक दल उन्हें उपकृत करने के लिए खोजते फिरते और संवाददाता बचते फिरते।

उन दिनों चैनल उद्योग स्थापित नहीं हुआ था। केवल दूरदर्शन हुआ करता था। उस दौर में दूरदर्शन की आचार संहिता बड़ी सख्त होती थी। सरकार भी एक तरह से असहाय नजर आती थी। चुनाव आयोग की आचार संहिता लागू होते ही उसे तोड़ने का दुस्साहस तो दूर, पत्रकार और संपादक उससे थर थर कांपते थे। निजी चैनल आए तो उसके बाद भी कई साल तक चुनाव के दिनों में कवरेज शांत, संयत, शालीन और मर्यादित रहता था। मगर आज एक भी दिन ऐसा नहीं जाता, जब आचार संहिता की धज्जियां न उड़ाई जाती हों। आयोग बेबस सा दिखाई देता है ।

विडंबना यह है कि पत्रकारिता में अपने विवेक का इस्तेमाल भी जैसे सिकुड़ता जा रहा है। यदि प्रचार अभियान में भाषा का संयम टूटा है और नेता गाली गलौज पर उतर आए हैं तो हम भी उसे दोगुने आवेग के साथ प्रकाशित या प्रसारित करते हैं। यदि कोई आपत्तिजनक दृश्य होता है तो उसे भी परदे पर पेश करने में परहेज नहीं करते।

अक्सर इस तरह के दृश्य सिर्फ पब्लिसिटी का हिस्सा होते हैं और हम उसका शिकार बन जाते हैं। कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि देशद्रोही नारे पहचान छिपाए लोग लगाते हैं और टीवी पर वे उस समूह के हिस्से में चले जाते हैं, जिसे उनका विरोधी बदनाम करना चाहता है। असलियत तो यह है कि विरोधी ही ऐसे नारों को प्रायोजित करता है। हम उसकी चाल में आ जाते हैं। उसका षड्यंत्र कामयाब हो जाता है। हम उसके पीछे की मंशा भी नहीं समझ पाते। हमें संयम, विवेक और अक्ल से काम लेना होगा मिस्टर मीडिया!

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पत्रकार पर हमला स्वीकार्य नहीं, लेकिन छिपी चेतावनी भी समझनी होगी मिस्टर मीडिया!

अब तो यह भी कहने का समय हाथ से फिसल सा गया है कि संभल जाइए मिस्टर मीडिया!

विस्तार के साथ ही कवरेज का दायरा सिकुड़ रहा है, परिणाम सोच लीजिए मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: साल भर जहरीली सांसें छोड़ता रहा मीडिया!

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‘पार्किंग ओनर के रिस्क पर और रिपोर्टिंग रिपोर्टर के रिस्क पर’

देश के सबसे तेज चैनल की एंकर अंजना ओम कश्यप जब शाहीन बाग पहुंचीं तो शाहीन बाग ने आंचल खोलकर उनका स्वागत किया।

प्रमिला दीक्षित by
Published - Friday, 31 January, 2020
Last Modified:
Friday, 31 January, 2020
Pramila Dixit

प्रमिला दीक्षित, वरिष्ठ पत्रकार।।

तालों में नैनीताल बाकी सब तलैया...

बागों में शाहीन बाग बाकी सब हैं बगिया!

प्रश्न-जब एनआरसी है ही नहीं तो आप विरोध क्यूं कर रहे हैं?

उत्तर-ये भगत सिंह का देश है।

देश के सबसे तेज चैनल की एंकर अंजना ओम कश्यप जब शाहीन बाग पहुंचीं तो शाहीन बाग ने आंचल खोलकर उनका स्वागत किया। दस लोग जवाब देने के लिए नियुक्त कर दिए और पांच-छह लोग उनके बगल में खड़े हो गए, जो हर सवाल के जवाब के लिए इशारा करके निर्धारित करते थे कि जवाब कौन देगा।

मजेदार बात ये कि पगड़ीधारी सिख, सफेद लबादे में ईसाई धर्मप्रचारक और गेरुए वस्त्र में एक संत-इस तरह तैनात थे कि शाहीन बाग की इस धर्मनिरपेक्षता पर किसी का भी दिल बाग बाग हो जाए।

सत्रह साल की एक बच्ची से जब कई दफा तर्कों के साथ एंकर ने पूछा- बेटा जब एनआरसी है ही नहीं और सीएए में किसी की नागरिकता नहीं जा रही तो फिर आप किसकी मुखालिफत कर रहे हो? तो बात ‘वो सभी का खून शामिल है यहां की मिट्टी में’ टाइप तर्क पर आ गई।

इसलिए तो सीएए समर्थक कह रहे हैं कि अगर ऐसी ही बात है तो सभी का टैक्स शामिल है इसमें, जो घेरी है सड़क वो भी तो किसी के बाप की नहीं है!

कमाल करते हो यार!

सत्रह साल की उस बच्ची से लेकर नब्बे साल की दादी तक की बातों से साफ था, कितने गुमराह कितने अंधेरे में हैं वो कानून को लेकर। एक घंटे के टेलिकास्ट ने साफ कर दिया कि ये धरना-प्रदर्शन महज आशंका पर आधारित धरना है।

बहुत शानदार आजतक! ज्यादा तर्क-वितर्क तो वहां मुमकिन थे नहीं, लेकिन आपने कम से कम लोगों को दिखा दिया कि शाहीन बाग का धरना आशंका का धरना ही है। ज्यादा तर्क-वितर्क से माहौल बिगड़ने की आशंका होते ही अंजना नजारे दिखाने लगतीं कि देखिए दूर-दूर तक, सिर्फ मोबाइल फोन की लाइटें बता रही हैं कि कितने लोग यहां जुटे हैं।

खैर ये अंजना के शो तक ही सीमित रहा। आजतक के ही अंग्रेजी चैनल ने जब मेहमानों के साथ वहां अभिव्यक्ति की आजादी को पर लगाने की कोशिश की तो मेहमानों को सिर पर पैर रखकर भाग खड़े होना पड़ा।

इस्लाम खतरे मे दिखा तो शाहीन बाग एकजुट हो गया और हिंदू खतरे में दिखा तो दीपक चौरसिया और सुधीर चौधरी एकसाथ आ गए। टीआरपी के कलयुग में जब एक रिपोर्टर पिटता है तो दूसरा चैनल सुध तक नहीं लेता। ऐसे में दीपक चौरसिया को अकेले टीआरपी लूटते देख, जी न्यूज का न्यूज नेशन के साथ आना नया प्रयोग बन गया।

शाहीन बाग में सबका स्वागत खुले दिल से हो ऐसा नहीं है। अलग-अलग बैरिकेड और दूरी निर्धारित हैं। जी न्यूज का रिपोर्टर 500 मीटर दूर तक, रिपब्लिक का 800 मीटर और न्यूज नेशन वालों की तो अब दूर से ही नमस्ते है।

एबीपी न्यूज के रिपोर्टर्स के कुदरती खाने वाले विडियो वायरल हैं। जब शाहीन बाग में एक शख्स से पूछा गया कि खाना कहां से आ रहा है, उसने कहा रात में कुदरती आ जाता है। बड़ा दिलचस्प विडियो है। इस विडियो को देखकर प्रसंग संदर्भ समेत व्याख्या की जा सकती है कि जहां तर्क दम तोड़ दें, वहां से रिपोर्ट करना कितना आसान या कितना मुश्किल है।

हालांकि दीपक चौरसिया और सुधीर चौधरी के बाद आजतक और आजतक के बाद रवीश कुमार के बाद एबीपी न्यूज के बाद राहुल कंवल के बाद इंडिया टीवी के सौरव शर्मा के बाद और टीवी भारतवर्ष के बाद एकाध रिपब्लिक भारत या सीएनबीसी आवाज को ही मलाल रह गया होगा कि हाय हुसैन, हम क्यों न हुए शाहीन!

जैसे दिल्ली में पार्किंग ओनर के रिस्क पर होती है। शाहीनबाग में रिपोर्टिंग रिपोर्टर के रिस्क पर। संपादक प्राइम टाइम में टीवी पर बैठकर शाहीन बाग, जामिया या नागरिकता कानून विरोधियों की जितनी लानत-मलानत करते हैं, अगले दिन इन इलाकों की सड़कों पर उनके रिपोर्टर उतनी ही तेजी से दौड़ा लिए जाते हैं!

जी न्यूज के कैमरामैन को जामिया में भीड़ ने घेरकर मारा। दाद देनी होगी रिपोर्टर की जो मौके से भागा नहीं, बल्कि पिटते कैमरामैन को बचाने के लिए हिंसा पर उतारू भीड़ के बीच घुस गया। रिपब्लिक भारत की एक महिला रिपोर्टर को भी दल्ले-दल्ले के नारों के बीच किसी तरह अपनी इज्जत बचाने की जद्दोजहद करते देखा।

वैसे जितनी मारपीट, गालीगलौज, छीनाझपटी जी न्यूज और रिपब्लिक भारत के रिपोर्टर्स के साथ हो रही है, उसका एक दो परसेंट भी एनडीटीवी जैसे किसी चैनल के रिपोर्टर के साथ हुआ होता तो टीवी कितने दिन काला रहता?

खैर.....हम सहिष्णु हैं हम देखेंगे। टीवी जो जो दिखाएगा, हम देखेंगे। बस बांचने की आजादी बनी रहे।

(ये लेखिका के निजी विचार हैं।)

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पत्रकार पर हमला स्वीकार्य नहीं, लेकिन छिपी चेतावनी भी समझनी होगी मिस्टर मीडिया!

पत्रकारिता धर्म भी विकट है। अगर किसी जन आंदोलन का कवरेज छोड़ दिया जाए तो आरोप लगने लगते हैं।

राजेश बादल by
Published - Monday, 27 January, 2020
Last Modified:
Monday, 27 January, 2020
mister-media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

कमाल का लोकतांत्रिक विरोध है। धरना, अनशन, प्रदर्शन, रैली और सभाएं सरकार या सिस्टम के प्रति विरोध करने के औपचारिक तरीके हो सकते हैं। गांधी युग से लेकर आज तक इन्हें असहमति की सार्थक शैली माना गया है। लेकिन जब इन आंदोलनों की गाड़ी पटरी से उतर जाए और उसमें हिंसा दाखिल हो जाए तो उस असहमति को नैतिक समर्थन कौन देगा? महात्मा गांधी अपने किसी आंदोलन में हिंसा उभरते देखते थे तो या तो उसे समाप्त कर देते अथवा उससे खुद को अलग कर लेते थे। यही उनकी ताकत थी। इस ताकत को नपुंसक स्वरूप क्यों दिया जाना चाहिए?

पत्रकारिता धर्म भी विकट है। अगर किसी जन आंदोलन का कवरेज छोड़ दिया जाए तो आरोप लगने लगते हैं। अगर कोई पत्रकार आंदोलन स्थल पर जाए और वहां उसकी पिटाई हो, कैमरे छीन लिए जाएं और उसे जान बचाकर वापस आना पड़े तो उस विरोध को कोई जायज नहीं कहेगा। दीपक चौरसिया के साथ जो व्यवहार प्रदर्शनकारियों ने किया, वह इस बात का सबूत है कि वे स्वयं तो अपनी असहमति को व्यक्त करने के सारे हथियार चलाना चाहते हैं, लेकिन पत्रकारिता धर्म पर डटे संवाददाताओं से पार्टी बनकर उनके साथ खड़े होने की अपेक्षा करते हैं। आखि़र वे अपने ऑर्केस्ट्रा से वही धुन क्यों निकलते देखना चाहते हैं, जिसका उपयोग वे सरकार के खिलाफ कर रहे हैं। यह कोई फरमाइशी कार्यक्रम नहीं है कि जो गीत आपको पसंद है, वही पत्रकारिता गाती रहे। मत भूलिए कि सरकार के इसी रवैए का तो आप प्रतिरोध कर रहे हैं कि वह भी अपने पसंद की धुन सुनना चाहती है। तरकश के तीर जब आप आंदोलन में निकालते हैं और धनुर्धर अनाड़ी हो तो तीर उलट कर खुद को ही लगने का खतरा रहता है। गांधीजी उलट कर लगने वाले इसी तीर से बचते थे।

लेकिन दीपक चौरसिया पर आक्रमण के पीछे पत्रकारिता करने वालों के लिए भी एक संदेश छिपा है। आज का समाज पचास साल पहले का समाज नहीं है, जब पत्रकारों की भूमिका और उनके लेखन पर जन मानस की अगाध श्रृद्धा थी। पन्ना और परदा अब किसी पत्रकार की नीयत को छिपाता नहीं है। छपा शब्द और स्क्रीन पर बोले गए लफ्जों का पोचापन अब दर्शक और पाठक पकड़ लेते हैं। अगर मीडिया ऐसी पत्रकारिता करेगा, जिसका रिमोट किसी और के हाथ में होगा तो उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा। अफसोस यह है कि इन दिनों पत्रकारिता में पक्ष और प्रतिपक्ष के खेमे बन गए हैं। दोनों खेमे जंग के मैदान में अपने अपने औजारों का इस्तेमाल कर रहे हैं। याद रखिए वे औजार आप चलाएं या सामने वाला खेमा- नुकसान तो पत्रकारिता का ही होगा। चाकू तरबूजे पर गिरे या तरबूजा चाकू पर- कटेगा तो तरबूजा ही मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

अब तो यह भी कहने का समय हाथ से फिसल सा गया है कि संभल जाइए मिस्टर मीडिया!

विस्तार के साथ ही कवरेज का दायरा सिकुड़ रहा है, परिणाम सोच लीजिए मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: साल भर जहरीली सांसें छोड़ता रहा मीडिया!

मिस्टर मीडिया: समय का संकेत नहीं समझने का है ये नतीजा

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