पुण्य प्रसून बाजपेयी: मौजूदा मीडिया बनाम आपातकाल के दौर की पत्रकारिता

‘चालीस साल पहले संघर्ष करते पत्रकार और मीडिया हाउस आपातकाल में भी दिखाई जरूर दे रहे थे...

Last Modified:
Saturday, 25 June, 2016
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‘चालीस साल पहले संघर्ष करते पत्रकार और मीडिया हाउस आपातकाल में भी दिखाई जरूर दे रहे थे, लेकिन चालीस साल बाद तो बिना आपातकाल सत्ता झुकने को कहती है तो हर कोई सरकारों के सामने लेटने को तैयार हो जाता है।’ अपने ब्लॉग (prasunbajpai.itzmyblog.com) के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

मौजूदा मीडिया बनाम आपातकाल के दौर की पत्रकारिता

क्या मौजूदा वक्त में मीडिया इतना बदल चुका है कि मीडिया पर नकेल कसने के लिए अब सरकारों को आपातकाल लगाने की भी जरूरत नहीं है। यह सवाल इसलिए क्योंकि चालीस साल पहले आपातकाल के वक्त मीडिया जिस तेवर से पत्रकारिता कर रहा था आज उसी तेवर से मीडिया एक बिजनेस मॉडल में बदल चुका है, जहां सरकार के साथ खड़े हुए बगैर मुनाफा बनाया नहीं जा सकता है। और कमाई ना होगी तो मीडिया हाउस अपनी मौत खुद ही मर जाएगा। यानी 1975 वाले दौर की जरुरत नहीं जब इमरजेन्सी लगने पर अखबार के दफ्तर में ब्लैक आउट कर दिया जाए या संपादकों को सूचना मंत्री सामने बैठाकर बताएं कि सरकार के खिलाफ कुछ लिखा तो अखबार बंद हो जाएगा। या फिर पीएम के कसीदे ही गढ़े। अब के हालात और चालीस बरस पहले हालात में कितना अंतर आ गया है।

यह समझने के लिए 40 बरस पहले जून 1975 में लौटना होगा। आपातकाल लगा तो 25 जून की आधी रात के वक्त लेकिन इसकी पहली आहट 12 जून को तभी सुनायी दे गई जब इलाहबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला सुनाया और समाचार एजेंसी पीटीआई ने पूरे फैसले को जस का तस जारी कर दिया। यानी शब्दों और सूचना में ऐसी कोई तब्दिली नहीं की जिससे इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला होने के बाद भी आम जनता खबर पढ़ने के बाद फैसले की व्याख्या सत्ता के अनुकूल करें। हुआ यही कि ऑल इंडिया रेडियो ने भी समाचार एजेंसी की कापी उठाई और पूरे देश को खबर सुना दी कि, श्रीमति गांधी को जन-प्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 [ 7 ] के तहत भ्रष्ट साधन अपनाने के लिए दोषी करार दिया गया । और प्रधानमंत्री को छह वर्षों के लिए मताधिकार से वंचित किया गया। और 600 किलोमीटर दूर बारत की राजधानी नई दिल्ली में इलाहबाद में दिए गए फैसले की खबर एक स्तब्धकारी आघात की तरह पहुंची। इस अविश्वसनीय खबर ने पूरे देश को ही जैसे मथ डाला। एक सफदरजंग मार्ग पर सुरक्षा प्रबंध कस दिए गए। ट्रकों में भरकर दिल्ली पुलिस के सिपाही पहुंचने लगे। दल के नेता और कानूनी विशेषज्ञ इंदिरा के पास पहुंचने लगे। घर के बाहर इंदिरा के समर्थन में संगठित प्रदर्शन शुरू हो गए। दिल्ली परिवहन की कुल 1400 बसों में से 380 को छोड़कर बाकी सभी बसों को भीड़ लाद लाद कर प्रदर्शन के लिए 1, सफदरजंग पहुंचाने पर लगा दिया गया। और यह सारी रिपोर्ट भी समाचार एजेंसी के जरिए जारी की जाने लगी। असल में मीडिया को ऐसे मौके पर कैसे काम करना चाहिए या सत्ता को कैसे काम लेना चाहिए यह सवाल संजय गांधी के जहन में पहली बार उठा और संजय गांधी ने सूचना प्रसारण मंत्री इन्द्र कुमार गुजराल को बुलाकर खूब डाटा कि प्रधानमंत्री के खिलाफ इलाहबाद हाईकोर्ट के फैसले को बताने के तरीके बदले भी तो जा सकते थे।

उस वक्त ऑल इंडिया रेडियो में काम करने वाले न्यूज एडिटर कपिल अग्निहोत्री के मुताबिक वह पहला मौका था जब सत्ता को लगा कि खबरें उसके खिलाफ नहीं जानी चाहिए और पहली बार समाचार एजेंसी पीटीआई-यूएनआई को चेताया गया कि बिना जानकारी इस तरह से खबरें जारी नहीं करनी है। चूंकि तब समाचार एजेंसी टिकी भी सरकारी खर्च पर ही थी तो संजय गांधी ने महसूस किया कि जब समाचार एजेंसी के कुल खर्च का 80 फीसदी रकम सरकारी खजाने से जाती है तो फिर सरकार के खिलाफ खबर को एजेंसियां क्यों जारी करती हैं। उस वक्त केन्द्र सरकार रेडियो की खबरों के लिए 20 से 22 लाख रुपए समाचार एजेंसी पीटीआई-यूएनआई को देती थी। बाकी समाचार पत्र जो एजेंसी की सेवा लेते वह तीन से पांच हजार से ज्यादा देते नहीं थे। यानी समाचार एजेंसी तब सरकार की बात ना मानती तो एजेंसी के सामने बंद होने का खतरा मंडराने लगता। यह अलग मसला है कि मौजूदा वक्त में सत्तानुकूल हवा खुद ब खुद ही एजेंसी बनाने लगती है क्योंकि एजेंसियों के भीतर इस बात को लेकर ज्यादा प्रतिस्पर्धा होती है कि कौन सरकार या सत्ता के ज्यादा करीब है।

लेकिन दिलचस्प यह है आपातकाल लगते ही सबसे पहले आपातकाल का मतलब होता क्या है इसे सबसे पहले किसी ने महसूस किया तो सरकारी रेडियो में काम करने वालों ने ही। और पहली बार आपातकाल लगने के बाद सुबह तो हुई लेकिन मीडिया के लिए 25 जून 1975 की रात के आखरी पहर में ही घना अंधेरा छा गया। असल में उसी रात जेपी यानी जयप्रकाश नारायण को गांधी पीस फाउंडेशन के दफ्तर से गिरफ्तार किया गया और जेपी ने अपनी गिरफ्तारी के वक्त मौजूद पत्रकारों से जो शब्द कहे उसे समाचार एजेंसी ने जारी तो कर दिया लेकिन चंद मिनटों में ही जेपी के कही शब्द वाली खबर किल..किल..किल कर जारी कर दी गई और समूचे आपाकताल के दौर यानी 18 महीनों तक जेपी के शब्दों को किसी ने छापने की हिम्मत नहीं की। और वह शब्द था , ‘विनाशकाले विपरीत बुद्धि’।

जेपी ने 25 की रात अपनी गिरफ्तारी के वक्त इंदिरा गांधी को लेकर इस मुहावरे का प्रयोग किया था कि जब विनाश आता है तो दिमाग भी उल्टी दिशा में चलने लगता है। कपिल अग्निहोत्री के मुताबिक वह रात उनके लिए वाकई खास थी, क्योंकि उनका घर रउफ एवेन्यू की सरकारी कॉलोनी में था जो गांधी पीस फाउंडेशन के ठीक पीछे की तरफ थी। तो रात का बुलेटिन कर जब वह घर पहुंचे और खाने के बाद पान खाने के लिए मोहन सिंह प्लेस निकले तब तक उनके मोहल्ले में सबकुछ शांत था। लेकिन जब वापस लौटे को बड़ी तादाद में पुलिस की मौजूदगी देखी। एक पुलिस वाले से पूछा, क्या हुआ है। तो उसने जबाब देने के बदले पूछा, तुम किधर जा रहे है। इसपर जब अपने घर जाने की बात कही तो पुलिस वाले ने कहा देश में इमरजेन्सी लग गई है। जेपी को उठाने आए हैं और कपिल अग्निहोत्री के मुताबिक उसके बाद तो नींद और नशा दोनों ही फाख्ता हो गए। स्कूटर वापस मोड़ रेडियो पहुंच गए। रात डेढ बजे न्यूज डायरेक्टर भट साहब को फोन किया तो उन्होंने पूछा इतनी रात क्या जरूरत हो गई। जब आपातकाल लगने और जेपी की गिरफ्तारी अपनी आंखों से देखने का जिक्र किया तो भट साहब भी सकते में आ गए।

खैर उसके बाद ऊपर से निर्देश आया कि सुबह आठ बजे के पहले बुलेटिन में आपातकाल की जानकारी और उस पर नेता, मंत्री , सीएम की प्रतिक्रिया ही जाएगी। इस बीच पीटीआई ने जेपी की गिरफ्तारी की खबर, विनाशकाले विपरित बुद्धि के साथ भेजी जिसे चंद सेकेंड में ही किल किया जा चुका था। तो अब समाचार एंजेसी पर नहीं बल्कि खुद ही सभी की प्रतिक्रिया लेनी थी तो रात से ही हर प्रतिक्रिया लेने के लिए फोन घनघनाने लगे। पहला फोन बूटा सिंह को किया गया। उन्हें जानकारी देकर उनकी प्रतिक्रिया पूछी तो जबाब मिला, तुस्सी खुद ही लिख दो, मैनू सुनाने दी जरुरत नहीं हैगी। मै मुकरुंगा नहीं। इसी तरह कमोवेश हर सीएम, नेता ने यही कहा कि आप खुद ही लिख दो। कपिल अग्निहोत्री के मुताबिक सिर्फ राजस्थान के सीएम सुखाडिया ने एक अलग बात बोली कि लिख तो आप ही दो लेकिन कड़क लिखना। अब कड़क का मतलब आपातकाल में क्या हो सकता है यह कोई ना समझ सका। लेकिन सभी नेता यह कहकर सो गए ।

और अगली सुबह जब बुलेटिन चला तो पहली बार समाचार एजेंसी के रिपोर्टर ऑल इंडिया रेडियो पहुंचे। सारे नेताओं की प्रतिक्रिया लिखकर ले गए। और उसी वक्त तय हो गया कि अब देश भर में फैले पीआईबी और ऑल इंडिया रेडियो ही खबरों का सेंसर करेंगे। यानी पीआईबी हर राज्य की राजधानी में खुद ब खुद खबरों को लेकर दिशा-निर्देश बताने वाला ग्राउंड जीरो बन गया। यानी मौजूदा वक्त में पीआईओ के साथ खड़े होकर जिस तरह पत्रकार खुद को सरकार के साथ खडे होने की प्रतिस्पर्धा करते है वैसे हालात 1975 में नहीं थे। यह जरूर था कि सरकारी विज्ञापनों के लिए डीएवीपी के दफ्तर के चक्कर जरूर अखबारो के संपादक लगाते, क्योंकि उस वक्त डीएवीपी का बजट सालाना दो करोड़ रुपए का था।

लेकिन अब के हालात में तो विज्ञापन के लिए सरकारों के सामने खबरों को लेकर संपादक नतमस्तक हो जाते हैं क्योंकि हर राज्य के पास हजारों करोड़ के विज्ञापन का बजट होता है। इसे एक वक्त हरियाणा के सीएम हुड्डा ने समझा तो बाद में राजस्थान में वसुधंरा से लेकर बिहार में नीतीश कुमार से लेकर दिल्ली में केजरीवाल तक इसे समझ चुके हैं। यानी अब खबरों को स्थायी पूंजी की छांव भी चाहिए। लेकिन अब की तुलना में चालीस बरस के कई हालात उल्टे भी थे। मसलन अभी संघ की सोच के करीबियों को रेडियो, दूरदर्शन से लेकर प्रसार भारती और सेंसर बोर्ड से लेकर एफटीआईआई तक में फिट किया जा रहा है तो चालीस साल पहले आपातकाल लगते ही सरकार के भीतर संघ के करीबियों और वामपंथियों की खोज कर उन्हें या तो निकाला जा रहा था या हाशिये पर ढकेला जा रहा था। वामपंथी धारा वाले आंनद स्वरूप वर्मा उसी वक्त रेडियो से निकाले गए।

हालांकि उस वक्त उनके साथ काम करने वालो ने आईबी के उन अधिकारियो को समझाया कि रेडियो में कोई भी विचारधारा का व्यक्ति हो उसके विचारधारा का कोई मतलब नहीं है क्योंकि खबरों के लिए पुल बनाये जाते हैं। यानी जो देश की खबरें जाएगी उसके लिए पूल वन, विदेशी खबरों के लिए पूल टू। और जिन खबरों को लेना है जब वह सेंसर होकर पूल में लिखी जा रही हैं और उससे हटकर कोई दूसरी खबर जा नहीं सकती तो फिर विचारधारा का क्या मतलब। और आनंद स्वरुप वर्मा तो वैसे भी उस वक्त खबरों का अनुवाद करते हैं। क्योंकि पूल में सारी खबरें अंग्रेजी में ही लिखी जातीं। तो अनुवादक किसी भी धारा का हो सवाल तो अच्छे अनुवादक का होता है। लेकिन तब अभी की तरह आईबी के अधिकारियों को भी अपनी सफलता दिखानी थी तो दिखाई गई। फिर हर बुलेटिन की शुरुआत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नाम से होनी चाहिए। यानी इंदिरा गांधी ने कहा है। और अगर किसी दिन कहीं भी कुछ नहीं कहा तो इंदिरा गांधी ने दोहराया है कि..., या फिर इंदिरा गांधी के बीस सूत्री कार्यक्रम में कहा गया है कि...। यानी  मौजूदा वक्त में जिस तरह नेताओं को सत्ताधारियों को कहने की जरुरत नहीं पड़ती और उनका नाम ही बिकता है तो खुद ब खुद ही अब तो नेताओं को खुश करने के लिए उनके नाम का डंका न्यूज चैनलों में बजने लगता है। वह चालीस बरस पहले आपाताकाल के दबाब में कहना पड़ रहा था। फिर बड़ा सच यह भी है कि मौजूदा वक्त में जैसे गुजरात के रिपोर्टरों या पीएम के करीबी पत्रकारों को अपने अपने सस्थानों में जगह मिल रही है चालीस साल पहले आपातकाल के वक्त जेपी के आंदोलन पर नजर रखने के लिए खासतौर से तब बिहार में चाक चौबंद व्यवस्था की गई।

चूंकि रेडियो बुलेटिन ही सबकुछ होता था तो पटना में होने वाले शाम साढ़े सात बजे के सबसे लोकप्रिय बुलेटिन के लिए शम्भूनाथ मिश्रा तो रांची से शाम छह बजकर बीस मिनट पर नया बुलेटिन शुरू करने के लिए मणिकांत वाजपेयी को दिल्ली से भेजा गया। फिर अभी जिस तरह संपादकों को अपने अनुकूल करने के लिए प्रधानमंत्री चाय या भोजन पर बुलाते हैं। यहां फिर दिल्चस्प यह भी है कि चालीस बरस पहले जिस आपातकाल के शिकार अरुण जेटली छात्र नेता के तौर पर हुए वह भी पिछले दिनों बतौर सूचना प्रसारण मंत्री जिस तरह संपादकों से लेकर रिपोर्टर तक को घर बुलाकर अपनी सरकार की सफलता के प्रचार-प्रसार का जिक्र करते रहे। और बैठक से निकलकर कोई संपादक बैठक की बात तो दूर बल्कि देश के मौजूदा हालात पर भी कलम चलाने की हिम्मत नहीं रख पाता है। जबकि आपातकाल लगने के 72 घंटे के भीतर इन्द्र कुमार गुजराल की जगह विद्याचरण शुक्ल सूचना प्रसारण बनते ही संपदकों को बुलाते हैं। और दोपहर दो बजे मंत्री महोदय पद संभालते है तो पीआईबी के प्रमुख सूचना अधिकारी डॉ. ए.आर.बाजी शाम चार दिल्ली के बड़े समाचार पत्र को संपादकों को बुलावा भेजते हैं।

मुलगांवकर {एक्सप्रेस} ,जार्ज वर्गीज {हिन्दुस्तान टाइम्स}, गिरिलाल जैन {स्टेट्समैन}, निहाल सिंह {स्टेटसमैन}  और विश्वनाथ {पेट्रियाट} पहुंचते हैं। बैठक शुरु होते ही मंत्री महोदय कहते है कि सरकार संपादकों के कामकाज के काम से खुश नहीं है। उन्हें अपने तरीके बदलने होंगे। इस पर एक संपादक जैसे ही बोलते हैं कि ऐसी तानाशाही को स्वीकार करना उनके लिए असम्भव है। तो ठीक है कहकर मंत्री जी भी उत्तर देते है कि, ‘हम देखेंगे कि आपके अखबार से कैसा बर्ताव किया जाए’। तो गिरिलाल जैन बहस करने के लिए कहते हैं कि ऐसे प्रतिबंध तो अंग्रेजी शासन में भी नहीं लगाए गए थे। शुक्ल उन्हें बीच में ही काट कर कहते है, ‘यह अंग्रेजी शासन नहीं है। यह राष्ट्रीय आपात स्थिति है।’ इसके बाद संवाद भंग हो जाता है और उसके बाद अदिकत्र नतमस्तक हुए। करीब सौ समाचारपत्र को सरकारी विज्ञापन बंद कर झुकाया गया। लेकिन तब भी स्टेट्समैन के सी.आर. ईरानी और एक्सप्रेस के रामनाथ गोयनका ने झुकने से इनकार कर दिया, तो सरकार ने इनके खिलाफ फरेबी चाले चलने शुरू की। लेकिन पीएमओ के अधिकारी ही सेंसर बोर्ड में तब्दील हो गए। प्रेस परिषद भंग कर दी गई। आपत्तिजनक सामग्री के प्रकाशन पर रोक का घृणित अध्यादेश 1975 लागू कर दिया गया। यह अलग बात है कि बावजूद चालीस साल पहले संघर्ष करते पत्रकार और मीडिया हाउस आपातकाल में भी दिखाई जरूर दे रहे थे, लेकिन चालीस साल बाद तो बिना आपातकाल सत्ता झुकने को कहती है तो हर कोई सरकारों के सामने लेटने को तैयार हो जाता है।

(साभार: prasunbajpai.itzmyblog.com)

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यह गंभीर सच परदे पर पत्रकारिता करने वालों को समझना पड़ेगा मिस्टर मीडिया!

अजीब सा नजारा था। अरसे बाद या शायद पहली बार मीडिया के अनेक अवतार पिछले दिनों इस तरह विलाप करते दिखाई दिए।

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 23 November, 2021
Last Modified:
Tuesday, 23 November, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

अजीब सा नजारा था। अरसे बाद या शायद पहली बार मीडिया के अनेक अवतार पिछले दिनों इस तरह विलाप करते दिखाई दिए। जब केंद्र सरकार ने तीनों विवादित कृषि कानून वापस लेने का ऐलान किया तो भारतीय पत्रकारिता का यह नया रूप सामने आया। वैसे तो सारे मुल्क ने और कई देशों में बसे हिंदुस्तानियों ने हुकूमत के इस फैसले पर राहत की सांस ली थी। इसका कारण भी था। साल भर से आंदोलन कर रहे किसानों से सरकार का संवाद टूटा हुआ था। सैकड़ों किसानों की जान जा चुकी थी और कृषि आधारित उद्योगों की कमर टूट गई थी। किसी की दृष्टि में इसकी वजह सरकार की हठधर्मिता थी तो एक वर्ग ऐसा भी था, जो अन्नदाताओं  को कोस रहा था। लोकतंत्र में किसी को अपनी बात रखने से रोका नहीं जा सकता। आप आंदोलनकारियों से असहमत हो सकते हैं, मगर उन्हें अलगाववादी, उग्रवादी, राष्ट्रद्रोही और हिंसक प्रवृत्ति का ठहराकर उनकी देशभक्ति को चुनौती नहीं दे सकते। खासतौर पर उस हाल में, जब किसानों के तमाम मान्यता प्राप्त संगठन गांधीवादी तरीके से अपना संघर्ष छेड़े हुए थे। उनके आंदोलन को कई बार हिंसक रूप देने की कोशिशें की गईं, लेकिन उन्होंने अपना धीरज और संयम नहीं खोया।

ऐसे में घटनाक्रम की निरपेक्ष रिपोर्टिंग करने के बजाय पत्रकारिता का एक बड़ा धड़ा सरकार को ही कोसने लगा, मानों उसने कोई जघन्य पाप कर दिया हो। एक निर्वाचित प्रधानमंत्री अचानक इस धड़े के लिए खलनायक बन गए। उसे कृषि कानूनों की चिंता नहीं थी, बल्कि लंबे समय से वे जो प्रशंसा गीत गा रहे थे, अचानक उनकी धुन बेसुरी हो जाने से ज्यादा दुखी थे। वे अपनी अवधारणा गलत साबित होने से भी परेशान थे, जिसके चलते वे सरकार के इस कदम का स्तुतिगान कर रहे थे। करीब साल भर से पत्रकारों के इस वर्ग ने किसानों के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था। यह वर्ग नाना प्रकार से खेती-किसानी के बारे में अजीबोगरीब कुतर्क गढ़ रहा था और कृषि कानूनों को जायज ठहराने का प्रयास करता रहा था। संसदीय पराक्रम से इन कानूनों को पारित किया गया था। वह प्रक्रिया यकीनन लोकतांत्रिक नहीं थी, पर माध्यमों के इन पैरोकारों को उसमें भी कोई दोष नजर नहीं आया । पत्रकारिता में संतुलन की भावना का विलोप होना इस कालखंड पर एक काला धब्बा है।

सरकार एक सियासी संस्था है, जो देश के लिए काम करती है, मगर अपना राजनीतिक चरित्र नहीं भूलती। जब उसने देखा कि उत्तरप्रदेश में उसकी राज्य सत्ता की चूलें हिलने लगी हैं और आने वाले विधानसभा चुनाव में उसे पराजय का सामना करना पड़ सकता है तो उसने यू टर्न लेने से कोई गुरेज नही किया। सरकार ने तो गिरगिट की तरह रंग बदल लिया, पर जो शब्द बिरादरी सरकारी रंग में रंगी हुई थी, इस विकट हाल में वह क्या करती? जाहिर है उसके लिए मुंह छिपाना भी मुश्किल हो गया। नहीं कहा जा सकता कि उसने किसान आंदोलन का जंग की हद तक जाकर विरोध क्यों किया। वह सरकार के दबाव में थी अथवा मैनेजमेंट के, वह सरकारी प्रतिष्ठानों से उपकृत थी या फिर किसी के इशारे पर काम कर रही थी।

हो सकता है उसके अपने निजी हित भी इस भूमिका के पीछे छिपे हुए हों। कई बार देखा गया है कि तमाम पत्रकार सम्मानों, राजनीतिक पदों के लालच या अन्य आर्थिक प्रलोभन में भी ऐसी भूमिका निभाते हैं। यानी कुछ न कुछ तो था, जिसके कारण उसने पत्रकारिता की निष्पक्षता और संतुलन की सीमा रेखा पार करने का काम किया। इससे समूची पत्रकारिता की किरकिरी हुई। बेजोड़ संपादक राजेंद्र माथुर पत्रकारिता के क्षेत्र में बढ़ती इस प्रवृति के खिलाफ थे। उनका कहना था कि संपादक के अपने या किसी अन्य के हित निष्पक्ष पत्रकारिता को प्रभावित करते हैं। स्वतंत्रता के बाद पत्रकारिता के इन पूर्वजों ने यदि संतुलन बिंदु पर टिके रहने के सिद्धांत प्रतिपादित किए हैं, तो उनके पीछे यही मंशा रही होगी कि आखिर इस पाक पेशे को नापाक होने से बचाए रखा जाए, लेकिन उनका पालन नहीं हुआ। जब उल्लंघन हुआ तो सारी बिरादरी बदनाम हो गई। साख दांव पर लग गई। नहीं भूलना चाहिए कि इस आंदोलन में एक दौर ऐसा भी आया था, जब कुछ संवाददाताओं और एंकरों को हड़ताली कृषकों ने कवरेज करने में सहयोग से इनकार कर दिया था । यदि आंदोलन की कवरेज कर रहे ऐसे पत्रकारों की नीयत साफ होती तो वैसे अप्रिय दृश्य देखने को नहीं मिलते।

वैसे भी बाजार तथा अन्य दबावों के चलते इन दिनों भारतीय पत्रकारिता अपनी साख के संक्रमण काल से गुजर रही है। दशकों तक बेहतरीन पत्रकारिता के नमूने प्रस्तुत करके उसने वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा कमाई थी। लेकिन हालिया दौर ने उसे चोट पहुंचाई है। टेलिविजन पत्रकारिता खासतौर पर इस बिगड़ती स्थिति के लिए जिम्मेदार मानी जा सकती है। उसे समझना होगा कि आज का दर्शक पच्चीस-तीस बरस पहले का दर्शक नहीं है। वह जागरूक है और जब पत्रकार परदे पर संतुलन की मर्यादा लांघता है तो वह छिपता नहीं है। समाचार पत्र के बारे में राय बनाने के लिए तो उसका पढ़ा-लिखा होना जरूरी है, मगर टेलिविजन समाचार देखकर तो कम पढ़ा-लिखा या एकदम अनपढ़ दर्शक भी अपनी राय बना लेता है। उसे चैनल बदलने में एक सेकंड भी नहीं लगता। यह गंभीर सच परदे पर पत्रकारिता करने वालों को समझना पड़ेगा। क्या यह खतरे की घंटी नहीं है कि नौजवान पीढ़ी टेलिविजन पर खबरें देखने से करीब करीब किनारा कर चुकी है मिस्टर मीडिया!   

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

कंटेंट के मामले में चैनलों व अखबारों को सतर्क और संवेदनशील होने की जरूरत है मिस्टर मीडिया

मिस्टर मीडिया: यह कैसा मानसिक दिवालियापन हमारे इस पेशे में दाखिल हो गया है

इस तरह किसी की यश हत्या से हमें बचना होगा मिस्टर मीडिया!

‘उधार का सिंदूर’ संसद टीवी की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाएगा मिस्टर मीडिया!

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कंटेंट के मामले में चैनलों व अखबारों को सतर्क और संवेदनशील होने की जरूरत है मिस्टर मीडिया

विडंबना तो यह है कि इस झूठ को दबंगी के साथ फैलाने के बाद लोकतंत्र के कमोबेश सारे प्रतीकों की खामोशी रहस्यमय है। एक अपात्र से पद्म सम्मान वापस लेने का साहस भी नहीं दिखाया गया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 16 November, 2021
Last Modified:
Tuesday, 16 November, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

हमारे देश की एक सम्मानित महिला ने एक टीवी चैनल पर कहा कि देश को आजादी भीख में मिली है। असली स्वतंत्रता तो 2014 के बाद मिली है। जब इसकी तीखी और व्यापक आलोचना हुई तो उन्होंने खेद प्रकट करना तो दूर, उल्टा यह कहा कि उस साल तो कोई युद्ध ही नहीं हुआ था तो आजादी कैसे मिली? इस मानसिक दिवालिएपन पर कोई टिप्पणी ही व्यर्थ है। मेरा सरोकार तो उस चैनल और उसकी विद्वान एंकर के विवेक तथा सामजिक-राष्ट्रीय जिम्मेदारी पर उनकी असंवेदनशीलता को लेकर है। आम तौर पर पत्रकारिता के काम में बुनियादी शिक्षा यह होती है कि आप पहले राष्ट्र की चिंता करिए, उसके बाद अपने कारोबार या व्यवसाय की। जब पद्म सम्मान से अलंकृत कोई व्यक्तित्व खुलेआम देश के लिए नुकसानदेह कथन बार-बार दोहराता हो तो चैनल के एंकर, उसके संपादक और प्रबंधक को तत्काल उस शो को ऑफ एयर करने का विवेक क्यों नहीं जागा? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हम समर्थन करते हैं लेकिन उसके नाम पर स्वच्छंदता, उच्श्रृंखलता और अराजकता को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता।

विडंबना तो यह है कि इस झूठ को दबंगी के साथ फैलाने के बाद लोकतंत्र के कमोबेश सारे प्रतीकों की खामोशी रहस्यमय है। एक अपात्र से पद्म सम्मान वापस लेने का साहस भी नहीं दिखाया गया। एक अभिनेता के बेटे के ड्रग मामले पर दिन रात भौंपू की तरह शोर करने वाले चैनलों को एक अभिनेत्री के एक ऐतिहासिक तथ्य के बारे में अपराध की हद को छूने वाला कुकृत्य नहीं दिखाई दिया और न ही कोई संगठन या पत्रकारिता के हितैषी महापुरुष सामने आए। शास्त्रीय बहस छेड़नी हो तो अनेक तर्क दिए जा सकते हैं। यदि आजादी भीख में मिली थी तो यह देश सरकारी स्तर पर 75 साल पूरे होने पर अमृत महोत्सव क्यों मना रहा है? बीजेपी के पितृपुरुष जैसा स्थान प्राप्त श्यामाप्रसाद मुखर्जी भारत की पहली राष्ट्रीय सरकार में क्यों शामिल हुए? यदि यह आजादी भीख में मिली तो भीख पच्चीस या पचास बरस पहले क्यों नहीं मांग ली गई?

सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, नेताजी सुभाषचंद्र बोस और महात्मा गांधी जैसे अवतार पुरुषों की कुर्बानियां बच जातीं। जलियांवाला बाग नरसंहार नहीं होता। भीख मांग लेते तो कामागाटामारू जहाज जैसा हादसा नहीं होता और कनाडा जैसा देश हिन्दुस्तान से सौ साल बाद माफी नहीं मांगता। और तो और भीख के प्रताप से मुल्क का बंटवारा भी टल जाता।

दरअसल कुछ गलती भारतीय समाज की भी है, जो मीडिया के ऐसे ब्लंडर्स पर चुप्पी साधे रहता है। टीवी चैनल और अखबार उपभोक्ता उत्पाद हैं। यदि भारत का उपभोक्ता फफूंद लगी ब्रेड बेचने के खिलाफ कोर्ट जा सकता है तो चैनलों, पोर्टलों और समाचार पत्रों के खिलाफ दूषित सामग्री परोसने पर न्यायालय की शरण लेने में देरी क्यों होनी चाहिए? इसके लिए एक जबरदस्त राष्ट्रीय उपभोक्ता आंदोलन की जरूरत है, जिस पर महान संपादक राजेंद्र माथुर जोर दिया करते थे। आज यह आंदोलन वक्त की मांग है। यदि चैनल और समाचारपत्र इस आंदोलन का सामना नहीं करना चाहते तो उन्हें कंटेंट के बारे में बेहद सतर्क और संवेदनशील होने की आवश्यकता है। मुद्रित और दृश्य माध्यमों के प्रतिनिधि संगठनों को भी इसकी जवाबदेही लेनी पड़ेगी।

चंद रोज पहले एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पदाधिकारियों का चुनाव हुआ है। सीमा मुस्तफा और उनकी टीम ने दूसरी पारी शुरू कर दी है। इस सर्वोच्च शिखर संस्था को समाचारपत्रों और टीवी चैनलों पर इस संबंध में कारगर कदम उठाने का दबाव डालना चाहिए। अनेक समाचार पत्रों और चैनलों के संपादक इस शीर्ष संस्था के सदस्य हैं और वे किसी आभूषण की तरह सजावट की वस्तु नहीं हैं। उन्हें एक्शन लेना ही होगा। यदि उन्होंने ध्यान नहीं दिया तो फिर दो चार पीढ़ियों के बाद इस नेक व्यवसाय की बची खुची छवि भी मिट्टी में मिल जाएगी मिस्टर मीडिया!  

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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सियासत में गलत फैसलों की भरपाई नहीं होती: राजेश बादल

सियासत की भी अपनी मनोवैज्ञानिक समझ होती है। यह कला प्रत्येक राजनेता को यूं ही हासिल नहीं होती। वर्षो की कठिन साधना के बाद ही यह हुनर प्राप्त होता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 09 November, 2021
Last Modified:
Tuesday, 09 November, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

सियासत की भी अपनी मनोवैज्ञानिक समझ होती है। यह कला प्रत्येक राजनेता को यूं ही हासिल नहीं होती। वर्षो की कठिन साधना के बाद ही यह हुनर प्राप्त होता है। लाखों में कोई एकाध बिरला ही होता है, जो वक्त की चाल समझ पाता है। चोटी पर बैठे लीडरों के लिए तो यह और भी कठिन है। ऐसे शिखर पुरुष अपने निर्णयों को हमेशा सही मानते रहते हैं। 

सियासत के सफर में उन्हें कई फैसले लेने पड़ते हैं। लेकिन उनमें से कोई एक कब हानिकारक हो जाता है, इसका पता ही नहीं चलता। इनमें कुछ तो उसके अपने हित साधने के लिए भी होते हैं। कभी-कभी उसका अहसास राजनेता को हो जाता है, पर उसके दंभ या अहं के कारण वे बने रहते हैं। कुछ निर्णयों से हो रही क्षति की भरपाई के लिए वह कुछ कदम उठाता है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। 

इस मामले में उसकी अपनी गलती तो होती ही है, सरकार में बैठे उसके सहयोगी और नौकरशाह भी सच से उसका संवाद नहीं कराते। वे सोचते हैं कि किसी फैसले में दोष निकालने से उनकी कुर्सी या करियर ही कहीं दांव पर न लग जाए। मौजूदा कालखंड इस मायने में रीढ़विहीन कहा जा सकता है।

हाल ही में पेट्रोल-डीजल के दामों में कटौती का निर्णय कुछ ऐसा ही है। यह फैसला लेने में सरकार से विलंब हुआ लेकिन जिस तरह से लगातार कीमतें बढ़ाई गईं, उनके पीछे कोई ठोस आधार नहीं था। अंतरराष्ट्रीय बाजार में जब कच्चे तेल के मूल्य गिर रहे थे, तब भी भारत में डीजल-पेट्रोल के मूल्य आसमान छू रहे थे। 

एक तरफ केंद्र सरकार दावा कर रही थी कि आर्थिक रफ्तार कुलांचे भर रही है, तो दूसरी ओर डायन महंगाई ने अवाम का जीना मुहाल कर दिया था। यदि देश संकट में होता, जंग हो रही होती, कोई दैवीय आपदा आई होती तो लगातार कीमतें बढ़ाने का वाजिब कारण समझ में आता। कोरोना के असाधारण आक्रमण काल को छोड़ दें तो लगातार मूल्यों में इजाफे की वजह समझ से परे है। 

विडंबना यह है कि डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़ने से रोजमर्रा की जिंदगी में उपभोक्ता वस्तुओं के दाम भी लोगों को रुलाते हैं। दूध, सब्जी, किराना, यातायात किराया, बिजली, पानी, स्वास्थ्य सेवाएं, आवास और औद्योगिक उत्पादन सब महंगा हो जाता है। इस हिसाब से व्यवस्था-नियंताओं से बड़ी चूक हुई। 

एक जमाने में प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने अन्न संकट के मद्देनजर हिन्दुस्तान से प्रार्थना की थी कि वह एक समय ही भोजन करें तो करोड़ों लोगों ने एक जून का खाना छोड़ दिया था। विकट हालात में जनता भी सरकार को सहयोग करती है।

कमोबेश ऐसा ही कुछ किसान आंदोलन के बारे में है। अफसोस यह है कि लीडरान अपनी राजनीतिक पारी में ढेरों अनुचित और अनैतिक निर्णय लेते हैं मगर किसी अहं या छिपे हित के चलते सही फैसले को ताक में रख देते हैं। किसानों का आंदोलन इसी जिद का शिकार हुआ है। 

सरकार समझने को तैयार नहीं है कि वह जिस डाल पर बैठी है, उसी को काटने पर उतारू है। वक्त गुजरने के बाद गलती दुरुस्त करने का लाभ नहीं मिलता। जनता सब समझती है पर बोलती नहीं। उसके बोलने का वक्त मुकर्रर है, उसी समय वह न्यायाधीश की भूमिका निभाती है।

आजादी के बाद इतिहास में ऐसे अनेक साक्ष्य मौजूद हैं। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया। उस दरम्यान महंगाई काबू में आ गई थी, भ्रष्टाचार पर लगाम लगी थी। सरकारी कार्यालयों में बिना घूस काम होने लगे थे। हम लोगों ने पत्रकारिता दायित्व निभाते हुए यह दौर देखा है। विनोबा भावे जैसे संत ने यदि उसे अनुशासन पर्व कहा तो उसके पीछे यही कारण थे। 

इसके बाद भी आपातकाल के निर्णय का नुकसान इंदिरा गांधी को उठाना पड़ा। उस समय उनके सलाहकार तथा नौकरशाह रिपोर्ट देते रहे कि वे चुनाव जीत रही हैं। हालांकि खुद इंदिरा गांधी को अंदेशा था कि उनसे बड़ी भूल हुई है इसलिए उन्होंने भरपाई के लिए आम जनता से माफी भी मांगी थी और कुछ निर्णयों को ठीक करने का प्रयास किया था लेकिन तब तक काफी समय निकल चुका था। 

उन्होंने 18 जनवरी 1977 को राष्ट्र के नाम संदेश में इशारा भी किया था। वे उस दिन सफाई देने की मुद्रा में थीं पर अवाम ने 1977 के चुनाव में उन्हें सत्ता छोड़ने का आदेश दिया और इंदिरा गांधी के सारे अच्छे काम भुला दिए। इस पराक्रमी नेत्री को पटखनी देते समय मुल्क को याद नहीं रहा कि उस महिला ने देश को अनाज संकट से उबार कर हरित क्रांति की थी। देश में श्वेत क्रांति की थी और दूध उत्पादन में रिकॉर्ड कायम किया था, हिन्दुस्तान को परमाणु शक्ति बनाया था और अंतरिक्ष में किसी भारतीय ने अपने कदम उनके कार्यकाल में ही रखे थे। 

यही नहीं, बांग्लादेश को आजाद कराकर भारत को एक सीमा से स्थायी खतरे से मुक्ति दिलाई थी और सिक्किम नामक देश को भारत में शामिल करके अपना राज्य बनाया था, जो चीन के लिए करारा तमाचा था।

पंजाब में आतंकवाद का करीब-करीब खात्मा उनके जमाने में ही हो गया था। वास्तव में भारत महाशक्ति के रूप में विश्व मंच पर अवतरित हुआ तो इंदिरा गांधी का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। मगर भारतीय मतदाता ने उन्हें उस अपराध के लिए दंडित किया, जिससे उसका अपना जीवन आसान बना था। 

एक खराब फैसला बहुत से अच्छे कार्यो पर पानी फेर देता है, इसे समझने के लिए इंदिरा गांधी से बेहतर कोई अन्य उदाहरण नहीं हो सकता। जिस तरह इंसान अपनी जिंदगी में कोई अवसर खोकर दोबारा नहीं पाता, उसी तरह सियासत में भी अवसर निकल जाने के बाद हितकारी और कल्याणकारी निर्णय कोई काम नहीं आते।

(साभार: लोकमत)

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मिस्टर मीडिया: यह कैसा मानसिक दिवालियापन हमारे इस पेशे में दाखिल हो गया है

आर्यन प्रसंग बीते दिनों मीडिया में छाया रहा। बॉलीवुड के एक सुपरस्टार का बेटा होने के कारण अखबारों, टीवी चैनलों और डिजिटल माध्यमों के तमाम रूपों में खबर तो बननी थी।

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 03 November, 2021
Last Modified:
Wednesday, 03 November, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।  

आर्यन प्रसंग बीते दिनों मीडिया में छाया रहा। बॉलीवुड के एक सुपरस्टार का बेटा होने के कारण अखबारों, टीवी चैनलों और डिजिटल माध्यमों के तमाम रूपों में खबर तो बननी थी। लेकिन जिस अंदाज में टेलिविजन के खबरिया चैनलों ने इसे तूल दिया, वह टीवी पत्रकारिता के इतिहास में कालिख भरा एक अध्याय और जोड़ गया। दर्शक अघा गए। करीब करीब डेढ़ सौ करोड़ की आबादी पर पहुंच रहे मुल्क के अपने सारे सरोकार इस एक घटना की बलि चढ़ गए। यह कैसा मानसिक दिवालियापन हमारे इस जिम्मेदार पेशे में दाखिल हो गया है? हम सारी दुनिया के लिए निजता और मानव अधिकारों की वकालत करते हैं मगर इस मामले में सारी हदें पार कर करके कौन सा तीर मार लिया?

कुछ वर्षों के दौरान पत्रकारिता की गिरती विश्वसनीयता और अधकचरे पेशेवर व्यवहार पर मैंने इस स्तंभ में कई बार चिंता प्रकट की है। हमने वह दौर भी देखा है, जब किसी अखबार और उसका संपादक इस बात से अवसाद में चले जाते थे कि प्रेस कौंसिल ने उनके समाचारपत्र की निंदा की है। वे भरसक यह प्रयास करते थे कि उनके पत्र में कोई गलत या पूर्वाग्रही खबर न छप जाए, जिससे इस सर्वोच्च संस्था को आलोचना करने का कोई अवसर मिले। आज स्थिति उलट है-भैंस के आगे बीन बजाओ, भैंस खड़ी पगुराय वाले अंदाज में पत्रकार बिरादरी काम कर रही है। कोई कितनी भी निंदा करे, हम नहीं सुधरेंगे।

जब कोई संस्थान अपने कामकाज पर सवाल उठाया जाना पसंद नहीं करता या आत्ममुग्ध शैली में व्यवहार करता है तो वह संस्थागत तानाशाही की श्रेणी में आता है। क्या भारतीय पत्रकारिता अब अपने ही समाज पर तानाशाही के घुड़सवारों को लेकर चढ़ाई करने पर उतारू है? यह स्थिति आने वाले दिनों के लिए खतरे की घंटी है। पत्रकारिता के लिए ही नहीं, देश और समाज के लिए भी। महान संपादक राजेंद्र माथुर कहा करते थे कि आदमी के यश का मर जाना उसके अपने मर जाने से कहीं अधिक दुखदायी है। कोई भी अपना मर जाना पसंद करेगा, लेकिन अपने यश का मर जाना पसंद नहीं करेगा। इस दृष्टिकोण से भारतीय मीडिया अपने यश को धीरे धीरे मरता देख रहा है।

इन हालातों में सर्वाधिक गंभीर चुनौती मीडिया के प्रशिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों के सामने है। वे कैसे प्रोफेशनल तैयार कर रहे हैं। उनके पाठ्यक्रमों और उनमे पढ़ाए जाने वाले मूल्यों तथा सरोकारों पर सवाल खड़ा हो रहा है। वे भारी भरकम फ़ीस लेकर पत्रकारों की फसल तैयार कर रहे हैं, लेकिन वह अधकचरी है। मीडिया अध्यापन और शिक्षण के साथ अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि इस क्षेत्र में काम कर रहे संस्थान डिग्री तो बांट रहे हैं, मगर उन्हें दक्ष पेशेवरों की जमात को जन्म देने की ललक नहीं है। यदि ऐसा हो गया है तो फिर मीडिया शिक्षण संस्थान उस दौर में अपनी मृत्यु को निमंत्रण दे रहे हैं, जब उनकी वास्तव में जरूरत है। इसके अलावा ख़बरिया चैनलों के संचालकों को अपने कंटेंट के बारे में बेहद गंभीर होना पड़ेगा। यदि उन्होंने ध्यान नहीं दिया तो किस दिन उनके दर्शक ग़ायब हो जाएंगे, पता ही नहीं चलेगा। नौजवान दर्शक पीढ़ी तो वैसे भी इन दिनों टीवी पत्रकारिता से तौबा कर चुकी है। वह अब मोबाइल पर जानकारियों की अपनी भूख सूचना के अन्य माध्यमों पर मिटा रही है मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

इस तरह किसी की यश हत्या से हमें बचना होगा मिस्टर मीडिया!

‘उधार का सिंदूर’ संसद टीवी की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाएगा मिस्टर मीडिया!

इतना पेशेवर दृष्टिकोण तो आज के संपादक भी नहीं रखते मिस्टर मीडिया!

सुप्रीम कोर्ट की चिंता संवैधानिक है मिस्टर मीडिया!

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इंदिरा गांधी की हत्या से एक सप्ताह पहले वह आखिरी मुलाकात: राजेश बादल

उन दिनों मैं इंदौर की नई दुनिया में सह संपादक था। उन्नीस सौ चौरासी का साल था। एक दिन संपादक जी ने बुलाया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 01 November, 2021
Last Modified:
Monday, 01 November, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

उन दिनों मैं इंदौर की नई दुनिया में सह संपादक था। उन्नीस सौ चौरासी का साल था। एक दिन संपादक जी ने बुलाया। बोले, तेईस अक्टूबर को इंदिरा गांधी की सभा भीकनगांव में है। आपको कवर करना है। पहले प्रधानमंत्री की कोई सभा कवरेज की है क्या? मैंने बताया कि बतौर प्रधानमंत्री 1977 में छतरपुर जिले में प्रधानमंत्री रहते हुए और 1979-80 में विपक्ष में रहते हुए कुल तीन बार उनकी रैली कवर की है और उनसे छोटे छोटे साक्षात्कार भी लिए हैं। मुझे वे पहचानती भी हैं। बताने की जरूरत नहीं कि मुझे भीकन गांव एक दिन पहले पहुंचने का निर्देश दे दिया गया। खरगोन जिले में ‘नईदुनिया’ के फोटोग्राफर को ही चित्र कवरेज के लिए कहा गया था। मुझे उसी दिन खबर और कैमरे की रील लेकर वापस पहुंचने का निर्देश था।

मैंने संपादक जी को बताया था कि 1977 में खजुराहो के विश्रामगृह में चार पांच मिनट का एक छोटा सा साक्षात्कार लिया था। उस दिन वे किसी पत्रकार को समय नहीं दे रही थीं। मैंने भी दो बार पर्ची भेजी थी। तीसरी बार मैंने अपने नाना जी के नाम का उल्लेख करते हुए पर्ची भेजी। नानाजी स्वतंत्रता सेनानी थे और बचपन में उन्होंने बताया था कि इंदिरा जी को अपनी गोद में खिलाया था। मैंने उन्हीं का नाम अपने नाम के नीचे लिख कर पर्ची को चाय ले जा रहे वेटर की ट्रे में रख दिया था। उन दिनों प्रधानमंत्री  की सुरक्षा आज की तरह नहीं होती थी। इंदिरा जी ने पर्ची पढ़ी और तुरंत अंदर बुला लिया। उस साक्षात्कार की बात फिर कभी। अभी तो उनकी हत्या के ठीक एक सप्ताह पहले किए मेरे कवरेज की बात।

इंदिरा जी सही वक्त पर पहुंची। हम लोग मंच के एकदम सामने बैठे थे। लकड़ी के लट्ठों का एक घेरा था। उससे सटा प्रेस बॉक्स था। याने वक्ता सामने बैठे लोगों के चेहरे देख सकता था। कांग्रेस नेता सुभाष यादव स्वागत भाषण दे रहे थे कि अचानक इंदिरा जी आयीं और उनसे माइक से एक तरफ जाने को कहा। सुभाष यादव अचकचा कर हट गए। हम  हैरत में थे। यह क्या हुआ। इंदिरा जी ने कहा, भाईयों और बहनों। मैं अभी दस मिनट में वापस आकर आपसे बात करूंगी और तब तक आप सुभाष जी की बात सुनिए और इंदिरा गांधी मंच से नीचे उतरने लगीं। मैंने तुरंत फोटोग्राफर को इशारा किया कि उनके उतरते हुए फोटो ले। मैं खुद भी चार छह कदम भागकर बल्लियों की रेलिंग के किनारे खड़ा हो गया। वे उतर कर आयीं। तिरछी नजर से मुझे देखा। ठिठकी और बोलीं अरे तुम यहां? मैंने कहा जी आपकी सभा कवर करने आया हूं। अब छतरपुर में नहीं हूं। इंदौर ‘नईदुनिया’ में हूं। उन्होंने कहा, आइए। मेरे साथ आइए और आगे बढ़ गईं। मैंने फोटोग्राफर को इशारा किया और हम बेरीकेट्स लांघ कर भागे। तब तक वे कार का दरवाजा खोलकर बैठ चुकी थीं। किसी को कुछ अंदाजा नही था। हम दौड़कर फोटोग्राफर की मोटरसाइकल तक पहुंचे और प्रधानमंत्री की सुरक्षा गाड़ी के पीछे चल पड़े। गाड़ी जिला अस्पताल जाकर रुक गई। मैंने सोचा, अस्पताल क्यों? क्या उनकी तबियत ठीक नही है। डॉक्टर तो सभास्थल पर ही था। इसी उधेड़बुन में हमने भी मोटरसाइकल पार्क की और भागे। तब तक वे उतर कर अस्पताल के पोर्च में जा पहुंची थीं और उनकी नजर हम पर पड़ गई थी। हमें वहां तैनात सुरक्षा कर्मियों ने रोक दिया। इंदिरा जी ने कहा, उन्हें आने दो। फिर तो हमें रोकने वाला कौन था। हम अंदर थे। उनके एक्सक्लूसिव फोटो मिल रहे थे। इंदिरा जी एक वार्ड में गयीं और वहां पलंग पर भर्ती आदिवासियों के सिर पर हाथ फेरते हुए उनकी तबियत का हाल पूछने लगीं।

तब तक हमें घटना की जानकारी मिल गई थी। असल में उनकी सभा के लिए कुछ आदिवासी ट्रैक्टर ट्राली में आ रहे थे। रास्ते में ट्राली पलट गई और कुछ आदिवासी घायल हो गए थे। शायद एक दो की मौत भी हो गई थी। इसकी सूचना मंच पर ही इंदिरा जी को दी गई थी और वे ताबड़तोड़ सभा छोड़कर अस्पताल के लिए निकल गई थीं। उन्होंने एक एक घायल से उनकी सेहत का हाल पूछा। डॉक्टरों से बात की और वापस सभा स्थल के लिए रवाना हो गई। हम भी पीछे पीछे आ गए। इस सभा में भी उन्होंने कहा था, ‘मेरे खून की एक एक बूंद देश के लिए है।’

जैसे ही वे सभा समाप्ति के बाद मंच से सीढ़ियां उतर कर बेरिकेट्स के गलियारे से जाने लगीं तो मैं भी लपककर बल्लियों के किनारे जा पहुंचा। मैंने तनिक चिल्लाकर कहा मैडम! एक मिनट। उन्होंने देखा। मुस्कराई और निकट आते हुए बोली- कुछ पूछना है? मैंने कहा- जी बस दो तीन सवाल हैं। उन दिनों देश में राष्ट्रपति प्रणाली पर बहस चल रही थी। एक सवाल उस पर था। दूसरा प्रश्न आतंकवाद पर और तीसरा विपक्ष के आन्दोलन पर था। उन्होंने संक्षिप्त उत्तर दिए। फिर बोलीं, ‘नईदुनिया’ अच्छा अखबार है। उसकी छपाई भी अच्छी है। मैंने उन्हें धन्यवाद दिया। यह उनके साथ मेरी अंतिम मुलाकात थी। इसके बाद मैं जीप से सीधे इंदौर भागा। भोपाल संस्करण में खबर लगवाई। इसकी प्रति आप यहां देख सकते हैं।

इसके बाद नगर संस्करण में मय फोटो के विस्तार से समाचार छपा। उन दिनों लगभग हर अखबार में अपना डार्क रूम होता था। हमारी फिल्म इंदौर के छायाकार शरद पंडित ने धोई और प्रिंट तैयार किए। नईदुनिया ने प्रकाशित समाचार के सभी संस्करणों की प्रति प्रधानमंत्री कार्यालय भेजी थी। उत्तर में इंदिरा जी का मेरे नाम धन्यवाद पत्र भी आया था। उन्हें कवरेज अच्छा लगा था।

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बिखराव बिंदु के करीब पहुंच रहा है पाकिस्तान, चीन से भी खो रहा है भरोसा: राजेश बादल

इमरान खान की छवि एक गैर जिम्मेदार, बार-बार यूटर्न लेने वाले और रंगीनमिजाज राजनेता की है। वे बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। अपने से अधिक काबिल लोगों को आगे नहीं आने देते।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 26 October, 2021
Last Modified:
Tuesday, 26 October, 2021
Imrankhan78781

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

इमरान खान के नारों से ऊब चुका है पाकिस्तान 

मौजूदा दौर में अवाम खोखले नारों पर भरोसा नहीं करती। वह सपनों के सौदागरों को सत्ता की चाबी सौंपने से बचना चाहती है। समूचा भारतीय उपमहाद्वीप कमोबेश इसी मानसिकता से गुजर रहा है। इस नजरिये से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान साख के गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं।

एक तरफ आंतरिक मोर्चे पर उनकी नाकामी ने नागरिकों को निराश किया है तो दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मुल्क की प्रतिष्ठा लगातार दरक रही है। उन्हें कुरसी पर बिठाने वाले फौजी हुक्मरान भी अब महसूस करने लगे हैं कि एक खिलंदड़ क्रिकेटर को प्रधानमंत्री बनाने का प्रयोग विफल रहा है। 

बीते दिनों आईएसआई प्रमुख को बदलने के बाद से सैनिक नेतृत्व के साथ इमरान खान की पटरी नहीं बैठ रही है। उनके लिए यह नाजुक वक्त है और ऐसे अवसर पर ही संयुक्त विपक्ष ने एक बार फिर उनके खिलाफ आंदोलन तेज कर दिया है। अब इमरान खान के सामने दो विकल्प ही बचते हैं- वे आईएसआई और सेना के हाथों की कठपुतली बने रहें या फिर पद छोड़कर नया जनादेश हासिल करने की तैयारी करें। 

दोनों विकल्प जोखिम भरे हैं। सेना का रबर स्टांप बने रहने से वे किसी तरह कार्यकाल तो पूरा कर लेंगे लेकिन उनका समूचा सियासी सफर एक अंधे कुएं में समा जाएगा। दूसरी ओर नए चुनाव कराने का रास्ता भी कांटों भरा है। उनके खाते में उपलब्धि के नाम पर एक विराट शून्य है, जिसके सहारे वे अपने दल को राजनीतिक वैतरणी पार नहीं करा सकते। यानी एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई की विकट स्थिति उनके सामने है।

दरअसल, पाकिस्तान जैसे फौज केंद्रित देश में कोई भी सरकार अपना लोकतांत्रिक धर्म नहीं निभा सकती। इस देश में सेना से रार ठानने का खामियाजा नवाज शरीफ और जुल्फिकार अली भुट्टो जैसे कद्दावर राजनेता भुगत चुके हैं। वे तभी तक अपनी गद्दी को सुरक्षित रख पाए, जब तक सेना के इशारों पर नाचते रहे। जैसे ही वे सेना के सामने चुनौती बनने लगे, सेना ने उनके नीचे से जाजम खींच ली। लेकिन भुट्टो और नवाज शरीफ तथा इमरान खान के बीच एक बुनियादी फर्क है। 

जुल्फिकार अली भुट्टो और नवाज शरीफ अपनी सीमाओं में रहते हुए भी आम आदमी के लिए भला करते थे और पाकिस्तान की कंगाली पर भी रोक लगा कर रखते थे। वे अवाम को सपने दिखाते थे तो उन्हें साकार करने के प्रयास भी जमीन पर साकार होते दिखाई देते थे। उनके कार्यकाल में पाकिस्तान ने अनेक उपलब्धियां भी हासिल की हैं। लेकिन इमरान खान की स्थिति इसके बिल्कुल उलट है। 

इमरान खान की छवि एक गैर जिम्मेदार, बार-बार यूटर्न लेने वाले और रंगीनमिजाज राजनेता की है। वे बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। अपने से अधिक काबिल लोगों को आगे नहीं आने देते। पाकिस्तान की तरक्की के वास्ते न उनके पास कोई आधुनिक पेशेवर कार्यक्रम है और न सोच। वे आत्ममुग्ध और किसी भी तरह सत्ता से चिपके रहने वाले शख्स हैं। 

इस कारण प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद वे चुनाव से पहले जनता से किया गया एक भी वादा पूरा नहीं कर सके। मुल्क में महंगाई चरम पर है। गरीबी और बेरोजगारी विकराल रूप में सामने है। सरकार का खजाना खाली है और इमरान खान भिक्षापात्र लिए कभी विश्व बैंक तो कभी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तो कभी चीन से गिड़गिड़ाते नजर आते हैं।

आंकड़ों में न भी जाएं तो सार यह है कि भारत के इस पड़ोसी का रोम-रोम कर्ज से बिंधा हुआ है और इमरान के सत्ता संभालने के बाद से स्थिति लगातार बिगड़ती गई है। औसतन पाकिस्तान के प्रत्येक नागरिक पर लगभग दो लाख रुपए का कर्ज है। चीन ने अपना निवेश कम कर दिया है। उसे आशंका है कि पाकिस्तान अमेरिकी शरण में जा रहा है। काफी हद तक इसमें सच्चाई है। 

अमेरिका की निकटता पाने के लिए पाकिस्तान छटपटा रहा है। इस चक्कर में वह चीन का भरोसा खो रहा है। रूस भी बहुत सहायता करने के मूड में नहीं है। सऊदी अरब नाराज है और तालिबान के मामले में आतंकवाद को शह देने की इमरान खान की घोषित नीति ने उन्हें विश्व में अलग-थलग कर दिया है। 

फैज हमीद की आईएसआई प्रमुख के पद पर नियुक्ति के बाद सेना से इमरान खान के मतभेद का कारण भी यही नीति रही है। अब तक तो परंपरा यही है कि सेना के साथ टकराव मोल लेने वाला अपनी कुर्सी की रक्षा नहीं कर सका है। इमरान खान जनरल बाजवा के सामने तीन बार समर्पण की मुद्रा में आ चुके हैं। देखना होगा कि फौज उन्हें कब तक अभयदान देती है।

अंत में एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि इमरान खान और सेनाध्यक्ष अपनी-अपनी सामाजिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि के चलते भी पाकिस्तान में आम अवाम के बीच बहुत भावनात्मक जुड़ाव महसूस नहीं करते। सेनाध्यक्ष बाजवा अहमदिया समुदाय के हैं। वे बहुसंख्यक आबादी में हाशिए पर रहने वाले समुदाय से आते हैं।

इसी तरह इमरान खान का खानदान नियाजी है और ढाका में पाकिस्तानी सेना ने जनरल नियाजी के नेतृत्व में ही भारत के सामने हथियार डाले थे। इस समर्पण के बाद नियाजियों को वहां हेय दृष्टि से देखा जाने लगा था। लाखों नियाजियों ने अपनी जाति लिखनी ही छोड़ दी थी। इस तरह दोनों शिखर पुरुष अपने-अपने हीनताबोध के साथ मुल्क में शासन कर रहे हैं। वे दोनों ही बहुमत का प्रतिनिधित्व
नहीं करते।

पाकिस्तान अपने अस्तित्व में आने के बाद पहली बार बिखराव बिंदु के करीब पहुंच रहा है। इमरान खान के रहते आशा की कोई किरण नहीं दिखाई देती। कोई चमत्कार ही पाक का उद्धार कर सकता है।

(साभार: लोकमत समाचार)

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'भारत की सकारात्मक छवि और उपलब्धियों को भी दिखाएं CNN, BBC जैसे विदेशी मीडिया संस्थान'

न्यूज मीडिया में सनसनीखेज समाचार ही सबसे ज्यादा देखे व पढ़े जाते हैं, खासकर आजकल के डिजिटल युग में, जहां पर ज्यादातर नकारात्मक टिप्पणियां यानी निगेटिव बातें ही हेडलाइंस बनती हैं

Last Modified:
Sunday, 24 October, 2021
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डॉ. अनुराग बत्रा।।

न्यूज मीडिया में सनसनीखेज समाचार ही सबसे ज्यादा देखे व पढ़े जाते हैं, खासकर आजकल के डिजिटल युग में, जहां पर ज्यादातर नकारात्मक टिप्पणियां यानी निगेटिव बातें ही हेडलाइंस बनती हैं और उन्हीं से पेज व्यूज बढ़ने के साथ ही रेवेन्यू में इजाफा होता है। न्यूज संस्थानों और संपादकों की बात करें तो चाहे वो डिजिटल हो या टेलिविजन, तमाम विषयों पर स्टोरी कर रहे हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में पूरे देश में और यहां के लोगों में नकारात्मकता पर ज्यादा रोशनी डाली जाती है। ऐसे में फिर इसका उपयोग केवल बदनाम करने के लिए किया जाता है और यहां तक कि आतंकित करने के लिए भी किया जाता है, हर कोई एक लाइन में खड़ा नजर आता है। एक ऐसी रेखा जिसे मीडिया ने खींचने का फैसला किया है। 

लेकिन इससे पहले की मैं अपने द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे तर्कों की गहराई में उतरूं, मैं बता देना चाहता हूं कि मैं एक वैश्विक यात्री और नागरिक हूं। मैं बिना किसी झिझक के कह सकता हूं कि मैं अमेरिका से प्रभावित हूं। मुझे हॉलीवुड से उतना ही प्यार है, जितना कि मुझे भारतीय सिनेमा से। मैं अमेरिका में आइवी लीग विश्वविद्यालयों में अपने दोनों बच्चों के स्टूडियो को देखना चाहता हूं और इसकी संस्कृति, व्यापार और शेयर बाजारों से प्रभावित हूं। इस देश में इनोवेशन की संस्कृति है जो समस्याओं को हल करती है और बड़ी कंपनियों का निर्माण करती है और एंटरप्रिन्योरशिप को चलाती है, जैसा और कहीं नहीं है। मेरा जन्मदिन भी उसी दिन (27 अगस्त) होता है, जिस दिन दो बार अमेरिका के राष्ट्रपति रह चुके लिंडन बेन्स जॉनसन (Lyndon B Johnson) का होता है। मैं अमेरिका और हर अमेरिकी के लिए अपने प्यार के बारे में बता सकता हूं। लेकिन मुझे अमेरिका की एक चीज सबसे ज्यादा अच्छी लगती है और वह है मीडिया... वह भी मेरे बिजनेस की वजह से।

मैं खासतौर पर सबसे ज्यादा ‘सीएनएन’ (CNN) को पसंद करता हूं और जिस तरीके का वह कंटेंट देता है, चाहे वह न्यूज हो या ब्रैंड वह काफी विकसित और बेहतर पैकेज में होता है, जिसे मैं काफी पसंद करता हूं। ‘सीएनएन इंटरनेशनल‘ मेरा पसंदीदा चैनल है और मैं उसे रोजाना दो से चार घंटे देखता हूं और रविवार को यह समय छह घंटे से भी ज्यादा हो सकता है। इसके दो ऐसे शो हैं-फरीद जकारिया का ‘GPS’ और ब्रायन स्टेल्टर का ‘Reliable Sources’, जिन्हें मैं कभी मिस नहीं करता। यहां कि यदि मैं व्यस्त भी होता हूं तो मैं ये सुनिश्चित करता हूं कि ये रिकॉर्ड हो जाएं और दिन में देर भी हो जाए तो मैं इन्हें देख लूं। मैं जिससे मिलता हूं चाहे निजी अथवा बिजनेस के सिलसिले में, उन तमाम लोगों से भी मैं इन शो को देखने के लिए कहता हूं और ऐसे लोगों की गिनती शायद हजारों में है। वैश्विक राजनीति और वैश्विक मीडिया में रुचि रखने वाले तमाम भारतीयों की तरह मैं खाड़ी युद्ध के बाद से सीएनएन से जुड़ा हुआ हूं।

रिज खान जैसे दिग्गज का मैं कई वर्षों से प्रशंसक हूं और करीब 12 साल पहले मैंने रिज खान को एक्सचेंज4मीडिया न्यूज ब्रॉडकास्ट कॉन्फ्रेंस ‘न्यूजनेक्स्ट’ (NewsNxt) में आमंत्रित किया था। इसके अलावा न्यूज को लेकर मैं एक और संस्थान ‘बीबीसी’ (BBC) को काफी पसंद करता हूं और उसका सम्मान करता हूं। मैं टिम सेबस्टियन के शो ‘Hard Talk’ को देखते हुए बड़ा हुआ हूं और इसके नए होस्ट को देखना अभी तक जारी है। मुझे ‘एक्सचेंज4मीडिया’ में मैथ्यू अमरोलीवाला की मेजबानी करने का सौभाग्य मिला है और वह मुलाकात काफी शानदार थी। निजी तौर पर मैं ‘बीबीसी इंडिया’ की तत्कालीन बिजनेस हेड सुनीता राजन की शादी में भी शामिल हुआ था। हालांकि, टिम सेबस्टियन के साथ एक घंटे की बातचीत काफी बेहतरीन थी। ‘सीएनएन’ के बाद मुझे ‘बीबीसी’ काफी पसंद है। मैं सीएनएन और बीबीसी को लेकर अपनी पसंद, उनके प्रति मेरे सम्मान और मुझ पर उनके प्रभाव के बारे में बहुत सारी बात कर सकता हूं। दोनों टॉप न्यूज और लाइव इवेंट्स के अलावा घरेलू बाजार को लेकर भी अपना नजरिया रखते हैं। मुझे यह भी लगता है कि इन दो प्रमुख प्लेटफार्म्स के बीच कई बार कंटेंट की समरूपता (convergence) होती है, हालांकि, शैली और इसे प्रस्तुत करने का तरीका अलग रहता है।

लेकिन मैं यह सब आपके साथ क्यों शेयर कर रहा हूं? मैं आपको यह बताने के लिए यह सब शेयर कर रहा हूं कि जब मैं अपने विचार प्रस्तुत करता हूं तो उसका बैकग्राउंड होता है कि मैं सीएनएन और बीबीसी के साथ जुड़ता हूं- टीवी पर और अब डिजिटल रूप से- और जो कुछ वे कहते हैं, उससे मैं भलीभांति परिचित हूं। हालांकि उनका अपना एजेंडा, विश्वास और शायद कभी-कभी पूर्वाग्रह भी होता है, इसके बावजूद मैं उनका सम्मान करता हूं। मुझे उनके एंकर्स की उच्च क्वालिटी को लेकर भी काफी विश्वास है। मीडिया इंडस्ट्री में होने के नाते और इसके साथ ही उनके साथ निजी तौर पर मिलकर बातचीत करने के नाते मैं ये सब जानता हूं। इनमें से बहुत से मीडिया प्रोफेशनल्स भी भारतीय हैं अथवा भारतीय मूल के हैं। मेरे तर्क के बारे में यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है।

इस साल की शुरुआत में भारत में कोविड-19 महामारी के दूसरे चरण के दौरान, सीएनएन, बीबीसी समेत तमाम वैश्विक मीडिया संस्थानों ने भारत पर अपना ध्यान केंद्रित किया और कई खबरें कीं। उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग की और दिल दहला देने वाली स्टोरीज दिखाईं। इनमें जलती चिताएं, अंतिम संस्कार के लिए रखीं लाशें और शोक संतप्त रिश्तेदारों को दिखाया गया। वे भारत सरकार, यहां के समाज और लोगों की लगातार आलोचना कर रहे थे। उन्हें ऐसी पार्टियों का साथ मिल गया, जो सरकार की आलोचक हैं या मैं कहूं कि भारत को विभाजित करने वाली हैं, विपक्ष में हैं अथवा देश के सामने आने वाली प्रतिकूलताओं अथवा परेशानियों को और बढ़ाने वाली हैं। किसी भी तरह से देश में सब कुछ इतना डरावना नहीं था। केंद्र और राज्य सरकारें और भी बहुत कुछ कर सकती थीं, एक समाज के रूप में हम और बेहतर हो सकते थे और एक नागरिक के रूप में हम और मदद कर सकते थे।

पिछले दिनों कैबिनेट में हुए फेरबदल में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को महामारी से खराब तरीके से निपटने और उनके मंत्रालय की इस मामले में ढिलाई के लिए उन्हें बाहर कर दिया गया था। प्रधानमंत्री ने इस पर संज्ञान लिया और कार्रवाई की। नए मंत्री की नियुक्ति और प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की निगरानी से वैक्सीनेशन की गति तेज हो गई है। स्वास्थ्य मंत्रालय और नए स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया, वैक्सीन और कोविड-19 के लिए गठित टास्क फोर्स के प्रमुख आरएस शर्मा, विभिन्न राज्य सरकारें, सिविल सोसायटीज, डॉक्टर, स्वास्थ्य कार्यकर्ता, गैर सरकारी संगठन, कॉर्पोरेट और सबसे महत्वपूर्ण कि देश के लोगों ने केंद्र सरकार के माध्यम से स्थिति को बेहतर ढंग से प्रबंधित करने में मदद की और टीकाकरण की एक अरब खुराक को लोगों तक पहुंचाने का अविश्वसनीय सा मुकाम हासिल कर लिया। भारत के नागरिकों ने अपनी सरकार पर भरोसा किया और मेरे हिसाब से पीएम मोदी की विश्वसनीयता के आलोक में बाहर जाकर टीका लगावाया। 700 मिलियन से अधिक भारतीयों को टीके की एक खुराक मिली है और 300 मिलियन से अधिक लोगों का पूरी तरह से टीकाकरण हो गया है। हम अभी भी हार नहीं मान रहे हैं। हम एक नया और ऊंचा मील का पत्थर चुनेंगे और इसे हासिल करेंगे। यहां तक कि अप्रैल से प्रशासन बूस्टर खुराक शुरू करने पर भी विचार कर रहा है। कोविन की सफलता प्रशासन के कार्यक्रम की प्रगति में एक अविश्वसनीय उत्प्रेरक रही है। वैश्विक स्तर पर यह एक बड़ी उपलब्धि है।

हम अमेरिका और यूरोप समेत अन्य देशों में वैक्सीन को लेकर हिचकिचाहट और अपेक्षाकृत कम आंकड़ों को देखें, तो पता चलेगा कि  ये वही देश हैं जो भारत को उपदेश दे रहे हैं। सीएनएन और बीबीसी के नेतृत्व वाले मीडिया प्लेटफॉर्म्स जिन्होंने भारत को नीचा दिखाया है, उन्हें अब निश्चित रूप से यह महसूस करना चाहिए कि वे भारत की इतनी खराब इमेज बनाने के लिए काफी कठोर थे, क्योंकि उन्होंने जानबूझकर देश की वैश्विक विश्वसनीयता को कम किया है। हम अपने टीकाकरण कार्यक्रम के कारण आर्थिक सुधार की राह पर हैं। 

पीएम मोदी ने अपने संबोधन में इसका जिक्र किया है। उन्होंने जो कुछ हो रहा है, उसकी व्यापक रूपरेखा को सामने रखा और अर्थव्यवस्था को विकास की पटरी पर और गति से वापस लाने की योजना भी बनाई है।

निष्पक्ष न्यूज प्लेटफॉर्म्स के रूप में ‘सीएनएन’ और ‘बीबीसी’ को संभवतः अब भारत में स्टेकहोल्डर्स और आम नागरिकों से बात करनी चाहिए कि वे कैसा महसूस करते हैं। मुझे पता है कि भारत कोविड की तीसरी लहर की आशंका को देखते हुए खुद को तैयार करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है, फिर चाहे वह अस्पताल के बेड हों, स्वास्थ्य सेवा का बुनियादी ढांचा हो, ऑक्सीजन की उपलब्धता या अन्य व्यवस्थाएं हों। मुझे उम्मीद है कि ‘सीएनएन’ और ‘बीबीसी’ अब अपने कार्यक्रमों में टीकाकरण को तैयारी और सफलता के लिए भारत के प्रयासों को प्रमुखता से सामने लाएंगे। मुझे उम्मीद है कि ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ और ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ भारत में बड़े पैमाने पर हुए वैक्सीनेशन और इसकी बड़ी सफलता की तस्वीरें वैश्विक पटल पर सामने रखेंगे। मुझे उम्मीद है कि विदेशी मीडिया वैक्सीनेशन समेत तमाम क्षेत्रों में भारत सरकार की सफलता को दिखाएगा। देश की सामाजिक संस्थाओं (civil society), गैर सरकारी संगठनों, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और यहां तक कि मीडिया संस्थानों ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मैं वैक्सीन की दोनों डोज ले चुका हूं और यह उतना ही आसान था, जितना कि पास की कॉफी शॉप में कॉफी लेना।

मैं पिछले 20 वर्षों के अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि विदेशी मीडिया भारत की नकारात्मक छवि को उभारता है और विशेष रूप से यहां की उपलब्धियों को कम दिखाता है। एनडीए सरकार के पिछले करीब साढ़े साल के कार्यकाल में इसमें और इजाफा हुआ है। देश विरोधी तत्वों का प्रतिनिधित्व करने वाले कई भारतीय पत्रकारों ने अपने निहित स्वार्थों के लिए मौजूदा सरकार और प्रधानमंत्री के खिलाफ प्रचार को और बढ़ाने का काम किया है। विदेशी मीडिया को इन विचारों को संतुलित तरीके से पेश करना चाहिए और भारत के विकास में सभी हितधारकों से बात करना चाहिए, चाहे वे राजनेता हों, नीति निर्माता हों, सरकारी अधिकारी, मीडिया और स्वतंत्र विश्लेषक हों। मेरा मानना है कि आलोचना के साथ-साथ भारत की सकारात्मकता को दिखाना भी उनका कर्तव्य है, जो यहां हो रही है। 
भारत आगे बढ़ रहा है और अगले तीन वर्षों में यह काफी तेज गति से आगे बढ़ेगा- और मैं वादा कर सकता हूं कि कोई भी पश्चिमी पत्रकार न तो समझ रहा है, न ही विश्लेषण कर रहा है और न ही उसमें इतना साहस है कि आंखें खोलकर देखे कि इस सरकार और पीएम के नेतृत्व में भारत ने कितनी प्रगति की है। यह भारत, यहां के नागरिकों, सरकार और पीएम को श्रेय देने का समय है। कृपया निष्पक्ष होने में संकोच न करें।

भारत में समावेशी मानवतावाद है। हम भारतीय हमेशा ही रचनात्मक, मेहनती, ईमानदारी व निस्वार्थ सेवा देने वाले रहे हैं। महामारी के दौरान पिछले 18 महीनों में हमने देशवासियों को अपने लोगों के समर्थन में दिल खोलकर पैसा खर्च करते व हर तरह से मदद करते देखा है। मैं विदेशी मीडिया में देखना चाहता हूं कि वह हमारी कमियों के साथ-साथ हमारे वैक्सीनेशन प्रोगाम की पूरी सफलता की कहानी को भी दिखाएं, संख्या दिखाएं, आंकड़े दिखाए और हमारी प्रगति को भी दिखाएं। ऐसा कुछ जो हर देश ने महामारी के दौरान अनुभव किया है और वह भी जिस पर अभी तक उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, जो हमारे हासिल किया है।

प्रधानमंत्री को आत्मनिर्भर अभियान के लिए धन्यवाद। दुनियाभर की परेशानियों को हल करने में अपना सहयोग देने के लिए हम भारतीय हमेशा ही मजबूती के साथ खड़े रहते हैं। एक भारतीय के तौर पर हम जानते हैं कि दुनिया में कहीं भी कुछ होता है, तो उसका प्रभाव वैश्विक स्तर पर पड़ता है। देश में इतने बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान को लेकर भारत में दुनिया के लिए एक रोल मॉडल बनने की क्षमता है। साथ ही हमारे कई नेताओं, सरकारों और सामाजिक संस्थाओं में भी टीकाकरण अभियान में तेजी लाकर और दुनिया की मदद कर प्रेरणास्रोत बनने की क्षमता है।

इसलिए मैं वैश्विक मीडिया से कहना चाहता हूं कि भगवान के लिए जागिए और आगे बढ़कर यहां की सकारात्मकता को दिखाइए (smell the coffee)। टीकाकरण में भारत की सफलता को दुनिया के सामने लाने का समय आ गया है। दुनिया को बचाने में भारत अग्रणी भूमिका निभा सकता है। भारत को आगे करना मतलब दुनिया को आगे बढ़ाना है। बेहतर उपलब्धि के लिए हम भारतीयों के साथ-साथ यहां की सरकार को भी कुछ श्रेय दीजिए।

आखिर में मैं यह कहना चाहता हूं कि जब मैंने यह सब लिखा तो मुझे यह देखकर निराशा हुई कि ‘सीएनएन’ ने अपनी एक स्टोरी में शीर्षक दिया है, जिसमें कहा गया है, ‘भारत ने एक बिलियन लोगों को कोविड वैक्सीनेशन दिया है, लेकिन अभी भी लाखों लोग ऐसे हैं, जिन्हें पहली डोज लगनी बाकी है।’ यहां कहना चाहूंगा कि यदि अनिच्छा से किसी की तारीफ करना हो तो ही ऐसे किया जा सकता है।

(लेखक ‘बिजनेसवर्ल्ड’ समूह के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ समूह के को-फाउंडर व एडिटर-इन-चीफ हैं।)

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ऐसे ही सामूहिक प्रयत्नों से हम इस लड़ाई में विजयी हो सकते हैं: प्रो. संजय द्विवेदी

हमारे शास्त्रों में कहा गया है, ‘त्याज्यम् न धैर्यम्, विधुरेऽपि काले’। अर्थात, कठिन से कठिन समय में भी हमें धैर्य नहीं खोना चाहिए।

Last Modified:
Friday, 22 October, 2021
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-प्रो. संजय द्विवेदी, महानिदेशक, भारतीय जन संचार संस्थान ।।

हमारे शास्त्रों में कहा गया है, ‘त्याज्यम् न धैर्यम्, विधुरेऽपि काले’। अर्थात, कठिन से कठिन समय में भी हमें धैर्य नहीं खोना चाहिए। किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए हम सही निर्णय लें, सही दिशा में प्रयास करें, तभी हम विजय हासिल कर सकते हैं। इसी मंत्र को सामने रखकर भारत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में कोरोना वैक्सीन के 100 करोड़ डोज का आंकड़ा पूरा कर इतिहास रच दिया है। 100 साल में आई सबसे बड़ी महामारी का मुकाबला करने के लिए अब पूरे देश के पास 100 करोड़ वैक्सीन डोज का मजबूत सुरक्षा कवच है। ये उपलब्धि भारत की है, भारत के प्रत्येक नागरिक की है।

पिछले वर्ष जब देश में कोरोना के कुछ ही मरीज सामने आए थे, उसी समय भारत में कोरोना वायरस के खिलाफ प्रभावी वैक्‍सीन्‍स के लिए काम शुरू कर दिया गया था। हमारे वैज्ञानिकों ने दिन-रात एक करके बहुत कम समय में देशवासियों के लिए वैक्‍सीन्‍स विकसित की हैं। आज दुनिया की सबसे सस्ती वैक्सीन भारत में है। भारत की कोल्ड चेन व्यवस्था के अनुकूल वैक्सीन हमारे पास है। इस प्रयास में हमारे प्राइवेट सेक्‍टर ने नवाचार और उद्यमिता की भावना का बेहतरीन प्रदर्शन किया है। वैक्सीन्स की मंजूरी और नियामक प्रक्रिया को फास्ट ट्रैक पर रखने के साथ ही, वैज्ञानिक मदद को भी बढ़ाया गया है। यह एक टीम वर्क था, जिसके कारण भारत, दो मेड इन इंडिया वैक्सीन्स के साथ दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान शुरू कर पाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीकाकरण के पहले चरण में ही गति के साथ इस बात पर जोर दिया कि ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों तक, जरूरतमंद लोगों तक वैक्सीन पहुंचे।

देश में 16 जनवरी से वैक्सीनेशन अभियान की शुरुआत हुई थी। शुरुआती 20 करोड़ वैक्सीन डोज देने में 131 दिन का समय लगा। अगले 20 करोड़ डोज 52 दिन में दिए गए। 40 से 60 करोड़ डोज देने में 39 दिन लगे। 60 करोड़ से 80 करोड़ डोज देने में सबसे कम, सिर्फ 24 दिन का समय लगा। इसके बाद 80 करोड़ से 100 करोड़ डोज देने में 31 दिन का वक्त लगा। अगर इसी रफ्तार से वैक्सीनेशन होता रहा, तो देश में 216 करोड़ वैक्सीन डोज लगने में करीब 175 दिन और लगेंगे। इसका मतलब है कि 5 अप्रैल, 2022 के आसपास ये आंकड़ा हम पार कर सकते हैं। हम भले ही 100 करोड़ डोज का आंकड़ा पार कर चुके हैं, लेकिन देश की 20 प्रतिशत आबादी ही अभी पूरी तरह वैक्सीनेट हुई है। 29 प्रतिशत आबादी को वैक्सीन की एक डोज दी जा चुकी है। ऐसे में मास्क फ्री होने के लिए हमें अभी इंतजार करना होगा। जब तक 85 प्रतिशत आबादी पूरी तरह वैक्सीनेट नहीं हो जाती, तब तक ऐसा करना खतरनाक हो सकता है। जिन देशों में मास्क से छूट दी गई है, वहां जनसंख्या घनत्व भारत की तुलना में काफी कम है। ऐसे में हमें अपनी जरुरतों के हिसाब से ही फैसला लेना चाहिए। एक रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी तक देश की 60 से 70 प्रतिशत आबादी पूरी तरह वैक्सीनेटेड हो जाएगी। इस वक्त तक भारत ‘हर्ड इम्यूनिटी’ को अचीव कर लेगा। इसके बाद लोगों को मास्क नहीं लगाने की पूरी तरह छूट मिल सकती है। यानी मास्क से पूरी तरह से आजादी के लिए हमें अभी कम से कम 6 से 8 महीने और इंतजार करना होगा।

सेवा परमो धर्म: के मंत्र पर चलते हुए हमारे डॉक्टर्स, हमारी नर्सेस, हमारे हैल्थ वर्कर्स, इतनी बड़ी आबादी की निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं। इन सभी प्रयासों के बीच, ये समय लापरवाह होने का नहीं है। ये समय ये मान लेने का नहीं है कि कोरोना चला गया या फिर अब कोरोना से कोई खतरा नहीं है। हाल के दिनों में हम सबने बहुत सी तस्वीरें, वीडियो देखे हैं, जिनमें साफ दिखता है कि कई लोगों ने अब सावधानी बरतना या तो बंद कर दिया है, या बहुत ढिलाई ले आए हैं। ये बिल्‍कुल ठीक नहीं है। अगर आप लापरवाही बरत रहे हैं, बिना मास्क के बाहर निकल रहे हैं, तो आप अपने आप को, अपने परिवार को, अपने बच्चों को, बुजुर्गों को उतने ही बड़े संकट में डाल रहे हैं। संत कबीरदास जी ने कहा है, ‘पकी खेती देखिके, गरब किया किसान। अजहूं झोला बहुत है, घर आवै तब जान’। अर्थात, कई बार हम पकी हुई फसल देखकर ही अति आत्मविश्वास से भर जाते हैं कि अब तो काम हो गया, लेकिन जब तक फसल घर न आ जाए तब तक काम पूरा नहीं मानना चाहिए। यानि जब तक सफलता पूरी न मिल जाए, लापरवाही नहीं करनी चाहिए।

कोविड-19 महामारी से सबसे बड़ा यह सबक मिलता है कि हमें मानवता और मानव हित के लिए पूरे विश्व के साथ मिलकर काम करना है और साथ-साथ ही आगे बढ़ना है। हमें एक-दूसरे से सीखना होगा और अपनी सर्वोत्तम प्रथाओं के बारे में एक-दूसरे का मार्गदर्शन भी करना होगा। इस महामारी की शुरुआत से ही भारत इस लड़ाई में अपने सभी अनुभवों, विशेषज्ञता और संसाधनों को वैश्विक समुदाय के साथ साझा करने के लिए प्रतिबद्ध रहा है और हमने तमाम बाधाओं के बावजूद इन अनुभवों को दुनिया के साथ ज्यादा से ज्यादा साझा करने की कोशिश भी की है। हम वैश्विक प्रथाओं से सीखने के लिए भी उत्सुक रहते हैं। भारत ने ‘कोविन प्लेटफॉर्म’ का निर्माण करके पूरी दुनिया को राह दिखाई है कि इतने बड़े पैमाने पर वैक्सीनेशन कैसे किया जाता है। पहाड़ हो या रेगिस्तान, जंगल हो या समंदर, 10 लोग हों या 10 लाख, हर क्षेत्र तक आज हम पूरी सुरक्षा के साथ वैक्सीन पहुंचा रहे हैं। इसके लिए देशभर में 1 लाख 30 हजार से ज्यादा टीकाकरण केंद्र स्थापित किए गए हैं।

इस महामारी ने दुनिया के हर देश, हर संस्था, हर समाज, हर परिवार, हर इंसान के सामर्थ्य को, उनकी सीमाओं को बार-बार परखा है। वहीं, इस महामारी ने विज्ञान, सरकार, समाज, संस्था और व्यक्ति के रूप में भी हमें अपनी क्षमताओं का विस्तार करने के लिए सतर्क किया है। पीपीई किट्स और टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर कोविड केयर और ट्रीटमेंट से जुड़े मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर का जो बड़ा नेटवर्क आज भारत में बना है, वो काम अब भी चल रहा है। देश के दूर-सुदूर इलाकों में अस्पतालों तक वेंटिलेटर्स, ऑक्सीजन कंसंट्रेटर्स पहुंचाने का भी तेज गति से प्रयास किया गया है। बीते डेढ़ साल में देश ने इतनी बड़ी महामारी से मुकाबला आपसी सहयोग और एकजुट प्रयासों से ही किया है। सभी राज्य सरकारों ने एक दूसरे से सीखने का प्रयास किया है, एक दूसरे के प्रयोगों को समझने का प्रयास किया है, एक दूसरे को सहयोग करने की कोशिश की है। ऐसे ही सामूहिक प्रयत्नों से हम इस लड़ाई में विजयी हो सकते हैं।

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इस तरह किसी की यश हत्या से हमें बचना होगा मिस्टर मीडिया!

तो सियासत की तरह पत्रकार बिरादरी भी बेशर्मी की हद पार करने लगी। यह सिलसिला कहां जाकर रुकेगा, कोई नहीं जानता।

राजेश बादल by
Published - Thursday, 21 October, 2021
Last Modified:
Thursday, 21 October, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

तो सियासत की तरह पत्रकार बिरादरी भी बेशर्मी की हद पार करने लगी। यह सिलसिला कहां जाकर रुकेगा, कोई नहीं जानता। पर यह तय है कि हम लोगों की जमात में अब ऐसे पेशेवर भी दाखिल हो चुके हैं, जिन्हें चौराहों पर अपने पीटे जाने का भी कोई भय नहीं रहा है। एक बार सार्वजनिक रूप से अस्मत लुट जाए, फिर क्या रह जाता है? जिंदगी में यश की पूंजी बार-बार नहीं कमाई जा सकती।

बीते सप्ताह समाचार कवरेज की तीन वारदातों ने झकझोर दिया। एक चैनल पर निहायत ही गैरपेशेवर अंदाज में एक उत्साही एंकर ने खुल्लमखुल्ला अश्लील और अमर्यादित शब्द का उपयोग शो के सीधे प्रसारण में किया। उसने आपत्तिजनक भाषा के बाद रुकने और माफी मांगने की जरूरत भी नहीं समझी। दूसरे चैनल पर एक वरिष्ठ एंकर को महात्मा गांधी के पूरे नाम का सही उच्चारण करने में एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ा और उस दौरान भी एक बार सही, नाम नहीं पढ़ पाने के लिए उसे दर्शकों से माफी मांगनी पड़ी।

तीसरी घटना पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के साथ बेहद अपमानजनक और शिष्टाचार के खिलाफ बर्ताव की है। एक मंत्री उन्हें देखने गया और अपने साथ एक फोटोग्राफर को ले गया। पूर्व प्रधानमंत्री खुद उस समय फोटोग्राफर को रोकने की स्थिति में नहीं थे। वे संभवतया दवा के असर के चलते नींद में थे। लेकिन उनके परिवारजनों ने उस फोटोग्राफर को कई बार रोका। इसके बावजूद वह फोटोग्राफर नहीं रुका और मर्यादा की सारी सीमाएं लांघते हुए तस्वीरें लेता रहा। मंत्री जी ने भी उसे रोकने की जरूरत नहीं समझी। बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती। वे तस्वीरें मीडिया में जारी कर दी गईं। बाद में परिवार के लोगों ने इस पर गंभीर एतराज किया। इसके बावजूद पत्रकारिता के किसी भी हिस्से से उस छायाकार की निंदा के स्वर नहीं सुनाई दिए।

तीनों श्रेणी की समाचार जानकारियां गंभीर अपराध से कम नहीं हैं। उन्हें कौन सजा देगा, इसका निर्धारण करने वाली एजेंसियां भी अभी तक चुप्पी साधे हुए हैं। इसके अलावा प्रेस काउंसिल तथा टीवी चैनल्स की संस्था ने भी इनका कोई संज्ञान नहीं लिया। इसका मतलब यह भी निकाला जाना चाहिए कि जिस तरह राजनीति का अपराधीकरण हमने मंजूर कर लिया है, उसी तरह की गुंडागर्दी पत्रकारिता का हिस्सा बनती जा रही है और किसी भी स्तर पर चिंता नहीं दिखाई दे रही है।

महान संपादक राजेंद्र माथुर पत्रकारिता में इस तरह की बढ़ती प्रवृति से प्रसन्न नहीं थे। वे मीडिया को किसी की यश हत्या करने की आदत को अच्छा नहीं मानते थे। वे कहा करते थे कि जीवन से ज्यादा चरित्र महत्वपूर्ण माना जाता है। जिंदगी क्या है। आदमी अपना मर जाना पसंद करेगा, लेकिन अपने यश का खत्म हो जाना कोई पसंद नहीं करेगा। यश का मर जाना, इंसान के अपने मर जाने से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है। किसी की यश हत्या आप इतनी आसानी से कैसे कर सकते हैं?

नौ फरवरी 1990 को उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था, ’मान लीजिए पत्रकार एक दस-बारह साल का बच्चा है। वह काला पेंट और ब्रश लेकर बगीचे में जाता है। वहां कुछ मूर्तियां भी हैं। वह शरारती बच्चा किसी मूर्ति के चेहरे पर कालिख पोत देता है। किसी पर मूंछ बना देता है। कोई मूर्ति काले रंग से अपने पर दाढ़ी लगी पाती है। किसी प्रतिमा को महिला से पुरुष बना देता है तो किसी को पुरुष से महिला बना देता है। इसके बाद उन मूर्तियों के पास लगातार कई दिन चाहने वाले और रिश्तेदार जुटते हैं। वे चौंकते हैं और मूर्तियों के जीवित संस्करणों से पूछते हैं कि अरे, यह कैसे हो गया? आप तो कभी मूंछ वाले नहीं थे। अखबार में तो मूंछ लगी है। दूसरे से कोई पूछता है कि आप तो पुरुष हैं। अखबार में तो महिला प्रकाशित हुआ है। वे बेचारे सफाई देते फिरते हैं कि यह तो पत्रकारों ने छाप दिया। ऐसे तो हम थे ही नहीं। कैसे पत्रकार हैं? कम से कम मुझसे पूछ तो लेते कि मेरे मूंछ हैं या नहीं। इसे आप गैर जिम्मेदार पत्रकारिता का नमूना मान सकते हैं।’ इस तरह किसी की यश हत्या से हमें बचना होगा मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

‘उधार का सिंदूर’ संसद टीवी की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाएगा मिस्टर मीडिया!

इतना पेशेवर दृष्टिकोण तो आज के संपादक भी नहीं रखते मिस्टर मीडिया!

सुप्रीम कोर्ट की चिंता संवैधानिक है मिस्टर मीडिया!

इस हकीकत को समझिए, फर्जी खबरों से मुकाबला करना आसान हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

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'कई देशों में ऐसे निर्भीक पत्रकार हैं, जो नोबेल पुरस्कार से भी बड़े सम्मान के पात्र हैं'

फिलीपींस की महिला पत्रकार मारिया रेसा और रूस के पत्रकार दिमित्री मोरातोव को नोबल पुरस्कार देने से नोबेल कमेटी की प्रतिष्ठा बढ़ गई है

Last Modified:
Monday, 18 October, 2021
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डॉ. वेद प्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

फिलीपींस की महिला पत्रकार मारिया रेसा और रूस के पत्रकार दिमित्री मोरातोव को नोबल पुरस्कार देने से नोबेल कमेटी की प्रतिष्ठा बढ़ गई है, क्योंकि आज की दुनिया अभिव्यक्ति के भयंकर संकट से गुजर रही है। इन दोनों पत्रकारों ने अपने-अपने देश में शासकीय दमन के बावजूद सत्य का खांडा निर्भीकतापूर्वक खड़काया है। जिन देशों को हम दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे पुराना लोकतंत्र कहते हैं, ऐसे देश भी अभिव्यक्ति की आजादी के हिसाब से एकदम फिसड्डी-से दिखाई पड़ते हैं। ‘विश्व प्रेस आजादी तालिका’ के 180 देशों में फिलीपींस का स्थान 138 वां है और भारत का 142 वां ! यदि पत्रकारिता किसी देश की इतनी फिसड्डी हो तो उसके लोकतंत्र का हाल क्या होगा ? लोकतंत्र के तीन खंभे बताए जाते हैं।

विधानपालिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका ! मेरी राय में एक चौथा खंभा भी है। इसका नाम है— खबरपालिका, जो सबकी खबर ले और सबको खबर दे। पहले तीन खंभों के मुकाबले यह खंभा सबसे ज्यादा मजबूत है। हर शासक की कोशिश होती है कि इस खंभे को खोखला कर दिया जाए। शेष तीनों खंभे तो अक्सर पहले से काबू में ही रहते हैं लेकिन पत्रकारिता ने अमेरिका और ब्रिटेन जैसे लोकतांत्रिक देशों में भी उनके राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के दम फुला रखे हैं। यही काम मारिया ने फिलीपींस में और मोरातोव ने रूस में कर दिखाया है। फिलीपींस के राष्ट्रपति रोड्रिग्गो दुतर्ते ने मादक-द्रव्यों के विरुद्ध ऐसा जानलेवा अभियान चलाया कि उसके कारण सैकड़ों निर्दोष लोग मारे गए और जेलों में ठूंस दिए गए। इस नृशंस अत्याचार के खिलाफ मारिया ने अपने डिजिटल मंच ‘रेपलर’ से राष्ट्रपति की हवा खिसका दी थी। राष्ट्रपति ने मारिया के विरुद्ध भद्दे शब्दों का इस्तेमाल किया और उनकी हत्या की भी धमकी दी थी लेकिन वे अपनी टेक पर डटी रहीं। इसी प्रकार मोरातोव ने अपने अखबार ‘नोवाया गज्येता’ के जरिए राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन के अत्याचारों की पोल खोलकर रख दी।

रूस में तो अखबारों पर कम्युनिस्ट पार्टी का कठोर शिकंजा कसे रखने की पुरानी परंपरा थी। अब से 50-55 साल पहले जब मैं माॅस्को में ‘प्रावदा’ और ‘इजवेस्तिया’ पढ़ता था तो इन रूसी भाषा के ऊबाऊ अखबारों को देखकर मुझे तरस आता था लेकिन अब कम्युनिस्ट शासन खत्म होने के बावजूद पत्रकारिता की आजादी के हिसाब से रूस का स्थान दुनिया में 150 वाँ है। ऐसी दमघोंटू दशा में भी मोरातोव ने ‘नोवाया गज्येता’ के जरिए पूतिन की गद्दी हिला रखी थी। सरकारी भ्रष्टाचार और चेचन्या में किए गए पाशविक अत्याचारों की खबरें मोरातोव और उनके साथियों ने उजागर कीं। उनके छह साथी पत्रकारों को इसीलिए मौत के घाट उतरना पड़ा। इसीलिए नोबेल पुरस्कार स्वीकार करते हुए उन्होंने इन छह साथी पत्रकारों को श्रद्धांजलि दी और कहा कि यह पुरस्कार उन्हीं को समर्पित है। भारत समेत दुनिया के कई देशों में ऐसे निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकार अभी भी कई हैं, जो नोबेल पुरस्कार से भी बड़े सम्मान के पात्र हैं। उक्त दो पत्रकारों का सम्मान ऐसे सभी पत्रकारों का हौसला जरुर बढ़ाएगा। मारिया और मोरातोव को बधाई!

(साभार: https://www.drvaidik.in/)

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