पुण्य प्रसून बाजपेयी: मौजूदा मीडिया बनाम आपातकाल के दौर की पत्रकारिता

‘चालीस साल पहले संघर्ष करते पत्रकार और मीडिया हाउस आपातकाल में भी दिखाई जरूर दे रहे थे...

Last Modified:
Saturday, 25 June, 2016
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‘चालीस साल पहले संघर्ष करते पत्रकार और मीडिया हाउस आपातकाल में भी दिखाई जरूर दे रहे थे, लेकिन चालीस साल बाद तो बिना आपातकाल सत्ता झुकने को कहती है तो हर कोई सरकारों के सामने लेटने को तैयार हो जाता है।’ अपने ब्लॉग (prasunbajpai.itzmyblog.com) के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

मौजूदा मीडिया बनाम आपातकाल के दौर की पत्रकारिता

क्या मौजूदा वक्त में मीडिया इतना बदल चुका है कि मीडिया पर नकेल कसने के लिए अब सरकारों को आपातकाल लगाने की भी जरूरत नहीं है। यह सवाल इसलिए क्योंकि चालीस साल पहले आपातकाल के वक्त मीडिया जिस तेवर से पत्रकारिता कर रहा था आज उसी तेवर से मीडिया एक बिजनेस मॉडल में बदल चुका है, जहां सरकार के साथ खड़े हुए बगैर मुनाफा बनाया नहीं जा सकता है। और कमाई ना होगी तो मीडिया हाउस अपनी मौत खुद ही मर जाएगा। यानी 1975 वाले दौर की जरुरत नहीं जब इमरजेन्सी लगने पर अखबार के दफ्तर में ब्लैक आउट कर दिया जाए या संपादकों को सूचना मंत्री सामने बैठाकर बताएं कि सरकार के खिलाफ कुछ लिखा तो अखबार बंद हो जाएगा। या फिर पीएम के कसीदे ही गढ़े। अब के हालात और चालीस बरस पहले हालात में कितना अंतर आ गया है।

यह समझने के लिए 40 बरस पहले जून 1975 में लौटना होगा। आपातकाल लगा तो 25 जून की आधी रात के वक्त लेकिन इसकी पहली आहट 12 जून को तभी सुनायी दे गई जब इलाहबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला सुनाया और समाचार एजेंसी पीटीआई ने पूरे फैसले को जस का तस जारी कर दिया। यानी शब्दों और सूचना में ऐसी कोई तब्दिली नहीं की जिससे इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला होने के बाद भी आम जनता खबर पढ़ने के बाद फैसले की व्याख्या सत्ता के अनुकूल करें। हुआ यही कि ऑल इंडिया रेडियो ने भी समाचार एजेंसी की कापी उठाई और पूरे देश को खबर सुना दी कि, श्रीमति गांधी को जन-प्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 [ 7 ] के तहत भ्रष्ट साधन अपनाने के लिए दोषी करार दिया गया । और प्रधानमंत्री को छह वर्षों के लिए मताधिकार से वंचित किया गया। और 600 किलोमीटर दूर बारत की राजधानी नई दिल्ली में इलाहबाद में दिए गए फैसले की खबर एक स्तब्धकारी आघात की तरह पहुंची। इस अविश्वसनीय खबर ने पूरे देश को ही जैसे मथ डाला। एक सफदरजंग मार्ग पर सुरक्षा प्रबंध कस दिए गए। ट्रकों में भरकर दिल्ली पुलिस के सिपाही पहुंचने लगे। दल के नेता और कानूनी विशेषज्ञ इंदिरा के पास पहुंचने लगे। घर के बाहर इंदिरा के समर्थन में संगठित प्रदर्शन शुरू हो गए। दिल्ली परिवहन की कुल 1400 बसों में से 380 को छोड़कर बाकी सभी बसों को भीड़ लाद लाद कर प्रदर्शन के लिए 1, सफदरजंग पहुंचाने पर लगा दिया गया। और यह सारी रिपोर्ट भी समाचार एजेंसी के जरिए जारी की जाने लगी। असल में मीडिया को ऐसे मौके पर कैसे काम करना चाहिए या सत्ता को कैसे काम लेना चाहिए यह सवाल संजय गांधी के जहन में पहली बार उठा और संजय गांधी ने सूचना प्रसारण मंत्री इन्द्र कुमार गुजराल को बुलाकर खूब डाटा कि प्रधानमंत्री के खिलाफ इलाहबाद हाईकोर्ट के फैसले को बताने के तरीके बदले भी तो जा सकते थे।

उस वक्त ऑल इंडिया रेडियो में काम करने वाले न्यूज एडिटर कपिल अग्निहोत्री के मुताबिक वह पहला मौका था जब सत्ता को लगा कि खबरें उसके खिलाफ नहीं जानी चाहिए और पहली बार समाचार एजेंसी पीटीआई-यूएनआई को चेताया गया कि बिना जानकारी इस तरह से खबरें जारी नहीं करनी है। चूंकि तब समाचार एजेंसी टिकी भी सरकारी खर्च पर ही थी तो संजय गांधी ने महसूस किया कि जब समाचार एजेंसी के कुल खर्च का 80 फीसदी रकम सरकारी खजाने से जाती है तो फिर सरकार के खिलाफ खबर को एजेंसियां क्यों जारी करती हैं। उस वक्त केन्द्र सरकार रेडियो की खबरों के लिए 20 से 22 लाख रुपए समाचार एजेंसी पीटीआई-यूएनआई को देती थी। बाकी समाचार पत्र जो एजेंसी की सेवा लेते वह तीन से पांच हजार से ज्यादा देते नहीं थे। यानी समाचार एजेंसी तब सरकार की बात ना मानती तो एजेंसी के सामने बंद होने का खतरा मंडराने लगता। यह अलग मसला है कि मौजूदा वक्त में सत्तानुकूल हवा खुद ब खुद ही एजेंसी बनाने लगती है क्योंकि एजेंसियों के भीतर इस बात को लेकर ज्यादा प्रतिस्पर्धा होती है कि कौन सरकार या सत्ता के ज्यादा करीब है।

लेकिन दिलचस्प यह है आपातकाल लगते ही सबसे पहले आपातकाल का मतलब होता क्या है इसे सबसे पहले किसी ने महसूस किया तो सरकारी रेडियो में काम करने वालों ने ही। और पहली बार आपातकाल लगने के बाद सुबह तो हुई लेकिन मीडिया के लिए 25 जून 1975 की रात के आखरी पहर में ही घना अंधेरा छा गया। असल में उसी रात जेपी यानी जयप्रकाश नारायण को गांधी पीस फाउंडेशन के दफ्तर से गिरफ्तार किया गया और जेपी ने अपनी गिरफ्तारी के वक्त मौजूद पत्रकारों से जो शब्द कहे उसे समाचार एजेंसी ने जारी तो कर दिया लेकिन चंद मिनटों में ही जेपी के कही शब्द वाली खबर किल..किल..किल कर जारी कर दी गई और समूचे आपाकताल के दौर यानी 18 महीनों तक जेपी के शब्दों को किसी ने छापने की हिम्मत नहीं की। और वह शब्द था , ‘विनाशकाले विपरीत बुद्धि’।

जेपी ने 25 की रात अपनी गिरफ्तारी के वक्त इंदिरा गांधी को लेकर इस मुहावरे का प्रयोग किया था कि जब विनाश आता है तो दिमाग भी उल्टी दिशा में चलने लगता है। कपिल अग्निहोत्री के मुताबिक वह रात उनके लिए वाकई खास थी, क्योंकि उनका घर रउफ एवेन्यू की सरकारी कॉलोनी में था जो गांधी पीस फाउंडेशन के ठीक पीछे की तरफ थी। तो रात का बुलेटिन कर जब वह घर पहुंचे और खाने के बाद पान खाने के लिए मोहन सिंह प्लेस निकले तब तक उनके मोहल्ले में सबकुछ शांत था। लेकिन जब वापस लौटे को बड़ी तादाद में पुलिस की मौजूदगी देखी। एक पुलिस वाले से पूछा, क्या हुआ है। तो उसने जबाब देने के बदले पूछा, तुम किधर जा रहे है। इसपर जब अपने घर जाने की बात कही तो पुलिस वाले ने कहा देश में इमरजेन्सी लग गई है। जेपी को उठाने आए हैं और कपिल अग्निहोत्री के मुताबिक उसके बाद तो नींद और नशा दोनों ही फाख्ता हो गए। स्कूटर वापस मोड़ रेडियो पहुंच गए। रात डेढ बजे न्यूज डायरेक्टर भट साहब को फोन किया तो उन्होंने पूछा इतनी रात क्या जरूरत हो गई। जब आपातकाल लगने और जेपी की गिरफ्तारी अपनी आंखों से देखने का जिक्र किया तो भट साहब भी सकते में आ गए।

खैर उसके बाद ऊपर से निर्देश आया कि सुबह आठ बजे के पहले बुलेटिन में आपातकाल की जानकारी और उस पर नेता, मंत्री , सीएम की प्रतिक्रिया ही जाएगी। इस बीच पीटीआई ने जेपी की गिरफ्तारी की खबर, विनाशकाले विपरित बुद्धि के साथ भेजी जिसे चंद सेकेंड में ही किल किया जा चुका था। तो अब समाचार एंजेसी पर नहीं बल्कि खुद ही सभी की प्रतिक्रिया लेनी थी तो रात से ही हर प्रतिक्रिया लेने के लिए फोन घनघनाने लगे। पहला फोन बूटा सिंह को किया गया। उन्हें जानकारी देकर उनकी प्रतिक्रिया पूछी तो जबाब मिला, तुस्सी खुद ही लिख दो, मैनू सुनाने दी जरुरत नहीं हैगी। मै मुकरुंगा नहीं। इसी तरह कमोवेश हर सीएम, नेता ने यही कहा कि आप खुद ही लिख दो। कपिल अग्निहोत्री के मुताबिक सिर्फ राजस्थान के सीएम सुखाडिया ने एक अलग बात बोली कि लिख तो आप ही दो लेकिन कड़क लिखना। अब कड़क का मतलब आपातकाल में क्या हो सकता है यह कोई ना समझ सका। लेकिन सभी नेता यह कहकर सो गए ।

और अगली सुबह जब बुलेटिन चला तो पहली बार समाचार एजेंसी के रिपोर्टर ऑल इंडिया रेडियो पहुंचे। सारे नेताओं की प्रतिक्रिया लिखकर ले गए। और उसी वक्त तय हो गया कि अब देश भर में फैले पीआईबी और ऑल इंडिया रेडियो ही खबरों का सेंसर करेंगे। यानी पीआईबी हर राज्य की राजधानी में खुद ब खुद खबरों को लेकर दिशा-निर्देश बताने वाला ग्राउंड जीरो बन गया। यानी मौजूदा वक्त में पीआईओ के साथ खड़े होकर जिस तरह पत्रकार खुद को सरकार के साथ खडे होने की प्रतिस्पर्धा करते है वैसे हालात 1975 में नहीं थे। यह जरूर था कि सरकारी विज्ञापनों के लिए डीएवीपी के दफ्तर के चक्कर जरूर अखबारो के संपादक लगाते, क्योंकि उस वक्त डीएवीपी का बजट सालाना दो करोड़ रुपए का था।

लेकिन अब के हालात में तो विज्ञापन के लिए सरकारों के सामने खबरों को लेकर संपादक नतमस्तक हो जाते हैं क्योंकि हर राज्य के पास हजारों करोड़ के विज्ञापन का बजट होता है। इसे एक वक्त हरियाणा के सीएम हुड्डा ने समझा तो बाद में राजस्थान में वसुधंरा से लेकर बिहार में नीतीश कुमार से लेकर दिल्ली में केजरीवाल तक इसे समझ चुके हैं। यानी अब खबरों को स्थायी पूंजी की छांव भी चाहिए। लेकिन अब की तुलना में चालीस बरस के कई हालात उल्टे भी थे। मसलन अभी संघ की सोच के करीबियों को रेडियो, दूरदर्शन से लेकर प्रसार भारती और सेंसर बोर्ड से लेकर एफटीआईआई तक में फिट किया जा रहा है तो चालीस साल पहले आपातकाल लगते ही सरकार के भीतर संघ के करीबियों और वामपंथियों की खोज कर उन्हें या तो निकाला जा रहा था या हाशिये पर ढकेला जा रहा था। वामपंथी धारा वाले आंनद स्वरूप वर्मा उसी वक्त रेडियो से निकाले गए।

हालांकि उस वक्त उनके साथ काम करने वालो ने आईबी के उन अधिकारियो को समझाया कि रेडियो में कोई भी विचारधारा का व्यक्ति हो उसके विचारधारा का कोई मतलब नहीं है क्योंकि खबरों के लिए पुल बनाये जाते हैं। यानी जो देश की खबरें जाएगी उसके लिए पूल वन, विदेशी खबरों के लिए पूल टू। और जिन खबरों को लेना है जब वह सेंसर होकर पूल में लिखी जा रही हैं और उससे हटकर कोई दूसरी खबर जा नहीं सकती तो फिर विचारधारा का क्या मतलब। और आनंद स्वरुप वर्मा तो वैसे भी उस वक्त खबरों का अनुवाद करते हैं। क्योंकि पूल में सारी खबरें अंग्रेजी में ही लिखी जातीं। तो अनुवादक किसी भी धारा का हो सवाल तो अच्छे अनुवादक का होता है। लेकिन तब अभी की तरह आईबी के अधिकारियों को भी अपनी सफलता दिखानी थी तो दिखाई गई। फिर हर बुलेटिन की शुरुआत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नाम से होनी चाहिए। यानी इंदिरा गांधी ने कहा है। और अगर किसी दिन कहीं भी कुछ नहीं कहा तो इंदिरा गांधी ने दोहराया है कि..., या फिर इंदिरा गांधी के बीस सूत्री कार्यक्रम में कहा गया है कि...। यानी  मौजूदा वक्त में जिस तरह नेताओं को सत्ताधारियों को कहने की जरुरत नहीं पड़ती और उनका नाम ही बिकता है तो खुद ब खुद ही अब तो नेताओं को खुश करने के लिए उनके नाम का डंका न्यूज चैनलों में बजने लगता है। वह चालीस बरस पहले आपाताकाल के दबाब में कहना पड़ रहा था। फिर बड़ा सच यह भी है कि मौजूदा वक्त में जैसे गुजरात के रिपोर्टरों या पीएम के करीबी पत्रकारों को अपने अपने सस्थानों में जगह मिल रही है चालीस साल पहले आपातकाल के वक्त जेपी के आंदोलन पर नजर रखने के लिए खासतौर से तब बिहार में चाक चौबंद व्यवस्था की गई।

चूंकि रेडियो बुलेटिन ही सबकुछ होता था तो पटना में होने वाले शाम साढ़े सात बजे के सबसे लोकप्रिय बुलेटिन के लिए शम्भूनाथ मिश्रा तो रांची से शाम छह बजकर बीस मिनट पर नया बुलेटिन शुरू करने के लिए मणिकांत वाजपेयी को दिल्ली से भेजा गया। फिर अभी जिस तरह संपादकों को अपने अनुकूल करने के लिए प्रधानमंत्री चाय या भोजन पर बुलाते हैं। यहां फिर दिल्चस्प यह भी है कि चालीस बरस पहले जिस आपातकाल के शिकार अरुण जेटली छात्र नेता के तौर पर हुए वह भी पिछले दिनों बतौर सूचना प्रसारण मंत्री जिस तरह संपादकों से लेकर रिपोर्टर तक को घर बुलाकर अपनी सरकार की सफलता के प्रचार-प्रसार का जिक्र करते रहे। और बैठक से निकलकर कोई संपादक बैठक की बात तो दूर बल्कि देश के मौजूदा हालात पर भी कलम चलाने की हिम्मत नहीं रख पाता है। जबकि आपातकाल लगने के 72 घंटे के भीतर इन्द्र कुमार गुजराल की जगह विद्याचरण शुक्ल सूचना प्रसारण बनते ही संपदकों को बुलाते हैं। और दोपहर दो बजे मंत्री महोदय पद संभालते है तो पीआईबी के प्रमुख सूचना अधिकारी डॉ. ए.आर.बाजी शाम चार दिल्ली के बड़े समाचार पत्र को संपादकों को बुलावा भेजते हैं।

मुलगांवकर {एक्सप्रेस} ,जार्ज वर्गीज {हिन्दुस्तान टाइम्स}, गिरिलाल जैन {स्टेट्समैन}, निहाल सिंह {स्टेटसमैन}  और विश्वनाथ {पेट्रियाट} पहुंचते हैं। बैठक शुरु होते ही मंत्री महोदय कहते है कि सरकार संपादकों के कामकाज के काम से खुश नहीं है। उन्हें अपने तरीके बदलने होंगे। इस पर एक संपादक जैसे ही बोलते हैं कि ऐसी तानाशाही को स्वीकार करना उनके लिए असम्भव है। तो ठीक है कहकर मंत्री जी भी उत्तर देते है कि, ‘हम देखेंगे कि आपके अखबार से कैसा बर्ताव किया जाए’। तो गिरिलाल जैन बहस करने के लिए कहते हैं कि ऐसे प्रतिबंध तो अंग्रेजी शासन में भी नहीं लगाए गए थे। शुक्ल उन्हें बीच में ही काट कर कहते है, ‘यह अंग्रेजी शासन नहीं है। यह राष्ट्रीय आपात स्थिति है।’ इसके बाद संवाद भंग हो जाता है और उसके बाद अदिकत्र नतमस्तक हुए। करीब सौ समाचारपत्र को सरकारी विज्ञापन बंद कर झुकाया गया। लेकिन तब भी स्टेट्समैन के सी.आर. ईरानी और एक्सप्रेस के रामनाथ गोयनका ने झुकने से इनकार कर दिया, तो सरकार ने इनके खिलाफ फरेबी चाले चलने शुरू की। लेकिन पीएमओ के अधिकारी ही सेंसर बोर्ड में तब्दील हो गए। प्रेस परिषद भंग कर दी गई। आपत्तिजनक सामग्री के प्रकाशन पर रोक का घृणित अध्यादेश 1975 लागू कर दिया गया। यह अलग बात है कि बावजूद चालीस साल पहले संघर्ष करते पत्रकार और मीडिया हाउस आपातकाल में भी दिखाई जरूर दे रहे थे, लेकिन चालीस साल बाद तो बिना आपातकाल सत्ता झुकने को कहती है तो हर कोई सरकारों के सामने लेटने को तैयार हो जाता है।

(साभार: prasunbajpai.itzmyblog.com)

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मिस्टर मीडिया: आर्थिक मंदी के दौर में मीडिया कवरेज के लिए निकला है यह अनोखा ‘फॉर्मूला’

इसमें न किसी बदनामी का खतरा है और न इसे आप पीत पत्रकारिता कह सकते हैं। ऐसी स्थिति में पुरानी पीढ़ी के अनेक पत्रकारों में नई चिंता देखी गई है

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Friday, 15 November, 2019
Last Modified:
Friday, 15 November, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

इन दिनों मीडिया संस्थानों और मीडिया घरानों की ओर से इवेंट्स कराना आम होता जा रहा है। इसके संस्थान को दो लाभ हैं। वह खबर का उत्पादन करता है और धन भी कमाता है। आर्थिक मंदी के इस दौर में यह एक अनोखा फॉर्मूला निकला है। खबर की फसल पैदा करने का फायदा यह है कि वह उस संस्थान की अपनी संपत्ति होती है इसलिए एक्सक्लूसिव की मोहर लग जाती है। मीडिया समूह इवेंट के कंटेंट को कई दिन तक थोड़ा-बहुत फेरबदल करके पाठकों और दर्शकों तक पहुंचाता रहता है। नए-नए मुद्दे पक्ष और प्रतिपक्ष के राजनेताओं से सवालों के आधार पर उगते रहते हैं। चैनल समझते हैं कि इससे टीआरपी बढ़ती है।

इसके अलावा इवेंट को प्रायोजित करने वाले घरानों को धन देने के बदले में सामाजिक और राजनीतिक पहचान भी मिलती है। इसमें न किसी बदनामी का खतरा है और न इसे आप पीत पत्रकारिता कह सकते हैं। ऐसी स्थिति में पुरानी पीढ़ी के अनेक पत्रकारों में नई चिंता देखी गई है। बीते दिनों लगातार हो रहे मीडिया सेमिनारों में यह बात गंभीरता से उभरकर आई कि विज्ञापन के आवरण में समाचार का उत्पादन कितना जायज है?

मीडिया संस्थान जब ऐसा करते हैं तो वह एक तरह से विज्ञापन जैसी ही कोई श्रेणी होती है। विज्ञापन में अखबार/टेलिविजन चैनल/डिजिटल मीडिया संस्थानों का विज्ञापन के कंटेंट पर सीधा नियंत्रण नहीं होता, लेकिन उसका अपने इवेंट के कंटेंट पर पूरा नियंत्रण होता है। यानी इवेंट भी, विज्ञापन भी, विज्ञापन का कंटेंट भी और उसके बाद उससे निकली खबर पर भी सौ फीसदी एक्सक्लूसिव कंट्रोल। मीडिया संस्थान हेडलाइन भी बनाते हैं और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों के समकक्ष अपने विज्ञापननुमा इवेंट से उपजी खबरें बिठाते हैं। सवाल यह है क्या यह अपने बैनर या ब्रैंड का अनुचित इस्तेमाल है?

यह भी एक पहलू है कि अगर यह सिलसिला जिला और तहसील स्तर तक फैल गया तो हर छोटा और मंझोला मीडिया संस्थान धन कमाने के लिए अपने-अपने आयोजन करेगा और अपनी अपनी सुर्खियां रचेगा तो देश की मिट्टी से निकलने वाली वास्तविक खबरें कहां जाएंगी और गढ़ी तथा पकाई गई खबरें क्या पाठकों तथा दर्शकों के साथ अन्याय नहीं होंगी? मेरे जेहन में यह प्रश्न भी है।

एक सेमिनार में सुझाव आया कि मीडिया संस्थान को अपने इवेंट या कॉन्क्लेव दिखाते समय या अखबार के पन्नों पर परोसते समय उसे एडवर्टोरियल या इंपेक्ट फीचर लिखना चाहिए। इससे कोई नैतिक सवाल नहीं पनपेगा और अपने-अपने खबर लोक रचने का अवसर भी नहीं मिलेगा।

मैं स्वीकार करता हूं कि आजकल मीडिया संस्थान अत्यंत आर्थिक दबाव में हैं। अब उनके लिए विज्ञापन का बाजार पहले की तरह नहीं खुला है, लेकिन एक इवेंट से चार महीने चैनल या अखबार का खर्च निकालना और उसकी खबर खपाना कितना ठीक है। इवेंट के सह आयोजक ढूंढ़ना, उनसे धन लेना फिर उन्हीं के आला अफसरों या मैनेजमेंट से जुड़े व्यक्तियों को सम्मान या अवार्ड देना और उनके समाचार दिखाना या प्रकाशित करना क्या दूध में पानी मिला देने की तरह नहीं  है।

प्रादेशिक अखबारों में भी इस तरह की प्रवृति शुरू हो गई है। बीते दिनों  ग्वालियर में विकास संवाद और आईटीएम विश्वविद्यालय में एक विशेषज्ञ ने इंदौर का उदाहरण दिया कि किसी कार्यक्रम के लिए यदि आयोजक एक ही अखबार में विज्ञापन देता है तो अन्य सारे समाचारपत्र उस कार्यक्रम की खबर का बहिष्कार कर देते हैं। शहर को पता ही नहीं चलता कि ऐसा कोई आयोजन भी शहर में हुआ है। यह कौन सी पत्रकारिता है मिस्टर मीडिया?

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: अगर इस तरह की खबरें सच हैं तो यह शुभ संकेत नहीं है

मिस्टर मीडिया: किसी पत्रकार को कवरेज का ऐसा दिन देखने का मौका न मिले तो अच्छा

मिस्टर मीडिया: यह विचार की जालसाजी अथवा धोखाधड़ी नहीं तो और क्या है?

मिस्टर मीडिया: राजदीप के विडियो और अजीत अंजुम के खुलासे के मायने भी समझिए

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‘बाहर पड़ी यह लाश वशिष्ठ बाबू की नहीं, सिस्टम की लाश है’

यकीन मानिए कि समाज में बहुत सारे आदर्श दोबारा जन्म लेंगे, लेकिन वशिष्ठ बाबू जैसा शख्स सदियों में कभी कभार ही धरती पर आता है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Thursday, 14 November, 2019
Last Modified:
Thursday, 14 November, 2019
Anuranjan Jha

अनुरंजन झा, वरिष्ठ पत्रकार।।

सुबह-सुबह सूचना मिली कि वशिष्ठ बाबू नहीं रहे। जो नहीं जानते, उनके लिए एक गणितज्ञ। जो जानते हैं, उनके लिए दूसरे रामानुजन और हमारे लिए ‘बिहार विभूति’ सर। यह भी गजब इत्तेफाक है कि कल ही यह सूचना आई कि उनके जीवन पर फिल्म बनाने के लिए जिन दो निर्माताओं के बीच कॉपीराइट को लेकर कानूनी विवाद फंसा हुआ था, उसे एक्सेल इंटरटेनमेंट ने जीत लिया है। रात ही हमने इनके मुद्दे पर कई लोगों से काफी बात की और थोड़ा सुकून था कि चलो इस विवाद के बाद अब सिनेमा पर काम शुरू होगा तो वशिष्ठ बाबू को दुनिया और ठीक से जान पाएगी।

दुनिया जान पाएगी कि चाणक्य की धरती बिहार में हाल के दिनों तक विश्व को गुरुमंत्र देने वाले लोग पैदा होते रहे हैँ। सोशल मीडिया का सूचना के मामले में जबरदस्त लाभ हुआ है। खबर सोशल मीडिया पर अगले एक घंटे में तैरने लगी। अपनी-अपनी सूचना और जानकारी के हिसाब से लोग उनको श्रद्धांजलि भी देने लगे। हम जितनी बार वशिष्ठ बाबू से मिले,  निश्चित तौर पर उनको कुछ भी याद नहीं रहा होगा, क्योंकि जबसे हमने होश संभाला है, तब से वो सिजोफ्रेनिया के शिकार हैँ, लेकिन हर मुलाकात हमें उत्साह और उर्जा से भर देती थी। निश्चित तौर पर हमारे लिए उनका जाना एक व्यक्तिगत क्षति है।

डिजिटल माध्यम पर उनके निधन की तैरती खबरों के बीच एक ऐसी खबर पर हमारी नजर पड़ी, जिसने हमें कुछ देर के लिए सुन्न कर दिया। उतने मर्माहत तो हम यह खबर सुनकर भी नहीं हुए कि वो नहीं रहे। एक रिपोर्ट देखी, जिसमें साफ-साफ दिखा कि पटना में निधन के बाद उनकी लाश अस्पताल से बाहर तकरीबन फेंक दी गई। उसे घर ले जाने के लिए एक अदद एंबुलेंस की व्यवस्था भी प्रशासन नहीं कर पाया।

आनन-फानन में सरकार ने सरकारी सम्मान से अंतिम संस्कार की घोषणा तो कर दी, लेकिन जिस तरीके का व्यवहार अस्पताल प्रशासन ने किया, वो वाकई शर्मसार करने वाला है। अस्पताल में अंतिम दिनों में कुछ राजनेता मिलने भी गए, क्योंकि उनको अपना फोटो कराना था। नहीं तो उनके जीवन से इन राजनेताओं का कोई लेना-देना नहीं रहा। क्यूंकि अगर रहा होता तो न तो वशिष्ठ बाबू की यह हालत होती और न ही वो गुमनामी की जिंदगी जीते हुए मरते।

जिस तरीके से वशिष्ठ बाबू की लाश बाहर रखी थी और समाज और राजनीति का कोई व्यक्ति नहीं पहुंचा था, उसे देखकर यही लगा कि यह लाश वशिष्ठ बाबू की नहीं, हमारे गौरव की लाश है। जिस शख्स ने 19 साल की उम्र में कैलिफोर्निया से पीएचडी करके एक वक्त में सबसे कम उम्र में यह डिग्री पाने का गौरव हासिल किया हो, यह उस गौरव की लाश है। जिस शख्स ने आइंस्टाइन जैसे वैज्ञानिक के सिद्धांतों तो चुनौती दी हो, यह उस चुनौती की लाश है। जो बीमार होने के बाद भी 40 से ज्यादा सालों तक हर दीवार पर गणित के फार्मूले लिखता रहा हो, यह उस फार्मूले की लाश है। जिसने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करने की शर्त पर नासा को ठुकरा कर देश के IIT में पढ़ाना पसंद किया हो, यह उस आत्मसम्मान की लाश है।

फिल्मकार नितिन चंद्रा ने ठीक ही तो कहा कि यह ये वशिष्ठ नारायण की लाश नहीं है, ये बिहारियों की बिहार के प्रति संवेदनशीलता की लाश है। यकीन मानिए समाज में बहुत सारे आदर्श दोबारा जन्म लेंगे, लेकिन वशिष्ठ बाबू जैसा शख्स सदियों में कभी कभार ही धरती पर आता है।

चूंकि मैं आशावादी हूं, इसलिए फिर कहता हूं कि अब भी समय है, चेत जाइए, सिस्टम बदलने का प्रयास कीजिए। अब भी अपने को बचाने की कोशिश कीजिए, धरोहरों का सम्मान कीजिए। भविष्य तभी ठीक होगा,  नहीं तो कभी दाना मांझी अपनों की लाश कंधों पर ढोकर घर ले जाएगा और कभी ये सिस्टम वशिष्ठ बाबू की लाश को झटके में सड़क पर पटक देगा।  वशिष्ठ बाबू को भावभीनी श्रद्धांजलि।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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‘जब टीएन शेषन को सुनने के लिए लोग हो गए थे बेकाबू’

सर्वश्रेष्ठ शहरी रिपोर्टिंग का पुरस्कार मुझे मिला था, इसके बावजूद मुझे और मेरे परिवार को एंट्री में जद्दोजहद करनी पड़ी

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Monday, 11 November, 2019
Last Modified:
Monday, 11 November, 2019
TN Seshan and Amitabh Shrivasta

टीएन शेषन नहीं रहे, जिन्होंने चुनाव आयोग के महत्व और अधिकारों को धरातल पर उतारा। ये स्मृति है तब की है, जब वे भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त थे। मौका था भोपाल के रवीन्द्र भवन में ‘भास्कर ग्रुप’ के द्वारका प्रसाद अग्रवाल स्मृति पुरस्कार का। सर्वश्रेष्ठ शहरी रिपोर्टिंग का पुरस्कार मुझे मिला था, इसके बावजूद मुझे और मेरे परिवार को एंट्री में जद्दोजहद करनी पड़ी, ये क्रेज था टीएन शेषन का।

रवीन्द्र भवन खचाखच भरा था, मध्यप्रदेश का मंत्रिमंडल, राजनीतिक हस्तियां, संपादक और तमाम जाने-माने लोग सिर्फ शेषन को देखने-सुनने आए थे। पास से एंट्री होने के बाद भी पास वाले बाहर खड़े थे। शेषन के आने के पहले ही हॉल भर चुका था। जब मैं पहुंचा तो सुरक्षाकर्मियों ने भीतर जाने से मना कर दिया। उनका कहना था कि आप अकेले जाएंगे, जबकि ‘भास्कर समूह’ की ओर से अपने परिवार सहित मुख्य पुरस्कार के लिए आमंत्रित था।

गेट पर मौजूद सुधीर अग्रवाल जी तक बात पहुंची और फिर वे आगे आकर हम सभी को भीतर ले गए। इस समारोह में देश के जाने-माने पत्रकार सूर्यकांत बाली को विचार लेखन के लिए पुरस्कार मिलना था। मुझे जो जानकारी मिली, उसके मुताबिक उन्होंने किसी राजनेता से सम्मानित होने से मना कर दिया था और इसलिए शेषन जी से ‘भास्कर ग्रुप’ ने संपर्क साधा।

ये ‘भास्कर ग्रुप’ का प्रभाव था कि वे इस प्रोग्राम में आने को तैयार हो गए और ये प्रोगाम सुपरहिट हो गया। रवीन्द्र भवन के बाहर जितनी लंबी कतार थी, वैसी मैंने इस तरह के प्रोग्राम में कभी नहीं देखी। हॉल के बाहर बड़े पर्दे पर लोग शेषन को देख-सुन सकते थे, लेकिन भीड़ उन तक पहुंचने को बेकाबू थी।

वही हुआ, जिसकी आशंका थी। हॉल के कांच तक टूट गए, लेकिन जल्द ही सब कुछ कंट्रोल हो गया। शेषन उसके पहले या बाद में शायद ही किसी कार्यक्रम में मुख्य चुनाव आयुक्त रहते हुए नजर आए होंगे। ये पहला द्वारिका प्रसाद अग्रवाल स्मृति पुरस्कार था और पता नहीं क्यों आखिरी भी। ‘भास्कर ग्रुप’ ने कई दिनों तक अखबार में जोर-शोर से इसका प्रचार किया था। देश के जाने-माने लोगों ने पुरस्कारों का चयन किया। जिन्हें पुरस्कार मिलना था, उनकी और अतिथियों की तस्वीरें कई दिनों तक प्रकाशित कीं। ‘रसरंग’ में इंटरव्यू भी छापे। तो ये था शेषन का जलवा। नमन।

(वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ श्रीवास्तव की फेसबुक वॉल से साभार)

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बिना मुस्कुराए न रह पाएंगे जब पढ़ेंगे- रामलला हम आएंगे TRP कमा के जाएंगे

दही ही दिखाओ और दही ही परोसो, रायता मत बनाओ। लेकिन ‘द शो मस्ट गो ऑन’ को ध्येय मानने वाले अब छन्नी से अयोध्या छान रहे हैं

प्रमिला दीक्षित by प्रमिला दीक्षित
Published - Monday, 11 November, 2019
Last Modified:
Monday, 11 November, 2019
Pramila Dixit

प्रमिला दीक्षित, वरिष्ठ पत्रकार।।

सबसे पहले तो मैं ये स्पष्ट कर दूं कि मुद्दा आस्था का है और संवेदनशील जरूर,लेकिन जब आप इस विश्लेषण को पढ़ें तो रोहित शेट्टी की मूवी जितना दिमाग लगाएं, सत्यजीत रे न बनें। ओ रामजी बड़ी टीआरपी  दीना...आस्था के जिस मुद्दे पर चैनलों को आज तक बड़ी टीआरपी मिलती आयी थी, शनिवार उसके चरम का दिन था। चैनल नहा धोकर तैयार थे, पहले दिक्कत ये रही कि अचानक तारीख आई और चैनलों के बड़े चेहरे जो दिल्ली में या बाहर थे, सब आपाधापी में अयोध्या दौड़ाए गए।

जैसे शैतान बच्चे को मम्मी-पापा बताते हैं कि शैतानी नहीं करनी है। फिर वो घर में आने वाले हर शख्स को जैसे बताता है कि वो कितना अच्छा  बच्चा है, शैतानी नहीं करता है, शैतानी नहीं करनी चाहिए। चैनल सुबह से ही शांति बनाए रखने और सौहार्द कायम रखने की अपील करते रहे। लेकिन शांति बनाए रखने की अपील आप सबसे तो कर सकते हैं, अरनब से अलग से करनी चाहिए थी। आवाज की बुलंदी तो आप फिर भी किसी मीटर पे माप सकते हो, लेकिन जोश का वो सांचा ही नहीं बना, जो रिक्टर स्केल पर अरनब का जोश तौल सके।

मौत पर रूदाली, चन्द्रयान पर एस्ट्रोनॉट, ओलंपिक मेडल पर खुद ही खेल-खिलाड़ी बन जाने वाले चैनल समझ ही नहीं पा रहे थे कि आज क्या बनें! ‘आजतक’ पर अंजना ओम कश्यप ने जोश को गरम कर के तरल बनाकर गंभीरता के रूप में धारण कर लिया। सधे लफ्जों में ठहर-ठहर (वैसे भी आजकल वो फिसली जुबान के लिए जानी जाती हैं) शांति बनाए रखने की अपील के साथ खबर बताती रहीं। ‘आम आदमी पार्टी’ के पूर्व नेता आशुतोष जब भी ‘आजतक’ पर होते हैं, वो भूल जाते हैं कि अब वो गेस्ट हैं, खुद मैनेजिंग एडिटर नहीं। वो एंकर को बताने लगे कि ऐसे मामलों में पूरा फैसला आने के बाद ही खबर दिखानी चाहिए, एक-एक बिंदु बताने में गड़बड़ी होगी।

‘एबीपी’ में सुमित अवस्थी ने मोर्चा संभाला, लेकिन फैसला आने से पहले उनकी आवाज और लहजे में पैमाना सेट होने की कशमकश दिखी। कम जोश से मामला बोझिल हो जाता है और ज्यादा जोश से गाइडलाइन के बाहर। ये दिक्कत कई चैनलों-एंकरों की रही। लेकिन काउंटडाउन पढ़ते हुए आप रोमाना की आवाज में खनक दिखाई दी।

‘एनडीटीवी’ अपने अनुभवी चेहरों के साथ स्टूडियो में भी था और मैदान में भी। अरे हां! अब समझ आया, इतनी देर मैंने ‘एनडीटीवी’ क्यूं देखा? क्यूंकि वहां पूरी खबर थी, पूरा विश्लेषण, कोई मातम नहीं। बेरोजगारी और भुखमरी को पूरी खबर में कहीं जबरदस्ती नहीं डाला गया था। मनोरंजन, नगमा, निधि कुलपति, आशीष भार्गव, कादम्बिनी शर्मा और हिमांशु सब बधाई के पात्र हैं। जितनी देर वो रहे, स्क्रीन पर कोई विलाप नहीं हुआ। मोदी जी का जिक्र नहीं हुआ। बस फैसले, बस खबर पर बात हुई और बहुत शानदार हुई।

कई बार जिन बच्चों के नोट्स कमजोर होते हैं, वो कॉपी इतनी सजा देते हैं कि देखने वाला लुक पर ही रुक जाए। सो सुधीर चौधरी विहीन सुबह के लिए ‘जी’ ने ग्राफिक्स पर ही सारी मेहनत झोंक दी। लाल-पीली स्क्रीन और रामजी की मूरत देख, एक पल के लिए तो कोई भी श्रद्धालु रुक ही जाएगा और फिर फैसला आने के बाद ‘जी’ ही पहला था, जिसने स्क्रीन पर बड़ा-बड़ा ‘मंदिर वहीं बनेगा’ लिखने की हिम्मत दिखाई।

‘एबीपी’ खबर के वक्त पेस पकड़ चुका था। निपुण सहगल की रिपोर्टिंग शानदार रही। खबर के बाद अब क्या? सोच-सोच कर ‘आजतक’ उतावला हुए जा रहा था। शांति बनाए रखने की अपील करने के साथ-साथ ओवैसी टाइप मसाला तो चाहिए ही था। सब तरफ से आती स्वागत की खबरों के बीच 'आजतक' ने ओवैसी को खबर की संभावना के तहत बराबर जगह दी। खैर, सलाह तो थी। 

खैर ये ऐसा दही है, बरसों बाद जमा है। दही ही दिखाओ और दही ही परोसो, रायता मत बनाओ। लेकिन ‘द शो मस्ट गो ऑन’ को ध्येय मानने वाले अब छन्नी से अयोध्या छान रहे हैं। कहीं राम जी खुद ही साक्षात टकरा जाएं और बोलें- ‘हे ब्रो आइ एम हियर’ और फिर चैनलवाले उनको पकड़ कर 'पीपली लाइव' का नत्था बना दें। 

(ये लेखिका के निजी विचार हैं।)

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‘SC के फैसले पर सटीक बैठती है अंग्रेजी की ये कहावत’

सच तो यही है कि इस समय देश में शांति और भाईचारा बनाये रखना ही हम देशवासियों का कर्तव्य है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Saturday, 09 November, 2019
Last Modified:
Saturday, 09 November, 2019
SC

निर्मलेंदु, वरिष्ठ पत्रकार।।

अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला। विवादित जमीन का मालिकाना हक रामलला विराजमान को, मस्जिद के लिए दी जाएगी दूसरी जगह। मेरी नजर में यह एक उत्तम और ऐतिहासिक फैसला जरूर है, लेकिन मुस्लिम पक्ष फैसले से संतुष्ट नहीं है। हालांकि ऐसी स्थिति में भी उन्होंने देशवासियों से अपील की कि पूरा देश शांति बनाये रखे। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मील का पत्थर है, शांति व सद्भाव बनाए रखें।

जी हां, देर आयद दुरुस्त आयद, अंग्रेजी में कहते हैं कि इज बेटर लेट, दैन एवर, यानी फैसला देर से जरूर आया, लेकिन दुरुस्त फैसला है यह। स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि सत्य को हजार तरीकों से बताया जा सकता है, फिर भी हर एक सत्य ही होगा। प्रधानमंत्री ने कहा, देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या पर अपना फैसला सुना दिया है। पीएम ने यह भी कहा कि फैसले को किसी की हार या जीत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि न्याय के मंदिर ने दशकों पुराने मामले का सौहार्दपूर्ण तरीके से समाधान कर दिया। केंद्रीय गृहमंत्री और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, अरविंद केजरीवाल और कुछ लोगों ने भी इस फैसले का स्वागत किया है।

कवि गुरु रबींद्रनाथ टैगोर ने कहा था कि तथ्य कई हो सकते हैं, लेकिन सत्य एक ही है और वह सत्य आज लोगों के सामने है। टैगोर ने यह भी कहा था कि जो अपना है, वह मिलकर ही रहेगा। अपना था, इसीलिए मिल गया। विदुर नीति में यह बात कही गयी है कि जिस व्यक्ति के पास ज्ञान है, वह समाधान निकाल ही लेता है। हमारे सुप्रीम कोर्ट के विचारकों के पास ज्ञान है, इसलिए उन्होंने समाधान निकाल ही लिया है। विदुर ने यह भी कहा था कि यदि बगैर किसी संघर्ष के आपको कोई चीज मिल जाती है, तो उसकी कीमत आपको समझ में नहीं आती है। वहीं, अगर आप अपने जीवन में किसी चीज को कड़ी मेहनत के बाद प्राप्त करते हैं, यानी उसे प्राप्त करने में बीस-तीस साल भी लग जाएं, तो उसका एक अलग ही महत्व आपके जीवन में होता है।

बापू यानी महात्मा गांधी ने कहा था, ‘आपको मानवता में विश्वास नहीं खोना चाहिए। मानवता सागर के समान है, यदि सागर की कुछ बूंदें गंदी हैं तो पूरा सागर गंदा नहीं हो जाता।’ गांधीजी ने यह भी कहा था कि विश्वास को हमेशा तर्क से तौलना चाहिए, क्योंकि जब विश्वास अंधा हो जाता है तो मर जाता हैं। जी हां, यहां भी विश्वास को तर्क के साथ तौला गया और इसीलिए वह विश्वास मरा नहीं। फैसला आया और ऐसा फैसला आया कि जिसकी कोई काट ही नहीं है। तर्क, कुतर्क और बोलवचन फेल हो गये और एक नया विश्वास पैदा हो गया, जो कि अटूट है, अकाट्य है, अमूल्य है और निश्छल है।

अब आइए जानते हैं कि ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने क्या कहा था? उन्होंने कहा था कि सबसे अनमोल धन है विद्या, क्योंकि इसके आने मात्र से ही सिर्फ अपना ही नहीं, अपितु पूरे समाज का कल्याण होता है। आज सुप्रीम कोर्ट के जजों ने यह साबित कर दिया कि उन्होंने सही विद्या हासिल की है। उन्होंने अपने इस निर्णय से पूरे समाज का कल्याण कर दिया। जी हां, समाज का कल्याण कर दिया है। इंसाफ के मंदिर के वे पांचों जज हीरो बन गये हैं। यह फैसला नहीं, एक नजीर, एक मिसाल है न्याय के मंदिर का। हमें सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले का मिल-जुलकर सम्मान व आदर करना चाहिए।

सच तो यही है कि इस समय देश में शांति और भाईचारा बनाये रखना ही हम देशवासियों का कर्तव्य है। हमें अफवाहों से भी सावधान व सजग रहना होगा। इस समय हमें किसी के बहकावे में नहीं आना चाहिए। अमन-चैन, शांति, आपसी भाईचारा, सद्भाव व सौहार्द हम बनाए रखेंगे, तो कोई भी हमारा नुकसान नहीं कर पाएगा। आज नफरत व वैमनस्य को परास्त करने का समय आ गया है।

हालांकि मुस्लिम पक्ष के वकीलों ने कहा, ‘हम फैसले से संतुष्ट नहीं हैं, कुछ गलत तथ्य पेश किए गए, हम उनकी जांच करेंगे।’ साथ ही उन लोगों ने यह भी कहा कि उच्चतम न्यायालय का फैसला है, इसलिए हम उसका सम्मान करते हैं। पूरे देश को शांति बनाए रखनी चाहिए। मुस्लिम पक्ष के एक वकील ने कहा, ‘फैसला हमें बाबरी मस्जिद नहीं देता, जो हमारे हिसाब से गलत है।‘ मुस्लिम पक्ष के दूसरे वकील ने कहा, ‘हमारे लिए पांच एकड़ जमीन के कोई मायने नहीं हैं। हम फैसले से जरा भी संतुष्ट नहीं हैं।‘ हालांकि साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हम नागरिकों से शांति बनाए रखने की अपील करते हैं।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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मिस्टर मीडिया: अगर इस तरह की खबरें सच हैं तो यह शुभ संकेत नहीं है

मेरा मानना है कि लोकतंत्र के गुलदस्ते में हर विचारधारा के फूल खिलते हैं

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Friday, 08 November, 2019
Last Modified:
Friday, 08 November, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

अगर राज्यसभा टेलिविजन और लोकसभा टेलिविजन के विलय की खबरें सच हैं तो यह शुभ संकेत नहीं है। देश के बजट का आकार देखते हुए सौ-पचास करोड़ रुपए बचा लेना कोई तर्कसंगत इसलिए भी उचित नहीं ठहराया जाना चाहिए, क्योंकि ये दोनों कोई विशुद्ध खबरिया चैनल नहीं हैं। न ही इनके कोई छिपे हुए राजनीतिक हित होते हैं। नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय लोकतंत्र के विराट आकार और प्राचीन महत्व को देखते हुए संसद के दोनों सदनों के अपने चैनलों ने संसार के तमाम लोकतांत्रिक देशों में भारत का मान बढ़ाया है। हिंदुस्तान के इन चैनलों की कामयाबी को देखते हुए अनेक देशों ने राज्यसभा टेलिविजन से सहयोग के लिए संपर्क भी किया था। इस चैनल का संस्थापक कार्यकारी निदेशक/संपादक होने के नाते मुझे यह अनुभव हुआ था।

सच तो यह है कि नई सदी में प्रवेश करने के साथ ही अनेक पश्चिमी और यूरोप के देशों की तर्ज पर भारत में भी संसद टीवी का विचार बहस के स्तर पर अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार के दरम्यान आया था। उसके बाद यूपीए सरकार आई तो लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने लोकसभा टीवी को हरी झंडी दी। सरकार उन्हीं दिनों राज्यसभा टीवी भी शुरू करना चाहती थी, लेकिन राज्यसभा के तत्कालीन सभापति भैरों सिंह शेखावत इसके पक्ष में नहीं थे। इसलिए यह मामला लटक गया।

यूपीए के दूसरे कार्यकाल में एक बार फिर यह बहस छिड़ी और 2010 में इसे शुरू करने का निर्णय हुआ। कार्यकारी संपादक के तौर पर मेरा अनुबंध हुआ। बाद में मेरा पदनाम कार्यकारी निदेशक कर दिया गया। 26 अगस्त 2011 को अत्यंत सीमित संसाधनों के साथ राज्यसभा टीवी शुरू हो गया। पहले दिन चार घंटे का प्रसारण किया। इसके बाद तो चैनल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। देखते ही देखते इसने आसमानी बुलंदियों को छुआ और इसके अनेक कार्यक्रम लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचे ।

मुझे लगता था कि एक तरफ तो भारतीय लोकतंत्र की तूती दुनिया में बोलती है, दूसरी ओर मुल्क के आम आदमी की संसद के कामकाज में दिलचस्पी घटती जा रही है। संसद के भीतर साल भर देश के भले के लिए अनेक समितियां किस तरह काम करती हैं, उसकी जानकारी भी लोगों तक पहुंचाने का कोई जरिया नहीं था। यह विरोधाभास था कि संसद को हम लोकतंत्र का सर्वोच्च मंदिर कहते हैं, पर उस मंदिर में होने वाली गतिविधियों से वाकिफ ही नहीं रहते। चैनल शुरू करते समय हमारा बड़ा सरोकार यही था।

मेरा मानना है कि लोकतंत्र के गुलदस्ते में हर विचारधारा के फूल खिलते हैं। जिस तरह संसद की राष्ट्रीय गंगा में हर विचारधारा की नदी शामिल हो जाती है। चुनाव आयोग सारी विचारधाराओं वाली पार्टियों को संरक्षण देता है तो संसद के चैनल में सभी दलों और सभी राजनीतिक विचारों को जगह मिलनी चाहिए। हमने वही किया। नतीजा यह कि देश के करोड़ों दर्शकों का परिवार हमारे साथ जुड़ा। उन्हें ताज्जुब होता था कि इस चैनल पर सरकार की सख्त आलोचना कैसे हो रही है। चाहे वह यूपीए सरकार रही हो या एनडीए। अगर सदन के भीतर पक्ष और विपक्ष बोल सकते हैं तो सदन के चैनल पर क्यों नहीं? मुझे गर्व है कि मेरे कार्यकाल में अनेक वर्षों तक यूपीएससी तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल हुए छात्र कहा करते थे कि परीक्षाओं की तैयारी के लिए उन्होंने केवल राज्यसभा टीवी देखा। अलग से पढ़ाई नहीं की ।

दरअसल, संसद एक तरह से देश की मां है। एक चैनल आठ सौ सांसदों की आवाज, उनके निर्वाचन क्षेत्र, उनके मुद्दे, जनता की आवाज, दोनों सदनों की कार्रवाई, स्थाई समितियों, लोकलेखा समिति, संयुक्त संसदीय समिति, प्रवर समिति तथा अनेक विभागीय समितियों का काम नहीं दिखा सकता। हमने राज्यसभा चैनल में फ़िल्में नहीं दिखाईं, फ़ूहड़ सीरियल नहीं दिखाए, विज्ञापन नहीं दिखाए, ब्रेक तक नहीं लिए।  हमारे समाचार तथ्यपरक और निष्पक्ष होने का पूरा प्रयास करते थे। हमारे एंकर अपने शो के लिए पूरी पढ़ाई करते थे। चीखपुकार और गाली गलौज संस्कृति को बढ़ावा नहीं देते थे और विषयों के विशेषज्ञ ही बुलाते थे ।

बहरहाल! अब यदि यह अतीत बनने जा रहा है तो भारत की संसदीय पत्रकारिता को बड़ा झटका है। वैसे भी अधिकतर पत्रकारिता शिक्षण संस्थानों में संसदीय पत्रकारिता नहीं पढ़ाई जाती। पत्रकारिता के छात्र इन चैनलों से काफी कुछ सीखते थे। पत्रकारिता के लिए ही नहीं, लोकतांत्रिक परिपक्वता के अनुष्ठान में भी बाधा पहुंचेगी मिस्टर मीडिया।

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: किसी पत्रकार को कवरेज का ऐसा दिन देखने का मौका न मिले तो अच्छा

मिस्टर मीडिया: यह विचार की जालसाजी अथवा धोखाधड़ी नहीं तो और क्या है?

मिस्टर मीडिया: राजदीप के विडियो और अजीत अंजुम के खुलासे के मायने भी समझिए

इन सवालों के जवाब आप खुद तलाशिये मिस्टर मीडिया

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दो खेमों में बंटी उप्र मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति

समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी और सचिव शिवशरण सिंह ने जारी किया अलग-अलग बयान

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Thursday, 07 November, 2019
Last Modified:
Thursday, 07 November, 2019
Committee

‘उप्र राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति’ के आधे पदाधिकारियों की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात के बाद संवाददाता समिति के दो फाड़ होने के आसार पैदा हो गये हैं। आज संवाददाता समिति के सचिव शिवशरण सिंह के नेतृत्व में समिति के चंद पदाधिकारियों ने मुख्यमंत्री से मुलाकात करके प्रदेश के पत्रकारों की जायज जरूरतों की मांग की थी। इनमें पत्रकारों के लिए सरकरी आवास और सुरक्षा की मांग प्रमुख थीं।

मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद सचिव शिवशरण सिंह ने एक विज्ञप्ति जारी कर इस मुलाकात का विवरण पत्रकारों के समक्ष प्रस्तुत किया। इसके बाद उ.प्र.मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने समिति के चंद पदाधिकारियों की मुख्यमंत्री से मुलाकात पर एतराज जताते हुए एक पत्र जारी किया। इसमें उन्होंने लिखा कि मुख्यमंत्री से समिति की मुलाकात आधिकारिक नहीं थी, बल्कि कुछ पदाधिकारी/सदस्य निजी एजेंडा पर मिले थे।

तिवारी ने समिति द्वारा जारी किए पत्र में लिखा कि उत्तर प्रदेश राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के निर्वाचित प्रतिनिधियों के किसी आधिकारिक प्रतिनिधि मंडल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बुधवार को मुलाकात नही की है। समिति के पदाधिकारियों को इस संदर्भ में न तो बुलाया गया था नही समिति की ओर से आधिकारिक तौर पर कोई ज्ञापन पत्रकारों से संबंधित मांगों का सौंपा गया है।

समिति अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने साफ किया है कि बुधवार को मुख्यमंत्री से समिति के मात्र चंद पदाधिकारी व्यक्तिगत स्तर पर मिले थे और अपनी निजी रुचि के अनुसार उन्होंने मांगों से संबंधित ज्ञापन सौंपा था। तिवारी ने बताया कि संवाददाता समिति के सभी निर्वाचित पदाधिकारियों ने एक साथ मुख्यमंत्री से मुलाकात के लिए समय मांगा है, जो अब तक नहीं मिल सका है। इन परिस्थितियों में महज चार-पांच पदाधिकारियों की मुलाकात व्यक्तिगत तो हो सकती है, पर समिति की आधिकारिक नही।

उन्होंने कहा कि समिति की ओर मुख्यमंत्री से मुलाकात होने की दशा में सभी निर्वाचित पदाधिकारी जाएंगे और सबकी सहमति से पत्रकारों की मांगों से संबंधित ज्ञापन उन्हें सौंपा जाएगा। समिति अध्यक्ष ने खेद जताया कि मुख्यमंत्री के एक मीडिया सलाहकार कुछ चहेते पदाधिकारियों की मुलाकात करवा कर पत्रकारों की एकता को खंडित करना चाहते हैं जो प्रदेश अथवा सरकार के हित में नहीं है।

उन्होंने कहा कि समिति में सभी पदाधिकारी बड़ी संख्या में पत्रकार साथियों का विश्वास व मत पाकर जीते हैं और सभी को मुख्यमंत्री के सामने अपनी बात रखने का समान हक होना चाहिए। उन्होंने प्रदेश सरकार को आगाह किया कि मीडिया सलाहकार को पत्रकारों के हितों के लिए कार्ययोजना बनाने और मुख्यमंत्री की छवि चमकाने के काम में गंभीरता से जुटना चाहिए न कि पत्रकारों के बीच गुटबाजी को प्रश्रय देने व अपनी मनमानी करने में। संवाददाता समिति अध्यक्ष ने सभी निर्वाचित पदाधिकारियों की ओर मुख्यमंत्री से मिलने का समय देने का अनुरोध करते हुए कहा कि पत्रकारों की कई समस्याओं पर विचार व उनकी मांगों का निराकरण अति आवश्यक है।

इससे पूर्व संवाददाता समिति के सचिव ने मुख्यमंत्री से मुलाकात के तुरंत बाद जो विज्ञप्ति जारी की वो इस प्रकार थी-

मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति ने पत्रकारों की समस्याओं को लेकर मुख्यमंत्री से की मुलाकात

उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति ने आज मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उनके आवास पर भेंट कर उन्हे एक अनुरोध पत्र सौंपा। इसमें पत्रकार की समस्याओं का उल्लेख किया गया। वार्ता के दौरान मुख्यमंत्री ने समिति के सदस्यों की बातों को ध्यानपूर्वक सुना और उनके निराकरण का आश्वासन दिया। समिति के सचिव शिवशरण सिंह के नेतृत्व में मिले इस शिष्टमंडल ने मुख्यमंत्री आवास पहुंचकर उनसे आग्रह किया कि राज्य मुख्यालय में कार्यरत पत्रकारों को आवास की भीषण समस्या का सामना करना पड़ रहा है। पूर्व में मुख्यमंत्री की तरफ से पत्रकारों को निजी आवास (फ्लैट) देने का मौखिक आश्वासन दिया गया था। जिस पर अब तक कोई कार्यवाही नहीं हो सकी है। इस पर मुख्यमंत्री जी ने समिति को आश्वासन दिया कि सरकार पत्रकारों की समस्याओं को लेकर गंभीर है लेकिन उन्ही पत्रकारों को यह सुविधा दी जाएगी जो इसके योग्य होंगे।

इसके अलावा समिति ने पत्रकारों के उत्पीडन को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की। इस पर मुख्यमंत्री ने कहा कि पत्रकार समाज के प्रति भी अपनी नैतिक जिम्मेदारी को निभाते हुए काम करें और आम जन के सरोकार से भी जुड़ें। उन्होंने कहा कि पत्रकारों की भूमिका सरकार के कामों को जन-जन तक पहुंचाना तथा जन समास्याओं को सरकार तक पहुंचाने की होती है। इसलिए इस पर वह प्रभावी ढंग से काम करें। प्रतिनिधिमंडल में समिति के सचिव शिवशरण सिंह, उपाध्यक्ष आकाश शेखर शर्मा, संयुक्त सचिव श्रीधर अग्निहोत्री, सदस्य कार्यकारिणी अभिषेक रंजन और दया बिष्ट शामिल थे। अब देखना ये है कि समिति के अध्यक्ष और सचिव के बीच खींचतानी में दो खेमों में बंटे पदाधिकारियों/सदस्यों का अलगाव किस नतीज़े पर पहुंचता है।

(वरिष्ठ पत्रकार नवेद शिकोह की फेसबुक वॉल से साभार)

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‘साइबर नीति की समीक्षा कर उसे प्रासंगिक बनाने का सही समय’

सोशल मीडिया के माध्यमों में वॉट्सऐप को सबसे सुरक्षित और निजता बनाए रखने वाला ऐप माना जाता रहा है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Saturday, 02 November, 2019
Last Modified:
Saturday, 02 November, 2019
Social Media

डॉ. बिजेंद्र कुमार।।

दो-तीन दिन पहले इस साल की सबसे बड़ी हैकिंग की खबर आई। खबर के अनुसार, 12 लाख से ज्यादा भारतीयों के डेबिट और क्रेडिट कार्ड के डाटा को चोरी कर लिया गया और इस डाटा को हैकर्स की वेबसाइट जोकर्स स्टेश पर बेचा जा रहा है। इससे भारतीय यूजर्स अभी उबर भी नहीं पाए थे कि वॉट्सऐप में सेंध लगने का मामला उजागर हो गया।

सोशल मीडिया के माध्यमों में वॉट्सऐप को सबसे सुरक्षित और निजता बनाए रखने वाला ऐप माना जाता रहा है। खुद वॉट्सऐप भी एंड टू एंड इंक्रिप्शन यानी संदेश के प्रेषक और प्राप्तकर्ता तक सीमित रहने का भरोसा देता है और दावा भी करता कि है वॉट्सऐप में जानकारी पूर्णतः सुरक्षित है। लेकिन 14 सौ से ज्यादा भारतीयों की जानकारी प्राप्त करने के लिए जासूसी सॉफ्टवेयर पेगासस के जरिये फोन हैक कर लिए गए।

जिन यूजर्स के वॉट्सऐप में सेंध लगी, उनमें सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार शामिल हैं। स्पाइवेयर, मैलवेयर और वायरस के जरिये साइबर अपराध करना अब आम होता जा रहा है। भारत में साइबर अपराध के बढ़ते आंकड़े इसका प्रमाण हैं। स्पाइवेयर अब यूजर्स की तमाम गतिविधियों पर नजर रकने के साथ यूजर्स की  महत्वपूर्ण जानकारियां को फोन हैक कर चुरा लेते हैं। ऐसे में यूजर्स को आर्थिक नुकसान के साथ-साथ उसके मौलिक अधिकारों का हनन होता है।

सोशल मीडिया कंपनियां विकासशील देशों में साइबर सिक्योरिटी को लेकर उतनी गंभीरता नहीं दिखातीं, जितनी यूरोपीय देशों और अमेरिका को लेकर दिखाती हैं। इन कंपनियों ने यूरोप और अमेरिका के लिए अलग कानून बनाए हुए हैं और भारत जैसे देशों के लिए अलग तरह का कानून है।

वॉट्सऐप जासूसी मामले में विपक्ष ने भी सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। सरकार ने भी वॉट्सऐप को तलब कर पूछा है कि सेंध कैसे लगी और उसने यूजर्स की जानकारियां सुरक्षित रखने के लिए क्या उपाय किए हैं? जाहिर है वॉट्सऐप में सेंध लगना निजता के उल्लंघन का मामला है। इसमें सरकार को निजता और मौलिक अधिकार दोनों को सुरक्षित रखने के लिए कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है। समय आ गया है सरकार साइबर नीति की समीक्षा कर उसे प्रासंगिक बनाएं।

(लेखक दिल्ली विश्विद्यालय से संबद्ध भीमराव अंबेडकर महाविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)

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‘वॉट्सऐप जासूसी कांड: याद आती है 32 साल पहले की वह घटना’

राजनीतिक गलियारों के अलावा सरकारी एजेंसियां और देश-विदेश की निजी एजेंसियां भी वर्षों से अधिकृत अथवा गैरकानूनी ढंग से भारत में जासूसी करती रही हैं

आलोक मेहता by आलोक मेहता
Published - Saturday, 02 November, 2019
Last Modified:
Saturday, 02 November, 2019
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।

एक बार फिर फोन से जासूसी पर हंगामा। कम से कम अनुभवी नेताओं और पत्रकारों को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। मुझे 32 वर्ष पहले की घटना याद आती हैI उस समय ज्ञानी जैल सिंह देश के राष्ट्रपति थे। उनके करीबी वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल के साथ राष्ट्रपति भवन में बातचीत हो रही थी। पहले हम उनके स्टडी रूम में ही बात कर रहे थे।  फिर राजनीतिक उठापटक पर बात शुरू होने पर ज्ञानीजी ने हमसे कहा कि चलो बाहर लॉन में बात करेंगे।  मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ। ज्ञानीजी ने बाहर निकलकर खुद ही बताया, ‘तुम्हें मालूम नहीं है,  आजकल दीवारों के कान भले ही न हों,  टेलिफोन उठाए बिना कोई दूर बैठा हमारी बात सुन लेगा या रिकॉर्ड भी कर लेगा।

उन दिनों ज्ञानीजी और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बीच मतभिन्नता और अविश्वास का दौर चल रहा था। उस दौरान इस तरह फोन टैपिंग से बचाव के रास्ते निकाले जाते रहे। राजनीतिक गलियारों के अलावा सरकारी एजेंसियां और देश-विदेश की निजी एजेंसियां भी वर्षों से अधिकृत अथवा गैरकानूनी ढंग से भारत में जासूसी करती रही हैं। 

अब इजरायल की एक कंपनी के आधुनिक उपकरण से दुनिया के 14 देशों के साथ भारत के भी लगभग 15 या उससे अधिक लोगों के फोन में सेंध लगाकर वॉट्सऐप के जरिये बातचीत अथवा दस्तावेजों की जासूसी का आधा अधूरा रहस्य मीडिया में उछला है। सरकार ने स्वयं इस मुद्दे पर वॉट्सऐप और एजेंसियों से जांच पड़ताल की घोषणा कर अपने हाथ झाड़ने का प्रयास किया है। दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी और प्रतिपक्ष के अन्य दलों, मीडिया समूहों तथा कानूनविदों ने इसे निजता में हस्तक्षेप ठहराते हुए आशंका व्यक्त की है कि प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से इस जासूसी में सरकार का हाथ हो सकता हैI

असली मुद्दा यह है कि किसी एजेंसी ने इन चुनिंदा लोगों के फोन में ही सेंध क्यों लगाई? जो नाम सामने आए, उनमें से कुछ पर नक्सल संगठनों, उनसे जुड़े संदिग्ध व्यक्तियों और देश विदेश में मानव अधिकारों के नाम पर सहायता देने वालों से संपर्क और संबंध होने के आरोप लगते रहे हैं। भारत सरकार भी वर्षों से ऐसे व्यक्तियों और संगठनों पर नजर रखती रही है। कांग्रेस गठबंधन की सरकार रही हो या भाजपा गठबंधन की, राष्ट्रीय अथवा प्रादेशिक सरकारों ने सुरक्षा व्यवस्था के लिए वैधानिक रूप से भी गुप्तचरी का इंतजाम किया है। लेकिन नए जासूसी कांड में बड़े पेंच हैं।

इजरायल की कंपनी एनएसओ ने कहा है कि वह आतंकवाद और गंभीर अपराधों के खिलाफ लड़ाई में मदद के लिए सरकारी खुफिया एजेंसियों को यह टेक्नोलॉजी देती है। यह टेक्नोलॉजी मानव अधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के खिलाफ इस्तेमाल के लिए डिजाइन नहीं की गई है। फिर भी जिन लोगों की जासूसी का मामला सामने आया है,  उनमें से कुछ भीमा कोरेगांव के हिंसक गंभीर मामलों के वकील अथवा मानव अधिकार कार्यकर्ता के रूप में चर्चित रहे हैं। रहस्य यह है कि  किसके कहने पर इनके फोन में सेंध लगाई गई। जासूसी भी 2019 के चुनाव से कुछ पहले की तारीखों में हुई है।

वॉट्सऐप यह दावा करता रहा है कि उसके संदेश पूरी तरह सुरक्षित होते हैं। दुनिया भर में उसके 150 करोड़ उपभोक्ता हैं। इनमें से करीब 40 करोड़ भारत में हैं। इसलिए वॉट्सऐप की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है और उसने बाकायदा अमेरिका की अदालत में इजराइल की कंपनी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया है। यह मामला आसानी से निपटने वाला नहीं है। सरकार के अलावा भारतीय अदालतों में भी यह मामला जांच और न्याय के लिए सामने आने के पूरे आसार हैं।

यूं मजेदार बात यह है कि इससे पहले भी परस्पर विरोधी संस्थानों और लोगों ने जासूसी के आरोपों पर बड़ी हायतौबा मचाई, लेकिन कभी किसी पर गंभीर कार्रवाई नहीं हो सकी। कांग्रेस गठबंधन की सरकार के दौरान एक प्रभावशाली मंत्री द्वारा अपनी ही सरकार के सबसे वरिष्ठ मंत्री के कक्ष में जासूसी के उपकरण लगाने का  आरोप लगा था। सरकार ने अपनी इज्जत बचाने के लिए इस मामले को दबा दिया। इसी तरह तत्कालीन थलसेना अध्यक्ष जनरल वीके सिंह की जासूसी का गंभीर मामला भी सामने आया था। बड़ी कारपोरेट कंपनियों, नेताओं और नामी पत्रकारों की महीनों तक फोन पर होती रही बातचीत की जासूसी के टेप सामने आने पर हंगामा मच गया था।

आज तक उस जासूसी के सूत्रधारों के नाम सामने नहीं आए और न ही किसी पर कोई कार्रवाई हुई। कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और पंजाब जैसे राज्यों में सत्ताधारियों द्वारा समय-समय पर अपने विरोधियों और अपने समर्थकों तक की जासूसी के आरोप सामने आते रहे हैं। शायद यही कारण है कि इस बार भी जासूसी कांड को लेकर राजनीतिक हंगामा हो रहा है।

इस विवाद से जुड़ा दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि नक्सली हिंसा अथवा आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े लोगों की प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष सहायता करने वालों पर सरकारी या गैर सरकारी स्तर पर नजर रखने की पूरी संभावना रहती है। लेकिन देर सवेर यह खतरा बन सकता है कि देश के अंदर या बाहर से सहायता देने वाले लोगों से संपर्क होने पर वह भी संदेह के पात्र हो जाते हैं। नक्सली हिंसा में कांग्रेस के भी शीर्ष नेताओं की हत्या हुई है। अपने सत्ता काल में वह भी ऐसे लोगों पर नजर रखती रही है।

भारत ही नहीं, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देशों में भी सत्ताधारियों अथवा कारपोरेट कंपनियों द्वारा जासूसी के मामले सामने आते रहे हैं। सार्वजनिक क्षेत्र में सक्रिय रहने पर अन्य खतरों के साथ इस तरह के खतरों का भी सामना करना होता है। बहरहाल यह उचित समय है, जब सरकार और संसद निजता के अधिकार की सीमाएं और किसी भी तरह की गुप्तचरी के नियमों को तय करे।

(लेखक पद्मश्री से सम्मानित है और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं।)

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मिस्टर मीडिया: किसी पत्रकार को कवरेज का ऐसा दिन देखने का मौका न मिले तो अच्छा

आज भी हमारे कई मीडिया शिक्षा संस्थान ऐसे मामलों की कवरेज का व्यावहारिक, नैतिक और सैद्धांतिक पक्ष नहीं पढ़ाते

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Thursday, 31 October, 2019
Last Modified:
Thursday, 31 October, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

वह 31 अक्टूबर 1984 की बेहद मनहूस सुबह थी। रात साढ़े तीन बजे अखबार का संस्करण प्रेस भेजा और गाड़ी मुझे घर छोड़ आई । सोते-सोते सुबह साढ़े चार बज गए। गहरी नींद में ही था कि दफ्तर की गाड़ी का भोंपू बजने लगा। उस गाड़ी का भोंपू ऐसी आवाज करता था कि घनघोर निद्रा भी उसके आगे दम तोड़ देती थी। आशंका हुई कि अखबार में कोई ब्लंडर तो नहीं हो गया। नौकरी बचेगी या नहीं? क्योंकि पहले कभी इतने सुबह प्रेस की गाड़ी लेने नहीं आई थी।

बाहर आया तो ड्राइवर ने कहा, ‘जैसी हालत में हों, तुरन्त चलिए।' मैंने पूछा, क्या हुआ? उसने कहा, ‘मुझे ज्यादा नहीं पता, पर दिल्ली में कुछ बड़ा हुआ है।’ शर्ट-पेंट पहनी। दफ्तर पहुंचा। न्यूजरूम खाली था। अकेले अखबार के प्रबंध संपादक अभय छजलानी टेलिप्रिंटर के पास खड़े थे। बदहवास। बोले, इंदिराजी को गोली मार दी। एक घंटे में छोटा अखबार निकालना है। टेलिप्रिंटर की घंटियां बज रहीं थीं। लाल रंग के रिबन से टाइप उभर रहे थे। मैं और वे खबर लिखने बैठे। कभी वे ले आउट रूम में जाते तो कभी मैं। एक घंटे में अठारह-बाइस साइज में हमारा अखबार बाजार में था-शीर्षक था इंदिराजी शहीद!

मेरी आंखों के सामने केवल एक सप्ताह पहले इंदिराजी की भीकन गांव की रैली की कवरेज याद आई। वह मध्य प्रदेश की अंतिम यात्रा थी और उसकी कवरेज करने तथा एक छोटा सा साक्षात्कार करने का मौका मुझे मिल गया था। उस रैली में भी उन्होंने कहा था कि मेरे खून का एक-एक कतरा देश के काम आएगा। हालांकि उससे पहले खजुराहो संसदीय क्षेत्र की दो चुनावी सभाओं को कवर करने और कुछ सवाल करने के अवसर आए थे, मगर भीकन गांव की कवरेज मेरे लिए यादगार है।

इसके बाद जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, बाकी संपादकीय सहयोगी भी आते गए। हम दिन भर छोटे संस्करण निकालते रहे। अखबार के गेट पर हॉकर्स की लंबी कतार लगी रही। शाम होते-होते देश अशांत हो गया। चारों तरफ हिंसा,लूट और आगजनी का दहशत भरा माहौल। ऐसे में शाम को हम लोग रिपोर्टिंग के लिए भेज दिए गए। उस रात घर नहीं जा सके। दिन भर पोहे-कचौरी और चाय चलती रही । अगले दिन स्थिति और बिगड़ गई। अगले दिन भी उसी हाल में रहे। शहर में कर्फ्यू था। तीसरे दिन घर जा पाए। रिपोर्टिंग और डेस्क वर्क एक साथ संभालना पड़ रहा था।

अपने ढंग का यह पहला अनुभव था। पत्रकारिता के नजरिये से काफी कुछ सीखने को मिला। खबर लिखने के नए अंदाज, धीरज और संयम की परीक्षा, संवेदनशील विषय पर सोच-समझकर शब्दों, भाषा और ले आउट की नसीहत हमारे वरिष्ठ सहकर्मी देते रहे। समाचार संपादक जयसिंह ठाकुर के हाथ में वह रिमोट था, जो हर कॉपी का एक-एक शब्द चेक करते थे। एक भी गलत शब्द का इस्तेमाल अर्थ का अनर्थ कर सकता था। कई तथ्य हमने बेहद अनुशासन का पालन करते हुए अखबार के पन्नों पर परोसे। आज वे नसीहतें, प्रशिक्षण और जिम्मेदारी की भावना का जगाए रखना याद आता है। लेकिन, किसी पत्रकार को कवरेज का ऐसा दिन देखने का अवसर न मिले तो अच्छा। आज भी आंखों के सामने वे अशांत दृश्य सिहरन पैदा कर देते हैं।

इस घटना को पैंतीस बरस बीत चुके हैं। मगर आज भी हमारे कई मीडिया शिक्षा संस्थान ऐसे अति संवेदनशील मामलों की कवरेज का व्यावहारिक, नैतिक और सैद्धांतिक पक्ष नहीं पढ़ाते। कम से कम बीस विश्वविद्यालयों के साथ उनके पाठ्यक्रमों का अध्ययन करने के बाद कह सकता हूं कि इनमें बहुत सुधार की जरूरत है। हमारे अनेक वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों को इस तरह की कवरेज का व्यापक अनुभव है। वे कम से कम इस मामले में पहल कर सकते हैं। मैं तो अपने स्तर पर काम कर ही रहा हूं। अप्रिय हालात में संयम और जवाबदेही के साथ खबर संकलन का काम सिखाना बहुत आवश्यक है मिस्टर मीडिया!

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