सोशलाइट परमेश्वर गोदरेज को वरिष्ठ पत्रकार वीर सांघवी की श्रद्धांजलि...

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। मशहूर समाजसेवी, सोशलाइट और महिला उद्यमी परमेश्वर गोदरेज का 70 साल की उम्र में

Last Modified:
Thursday, 13 October, 2016
vir-sanghvi

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

vir-sanghviमशहूर समाजसेवी, सोशलाइट और महिला उद्यमी परमेश्वर गोदरेज का 70 साल की उम्र में मुंबई में निधन हो गया। वे गोदरेज ग्रुप के चेयरमैन आदि गोदरेज की पत्नीं थीं। फेफड़े की बीमारी के चलते उन्हें ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल में एडमिट कराया गया था, जहां सोमवार की रात उनका निधन हो गया।

उन्हें नजदीक से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार वीर संघवी ने अंग्रेजी दैनिक 'हिन्दुस्तान टाइम्स' में एक लेख के जरिए उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनका कहना है कि संभवत: डिजाइनिंग में उनका सबसे बड़ा योगदान रेस्तरां डिजाइन के क्षेत्र में है। इसके बाद उन्होंने अपने पति के समूह गोदरेज के रियल एस्टेट डिवीजन को संभाला। संघवी कहते हैं कि उनमें एक के बाद कई भूमिकाएं निभाने की असाधारण क्षमता थी।

सांघवी का कहना है कि परमेश्वर अरबपति थीं, लेकिन विनम्रता उनमें कूट-कूट कर भरी थी। सालों पहले मेरे जैसे नए पत्रकार से वह बेहद शालीनता और विनम्रता से पेश आईं थीं। स्टाइल और ग्लैमर के मामले में उनका कोई जवाब नहीं था।

संघवी कहते हैं, परमेश्वर पंजाबी वर्ग से ताल्लुक रखती थीं। जिनता गोदरेज के पारसी परिवार ने उन्हें नहीं बदला, उतना उन्होंने गोदरेज परिवार को बदल दिया। परमेश्वर पारिवारिक मूल्यों, ग्लैमर और साहस की अद्भुत संगम थीं।

पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार वीर सांघवी का पूरा लेख:

A true original: Vir Sanghvi remembers Parmeshwar Godrej

To the world at large, Parmeshwar Godrej was a coolly elegant figure who partied with the international jet set and carried one of India’s most famous surnames. Those who knew her, however, remember a different Parmesh: warm, caring, giving, and always fun to be with.

I first met her when I was 20 and just starting out in journalism. She was already Mrs Godrej, queen of Bombay society, and had no reason to give a damn about a young journo. But she was unfailingly hospitable, charming and friendly. At the time, she was famous for having bridged the gap between the film world and Bombay society, which had seemed unbridgeable till she appeared on the scene – and on the cover of Stardust.

We forget now that she was India’s first designer, running the successful Dancing Silks boutique at the Oberoi and making clothes for the top heroines of the 1970s. When fashion bored her, she moved into interior designing and set up Bombay’s hottest design firm, Inner Spaces, in partnership with Sunita Pitamber. Inner Spaces designed the homes of millionaires in Bombay, Delhi and London but is probably best remembered for its revolutionary approach to restaurant décor. The original China Garden in Kemps Corner was the first stand alone to actually look better than any five-star hotel restaurant.

By the time others had attempted to copy the success of Inner Spaces, Parmesh had finally got involved with the Godrej Group’s businesses, advising the real estate development division. I used to joke with her that with Inner Spaces she made so much money that she could have maintained her glamorous lifestyle without drawing on the Godrej wealth.

And her lifestyle was certainly glamorous. When she and her husband, Adi, abandoned their Carmichael Road apartment to spend more time at their stunning beach house in Juhu, their move had the effect of quadrupling property prices in Juhu. Suddenly, every millionaire wanted a beach house like the Godrejs.

Some of her legendary parties were thrown at that beach house and attended by the likes of Richard Gere, Goldie Hawn, Amitabh Bachchan and Imran Khan. The parties acquired an iconic status not because of the guest lists or the extravagance but because of Parmesh’s own sense of warm hospitality.

She was born into an upper middle-class Sikh family and met Adi when she was flying with Air India. They had an intense romance before marrying. Till the end, Adi remained the centre of Parmesh’s universe and for all the exterior glamour, the Godrejs and their children were a close-knit family.

When middle-class women marry into billionaire families, they usually have to change to fit in. Parmesh was the exception. She changed the Godrejs much more than they changed her. She took a conservative Parsi family whose idea of a good time was a family picnic and introduced it to international glamour. But through it all, she remained the exuberant Punjabi she had always been: generous to a fault, full of life and vitality, and yet, at the same time, sensitive and vulnerable.

She was a true original.

(साभार: हिन्दुस्तान टाइम्स)

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मिस्टर मीडिया: अब तो हमारे मीडिया महारथियों को भी लाज नहीं आती

पाकिस्तान को तो हम 1992 से हराते आए हैं, आगे भी हराते रहेंगे

Last Modified:
Wednesday, 19 June, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

हम इन दिनों मीडिया का एक क्रूर, असंवेदनशील और खौफनाक चेहरा पेश कर रहे हैं। यह हिंदुस्तान की पाकिस्तान पर क्रिकेट विजय का जश्न मनाता है और आम अवाम बिहार के नौनिहालों की अकाल मौतों के मातम में डूबी है। बिहार का अमानवीय स्वास्थ्य मंत्री जीत पर मुबारकबाद देता है तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उसकी बलैयां लेते हैं। एक-एक बच्चे की हत्या बिहार की हुकूमत के लिए सार्वजनिक शोक का भी सबब नहीं बनती। बिहार के इस प्रादेशिक शोक का असर दूसरे राज्यों तथा मीडिया में कितना दिखाई देता है? हम यह कैसे पथरीले समाज की रचना कर रहे हैं? अजीत अंजुम की अन्वेषणात्मक ख़बरें छोड़ दें तो किस चैनल ने बेहद संजीदगी और गहराई से इस मसले की पड़ताल की?

सत्ता प्रतिष्ठान भले ही रागरंग में डूबे रहें, मगर मीडिया पर आनंद की इन नशीली हवाओं का असर क्यों होना चाहिए? अपनी मौत की भविष्यवाणी करने वाले पंडित कुंजीलाल का ड्रामा दिखाने के लिए मीलों दूर अपनी ओबी वैन और कैमरा टीमें दौड़ाने वाले कितने चैनलों ने बिहार की इस भयावह त्रासदी पर गंभीरता से कवरेज़ की? उसके कारणों की तीखी और पैनी पड़ताल की। अखबारों के पन्नों पर कितनी जगह मिली? सरकारी रेडियो एक-एक सांसद की शपथ का आंखों देखा हाल सुनाता रहा, पर घरों के चिराग बुझने से हुए अँधेरे पर किस प्रसारण में पर्याप्त जगह मिली? मीडिया का यह कौन सा जिम्मेदारी भरा रूप है?  पाकिस्तान को तो हम 1992 से हराते आए हैं। आगे भी हराते रहेंगे। उसे सातवीं बार भी शिकस्त दे दी तो ऐसा उन्माद कितना जायज है? अब तो हमारे मीडिया महारथियों को भी लाज नहीं आती। घंटों तक परदे पर गाल बजाने वाले स्वनाम धन्य एंकर सरोकारों के साथ पत्रकारिता कब सीखेंगे?

क्या पत्रकार याद करेंगे कि इस देश ने एक दौर ऐसा भी देखा था, जब भागलपुर के आँख फोड़ कांड पर कवरेज से सत्ता हिल गई थी। क्या पत्रकार याद करेंगे कि कभी सिलिकोसिस से तिल तिलकर मरने वाले भी पत्रकारिता के जरिए सरकार का सिरदर्द बन जाते थे। क्या पत्रकार याद करेंगे कि छत्तीसगढ़ के रिवई पंडों की भूख से मौत की खबरों ने प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया था। क्या पत्रकार याद करेंगे कि कभी कालाहांडी की बदहाली भी कवरस्टोरी बनती थी। क्या पत्रकार याद करेंगे कि कभी बुंदेलखंड के अपहरण भी आमुख कथा का विषय होते थे। क्या पत्रकार याद करेंगे कि देश की इकलौती ध्रुपद गायिका असगरीबाई के बीड़ी बनाकर गुजारा करने की खबरों के छपने पर उन्हें पद्मश्री से विभूषित किया गया था।

क्या पत्रकार याद करेंगे कि कभी राजस्थान में बाल विवाह को मानने के लिए बेटी को मजबूर करने पर मंत्री को पद छोड़ना पड़ा था, क्योंकि मीडिया ने उसे प्रमुखता दी थी। क्या पत्रकार याद करेंगे कि दिवराला के सती कांड के बाद मीडिया के ग़ुस्से ने ही सती निरोधक नए कानून के लिए सरकार को मजबूर कर दिया था। आखिर कितनी घटनाएँ याद दिलाऊँ? क्या अचानक हिंदुस्तान में राम राज्य आ गया है? क्या अचानक हमारे सारे दुःख हवा हो गए हैं? क्या अब भारतीय समाज से सारी विसंगतियाँ, विद्रूपताएँ, असमानता, अत्याचार और व्यवस्था को निशाने पर लेने वाले मुद्दे दूर कहीं यूरोप या अमेरिका में जाकर बैठ गए हैं?

सरोकारों से मुँह मोड़ना मीडिया को बहुत महंगा पड़ेगा। एक ऐसे रोबोटिक पत्रकार की रचना करना कितना जायज होगा, जो सिर्फ़ अप मार्केट खबरों से रिश्ता रखता हो। आज की तथाकथित 'डाउन मार्केट' हिंदुस्तानी खबरें यानी आंचलिक खबरें उसे उद्वेलित न करती हों। व्यवस्था की आलोचना करने वाला भाव कहीं दम तोड़ चुका हो तो यकीन मानिए देश से लोकतंत्र को बिखरते देर नहीं लगेगी। इसे गहराई से समझिए मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: यह भारतीय कानून का पुलिस-प्रशासन और सियासत के लिए फरमाइशी चेहरा है

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'गुप्ता बंधुओं की ‘कोर्ट’ मैरिज पर सीएम को लेकर कही गई ये बात अच्छी नहीं लगी'

उत्तराखंड के औली में होने जा रही है 200 करोड़ रुपए की शाही शादी

Last Modified:
Wednesday, 19 June, 2019
Umesh Kumar

उमेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार।।

‘सुना है कि सीएम साहब भी शादी में आने वाले हैं।’ ‘हां, हां। जो जूते सालियां चुराएंगी, उनको लाने का जिम्मा गुप्ता बंधुओं ने राज्य के कई जिम्मेदार लोगों को ही सौंपा है!’ नाम नहीं लेना चाहूँगा। उत्तराखंड हाई कोर्ट के बाहर चाय पर 200 करोड़ रुपए की बहुचर्चित शादी को लेकर चर्चा चल रही थी। जितनी मुंह,उतनी बातें। मैं खामोशी से सबकी बात सुन रहा था। मन उन केसों में उलझा हुआ था, जो रावत सरकार ने मेरे खिलाफ किए हैं। वही सीएम और उनके करीबियों के खिलाफ स्टिंग ऑपरेशन का मसला। हाई कोर्ट में मेरे केस की लगातार सुनवाई हो रही है। उसी सिलसिले में मैं हाई कोर्ट पहुंचा था। अपने वकील का इंतजार करते हुए शाही शादी को लेकर लोगों की राय सुन रहा था। सीएम को लेकर कही गई आखिरी बात मुझे अच्छी नहीं लगी।

‘अरे भाई, अपने राज्य के मुख्यमंत्री के बारे में तो इस तरह न बोलो’। ‘उमेश भाई, आप भी गजब करते हो। जो सीएम सीधे-सीधे गुप्ता ब्रदर्स के हाथों में औली को गिरवी रख रहा है। तमाम कायदे कानून को ताक पर रखकर औली में शाही शादी करा रहा है, उसके बारे में आप ही बताओ और क्या कहा जाए?’

‘बात आपकी ठीक है बंधु, लेकिन सीएम साहब का सम्मान’, सीएम के खिलाफ मोर्चा खोले उस वकील ने मेरी बात पूरी भी नहीं होने दी। बीच में ही शाही शादी को लेकर हाई कोर्ट के आदेश को ले आया। बोला, ‘हाई कोर्ट ने किया है न सीएम का सम्मान! कैसी जबरदस्त फटकार लगाई है रावत सरकार को। मैं तो कहता हूं कि कुछ दिनों के लिए हाई कोर्ट को ही राज्य का जिम्मा सौंप दिया जाए। रावत सरकार के सब कल-पुर्जे अदालत टाइट कर देगी।’

यहां आपको बता दूं कि गुप्ता ब्रदर्स के बेटों की हाईप्रोफाइल शादी को लेकर हाई कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने औली में शादी समारोह के लिए बनाये गये 8 हैलीपैड के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। इन हैलीपैड का इस्तेमाल वो 200 हेलीकॉप्टर करने वाले थे, जो गुप्ता ब्रदर्स के मेहमानों को लाने-ले जाने के लिए तैनात किये गये हैं। हाई कोर्ट ने पर्यावरण को पहुंचने वाली क्षति की भरपाई और औली की साफ सफाई के लिए गुप्ता ब्रदर्स को 5 करोड़ रुपए जमा करने का भी आदेश दिया है।

हाईकोर्ट ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इस शादी पर नजर रखने के लिए कहा है और ये रिपोर्ट देने के लिए कहा है कि इस आयोजन से पर्यावरण को अब तक कितना नुकसान पहुंचा है और पूरे शादी समारोह से कितना नुकसान पहुंच सकता है। दूसरी तरफ 200 करोड़ की कथित शादी को लेकर हाई कोर्ट ने रावत सरकार को फटकार लगाते हुए पूछा है कि जब कोर्ट ने बुग्यालों में इस तरह के शादी समारोहों पर रोक लगा रखी है, तब फिर कैसे सरकार ने औली में इस हाई प्रोफाइल शादी की इजाजत दे दी?

‘उमेश भाई, ये हाई कोर्ट ही है जो इस रावत सरकार से राज्य को बचाए हुए है। वरना त्रिवेंद्र सिंह रावत की चलती तो ये अब तक पूरे राज्य को बरबाद कर चुके होते।’ ‘यहां जंगल में आग लगी हुई है। पहाड़ का तापमान मैदान को मात देने पर तुला हुआ है। बदरीनाथ-केदारनाथ रोड पर भयानक जाम लगा हुआ है। पेट्रोल नहीं मिल रहा है, लेकिन त्रिवेंद्र रावत पर कोई फर्क नहीं। सब कुछ भुलाकर अपने गुप्ता ब्रदर्स की खातिरदारी में जुटे हैं!!’ ‘अब जो कुछ उम्मीद है, वो कोर्ट से ही है।’

चाय के ढाबे पर कुछ इसी अंदाज में चर्चा चलती रही। मैं चुपचाप सुनता रहा। पूरे राज्य में इस वक्त गुप्ता ब्रदर्स की शाही शादी की ही चर्चा हो रही है। 200 करोड़ से ज्यादा की शादी! मेहमानों को लाने-ले जाने के लिए 200 हेलीकॉप्टर! हाईप्रोफाइल गेस्टों की लंबी लिस्ट। राज्य सरकार की तरफ से दावा किया जा रहा है कि इस शादी से राज्य को फायदा होगा। बड़े-बड़े लोग शादी के लिए उत्तराखंड आएंगे। स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा, लेकिन चर्चा में शामिल ज्यादातर लोगों की राय कुछ और थी।

‘असली कमाई तो बाहर वाले करेंगे। स्विटजरलैंड का वो नर्सरी मालिक कितना खुश होगा, जिससे गुप्ता ब्रदर्स 5 करोड़ के फूल खरीद रहे हैं।’ ‘और शामियाना, पंडाल, खाने-पीने के सब आइटम तो बाहरवालों के हैं। लोकल लोगों के हिस्से क्या?’ ‘500 रुपये रोज की दिहाड़ी। एक मजदूर का यही रेट तय हुआ है।’‘बोल देना सब लेबर एडवांस ले लेंगे। गुप्ता ब्रदर्स के बारे में मशहूर है कि दक्षिण अफ्रीका में अपने सिक्योरिटी गॉर्डस का भी पैसा मारकर वहां से फरार हुए हैं।’

उम्मीद के विपरीत लोग गुप्ता ब्रदर्स को लेकर काफी अपडेट दिखे। कई लोग गूगल खोलकर गुप्ता ब्रदर्स की हिस्ट्री खंगाल रहे थे। वहीं से उन्हें जानकारी मिली थी कि गुप्ता ब्रदर्स पर ये भी आरोप है कि इन्होंने दक्षिण अफ्रीका के अपने निजी सुरक्षाकर्मियों की भी सैलरी नहीं दी और अब ये वहां से फरार होकर दुबई में रह रहे हैं।

गौरतलब है कि गुप्ता ब्रदर्स-अजय गुप्ता, अतुल गुप्ता और राजेश उर्फ टोनी गुप्ता मूलरूप से पश्चिमी यूपी के सहारनपुर के हैं और ये लोग कारोबार के लिए 1994 में दक्षिण अफ्रीका गए। वहां पर उन्होंने सत्ता और अधिकारियों के साथ ऐसा गठजोड़ कायम किया कि दक्षिण अफ्रीका का पूर्व राष्ट्रपति जैकब जुमा भी उनकी जेब में रहने लगा। गुप्ता ब्रदर्स के बारे में यहां तक कहा जाने लगा कि सत्ता का चेहरा बेशक जैकब जुमा हैं, लेकिन शासन असल में यही गुप्ता ब्रदर्स चलाते हैं।

गुप्ता बंधुओं के खिलाफ मार्च 2018 में अचानक तब हवा बहने लगी, जब देश के पूर्व उप वित्त मंत्री मसोबीसी जोनास ने दावा किया कि गुप्ता बंधुओं ने फाइनेंस मिनिस्टर को पद से हटाने के लिए सौदेबाजी की है। जोनास के बयान के बाद वहां भूचाल आ गया, क्योंकि जैकब जुमा और गुप्ता बंधुओं के बीच पहले से साठगांठ की खबर आ रही थी। जो बात दक्षिण अफ्रीका में दबी जुबां में कही जाती थी, वो बात जोनास ने खुलकर कह दी और इसी के बाद पूरे देश में जैकब जुमा और गुप्ता ब्रदर्स के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। गुप्ता ब्रदर्स की गिरफ्तारी और उनकी अकूत संपत्ति जब्त करने की मांग होने लगी। माहौल खराब देखकर गुप्ता ब्रदर्स दक्षिण अफ्रीका से फरार होकर दुबई पहुंच गये। उनके खिलाफ इंटरपोल का रेड कॉर्नर नोटिस तक जारी हुआ।

दूसरी तरफ दक्षिण अफ्रीका के स्टॉक एक्सचेंज और वहां के स्थानीय बैंकों ने गुप्ता बंधुओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए उनकी कई संपत्तियों को जब्त कर लिया। इनकी संपत्ति का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि साल 2016 में अतुल गुप्ता दक्षिण अफ्रीका के सबसे अमीर अश्वेत बन गए थे। तब उनकी संपत्ति करीब 55 अरब रुपए बताई गई थी। ये बस एक भाई की दौलत है। बाकी दोनों भाइयों का अलग है ।

अब इन्हीं गुप्ता बंधुओं में से अजय गुप्ता और अतुल गुप्ता के बेटों की शादी उत्तराखंड के औली में होने जा रही है। पहली शादी अजय गुप्ता के बेटे सूर्यकांत की है। दूसरी शादी अतुल गुप्ता के बेटे शशांक की है। दोनों शादी के लिए पांच करोड़ रुपए के फूल स्विटजरलैंड से मंगाये जा रहे हैं, वहीं मेहमानों को औली तक लाने-ले जाने के लिए करीब 200 हेलीकॉप्टर किराए पर लिए गए हैं। इस शादी के लिए 100 पंडित बुक किए गए हैं । शादी का कार्ड चांदी से बना है, जिसका वजन करीब साढ़े 4 किलो है। इस पूरी शादी पर करीब 200 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है।

राज्य सरकार की दलील है कि ऐसी हाईप्रोफाइल शादी से राज्य को कमाई होगी लेकिन जोशीमठ के प्रकाश रावत की राय कुछ और दिखी। उनका कहना है, ‘आप ही बताइए कि इस शादी से उत्तराखंड का कैसे भला होगा? गुप्ता ब्रदर्स ने कोर्ट में कहा है कि उन्होंने शादी के लिए स्थानीय प्रशासन को 30 लाख रुपए दिए हैं, लेकिन जरा ये सोचिए कि इस शादी से औली में नुकसान कितना होगा? पर्यावरण का क्या होगा?’

दो दिन पहले जोशीमठ गया था, तब कई लोगों के मुंह से ऐसी ही बातें सुनने को मिलीं। दरअसल इस शाही शादी से पर्यावरण को जो नुकसान पहुंच रहा है, उससे स्थानीय लोग खासे नाराज हैं। इसके अलावा इस शादी की वजह से स्थानीय लोगों के सामान्य कामकाज प्रभावित हुए हैं, जिससे वो नाराज हैं। स्थानीय लोगों की नाराजगी की खबर शायद गुप्ता ब्रदर्स तक भी पहुंच चुकी है। यही वजह है कि वो स्थानीय लोगों की नाराजगी दूर करने में जुटे हैं।

औली में जहां शादी हो रही है, उसी से सटा है सुनील गांव। सोमवार को गुप्ता ब्रदर्स की तरफ इस गांव के सभी लोगों को भोज दिया गया। शादी समारोह के दौरान भी भोज का वादा किया गया है। खबर यहां तक है कि समारोह के दौरान पूरे औली में गुप्ता ब्रदर्स की तरफ से मुफ्त चाय-नाश्ता का प्रबंध रहेगा और औली में लगने वाले हाईप्रोफाइल ग्रामीण हॉट और स्टॉल में बिकने वाला सामान स्थानीय लोगों और मेहमानों को फ्री में मिलेगा। उसी सुनील गांव का एक युवक कल मुझसे टकाराया था।

युवक का कहना था, ‘ये गुप्ता ब्रदर्स गांववालों को एक टाइम का फ्री खाना खिलाकर आखिर क्या साबित करना चाहते हैं? पहाड़ हमारे, नदी हमारी, औली हमारा। जब वो अपने बेटों की शादी में इसका इस्तेमाल कर रहे हैं तो इसकी वाजिब कीमत चुकाएं। स्थानीय लोगों को कमाई का मौका दें। क्या आप सोच सकते हैं कि केवल 30 लाख रुपए में औली जैसी जगह उन्हें दुनिया के किसी कोने में मिल सकती थी?’

गौरतलब है कि बीजेपी की फायरब्रैंड नेता उमा भारती भी इस शाही शादी को लेकर अपनी नाराजगी जता चुकी हैं। राज्य में बीजेपी की ही सरकार है, इसके बावजूद उन्होंने कहा, ’भारत में अमीर और गरीब के बीच गहरी खाई है। अभी जोशीमठ जैसी जगह पर जहां पेयजल का घोर संकट है और आसपास के गांवों में गरीबी फैली हुई है, वहां ऐसी शादी गरीबों का अपमान है। यह शादी अमीर और गरीब की खाई को और गहरा कर देगी। शादी में इस तरह के खर्चों की वजह से ही माओवाद और नक्सलवाद पैदा हुआ है।’

जोशीमठ नगरपालिका अध्यक्ष शैलेंद्र पंवार उमा भारती की बात को आगे बढ़ाते हैं, ‘ये गुप्ता ब्रदर्स तो शादी के बाद यहां से चले जाएंगे। पीछे छोड़ जाएंगे ढेर सारा कचरा। उसे साफ कराने का जिम्मा नगरपालिका के मत्थे। राज्य सरकार ने इतनी बड़ी शादी को लेकर न तो पहले से कोई सूचना दी, न ही कोई प्लानिंग की है। सारे कायदे कानून को ताक पर रखकर गुप्ता ब्रदर्स को शादी की इजाजत मिली है।’

त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार के लिए ये कोई नई बात नहीं हैं। जब से त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री बने हैं, तब से वो इसी अंदाज में शासन चला रहे हैं। कई मामलों में दिखा है कि संवैधानिक कायदे-कानून उनके लिए खास मायने नहीं रखते हैं। वो अपना खुद का कायदा कानून तय करते हैं। पिछले दिनों देहरादून में जिस आईजी की गाड़ी का इस्तेमाल चोरी में हुआ था, उन आईजी साहब के खिलाफ अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। मेरे मामले में रावत सरकार की जमकर किरकिरी हो रही है, लेकिन हाई कोर्ट में भी वो अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। जो लोग अपनी काली करतूतों के साथ मेरी टीम के कैमरे में कैद हुए हैं, कायदे से उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन रावत सरकार ने उन सबको सरकारी गवाह बना दिया है!

‘उमेश सर, हाई कोर्ट में आपके मामले की जो सुनवाई चल रही है, उस पर आपका क्या कहना है?’ उत्तराखंड के एक लोकल चैनल का रिपोर्टर मेरे सामने खड़ा था। उसके सवालों से मैं अपने ख्यालों से बाहर निकला। ‘मेरे केस की छोड़ो, ये बताओ गुप्ता ब्रदर्स की शाही शादी को लेकर क्या अपडेट है?’ इस पर इस रिपोर्टर ने कहा, ‘हाई कोर्ट में मामले की सुनवाई चल रही है सर। आपके केस की तरह इस मामले में भी रावत सरकार बैकफुट पर है।’

उस रिपोर्टर की तरह मुझे भी हाई कोर्ट के फैसले का इंतजार है। अपने केस को लेकर भी, गुप्ता ब्रदर्स की शाही शादी को लेकर भी।

गुप्ता बंधुआ पर आरोप:

1: साउथ अफ्रीका के सभी बड़े बैंकों ने गुप्ता फ़ैमिली के सभी खाते बंद कर दिए थे।

2: आरोप यहाँ तक हैं (जिनकी जाँच चल रही है) कि ग्रामीण डेरी विकास के लिए लिए लिये गए फंड्स को भी गुप्ता बंधुओं ने अपनी एक ऐसी ही 200 करोड़ वाली शादी में लगा डाला।

3: साउथ अफ्रीका द्वारा एक आयोग का गठन किया गया है, जो अब इनके द्वारा किए गए काले कारनामों की जाँच कर रहा है। इसके सामने गुप्ता बंधुओं को पेश होना है।

4: ब्रिटेन के एक अखबार द्वारा ये भी खुलासा किया गया था कि गुप्ता बंधुओं द्वारा जो कालाधन साउथ अफ़्रीका से बाहर भेजा गया है, उसकी जाँच अमेरिका की सबसे बड़ी एजेंसी FBI भी कर रही है। वॉशिंगटन पोस्ट के हवाले से एक खबर ये भी आयी थी कि कनाडा के आयात-निर्यात बैंक द्वारा लोन पर लिया गया प्लेन नम्बर sporting tail number ZS-OAK, Canada गुम हो गया है यानी गुप्ता बंधुओं ने गायब कर दिया है। खबर के लिए क्लिक करें।

5: साउथ अफ्रीका की सबसे बड़ी जाँच एजेंसी HAWK ने गुप्ता बंधुओं के साउथ अफ्रीका वाले घर पर रेड की, लेकिन गुप्ता बंधु समय उससे पहले ही रफूचक्कर हो चुके थे।

6: गुप्ता बंधुओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते साउथ अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा को अपने पद से हाथ धोना पड़ा।

आप धन्य है त्रिवेंद्र जी।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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वरिष्ठ पत्रकार टीपी पाण्डेय बोले, उल्टा पड़ चुका है इमरान खान का ये दांव

आजादी के बाद से अब तक के सबसे घनघोर राजनीतिक और आर्थिक संकट का शिकार है पाकिस्तान

Last Modified:
Wednesday, 19 June, 2019
TP PANDEY

टीपी पाण्डेय, वरिष्ठ पत्रकार।।

मोहम्मद अली जिन्ना का पाकिस्तान आजादी के बाद से अब तक के सबसे घनघोर राजनीतिक और आर्थिक संकट का शिकार है। 11 जून को मुल्क का आम बजट आने से पहले यहां रुपए के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की कीमत 146 तक पहुंच गई थी, जो बजट आने के बाद 150 को पार गई है। जाहिर है कि पाकिस्तान का ये बजट एक प्रकार से ‘अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष’ (आईएमएफ) की निगरानी में बना है, लेकिन इस बजट के बाद से पाकिस्तान की जनता खून के आंसू रो रही है।

तेल,घी और खाने-पीने की बुनियादी चीजों की कीमत आसमान को छू गई है। इतनी महंगाई है कि लोगों को आटे-दाल के लाले पड़ चुके हैं। मटन तो खाने लायक रहा ही नहीं, क्योंकि इस पर 16 फीसदी सेल्स टैक्स लगा दिया गया है। मीट व्यापारी तो यहां तक कह रहे हैं कि उन्हें अब ये काम बंद करके कोई दूसरा काम-धंधा शुरू करना पड़ेगा। पाकिस्तानी अवाम अपने हुक्मरानों के आगे सिर पटक-पटककर रो रही है। पाकिस्तान का ये बजट अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुलाजिम रह चुके डॉक्टर हफीज शेख और उनकी टीम ने बनाया है। सबसे बड़ी बात है कि इस बजट में पाकिस्तान के किसी भी इकॉनोमिस्ट की कोई राय नहीं ली गई। उन्हें किसी मीटिंग में नहीं बुलाया गया।

इस बजट के बाद प्रधानमंत्री इमरान पर चौतरफा हमले हो रहे हैं। दूसरी ओर इमरान और उनकी पार्टी तहरीके इंसाफ को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा और वे लगातार उल्टे-सीधे फैसले कर रहे हैं। इमरान खान जेहनी दबाव में आ चुके हैं। पाकिस्तान की फौज की चाकरी कर रहे इमरान पाकिस्तान को संभाल नहीं पा रहे। बजट के बाद सड़कों पर राजनीतिक पार्टियों के लोग प्रदर्शन और नारेबाजी न करें, इसका बंदोबस्त इमरान की सरकार ने पहले ही कर लिया था। मुल्क के पूर्व प्रधानमंत्री मियां मोहम्मद नवाज शरीफ तो पहले से ही लाहौर की जेल में बंद हैं, मगर बजट से पहले सरकार ने फर्जी खातों और धोखाधड़ी के केस में पूर्व राष्ट्रपति आसिफ जरदारी को भी जेल में ठूंस दिया। इसके कुछ दिन बाद नवाज शरीफ के भतीजे हमजा शहबाज को भी जेल में डाल दिया गया। आरोप है कि किसी जमाने में महीने में 20 हजार कमाने वाले हमजा की संपत्तियां अरबों में पहुंच गईं।

ये सिलसिला जारी रखते हुए आसिफ जरदारी की बहन फरयाल तालपुर को भी नेशनल अकाउंटेबिलिटी ब्यूरो (NAB) ने गिरफ्तार कर लिया। अभी खबर ये भी है कि पाकिस्तान के सिंध प्रांत के मुख्यमंत्री मुराद अली शाह के अलावा जरदारी साहब के कुछ और भी समर्थक जेल भेजे जा सकते हैं। अब पाकिस्तान की फौज का ड्रामा देखिए। पहले उसने एक खबर फैलाई कि वो देश की बदहाल आर्थिक स्थिति को देखते हुए अपना बजट नहीं बढ़ाएगी। फौज के प्रवक्ता आसिफ गफूर ने कहा कि हमारे पास इतनी ताकत है कि हम अपने वर्तमान असलहे से दुश्मनों का मुकाबला कर सकते हैं, मगर बाद में पता ये चला कि फौज ने चुपचाप अपना बजट बढ़ा लिया। पाकिस्तान की फौज अपने देश के नागरिकों में लगातार ये संदेश देती रही है कि अवाम की असली हमदर्द वही है और डेमोक्रेटिक सरकार उनके हितों की रक्षा नहीं कर सकती है। पाकिस्तान जिस कदर अंदरूनी और बाहरी मुश्किलात से दोचार है, उसे लेकर भी कौम से लगातार झूठ बोला जा रहा है।

पाकिस्तानी फौज ये संदेश देने की कोशिश कर रही है कि देश में सब-कुछ सामान्य है और इमरान की सरकार उसके साथ तालमेल बिठाकर चल रही है, जो कि बिल्कुल गलत है। अगर ऐसा है तो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं, पश्तूनों का आंदोलन तेज क्यों हो रहा है। कराची और सिंध में मोहाजिरों और हिंदुओं पर हमले क्यों हो रहे हैं। इतना ही नहीं, हिंदुओं की लड़कियों को अगवा क्यों किया जा रहा है। फौज के मुताबिक सब-कुछ सामान्य है तो फिर पाकिस्तान के लाखों वकील इन दिनों सड़कों पर क्यों उतरे हुए हैं। इस अराजकता के पीछे भी पाकिस्तान की फौज है। ये फौज पाकिस्तान में आग लगाकर तमाशा देखती है।

आपको याद होगा कि पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने जिस प्रकार सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जज इफ्तिखार चौधरी को जेल में डाला था, उसके बाद से पाकिस्तान बुरी तरह हिल उठा। बाद में इसकी कीमत परवेज मुशर्रफ को चुकानी पड़ी। आजकल वो देश से भागकर दुबई में निर्वासित जीवन जी रहे हैं। फिलवक्त जो हालात हैं, उसमें फौज के निशाने पर सुप्रीम कोर्ट के जज काजी फैज ईसा हैं। दिलचस्प बात ये है कि मुशर्रफ के वक्त सुप्रीम कोर्ट के जज इफ्तिखार चौधरी और वर्तमान जस्टिस काजी फैज ईसा दोनों का ताल्लुक पाकिस्तान के अशांत बलूचिस्तान प्रांत से है।

पाकिस्तान की फौज जस्टिस काजी ईसा से नाराज है,क्योंकि बलूचिस्तान में लापता व्यक्तियों के एक केस में वो फौज को फटकार लगा चुके हैं, लेकिन ये पाकिस्तान की फौज है, जिसे किसी जस्टिस की फटकार पसंद नहीं आती। ये पाकिस्तानी फौज बलूचिस्तान में अब तक हजारों युवाओं,महिलाओं और बच्चों को गद्दारी के इल्जाम में मार चुकी है। इससे बदला लेने के लिए फौज ने जस्टिस काजी के खिलाफ जबरन आय से अधिक संपत्ति का एक केस बनाया, जो कि अदालत में विचाराधीन है और इस काम में इमरान सरकार ने उनकी मदद की है।

इमरान का कहना है चाहे जज ही क्यों न हो, उस पर भी भ्रष्टाचार के मामले में पूछताछ हो सकती है, लेकिन देशभर के वकीलों का कहना है कि ये केस बदनीयती से बनाया गया और जज साहब को फंसाने की कोशिश है। हाल ये है कि इस्लामाबाद की सड़कों पर वकीलों के गुस्से का लावा फूट पड़ा है। जाहिर है कि इमरान को कमजोर करने के लिए फौज ने ये चाल चल दी है। इमरान ने ये सोचा था कि जरदारी, उनकी बहन फरयाल तालपुर और हमजा शहबाज को गिरफ्तार करके बजट से नाराज अवाम के गुस्से से बचा जा सकेगा, मगर उनका ये दांव अब उल्टा पड़ चुका है। क्योंकि फौज के इशारे पर जस्टिस काजी ईसा के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति देकर इमरान ने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है।

जून की तपती गर्मी में इस्लामाबाद और लाहौर की सड़कों पर वकीलों का आंदोलन ज़ोर पकड़ रहा है। इमरान सरकार को भारत ने भी ठेंगा दिखा दिया है। बिश्केक यानी शंघाई सहयोग संगठन में भी इमरान से हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी से केवल शिष्टाचार भेंट हुई, लेकिन कोई बात नहीं हुई। पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत पाकिस्तान को कोई स्पेस नहीं देना चाहता। भारत साफ कर चुका है कि धमाकों के साथ बात नहीं हो सकती। यानी विदेशी मोर्चे पर भी इमरान को मुंह की खानी पड़ी है। ओआईसी यानि इस्लामी सहयोग संगठन में भी पाकिस्तान को बेइज्जत होना पड़ा। अब चीन भी उससे दूरियां बना रहा है। इस बीच खबर ये भी है कि आसिफ जरदारी के साहबजादे और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी और नवाज शरीफ की बेटी मरियम नवाज सफदर की मुलाकातों का दौर जारी है।

दिलचस्प बात ये है कि दोनों के ही पिता जेल में बंद हैं। दोनों ही इमरान सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं, मगर पाकिस्तान के पीएम इमरान का कहना है कि ये दोनों पाकिस्तान के मुश्किल हालात से बाहर निकालने के लिए नहीं, बल्कि मिलकर सत्ता की मलाई चाटने का ख्वाब देख रहे हैं। पिछले दिनों राष्ट्र के नाम रात 12 बजे दिए गए संदेश में इमरान ने यहां तक कह डाला कि चाहे उनकी जान चली जाए, मगर वो देश को लूटने वाले सियासतदानों को छोड़ेंगे नहीं। उनका इशारा नवाज शरीफ और जरदारी खानदान की ओर था। दूसरी ओर बिलावल और मरियम का आरोप है कि इमरान सरकार एहतसाब (हिसाब-किताब) करने की आड़ में इंतकाम (प्रतिशोध) की सियासत कर रही है। कहावत है कि नफरत की लड़ाई किसी अंजाम तक नहीं पहुंचती। अब देखना ये है कि आने वाले दिनों में पाकिस्तान की सियासत का ऊंट किस करवट बैठता है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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पूरन डावर ने उठाया सवाल- आखिर कौन जिम्मेदार है उद्योगों की दुर्दशा का

मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर में गिरावट थम नहीं रही, सरकार लगातार अनेको अनूठी योजनाएं-मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप, मुद्रा योजना जैसे उपायों में जुटी हुई है

Last Modified:
Monday, 17 June, 2019

पूरन डावर

मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर में गिरावट थम नहीं रही, सरकार लगातार अनेको अनूठी योजनाएं-मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप, मुद्रा योजना जैसे उपायों में जुटी हुई है। सरकार की प्रतिबद्धता लगातार स्किल डिवेलपमेंट के क्षेत्र में  प्रयास, अलग से कौशल विकास मंत्रालय के साथ एमएसएमई, एचआरडी, उद्योग मंत्रालय सभी के अथक प्रयासों से नजर आ रही है, पर उधर अमेरिका चीन ट्रेड वार के कारण बढ़ती सम्भवनाएं, अथाह विश्व बाज़ार में बढ़ती हुयी देश की मांग। अकेले अमेरिका विश्व के उपभोक्ता बाज़ार में 24% हिस्सेदारी रखता है। भारत को विश्व की उत्पादन फ़ैक्टरी के रूप में देख रहा है, भारत में चीन का विकल्प तलाश रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को नए भारत के रूप में पेश किया है, साख बनाने के प्रयास किये है। जिस देश को मात्र ताजमहल के नाम से जाना जाता था, अब 5 साल में विश्व की सर्वाधिक उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में देखा जाने लगा है अपना ये देश।

विश्व के विकास की परिकल्पना भी करें। विकास की गति ऊपर से नीचे की ओर आ रही ही, चीन के बाद हमारी बारी है। कुछ समय पहले लगता था कि हमारी बारी कहीं खो न दें लेकिन अब उम्मीद लगने लगी है बारी नहीं जायेगी।

उद्यमियो, सरकार और विशेषतौर पर देश की नौकरशाही जिस पर सारा नियमन एवं प्रबंधन है। ऐसे मे बहुत अहम है कि सबको मानसिकता में बदलाव लाना होगा।

उद्यमियों को सरकार से अपनी अपेक्षाओ को सीमित करना होगा, अपने मस्तिष्क में स्पष्ट भरना होगा उद्योग उद्यमी बनाते है न कि सरकार। उद्योग बैसाखियो पर नहीं चल सकते। मात्र सब्सिडी पर आधारित उद्योग घातक हैं। उद्योग लगाने से पूर्व उसकी व्यवहारता को समझना ज़रूरी है।

 उद्यमियो को ‘बॉटम लाइन’ के बजाय ‘टॉप लाइन’ पर ध्यान  देना होगा। अपनी सोच बड़ी करनी होगी, लाभ में भी पारदर्शिता लानी होगी। यह तय करना है कि आप 200 रुपये का व्यापार कर 100 रुपये कमाने से संतुष्ट होते है या फिर 2000 रुपये का व्यापार कर 200 रुपये कमाकर। 100 रुपये की स्थिति आरामदायक हो सकती है लेकिन ऐसी मानसिकता के साथ आप आगे नहीं बढ़ सकते।

देश को आवश्यकता रोज़गार की है। आपको बड़ी छलांग लगानी होगी। आप तकनीक की ओर नहीं बढ सकते जब तक कि आप बड़ा टर्नओवर न करें। आप 1 करोड़ का व्यापार कर 20 लाख कमा सकते हैं। 20 लाख कमाकर आप मारुति ख़रीद सकते हैं मर्सेडीज़ नहीं। 10 करोड़ से 50 लाख भी कमायेंगे तो बढ़ते टर्नओवर से आप एडवांस्ड तकनीक भी ख़रीद सकते हैं।

उद्योगों को सतत विकास के लिये आवश्यक पर्यावरण से लेकर, सामाजिक सुरक्षा, औद्योगिक सुरक्षा, अग्नि सुरक्षा, विद्युत सुरक्षा, श्रम नियमो का यथासंभव पालन ही आपको आगे ले जा सकते हैं..

अपने निवेश को रियलस्टेट से हटा कर उद्योगों में लगाना होगा। उद्योगों की दर को धकेलने में रियलस्टेट का बड़ा हाथ है।

नौकरशाही को अनुपालन नियमो का समग्र रूप में पवित्रता से पालन कराना होंगा। बाल की खाल निकालने की प्रवृति के बजाए उपलब्ध संसाधनों और परिस्थितियों के अनुसार अनुपालन में सहयोग कर ही बेहतर भविष्य निर्माण हो सकेगा।

सरकार से सुरक्षित औद्योगिक वातावरण की अपेक्षा है। सही मायने में ‘सिंगल विंडो’  के जरिए सारे अनुपालन होने चाहिए। पर्यावरण, सामाजिक सुरक्षा, विद्युत सुरक्षा, अग्नि सुरक्षा जैसी सुविधायों के लिए स्वतंत्र संस्थाओं द्वारा कार्यान्वयन किया जाए, इसमें सरकार क़तई नहीं हो। नौकरशाही के हटते ही अनुपालन स्वतः हो जाएगा। स्वतंत्र संस्थाएं समयबद्ध तरीक़े से अनुपालन कराएगी।

उद्योगों को बढ़ाना है तो संवेदनशील टीटीज़ेड सहित किसी भी क्षेत्र में उद्योगों पर प्रतिबंध क़तई नहीं लगाना चाहिए। सुदृढ़ पर्यावरण अनुपालन, वायु प्रदूषण एवं डिस्चार्ज मीटर अनिवार्य किए जा सकते हैं जो सीधे विभाग से जुड़े हों।

मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर, बैंकिंग की स्थापना, करदाताओं की सामाजिक सुरक्षा योजनाएं आदि पर फोकस किया जाना चाहिए क्योंकि यदि रोज़गार देने वालों की ही सामाजिक सुरक्षा नहीं होंगी तो श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा कैसे कर पायेंगे।

कौशल विकास को एक आंदोलन के तौर पर शिक्षा का मुख्य भाग बनाना होगा। देश का हर व्यक्ति निपुण हो इसलिएक्लस्टर सेंट्रिक शिक्षा की शुरुआत करनी होगी। लेदर, ओटोमोबाइल, टैक्टाइल जैसे क्षेत्रों के लिए प्रैक्टिकल एजुकेशन, पर्यटन की उत्तम शिक्षा और विशुद्ध ग्रामीण क्षेत्रों में खेती और खेती उत्पादों की शिक्षा आदि की व्यवस्था। शिक्षा को रोजगार का मुख्य भाग बनाने की आवश्यकता है। उद्यमियों को भी मानसिकता बनानी होगी कोई भी कार्य छोटा नहीं है, वही जब पढ़ लिख कर व्यवस्थित रूप से किया जाता है तो एक सफल मॉडल बन जाता है। हलवाई कैटर्स हो जाता है, सफाई-धुलाई वाले होमकीपिंग बन जाने हैं, रसोइया शेफ बन जाता है आदि।

(लेखक स्वयं एक बड़े व सफल उद्यमी रहे हैं)

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‘बाजार के दबाव में आकर डे मनाने वालों के लिये सीख है ये जवाब’

जब मां-बाप अपने बच्चों से हारते हैं तो सही मायने में विजेता होते हैं

Last Modified:
Saturday, 15 June, 2019
Manoj Kumar

मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया विश्लेषक।।

छोटी ही रहना चाहती हूं...पापा

अखबार पढ़ते हुये अचानक नजर पड़ी कि फादर्स डे आना वाला है। फादर्स डे जैसा चलन नए जमाने का है। सही मायनों में यह दिन पिता का दिन नहीं, बल्कि बाजार का दिन है। भारतीय संस्कृति में पिता का दिन अर्थात वह दिन जब उनकी मृत्यु के पश्चात उनकी शांति के लिए तर्पण करते हैं। श्राद्ध पक्ष में यह क्रिया दिवंगत हो चुके परिवार के हर व्यक्तियों के लिए होती है, लेकिन नए जमाने में पिता के इस खास दिन को बिसरा दिया गया है। पिता हो, माता हो, दादा-दादी हो या जीवनसाथी, बाजार ने सबके लिए दिन नियत कर दिया है। यह दिन बाजार के लिए उत्सव का है, लेकिन भारतीय संस्कृति और परम्परा के तर्पण का दिन है। हालांकि इस खराब हालात के बाद भी मेरा भरोसा टूटा नहीं है। छीजा नहीं है।

बदलते समय और स्कूल से कॉलेज जाती बिटिया के मन की बात जान लेना आसान नहीं होता है। कदाचित कुछ भय और कुछ भरोसे के साथ उससे सवाल करने का मन किया। मन में जिज्ञासा थी और लगा कि अपनी बिटिया से पूछूं कि वो इस फादर्स डे पर मेरे लिए अर्थात अपने फादर के लिए क्या करने वाली है। मैंने सहज भाव से पूछ ही लिया कि बेटा, फादर्स डे आने वाला है। तुम अपने फादर अर्थात मेरे लिये क्या करने वाली हो? वह मेरा सवाल सुनकर मुस्करायी और मेरे सामान्य ज्ञान को बढ़ाते हुये कहा कि हां, पापा मुझे पता है कि फादर्स डे आने वाला है। अच्छा आप बताओ कि आप मेरे लिये क्या करने वाले हो? मैंने कहा कि दिन तो मेरे लिए है, फिर मैं क्यों तुम्हारे लिये कुछ करने लगा। तुम्हें मेरे लिये करना चाहिये? इसके बाद हम बाप-बेटी के बीच जो संवाद हुआ, वह एक दार्शनिक संवाद  जरूर था, लेकिन इस तरह बाजार के दबाव में आकर डे मनाने वालों के लिये सीख भी है।

बेटी ने कहा कि पहली बात तो यह कि मैं अभी आपकी इनकम पर अपना भविष्य बना रही हूं और जो कुछ भी करूंगी, आपके जेब से निकाल कर ही करूंगी। ऐसे में आपके लिये कुछ करने का मतलब आपको खुश करने के बजाय दुखी करना होगा, क्योंकि जितने पैसों से मैं आपके लिये उपहार खरीदूंगी, उतने में आप हमारी कुछ जरूरतें पूरी कर सकेंगे। तो इसका मतलब यह है कि जब तुम कमाने लगोगी तो फादर्स डे सेलिब्रेट करोगी। अपने पापा के लिये उपहार खरीदोगी? इस बार भी बिटिया का जवाब अलग ही था। नहीं पापा, मैं चाहे जितनी बड़ी हो जाऊं, जितना कमाने लगूं लेकिन कभी इतनी बड़ी न हो पाऊं कि अपने पापा को उपहार देने की मेरी हैसियत बने। जिस पापा ने अपनी नींद खोकर मेरी परिवरिश की, जिस पापा ने अपनी जरूरतों को कम कर मेरी जरूरतों को पूरा करने में पूरा समय और श्रम लगा दिया, जिस पापा ने मेरे सपनों को अपना सपना मानकर मुझे बड़ा किया, उस पापा को भला मैं क्या दे सकती हूं। और पापा ही क्यों, मम्मी, दादाजी, दादीजी सब तो मिलकर मुझे बनाने की कोशिश कर रहे हैं, फिर भला मैं कैसे आप लोगों के लिये उपहार खरीदने की हिम्मत कर सकती हूं।

बिटिया की बातों को सुनकर मेरी आंखें भर आयीं। मुझे लगा कि मैंने जो कुछ किया, वह निरर्थक नहीं गया। बेटी के भीतर वह सबकुछ मैंने समाहित कर दिया, जो मुझे मेरे पिता से मिला था। मुझे लगा कि फादर्स डे पर इससे अच्छा कोई उपहार हो भी नहीं सकता है। जब मां-बाप अपने बच्चों से हारते हैं तो सही मायने में विजेता होते हैं। हारते हुये माता-पिता को सही मायने में खुशी मिलती है, क्योंकि बच्चों की जीत ही माता-पिता की असली जीत है। हमारे समाज में ये जो डे मनाने का रिवाज चल पड़ा है, यह भारतीय नहीं, बल्कि यूरोपियन देशों की देन है। भौतिक जरूरतों की चीजों में उनके रिश्ते बंधे होते हैं और वे हर रिश्ते को वस्तु से तौलते हैं, लेकिन भारतीय मन भावनाओं की डोर से बंधा होता है। वस्तु हमारे लिये द्वितीयक है, प्रथम भावना होती है और आज मेरी बेटी ने जता दिया कि वह जमाने के साथ दौड़ रही है, लेकिन अपनी संस्कृति और संस्कार को सहेजे हुये। अपनी भावनाओं के साथ, अपने परिजनों की भावनओं की कद्र करते हुये। वह बाजार जाकर कुछ सौ रुपयों के तोहफों से भावनाओं का व्यापार नहीं कर रही है। यह मेरे जैसे पिछड़ी सोच के बाप के लिये अनमोल उपहार है।

भारतीय समाज में भी डे मनाने की पुरातन परमपरा है। हम लोग यूरोपियन की तरह जीवित लोगों के लिये डे का आयोजन नहीं करते हैं, बल्कि उनके हमारे साथ नहीं रहने पर करते हैं। उनकी मृत्यु की तिथि पर उनके पसंद का भोजन गरीबों को खिलाया जाता है, वस्त्र इत्यादि गरीबों में वितरित किया जाता है। यह हम उनकी आत्मा की प्रसन्नता के लिये करते हैं, इसे हम पितृपक्ष कहते हैं। जीते जी हम उन्हें भरपूर सम्मान देते हैं और मरणोपरांत भी उनका स्थान हमारे घर-परिवार के बीच में होता है। दुर्भाग्य से हम यूरोपियन संस्कृति के साथ चल पड़ हैं। सक्षम पिता या माता का डे तो मनाते हैं, लेकिन वृद्ध होते माता-पिता को वृद्वाश्रम पहुंचाने में देर नहीं करते हैं। बाजार जिस तरह अनुपयोगी चीजों की सेल लगाता है या चलन से बाहर कर देता है, वही हालत यूरोपियन समाज में रिश्तों का है, भावनाओं का है। हम भी इसी रास्ते पर चल पड़े हैं। पालकों के पास धन है, साधन है, सक्षम हैं तो दिवस है और नहीं तो उनके लिये दिल तो क्या, घर पर स्थान नहीं है।

मैं अभी भी उम्मीद से हूं कि जो संस्कार मेरे परिवार ने मुझे और मेरे बच्चों को दिए हैं, उन्हें वे सहेज कर रख रहे हैं। मेरा मन उस समय पुलकित हो गया, जब इस पाश्चात्य तर्पण दिवस अर्थात फादर्स डे पर अपनी बिटिया से बात की। मेरी आंखें नम हो गयीं, लेकिन भीतर का पिता गौरवान्वित हो उठा कि बाजार में इतना दम अभी भी नहीं आया है कि वे हमारी परम्परा और संस्कार को खत्म कर दे। हालांकि बाजार का घुन हमारे रीति-रिवाज पर लग गया है, लेकिन भरोसे का एक टिमटिमाता तारा मेरे आसपास है। आपके आसपास भी होगा। तलाश कीजिए आपके बच्चों में भी वही संस्कार हैं, विश्वास है और आपके प्रति भरोसा। थोड़ी कोशिश कीजिए। फादर बनकर जरूरत पूरी करने वाली मशीन बनकर नहीं, बल्कि सात्विक रूप से बाबूजी बनकर बच्चों को समय दीजिए।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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मिस्टर मीडिया: यह भारतीय कानून का पुलिस-प्रशासन और सियासत के लिए फरमाइशी चेहरा है

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की रिपोर्ट में हिन्दुस्तान को प्रेस के नजरिए से लाल खतरे का निशान दिखाया गया है

Last Modified:
Thursday, 13 June, 2019
Rajesh Badal

सुप्रीम कोर्ट में कुतर्क। राज्य सरकार का कुतर्क-प्रशांत कनौजिया का ट्वीट अपमानजनक था। उस ट्वीट पर ग्यारह दिन जेल में। ट्वीट क्या था? एक महिला खुद को मुख्यमंत्री की मित्र बताती है। कैमरे पर संवाददाताओं से कहती है कि उसने मुख्यमंत्री को विवाह प्रस्ताव भेजा है। सार्वजनिक जीवन में राजनेताओं को कभी-कभी इस तरह की अप्रिय स्थितियों का सामना करना पड़ता है। पर इसमें इतना अपमानजनक क्या है,समझ नहीं आया।

उत्तर प्रदेश सरकार बीते चुनाव के दौरान सोशल मीडिया के सभी प्लेटफॉर्म पर की गई टिप्पणियों की जानकारी ले तो पता चलेगा कि उसके ही राज्य में कितनी भद्दी, अश्लील, अपमानजनक और स्तरहीन बातें कही गई हैं। अगर प्रदेश पुलिस को उन टिप्पणियों में कुछ अपमान नहीं दिखाई देता तो इस कथन में तो कुछ अपमानजनक था ही नहीं। एक वयस्क महिला 2019 के भारत में किसी भी बालिग व्यक्ति को विवाह का आमंत्रण भेजने के लिए क्यों स्वतंत्र नहीं है? इसमें अनुचित क्या है? मुख्यमंत्री इस प्रस्ताव को अस्वीकार करने का हक रखते हैं। यह तो उल्टा पुलिस के विरुद्ध महिला अपमान का मामला बनता है।

चिंता का आकार इस मामले से कहीं बहुत बड़ा, विकराल और भयावह है। सत्ता प्रतिष्ठान किस राजनीतिक और सार्वजनिक शुचिता तथा आचरण की बात करते हैं? मीडिया उनके निजी व्यवहार पर कोई टिप्पणी न करे, लेकिन राजनेताओं को यह आजादी कौन सा कानून देता है कि वे अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ ओछी और अपमानजनक भाषा का उपयोग करने में कोई संकोच नहीं करते। मीडिया पर तुगलकी कार्रवाई करते हैं। वे सार्वजनिक तौर पर महिला की लात-घूँसे से पिटाई करते हैं। बदनामी होती है तो बहन बनाने में शर्म का अनुभव तक नहीं करते। जिस पर गुजरात पुलिस को सुओ मोटो (Suo moto) एक्शन लेना था, वह तो हुआ नहीं और उत्तर प्रदेश में महिला का अपमान हो तो समाचार प्रसारित करने पर पत्रकार सीखचों के पीछे कर दिया जाए। यह भारतीय कानून का पुलिस-प्रशासन और सियासत के लिए फरमाइशी चेहरा है।

ज्यादा दिन पुरानी बात नहीं है। दो बरस पहले छत्तीसगढ़ में 14 पत्रकारों को हिरासत में लिया गया था। वरिष्ठ पत्रकार विनोद वर्मा की गिरफ्तारी और उनके परिवार को मानसिक यातना हम कैसे भूल सकते हैं? छत्तीसगढ़ पुलिस को आज तक कोई सुबूत नहीं मिला। 2017 में भारत में दस पत्रकारों की हत्या हुई। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की रिपोर्ट में हिन्दुस्तान को प्रेस के नजरिए से लाल खतरे का निशान दिखाया गया है। तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह के निर्देश पर 20 अक्टूबर को उनके मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था। पर उसका खुद उन राज्यों में ही पालन नहीं हुआ, जहां बीजेपी सरकार थी। इससे पहले 23 मई को भी ऐसे ही निर्देश दिए गए थे। और पीछे जाएं तो एक अप्रैल 2010 को भी गृह मंत्रालय ने यही घड़ियाली अभिनय किया था।

पत्रकारों पर दमनकारी कार्रवाई के चलते पहले अनेक मुख्यमंत्री अपनी बलि चढ़ा चुके हैं। बिहार प्रेस बिल और उसके बाद 1987 का प्रेस कानून सियासी दलों को भूलना नहीं चाहिए। अगर एक बार बर्र के छत्ते में सियासी दल और नेता हाथ डालेंगे तो अंजाम क्या होगा-यह बताने की जरूरत नहीं है। हां, अपने को सावधान और अधिक जिम्मेदार बनाने की आवश्यकता है मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

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'जिस लोकतंत्र ने एक साधारण घर के युवक को CM-PM बनाया, उसके मूल को कुचलना फासीवाद है'

पत्रकारों के खिलाफ यूपी पुलिस की ओर से की गई कार्रवाई निहायत ही निंदनीय है

Last Modified:
Wednesday, 12 June, 2019
Ajay Shukla

अजय शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार।।

बीते कुछ दिनों के दौरान स्वतंत्र और निष्पक्ष काम करने की कोशिश करने वाले पत्रकारों पर हमले हो रहे हैं। सत्ता प्रतिष्ठान लोकतंत्र और लोक संस्थाओं को मजबूत बनाने के बजाय फासीवादी तरीका अपना रहे हैं। प्रशांत कनौजिया सहित जिन चार पत्रकारों को यूपी के मुख्यमंत्री अजय सिंह बिष्ट उर्फ योगी आदित्यनाथ से कथित संबंधों का आरोप लगाने वाली महिला के बयान को चैनल में चलाने और सोशल मीडिया पर प्रसारित करने पर डकैतों की तरह गिरफ्तार किया गया, वह निहायत निंदनीय है।

हम प्रशांत सहित इन चारों पत्रकारों को निजी तौर पर नहीं जानते, मगर उनके खिलाफ हुई पुलिसिया कार्रवाई को पूर्णतः असंवैधानिक एवं लोकतंत्र की हत्या की तरह मानते हैं। एक दिन पहले शामली जिले में एक थानेदार ने समाचार संकलन कर रहे संवाददाता को जिस तरह से मारा-पीटा और अमानवीय यातनायें दीं, वह किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हैं। मर्यादायें सभी के लिए समान होती हैं। निश्चित रूप से उच्च पदों पर बैठे लोगों को मर्यादाओं का कड़ाई से पालन करना चाहिए। मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने प्रजा के लिए मर्यादा का हृदय से निर्वहन किया। प्रजा को अपने खिलाफ बोलने पर दंडित करने के बजाय पत्नी सीता का त्याग किया था। योगी आदित्यनाथ जैसे लोग खुद को राम का अनुयायी बताते हैं, मगर आचरण उनके विपरीत करते हैं।

असल में तो कार्यवाही उस महिला के खिलाफ होनी चाहिए थी, न कि उसकी बात प्रसारित करने वाले पत्रकारों के खिलाफ। आदित्यनाथ खुद को योगी और संत होने का दंभ भरते हैं तो उन्हें समझना चाहिए कि संत कौन है? तुलसीदास ने रामचरित मानस में स्पष्ट लिखा है, ‘संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना॥ निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर सुख द्रवहिं संत सुपुनीता॥’ इसका भावार्थ है, कवियों ने कहा है कि संतों का हृदय मक्खन के समान होता है, परंतु वो सही बात नहीं कह पाये, क्योंकि मक्खन तो खुद पर ताप लगने से पिघलता है, किंतु परम पावन संत दूसरों के दुःख से पिघलते हैं न कि अपने कष्ट से।

हमारे कहने का अभिप्राय यह है कि योगी आदित्यनाथ को अपने राज्य के लोगों के कष्टों को महसूस करके कष्ट होना चाहिए, न कि खुद के हल्के से कष्ट से। बतौर यूपी के राजसत्ता प्रमुख भी उन्हें जनता से सरोकार होना चाहिए और आलोचनाओं को आत्मसात करके सीख लेनी चाहिए। इस वर्ष विश्व प्रेस स्वतंत्रता इंडेक्स में भारत का शर्मनाक स्थान हो गया है। 180 देशों में भारत 140वें स्थान पर पहुंच गया है। हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दम भरते हैं, मगर हमारे सत्ता प्रतिष्ठान ने हालात लोकतंत्र का गला घोंटने जैसे कर दिये हैं। सरकार और उसके तंत्र ने संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खत्म करने का मन बना लिया लगता है।

जिस तरह से पत्रकारों को मौजूदा सरकार में सामान्य सटायर और किसी के आरोप की खबर चलाने पर जेल में डाला जा रहा है। विद्यार्थियों की समस्याओं को लेकर प्रदर्शन करने वाली लड़की पर गैंगेस्टर लगाया जा रहा है। अन्य मनगढ़ंत मुकदमे दर्ज किये जा रहे हैं, वह पत्रकारों को डराने, भय पैदा करने वाला है। इस माहौल के जरिए शायद यह संदेश दिया जा रहा है कि अभी कुछ नहीं किया। आगे अगर हम पर कोई टीका टिप्पणी की तो गला घोंट देंगे या पत्थरों से पीट-पीटकर मार डालेंगे।

योगी आदित्यनाथ शायद लोकतंत्र का अर्थ ही नहीं समझते। निश्चित रूप से उनकी ईमानदारी और चरित्र संदेह के दायरे से बाहर है। यह भी सच है कि एक महिला ने आरोप लगाया, भले ही उसमें सच्चाई कुछ न हो। पत्रकार जज नहीं हो सकते, उनका दायित्व है कि दोनों पक्षों की बात रखें। अपनी और दूसरे की मर्यादा का भी पूरी सावधानी से ध्यान रखें। किसी की मर्यादा भंग नहीं होनी चाहिए। योगीजी सत्ता प्रतिष्ठान की यह महती जिम्मेदारी है कि वह आलोचकों, समीक्षकों, कार्टूनिस्टों और सटायरों का आनंद लें, उनसे सीखने का काम करें।

हमें दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि अब तक यूपी पुलिस और कुछ कथित कट्टरवादियों ने लोकतंत्र को खत्म करने का बीड़ा उठा रखा है। यह लोग गुंडों- बदमाशों की तरह साधारण लोगों अथवा पत्रकारों के साथ व्यवहार कर रहे हैं। जिस लोकतंत्र ने एक साधारण घर के युवक को मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनाया है, उसके मूल को कुचलना फासीवाद है।

दुखद स्थिति पत्रकारों को भी देखकर होती है, क्योंकि वह भी खांचों में बंट गए हैं। कोई भाजपाई, कोई कांग्रेसी और कोई लाल सलामी बन गया है। पत्रकार को सिर्फ पत्रकार रहते हुए ईमानदारी से समीक्षा करनी चाहिए, न कि किसी के निजी जीवन पर हमला करना चाहिए। योगी जी, हृदय बड़ा कीजिए, संतों की तरह। संकुचित मानसिकता मत रखिए और सत्ता के घमंड में मदमस्त मत होइये। जयहिंद।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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इस्लामी देशों के मंच पर पाकिस्तान की फिर बेइज्जती

कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के भाषण को खास तवज्जो नहीं दी गई

Last Modified:
Wednesday, 05 June, 2019
IOC

टीपी पाण्डेय, वरिष्ठ पत्रकार।।

विश्व बिरादरी के बीच अलग-थलग पड़ चुका पाकिस्तान अब भी कश्मीर का राग अलापने से बाज नहीं आ रहा। ये हालत तब है, जब इस्लामी देशों के सम्मेलन आईओसी में पाकिस्तान को इस बार भी बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी। सऊदी अरब के मक्का में आईओसी का 14वां सम्मेलन था, जिसके दो सत्र थे। पहले सत्र में इस्लामी देशों के विदेश मंत्रियों ने आपसी संबंधों के बारे में अपना नज़रिया रखा, जिसमें पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कश्मीर के मुद्दे पर भी प्रमुखता से चर्चा की,मगर इसमें उन्के भाषण को खास तवज्जो नहीं दी गई।

अगले सत्र में सम्मेलन को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने संबोधित किया, जिसमें उन्होंने फिलिस्तीन में इज़रायली ज़्यादतियों के साथ-साथ कश्मीर का बेसुरा राग छेड़ दिया, मगर इसका नतीजा भी सिफर रहा। इमरान के भाषण को सुना तो गया, लेकिन इसके बाद जो प्रस्ताव पारित हुआ, उसमें कश्मीर का कोई ज़िक्र नहीं था। साफ है कि इस्लामी देशों ने कश्मीर पर इमरान की बात को कोई तवज्जो नहीं दी। इस सम्मेलन के बाद बार-बार अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का राग अलापने वाले पाकिस्तान की घनघोर बेइज्जती हुई है।

अंतराष्ट्रीय मंच पर हुई इस बेइज्जती के चलते पाकिस्तान में इमरान की भारी आलोचना हो रही है मीडिया में इस बात की चर्चा गर्म है। पाकिस्तानी मीडिया गहरे सदमे में है कि इस्लामी सहयोग संगठन का हिस्सा होने के बावजूद पाकिस्तान की ऐसी भद्द क्यों पिट रही है। पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार और जियो टीवी के संपादक हामिद मीर ने तो ट्वीट किया, जिसका मज़मून था कि मक्का में पाकिस्तान की शिकस्त। उन्होंने तो यहां तक लिखा कि इतनी बेइज्जती को देखकर मैं चुपचाप सम्मेलन से निकल गया।

इस सम्मेलन में भारतीय पत्रकारों को भी कवरेज के लिए बुलाया गया, जिसके चलते भी पाकिस्तान काफी खफा है। लंदन में रह रहीं पाकिस्तान की महिला एक्टिविस्ट शमाँ जुनेजो ने तो इसे इमरान और पाकिस्तान की विदेश नीति की विफलता करार दिया है। असल में इस्लामी देशों के सहयोग संगठन की स्थापना 25 सितंबर 1969 में मोरक्कों में हुई थी। आपको बता दें कि इस्लामिक सहयोग संगठन का मूल मुद्देश्य फिलिस्तीन की आज़ादी और इस्लामी देशों के बीच परस्पर सहयोग करना था, लेकिन दुनिया में अमेरिका के बढ़ते प्रभाव और अपने नफे-नुकसान को साधने के चक्कर में ये संगठन अपने मूल उद्देश्य से भटक गया।

आज हालत ये है कि अगर टर्की और ईरान को छोड़ दें तो बाकी इस्लामी देश अमेरिका के पिठ्ठू बने हुए हैं और सऊदी अरब इन पिट्ठुओं में सबसे ऊपर है, मगर पाकिस्तान को असली दिक्कत भारत से इसलिए है कि पिछले 1 और 2 मार्च को जेद्दा में हुए इस्लामी सहयोग संगठन की बैठक में अरब देशों की ओर से भारत को भी शामिल होने का निमंत्रण मिला था। इस सम्मेलन की टाइमिंग ऐसी थी कि पाकिस्तान इससे बौखला गया। क्योंकि 14 फरवरी 2019 को पुलवामा में पाकिस्तानपरस्त आतंकी तंजीम जैश-ए-मोहम्मद ने आत्मघाती हमले को अंजाम दिया था। इसलिए पाकिस्तान नहीं चाहता था कि भारत को इस सम्मेलन में आमंत्रित किया जाए मगर हुआ एकदम उल्टा।

इस सम्मेलन में भारत की पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने बहुत ही सारगर्भित भाषण दिया और पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की कड़ी निंदा की,  जिससे पाकिस्तान बुरी तरह चिढ़ गया। हालत यहां तक पहुंच गई थी कि पाकिस्तान ने सुषमा जी को आमंत्रित करने का सख्त विरोध किया और यहां तक कह दिया कि वे सम्मेलन में शामिल नहीं होगा। हालांकि, इसके बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने इसमें शिरकत की, लेकिन उन्होंने सुषमा स्वराज के भाषण का बायकॉट किया। सम्मेलन में सुषमा जी की शिरकत को पाकिस्तान ने अपना अपमान माना।

इस्लामी देशों के सम्मेलन में भारत को निमंत्रण मिलना मोदी सरकार की सशक्त विदेश नीति की कामयाबी है। इसी का असर है कि खुद को इस्लामी बिरादरी का ठेकेदार मानने वाला पाकिस्तान भारत से चिढ़ा हुआ है। इस्लामी देशों के संगठन की इस बेरुखी को पाकिस्तान अभी भूल नहीं पाया था कि एक बार फिर उसे करारी शिकस्त मिली है। पाकिस्तान में इमरान की सख्त आलोचना हो रही है, इसके बावजूद इमरान सऊदी अरब को अपना दोस्त सिर्फ इसलिए मानते हैं क्योंकि ये देश पाकिस्तान की जब-तब थोड़ी बहुत मदद करता रहा है।

याद रहे कि पिछले दिनों सऊदी अरब पहुंचते ही इमरान जब वहां के किंग से मिले तो उन्होंने उनका अपमान भी किया। असल में मक्का में ओआईसी के सम्मेलन में सऊदी अरब के किंग से मुलाक़ात के दौरान इमरान ख़ान का एक विडियो सामने आया, जिसमें वो रेड कार्पेट पर चलते हुए सऊदी अरब के बादशाह सलमान तक पहुंचते हैं और उनसे हाथ मिलाने के बाद कुछ बात करते हैं। हालांकि, जो विडियो फुटेज सामने आया है, उसमें पाकिस्तानी पीएम किंग से सीधे बात न कर ट्रांसलेटर से बात कर रहे हैं। पता चला है कि इसके बाद सऊदी किंग काफी नाराज हैं। इमरान ख़ान हाथ तो किंग सलमान से मिला रहे हैं, लेकिन बात ट्रांसलेटर से कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर शेयर किए गए विडियो में इमरान ख़ान किंग सलमान की तरफ़ देख भी नहीं रहे हैं। यहां तक कि इमरान ख़ान ने किंग सलमान को प्रतिक्रिया में कुछ कहने का भी वक़्त नहीं दिया और वहां से अचानक निकल गए। सोशल मीडिया पर लोगों का कहना है कि इमरान ख़ान ने किंग सलमान का सरासर अपमान किया है और उन्हें राजनयिक शिष्टाचार भी नहीं आता। कई लोग तो सलाह दे रहे हैं कि पाकिस्तान के नेताओं को राजनयिक व्यवहार सीखने की ज़रूरत है। इस घटना से ये माना जा रहा है कि अब सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच दूरियां बढ़ सकती हैं।

असल में सऊदी अरब एक कारोबारी देश है। उसने अगले डेढ़ साल तक पाकिस्तान को कच्चा तेल उधार देने का वादा किया है। पाकिस्तान को अपने मित्र देशों से मदद की जरूरत है, क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था का पूरी तरह जनाजा निकल चुका है। पाकिस्तान को डर है कि इस्लामी देशों से रिश्ते अगर खराब हुए तो उसे भारी नुकसान भुगतना पड़ेगा। वर्तमान में ईरान से उसके रिश्ते बहुत नाज़ुक दौर में हैं और ईरान तो पाकिस्तान का बिरादर मुल्क है। पाकिस्तान से उसकी सीमा सटी हुई है। इमरान घरेलू मोर्चे पर भी बुरी तरह घिरे हुए हैं।

पाकिस्तान की सियासी जमात मुस्लिम लीग (नून) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी इमरान के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है। कराची, बलूचिस्तान और उत्तरी वजीरिस्तान के कबाइली इलाकों में पाकिस्तान सरकार के खिलाफ आंदोलन हो रहे हैं। पश्तूनों पर पाकिस्तानी फौज जुल्म ढा रही है। पिछले दिनों पाकिस्तानी फौज की फायरिंग में 20 पश्तून आंदोलनकारियों की मौत हो गई और कई घायल हो गए। भारत की सख्त कूटनीति के कारण कश्मीर पर भी पाकिस्तान को लगातार पटखनी मिल रही है। जल्द ही पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में सालाना बजट पास किया जाएगा, जिसके बाद उम्मीद है कि महंगाई और बढ़ेगी और फिर वहां की अवाम सड़कों पर उतरेगी। पाकिस्तान में सिविल वॉर के हालात बन रहे हैं। ऐसे में क्या इतिहास खुद को दोहराएगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि पाकिस्तान में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई कोई भी सरकार 5 साल पूरे नहीं नहीं कर सकी है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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मिस्टर मीडिया: ग़ैरज़िम्मेदारी के 3 उदाहरण भारतीय मीडिया के औसत चरित्र को उजार करते हैं

अच्छी पत्रकारिता करने के लिए किसी तरह की प्रतिद्वंद्विता नहीं होती

Last Modified:
Wednesday, 05 June, 2019
Rajesh Badal

हद है। इससे नीचे और कहाँ तक जा सकते हैं? शायद इन दिनों यही होड़ बची है। अच्छी पत्रकारिता करने के लिए प्रतिद्वंद्विता नहीं होती। घटिया से घटिया हरक़तों के ज़रिये अपने आपको निर्वस्त्र दिखाने पर तुले हुए हैं। अपने दिमाग़ों की अश्लील सड़ाँध को सोशल मीडिया पर परोसकर अपनी बदबू फैलाने में शर्म भी महसूस नहीं करते। वैचारिक मीडिया से रिश्ता रखने वाली एक भद्र महिला ने लंदन में अपने एक मित्र से गांधी और नेहरू के समलैंगिक रिश्तों के बारे में सुना। उस सुनी सुनाई बात को मीडिया में विस्तार दे दिया। न मित्र के पास कोई सुबूत और न इन भद्र महिला के पास कोई प्रमाण। चटख़ारे लेने के लिए भारत के दो शिखर पुरुष ही बचे थे? वह भी उस स्थिति में, जब अपने पर लग रहे आरोपों के बारे में क़ैफ़ियत देने के लिए दोनों राष्ट्रनेता इस लोक में नहीं हैं।

मीडिया की ज़िम्मेदारी सभी पक्षों से बात करके किसी तथ्य को पेश करने की होती है। इस मामले में तो सब ताक में रख दिया गया। इन विद्वान महिला ने किसी ज़माने में अपने प्रगतिशील विचारों से हिन्दुस्तान में स्त्री विमर्श को नया मोड़ दिया था। अब उन्हीं के हवाले से यह बेहूदा,अभद्र,अशालीन, अश्लील और अमर्यादित टिप्पणी अत्यंत दुखद है। हज़ारों साल की संस्कृति पर गर्व करने वाले मुल्क़ में अब संस्कारों का इतना अकाल है कि पूर्वजों पर निशाना साधते लाज भी नहीं आती।

सवाल यह है कि एक डंडा-ठोक आचार संहिता हमारे ऊपर क्यों नहीं होनी चाहिए? मीडिया की आज़ादी के नाम पर अपने अश्लील कल्पना लोक की सार्वजनिक नुमाइश आप क्यों करना चाहते हैं? गांधी, नेहरू, आंबेडकर, इंदिरा, राजीव, अटल बिहारी और नरेन्द्र मोदी से लेकर स्मृति ईरानी तक हम किसी को नहीं छोड़ते। उनके कार्यों का मूल्यांकन हम नहीं करना चाहते। हमें सिर्फ़ उनके लैंगिक रिश्तों में आनंद आता है।

दो दिन पहले एक और पढ़ी-लिखी महिला पर गुजरात के एक विधायक ने पाशविक अत्याचार किया। हमने उसकी तस्वीर धड़ल्ले से दिखाई। न केवल दिखाई, बल्कि पहचान भी उजाग़र की। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का भी हमने मख़ौल उड़ाया। क्या मानहानि और मर्यादा के संबंध में बुनियादी क़ानून भी हम नहीं जानते। हो सकता है-कुछ लोग यह कुतर्क करें कि मीडिया इस तरह से न दिखाता तो विधायक अपनी करतूत की माफ़ी भी न माँगता। पर यह भ्रम है। विधायक का हृदय परिवर्तन नहीं हुआ है। उसने सिर्फ़ पार्टी की कार्रवाई से बचने के लिए ऐसा किया है। इस घटना के बाद भी उसके आचरण में बदलाव नहीं आने वाला है। लेकिन मीडिया ने उस सम्मानित महिला को अवश्य सार्वजनिक रूप से अपमानित कर दिया है। इस घटना के कवरेज का और भी शिष्ट तरीक़ा हो सकता था। टीआरपी बटोरने के लिए हम कुछ भी दिखाने के लिए स्वच्छंद नहीं हैं, न ही क़ानून तोड़ सकते हैं।

तीसरा उदाहरण भी इसी सप्ताह का है। भूटान के प्रधानमंत्री आए और भारतीय मीडिया का स्तर देख कर चुपचाप चले गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ समारोह में भूटान से शिरक़त करने आए प्रधानमंत्री ने पाया कि हिन्दुस्तान में उनके स्थान पर पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री की फोटो लगाई गई है। वे तो ख़ामोश रहे, मगर पूर्व प्रधानमंत्री अपने को रोक नहीं पाए। उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि अगर किसी देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्थान पर किसी और की फोटो लगा दी गई होती तो भारतीय मीडिया बखेड़ा खड़ा कर देता।

यह भी ग़ैरज़िम्मेदार पत्रकारिता का एक नमूना है। परदेसी राजनयिकों-राष्ट्राध्यक्षों के नाम और तस्वीर को लेकर हम इतने लापरवाह हो जाते हैं कि उसको क्रॉस चेक करने की ज़रूरत भी नहीं समझते। वह भी जब, भूटान जैसा पड़ोसी-एकदम भारत के एक राज्य की तरह घरेलू रिश्तों वाला मुल्क़ हो। इस त्रुटि के लिए क्या किसी को माफ़ किया जा सकता है? एक ही सप्ताह में ग़ैरज़िम्मेदारी के तीन उदाहरण भारतीय मीडिया के औसत चरित्र को उजागर करते हैं। क्या हम उस चरम स्थिति का इंतज़ार कर रहे हैं, जब दर्शक, पाठक और श्रोता ग़लतियों (मेरी नज़र में अपराध) के लिए सार्वजनिक रूप से हमारा मान मर्दन करने लगें? कुछ तो सीखिए मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

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पत्रकारिता का अस्तित्व बचाने को फिर से अपनाना होगा ये उद्देश्य!

उदंत मार्तंड की जीवटता से प्रेरणा लेकर बाद में हिंदी के अन्य समाचार-पत्र प्रारंभ हुए

Last Modified:
Thursday, 30 May, 2019
News

लोकेन्द्र सिंह, स्वतंत्र टिप्पणीकार।।

'हिंदुस्थानियों के हित के हेत' इस उद्देश्य के साथ 30 मई 1826 को भारत में हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी जाती है। पत्रकारिता के अधिष्ठाता देवर्षि नारद के जयंती प्रसंग (वैशाख कृष्ण पक्ष द्वितीया) पर हिंदी के पहले समाचार-पत्र 'उदंत मार्तंड' का प्रकाशन होता है। हिंदी पत्रकारिता का सूत्रपात होने पर संपादक पंडित युगलकिशोर समाचार-पत्र के पहले ही पृष्ठ पर अपनी प्रसन्नता प्रकट करते हुए उदंत मार्तंड का उद्देश्य स्पष्ट करते हैं। आज की तरह लाभ कमाना उस समय की पत्रकारिता का उद्देश्य नहीं था।

भारत की स्वतंत्रता से पूर्व प्रकाशित ज्यादातर समाचार-पत्र आजादी के आंदोलन के माध्यम बने। अंग्रेज सरकार के विरुद्ध मुखर रहे। यही रुख उदंत मार्तंड ने अपनाया। अत्यंत कठिनाइयों के बाद भी पंडित युगलकिशोर उदंत मार्तंड का प्रकाशन करते रहे, लेकिन यह संघर्ष लंबा नहीं चला। हिंदी पत्रकारिता के इस बीज की आयु 79 अंक और लगभग डेढ़ वर्ष रही। इस बीज की जीवटता से प्रेरणा लेकर बाद में हिंदी के अन्य समाचार-पत्र प्रारंभ हुए।

आज भारत में हिंदी के समाचार-पत्र सबसे अधिक पढ़े जा रहे हैं। प्रसार संख्या की दृष्टि से शीर्ष पर हिंदी के समाचार-पत्र ही हैं। किंतु, आज हिंदी पत्रकारिता में वह बात नहीं रह गई, जो उदंत मार्तंड में थी। संघर्ष और साहस की कमी कहीं न कहीं दिखाई देती है। दरअसल, उदंत मार्तंड के घोषित उद्देश्य 'हिंदुस्थानियों के हित के हेत' का अभाव आज की हिंदी पत्रकारिता में दिखाई दे रहा है। हालाँकि, यह भाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन बाजार के बोझ तले दब गया है।

व्यक्तिगत तौर पर मैं मानता हूँ कि जब तक अंश मात्र भी 'देशहित' पत्रकारिता की प्राथमिकता में है, तब तक ही पत्रकारिता जीवित है। आवश्यकता है कि प्राथमिकता में यह भाव पुष्ट हो, उसकी मात्रा बढ़े। समय आ गया है कि एक बार हम अपनी पत्रकारीय यात्रा का सिंहावलोकन करें। अपनी पत्रकारिता की प्राथमिकताओं को जरा टटोलें। समय के थपेडों के साथ आई विसंगतियों को दूर करें। समाचार-पत्रों या कहें पूरी पत्रकारिता को अपना अस्तित्व बचाना है, तब उदंत मार्तंड के उद्देश्य को आज फिर से अपनाना होगा। अन्यथा सूचना के डिजिटल माध्यम बढऩे से समूची पत्रकारिता पर अप्रासंगिक होने का खतरा मंडरा ही रहा है।

असल में आज की पत्रकारिता के समक्ष अनेक प्रकार की चुनौतियां मुंहबाये खड़ी हैं। यह चुनौतियां पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों से डिगने के कारण उत्पन्न हुई हैं। पूर्वजों ने जो सिद्धांत और मूल्य स्थापित किए थे, उनको साथ लेकर पत्रकारिता मिशन से प्रोफेशन की ओर जाती, तब संभवत: कम समस्याएं आतीं। क्योंकि मूल्यों और सिद्धांतों की उपस्थिति में प्रत्येक व्यवसाय में मर्यादा और नैतिकता का ख्याल रखा जाता है। किंतु, जैसे ही हम तय सिद्धांतों से हटते हैं, मर्यादा को लांघते हैं, तब स्वाभाविक तौर पर चुनौतियां सामने आने लगती हैं। नैतिकता के प्रश्न भी खड़े होने लगते हैं।

यही आज मीडिया के साथ हो रहा है। मीडिया के समक्ष अनेक प्रश्न खड़े हैं। स्वामित्व का प्रश्न। भ्रष्टाचार का प्रश्न। मीडिया संस्थानों में काम करने वाले पत्रकारों के शोषण, स्वाभिमान और स्वतंत्रता के प्रश्न हैं। वैचारिक पक्षधरता के प्रश्न हैं। 'भारतीय भाव' को तिरोहित करने का प्रश्न। इन प्रश्नों के कारण उत्पन्न हुआ सबसे बड़ा प्रश्न-विश्वसनीयता का है।

यह सब प्रश्न उत्पन्न हुए हैं पूँजीवाद के उदर से। सामान्य-सा फलसफा है कि बड़े लाभ के लिए बड़ी पूँजी का निवेश किया जाता है। आज अखबार और न्यूज चैनल का संचालन कितना महंगा है, हम सब जानते हैं। अर्थात् मौजूदा दौर में मीडिया पूँजी का खेल हो गया है। एक समय में पत्रकारिता के व्यवसाय में पैसा 'बाय प्रोडक्ट' था। लेकिन, उदारीकरण के बाद बड़ा बदलाव मीडिया में आया है। 'बाय प्रोडक्ट' को प्रमुख मानकर अधिक से अधिक धन उत्पन्न करने के लिए धन्नासेठों ने समाचारों का ही व्यवसायीकरण कर दिया है।

यही कारण है कि मीडिया में कभी जो छुट-पुट भ्रष्टाचार था, अब उसने संस्थागत रूप ले लिया है। वर्ष 2009 में सामने आया कि समाचार के बदले अब मीडिया संस्थान ही पैसा लेने लगे हैं। स्थिति यह बनी की देश के नामी-गिरामी समाचार-पत्रों को 'नो पेड न्यूज' का ठप्पा लगाकर समाचार-पत्र प्रकाशित करने पड़े। संपादक गर्वित होकर बताते हैं कि पूरे चुनाव अभियान के दौरान उनके समाचार-पत्र के विरुद्ध पेड न्यूज की एक भी शिकायत नहीं आई। मालिकों के आर्थिक स्वार्थ समाज हितैषी पत्रकारिता पर हावी नहीं होते, तब यह स्थिति ही नहीं बनती।

केवल मालिकों की धन लालसा के कारण ही मीडिया की विश्वसनीयता और प्राथमिकता पर प्रश्न नहीं उठ रहे हैं, बल्कि पत्रकारों की भी भूमिका इसमें है। देखने में आ रहा है कि कुछ पत्रकार राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ता की तरह व्यवहार कर रहे हैं। ऑन स्क्रीन ही नहीं, बल्कि ऑफ स्क्रीन भी न्यूज रूम में वह आपस में राजनीतिक प्रवक्ताओं की भांति संबंधित पार्टी का पक्ष लेते हैं। कांग्रेस बीट कवर करने वाला पत्रकार कांग्रेस को और भाजपा बीट देखने वाला पत्रकार भाजपा को सही ठहराने के लिए भिड़ जाता है। वामपंथी पार्टियों के प्रवक्ता तो और भी अधिक हैं। भले ही देश के प्रत्येक कोने से कम्युनिस्ट पार्टियां खत्म हो रही हैं, लेकिन मीडिया में अभी भी कम्युनिस्ट विचारधारा के समर्थक पत्रकारों की संख्या जरा ज्यादा है।

हालात यह हैं कि मौजूदा दौर में समाचार माध्यमों की वैचारिक धाराएं स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। देश के इतिहास में यह पहली बार है, जब आम समाज यह बात कर रहा है कि फलां चैनल/अखबार कांग्रेस का है, वामपंथियों का है और फलां चैनल/अखबार भाजपा-आरएसएस की विचारधारा का है। समाचार माध्यमों को लेकर आम समाज का इस प्रकार चर्चा करना पत्रकारिता की विश्वसनीयता के लिए ठीक नहीं है। कोई समाचार माध्यम जब किसी विचारधारा के साथ नत्थी कर दिया जाता है, तब उसके समाचारों के प्रति दर्शकों/पाठकों में एक पूर्वाग्रह रहता है। वह समाचार माध्यम कितना ही सत्य समाचार प्रकाशित/प्रसारित करे, समाज उसे संदेह की दृष्टि से देखेगा।

समाचार माध्यमों को न तो किसी विचारधारा के प्रति अंधभक्त होना चाहिए और न ही अंध विरोधी। हालांकि यह भी सर्वमान्य तर्क है कि तटस्थता सिर्फ सिद्धांत ही है। निष्पक्ष रहना संभव नहीं है। हालांकि भारत में पत्रकारिता का एक सुदीर्घ सुनहरा इतिहास रहा है, जिसके अनेक पन्नों पर दर्ज है कि पत्रकारिता पक्षधरिता नहीं है। निष्पक्ष पत्रकारिता संभव है। कलम का जनता के पक्ष में चलना ही उसकी सार्थकता है। यदि किसी के लिए निष्पक्षता संभव नहीं भी हो तो न सही। भारत में पत्रकारिता का एक इतिहास पक्षधरता का भी है। इसलिए भारतीय समाज को यह पक्षधरता भी स्वीकार्य है लेकिन, उसमें राष्ट्रीय अस्मिता को चुनौती नहीं होनी चाहिए।

किसी का पक्ष लेते समय और विपरीत विचार पर कलम तानते समय इतना जरूर ध्यान रखें कि राष्ट्र की प्रतिष्ठा पर आँच न आए। हमारी कलम से निकल बहने वाली पत्रकारिता की धारा भारतीय स्वाभिमान, सम्मान और सुरक्षा के विरुद्ध न हो। कहने का अभिप्राय इतना-सा है कि हमारी पत्रकारिता में भी 'राष्ट्र सबसे पहले' का भाव जागृत होना चाहिए। वर्तमान पत्रकारिता में इस भाव की अनुपस्थिति दिखाई दे रही है। यदि पत्रकारिता में 'राष्ट्र सबसे पहले' का भाव जाग गया तब पत्रकारिता के समक्ष आकर खड़ी हो गईं ज्यादातर चुनौतियां स्वत: ही समाप्त हो जाएंगी।

हिंदी के पहले समाचार पत्र उदंत मार्तंड का जो ध्येय वाक्य था- 'हिंदुस्थानियों के हित के हेत'। अर्थात् देशवासियों का हित-साधन। यही तो 'राष्ट्र सबसे पहले' का भाव है। समाज के सामान्य व्यक्ति के हित की चिंता करना। उसको न्याय दिलाना। उसकी बुनियादी समस्याओं को हल करने में सहयोगी होना। न्यायपूर्ण बात कहना।

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