सोशलाइट परमेश्वर गोदरेज को वरिष्ठ पत्रकार वीर सांघवी की श्रद्धांजलि...

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। मशहूर समाजसेवी, सोशलाइट और महिला उद्यमी परमेश्वर गोदरेज का 70 साल की उम्र में

Last Modified:
Thursday, 13 October, 2016
vir-sanghvi

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

vir-sanghviमशहूर समाजसेवी, सोशलाइट और महिला उद्यमी परमेश्वर गोदरेज का 70 साल की उम्र में मुंबई में निधन हो गया। वे गोदरेज ग्रुप के चेयरमैन आदि गोदरेज की पत्नीं थीं। फेफड़े की बीमारी के चलते उन्हें ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल में एडमिट कराया गया था, जहां सोमवार की रात उनका निधन हो गया।

उन्हें नजदीक से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार वीर संघवी ने अंग्रेजी दैनिक 'हिन्दुस्तान टाइम्स' में एक लेख के जरिए उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनका कहना है कि संभवत: डिजाइनिंग में उनका सबसे बड़ा योगदान रेस्तरां डिजाइन के क्षेत्र में है। इसके बाद उन्होंने अपने पति के समूह गोदरेज के रियल एस्टेट डिवीजन को संभाला। संघवी कहते हैं कि उनमें एक के बाद कई भूमिकाएं निभाने की असाधारण क्षमता थी।

सांघवी का कहना है कि परमेश्वर अरबपति थीं, लेकिन विनम्रता उनमें कूट-कूट कर भरी थी। सालों पहले मेरे जैसे नए पत्रकार से वह बेहद शालीनता और विनम्रता से पेश आईं थीं। स्टाइल और ग्लैमर के मामले में उनका कोई जवाब नहीं था।

संघवी कहते हैं, परमेश्वर पंजाबी वर्ग से ताल्लुक रखती थीं। जिनता गोदरेज के पारसी परिवार ने उन्हें नहीं बदला, उतना उन्होंने गोदरेज परिवार को बदल दिया। परमेश्वर पारिवारिक मूल्यों, ग्लैमर और साहस की अद्भुत संगम थीं।

पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार वीर सांघवी का पूरा लेख:

A true original: Vir Sanghvi remembers Parmeshwar Godrej

To the world at large, Parmeshwar Godrej was a coolly elegant figure who partied with the international jet set and carried one of India’s most famous surnames. Those who knew her, however, remember a different Parmesh: warm, caring, giving, and always fun to be with.

I first met her when I was 20 and just starting out in journalism. She was already Mrs Godrej, queen of Bombay society, and had no reason to give a damn about a young journo. But she was unfailingly hospitable, charming and friendly. At the time, she was famous for having bridged the gap between the film world and Bombay society, which had seemed unbridgeable till she appeared on the scene – and on the cover of Stardust.

We forget now that she was India’s first designer, running the successful Dancing Silks boutique at the Oberoi and making clothes for the top heroines of the 1970s. When fashion bored her, she moved into interior designing and set up Bombay’s hottest design firm, Inner Spaces, in partnership with Sunita Pitamber. Inner Spaces designed the homes of millionaires in Bombay, Delhi and London but is probably best remembered for its revolutionary approach to restaurant décor. The original China Garden in Kemps Corner was the first stand alone to actually look better than any five-star hotel restaurant.

By the time others had attempted to copy the success of Inner Spaces, Parmesh had finally got involved with the Godrej Group’s businesses, advising the real estate development division. I used to joke with her that with Inner Spaces she made so much money that she could have maintained her glamorous lifestyle without drawing on the Godrej wealth.

And her lifestyle was certainly glamorous. When she and her husband, Adi, abandoned their Carmichael Road apartment to spend more time at their stunning beach house in Juhu, their move had the effect of quadrupling property prices in Juhu. Suddenly, every millionaire wanted a beach house like the Godrejs.

Some of her legendary parties were thrown at that beach house and attended by the likes of Richard Gere, Goldie Hawn, Amitabh Bachchan and Imran Khan. The parties acquired an iconic status not because of the guest lists or the extravagance but because of Parmesh’s own sense of warm hospitality.

She was born into an upper middle-class Sikh family and met Adi when she was flying with Air India. They had an intense romance before marrying. Till the end, Adi remained the centre of Parmesh’s universe and for all the exterior glamour, the Godrejs and their children were a close-knit family.

When middle-class women marry into billionaire families, they usually have to change to fit in. Parmesh was the exception. She changed the Godrejs much more than they changed her. She took a conservative Parsi family whose idea of a good time was a family picnic and introduced it to international glamour. But through it all, she remained the exuberant Punjabi she had always been: generous to a fault, full of life and vitality, and yet, at the same time, sensitive and vulnerable.

She was a true original.

(साभार: हिन्दुस्तान टाइम्स)

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पूरी दुनिया यूं ही नहीं करती हिंदी को सलाम, ये है बड़ी वजह: अनुराग दीक्षित

बदलते वक्त में हिंदी भाषा बाजार की जरूरत बन चुकी है। देश का करीब 60 फीसदी बाजार हिंदी बोलने वालों का है।

Last Modified:
Saturday, 14 September, 2019
Anurag Dixit

अनुराग दीक्षित, वरिष्ठ पत्रकार।।

आज हिंदी दिवस है। हमारे देश की राजभाषा हिंदी के बढ़ते दायरे को समझने का ये एक मौका भर है। ये दिन सभी भाषाओं को खुद में शामिल करने वाली और सभी को जोड़ने वाली भाषा हिंदी की सांस्कृतिक और पारंपरिक विरासत को सहेजकर रखने की चुनौती का एहसास भी कराता है। ये एक ऐसा मौका है, जबकि हिंदी के बढ़ते दायरे और उसके समक्ष पैदा होती रही चुनौतियों पर मंथन होता है। राजभाषा जैसे मुद्दों को लेकर सरकारी नीतियों पर सवाल खड़े होते हैं, लेकिन इन तमाम सवालों के बीच हिंदी का दायरा साल दर साल बढ़ता जा रहा है।

संविधान बनाते वक्त सबसे पहले उठा था भाषा का मुद्दा

भारत का संविधान बनाने का जिम्मा संभालने के लिए बनी संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई थी। लेकिन इसके अगले ही दिन यानी 10 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की हुई दूसरी बैठक में डॉ. सच्च्दिानंद सिन्हा और आर.वी धूलेकर ने भाषा का मुद्दा उठा दिया। इसके बाद मार्च 1947 में मौलिक अधिकारों को लेकर बनी एक उप—कमेटी में हिंदी पर बात आगे बढ़ी।

संविधान सभा में भाषा को लेकर हुए मंथन में 'हिन्दुस्तानी' भाषा पर चर्चा हुई लेकिन कांग्रेस की एक बैठक में हिन्दुस्तानी के मुकाबले हिंदी को राजभाषा बनाने का प्रस्ताव 32 के मुकाबले 63 वोटों से जीत गया। दूसरी ओर, महात्मा गांधी भी हिंदी पर ही जोर दे रहे थे। इन सबके बीच 1948 के मार्च और नवंबर में एक बार फिर भाषा का मुद्दा जोर-शोर से उठा। हिंदी के दायरे के बढ़ाने की मांग पर एक संन्यासिनी के अनशन पर बैठने के चलते पं.नेहरू को के.एम. मुंशी की अगुवाई में एक कमेटी बनानी पड़ी। 12 सितंबर को कमेटी की रिपोर्ट संसद में पेश हुई। हिंदी को सरकारी कामकाज की भाषा चुना गया। इसी दौरान हिंदी भाषा पर सेठ गोविंद दास, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और मौलाना अबुल कलाम के भाषण यादगार रहे।

देश में 77 फीसदी लोग समझते हैं हिंदी

आज भारत में भी करीब 77 फीसदी लोग हिंदी बोलते और समझते हैं। दुनियाभर की बात करें तो करीब 50 करोड़ लोग हिंदी बोलते और समझते हैं। दुनिया के 150 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली ये भाषा अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, मॉरीशस जैसे कई देशों के साथ-साथ नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश में काफी लोकप्रिय है। साफ है कि हिंदी दुनियाभर की चहेती भाषा है।

बाजार की जरूरत है हिंदी

हिंदी शब्द संस्कृत के सिंधु शब्द का अपभ्रंश माना जाता है। हिंदी का इतिहास वैसे तो करीब 1 हजार साल पुराना बताया जाता है, लेकिन बदलते वक्त में हिंदी भाषा बाजार की जरूरत बन चुकी है। देश का करीब 60 फीसदी बाजार हिंदी बोलने वालों का है। हर कंपनी के विज्ञापन का आधार सिर्फ और सिर्फ हिंदी है। तभी विदेशी कंपनियों के मोबाइल फोन हिंदी में टाइपिंग की सुविधा दे रहे हैं। आज हर 5 में से 1 व्यक्ति इंटरनेट का इस्तेमाल हिंदी में ही करता है और इंटरनेट पर हिंदी सामग्री की खपत में सालाना 90 फीसदी की रफ्तार से तेजी देखने को मिल रही है।

पूरी दुनिया करती है हिंदी को सलाम

10 जनवरी दुनियाभर में विश्व हिंदी दिवस के तौर पर याद किया जाता है। इसी दिन साल 1975 में नागपुर में पहले विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया गया था। करीब 4 दशक पहले हुए इस आयोजन में दुनियाभर के 30 मुल्कों के करीब सवा सौ प्रतिनिधियों ने शिरकत की थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी कार्यक्रम में शामिल होकर दुनियाभर में हिंदी के बढ़ते प्रभाव को सलाम किया था। तब से लेकर अब तक कई देशों में इसका आयोजन हो चुका है। मकसद है हिंदी भाषियों को आपस में जोड़ना।

(साभार: न्यूज स्टेट)

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वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने यूं समझाया भाषाओं का ‘गणित’

भाषा के बिना किसी समाज/समूह की संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती। संस्कृति की सबसे बड़ी, सबसे प्रभावी और शक्तिशाली वाहिका भाषा ही होती है।

Last Modified:
Saturday, 14 September, 2019
Rahul Dev

राहुल देव, वरिष्ठ पत्रकार।।

सारी भारतीय भाषाएं अपने जीवन के सबसे गंभीर संकट के मुहाने पर खड़ी हैं। यह संकट अस्तित्व का है, महत्व का है, भविष्य का है। कुछ दर्जन या सौ लोगों द्वारा बोली जाने वाली छोटी आदिवासी भाषाओं से लेकर 45-50 करोड़ भारतीयों की विराट भाषा हिंदी तक इस संकट के सामने अलग-अलग अंशों में लेकिन लगभग अटल और अपरिहार्य दिखते लोप के सामने निरुपाय खड़ी दिखती हैं।

भाषाओं का यह संकट अपने दीर्घावधि निहितार्थों और बहुआयामी प्रभावों में भारतीय सभ्यता का संकट बन जाता है। कारण सीधा है। भाषा और संस्कृति,राष्ट्र, राष्ट्बोध और राष्ट्रीयता का गर्भनाल जैसा संबंध है। भाषा इनकी गर्भनाल है। भाषा के बिना किसी समाज/समूह की संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती। संस्कृति की सबसे बड़ी, सबसे प्रभावी और शक्तिशाली वाहिका भाषा ही होती है। भाषा में ही संस्कृति के सबसे महत्वपूर्ण उपादान, उसकी चिन्तन-आध्यात्मिक-ज्ञान-साहित्य-शास्त्रीय-लोक संपदा निर्मित, संचारित और प्रवाहित होती है। संस्कृति के अन्य रूप- साहित्य, ललित कलाएं, गीत संगीत, स्थापत्य, वेशभूषा, खानपान, पर्व त्यौहार, सामाजिक रीतियां, परंपराएं, लोकाचार आदि मुख्यतः भाषा के कारण और माध्यम से ही प्रकट होते हैं।

100 साल पहले 1918 में चेन्नई में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति स्थापित करने वाले महात्मा गांधी और उसके 40 साल बाद भारत के संविधान निर्माताओं ने भाषा संबंधी प्रावधान बनाते समय इसकी दूर-दूर तक कल्पना नहीं की थी कि जिन महान उद्देश्यों, राष्ट्रनिर्माण के जिन सपनों को सामने रखकर उन्होंने यह पुरुषार्थ किए थे, भारतीय राष्ट्र और उसके भविष्य का जो चित्र उन्होंने अपने सामने रखा था उसका साकार रूप 70 साल में ही इतना अलग, इतना विकृत हो जाएगा।  लेकिन हमारी आंखों के सामने आज जो दृश्य है और निकट भविष्य में आकार लेता दिखाई दे रहा है, वह इतना विकराल है, गहरे संस्कृतिमूलक आयामों में राष्ट्र निर्माताओं की कल्पना के इतना विपरीत है कि विश्वास नहीं होता।

ब्रिटिश साम्राज्यवाद की दासता से मुक्त अपनी मौलिक अंतःप्रेरणा और साभ्यतिक आभा के आलोक में भारत एक बार फिर चमचमाकर खड़ा होगा, अपना नवनिर्माण करेगा वह सपना आज अंग्रेजी के ऐसे भाषायी साम्राज्यवाद की जकड़ में है जो दिनोंदिन मजबूत होती जा रही है। 150 वर्षों के प्रयासों के बाद भी 15% भारतीयों की कार्यभाषा बन सकी, अपने भक्तों के सम्मोहन से प्राण वायु पाती अंग्रेजी इस देश की 85% प्रतिभा, उद्यमिता के उच्चतम विकास के आगे पत्थर की दीवार की तरह खड़ी है। अंग्रेजी़ न जानने के कारण उच्च शिक्षा, ऊंचे अवसरों, रोज़गारों से वंचित करोड़ों युवा प्रतिभाएं आज रोज कुंठित, अपमानित होने, अपने आत्मसम्मान, आत्मविश्वास को तिल तिल कर मरते देखने, पिछड़ जाने के लिए अभिशप्त हैं। अंग्रेज़ी से वंचित होना दोयम दर्जे का भारतीय होना है। केवल किसी भारतीय भाषा में जीने-काम करने वाला व्यक्ति अंग्रेज़ी वालों के सामने दीन हो जाता है। इस आत्मदैन्य को अपनी बातचीत में अधिक से अधिक अंग्रेज़ी शब्दों, अभिव्यक्तियों को ढूंसता हिन्दुस्तानी ही आज प्रतिनिधि हिन्दुस्तानी है।

वर्तमान से अब ज़रा भविष्य में चलते हैं। सन 2050 की कल्पना कीजिए। तब तक हमारा भारत विश्व की एक बड़ी आर्थिक महाशक्ति बन चुका होगा। भारतीय प्रतिभा, उद्यमशीलता और हमारी बुनियादी लोकतांत्रिकता विश्वमंच पर भारत का अटल उदय सुनिश्चित कर चुके हैं। चरम गरीबी, कुपोषण, भुखमरी, शैक्षिक-आर्थिक पिछड़ापन बड़ी हद तक मिट चुके होंगे। आम भारतीयों का जीवन स्तर, सुविधाएं काफी ऊपर आ चुके होंगे। देश के 50-60% भाग का शहरीकरण हो चुका होगा। आधुनिक सुख सुविधाएं, तकनीकी यंत्र, साधन गांव-गांव तक पहुंच चुके होंगे। सारा देश डिजिटल जीवन पद्धति को बहुत बड़ी हद तक अपना चुका होगा। ब्रॉडबैंड और उसके माध्यम से मिलने वाली अनंत सेवाएं आम हो चुकी होंगे।

अब कल्पना के घोड़े दौड़ाइए और सोचिए-उस भारत के अधिकतर नागरिक अपने जीवन के सारे प्रमुख काम किस भाषा में कर रहे होंगे? पूरे देश में शिक्षा, प्रशासन, व्यापार, शोध, पत्रकारिता, स्वास्थ्य, न्याय जैसे हर बड़े क्षेत्र में किस भाषा का प्रमुखता से उपयोग हो रहा होगा? वह देश भारत होगा, भिंडिया या सिर्फ़ इंडिया?  उस इंडिया में संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हमारी बड़ी 22 और 16 सौ से अधिक छोटी भाषाओं-बोलियों की स्थिति क्या होगी? कहां होंगी वे? होंगी भी कि नहीं?

मेरा अपना आकलन है कि रहेंगी तो जरूर लेकिन गरीबों की गरीब भाषाएं बनकर। हाशियों की भाषा बन कर। गालियों की भाषा बन कर। गीत-संगीत, मनोरंजन, फिल्में, ये भाषाओं में बचे रहेंगे, हालांकि इनमें भी तब तक आधी से ज्यादा अंग्रेजी प्रवेश कर चुकी होगी। आज बनने वाली हिंदी फिल्मों में आधी से ज्यादा के शीर्षक अब अंग्रेजी के होते हैं। उनके संवादों में हिंदी नहीं हिंग्लिश ज्यादा होती है। पूरी तरह अंग्रेजी में बनने वाली फिल्में और नेटफ्लिक्स जैसे आधुनिक मंचों पर भारतीय अंग्रेजी धारावाहिक आम हो चले हैं। यह प्रक्रिया बढ़ती ही जाएगी।

भाषाई अखबारों, फिल्मों और धारावाहिकों का विस्तार हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों का आंखों देखा विवरण भी अब हिंदी व भाषाओं में होने लगा है। इस विस्तार पर मुग्ध भाषायी मीडिया और साहित्यकार अपनी भाषाओं पर किसी तरह के संकट की बात को अरण्य रोदन कह देते हैं। यह दूरदृष्टिहीनता है। भविष्य देखना है तो बच्चों की ओर देखना चाहिए। बच्चों की जो पीढ़ियां अधिकाधिक अंग्रेजी माध्यम से पढ़कर बड़ी होंगी वे क्या भाषाई अखबारों, साहित्य, पुस्तकों, टीवी समाचारों की पाठक- दर्शक होंगी? हिंदी के कितने लेखकों, पत्रकारों, राजभाषा अधिकारियों के बच्चे हिंदी माध्यम में पढ़ते हैं? इसलिए आज यह जो विस्तार दिख रहा है अगले 20-25 साल का खेल है। उसके बाद ऊपर से नीचे तक अंग्रेजी का ही वर्चस्व हर क्षेत्र में दिखेगा।

संसार में लगभग 6000 भाषाओं के होने का अनुमान है। भाषा शास्त्रियों की भविष्यवाणी है कि 21वीं सदी के अंत तक इनमें केवल 200 भाषाएं जीवित बचेंगी। इनमें भारत की सैकड़ों भाषाएं होंगी। भारत की आदिवासी भाषाओं में 196 तो अभी यूनेस्को के अनुसार ही गंभीर संकटग्रस्त भाषाएं हैं। संकटग्रस्त भाषाओं की इस वैश्विक सूची में भारत सबसे ऊपर है। यूनेस्को का भाषा एटलस 6000 में से 2500 भाषाओं को संकटग्रस्त बताता है। यूनेस्को के पूर्व महानिदेशक कोचिरो मत्सूरा ने कहा था, ‘एक भाषा की मृत्यु उसे बोलने वाले समुदाय की अमूर्त विरासत, परंपराओं और वाचिक अभिव्यक्तियों का नष्ट हो जाना है।‘

भारत की अनुमानित 1957 में कम से कम 1416 लिपिहीन मातृभाषाएं हैं। ये सब आसन्न संकट में हैं। पर भारत के प्रभु और बुद्धिजीवी वर्ग तथा सामान्य जन को इन छोटी भाषाओं की तो क्या अपनी बड़ी भाषाओं की भी चिन्ता और उनके संकट को देखने समझने, बचाने में कोई रुचि नहीं है। ये वे विशाल,10 लाख से ज्यादा जनसंख्या वाली भाषाएं हैं, जिन्हें भारत के 90% लोग बोलते-बरतते हैं।

किसी भी समाज में भाषा के नियामक-निर्णायक तत्व क्या हैं? भाषा और समावेशी, समतामूलक, लोकतांत्रिक विकास का क्या संबंध है? भाषा और शिक्षा का क्या संबंध है? भाषा का राष्ट्र, राष्ट्र भाव और राष्ट्र निर्माण से क्या संबंध है? राष्ट्र बोध के केंद्रीय महत्व के इन बिंदुओं पर स्वतंत्रता के बाद भारत में सिर्फ एक बार 1967 में उच्चतम स्तर पर समग्रता से विचार मंथन हुआ था राष्ट्रीय उच्चतर अध्ययन संस्थान, शिमला में। उसके बाद उस तरह का कोई विचार कुंभ भाषाओं की बदलती स्थितियों, चुनौतियों और भविष्य पर हुआ हो, ऐसा मेरी जानकारी में नहीं है।

इसलिए कोई आश्चर्य नहीं है कि विरल भाषिक समृद्धि और विविधताओं के भारत के पास 70 साल में भी अपनी कोई भाषा नीति नहीं है,  न ही उसको बनाने का कोई गंभीर प्रयास किया गया है। अब भी अगर वह नहीं बनाई गई तो अपनी इस अमूल्य और आधारभूत सांस्कृतिक संप्रभुता से दो-तीन पीढ़ियों में ही वंचित होकर हम पश्चिम, मुख्यतः अमेरिका के सांस्कृतिक, बौद्धिक, सामाजिक, आर्थिक उपनिवेश बन जाएंगे।

भाषा मनुष्य की श्रेष्ठतम संपदा है। सारी मानवीय सभ्यताएं भाषा के माध्यम से ही विकसित हुई हैं। आदिम समाज तो हो सकते हैं लेकिन आदिम भाषाएं नहीं होतीं। संचार के वाचिक और लिखित माध्यम रूप में यह एक समाज के भावनात्मक जीवन और संस्कृति का सर्वोत्तम उद्घोष है। एक सांस्कृतिक संस्थान होने के कारण यह अपने बोलने-बरतने वालों को एक जन्मसिद्ध अधिकार के रूप में पहचान और अद्वितीयता देती है। जातीयता का एक प्रबल कारक होती है। समाज के सभी क्षेत्रों में-प्रबंधन, प्रशासन, वैज्ञानिक सूचनाओं, शिक्षा और शोध का माध्यम हो या ज्ञान निर्माण का, भाषा विकास का सबसे शक्तिशाली उपकरण है।

भाषा के विकास को हम उन भूमिकाओं से परिभाषित कर सकते हैं जिन्हें वह अपने समुदाय में निभाती है और जिन क्षेत्रों में वह प्रमुखता से इस्तेमाल की जाती है। किसी समुदाय में कोई भाषा कितनी प्रतिष्ठा पाती है, यह सीधा इस बात पर निर्भर करता है कि वह भाषा अपने समुदाय की कितनी तरह की अभिव्यक्ति-आवश्यकताओं को पूरा करती है-जैसे व्यापार, अर्थतंत्र, तकनीकी, नवाचार, शोध, मौलिक वैज्ञानिक चिंतन,  उद्यमिता, प्रबंधकीय निर्णय आदि। एक बहुभाषी और बहुजातीय समाज में उसकी आधिकारिक भाषा/भाषाएं सभी सभी वर्गों को तभी स्वीकार्य होती हैं जब वे शिक्षा, आजीविका, व्यवसाय, शोध, तकनीक, नवाचार, विकास और प्रशासनात्मक, प्रबंधकीय निर्णय प्रक्रियाओं की प्रमुख भाषा होती है।

भाषाओं के संकट से भी बड़ा संकट है उसको न देख पाना। कमोबेश यह समस्या सारे भाषा समूहों के साथ है। लेकिन हिंदी वालों के साथ तो रोग की हद तक है। बड़े-बड़े हिंदी के विद्वान और पत्रकार प्रतिप्रश्न करते हैं कि जब हिंदी अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ रही है, हिंदी में सबसे ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं, हिंदी फिल्म और टीवी उद्योग बढ़ रहा है तब हिंदी के सामने संकट कैसे हो सकता है?

संक्षिप्त उत्तर यह है। अब हम वाचिक युग में नहीं लिखित और डिजिटल युग में हैं। इसलिए भाषा का बोली रूप उसे बनाए रखने और बढ़ाने के लिए अपर्याप्त है। यह देखने की बजाय कि हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं को समझने-बोलने वालों की संख्या कितनी बढ़ रही है जो हमें देखना चाहिए वह यह है कि उस भाषा को अपनी इच्छा से पढ़ने-लिखने और सभी गंभीर कार्य क्षेत्रों में व्यवहार करने वाले लोग बढ़ रहे हैं या घट रहे हैं? उस भाषा माध्यम के विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या घट रही है या बढ़ रही है? ज्ञान ग्रहण, ज्ञान निर्माण, भविष्य निर्माण, न्याय,विज्ञान, प्रशासन, व्यापार, प्रबंधन, शोध आदि जीवन के निर्णायक क्षेत्रों में उस भाषा का प्रयोग घट रहा है या बढ़ रहा है?

सबसे बड़ा प्रश्न, जिसे पूछते ही आपके सामने अपनी भाषा का भविष्य साकार खड़ा हो जाएगा यह है-आपकी भाषा की मांग कितनी है? है कि नहीं? घट रही है या बढ़ रही है? इस कसौटी पर हिंदी सहित सारी भारतीय भाषाओं को कसें तो उत्तर बिल्कुल साफ है। आज देश के छोटे से छोटे गांव में गरीब से गरीब व्यक्ति अपने बच्चों के लिए सिर्फ एक भाषा मांग रहा है-अंग्रेजी। किसी भी भारतीय भाषा की मांग नहीं है भारत में। इस बाजार युग में जिस चीज की मांग नहीं है वह कैसे चलेगी, कैसे बचेगी?

अभी देश के 30 से 40% बच्चे अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में पढ़ रहे हैं। भले ही कितनी अधकचरी अंग्रेजी वहां पढ़ाई जाती हो, खुद शिक्षकों को ठीक से आती हो या नहीं, यह निर्विवाद रूप से सबका अनुभव है कि जो बच्चा बचपन से एक बार अंग्रेजी माध्यम में पढ़़ गया, वह कभी अपने परिवार और परिवेश की, विरासत की भाषा का नहीं होता। उसमें अपनी मातृभाषा/परिवेश भाषा से प्रेम,  लगाव, गर्व की जगह एक हेयभाव और नापसंदगी पैदा होती जाती है जो आयु के साथ बढ़ती ही रहती है। अपनी भाषा से यह दूरी उसे भाषा से परिचित तो बनाए रखती है, लेकिन उसमें कुछ भी गंभीर पढ़ने वाला और काम करने वाला नहीं रहने देती। भारत के हर मध्यवर्गीय परिवार की यही स्थिति है।

10 साल पहले के एक सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार भारत की सभी भाषा-माध्यम विद्यालयों में प्रवेश दर हर साल घट रही थी। सिर्फ दो भाषाएं अपवाद थीं-अंग्रेजी और हिंदी। अंग्रेजी में यह वार्षिक वृद्धि दर 250% से अधिक थी। हिंदी में लगभग 35%। अब जब हिंदीभाषी राज्यों में भी सरकारें हिंदी-माध्यम विद्यालय बंद या बदल कर उन्हें अंग्रेजी-माध्यम करती जा रही है तो हिंदी का भविष्य स्पष्ट है। ठीक यही चीज़ हर प्रदेश में हो रही है।

यूनेस्को के कहने पर विश्व के श्रेष्ठ भाषाविदों ने किसी भी भाषा की जीवंतता और संकटग्रस्तता नापने के लिए 9 कसौटियां निर्धारित की हैं। पहली है, एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी के बीच उस भाषा का अंतरण, जाना कितना हो रहा है? दूसरी कसौटियों में प्रमुख हैं ज्ञान विज्ञान के आधुनिक क्षेत्रों में उस भाषा में काम हो रहा है या नहीं,  घट रहा है या बढ़ रहा है? वह भाषा नई तकनीक और आधुनिक माध्यमों को कितना अपना रही है? उस भाषा के विविध रूपों का दस्तावेजीकरण कितना और किस स्तर का है? उस समाज की महत्वपूर्ण राजकीय/अराजकीय संस्थाओं की उस भाषा के बारे में नीतियां और रुख़ कैसे हैं? अंतिम लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण कसौटी है उस भाषा समुदाय का अपनी भाषा के प्रति रुख़ क्या है, भाव क्या है?

इनमें से किसी भी कसौटी पर किसी भी भारतीय भाषा को तोल लीजिए तुरंत समझ में आ जाएगा कि भविष्य के संकेत संकट की ओर इशारा करते हैं या विकास-विस्तार की ओर।

एक बार फिर 2050 पर चलते हैं। उस वैश्विक महाशक्ति, आधुनिक, वैश्वीकृत, संपन्न-सबल इंडिया में जब हर नागरिक अपने जीवन का हर महत्वपूर्ण काम सिर्फ अंग्रेजी में कर रहा होगा, उसमें भारत, भारतीयता और भारतीय सभ्यता ने 5000-6000 वर्ष की अपनी अविच्छिन्न यात्रा में जो समूची साहित्यिक-सांस्कृतिक-ज्ञान-लौकिक-आध्यात्मिक संपदा अर्जित की है वह इस संपदा की निर्मात्री भाषाओं के बिना कैसे जीवंत और जीवित रहेगी, अगली पीढ़ियों तक कैसे पहुंचेगी? क्या अंग्रेज़ी यह कर सकती है?

रंगरूप में भारतीय लेकिन दिलो-दिमाग, जीवन शैली, सोच-संस्कार से अमेरिका के उन नकलची नागरिकों का भारत-बोध, अपनी साभ्यतिक ऊंचाईयों-विरासत की स्मृति, सांस्कृतिक संप्रभुता का अहसास कैसा होगा?

कम से कम मुझे स्पष्ट दिखता है कि समूची भारतीय सभ्यता लोप, विस्मृति और भयानक हाशियाकरण की कगार पर खड़ी है। उसके पास शायद सिर्फ दो पीढ़ियों का समय है बचने के लिए। यानि हमारी और हमारे बच्चों की पीढ़ी आज अगर चाहे, राजसत्ता को बुद्धि आ जाए, समूचा राष्ट्र संकल्पबद्ध हो, राष्ट्रीय और निजी महत्व के हर क्षेत्र में भारतीय भाषाओं को स्थापित करने में जुटे तो इस प्रक्रिया को हम रोककर उलट सकते हैं। वरना शैशव से ही अंग्रेजी/अंग्रेज़ियत में पली, पढ़ी और बढ़ी पीढ़ियां चाहेंगी भी तो इस संपदा और सभ्यता को पुनर्जीवित करना उनके लिए असंभव नहीं तो असंभव जैसा जरूर होगा।

यहां महत्वपूर्ण हो जाती है प्रत्येक भाषा में काम करने,, लिखने वाले साहित्यकारों-लेखकों-विद्वानों- बुद्धिजीवियों-शिक्षाविदों, मीडिया, पत्रकारों और संपूर्ण नागर समाज की भूमिका। यही वे वर्ग हैं जो अपने अपने क्षेत्रों में, अपने भाषा समाज में एक विमर्श उत्पन्न करते हैं, चिंतन को आगे बढ़ाते हैं, महत्वपूर्ण चिंताओं,संकटों और सरोकारों के प्रति समाज को जागरूक करते हैं।

कमाल यह है कि ऐसे अभूतपूर्व प्राणांतक संकट से देश का लगभग समूचा नियंता प्रभु वर्ग, नीति निर्माता, बुद्धिजीवी, शिक्षाविद, राजनीतिक दल, संसद, विधानसभाएं, सरकारें, मीडिया और व्यापक नागर समाज अनभिज्ञ और इसलिए उदासीन दिखते हैं। इस विराट सभ्यतामूलक संकट का मुख्य कारण, उस का सबसे बड़ा स्रोत सीधा और स्पष्ट है-अंग्रेज़ी और उसके प्रति हमारा शर्मनाक दासतापूर्ण और शर्मनाक  सम्मोहन।

भारतीय चरित्र इजराइली चरित्र जैसा नहीं है जिसने 2000 साल से मृत पड़ी हिब्रू को आज वैज्ञानिक शोध, नवाचार और आधुनिक ज्ञान निर्माण की श्रेष्ठतम वैश्विक भाषाओं में एक बना दिया है। जिसके बल पर 40 लाख की जनसंख्या वाला इजरायल एक दर्जन से ज्यादा विज्ञान के नोबेल पुरस्कार जीत चुका है। सारे इस्लामी देशों की शत्रुता के बावजूद अपनी पूरी अस्मिता, धमक और शक्ति के साथ अजेय बना विश्व पटल पर विराजमान है। विश्व गुरु बनने के सपने देखता भारत चाहे तो इजराइल से प्रेरणा ले सकता है।

(नवनीत पत्रिका से साभार)

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विकसित देशों के पत्रकारों की अपेक्षा भारत के पत्रकारों में ये 'गुण' ज्यादा है

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक गुप्ता का कहना है कि भारत का संविधान नागरिकों को सरकार की आलोचना करने का अधिकार देता है

Last Modified:
Saturday, 14 September, 2019
Ajay

अजय शुक्ल, प्रधान संपादक, आईटीवी नेटवर्क।।

खबरनवीसों पर हमले से नहीं बदलेगा यथार्थ

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक गुप्ता ने पिछले सप्ताह ‘राजद्रोह और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ विषय पर अपने व्याख्यान में कहा कि भारत का संविधान नागरिकों को सरकार की आलोचना करने का अधिकार देता है। उनका कहना था, ‘कार्यपालिका, न्यायपालिका, नौकरशाही और सशस्त्र बलों के कार्यों की आलोचना करना राजद्रोह नहीं हो सकता है। अगर हम इन संस्थानों की आलोचना करना बंद कर देंगे तो हम लोकतंत्र के बजाय पुलिस राज्य बन जाएंगे।’

बीते कुछ महीनों में हमें देखने को मिल रहा है कि खबरनवीसों पर हमले बढ़े हैं। कहीं उन्हें धमकाया जा रहा है तो कहीं उनकी हत्याएं की जा रही हैं। यही नहीं, उनके खिलाफ सत्ता प्रतिष्ठान गंभीर धाराओं में आपराधिक मुकदमे दर्ज करा रहे हैं। वजह सिर्फ यह है कि उन्होंने वह सच दिखाया, जिसे भ्रष्ट व्यवस्था छिपाना चाहती थी। खबरनवीसों और सच की आवाज बनने वालों को कुचलने की कोशिश करने वाले अफसरों के खिलाफ सरकार ने कोई कार्रवाई न करके, यह भी जता दिया कि वह इन भ्रष्ट अफसरों के साथ खड़ी है।

यह ईमानदारी से निष्पक्ष और सच दिखाने की कोशिश करने वालों का मनोबल तोड़ने की ऐसी साजिश है, जिसमें सियासतदां, नौकरशाह और भ्रष्ट धंधेबाज शामिल हैं। लोकतांत्रिक देश होने का दम भरने वाले जिम्मेदार लोगों के मुंह से निंदा का एक भी शब्द न निकलना इसे पुलिस राज्य (तानाशाही) की ओर ले जाने के लिए काफी है।

‘नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो’ (NCRB) के आंकड़ों से पता चलता है पिछले कुछ सालों में खबरनवीसों पर हमले के 190 मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें डेढ़ दर्जन पत्रकारों की हत्या भी हुई। इसके साथ ही जो मामले दर्ज नहीं हुए, उनकी संख्या 10 गुणा अधिक है। यूपी में पुलिस ने पत्रकारों पर हमले के 67 मामले पिछले साल तक दर्ज किए हैं। केवल 2017 में 13 ऐसे मामले सामने आये, जिनमें पत्रकारों पर हमला करने वाले पुलिसवाले ही थे।

हाल के दिनों में यूपी में मिड-डे मील से लेकर तमाम कल्याणकारी योजनाओं में हो रहे घपले को दिखाने पर खबरनवीसों पर गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज की गईं। हरियाणा के उकलाना में खाद्य आपूर्ति विभाग के घपले को दिखाने वाले पत्रकार पर आपराधिक मामला दर्ज कर लिया गया। जम्मू-कश्मीर में खबरनवीसों के साथ सत्ता ऐसे पेश आ रही है, जैसे पत्रकार देशद्रोही हों। उन्हें भी नजरबंदी जैसे हालातों से रूबरू होना पड़ रहा है। इसको लेकर वहां के एक अखबार के संपादक ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की।

यह सभी वे मामले हैं, जो हमें नजर आ रहे हैं मगर इनसे कई गुणा अधिक घटनाएं रोज हो रही हैं। सत्ता मूकदर्शक बनी है। सरकार का चारण करने वाले पत्रकार संगठन मौन साधे हुए हैं। इनको अपने अनुदान और दूसरे धंधे बंद हो जाने का खौफ नजर आता है।

हमारे लिए एक और शर्मनाक बात यह है कि ग्लोबल प्रेस फ्रीडम इंडेक्स की रिपोर्ट के मुताबिक भारत निष्पक्ष खबरों के मामले में नीचे चला गया है। यहां खबरनवीसों पर हमले बढ़े हैं। कई बार भीड़ ने पत्रकारों पर हमले किये। हमें लगता है कि भारत देश के पत्रकार अन्य तमाम विकसित देशों के पत्रकारों की अपेक्षा बड़े राष्ट्रभक्त और राष्ट्रवादी हैं। अपने देश और देशवासियों के सामने सच लाने को वे अपनी जिम्मेदारी समझते हैं।

सत्ता-प्रशासन के भ्रष्ट आचरण को सामने लाना और उन पर सवाल उठाना किसी भी देश प्रेमी पत्रकार का कर्तव्य है। अगर वे ऐसा नहीं करते तो यह देश के साथ धोखा करने जैसा है, क्योंकि देश को खोखला करने वालों को सजा दिलाने तक सच की आवाज बनना उनका ही काम है। सत्ता प्रतिष्ठान की यह महती जिम्मेदारी है कि वह पत्रकारों-आलोचकों और खबरनवीसों को संरक्षण प्रदान करे।

हमारे यहां कबीरदास ने इसको लेकर बड़ा स्पष्ट मत दिया है-‘निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।‘ हमारे देश और उसके लोकतंत्र की यही खूबी है कि हमें बेहतरीन विचारों के लिए किसी दूसरे देश के विचारकों पर आश्रित होने की आवश्यकता नहीं है। हमारे वेद राज सत्ता और उसके कर्तव्यों से लेकर उसकी आलोचना करने तक को बेहतरीन तरीके से समझाते हैं।

विश्वसनीयता और निडरता के साथ सच्चाई को सामने रखना ही खबरनवीसों की जिम्मेदारी है। इस कर्तव्य को उन्हें बेखौफ निभाना चाहिए। उन्हें तुलसीदास की रामचरित मानस में लिखी यह चौपाई ध्यान में रखनी चाहिए-‘सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेहुं मुनिनाथ। हानि, लाभ, जीवन, मरण,यश, अपयश विधि हांथ।’ इसके साथ ही अथर्ववेद का श्लोक है- ‘यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा मे प्राण मा विभेः।।’ इसका अर्थ है कि जिस प्रकार आकाश एवं पृथ्वी न भयग्रस्त होते हैं और न इनका नाश होता है, उसी प्रकार हे मेरे प्राण! तुम भी भयमुक्त रहो।

हमारे वेद जीवन संघर्ष को आनंद के रूप में परिभाषित करते हैं। ‘जिंदगी है तो संघर्ष हैं, तनाव है, काम का दबाब है, खुशी है, डर है, लेकिन अच्छी बात यह है कि यह सभी स्थायी नहीं हैं। समय रूपी नदी के प्रवाह में सब प्रवाहमान हैं। कोई भी परिस्थिति चाहे खुशी की हो या गम की, कभी स्थाई नहीं होती, समय के अविरल प्रवाह में विलीन हो जाती है।’ जो लोग धन-संपदा या किसी अन्य लालच में सच को छिपाते हैं, वो भले ही कुछ वक्त खुद को सुखी महसूस करें, मगर अंततः उनकी दुर्गति तय है।

हमें यह भी देखना होगा कि विश्व में जहां क्रांतियां हुईं, वहां देशकाल और स्थितियों के अनुसार ही इनका सूत्रपात हुआ। दिन-प्रतिदिन बढ़ते साधनों से हिंसक और अहिंसक दोनों ही रूपों की क्रांतियां सामने आईं, उनके कारण विचारकों की सोच सर्वोच्च थी। 17वीं शताब्दी के अंत में विश्व का क्रांति से परिचय हुआ, जो 21वीं शताब्दी के आधुनिक युग में भी अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है।

तानाशाही, साम्राज्यवादी, निरंकुश और अयोग्य शासकों से आमजन को बचाकर आधुनिकता की ओर बढ़ने में इन्हीं क्रांतियों का हाथ रहा है। इंग्लैंड की महान् क्रांति, फ्रांस की गौरवपूर्ण क्रांति, इटली की संघर्ष-क्रांति, भारत छोड़ो आंदोलन, जर्मनी की एकीकरण क्रांति, तिब्बत की धार्मिक क्रांति, जापान की तकनीकी क्रांति, औद्योगिक क्रांति और वैज्ञानिक क्रांति तक निष्पक्ष समकालीन विचारधारा का नतीजा रही हैं न कि किसी भीड़ का।

ये क्रांतियां तब संभव हो सकीं, जब निष्पक्ष और निडर खबरनवीसी की गई। हमारा देश विश्व पटल पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे में निष्पक्ष समीक्षा और खोजपूर्ण तथ्यात्मक खबरों को सामने लाकर सत्ता प्रतिष्ठान को आईना दिखाना हमारी महती जिम्मेदारी है। इसे हर उस खबरनवीस और समीक्षक को करना चाहिए, जो देश से प्यार करता है।

कमियों को सामने लाकर उनको दुरुस्त करने से एक सशक्त देश बनता है, न कि सच दिखाने वालों को कुचलने से। सच्चाई को छिपाने या सच दिखाने वालों पर हमलों से व्यवस्था गर्त में जाती है। दमनकारी नीति सरकार और देश के आचरण को दर्शाती है। सरकार को चाहिए कि वह उनकी कमियां गिनाने वालों को सम्मान सहित प्राश्रय दे और कमियां दूर करके सुशासन स्थापित करे।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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पढ़कर मुस्कराइए, क्योंकि हिंदी दिवस पर न्यूज चैनल ने की ऐसी जोरदारी तैयारी

कुछ टिकटॉक से गाने निकाल लो...आजकल जो विडियो यूट्यूब पर नहीं मिलते, टिकटॉक पर मिलते हैं। हिंदी पर भी जरूर होंगे

Last Modified:
Friday, 13 September, 2019
Channel Meeting

पीयूष पांडे, व्यंग्यकार व वरिष्ठ पत्रकार।।

‘हमें भी हिंदी दिवस को सेलीब्रेट करना चाहिए।‘ संपादक ने फरमाया।

‘यस सर, बिलकुल करना चाहिए। ये हमारी रिस्बॉन्सिबिलिटी है।‘ मीटिंग में संपादक के सबसे खास एडवाइजर कम ‘कार साकी’ ने कहा।

‘अच्छा बुलाओ किसी को। हम समझाते हैं कि क्या करना है कैसे करना है।‘ संपादक ने स्वयं को लगभग बुद्ध की अवस्था में पाते हुए नया आदेश दिया।

मीटिंग में भगदड़ मच गई। एक साथ कई लोग उस एक शख्स को बुलाने के लिए भागे, जिसे बताया जाना था कि क्या करना है और कैसे करना है। दरअसल, हलकारा तो बहाना था, बॉस की नजर में खुद को 100 मीटर रेस का चैंपियन बताना था।

खैर, बुद्ध ज्ञान सुनने के लिए बंदा मीटिंग में हाजिर हो गया।

सुनो....

जी...

‘अच्छा...हिंदी दिवस है। एक प्रोग्राम बनाओ। हिंदी राष्ट्रभाषा-राजभाषा वगैरह जो भी है, उसका इतिहास वगैरह बता देना एक पैकेज में। हिंदी के दो-चार साहित्यकारों के कोट वगरैह डालकर उसमें तीन चार गाने घुसेड़ दो। अलग-अलग जगह से दो-चार सेलेब्रिटी की बाइट मंगा लो, जिसमें वो बताएं कि हिंदी के बिना उनका जीवन अधूरा है। और फिर एक धांसू सा नाम रखकर शाम को चला दो पांच बजे। हिंदी की सेवा करना हमारा धर्म है। हम हिंदी न्यूज चैनल हैं। हमें हिंदी दिवस पर कुछ खास करना ही चाहिए।

‘बिलकुल ये हमारा कर्तव्य है।‘ कार साकी ने फिर दोहराया।

‘लेकिन सर फिल्मों में हिंदी भाषा पर कौन से गाने बने हैं?’ कार्यक्रम बनाने वाले अज्ञानी बालक ने सवाल किया।

‘यार ढूंढो..मिलेंगे। दो-चार गाने जरूर बने होंगे। एक लाख गाने बने हैं फिल्मों में। दो गाने हिंदी पर नहीं होंगे क्या। गूगल करो। क्या मूर्खों जैसी बात करते हो।‘ अब संपादक बुद्ध की मुद्रा से बाहर आ रहा था।

‘कुछ टिकटॉक से गाने निकाल लो...आजकल जो विडियो यूट्यूब पर नहीं मिलते, टिकटॉक पर मिलते हैं। हिंदी पर भी जरूर होंगे।‘ कार साकी ने फिर ज्ञान बांटा।

‘जी सर’, अज्ञानी बालक ने जी पर अतिरिक्त जोर डालते हुए जवाब दिया। फिर पूछा-‘नाम सर’

नाम....रख दो ‘हिंद की हिंदी की जय जय'।

‘वाह सर, क्या नाम है।‘ कार साकी बोला।

चूंकि हर मीटिंग में एक-दो पथ विमुख, नौकरी से बेपरवाह लोग होते हैं। इस मीटिंग में भी थे। एक ने सवाल किया।

सर, हिंदी दिवस से अच्छा है कि हम मंदी पर एक जोरदार कार्यक्रम कर दें।

‘मंदी। कहां है मंदी? तुम्हें दो लाख रुपए सैलरी मिल रही है ना। बराबर मिल रही है ना? तो कहां है मंदी।‘ संपादक चिढ़कर बोला।

सर लेकिन...

‘कुछ लेकिन वेकिन नहीं। हिंदी दिवस पर ही कार्यक्रम बनेगा और धूमधाम से चैनल पर चलेगा।‘ संपादक ने आदेश दिया।

अब दूसरा अड़ंगेबाज बोला।

सर, लेकिन हिंदी दिवस पर कार्यक्रम से पहले मेरा एक सुझाव है।

बोलो?

सर, हमें भी चैनल के भीतर हिंदी को बढ़ावा देना चाहिए।

‘बिलकुल देना चाहिए।‘ संपादक बोला।

‘ तो सर एंकर को कल से क्या कहें।‘ अड़ंगेबाज बोला।

संपादक ने महिला एंकर का मुंह देखा। एंकर ने संपादक का। मीटिंग के बाकी लोगों ने उन दोनों का।

अड़ंगेबाज बोला- ‘सर प्रोड्यूसर को कल से निर्माता कह दें क्या?‘

संपादक फिर सोच में डूब गया।

अड़ंगेबाज फिर बोला-‘सर आउटपुट डेस्क, इनपुट डेस्क, असाइनमेंट डेस्क, रिपोर्टर का भी हिंदीकरण जरूरी है। आप सुझाएं क्या बोला जाना चाहिए?‘

संपादक अब सोच से आगे की अवस्था चिंता में चला गया।

अड़ंगेबाज को मजा आने लगा। बोला-‘सर ओबी वैन, कंप्यूटर, माइक, टेलीप्रॉम्पटर, स्टूडियो वगैरह की भी हिंदी लगे हाथ बता दीजिए ताकि एक बार में ही सारा चैनल हिंदीमय हो जाए।‘

संपादक अब चिंता से आगे की मुद्रा निद्रा में जाने को बेकरार दिखने लगा।

‘कार साकी’ भी चुप था। लेकिन जानता था कि ऐसे चुप रहा तो अगला इंक्रीमेंट नहीं हो पाएगा। क्योंकि उसका इंक्रीमेंट संपादक को मुश्किल वक्त से निकालने की उसकी कोशिशों पर ही निर्भर था।

‘सर, मुझे लगता है कि हिंदी दिवस पर कार्यक्रम की टीआरपी नहीं आएगी। और बिना टीआरपी के प्रोग्राम का कोई मतलब नहीं।‘ कार साकी बोला

संपादक ने हां में सिर हिलाया।

कार साकी ने आगे कहा-‘सर, हिंदू-मुसलमान खोज लेते हैं कोई.....उसी पर बना देते हैं कोई प्रोग्राम। हिंदी दिवस पर मिठाई मंगा लेंगे।’

संपादक निद्रा से बाहर आने लगा।

‘हां, अच्छा आइडिया है....टीआरपी इज मस्ट।  वी ऑल शुड कंसन्ट्रेट ऑन टीआरपी ओनली.....’ संपादक ने कहा और मीटिंग खत्म हो गई।

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मिस्टर मीडिया: हम कितने ग़ैर ज़िम्मेदार और देहाती हैं 

 पत्रकारिता अभिव्यक्ति का माध्यम है। पेशा नहीं। यह दाल रोटी की जुगाड़ का ज़रिया हो सकता है

Last Modified:
Friday, 13 September, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल

वरिष्ठ पत्रकार 

पत्रकारिता अभिव्यक्ति का माध्यम है। पेशा नहीं। यह दाल रोटी की जुगाड़ का ज़रिया हो सकता है। किसी भी अन्य रोज़गार की तरह, लेकिन अभिव्यक्ति रोज़गार नहीं हो सकती। स्वतंत्र अभिव्यक्ति हमारा मौलिक अधिकार है। बशर्ते उसमें कोई दुर्भावना न छिपी हो। 

अफ़सोस यह है कि पत्रकारिता में भी एक वर्ग ऐसा पनप रहा है,जो रोज़गार देने वाले संस्थान के पास अपनी अभिव्यक्ति भी जैसे गिरवी रख देता हैं। किसी के आठ घंटे उसे सौंपे गए काम का हिस्सा हो सकते हैं। उस काम को उसे पेशेवर (प्रोफेशनल) तरीक़े से करना ही चाहिए। इसमें दो मत नहीं हो सकते। मगर, सौंपे गए काम से उसके विचारों की उड़ान के पंख नहीं कुतरे जा सकते। जहां यह घालमेल होता है, उस प्रोफेशनल की अपनी पहचान ख़त्म हो जाती है।

बीते सप्ताह अनेक उदाहरण देखने को मिले। सबसे बड़ा सुबूत पाकिस्तान के मामले में सामने आया। पाकिस्तान को एक शत्रु देश की श्रेणी में रखे जाने पर शायद ही किसी को एतराज हो। अपने जन्म से ही वह एक ऐसे नक़ली मुल्क़ के रूप में उभरकर सामने आया है, जो सिर्फ़ हिन्दुस्तान से नफ़रत के आधार पर जीवित है। अवाम वही है, जो शान्ति से दो पड़ोसियों की तरह रहना चाहती है, पर हुक़्मरानों ने उसे केवल अपने स्वार्थों के लिए एक सत्यानाशी देश की श्रेणी में खड़ा किया है। 

भारतीय मीडिया में हाल के दिनों में पाकिस्तान का ज़िक्र कुछ इसी तरह हो रहा है। विडंबना यह है कि पाकिस्तान को मीडिया नष्ट करने के लिए जिस भाषा का इस्तेमाल करता है, वह किसी भी सूरत में शिष्ट नहीं है। हम उस देश को कुछ इस तरह प्रस्तुत करते हैं, जैसे उसकी हैसियत एक चींटी से अधिक नहीं है और उसे आप चुटकियों में मसल कर रख देंगे। निवेदन है कि मौजूदा माहौल में दो मुल्क़ों के बीच जंग लड़ना भी इतना आसान नहीं रहा है। पाकिस्तान के मित्र देश भले ही अधिक न हों, लेकिन अकेला चीन ही पर्याप्त है। 

परदे पर या अख़बार के पन्नों पर जंग की भाषा का प्रस्तुतिकरण शर्मनाक और स्तरहीन हो सकता है, हाल के दिनों का कवरेज उसका नमूना है। ऐसा लगता है कि अगर न्यूज़रूम के प्रोड्यूसरों के हाथ में रायफलें दे दी जाएं तो लाहौर से लेकर पेशावर तक ये लोग क़ब्ज़ा करके तिरंगा लहरा देंगे। भारतीय सेना को अपने क़दम बैरकों से निकालने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। आज समूचे संसार में जितने भी संवेदनशील जंगी मसले हैं ,कृपया उनका कवरेज भी अंतर्राष्ट्रीय चैनलों और माध्यमों में देखिए। साफ़ पता लगता है कि हम कितने ग़ैर ज़िम्मेदार और देहाती हैं। जंग के लिए आम अवाम को उकसाना और भड़काना ही देशभक्ति नहीं है। मसले का तर्कपूर्ण, तथ्यपरक और संतुलित विश्लेषण भी देशभक्ति है मिस्टर मीडिया !  

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मेरे जहन में हमेशा ताजा रहेगा राम जेठमलानी का वह इंटरव्यू

जेठमलानी विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। महज 17 साल की उम्र में उन्होंने न केवल लॉ की डिग्री हासिल की, बल्कि अपना पहला केस भी लड़ा

Last Modified:
Monday, 09 September, 2019
Ram Jethmalani

तरुण नांगिया, वरिष्ठ पत्रकार।।

आठ सितंबर 2019, रविवार, सुबह 7.45 बजे, राम जेठमलानी निचली अदालत यानी पृथ्वी छोड़कर भगवान की अदालत में बहस के लिए प्रस्थान कर गए। कई मौकों पर आपने मुझसे कहा था कि आप खुलकर और बेवाकी से अपनी बात रखते हैं, क्योंकि आप जीवन रूपी हवाईअड्डे के प्रतीक्षा कक्ष में बैठे हैं और विमान किसी भी समय उड़ान भर सकता है। आज आप उस विमान में सवार होकर भगवान की अदालत में बहस के लिए चले गए हैं, लेकिन आपके यूं जाने से जो एक खालीपन हमारे जीवन में आया है, उसे भरा नहीं जा सकता।

जेठमलानी विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। महज 17 साल की उम्र में उन्होंने न केवल लॉ की डिग्री हासिल की, बल्कि अपना पहला केस भी लड़ा। उस दौर में वकील बनने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष थी। जेठमलानी ने इसके खिलाफ अदालत में याचिका दायर की, जिसके बाद उन्हें कोर्ट से विशेष अनुमति मिल गई।

भारत-पाक बंटवारे के बाद जेठमलानी मुंबई में बस गए। ये उनकी जिंदगी का सबसे कठिन समय था। उन्होंने कई रातें रिफ्यूजी कैंप में गुजारीं, लेकिन मेहनत के बल पर वह अपनी एक अलग पहचान बनाने में कामयाब रहे। सबसे पहले वह केएम नानावती केस हाथ में लेने के चलते सुर्खियों में आये, जिसे हाल ही में अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म ‘रुस्तम’ के माध्यम से बड़े पर्दे पर दिखाया गया है।

आपातकाल की खिलाफत में  जब करीब 1.5 लाख लोगों को बिना मुकदमे के जेलों में बंद कर दिया गया था। एडीएम जबलपुर बनाम एसएस शुक्ला मामले की सुनवाई के दौरान, जिसे बंदी प्रत्यक्षीकरण मामले के रूप में भी जाना जाता है, उस समय के अटॉर्नी जनरल नीरेन डे ने अदालत को बताया कि जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत हैं। आपातकालीन शक्तियों के तहत हिरासत में लिए गए लोगों के पास कोई लोकल स्टैंडी नहीं है और उनकी याचिकाओं को खारिज करना होगा। इस पर न्यायमूर्ति एचआर खन्ना ने पूछा, ‘अनुच्छेद 21 में भी जीवन का उल्लेख है और क्या सरकार इसे भी इस हद तक आगे बढ़ाएगी?’ जिस पर डे ने जवाब दिया, ‘भले ही जीवन अवैध रूप से छीना गया हो, अदालतें असहाय हैं।‘

बहस पूरी होने के बाद अदालत को संबोधित करते हुए राम जेठमलानी ने कुछ ऐसा कहा, जिसने उनके समर्थकों की संख्या को एकाएक बढ़ा दिया। उन्होंने अदालत से कहा, ‘इस कोर्ट ने कभी भी किसी मामले को इतने महत्वपूर्ण तरीके से नहीं निपटाया। एक ऐसा मामला जिस पर कुछ लोगों को छोड़कर सभी की आजादी निर्भर करती है, यह कहना गलत नहीं होगा कि लोकतंत्र पहले से ही कॉफिन में हैं। सरकार अपने किये पर पर्दा डालना चाहती है, पूरी दुनिया की निगाहें आज अदालत पर हैं। लोग यह देखना चाहते हैं कि आप (न्यायाधीश) एक भयानक त्रासदी से जुड़े गंभीर मामले पर क्या रुख अख्तियार करते हैं। आप समकालीन राय के लिए तिरस्कारपूर्ण व्यवहार का सामना कर सकते हैं, लेकिन लंबे समय बाद भावी पीढ़ी आपके फैसलों को पढ़ेगी और अपने निष्कर्ष निकालेगी।’

उन्होंने यह भी कहा, ‘अब आप इसे एक आदर्श उदाहरण की तरह सामने रखना चाहते हैं या अवमानना की तरह, यह आपको चुनना है। लेकिन याद रखें कि आपातकाल को उन लोगों द्वारा स्थायी किया जा सकता है जो खुद को स्थायी बनाने के लिए दृढ़ हैं।’

इसके बाद जेठमलानी, स्वत: निर्वासन पर कनाडा चले गए। आपातकाल हटने के बाद वह वापस लौटे और बंबई उत्तर पश्चिम लोकसभा क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। अपने राजनीतिक करियर में उन्हें दो बार कानून मंत्री बनने का मौका मिला, लेकिन उनके जीवन का दूसरा पक्ष भी था। उन्हें पढ़ाना पसंद था और इसलिए उन्होंने नेशनल लॉ स्कूलों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लगभग चार दशक पहले बार काउंसिल के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने एनआर माधव मेनन को प्रभावित किया। फिर दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय में पहुंचकर भारतीय कानूनी शिक्षा में एक नया प्रयोग शुरू किया, जिसके बाद मेनन ने दिल्ली विश्वविद्यालय से तीन साल का विश्राम लिया और बार काउंसिल ऑफ इंडिया से जुड़ गए, जिसने राज्यों के लिए लॉ स्कूलों का एक नया मॉडल पेश किया। इसके आधार पर पहला लॉ स्कूल कर्नाटक में स्थापित किया गया, जिसे नेशनल लॉ स्कूल, बेंगलुरु के रूप में जाना जाता है।

एक बार जेठमलानी के निवास पर उनका साक्षात्कार करते हुए मैंने उनसे पूछा था कि आप किंग सोलोमन की बहुत प्रशंसा करते हैं? जिसके जवाब में उस समय 91 वर्षीय जेठमलानी ने कहा ‘यंग मैन, मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूं, आदमी जितना बूढ़ा होता जाता है, उसके साथी उतने ही जवान होने चाहिए’, इतना कहते ही उन्होंने एक बड़ी मुस्कान के साथ मुझे देखा। कुछ साल पहले लिया गया उनका यह इंटरव्यू आज भी मेरे जहन में ताजा है और हमेशा रहेगा।

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‘पत्रकारिता में गुरु बनाने से पहले इस बात का रखें खास ध्यान’

कुछ पेशे तो ऐसे हैं, जो गुरुओं के आशीर्वाद से ही चलते हैं। मसलन, राजनीति और पत्रकारिता

Last Modified:
Thursday, 05 September, 2019
KM Sharma

कृष्ण मोहन शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार।।

‘सफलता’ से ज्यादा ‘गरिमा’ को महत्व देने की जो बात कहे, वही आपका गुरु है। वो व्यक्ति कोई भी हो सकता है। आपकी मां हो सकती है, आपके पिता हो सकते हैं। हो सकता है कि आपकी पत्नी हो, आपके दोस्त हों, आपके शुभचिंतक हों या फिर वास्तव में आपके शैक्षणिक गुरु। रिश्तों का गुरु के अस्तित्व में होने या नहीं होने से कोई मतलब नहीं होता, कोई भी व्यक्ति आपका गुरु हो सकता है।

कुछ पेशे तो ऐसे हैं, जो गुरुओं के आशीर्वाद से ही चलते हैं। मसलन, राजनीति और पत्रकारिता। दोनों में फर्क सिर्फ इतना है कि राजनेता अपने शिष्य की मदद दलगत राजनीति से ऊपर उठकर भी करते हैं, लेकिन पत्रकारिता में अक्सर यह देखा गया है कि आप अगर किसी वजह से फिसल गए तो आपका गुरु सबसे पहले आपको त्याग देगा।

लेकिन गुरु तो गुरु होता है। ये बात अलग है कि कोई सिर्फ अपनी जाति के लोगों को अपना शिष्य बनाता है, कोई किसी खास धर्म के लोगों को शिष्य बनाता है, कोई किसी राज्य विशेष के लोगों को शिष्य बनाता है। कई की पसंद लैंगिक भी होती है, लेकिन फिर भी कहूंगा कि गुरु तो गुरु होता है, चाहे वो बौद्धिक गुरु हो या फिर शैक्षणिक गुरु। सही मायने में जो ‘सफलता’ से ज्यादा ‘गरिमा’ को महत्व देने की बात कहे, वही आपका असली गुरु है ।

गुरु की बात को जेहन में रखकर सदैव काम करना यूं तो कहने में बहुत अच्छा लगता है, लेकिन इसे अमल में लाकर काम करना बहुत मुश्किल है। खासकर तब, जब इंडस्ट्री के तथाकथित गुरु खुद को बचाने के लिए शिष्यों की बलि ले रहे हों। बात ‘मैनेजेरियल इथिक्स’ की कर रहें हो और एचआर (HR) मैनेजर को अपना दोस्त बना लिया हो।

मुझे श्री कन्हैया लाल नंदन, त्रिनेत्र जोशी, वीरेन्द्र सेंगर, शेष नारायण सिंह, विनोद अग्निहोत्री, अमिताभ, सुप्रिय प्रसाद, संतोष भारतीय, शैलेष कुमार, राम कृपाल सिंह और कमर वाहिद नकवी, जी कृष्णन जैसे लोगों के मार्गदर्शन में काम करने का मौका मिला। इनमे से कई को मुझमें ‘शिष्य’ नहीं मिला तो मुझे भी इनमें से कई लोगों में अपना ‘गुरु’ नहीं मिला। इसे मैं अपना दुर्भाग्य ही मानूंगा कि कई ने मुझे अपना शिष्य नहीं बनाया और कई को मैं अपना गुरु नहीं बना पाया।

ईमानदारी और उसूलों के साथ नौकरी करना आज के दौर में बहुत कठिन काम है। खासकर तब, जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ‘म्यूजिकल चेयर’ का खेल चल रहा हो। जब टीवी में नौकरी करने वाले 20 प्रतिशत पत्रकारों की योग्यता साल के अंत में संस्थान के लिए अप्रासंगिक हो जा रही हो। ऐसे में गुरु की तलाश निश्चित ही एक मुश्किल काम है। लेकिन, इन तमाम सारी थ्योरी और खामियों के बावजूद आज भी पत्रकारिता के पेशे में ‘गुरु-शिष्य’ परंपरा कायम है। रजत शर्मा, प्रणॉय रॉय राय, कमर वाहिद नकवी, हेमंत शर्मा, सुप्रिय प्रसाद जैसे लोग आज भी अपने शिष्यों का ख्याल रखते हैं। यह बात अलग है कि इनमें से कोई आपको अपना शिष्य बनाएगा या नहीं, लेकिन परंपरा अब भी जिंदा है।

बात 2006 की है जब ‘आजतक’ में नौकरी के लिए शैलेष, राम कृपाल सिंह और कमर वाहिद नकवीजी के पैनल में मेरा साक्षात्कार हो रहा था। काफी देर तक सवाल-जवाब के बाद कमर वाहिद नकवीजी ने एक सवाल पूछा कि आखिर आपने नौकरी क्यों छोड़ी? मेरा जवाब था, ‘सर, स्वाभिमान बेचकर नौकरी नहीं हो सकती।’ इस जवाब के बाद नकवीजी ने कहा कि ठीक है जाइए, देखता हूं। चार दिनों के बाद मुझे जानकारी मिली कि मुझे ‘आजतक’ में नौकरी मिल गई है। जॉइन करने के करीब तीन साल बाद नकवीजी ने एक दिन कहा कि जो व्यक्ति सफलता से ज्यादा गरिमा को तव्वजो देता है,वही एक दिन बड़ा आदमी बनता है।

नकवीजी मुझे अपना शिष्य मानते हैं या नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन मैं उन्हें अपना गुरु मानता हूं। इसलिए शिक्षक दिवस के अवसर पर पत्रकारिता के छात्रों को यह मान लेना चाहिए कि ‘सफलता’ से ज्यादा ‘गरिमा’ को महत्व देने की जो बात कहे, वही आपका गुरु है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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मिस्टर मीडिया: पत्रकारों के खिलाफ आखिर यह किस तरह की मानसिकता है?

केंद्रीय गृह मंत्रालय के पिछले चालीस साल के परिपत्र देखिए। ऐसा लगता है कि सबकी होली जला दी गई है।

राजेश बादल by समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
Published - Wednesday, 04 September, 2019
Last Modified:
Wednesday, 04 September, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

मत कहो आकाश में कोहरा घना है/ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है/प्रेस और पब्लिक तो अब इतने मुखर हैं/बात ये है कि नमक रोटी का भोजन बना है/बीहड़ों में छोड़ दो नन्हें चिराग/चेहरा इनका भी तो गुस्से से तना है/(छेड़छाड़ के लिए दुष्यंत कुमार से माफी के साथ)

खतरनाक दौर है। पत्रकारों के साथ सरकारी जुल्म की कथाएं सीमा पार कर रही हैं। उत्तर प्रदेश में पुलिस बेलगाम दिखाई दे रही है। अनुभव तो यही कहता है कि जब तक लखनऊ से इशारा नहीं होता, तब तक पत्रकारों के साथ इस तरह का व्यवहार नहीं हो सकता। गृहमंत्री आंखें मूंदे हैं और मुख्यमंत्री कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। लगता है कि जैसे पुलिस और प्रशासन ने पत्रकारों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

यूपी में एक पत्रकार बच्चों के मध्यान्ह भोजन की पोल खोलता है तो उसी के खिलाफ कार्रवाई हो जाती है। विडंबना है कि वह पत्रकार बाकायदा संबंधित अफसरों को बताकर जाता है। उसका विडियो फुटेज उन्हें दिखाता है और उसे ही अपराधी बना दिया जाता है। जिस देश में अगली पीढ़ियों को कुपोषण से मारने की साजिश खुद सरकारी कारिंदे करें, उसका भला कौन करेगा।

इसी राज्य के एक अन्य शहर में कवरेज के लिए गए पत्रकार के कपड़े फाड़ दिए जाते हैं तो तीसरे शहर में पत्रकारों को धरने पर बैठना पड़ जाता है। चौथे शहर में एक पत्रकार के दफ्तर पर दबंग नेताजी ने ताला जड़ दिया और उसकी जान के पीछे पड़े हैं। कसूर यह था कि उसने दबंग नेताजी की करतूतें उजागर की थीं। पांचवें वीआईपी बनारस में प्रेस फोटोग्राफर ने गंगा की सफाई करते बाल श्रमिकों की तस्वीरें निकाली तो कैमरा छीन लिया गया। अब उसे धमकाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश से इस तरह स्थानीय संवाददाताओं को यातनाएं देने की अनेक कहानियां मिल रही हैं। मैंने तो चंद बानगियां पेश की हैं।

देश के अन्य राज्य भी इन दिनों पत्रकारों को सताने के मामले में पीछे नहीं हैं। बिहार के शहर में पुलिस अफसर एक पत्रकार का मोबाइल तोड़कर धमकाता है। बंगाल में एक पुलिस अधिकारी पत्रकार को पीट देता है तो जम्मू-कश्मीर के एक पत्रकार को प्रशिक्षण शिविर के लिए जर्मनी जाने से ठीक पहले एयरपोर्ट पर रोक दिया जाता है। यह किस मानसिकता का नमूना है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के पिछले चालीस साल के परिपत्र देखिए। ऐसा लगता है कि सबकी होली जला दी गई है। अब तो किसी अफसर के खिलाफ कार्रवाई भी नहीं होती।

याद आ रहा है-चालीस बरस पहले मैं जिला स्तर का संवाददाता था तो जनहित में एक गोपनीय मजिस्ट्रेटी जांच के अंश छापने के कारण सारे पत्रकारों के खिलाफ़ जिला कलेक्टर ( कहीं जिला मजिस्ट्रेट भी कहते हैं) ने अमानवीय उत्पीड़न का सिलसिला हम लोगों के खिलाफ खोल दिया था। हमने विधानसभा में एक तरह से धरना दिया। सात-आठ घंटे बहस चली और भारत में प्रेस को सताए जाने के मामले की पहली ज्यूडीशियल इन्कवायरी हुई। न्यायिक जांच आयोग ने हम पत्रकारों के सारे आरोप सच पाए और प्रशासनिक मशीनरी शर्मसार हुई। सलाम उस दौर के पुलिस अफसरों को, जिन्होंने कलेक्टर के निर्देश पर हम लोगों को गिरफ्तार करने से इनकारकर दिया और जांच आयोग में उनके विरोध में गवाही दी। यही नहीं,उस समय प्रेस काउंसिल ने सुओमोटो ( स्व प्रेरणा से ) जांच दल भेजा। प्रेस काउंसिल ने भी हम सारे पत्रकारों के आरोप सच पाए और हमारे हक में फ़ैसला दिया। बेहद तकलीफ़ होती है यह सोचकर कि वाकई हमने ये दौर देखा है?

अब तो दुष्यंत कुमार की ही याद आती है मिस्टर मीडिया!

चल भई गंगाराम भजन कर

सूखे ताल भरी दोपहरी/प्यासी मारी फिरे टिटहरी/गर्मी गहरी से भी गहरी/सहनी है, चुपचाप सहन कर/

घर के दरवाजों पर पहरा/ जलसों पर नारों पर पहरा/सारे अखबारों पर पहरा/खबरें आतीं हैं छन छनकर/

अपनी कलम उठाकर रख दे/ या इसको फिर इसका हक दे/तनिक सचाई की न झलक दे/सिर्फ़ उजालों का वर्णन कर/

पथ ऐसे सुनसान पड़े हैं/ जैसे लोग यहां लंगड़े हैं/कुछ जो राहें रोक खड़े हैं/हाथ जोड़कर इन्हें नमन कर/

वे जो प्रतिभावान बड़े हैं/उनके साथ बड़े लफड़े हैं/ अंतिम निर्णय का अवसर है/इन प्रश्नों पर आज मनन कर/

मैंने देखा यार निकट से/ कोई त्राण नहीं संकट से/यह सर ऊंचा है चौखट से/और फिर तू चलता है तनकर/ चल भई गंगाराम भजन कर/

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

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मिस्टर मीडिया: यह कार्यशैली दिखाती है पत्रकारों का अधकचरापन

मिस्टर मीडिया: अनुच्छेद 370: मीडिया कवरेज से दिल बाग-बाग नहीं हुआ

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उत्तर प्रदेश: बीत गए तीन साल, अब तो 'महाराज' करो कुछ 'बेमिसाल'

केवल सरकार की अच्छी मंशा से जनता कुछ समय तो संतुष्ट हो सकती है, मोदीजी के नाम पर प्रदेश को भारी बहुमत से भाजपा सरकार दे सकती है, लेकिन अब प्रदेश सरकार को अपने कार्यों से इस मंशा को सिद्ध करना ही होगा

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
Published - Wednesday, 04 September, 2019
Last Modified:
Wednesday, 04 September, 2019
Puran Dawar

पूरन डावर 

प्रखर चिंतक एवं विश्लेषक ।।

उत्तर प्रदेश सरकार के तीन वर्ष का कार्यकाल संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। यदि यह कहा जाये कि विकास की दृष्टि से अब तक के कार्यकालों में पीछे रहा है, तो यह कतई गलत नहीं होगा। विकास के नाम पर एक भी बड़ा कार्य दिखाया नहीं जा सकता। इस सरकार द्वारा आते ही 30 जून को गड्ढामुक्ति की घोषणा की गई। उस दौरान एक विश्वास की लहर दौड़ गयी थी, लेकिन तीन साल में गड्ढामुक्ति के नाम का कार्य शुरू भी नहीं हुआ। घोषणाएं कभी ब्रज क्षेत्र के विकास की होती हैं, कभी पूर्वांचल की तो कभी बुंदेलखंड की, लेकिन विकास कार्य शुरू नहीं हुआ है।

मायावती के कार्यकाल में यमुना एक्सप्रेस वे, अखिलेश यादव के कार्यकाल में लखनऊ एक्सप्रेस वे, पूर्वांचल एक्सप्रेस वे की योजना,रिंग रोड, ताजमहल का VIP रोड, मुगल म्यूजियम, कैफे स्ट्रीट जैसी अनेक योजनाएं बनीं। मायावती के पहले कार्यकाल में यमुना पर हेरिटिज कॉरिडोर की योजना शुरू हुयी, लेकिन राजनीति और कुछ तथाकथित पर्यावारणविदों की भेंट चढ़ गयी। लखनऊ का बड़ा विकास भी मायावती और अखिलेश के समय हुआ। यह बात अलग है कि इन योजनाओं में भ्रष्टाचार के आरोप लगे। जनता का सीधा सरोकार इन भ्रष्टाचारों से नहीं है और जिस भ्रष्टाचार से है, उसमें उत्तर प्रदेश में कतई कमी नहीं आयी। गुजरात मॉडल का बढ़-चढ़कर प्रचार किया गया, लेकिन एक भी मॉडल अपनाया नहीं गया।

न प्रदेश में मास्टर प्लान लागू करने की नीति है, न जोनल प्लान की। जनता के पास अवैध निर्माण के अतिरिक्त कोई रास्ता ही नहीं है। एक तरफ जमीन का संकट है। प्रदेश में उद्योगों या अन्य योजनाओं के लिए जमीन नहीं है, दूसरी तरफ हजारों एकड़ भूमि बीस-बीस सालों से अधिग्रहण की कागजी योजनाओं के कारण सड़ रही है। यह न अधिग्रहीत की जाती है और न अवमुक्त की जाती है। ऐसे में न सरकार प्रयोग कर पाती है और न भूस्वामी।

न एक भी वॉटर फ्रंट बना और न एक भी हवाई अड्डा। न पर्यावरण की कोई स्पष्ट नीति है और न कूड़ा निस्तारण की कोई ठोस व्यवस्था। स्मार्ट सिटीज की दुर्दशा जो उत्तर प्रदेश में है, वह कहीं हो नहीं सकती। आगरा में रिंग रोड के सहारे नए शहर के प्लान बने, लेकिन आज उनका कोई अत-पता नहीं है। इन्वेस्टमेंट समिट अवश्य हो रहे हैं, सब्सिडी की घोषणाएं हो रही हैं। उद्योगों को सब्सिडी की नहीं, स्वस्थ वातावरण की ज़रूरत है। सिंगल विंडो अभी दूर की कौड़ी है।

उल्लेखनीय है कि आगरा को टोरेंट की अद्वितीय विद्युत सेवा भी मायावती के कार्यकाल में मिली। भाजपा शहर की विद्युत व्यवस्था निजी हाथों में नहीं दे सकी। न सरकारी व्यवस्था में सुधार आया और न बिजली चोरी में कमी। 2.40 रुपए की बिजली 9 रुपए में बेचकर भी भयंकर घाटे में, ऊपर से 12% की वृद्धि। हम पिछले भ्रष्टतम कार्यकालों का समर्थन नहीं कर रहे, बल्कि उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार को वास्तविकता दिखा रहे हैं। गरीबों के लिए बनी प्रधानमंत्री आवास योजना में भी उत्तर प्रदेश सबसे पीछे। भुखमरी के शिकार लोगों के लिए अन्नपूर्णा योजना की योगीजी ने घोषणा की थी, जिसका कोई अता-पता नहीं है।

जो दिखता है, वह बिकता है। अभी दो वर्ष हैं। सरकार से जो अपेक्षाएं हैं, वो पूरी करनी होंगी। केवल सरकार की अच्छी मंशा से जनता कुछ समय तो संतुष्ट हो सकती है, मोदीजी के नाम पर प्रदेश को भारी बहुमत से भाजपा सरकार दे सकती है, लेकिन अब प्रदेश सरकार को इस मंशा को अपने कार्यों से सिद्ध करना ही होगा। सड़कें गड्ढामुक्त करनी होंगी। ऐसी कि दिव्यांग को भी स्वतः बोध हो जाए और लाठी गड्ढे में न गिरे। यदि सड़कें गड्ढा मुक्त होंगी तो प्रचार की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, बात अमेरिका तक स्वतः पहुंच जाएगी। सड़कें धूलरहित हों, इसके लिये प्लान मात्र सरकारी कार्यालयों द्वारा नहीं विशेषज्ञों द्वारा बनें।

पर्यावरण की स्पष्ट प्रभावी नीति बनानी होगी। अपनी नाकामियों का ठीकरा उद्योगों पर न फोड़कर प्रभावी व्यवस्थाएं हों। कूड़ा एकत्रीकरण और निस्तारण की व्यवस्था हो। मात्र प्लास्टिक बंद के कानून बनाकर इतिश्री नहीं की जा सकती। प्लास्टिक-पॉलीथिन आज जीवन का अंग बन चुके हैं। इन्हें बंद कर जीवन को रोका नहीं जा सकता। विश्व में कहीं भी इन पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। हतोत्साहित अवश्य किया जाना चाहिये। यदि सरकार निस्तारण की व्यवस्था या प्रबंधन में नाकाम है तो जीवन को दूभर भी नहीं बनाया जाना चाहिए।

वाहनों से हो रहे प्रदूषण को सीमित करने के लिए आवश्यक है कि हर शहर में रिंग रोड प्राथमिकता पर बनाए जाएं हों। इससे शहरों का प्रदूषण कम होगा, ट्रैफ़िक की समस्या हल होगी और प्रगति की गति भी बढ़ेगी। जन कार्यों और उद्योगों के लिये भूमि अधिग्रहण की स्पष्ट एवं समयबद्ध नीति बनानी होगी। स्पष्ट नीति होगी तो अदालतें सीमित हस्तक्षेप करेंगी। अधिकतम समय तीन वर्ष से अधिक नहीं होना चाहिये। तीन वर्ष बाद योजना पूरी नहीं होती या अधिग्रहीत नहीं होती तो स्वतः समाप्त होनी चाहिए। हर योजना का एक नोडल अधिकारी हो जो इसे समयबद्ध पूरी कराये और कार्य का आकलन करे।

उत्तर प्रदेश में नगरीय मास्टर प्लान व जोनल प्लान की स्पष्ट ‘लैंड पूलिंग ‘नीति हो, ताकि समयबद्ध और नियोजित विकास हो सके। विडम्बना है कि 20 वर्ष का मास्टर प्लान बनता है और 20 वर्ष में शायद एक भी कार्यान्वित हो पाता हो। मजबूरी में अनियोजित एवं अवैध निर्माण होते हैं। इस समस्या पर बिना किसी देरी के स्पष्ट नीति आवश्यक है और इसमें कोई रॉकेट साइंस नहीं है। किसी भी प्रदेश की नीति कट-पेस्ट की जा सकती है। गुजरात की उपयुक्त हो सकती है।

पर्यटन देश की अर्थव्यवस्था है। उत्तर प्रदेश इसमें अग्रणी होना चाहिये। विश्व धरोहर ताजमहल के अतिरिक्त कई धार्मिक स्थल (कृष्ण जन्मभूमि ब्रज, बाबा काशी विश्वनाथ वाराणसी, राम जन्मभूमि अयोध्या) होते हुए भी प्रदेश आर्थिक रूप से सबसे समृद्ध क्यों नहीं हो सकता? इन सभी का विकास अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ संस्थाओं द्वारा या उनके निर्देशन में होना चाहिये।

उत्तर प्रदेश नदियों का प्रदेश है। मथुरा,आगरा, कानपुर, प्रयागराज या वाराणासी पर आध्यात्मिक घाटों सहित विश्वस्तरीय वॉटर फ्रंट से गंगा-यमुना जैसी नदियां प्रदेश के विकास की गति को आसमान पर ले जा सकती हैं। इन सारे शहरों में ‘पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप’(पीपीपी) मॉडल पर आधुनिक हवाई अड्डे हों। हवाई पट्टी एयरफोर्स की प्रयोग की जा सकती है चेक इन व्यवस्था आधुनिक तकनीक युक्त हो। मोनो रेल से हवाई पट्टी तक पहुंचा जा सकता है। सरकार कोई भी योजना बनाये, उसका जिम्मेदार एक सक्षम नोडल अधिकारी हो, जो इस योजना को समयबद्ध पूरा करा सके। ऐसे अधिकारी पुरस्कृत होने चाहिए।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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क्यों इन मुद्दों को अपने डिबेट शो का हिस्सा नहीं बनाते हैं न्यूज चैनल्स?

दिग्गजों की सलाह को अनदेखा करना अज्ञान या गफलत की वजह से नहीं हो रहा है, इन्हें जानबूझ कर इसलिए इग्नोर किया जा रहा है ताकि सही स्थिति देश के लोगों के सामने न जा पाए

Last Modified:
Friday, 30 August, 2019
Santosh Bhartiya

संतोष भारतीय, वरिष्ठ पत्रकार।।

मैं इस आशा से यह लिख रहा हूं, ताकि इन विषयों की सत्यता मेरे साथी खासकर पत्रकार साथी बता सकें कि मैं कितना सही लिख रहा हूं और कितना गलत लिख रहा हूं। हालांकि मैं जानता हूं कि मैं खुद को उस वर्ग के निशाने पर ला रहा हूं, जिसने इस कहावत को सत्य साबित किया है कि सावन के अंधे को हमेशा हरा ही हरा सूझता है। जिस-जिसकी आंखें अच्छे भविष्य का सपना देखते हुए या उसे सही मानते हुए बंद हुई हैं, वह मेरे आज के विषय को अच्छे भविष्य की आलोचना के रूप में देखेगा, लेकिन इस खतरे को उठाकर भी मैं कहना चाहता हूं कि अगर मुझे मेरे पत्रकार मित्र बता सकें कि मैं गलत विषय उठा रहा हूं तो मैं उनका आभारी रहूंगा।

आज जब भी हम न्यूज चैनल के प्रोग्राम देखते हैं, खासकर शाम 4:00 बजे से रात के 10:00 बजे तक के प्रोग्राम, तब लगता है कि हमारे न्यूज चैनल के विषयों का चयन करने वाले भारत में नहीं, बल्कि कहीं बाहर रहते हैं। अब विज्ञापन के द्वारा कपड़ा, धागा, चाय ऑटो कंपनियों को देश के लोगों को यह बताना पड़ेगा कि उनका उद्योग इतनी खस्ता हालत में पहुंच गया है कि जिसे बर्बाद कहना भी स्थिति की भयावहता को पूरा नहीं दर्शाता।

ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों के 85 हजार से ज्यादा कर्मचारी अभी हड़ताल पर चले गए थे, लेकिन हमारे पत्रकार साथियों ने देश को यह नहीं बताया यह मजदूर वेतन-भत्ते या सुविधाओं के लिए हड़ताल पर नहीं गए थे, ये तो सरकार से यह कह रहे थे कि ऑर्डिनेंस सेक्टर को प्राइवेट या कारपोरेट क्षेत्र में नहीं दिया जाए, जिसकी कि सरकार योजना बना रही है। रेलवे के मजदूर हड़ताल पर जाने वाले हैं, क्योंकि उनकी मांग है कि रेलवे को निजी क्षेत्र में न दिया जाए, क्योंकि इससे करोड़ों लोगों की नौकरियां चली जाएंगी।

बीएसएनल, जेट एयरवेज के बहुत से कर्मचारियों की नौकरियां जा चुकी हैं। डॉलर की तुलना में रुपया 73 क्रॉस कर गया है, सोना 40000 छू रहा है। इतना ही नहीं, बैंकिंग सेक्टर बुरी तरह लड़खड़ा रहा है। न जाने कब बैंक देश के लोगों को धोखा देकर उनकी बचत का पैसा वापस करने से साफ मना कर दें। सेना में पोस्ट कम कर दी गई हैं।

क्या इनके ऊपर न्यूज चैनल्स पर चर्चा नहीं होनी चाहिए? जैसे जेट एयरवेज बंद हो गई, एयर इंडिया 7600 करोड़ के घाटे में है, इसे बेचने की एक बार कोशिश हो चुकी है, लेकिन कोई खरीददार नहीं मिला। दोबारा इसकी कोशिश में भारत सरकार की टीम दुनियाभर में घूम रही है।  बीएसएनल में 54000 नौकरियां खतरे में हैं, भारत की शान रहे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड जिसे एचएएल के रूप में जानते हैं, उसके पास अब कर्मचारियों को वेतन देने के लिए भी पैसा ही नहीं है, ऑटो इंडस्ट्री संकट में है। 12.76 लाख घर देश के 30 बड़े शहरों में खड़े हैं, लेकिन उनका कोई खरीदार नहीं है। एयरसेल कंपनी खत्म हो चुकी है, जेपी ग्रुप डूबने के कगार पर है।

भारत सरकार को सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाली ओएनजीसी और पंजाब नेशनल बैंक लगातार घाटे में जा रहा है। बैंकों ने 2.4 लाख करोड़ माफ कर दिया है, वह भी सिर्फ कुछ औद्योगिक घरानों का, सारे बैंक लगातार घाटा दे रहे हैं। देश के ऊपर 500 बिलियन से ज्यादा उधार है, रेलवे बेचने की पूरी तैयारी सरकार कर चुकी हैं और मौजूदा रेल मंत्री इसकी भिन्न-भिन्न योजनाएं बना रहे हैं। लाल किले की तरह पुरातत्व की नजर से सभी ऐतिहासिक इमारतों को किराए पर देने की पूरी योजना सरकार के पास तैयार हैं, देश की सबसे बड़ी कार बनाने वाली कंपनी मारुति ने अपना उत्पादन घटा दिया है, देश की कारों में लगने वाले सामान फैक्ट्रियों में पड़ा हुआ है जिसकी कीमत लगभग 55000 करोड रुपए है, इनका कोई खरीददार नहीं है,

सारे देश के बिल्डर तनाव के शिखर पर हैं और उनमें से कई ने आत्महत्या भी कर ली है। इसका कारण है कि इनके पास कोई खरीदार नहीं है, इसलिए कंस्ट्रक्शन ठप पड़ा है और जीएसटी की वजह से कीमतें 18 से 28 परसेंट बढ़ गई हैं। ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड के तहत आने वाली कंपनियों के डेढ़ लाख से ज्यादा कर्मचारियों के परिवार पर मानसिक दबाव और आर्थिक दबाव बढ़ गया है, क्योंकि ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड यानी ओएफबी रक्षा मंत्रालय की प्रोडक्शन कंपनी है, जो रक्षा सामान बनाती है।

देश मैं बेरोजगारी 45 साल में आज सबसे ज्यादा है। पांच हवाई अड्डे अदानी साहब को बेच दिए गए हैं। विडियोकॉन बैंक करप्ट हो गया है, टाटा डोकोमो बर्बाद हो गया है, कैफे कॉफी डे के मालिक वीजी सिद्धार्थ ने आत्महत्या कर ली है। लोग कह रहे हैं कि हजारों फैक्ट्रियां बंद हो गई हैं और सरकार की नीतियों ने सरकारी नौकरियों के दरवाजे बंद कर रखे हैं। प्राइवेट नौकरियों के रास्ते पर सरकार ने कांटे बिछा दिए हैं और खामियां खड़ी कर दी हैं।

ऊपर से एसबीआई के चेयरमैन रजनीश कुमार का कहना है कि रेट कट की वजह से बैंकों के पास नकदी की कमी नहीं है, लेकिन लोन लेने वालों की संख्या में कमी आ गई है हर कोई लोन लेने से डर रहा है और कर्ज की मांग कमजोर पड़ गई है। मांग कमजोर पड़ने की वजह से उन्होंने जोर दिया है कि अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन की जरूरत है। परसों रिजर्व बैंक ने भारत सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपए की सहायता दी है। अब इस पैसे को भारत सरकार कहां खर्च करेगी, यह साफ नहीं है। खतरा इस बात का है कि इस पैसे से सरकार के मित्र अदानी और अंबानी के पास यह रकम कहीं ना चली जाए।

रिजर्व बैंक के पुराने गवर्नर रघुराम राजन का कहना है कि अर्थव्यवस्था में लगातार जारी मंदी बहुत चिंताजनक है तथा सरकार को बैंकिंग वित्तीय, ऊर्जा क्षेत्र और गैर बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र की समस्याओं को तुरंत हल करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि निजी क्षेत्र में निवेश को बढ़ाने के लिए नए सुधारों की शुरुआत करनी होगी। एक बात और कही कि जिस तरह जीपीडीपी की गणना की गई है उस पर फिर विचार करना जरूरी है। ऊपर से भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी का कहना है कि इस हालत के जिम्मेदार पूर्व वित्तमंत्री अरुण जेटली की गलत नीतियां हैं और भारतीय रिजर्व बैंक के चेयरमैन भी इस स्थिति को स्वीकार कर रहे हैं।

उधर इंफोसिस के पूर्व सीईओ मोहनदास पाई कह रहे हैं कि इंडस्ट्री अब और झटके बर्दाश्त नहीं कर सकती। इंडस्ट्री को एक से बढ़कर एक झटके दिए जा रहे हैं। उदाहरण के रूप में वह कहते हैं कि पहले नोटबंदी फिर जीएसटी, आईबीसी, फिर  रेरा की वजह से इंडस्ट्री के सामने मुसीबतें खड़ी हो गई है। एनबीएफसी कंपनियां भी मुसीबत में पड़ गई हैं, बाजार में लिक्विडिटी नहीं है। धंधा करने के लिए पैसा नहीं है, इसलिए अर्थव्यवस्था व उद्योगों को और झटके की जरूरत नहीं है। सरकार को यह समझना चाहिए कि लोगों की क्रय शक्ति समाप्त हो गई है। गांव की इकोनॉमी ध्वस्त हो गई है। शहर भी बर्बादी की राह पर हैं। दूसरी ओर सरकार पर्दा डालने में व्यस्त है, क्योंकि उनकी सोच में एक ही लक्ष्य है हिंदू राष्ट्र बनाना, भले उसके लिए सब कुछ बर्बाद करना पड़े।  यह राम की नहीं रावण की सेना है, जो भेष बदलकर सीता हरण कर ले गई।

इसका उदाहरण पारले जी कंपनी है, जिसने घाटे की वजह से कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया है। क्योंकि ग्रामीण भारत में 5 और 10 रुपए के बिस्कुट भी नहीं बिक रहे। अब मैं कुछ और ऐसे लोगों की सलाह सामने रखना चाहता हूं, जिन्हें न्यूज चैनल अनदेखा कर रहे हैं। अनदेखा करना अज्ञान या गफलत की वजह से नहीं हो रहा है,  इन्हें जानबूझ कर इसलिए इग्नोर किया जा रहा है, ताकि यह स्थिति देश के लोगों के सामने न जा पाए। दुनिया के सामने सब साफ है, बस देश के लोगों को जानकारी न पहुंच पाए, इसके लिए ये न्यूज चैनल अपनी पूरी ताकत लगा रहे हैं।

दीपक पारेख ऐसे व्यक्ति नहीं हैं, जिनकी चेतावनी को अनसुना या अनदेखा कर दिया जाए, वे एचडीएफसी बैंक के चेयरमैन हैं। उन्होंने कहा है कि मंद पड़ रही अर्थव्यवस्था की रफ्तार  और इकोनामी संकट के दौर से गुजर रही है। इस वक्त की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि देनदार के विश्वास को बहाल किया जाए।  इसी से हालात सुधरेंगे। अभी बैंक कर्ज देने में हिचक रहे हैं, कुछ ही चुनिंदा लोगों को फंडिंग मिल पा रही है।

बजाज, l&t, महिंद्रा, मारुति सुजुकी, यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस, टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, एयरटेल, वोडाफोन, आइडिया, निशान, ऑडी, नेशनल इंश्योरेंस, ओरिएंटल इंश्योरेंस जैसी कई बड़ी कंपनियां इस समय भारी आर्थिक मंदी का सामना कर रही हैं। अकेले ऑटोमोबाइल सेक्टर में पिछले 4 महीनों में 3:30 लाख से ज्यादा लोग नौकरी से हाथ धो बैठे हैं।

कुछ अनुमान भी देखिए, जिनसे भविष्य का अंदाजा बनता है, जिन्हें न्यूज चैनल्स पूरी तरह से नजरअंदाज किए हुए हैं। इंफॉर्मेशन और आईटी सेक्टर ने इस साल अंदाजा लगाया है कि 37% नौकरियों में कमी आ सकती है। एफआईडीए ने बताया है ऑटो सेक्टर में आने वाले कुछ महीनों में 1000000 लोगों की नौकरियां संकट में हैं।

एसबीआई के चेयरमैन का कहना है, ‘मंदी से निकलने में सिर्फ और सिर्फ भगवान का ही सहारा है। मैं रोज सुबह जाता हूं, आसमान की तरफ देखता हूं कि हे परमेश्वर, हमें इस संकट से मुक्ति दिला दे।’ बजाज के एमडी राजीव बजाज ने कहा है कि ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री कोई चाय की दुकान नहीं है, जिसे रातोंरात बंद करके फिर चालू किया जा सके।  देश में 200 से ज्यादा कार शोरूम बंद कर दिए गए हैं, जिससे लगभग 25000 लोगों की नौकरी चली गई है। इसमें वह संख्या शामिल नहीं है, जो कार बनाने का या पूरे ऑटोमोबाइल सेक्टर का सहयोगी सामान बनाने का सेक्टर है, जिससे लाखों लोग एक झटके में सड़क पर आ गए हैं।

बजाज ग्रुप के चेयरमैन राहुल बजाज का कहना है कि ना मांग है और ना निवेश है, तो क्या आसमान से उतरकर विकास आएगा? आरबीआई के गवर्नर ने एक कार्यक्रम में कहा कि अर्थव्यवस्था अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। देश मैं सबसे ज्यादा रोजगार उपलब्ध कराने वाला टेक्सटाइल सेक्टर मंदी की मार झेल रहा है और लाखों लोगों के हाथ से रोजगार चला गया है। गुजरात का हीरा उद्योग विदेशी बाजारों में चमक खो बैठा है।

न्यूज चैनल इस चेतावनी का भी परीक्षण नहीं कर रहे हैं कि जहां 2013-14 में भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की तीन नंबर की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी और आज अट्ठारह-उन्नीस में हम विश्व की सातवें नंबर की अर्थव्यवस्था बन गए हैं। क्या न्यूज़ चैनल यह अंदाजा नहीं लगा पा रहे हैं कि भारत आर्थिक तौर पर बहुत ज्यादा कमजोर होता जा रहा है, कहीं मंदी बड़े स्तर पर हमें चपेट में तो नहीं लेती जा रही है।

दूसरी ओर न्यूज चैनल्स देश के सामने अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले के पक्ष में जय जयकार कर रहे हैं। हिंदू मुसलमान का सवाल और राम मंदिर का सवाल बहस में बनाए हुए हैं  तथा पाकिस्तान के खिलाफ तत्काल कदम उठाए जाएं और संभव हो तो एंकर्स को जनरल बनाकर और जनता को सीमा पर भेजकर युद्ध कर लिया जाए, जैसा माहौल योजना पूर्वक बना रहे हैं। विकास की और अर्थव्यवस्था की बात करना देश के हित के खिलाफ है, यह महान ज्ञानी और इतिहास को बदलने की ताकत रखने वाले महान शक्तिशाली चैनल इसलिए कहते हैं, क्योंकि वह सबसे बड़ा देशद्रोही काम कर रहे हैं।

दरअसल वे मंदी दिलाने वाले तत्वों के भारत में एजेंट बन गए हैं, यह बेरोजगारों के दुश्मन हैं, जनता के जानकारी पाने के अधिकार को तबाह करने के सबसे बड़े षड्यंत्रकारी हैं  या फिर यह इतने बड़े अज्ञानी हैं कि इन्हें क्या विषय लेना चाहिए, यह पता ही नहीं है  या देश किस स्थिति से गुजर रहा है, इसकी समझ ही नहीं है। शेर याद कीजिए...हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्तां क्या होगा?

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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