श्रद्धांजलि: इस नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया था शकुंतला काजमी ने

मैंने पूछा तो उन्होंने बताया कि बिटिया की स्कूली पढ़ाई पूरी हो गयी, जिसके बाद उन्होंने मीडिया में करियर बनाने के बारे में सोचा है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 14 August, 2019
Last Modified:
Wednesday, 14 August, 2019
Shakuntala Kazmi

करीब 20 साल पहले की बात है। आंखों देखी के न्यूज-रूम में पहुंचा तो एक छोटे कद की गोरी सी महिला इंटर्नशिप करने वालों के साथ बैठी थी। क्योंकि मैं न्यूज-रूम का इंचार्ज था, इसलिये उन्हें मुझसे मिलवाया गया, ये कहते हुए कि ये कैमरा विभाग में इंटर्नशिप करने आयी हैं। मैं चौंक गया। एक तो कैमरा पारंपरिक तौर पर पुरुष वर्चस्व वाला क्षेत्र और उन दिनों सौ में एक-दो ही कैमरापर्सन महिलाएं दिखती थीं। दूसरी चौंकाने वाली बात थी उनकी उम्र। अमूमन इंटर्नशिप करने नये ग्रेजुएट या स्टूडेंट्स आते हैं, लेकिन उनकी उम्र लगभग मेरी जितनी थी।

मैंने पूछा तो उन्होंने बताया कि बिटिया की स्कूली पढ़ाई पूरी हो गयी, जिसके बाद उन्होंने मीडिया में करियर बनाने के बारे में सोचा है। तीसरी बार तब चौंका, जब उन्होंने अपना नाम 'शकुन काजमी' बताते हुए खुद को बिहार से जुड़ा बताया। हिन्दू-मुस्लिम मिक्स नाम और खड़ी हरियाणवी बोली वाली बिहारन?

मेरे चेहरे के भावों को पढ़ते हुए हमारे कैमरापर्सन Aijaz उर्फ जॉर्ज ने हंसते हुए राज खोला, ‘ये शकुंतला जी हैं तो मूल रूप से हरियाणा की, लेकिन अपने NDTV वाले नदीम भाई की पत्नी हैं।’ नदीम भाई उर्फ नदीम काजमी से प्रेस क्लब में Manoranjan जी के साथ कुछ मुलाकातें हुई थीं। मैंने हाथ जोड़कर नमस्कार किया तो हंसते हुए बोलीं, ‘यहां तो मैं सिर्फ ट्रेनी कैमरापर्सन हूं।’

बाद में मेरी पुरानी मित्र Anju Grover ने बताया कि शकुन सोशल एक्टिविस्ट भी रह चुकी हैं और कई आंदोलनों में प्रमुख भूमिका निभा चुकी हैं। बेहद डाउन टू अर्थ और बिंदास स्वभाव। वे जब तक हमारे यहां रहीं, दिन भर बड़े लगन से टीवी कैमरा ऑपरेट करने के साथ उसकी बारीकियों को सीखा। वे बेहद ऊर्जावान और एक्टिव थीं। कभी बाहर भी मुलाकात हुई तो उनके बेबाक और मिलनसार स्वभाव ने काफी प्रभावित किया। समाज और राजनीति पर भी चर्चा होती।

फिर वे कुछ महीनों बाद इंटर्नशिप पूरा कर वापस चली गयीं, लेकिन मिलना-जुलना होता रहा। अक्सर प्रेस क्लब या वूमेन प्रेस क्लब में। जब नोएडा शिफ्ट हुआ तो दिल्ली जाने का सिलसिला कम होता चला गया। वैसे भी मैं फील्ड रिपोर्टिंग में था नहीं, तो कभी-कभी ही बाहर जाना होता था। कुछ सालों बाद पता चला कि वे बिहार चली गयी हैं। कल रात अचानक अंजू का संक्षिप्त सा वॉट्सऐप मैसेज मिला जिसमें लिखा था, ‘शकुन नहीं रही।‘ एक मित्र, हमदर्द और अच्छी इंसान का अचानक सदा के लिये चले जाना वाकई दुःखद होता है।

नदीम काजमी जी के होम टाउन दरभंगा के उनके गांव में वे मुखिया बन गयी थीं। हाल ही में बाढ़ राहत की उनकी तस्वीरें देखीं तो समझ में आया कि वे कितनी मेहनती और दरियादिल थीं। हालांकि समझौता न करने वाले उनके तेवर बरकरार रहे। बिहार के एक पिछड़े से गांव की मुस्लिम महिला टी शर्ट व पेंट में दिखे, जन समर्थन भी पाये, वह भी तब, जबकि उनकी भाषा हरियाणवी हो, ये सारी बातें असंभव लगती हैं... लेकिन इस नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया था शकुंतला काजमी ने।

हालांकि वे प्रगतिशील विचारों वाली सुशिक्षित महिला थीं, लेकिन पिछड़ी हुई व्यवस्था और स्वार्थी डॉक्टरों की चालबाज साजिशों का शिकार बन गयीं। कुछ सालों से दरभंगा के डॉक्टर उन्हें किडनी की बीमारी की दवाइयां दे रहे थे, जबकि मर्ज उनके दिल में था। पता तब चला, जब अचानक हार्ट अटैक आने पर उन्हें पटना ले जाया गया। दिल्ली आना चाहती थीं, लेकिन अचानक वेंटिलेटर पर शिफ्ट होना पड़ गया।

फिर कल रात खबर आयी कि वे जीते जी नहीं आ पायी, लेकिन नदीम काजमी उनके शव को दिल्ली लाकर यहीं अंतिम संस्कार करवाने की कोशिश में हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार धीरज कुमार की फेसबुक वॉल से)

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‘विक्टिम कार्ड खेलना बंद कर इलाज कराइए। दिमाग का भी और कोरोना का भी’

इस बात को साफ तौर पर समझ लीजिए कि आपकी जिद के चलते इंदौर शहर की जनता खुद को दांव पर लगाने को तैयार नहीं है।

Last Modified:
Tuesday, 31 March, 2020
Corona

हेमंत शर्मा,  संस्थापक व संपादक, प्रजातंत्र।।

इस संपादकीय के बाद शायद ‘प्रजातंत्र’ को सांप्रदायिक करार दे दिया जाए। कुछ लोग यह भी कहेंगे कि देखिए, यही है आजकल की हिंदी पत्रकारिता का असली चेहरा, जिसमें मुसलमानों पर निशाना साधा जा रहा है। इन अखबारों को पढ़ना बंद कर दीजिए। जैसे हमने बरसों पोलियो के टीके नहीं लगवाए और जैसे महामारी के इस दौर में हम अपनी बीमारी छिपाकर घरेलू इलाज से उसे ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं, वही कीजिए।

जब पूरा शहर महामारी के मुहाने पर खड़ा है और सबसे ज्यादा बीमारी का कहर उन सघन मुस्लिम बस्तियों में है, जहां न तो पर्याप्त सुरक्षा है और न ही लोग बीमारी और बीमारों का पता बताने को तैयार हैं-इस बात को साफ तौर पर समझ लीजिए कि आपकी जिद के चलते इंदौर शहर की जनता खुद को दांव पर लगाने को तैयार नहीं है। इसमें वे मुस्लिम भी शामिल हैं, जो आपको समझा-समझाकर परेशान हो गए। आफत इसलिए भी बढ़ गई है, क्योंकि पढ़े-लिखों से ज्यादा आपके दिमाग पर वे लोग असर डाल रहे हैं, जो कभी स्कूल नहीं गए और मजहब की घुट्‌टी पिला-पिलाकर जिन्होंने अपनी टपरी सजाई हुई है।

कल अलग-अलग जगहों से तीन विडियो मोबाइल पर आए थे। पहला उन मौलाना का था, जो इस बात पर बहस कर रहे थे कि मस्जिद में 15 लोग इकट्‌ठा हो जाएंगे तो क्या हो जाएगा? क्योंकि सरकारी अमले के आप लोग जो हमें रोकने आए हैं, आप भी तो 15 हैं। इस मौलाना की बुद्धि में सुराख कर कोई कैसे समझाए कि ये अपनी जान पर खेलकर आए हैं, ताकि तुम्हारी जान बचा सकें।

दूसरा विडियो उत्तर प्रदेश का था, जिसमें 15-20 लोग एक बंद कमरेनुमा जगह पर प्रतिबंध होने के बावजूद नमाज पढ़ रहे हैं। नमाज पढ़ने से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लेकिन जब प्रशासन कह रहा है इकट्‌ठा मत होइए, यह कानून का उल्लंघन है तो कानून को तोड़कर महामारी के दौर में सिर्फ मस्जिद जाकर ही इबादत करने को ईश्वर भी मंजूर नहीं करेगा। यहां सवाल सिर्फ उन लोगों का नहीं था, जो इकट्‌ठा हुए थे, बल्कि उन लोगों का है, जिन्हें इनमें से कोई भी वायरस दे सकता है। यहां एक छोटा बच्चा भी था और काफी जगह होने के बावजूद सब इतने नजदीक बैठे थे कि जैसे उस कमरे की चौखट पर पहले ही महामारी को फूंक मारकर बाहर बांध दिया गया हो। क्या आप देश के कानून से ऊपर हैं? और जब उसका पालन करवाया जाए तो आप कहने लगते हैं कि देखिए, ये जालिम सरकार कैसे मजलूमों पर कहर ढा रही है!

डंडे तो पड़ेंगे, फिर आप मुस्लिम हों या हिंदू। आपकी मूर्खता का खामियाजा बाकी सारे हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई नहीं भुगतेंगे। बुजुर्ग नहीं भुगतेंगे, बच्चे नहीं भुगतेंगे। अगर लॉकडाउन के बाद कुछ मूर्ख हिंदू जुलूस निकालेंगे तो उन्हें भी उतने ही डंडे पड़ेंगे, जितने आपको लॉकडाउन तोड़कर इकट्‌ठा होने पर पड़ने चाहिए।

तीसरा और सबसे ज्यादा दिल दहलाने वाला विडियो इंदौर का था और उस इलाके का था, जहां से सबसे ज्यादा कोरोना के मरीज मिल रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग की टीम जब उनके घरों पर दस्तक दे रही थी तो आप उन पर थूक रहे थे, उन्हें गालियां दे रहे थे, उन्हें धमका रहे थे और इसका विडियो बना रहे थे, ताकि बाकी लोगों को यह संदेश मिल जाए कि इन टीमों के साथ क्या करना है। और जब पुलिस-प्रशासन सख्ती करेगा तो आप जोर-जोर से रोने लगेंगे कि पहले तो सिर्फ दिल्ली ही थी, अब ये भी…।

ये ‘विक्टिम कार्ड' खेलना बंद करिए। इलाज कराइए। दिमाग का भी और कोरोना का भी। कोरोना से पहले दिमाग का। क्योंकि पिछले कुछ सालों में जैसे-जैसे उनके पाजामे की लंबाई इंच-दर-इंच कम होती गई है, आपने मौलाना आजाद से लेकर जावेद अख्तर और डॉ. अब्दुल कलाम से लेकर मौलाना वहीदुद्दीन खान तक की नसीहतों को खुद से दूर कर लिया है और कठमुल्लों ने उल्टे उन्हें जाहिलों की श्रेणी में डाल दिया है। सबको छोड़िए, अपनी मुकद्दस किताब को एक बार फिर पढ़िए। वह विज्ञान की बात करती है, वह इंसानियत की बात करती है। और जब-जब अंधेरा घना हो, उससे बाहर कैसे निकला जाए इसकी बात करती है।

इस बात को भी साफ तौर पर समझ लीजिए कि बीमारी का धुआं आपके घर से निकलकर आसपास फैल रहा है। अभी तो दरवाजे बंद हैं, लेकिन जब ये आपकी गलतियों के कारण दूर दूसरों के घरों में घुसने लगेगा तो फिर हिंदू या मुस्लिम सब अपने दरवाजे खोलेंगे और यह धुआं बुझाने निकलेंगे।

याद रखिए… धुआं आंखों में सिर्फ पानी लाता है। बिना यह देखे कि आंखें हिंदू की हैं या मुसलमान की। लिहाजा, अपने तईं पूरी कोशिश कीजिए कि आप इस खूबसूरत दुनिया को बचाने में क्या भूमिका निभा सकते हैं।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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कोरोना से जंग में मजूबती से अपनी भूमिका निभा रहे ये ‘धुरंधर’

आज के दौर में टेलिविजन और अन्य ‘ओवर द टॉप’ (OTT) प्लेटफॉर्म्स हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं।

Last Modified:
Saturday, 28 March, 2020
corona

रित्विका नंदा व सुधीर मिश्रा

पार्टनर, ट्रस्ट लीगल एडवोकेट्स  एंड कंसल्टेंट्स ।।

आज के दौर में टेलिविजन और अन्य ‘ओवर द टॉप’ (OTT) प्लेटफॉर्म्स हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। जैसा कि सभी को पता है कि कोरोनावायरस (कोविड-19) जैसी महामारी से निपटने के लिए सरकार द्वारा 21 दिनों के लॉकडाउन की घोषणा की गई है। ऐसे में नागरिकों के जिन अधिकारों को लेकर दशकों से चर्चा और उनकी वकालत होती रही है, उनमें कमी कर दी गई है और यह राष्ट्र के कल्याण के लिए एक सही कदम भी है। वर्तमान हालातों को छोड़कर देश के सामने ऐसी स्थिति कभी नहीं आई है, ऐसे में यह जरूरी है कि सभी लोगों को इंफॉर्मेशन, न्यूज और एंटरटेनमेंट मिल सके।

इस साल की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया था कि इंटरनेट का इस्तेमाल संविधान के तहत लोगों का मौलिक अधिकार है। आज, ऐसा लगता है कि न्यूज और एंटरटेनमेंट को हासिल करने के अधिकार ने अन्य अधिकारों पर विजय हासिल कर ली है। यह समाज और समुदाय को साथ-साथ ले आया है और वर्तमान स्थिति से निपटने में समाज की सहायता कर रहा है। ऐसे नाजुक दौर में डॉक्टरों और अन्य प्राधिकरणों द्वारा दी जाने वाली आपातकालीन सेवाओं की भूमिका काफी बढ़ गई है और इस ‘जंग’ से बहादुरी के साथ लड़ने में मदद कर रही है।

ऐसे समय में मीडिया, ब्रॉडकास्टिंग और डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म्स की भूमिका को भी समझने और सराहे जाने की आवश्यकता है। ऐसे नाजुक दौर में जब लोगों को घरों में बंद रहने की सलाह दी गई है, किसी जमाने में ‘इडियट बॉक्स’ (idiot box) कहलाने वाला टीवी अब इडियट नहीं दिखाई दे रहा है। परिवार का हर सदस्य या तो खबरों के लिए या फिर मनोरंजन के लिए टेलिविजन की ओर रुख कर रहा है। इसके लिए हम कई लोगों को धन्यवाद देना चाहते हैं, जो दिन रात अपने काम में लगातार जुटे हुए हैं, ताकि न्यूज और एंटरटेनमेंट की निर्बाध रूप से आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। 

ऐसा ही एक डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म सिटी नेटवर्क्स (SITI Networks Limited) है, जो देश का सबसे बड़ा मल्टी सिस्टम ऑपरेटर है। सिटी नेटवर्क्स ‘एस्सेल’ ग्रुप का ही एक हिस्सा है, जो 580 से अधिक स्थानों और आसपास के क्षेत्रों में अपनी केबल सेवाएं प्रदान करता है और लगभग 8 मिलियन डिजिटल कस्टमर्स तक अपनी पहुंच बनाता है।

इस संबंध में ‘सिटी नेटवर्क्स लिमिटेड’ के चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर अनिल मल्होत्रा कहते हैं, ‘मानवता के लिए खतरा बने कोरोनावायरस के खिलाफ इस जंग में हमारे SITI कर्मचारी भी आगे आकर एक शांत हीरो की तरह डटे हुए हैं। हमारी फील्ड और सपोर्ट टीमें लोगों को सूचनाएं और एंटरटेनमेंट उपलब्ध कराकर घर पर रहने में मदद कर रही हैं।’

कई बार पुलिस और अन्य अधिकारियों से थोड़ा समर्थन मिलने के बावजूद हमारी टीमें यह सुनिश्चित करती हैं कि सेवाएं बनी रहें और चलती रहें। हालांकि इस लड़ाई में कोरोना वायरस के फैलते संक्रमण की चेन को तोड़ना जरूरी है, लेकिन यह भी जरूरी है कि यह चेन टूटी रहे। वहीं, लोग घरों में रहें इसके लिए हमारी सर्विस और टीम अपनी चेन को मजबूती प्रदान किए हुई है। मीडिया, ब्रॉडकास्टिंग और डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म्स जैसे सिटी (SITI) इस मुश्किल दौर में भी अपना प्लेटफॉर्म बंद नहीं कर रहे हैं, लेकिन इन पर दबाव बनाने के बजाय इनकी सराहना की जानी चाहिए।

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CM को खुला पत्र, कुशाभाऊ ठाकरे का नाम हटाना चंदूलाल जी का सम्मान नहीं

विश्वविद्यालय का नाम आदरणीय चंदूलाल चंद्राकर के नाम पर रखकर आप उनका सम्मान नहीं कर रहे, बल्कि एक महानायक को विवादों में ही डाल रहे हैं।

Last Modified:
Thursday, 26 March, 2020
chandu

सेवा में,

श्री भूपेश बघेल जी

मुख्यमंत्रीः छत्तीसगढ़ शासन, रायपुर

 

आदरणीय भूपेश जी,

 सादर नमस्कार,

                 आशा है आप स्वस्थ एवं सानंद हैं। यह पत्र विशेष प्रयोजन से लिख रहा हूं। मुझे समाचार पत्रों से पता चला कि आपके मंत्रिमंडल ने रायपुर स्थित कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय का नाम बदलकर अब चंदूलाल चंद्राकर पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय करने का निर्णय लिया है। राज्य के मुख्यमंत्री होने के नाते और लोकतंत्र में जनादेश प्राप्त राजनेता होने के नाते आपका निर्णय सिर माथे। लेकिन आपके इस फैसले पर मेरे मन में कई प्रश्न उठे हैं, जिन्हें आपसे साझा करना जागरूक नागरिक होने के नाते अपना कर्तव्य समझता हूं।

    मैंने 1994 से लेकर 2009 तक अपनी युवा अवस्था का एक लंबा समय पत्रकार होने के नाते छत्तीसगढ़ की सेवा में व्यतीत किया है। रायपुर और बिलासपुर में अनेक अखबारों के माध्यम से मैंने छत्तीसगढ़ महतारी की सेवा और उसके भूमिपुत्रों को न्याय दिलाने के लिए सतत लेखन किया है। मेरी पुस्तकों के विमोचन कार्यक्रमों में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, अजीत जोगी, डा. रमन सिंह, सत्यनारायण शर्मा, बृजमोहन अग्रवाल, चरणदास महंत, धर्मजीत सिंह,स्व. नंदकुमार पटेल, स्व.बी.आर. यादव जैसे नेता आते रहे हैं। आपसे भी विधायक और मंत्री के नाते मेरा व्यक्तिगत संवाद रहा है। आपके गांव भी आपके साथ एक आयोजन में जाने का अवसर मिला और क्षेत्र में आपकी लोकप्रियता, संघर्षशीलता का गवाह  रहा हूं।

योद्धा हैं आप-

   आपसे हुए अनेक संवादों में आपके व्यक्तित्व, उदारता और लोगों को साथ लेकर चलने की आपकी क्षमता तथा छत्तीसगढ़ राज्य के लिए आपके मन में पल रहे सुंदर सपनों को जानने-समझने का अवसर मिला। मैं आपकी संघर्षशीलता, अंतिम व्यक्ति के प्रति आपके अनुराग को प्रणाम करता हूं। आप सही मायने में योद्धा हैं, जिन्होंने स्व. नंदकुमार पटेल के छोड़े हुए काम को पूरा किया। सत्ता में आने के बाद आपका रवैया आपको एक अलग छवि दे रहा है, जिसके बारे में शायद ‘आपके सलाहकार’ आपको नहीं बताते हैं। आप राज्य के मुख्यमंत्री हो चुके हैं और मैं अदना सा लेखक हूं, सो आपसे मित्रता का दावा तो नहीं कर सकता। किंतु आपका शुभचिंतक होने के नाते मैं आपसे यह निवेदन करना चाहता हूं कि आप कटुता, बदले की भावना और निपटाने की राजनीति से बचें। यह कांग्रेस का रास्ता नहीं है, देश का रास्ता नहीं है और छत्तीसगढ़ का रास्ता तो बिल्कुल नहीं।

नाम में क्या रखा है-

   विश्वविद्यालय का नाम आदरणीय चंदूलाल चंद्राकर के नाम पर रखकर आप उनका सम्मान नहीं कर रहे, बल्कि एक महानायक को विवादों में ही डाल रहे हैं। चंदूलाल जी छत्तीसगढ़ राज्य के स्वप्नदृष्टा हैं। वे पांच बार दुर्ग क्षेत्र से लोकसभा के सांसद, दो बार केंद्रीय मंत्री, कांग्रेस के प्रवक्ता और राष्ट्रीय महासचिव जैसे पदों पर रहे हैं। वे छत्तीसगढ़ के पहले पत्रकार हैं जिन्हें ‘दैनिक हिंदुस्तान’ जैसे राष्ट्रीय अखबार का संपादक होने का अवसर मिला। ऐसे महत्त्वपूर्ण पत्रकार, राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता के नाम पर आप कुछ बड़ा कर सकते थे। एक बड़ी लकीर खींच सकते थे किंतु आपको चंदूलाल जी का सम्मान नहीं, एक अन्य सामाजिक कार्यकर्ता कुशाभाऊ ठाकरे का नाम हटाना ज्यादा प्रिय है। मुझे लगता है इससे आपने अपना कद छोटा ही किया है।

      मृत्यु के बाद कोई भी सामाजिक कार्यकर्ता पूरे समाज का होता है। राजनीतिक आस्थाओं के नाम पर उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। समाज के प्रति उसका प्रदेय सब स्वीकारते और मानते हैं। स्वयं चंदूलाल जी यह पसंद नहीं करते कि उनकी स्मृति में ऐसा काम हो, जिसके लिए किसी का नाम मिटाना पड़े।

     कुशाभाऊ जी एक सात्विक वृत्ति के राजनीतिक नायक थे, जिन्होंने छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की अहर्निश सेवा की। उनका नाम एक विश्वविद्यालय से हटाकर आप उसी अतिवाद को पोषित करेगें, जिसके तहत कुछ लोग जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का नाम बदलने की बात करते हैं। नाम बदलने की प्रतियोगिता हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी। यह देश की संस्कृति नहीं है। हमें यह भी सोचना चाहिए कि सत्ता आजन्म के लिए नहीं होती। काल के प्रवाह में पांच साल कुछ नहीं होते। कल अगर कोई अन्य दल सत्ता में आकर चंदूलाल जी का नाम इस विश्वविद्यालय से फिर हटाए तो क्या होगा ? हम अपने नायकों का सम्मान चाहते हैं या उनके नाम पर राजनीति यह आपको सोचना है। इस बहाने शिक्षा परिसरों को हम अखाड़ा बना ही रहे हैं, जो वस्तुतः अपराध ही है।

      मैं आपको सिर्फ स्मरण दिलाना चाहता हूं कि डा. रमन सिंह की सरकार ने तीन विश्वविद्यालय साथ में खोले थे स्वामी विवेकानंद टेक्नीकल विश्वविद्यालय, पं. सुंदरलाल शर्मा खुला विश्वविद्यालय और कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय। इनमें सुंदरलाल शर्मा आजन्म कांग्रेसी रहे, जिनसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी प्रभावित थे। इससे क्या डा. रमन सिंह का कद घट गया। चंदूलाल चंद्राकर जी के नाम पर जनसंपर्क विभाग के पुरस्कार दिए जाते रहे, पंद्रह साल राज्य में भाजपा की सरकार रही तो क्या भाजपा ने उनके नाम पर दिए जा रहे पुरस्कारों को बदल दिया। नायक मृत्यु के बाद राजनीति का नहीं, समाज का होता है। तत्कालीन रमन सरकार ने इसी भावना को पोषित किया। इसके साथ ही महाकवि गजानन माधव मुक्तिबोध की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए राजनांदगांव में डा. रमन सिंह ने जो कुछ किया, उसकी देश के अनेक साहित्यकारों ने सराहना की। क्या हम अपने नायकों को भी दलगत राजनीतिक का शिकार बन जाने देगें। मुझे लगता है यह उचित नहीं है। कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय में ठाकरे जी की प्रतिमा भी स्थापित है। अनेक वर्षों में सैकड़ों विद्यार्थी यहां से अपनी डिग्री लेकर जा चुके हैं। उनकी डिग्रियों पर उनके विश्वविद्यालय का नाम है। इस नाम से एक भावनात्मक लगाव है। मुझे लगता है कि इतिहास को इस तरह बदलना जरूरी नहीं है। एक नए विश्वविद्यालय के साथ जो अभी ठीक से अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं है, इस तरह के प्रयोग उसे कई नए संकटों में डाल सकते हैं। यह कहा जा रहा है कि कुछ पत्रकारों की मांग पर ऐसा किया गया, आप आदेश करें तो मैं देश भर के तमाम संपादकों के पत्र आपको भिजवा देता हूं जो इस नाम को बदलने का विरोध करेंगे। राजनीति में इस तरह के प्रपंचों को आप बेहतर समझते हैं, इस प्रायोजिकता का कोई मूल्य नहीं है। मूल्य है उन विचारों का जिससे आगे का रास्ता सुंदर और विवादहीन बनाया जा सकता है।

गांधी परिवार पर हमले के लिए अवसर-

    आपके ‘विद्वान सलाहकार’ आपको नहीं बताएंगे क्योंकि उनकी प्रेरणाभूमि भारत नहीं है, नेहरू और गांधी नहीं हैं। प्रतिहिंसा और विवाद पैदा करना उनकी राजनीति है। आज वे कांग्रेस के मंच पर आकर यही सब करना चाहते हैं, जिसके चलते उनकी समूची विचारधारा पुरातात्विक महत्त्व की चीज बन गयी है। वे आपको यह नहीं बताएंगें कि ऐसे कृत्यों से आप गांधी- नेहरू परिवार के अपमान के लिए नई जमीन तैयार कर रहे हैं। देश में अनेक संस्थाएं पं. जवाहरलाल नेहरू,श्रीमती इंदिरा गांधी, श्री फिरोज गांधी, श्री राजीव गांधी, श्री संजय गांधी के नाम पर हैं। इस बहाने गांधी परिवार के राजनीतिक विरोधियों को इनकी गिनती करने और मृत्यु के बाद इन नायकों पर हमले करने का अवसर मिलता है। मेरा मानना है यह एक ऐसी गली में प्रवेश है, जहां से वापसी नहीं है। अपने राजनीतिक चिंतन का विस्तार करें, इन छोटे सवालों में आप जैसे व्यक्ति का उलझना ठीक नहीं है। छत्तीसगढ़ के अनेक नायकों के लिए आपको कुछ करना चाहिए पं. माधवराव सप्रे,कवि-पत्रकार-राजनेता श्रीकांत वर्मा,सरस्वती के संपादक रहे पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, रंगकर्मी सत्यदेव दुबे जैसे अनेक नायक हैं जिनकी स्मृति का संरक्षण जरूरी है। लेकिन यह काम किसी का नाम पोंछकर न हो।

सेवा के अवसर को यूं न गवाएं-

    महिमामय प्रभु ने बहुत भाग्य से आपको छत्तीसगढ़ महतारी की सेवा का अवसर दिया है। छत्तीसगढ़ को देश का अग्रणी राज्य बनाना और उसके सपनों में रंग भरने की जिम्मेदारी इतिहास ने आपको दी है। इस समूचे भूगोल की सेवा और इसके नागरिकों को न्याय दिलाना आपका कर्तव्य है। इन विवादित कदमों से बड़े लक्ष्यों को हासिल करने में कोई मदद नहीं मिलेगी। छत्तीसगढ़ के स्वभाव को आप मुझसे ज्यादा जानते हैं। यहां ‘अतिवाद की राजनीति’ के लिए कोई जगह नहीं है। राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री श्री अजीत जोगी अपनी तमाम योग्यताओं के बावजूद भी राज्य की जनता वह स्नेह नहीं पा सके, जिसके वे अधिकारी थे। आप सोचिए कि ऐसा क्यों हुआ ? राज्य की जनता ने डा. रमन सिंह को सेवा के लिए तीन कार्यकाल दिए। यह छत्तीसगढ़ है जहां लोग अपने जैसे लोगों को,सरल और सहज स्वभाव को स्वीकारते हैं। यहां नफरतें और कड़वाहटें लंबी नहीं चल सकतीं।

      इस माटी के प्रति मेरा सहज अनुराग मुझे यह कहने के लिए बाध्य कर रहा है कि आप राज्य के स्वभाव के विपरीत न चलें। प्रतिहिंसा, विवाद और वितंडावाद यहां के स्वभाव का हिस्सा नहीं है। अभी तीन दिन पहले बस्तर में सुरक्षाबलों के 17 लोग शहीद हुए हैं। करोना से सारा देश जूझ रहा है। ऐसे समय में बस्तर की शांति, छत्तीसगढ़ के नागरिकों का स्वास्थ्य आपकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। मुझे आपको कर्तव्यबोध कराने का साहस नहीं करना चाहिए किंतु आपके प्रति सद्भाव और मेरे प्रति आपका स्नेह मुझे यह हिम्मत दे रहा है। छत्तीसगढ़ महतारी की मुझ पर अपार कृपा रही है। बिलासपुर में बैठी मां महामाया, बस्तर की मां दंतेश्वरी, डोंगरगढ़ की मां बमलेश्वरी से मैं नवरात्रि के दिनों में यह प्रार्थना करता हूं वे आपको शक्ति, साहस दें कि आप अपना मार्ग प्रशस्त कर सकें। बेहतर होगा कि आप अपने मंत्रिमंडल द्वारा लिए इस फैसले को वापस लेकर सद्भाव की राजनीतिक परंपरा को अक्षुण्ण रखेंगें। भारतीय नववर्ष पर आपको सुखी और सार्थक जीवन के लिए मंगलकामनाएं।

जय जोहार!

 

सादर आपका शुभचिंतक

संजय द्विवेदी,

कार्यकारी संपादकः मीडिया विमर्श, भोपाल

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ऐसे पुलिसवालों के खिलाफ कार्रवाई न हो तो सड़कों पर उतरने के लिए तैयार रहिए मिस्टर मीडिया!

पिछले सप्ताह जब मैंने कोरोना केंद्रित यह स्तंभ लिखा था तो उस समय के कवरेज को देखते हुए कुछ आशंकाएं प्रकट की थीं। इस सप्ताह यह कॉलम लिखते हुए मैं संतोष का अनुभव कर रहा हूं।

Last Modified:
Tuesday, 24 March, 2020
rajeshsircorona

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

पिछले सप्ताह जब मैंने कोरोना केंद्रित यह स्तंभ लिखा था तो उस समय के कवरेज को देखते हुए कुछ आशंकाएं प्रकट की थीं। इस सप्ताह यह कॉलम लिखते हुए मैं संतोष का अनुभव कर रहा हूं। मीडिया के तमाम अवतारों पर जिम्मेदारी भरा और कमोबेश संतुलित कवरेज देखने को मिल रहा है। डराने वाला और अंध विश्वास फैलाने वाला कवरेज एकाध अपवाद छोड़कर नहीं दिखाई दिया। निस्संदेह सारे पत्रकार साथी इसके लिए शाबाशी के पात्र हैं।

अपवाद के तौर पर रविवार की शाम यकीनन परेशान करने वाली थी। प्रधानमंत्री ने अपने अपने घर में रहते हुए ताली-थाली बजाने की अपील की थी। हुआ उल्टा। कुछ अनपढ़ लोग समझ बैठे, मानो उन्होंने कोरोना का अंतिम संस्कार कर दिया है और संसार पर विजय प्राप्त कर ली है। जहां सारे दिन समूह में रहने से बचा गया, एक दूसरे के निकट संपर्क में आने से बचा गया, वहीं दूसरी ओर शाम पांच बजते ही झुंड के झुंड सड़कों पर नजर आने लगे, हर्षातिरेक में चिल्लाने लगे और नारेबाजी करने लगे। जैसे उन्होंने पाकिस्तान को जमींदोज कर दिया है। सारे दिन लॉक डाउन का मतलब धरा रह गया। सैकड़ों की तादाद में सड़कों पर नाचने वाले इन निपट मूर्खों का क्या किया जाए? दुर्भाग्य से अनेक चैनलों ने इन दृश्यों को प्रमुखता से स्थान दिया, मगर उतनी ही प्रमुखता से इन झुंडों की आलोचना नहीं की।  

लेकिन इस हालात में हिन्दुस्तान के सरकारी ऑल इंडिया रेडियो के अनेक केंद्रों का प्रसारण ठप्प हो जाना खतरनाक संकेत है। अगर रेडियो का स्टाफ नहीं पहुंचा और वहां रिकॉर्डेड प्रोग्राम तथा गाने सुनाए जा रहे हैं तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है। मत भूलिए कि आज भी करोड़ों लोग प्रतिदिन घंटों रेडियो सुनते हैं। जंग के दिनों में अथवा आपातकाल में सरकारी प्रसारण केंद्रों को लकवा लग जाना यकीनन तंत्र पर सवाल खड़े करता है। इसी तरह दूरदर्शन के अनेक प्रादेशिक केंद्रों का प्रसारण बाधित रहा। वे या तो रिकॉर्डेड कार्यक्रम दिखा रहे हैं अथवा दूरदर्शन न्यूज या संसद के चैनलों का प्रसारण दिखा रहे हैं। भारत सरकार के लिए यह सोचने का विषय है कि असाधारण परिस्थितियों में उसका अपना प्रसारण तंत्र अपाहिज न बने।

वैसे तो आपात सेवाओं में दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार ने मीडिया कर्मियों को छूट दी है, पर सोमवार को एक टीवी चैनल के वरिष्ठ प्रड्यूसर नवीन कुमार के साथ सफदरजंग एन्क्लेव क्षेत्र की पुलिस ने जो बरताव किया, उसे कतई जिम्मेदाराना नहीं ठहराया जा सकता। परिचय पत्र दिखाने के बावजूद उनका मोबाइल, पर्स और गाड़ी की चाबी छीन ली और गालियां देते हुए देर तक पीटा। आदम युग की यह बर्बरता पुलिस आखिर कब छोड़ेगी? उन्हें सभ्य और शालीन बनाने के लिए क्या किया जाए? माना जा सकता है कि जब अधिकांश सेवाओं के कर्मचारी घरों में बंद रहकर अपनी हिफाजत कर रहे हैं तो उन्हें यह अवसर भी नहीं मिल रहा है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्हें जल्लादी का लाइसेंस मिल गया है। इस सेवा का चुनाव उन्होंने स्वयं ही किया है। किसी ने बन्दूक की नोक पर उन्हें पुलिस में आने के लिए बाध्य नहीं किया है।  ऐसे अभद्र और गंवार पुलिसवालों के खिलाफ यदि कार्रवाई नहीं हो तो सड़कों पर उतरने के लिए तैयार रहिए मिस्टर मीडिया!

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अनजाने में हम डर और आतंक को भी पत्रकारिता का टूल तो नहीं बनाते जा रहे हैं मिस्टर मीडिया?

दुनिया दहशत में है। कोरोना काल बन गया है। मौत से अधिक मौत का डर है। भय के भूत की तरह। हर बड़े मुद्दे पर गैर जिम्मेदारी दिखाता हिंदी टीवी मीडिया

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 18 March, 2020
Last Modified:
Wednesday, 18 March, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

दुनिया दहशत में है। कोरोना काल बन गया है। मौत से अधिक मौत का डर है। भय के भूत की तरह। हर बड़े मुद्दे पर गैर जिम्मेदारी दिखाता हिंदी टीवी मीडिया। एक-दो चैनल छोड़ दें तो ज्यादातर कोरोना का कवरेज कोड़ा मारने जैसा कर रहे हैं। सूचनाएं इस अंदाज में परोसी जा रही हैं कि दर्शक का ब्लड प्रेशर बढ़ जाए। कमजोर दिल वालों को आघात का खतरा। अगर ऐसा ही कवरेज करना है तो एक सूचना पट्टी भी साथ में प्रदर्शित कर दें कि कमजोर दिल वाले कोरोना की खबरें नहीं देखें। समाचार देते समय बैकग्राउंड संगीत नहीं सुनाया जाता। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह स्थापित पैमाना है, लेकिन कोरोना की खबरें दिखाते समय सस्पेंस,सनसनी,साजिश भरा या भय संगीत क्यों सुनाया जाना चाहिए?

कोरोना की इस भयावह कवरेज में हिंदी चैनल्स की तुलना में अंग्रेजी चैनल्स ने अधिक जिम्मेदारी, संयम, विश्लेषण, गहराई तक जाकर विवेचन और दर्शकों को जागरूक करने का काम किया है। हिंदी चैनल्स पल पल आती जानकारियों को डर का तड़का लगाकर पेश कर रहे हैं तो अंग्रेजी चैनल्स उसी खबर को धैर्यपूर्वक और बचाव के तरीकों के साथ दे रहे हैं। संसार भर से आ रही सूचनाओं की बारीक पड़ताल करने की जरूरत तक नहीं समझी गई। इससे बेहतर तो अनेक भाषाई चैनल्स ने इन समाचारों को अपने दर्शकों के समक्ष रखा। तेलुगू,तमिल,बांग्ला,कन्नड़ और मराठी भाषी चैनल्स ने कोरोना पर बेहतर और लोगों को जागरूक करने वाली सामग्री प्रस्तुत की है।

कुछ चैनलों ने तो इस कठिन दौर को अंधविश्वास फैलाने का जरिया बना लिया है। एक चैनल ने दिखाया कि कोरोना से बचने के लिए गायत्री मंत्र का जाप करें तो दूसरे चैनल ने कहा कि मस्जिदों में मुस्लिमों को सच्चे दिल से नमाज पढ़नी चाहिए। तीसरे चैनल ने एक स्थान पर हो रहे यज्ञ और अनुष्ठान को कोरोना से बचाव का सर्वश्रेष्ठ उपाय साबित कर दिया। एक रीजनल चैनल ने गंडा-ताबीज का प्रमोशन शुरू कर दिया। यह क्या है? हिंदी पट्टी के दर्शकों को इतना अनपढ़ और बेवकूफ समझने की क्या वजह है? किसी जिम्मेदार चैनल संचालक और संपादक के पास कोई उत्तर है कि वे अपने प्रसारण संस्थान से इस तरह की खबरों का उत्पादन क्यों कर रहे हैं?

करीब पैंतालीस साल पहले रूसी उपग्रह स्काईलेब के अंतरिक्ष से टूटकर गिरने की खबरों पर उन दिनों अखबारों ने हौवा खड़ा कर दिया था। कुछ बरस पहले स्वाइन फ्लू का आतंक जैसे कहर बनकर छोटे परदे पर बरपा था। सवाल यह है कि कहीं अनजाने में हम डर और आतंक को भी पत्रकारिता का अनिवार्य टूल तो नहीं बनाते जा रहे हैं? इसे ध्यान में रखना होगा मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

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इस धर्म या कर्तव्य को निभाने से किसने रोका है मिस्टर मीडिया?

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इस मानसिक दिवालिएपन पर क्या कहा जाए, मिस्टर मीडिया!

 

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वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने बताया, कैसे संकट की घड़ी में मीडिया की साख पर उठ रहे सवाल

यह बात उन क्रांतिकारी समझने वाले चर्चित टीवी हस्तियों को भी स्वीकारना चाहिए, जो आजकल स्वयं मीडिया पर भरोसा नहीं करने और उन्हें छोड़कर सबको नाकारा साबित करने में लगे हुए हैं।

Last Modified:
Saturday, 14 March, 2020
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार ।।

कोरोना वायरस हो या साम्प्रदायिक उपद्रव, सत्ता की मारामारी हो या अर्थिक घोटाले. मीडिया की साख पर सवाल उठने लगते हैं। कोरोना के विश्व संकट के दौरान भारतीय मीडिया- प्रिंट, टीवी समाचार चैनल, डिजिटल चैनल ने जितनी जिम्मेदारी के साथ जागरूकता लाने तथा महामारी को फैलने से रोकने में क्या महत्वपूर्ण योगदान नहीं दिया है? कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन अधिकांश भारतीय मीडिया पश्चिम के मीडिया से अधिक सक्रिय और सहायक रहा है।

यह बात उन क्रांतिकारी समझने वाले चर्चित टीवी हस्तियों को भी स्वीकारना चाहिए, जो आजकल स्वयं मीडिया पर भरोसा नहीं करने और उन्हें छोड़कर सबको नाकारा साबित करने में लगे हुए हैं। सत्ताधारी और प्रतिपक्ष के भी कई नेता प्रवक्ता अपनी कमजोरी-बर्बादी के लिए मीडिया पर ही दोष मढ़ते रहे हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि वायरस संकट के दौर में संपन्न पश्चिमी देशों का मीडिया ही नहीं सरकारें अधिक नाकारा तथा विफल सिद्ध हो रही हैं। ताजा प्रमाण गुरुवार को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस साहेब का प्रेस वक्तव्य देख सकते हैं, जिसमें 500 से अधिक लोगों के संक्रमित होने के बावजूद वह यह भी सूचित कर गए कि अभी तो शुरुआत है, असली प्रकोप मई महीने तक दिखेगा, तब हम और कदम उठाएंगे। फिलहाल स्कूल भी बंद नहीं करेंगें, क्योंकि बच्चे खेलेंगे या बुजुर्ग दादा दादी नाना नानी के पास रहकर संक्रमित होंगे या उन्हें करेंगे। बस सावधानी के लिए हाथ बार बार धोते रहिये।

आजकल भारत के सन्दर्भ में राजनीतिक या आर्थिक मामलों पर खबरों तथा टिप्पणियों पर बीबीसी, गार्जियन, न्यूयार्क टाइम्स, एसीएनएन, इकोनॉमिस्ट इत्यादि की बड़ी चर्चा हो रही है। निश्चित रूप से वे अपने नजरिये और देश के हितों के लिए काम करते होंगे। फिर भी हमारे महारथियों को यह भी देखना चाहिए कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री या अमेरिकी राष्ट्रपति अपने ही मीडिया को अविश्वसनीय बताकर सार्वजानिक रूप से कितना अपमानित करते हैं।

आपातकाल में सेंसर के कारण राजनीतिक खबरों के लिए हमारे लोगों को पश्चिम के मीडिया पर मजबूरी में निर्भर होना स्वाभाविक था, लेकिन आज तो अधिकांश भारतीय मीडिया प्रिंट, टीवी समाचार चैनल  दुनिया के किसी भी देश से अधिक स्वतंत्र, निर्भीक और विशाल है। बाकी कसर कई नामी पत्रकारों, सामाजिक संगठनों के वेब पोर्टल, यू-टूयूब चैनल्स से पूरी हो रही है। प्रदेशों के कई भाषाई अखबार या टीवी पत्रकार समाज, समस्याओं, स्वास्थ्य, आर्थिक विषयों पर श्रेष्ठतम सामग्री दे रहे हैं। फिर पश्चिम के मीडिया के मुहं पर मोहित क्यों हो रहे हैं। संभव है राजनेताओं को विदेश में अपनी छवि बनाने या दूसरे कि बिगाड़ने में रूचि रहती हो, लेकिन समझदार विश्लेषकों को असली तथ्यों की जानकारी रहनी चाहिए। उनका ध्यान हाल के वर्षों में अमेरिका और ब्रिटेन के सरकारी गोपनीय दस्तावेज डि क्लासिफाइड होने से यह तथ्य उजागर हो चुका है कि अमेरिकी गुप्तचर संगठन सीआईए और ब्रिटिश जासूसी संस्था एमआई 6 न्यूयॉर्क टाइम्स, गार्जियन, बीबीसी के पत्रकारों, प्रबंधकों, मालिकों का इस्तेमाल करते रहे हैं।

सबसे अधिक चौकाने वाला तथ्य यह भी सामने आया कि कुछ वर्ष पहले बीबीसी में बड़े पैमाने पर भर्ती की जिम्मेदारी ही जासूसी संगठन एमआई 6 के वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी गई थी। अब आप समझ सकते हैं कि क्या उन अधिकारियों ने अपने काम के लिए अनुकूल लोग भी भर्ती नहीं कराए होंगे? इसी तरह जासूसी संगठन से सेवामुक्त होकर पत्रकार बनकर विदेशों में पहुंचने वाले कई जासूसों ने अपने ढंग से रिपोर्टिंग करने के साथ अपनी एजेंसी को भी गोपनीय सूचनाएं भेजने का काम किया है।

सीआईए के ही रिकॉर्ड का दस्तावेज साबित करता है कि संगठन ने 25 वर्षों के दौरान करीब 400 पत्रकारों का उपयोग जासूसी के लिए करवाया। वाटरगेट कांड को उजागर करने वाले एक पत्रकार कार्ल बेरनिस्तन ने स्वयं यह तथ्य लिखा भी था। दूसरी तरफ सीआईए के एक बड़े अधिकारी ने स्वयं वॉशिंगटन पोस्ट के मालिक फिलिप ग्राहम से कहा था कि हमें जासूसी के लिए कॉल गर्ल से कम खर्च पर पत्रकार मिल जाते हैं। सीआईए के दस्तावेज के अनुसार संगठन ने प्रमुख अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसियों को नियमित रूप से फंडिंग कर अपने ढंग से पत्रकारों से सूचनाएं लेने, गलत खबरें फैलाकर गड़बड़ियां कराने में कभी संकोच नहीं किया। यहां तक कि मित्र यूरोपीय देशों में भी राजनीतिक उठापटक में पत्रकारों का उपयोग किया गया। वैसे रूस और चीन के जासूसी संगठन भी पत्रकारों के भेस में जासूस भेजते रहे या स्थानीय लोगों को मोहरा बनाकर उपयोग करते रहे। सत्तर के दशक में भारत के दो बड़े संस्थानों के पत्रकारों के सीआईए एजेंट की तरह काम करने की जानकारी भारतीय गुप्तचर संस्था रॉ को मिली, तब उनसे लाल किले के गुप्त तहखाने में लंबी पूछताछ हुई। एक तो कुछ समय बाद अमेरिकी सम्पर्कों के बल पर भारत से निकलकर वहीँ बस गया और एक स्वयं अधिकाधिक जानकारी देकर अपने राजनीतिक-प्रशासनिक संपर्कों से जेल जाने से बच गया।

इस पृष्टभूमि को देखते हुए जम्मू कश्मीर की स्थिति, अनुच्छेद 370 की समाप्ति के कानून एसीएए या भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था पर पश्चिम के पूर्वाग्रहों वाली सूचनाओं तथा टिप्पणियों को अनावश्यक तरजीह क्यों दी जानी चाहिए?

सवाल यह भी है कि इंदिरा गांधी से लेकर इन्दर गुजराल और मनमोहन सिंह के सत्ता काल में उनके ही दिग्गज नेता विदेशी जासूसी संगठनों के षड्यंत्रों की बात करते थे, लेकिन अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनकी सरकार या रक्षा सौदों पर विदेशी दुष्प्रचार को अपना हथियार बनाने में संकोच नहीं करते। कांग्रेस  के ही नेता जयराम रमेश द्वारा कृष्ण मेनन की जीवनी पर आई नई किताब के तथ्यों के साथ सबसे बुजुर्ग राजनियक पूर्व विदेश सचिव महाराज कृष्ण रसगोत्रा ने हाल में एक कार्यक्रम में माना कि साठ के दशक में भी पश्चिम का मीडिया भारत के विरुद्ध झूठा प्रचार करता था। पत्रकार ही नहीं सेनाधिकारियों से लिखवाकर भारत को नुक्सान पहुंचाने की कोशिशें की गई। इसलिए उदार लोकतंत्र में सूचना-समाचार तंत्र के सारे देसी विदेशी दरवाजे खिड़कियां खुली रखते हुए कम से कम स्वदेशी मीडिया पर अधिक भरोसा कर दुष्प्रचार के वायरस से भी लोगों को बचाना चाहिए।

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मीडिया की नई चुनौतियों से प्रोफेसर केजी सुरेश ने कुछ यूं कराया रूबरू

भारतीय समाचार कक्ष भी धीरे ही सही, लेकिन स्थिरता के साथ विश्व की श्रेष्ठतम तकनीक अपनाने के लिए प्रयासरत हैं।

Last Modified:
Thursday, 12 March, 2020
KG Suresh

के.जी. सुरेश

पूर्व डीजी, आईआईएमसी

इतिहास मुख्य रूप से दो भागों में बंटा है - ईसा पूर्व और ईस्वी (ईसा के जन्म का वर्ष)। इसी तरह पिछले एक दशक में मीडिया में आए क्रांतिकारी बदलावों को देखते हुए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मीडिया के इतिहास को भी दो भागों में बांटा जा सकता है। ये दो वर्ग होंगे - गूगल पूर्व और गूगल के बाद। गूगल के बाद के मीडिया के दौर की देन हैं इंटरनेट और स्मार्ट फोन। प्रौद्योगिकी में आए बदलाव ने मीडिया संस्थानों के समाचार कक्ष का दृश्य भी बदल दिया। खबर बनने की पूरी प्रक्रिया ही बदल गई, जैसे खबर एकत्रित करना, बनाना और साझा करना... सब कुछ! दुनिया भर के न्यूजरूम आज बदलते परिदृश्य के गवाह बन रहे हैं। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और रोबोटिक्स मानवकर्मियों का स्थान ले रहे हैं।

भारतीय समाचार कक्ष भी धीरे ही सही, लेकिन स्थिरता के साथ विश्व की श्रेष्ठतम तकनीक अपनाने के लिए प्रयासरत हैं। थोड़े ही समय में हम सूचना युग से आगे बढ़कर कम समय में अधिक संप्रेषण और बातचीत के दौर तक पहुंच गए। अब वैश्विक मीडिया का फोकस पहुंच पर बहुत अधिक न होकर लोगों को जोड़ने पर है। मीडिया के समक्ष अब चुनौती पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों को आकर्षित करने की नहीं है, बल्कि उन्हें जोड़े रखने की है, क्योंकि लोग एक विषय-वस्तु पर केवल कुछ ही सेकंड का समय देते हैं।

इंटरनेट के बढ़ते उपयोग और ओवर द टॉप' (ओटीटी) प्लेटफॉर्म, जो सेटेलाइट, केबल और ब्रॉडकास्टर से परे इंटरनेट के माध्यम से मिलने वाला मीडिया है, के बढ़ते विकल्पों से भारतीय मीडिया भी तकनीकी प्रेमी हो गया है। मोबाइल जर्नलिज्म, डेटा जर्नलिज्म, एनिमेशन, कॉमिक्स और दृश्य प्रभाव आम माध्यम हो गए हैं। सिटीजन जर्नलिज्म, हैशटेग जर्नलिज्म और संकलित न्यूजरूम मीडिया वर्ग में आम बोलचाल की भाषा के लोकप्रिय शब्द बन चुके हैं। सोशल मीडिया ने मीडिया के माहौल को इतना लोकतांत्रिक बना दिया है, जैसा पहले कभी नहीं था और मीडिया घराने डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर अधिक समय दे रहे हैं। सरकार ने भी डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म क्षेत्र में 20 फीसदी एफडीआई की मंजूरी देते हुए मीडिया के बदलते परिदृश्य का स्वागत किया है। पहले देश में केवल प्रिंट मीडिया में एफडीआई था। फिलहाल, वैश्विक चलन के विपरीत भारत में प्रिंट मीडिया उत्तरोत्तर वृद्धि की राह पर है।

नवसाक्षरों के लिए अखबार सदा ही सशक्तीकरण का प्रतीक रहा है और रहेगा। सम्पादकीय सुदृढ़ता वाले संस्थानों के रहते प्रिंट मीडिया अपनी साख, विश्वसनीयता और प्रामाणिकता के बल पर बिना दिग्भ्रमित और पथपभ्रष्ट हुए लोगों के दिलों पर राज करता रहेगा।

बढ़ती साक्षरता दर और युवाओं द्वारा अपनी भाषाई पहचान को स्वीकार करने के चलते भारतीय भाषाई मीडिया में भी प्रगति स्पष्ट देखी जा सकती है। मीडिया का यह वृहद स्तरीय तकनीकी बदलाव भारत जैसे बहुभाषी, बहुसंस्कृतिवादी, इंद्रधनुषी विविधता वाले देश को कैसे प्रभावित कर रहा है, संपूर्ण जगत इसका साक्षी है। लेकिन एक बात तय है। भले ही कितना भी तकनीकी विकास हो जाए, प्रस्तुत कंटेंट या विषय-वस्तु ही सर्वोपरि रहेगा। अस्तित्व बचाने की इस दौड़ में जीत उसी की होगी, जिसका कंटेंट सर्वश्रेष्ठ होगा।

(साभार: राजस्थान पत्रिका)

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मिस्टर मीडिया: चेतावनी है कि अब मजाक भी बनने लगे हैं एंकर

याद कीजिए, संसार के सारे कार्टूनिस्टों के सिरमौर आर.के. लक्ष्मण ने करीब आधी शताब्दी तक भारत के करोड़ों पाठकों के दिलों पर राज किया है।

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 04 March, 2020
Last Modified:
Wednesday, 04 March, 2020
rajeshbadal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

इस बार मिस्टर मीडिया के साथ आप एक कार्टून देख रहे हैं। किसी मित्र ने मुझे भेजा है। साथ में उनकी टिप्पणी है, ये कहां से कहां आ गए हम? आप देख रहे हैं कि कार्टून में एक न्यूज चैनल का एंकर फुफकारते हुए मुंह से लपटें निकाल रहा है। लपटें स्क्रीन के बाहर बैठे दर्शक तक पहुंचने के लिए बेताब हैं। दर्शक के दिमाग से बम चिपका हुआ है। जैसे ही लपटें उस बम तक पहुंचेंगी, विस्फोट हो जाएगा। अब इसके बाद कुछ भी कहने को क्या रह जाता है। पत्रकारिता को यह दिन भी देखना था। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अब लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत को ही विस्फोट से उड़ाने की तैयारी में है। याने अब हम जिस डाल पर बैठे हैं, उसी को काटने की तैयारी में हैं। विडंबना यह कि इस हालत को समाज पहचान रहा है और हम बेखबर हैं। आखिर समय की स्लेट पर लिखी इबारत हम कब पढ़ेंगे? किसी भी सभ्य समाज में गैर जिम्मेदार पत्रकारिता के लिए कोई स्थान नहीं है।

याद कीजिए, संसार के सारे कार्टूनिस्टों के सिरमौर आर.के. लक्ष्मण ने करीब आधी शताब्दी तक भारत के करोड़ों पाठकों के दिलों पर राज किया है। अपनी चंद रेखाओं से उन्होंने एक काल्पनिक किरदार पैदा किया। यह आम आदमी था। यह आम आदमी अवाम की बात करता था और लक्ष्मण इस देश के एक एक नागरिक से इन रेखाओं के जरिए जुड़ जाते थे। आगे जाकर यह आम आदमी नाम का काल्पनिक पात्र इस मुल्क की जनता का प्रतिनिधित्व करने लगा। इसकी लोकप्रियता का आलम यहां तक पहुंचा कि लक्ष्मण के निधन को अनेक बरस बीत चुके हैं, मगर उनका आम आदमी आज भी जिंदा है। इतना ही नहीं, मुंबई और पुणे में सड़कों-चौराहों पर इस आम आदमी की बड़ी बड़ी मूर्तियां लगी हैं। हम लोग उसे देखते हैं और उसमें अपनी अपनी पीड़ा का प्रतिबिम्ब पाते हैं। समूचे संसार में इस तरह का कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। यह अपार लोकप्रियता तब मिलती है, जब पत्रकारिता आम आदमी की बात करती है। आज हम सियासत के प्रवक्ता बन बैठे हैं। अवाम को कोसते हैं कि उसने दिल्ली के चुनावी चक्कर में मुफ्तखोरी के लालच में अपना बेड़ा गर्क कर लिया गोया 1947 के बाद पहली बार किसी पार्टी ने इस तरह के वादे किए हों।

लब्बो लुआब यह कि जब पत्रकारिता इस धर्मसंकट में हो कि निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता करना संभव नहीं है तो बिना सोचे समझे अवाम के साथ खड़े होने से उतना नुकसान नहीं होता, जितना सियासत का साथ देने से होता है। समूचे विश्व के प्रतिष्ठित मीडिया शिखर पुरुषों ने यह तथ्य स्वीकार किया है। इसमें पक्ष या प्रतिपक्ष जैसी कोई बात नहीं बल्कि इस धारणा को मान लिया गया है कि देश की जनता कभी गलत फैसला नहीं करती। यह बात अब आपको भी समझ लेनी चाहिए मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

इस धर्म या कर्तव्य को निभाने से किसने रोका है मिस्टर मीडिया?

भारत के पत्रकार क्या इससे सबक लेंगे मिस्टर मीडिया!

इस मानसिक दिवालिएपन पर क्या कहा जाए, मिस्टर मीडिया!

चुनाव कवरेज के सारे नियम-संतुलन टूट रहे हैं, मिस्टर मीडिया!

 

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कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के नए कुलपति का चयन क्यों है महत्त्वपूर्ण

बड़े अखबारों के संपादक, प्रोफेसर, नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष रहते हुए प्रो. बलदेव भाई शर्मा की सेवाओं को सारे देश ने देखा और उसके स्पंदन को महसूस किया है।

Last Modified:
Tuesday, 03 March, 2020
baldev

-प्रो.संजय द्विवेदी ।।

हिंदी पत्रकारिता के विनम्र सेवकों की सूची जब भी बनेगी उसमें प्रो. बलदेव भाई शर्मा का नाम अनिवार्य रूप से शामिल होगा। ऐसा इसलिए नहीं कि उन्हें रायपुर स्थित कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया है। बल्कि इसलिए कि उन्होंने छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और दिल्ली की पत्रकारिता में अपने उजले पदचिन्ह छोड़े हैं। उनकी पत्रकारिता की पूरी पारी ध्येयनिष्ठा और भारतबोध से भरी है। वे अपने आसपास इतना सृजनात्मक और सकारात्मक वातावरण बना देते हैं कि नकारात्मकता वहां से बहुत दूर चली जाती है।

बड़े अखबारों के संपादक, प्रोफेसर, नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष रहते हुए उनकी सेवाओं को सारे देश ने देखा और उसके स्पंदन को महसूस किया है। इस पूरी यात्रा में बलदेव भाई के निजी जीवन के द्वंद्व, निजी दुख, पारिवारिक कष्ट कहीं से उन्हें विचलित नहीं करते। अपने युवा पुत्र और पुत्री के निधन के समाचार उन्हें आघात तो देते हैं पर इन पारिवारिक दुखों के बीच भी वे अविचल और अडिग खड़े रहते हैं। अपने जीवन की ध्येयनिष्ठा उन्हें शक्ति देती है। लोगों का साहचर्य उन्हें सामान्य बनाए रखता है। उनका साथ और सानिध्य मुझ जैसे अनेक युवाओं को मिला है, जो उनसे प्रेरणा लेकर पत्रकारिता के क्षेत्र में आए। उनसे सीखा और उनकी बनाई राह पर चलने की कोशिश की।

मुख्यधारा की पत्रकारिता में जिस तरह उनके विरोधी विचारों का आधिपत्य था, उसके बीच उन्होंने राह बनाई। दैनिक भास्कर, हरियाणा के राज्य संपादक के रूप में उनकी सेवाएं और एक नए संस्थान को जमाने में उनकी मेहनत हमारे सामने है। इसी तरह वाराणसी में अमर उजाला के संस्थापक संपादक के रूप में संस्थान को आकार देकर उन्होंने साबित किया कि वे किसी भी तरह के कामों को अंजाम देने में दक्ष हैं। दिल्ली के नेशनल दुनिया के संपादक, नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष रहते हुए उनके द्वारा किए गए काम सराहे गए। उनके कार्यकाल में राष्ट्रीय पुस्तक मेले को एक नया और व्यापक स्वरूप मिला। किताबों की बिक्री कई गुना बढ़ गयी। उनके स्वभाव और सौजन्य से लोग जुड़ते चले गए। 

स्वदेश, ग्वालियर और रायपुर के संपादक के रूप में मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ की जमीन पर उन्होंने अपने रिश्तों का संसार खड़ा किया जो आज भी उन्हें अपना मानता है। रिश्तों को बनाना और उन्हें जीना उनसे सीखा जा सकता है। बलदेव भाई की कहानी ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसने अपनी किशोरावस्था में एक स्वप्न देखा और उसे पूरा करने के लिए पूरी जिंदगी लगा दी। उनकी आरंभिक पत्रकारिता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिक छाया में चलने वाले प्रकाशनों ‘स्वदेश’ और ‘पांचजन्य’ के साथ चली। इस यात्रा ने उन्हें वैचारिक तौर पर प्रखरता और तेजस्विता दी। अपने लेखन और विचारों में वे दृढ़ बने। किंतु इसी संगठनात्मक-वैचारिक दीक्षा ने उन्हें समावेशी और लोकसंग्रही बनाया। अपनी इसी धार को लेकर वे मुख्यधारा के अखबारों में भी सफलता के झंडे गाड़ते रहे।

मथुरा जिले के पटलौनी(बल्देव) गांव में 6 अक्टूबर, 1955 में जन्में बलदेव भाई अपने लेखन कौशल के लिए जाने जाते हैं। उनकी कई पुस्तकें अब प्रकाशित होकर लोक विमर्श का हिस्सा हैं। जिनमें ‘मेरे समय का भारत’, ‘आध्यात्मिक चेतना और सुगंधित जीवन’, 'संपादकीय विमर्श', 'अखबार और विचार' 'हमारे सुदर्शन जी' और ‘सहजता की भव्यता’ शामिल हैं। उन्हें म.प्र. शासन के ‘पं. माणिकचंद वाजपेयी राष्ट्रीय पत्रकारिता सम्मान’, स्वामी अखंडानंद मेमोरियल ट्रस्ट, मुंबई का रचनात्मक पत्रकारिता राष्ट्रीय सम्मान व केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा द्वारा ‘पंडित माधवराव सप्रे साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान’  दिया जा चुका है।

मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता की लंबी और सार्थक पारी के बाद अब जब उन्हें देश के दूसरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में नियुक्त किया गया है तब उम्मीद की जानी कि वे अपने अनुभव, दक्षता और उदारता से इस शिक्षण संस्थान की राष्ट्रीय पहचान बनाने में अवश्य सफल होंगे। फिलहाल तो इस यशस्वी पत्रकार को शुभकामनाओं के सिवा दिया ही क्या जा सकता है।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग में प्रोफेसर हैं)

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‘मीडिया की नकारात्मक रिपोर्टिंग ही है जो बैंकर्स को ‘कामचोर’ बना देती है’

छुट्टियां वैसे तो सभी के लिए मूल्यवान होती हैं, लेकिन पत्रकारों के लिए इनका मूल्य और भी बढ़ जाता है, क्योंकि जब किसी चीज की उपलब्धता कम हो, तो उसका मूल्य बढ़ना लाजमी है

नीरज नैयर by
Published - Monday, 02 March, 2020
Last Modified:
Monday, 02 March, 2020
bankers

काफी दिनों से कुछ लिखने का सोच रहा था, लेकिन कभी दिमाग साथ नहीं दे रहा था और कभी समय। आज सौभाग्य से दोनों साथ हैं और देखिये इसलिए कई दिनों का अधूरा काम आज पूरा होने की दिशा में बढ़ चला है। लिखने का माहौल बनाने के बाद बारी आई विषय खोजने की, जो अक्सर ही मुश्किल काम होता है। दिमागी घोड़े दौड़ाते-दौड़ाते अचानक नजर पास रखी चेकबुक पर गई और मैं एकदम से कई साल पीछे चला गया। दिमाग की यही खासियत है कि आप तुरंत ही अपनी जिंदगी को रिवाइंड करके देख सकते हैं और इसके लिए कोई बटन दबाने की भी जरूरत नहीं पड़ती। पीछे जाकर मैंने उन खबरों पर अपनी प्रतिक्रिया पर गौर किया, जो बैंक या बैंकर्स के विषय में आया करती थीं। अब उन प्रतिक्रियाओं को मौजूदा प्रतिक्रियाओं से मिलाया और लेखन का विषय उभरकर सामने आ गया। अमूमन जब हम अपनी सालों पुरानी फोटो को आज की फोटो से मिलाते हैं, तो कई अंतर सामने आते हैं। सबसे बड़ा अंतर तो शायद वजन का होता है, लेकिन सोच के मामले में भी ऐसा होगा, ये जरूरी नहीं। उदाहरण के तौर पर आज भी अधिकांश लोग यह मानते हैं कि बैंकों में काम नहीं होता। कुछ ऐसा ही वह कल भी मानते थे। बैंक की नौकरी उन्हें कल भी ऐशोआराम से भरपूर लगती थी, और आज भी। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? इसका निष्पक्ष और सबसे सटीक जवाब केवल वही दे सकता है, जिसका अपना कोई बैंक में हो।    

मैंने एक बैंकर से शादी की है और पिछले सात सालों में कई मर्तबा मैंने उसे खुद से ज्यादा व्यस्त पाया है। सच कहूं तो शादी के बाद ही मैं इस हकीकत को महसूस कर पाया कि बैंकों में भी रात 9-10 बजे तक काम होता है। वरना, पहले मैं उस जमात का हिस्सा था, जिसकी नजर में 6 बजते ही बैंकर कुर्सी छोड़कर घर के लिए निकल जाते हैं। सुबह 9 बजे ऑफिस जाना और रात लगभग इतने ही बजे वापस आना, बैंकों की ऐसी स्थिति की कल्पना तो मैंने कभी नहीं की थी और आज भी अधिकांश लोग इसकी कल्पना नहीं कर सकते। एक और बात जो मैंने महसूस की वो यह कि बैंकर्स की छुट्टियों पर भी कैंची चलती है, उन्हें भी ‘काम के बोझ’ में कई बार अवकाश की आस को खूंटी पर टांगना पड़ता है, जैसे कि हम पत्रकारों को।

छुट्टियां वैसे तो सभी के लिए मूल्यवान होती हैं, लेकिन पत्रकारों के लिए इनका मूल्य और भी बढ़ जाता है। क्योंकि जब किसी चीज की उपलब्धता कम हो, तो उसका मूल्य बढ़ना लाजमी है। खैर, अपने पेशे पर तो कलम कई बार चल चुकी है, लिहाजा मूल मुद्दे पर वापस लौटते हैं। इन सात सालों में कई बार ऐसा हुआ कि अपने स्वयं घोषित व्यस्त शेड्यूल से टाइम निकालने के बावजूद मेरे प्लान इसलिए चौपट हो गए, क्योंकि पत्नी को छुट्टी नहीं मिल सकी। कई दफा तो ऐन मौके पर घूमने की खुशियों को तीली दिखानी पड़ी।

हर नौकरीपेशा को अपने एचआर विभाग से हमेशा शिकायत रहती है। मुझे भी रहती थी, हम दोस्त मिलकर अक्सर यह बातें करते कि एचआर वालों के पास कोई काम नहीं होता, इस भ्रम को भी मेरी पत्नी ने दूर किया। बतौर एचआर मैनेजर 10-12 घंटे की नौकरी के बाद घर में भी ऑफिस की उधेड़बुन और छुट्टी वाले दिन भी घनघनाते मोबाइल ने मुझे यकीन दिला दिया कि एचआर में भी काम होता है और भरपूर होता है। शुरुआत में मुझे काफी परेशानी हुई, लेकिन धीरे-धीरे मैंने एडजस्ट कर लिया, ठीक वैसे ही जैसे उसने मेरे साथ एडजस्ट कर लिया। अपनी बड़ाई मैं इसलिए कर रहा हूं क्योंकि पत्रकारों की लाइफस्टाइल के साथ एडजस्ट करना हर किसी के बस की बात नहीं होती। शादी से पहले तक मुझे बैंकों में होने वाली हड़ताल भी बहुत सालती थी। बहुत बुरा लगता था जब बैंकों पर लगे तालों के चलते आम जनता के जरूरी काम अटक जाते थे, मगर अब उन ‘तालों’ की जरूरत का अहसास होने लगा है।

इससे पहले कि आप मेरे अहसास को ‘स्वार्थ या पक्षपात’ का नाम दें, मैं एक उदाहरण आपके समक्ष रखना चाहता हूं। बात कुछ साल पहले की है, जब मैं मध्यप्रदेश के एक बड़े मीडिया हाउस का हिस्सा हुआ करता था। प्रबंधन द्वारा हर बार संपादकीय विभाग के साथियों से वेतनवृद्धि का वादा किया जाता और फिर उसे भुला दिया जाता। हम नाराज होते, मन में सैंकड़ों गालियां देते और आखिरकार काम पर लग जाते, क्योंकि हमारे सीनियर जानते थे कि हमें कैसे समझाना है। लेकिन जब समझने-समझाने की सीमा पार होने लगी, तो हमारे सब्र का बांध भी टूट गया। हम एक दिन कलम चलाने के बजाये खामोश बैठे रहे... यानी कलम बंद आंदोलन। तब प्रबंधन को अहसास हुआ कि कोरे आश्वासन अब काम नहीं आएंगे और हमें हमारा वाजिब हक दिया गया। अब मैं अपने ऊपर उल्लेखित ‘अहसास’ पर वापस आता हूं। तो बैंकों में हड़ताल की असल वजह सरकार द्वारा कर्मियों की वाजिब मांगों की लगातार अनदेखी है, जिसमें वेज रिविजन सबसे प्रमुख है। बैंकर्स लंबे समय से वेतन में इजाफे की मांग कर रहे हैं और सरकार वैसा ही झुनझुना पकड़ा रही है जैसा कि हमारे मीडिया हाउस का प्रबंधन पकड़ाता  था।

एक और बात जो जानना सबसे जरूरी है वो यह कि हड़ताल में शामिल होने वालों की तनख्वाह भी कटती है। यानी अपने हक की आवाज उठाने की कीमत अदा करनी पड़ती है, लिहाजा इसे केवल छुट्टी के रूप में तो कतई नहीं देखा जाना चाहिए। अधिकांश लोगों की शिकायत होती है कि बैंकों में काम नहीं होता। ये बात सही है कि सरकारी बैंकों के स्टाफ और निजी बैंकों के कर्मचारियों के व्यवहार में अंतर होता है। मैं खुद भी इसे महसूस कर चुका हूं, लेकिन अब यह समझ आने लगा है कि इस अंतर की एक वजह फुटफॉल भी है। यानी हर रोज बैंक पहुंचने वालों की संख्या। सरकारी बैंकों में चपरासी से लेकर धन्नासेठ तक हर तबके के लोग सैंकड़ों की संख्या में पहुंचते हैं, जबकि प्राइवेट बैंकों में संख्या भी सीमित होती है और उन्हें हर तबके की जरूरत का ज्यादा ध्यान भी नहीं रखना पड़ता, क्योंकि मिनिमम बैलेंस की बाध्यता के चलते आम इंसान वहां का रुख नहीं करता। उदाहरण के तौर पर यदि आपको दिन में 100 लोगों से मिलना पड़ता है, वो भी हर किस्म के और मेरा काम 10-20 लोगों में ही खत्म हो जाता है, तो आपके और मेरे व्यवहार में अंतर लाजमी है। इसके अलावा, मोदी सरकार की लगभग हर स्कीम का बोझ बैंकर्स उठा रहे हैं, मतलब उनका काम बढ़ा है। ‘आधार’ के लिए एक अलग संस्था होने के बावजूद बैंकों में सेंटर खुलवा दिए गए हैं। नोटबंदी को आप कैसे भूल सकते हैं, उस वक्त बैंकों में जितना काम हुआ, उतना कहीं नहीं हो सकता। कई बैंकर्स को अपनी जान तक गंवानी पड़ी थी। आज जान भले ही न जा रही हो, लेकिन काम जान बराबर ही है। पोस्टिंग के मामले में भी बैंकर्स की स्थिति खास अच्छी नहीं है। छत्तीसगढ़ के घोर नक्सल प्रभावित इलाकों से लेकर घाटी के आतंकवाद ग्रस्त इलाकों तक में बैंक की शाखाएं हैं, जहां हर रोज बैंककर्मी अपनी जान जोखिम में डालकर काम करते हैं। कई-कई महीनों तक उन्हें अपने परिवार का मुंह देखना भी नसीब नहीं होता। अब इसे आरामदेह नौकरी तो नहीं कहा जा सकता?

बैंकर्स के लंच को लेकर भी सवाल उठाये जाते हैं। किसी जमाने में मैं भी सवाल उठाने वालों का हिस्सा हुआ करता था, लेकिन अब मुझे लगता है कि जब निजी से लेकर सरकारी तक सभी कार्यालयों में पेट पूजा के लिए समय निर्धारित है, तो फिर बैंककर्मियों के एक साथ बैठकर लंच करने पर आपत्ति क्यों? प्रेस में काम के दौरान कई बार हम पत्रकारों को भी अकेले खाना खाने को मजबूर होना पड़ता है, क्योंकि वहां सारा काम डेडलाइन का है और कसम से वह समय सबसे उबाऊ होता है। आप जाते हैं, टिफिन खोलते हैं, खाना खाते हैं और वापस आकर काम में जुट जाते हैं। ये न तो आपकी सेहत के लिए ही अच्छा है और न ही आपके मिजाज के लिए। इसके अलावा, तरोताजा न हो पाने का एक अधूरापन अलग सालता रहता है। गौर करने वाली बात यह है कि जिन लोगों को बैंककर्मियों के एक साथ लंच करने पर आपत्ति है, उनमें से अधिकांश अपने ऑफिस में इसके पक्षधर होंगे और लंच टाइम के एक-एक सेकंड को निचोड़ना जानते होंगे।

बैंकर्स की एक व्यथा यह भी है कि लोगों के ताने, आलोचना, कटाक्ष के बीच काम करने के बावजूद सरकार उसे अपना नहीं समझती, वो सरकार जिसकी आधी से ज्यादा तथाकथित महत्वकांक्षी योजनाओं का बोझ बैंककर्मी ही उठा रहे हैं। पहले अरुण जेटली थे, जो बैंककर्मियों को सरकारी कर्मचारी मानने से ही इनकार करते रहे और अब सीतारमण हैं जिनकी सोच काफी हद तक मेरी पूर्व की सोच से मेल खाती है कि बैंकों में काम नहीं होता। मैं तो फिर भी एक सामान्य नागरिक हूं, मेरी सोच बैंककर्मियों के लिए खास मायने नहीं रखती, लेकिन सबकुछ जानते-बुझते हुए भी वित्तमंत्री का रुखा व्यवहार उन्हें दर्द देता है।

वैसे, बैंकर्स को दर्द देने में हमारी मीडिया भी पीछे नहीं है। एक पत्रकार होने के बावजूद मैं तो यही कहूंगा कि मीडिया की नकारात्मक रिपोर्टिंग की वजह से ही आमजन बैंककर्मियों को ‘कामचोर’ समझने की भूल करता है। बैंकों से जुड़ी खबरों के शीर्षक ऐसे लगाये जाते हैं जैसे देश में बहुत बड़ा अनर्थ होने जा रहा है।

अंत में बस यही कहना चाहूंगा कि बैंक और बैंकर्स वैसे नहीं हैं, जैसे हममें से अधिकांश लोग अब तक समझते आये हैं। उन्हें भी उतना ही काम करना पड़ता है, जितना मुझे या आपको। इसलिए जब हम खुद को कामचोर नहीं समझते, तो उन्हें कैसे समझ सकते हैं? अपने आसपास के किसी बैंकर की लाइफ को करीब से देखिये, गलतफहमी दूर हो जाएगी, जैसे कि मेरी हो चुकी है।          

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