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अगर प्रेम की भर्त्सना करेंगे तो कालिदास का क्या करेंगे : समीर चौगांवकर
'वेलेन्टाइन डे' के पीछे लट्ठ लेकर पड़े हमारे नौजवानों को शायद पता नहीं कि भारत में मदनोत्सव, वसन्तोत्सव और कौमुदी महोत्सव की शानदार परम्पराएं रही हैं।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 year ago
समीर चौगांवकर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
प्रेम का जो मुकाम भारत में है, हिंदू धर्म में है, हमारी परम्परा में है, वह दुनिया में कहीं नहीं है। वेलेन्टाइन 14 फरवरी को मनाया जाता है। मध्य फरवरी तक प्रकृति में,चराचर जगत में परिवर्तन होता है। ‘आया वसन्त, जाड़ा उड़न्त’! वसन्त के परिवर्तनों का जैसा कालिदास ने ऋतुसंहार में, श्री हर्ष ने रत्नावली में, भास ने स्वप्नवासवदत्तम् में और विशाखदत्त ने मुद्राराक्षस में अंकन किया है, दुनिया में कहीं नहीं मिलेगा। सौन्दर्य का, प्रेम का, शृंगार का, रति का, मौसम की मजबूरियों का इतना सूक्ष्म चित्रण इतना गहन और स्पष्ट है जो कही नहीं है।
अगर प्रेम की भर्त्सना करेंगे तो कालिदास का क्या करेंगे? श्रीहर्ष का क्या करेंगे? बाणभट्ट का क्या करेंगे? 'वेलेन्टाइन डे' के पीछे लट्ठ लेकर पड़े हमारे नौजवानों को शायद पता नहीं कि भारत में मदनोत्सव, वसन्तोत्सव और कौमुदी महोत्सव की शानदार परम्पराएं रही हैं। इन उत्सवों के आगे 'वेलेन्टाइन डे' पानी भरता नज़र आता है। कौमुदी महोत्सवों में युवक और युवतियां कार्डों का लेन-देन नहीं करते, प्रमत्त होकर वन-विहार करते हैं, गाते-बजाते हैं, रंगरलियां करते हैं, गुलाल-अबीर उड़ाते हैं, एक-दूसरे को रंगों से सरोबार करते हैं और उनके साथ चराचर जगत भी मदमस्त होकर झूमता है।
मस्ती का वह संगीत पेड़- पौधों, लता-गुल्मों, पशु-पक्षियों, नदी-झरनों-प्रकृति के चप्पे-चप्पे में फूट पड़ता है। सम्पूर्ण सृष्टि प्रेम के स्पर्श के लिए आतुर दिखाई पड़ती है। सुन्दरियों के पदाघात से अशोक के वृक्ष खिल उठते हैं। सृष्टि अपना मुक्ति-पर्व मनाती है। इस मुक्ति से मनुष्य क्यों वंचित रहे? मुक्ति-पर्व की पराकाष्ठा होली में होती है। सारे बन्धन टूटते हैं। मान-मर्यादा ताक पर चली जाती है। चेतन में अचेतन और अचेतन में चेतन का मुक्त-प्रवाह होता है।
राधा कृष्ण और कृष्ण राधामय हो जाते हैं। सम्पूर्ण अस्तित्व दोलायमान हो जाता है, रस में भीग जाता है, प्रेम में डूब जाता है। ब्रज की गोरी, कन्हैया की जैसी दुर्गति करती है, क्या वेलेन्टाइन के प्रेमी उतनी दूर तक जा सकते हैं? प्रतिबन्धों, प्रताड़नाओं, वर्जनाओं का भारत कभी हिंदू भारत तो हो ही नहीं सकता जिसे हिंदू भारत कहा जाता है, वह ग्रन्थियों से ग्रस्त कभी नहीं रहा।
वह भारत मानव मात्र की मुक्ति का सगुण सन्देश है। उस भारत को वेलेन्टाइन से क्या डर है? उसके हर पहलू में हजारों वेलेन्टाइन बसे हुए हैं। उसे वेलेन्टाइन के आयात नहीं, होली के निर्यात की जरूरत है। चीन, जापान, थाईलैंड, सिंगापुर आदि देशों के दमित यौन के लिए वेलेन्टाइन निकास-गली बन सकते हैं लेकिन जिस देश में गोपियां कृष्ण की बाहें मरोड़ देती हैं, पीताम्बर छीन लेती हैं, गालों पर गुलाल रगड़ देती हैं, और नैन नचाकर कहती हैं 'लला, फिर आइयो खेलन होरी,' उस देश में वेलेन्टाइन की क्या ज़रूरत?
कृष्ण के मुकाबले वेलेन्टाइन क्या है? कहां कृष्ण और कहां वेलेन्टाइन ?मृत्युओं के परे, पतझड़ों के परे, समय के परे, उस लोक में, जहां प्रेम चतुर्दशी एक दिन नहीं, हर पल की पहचान होती है। भारत में वेलेन्टाइन डे की ज़रूरत नहीं है। यह राधा और कृष्ण की धरती है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
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