जनता की निगाह से उतरने लगे हैं इस तरह के नेता, बताया वरिष्ठ पत्रकार अजय शुक्ल ने

मैं अचानक मर जाऊं, तो मेरी पत्नी विधवा हो जाएगी। मेरी बच्चियों और मेरे माता-पिता का...

Last Modified:
Sunday, 25 November, 2018
ajay shukla

अजय शुक्ल

प्रधान संपादक, आईटीवी नेटवर्क।।

हास्यास्पद है विकल्प का सवाल!

मैं अचानक मर जाऊं, तो मेरी पत्नी विधवा हो जाएगी। मेरी बच्चियों और मेरे माता-पिता का क्या होगा? मेरे छोटे भाई-बहन क्या करेंगे, मेरे मित्रों और सहयोगियों के साथ क्या होगा? ये ऐसे सवाल हैं, जिसका सिर्फ एक जवाब है कि प्रकृति ने हर किसी को समर्थ बनाया है। वक्त के साथ बेहतर विकल्प तैयार हो जाते हैं। जब अचानक पंडित जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु हुई, तब पूरा देश सदमे में पहुंच गया। विकल्प कौन बने, इसको लेकर दो महीने मंथन चला और उस महानायक की जगह एक गुदड़ी के लाल (लाल बहादुर शास्त्री) ने ली। सजग, सतर्क और ईमानदार सरकार प्रस्तुत की। डेढ़ साल में ही उनकी भी मृत्यु हो गई, तब फिर संकट खड़ा हुआ मगर दो महीने में ही नए विकल्प के तौर पर इंदिरा गांधी आईं, जिनका विरोधी गूंगी गुड़िया कहकर उपहास करते थे। वह विश्व की सबसे ताकतवर महिला नेता के रूप में उभरीं। विपक्ष को भी उन्हें मां दुर्गा और आयरन लेडी की उपाधि देनी पड़ी। हमने यह सिर्फ देशी उदाहरण दिए हैं, क्योंकि बात 130 करोड़ की आबादी वाले देश की हो रही है।

इस वक्त देश में कुछ ऐसे ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं कि आखिर देश संभालने के लिए विकल्प क्या हैं? जो भी व्यक्ति या संस्था इस तरह का सवाल करता है, वह 130 करोड़ की आबादी वाले देश को निकम्मा और निर्लज्ज करार देता है। अगर इतनी जनसंख्या में कोई योग्य नहीं तो हम सभी को शर्म से डूब मरना चाहिए। हम कुछ पीछे चलें तो 2013 में लोग सवाल उठाते थे कि आखिर विकल्प क्या है? हमें एक अच्छा विकल्प मिला नरेंद्र मोदी के रूप में। अगर मोदी विकल्प हो सकते हैं, तो उनसे भी बहुत अच्छे और श्रेष्ठ लोग भाजपा और कांग्रेस सहित तमाम दलों में मौजूद हैं। वेद कहता है ‘जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् भवेत् द्विजः।वेद-पाठात् भवेत् विप्रः ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः’। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जन्म से कोई व्यक्ति योग्य नहीं होता, बल्कि अपने कार्यों-संस्कारों से योग्य बनता है। प्रभुत्व स्थापित करने के लिए कालांतर में यह व्यवस्था बना दी गई कि लोग जन्म से ही योग्य होते हैं, क्योंकि वो कुलीन हैं। कमोबेश यही स्थिति हमारे यहां राजनीति में आ गई है और चाटुकार निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए इसे आगे बढ़ाते हैं।

भारत में जब स्वशासन का संघर्ष शुरू हुआ तब सिर्फ एक ही पार्टी थी, कांग्रेस। उसमें तमाम विचारधारायें थीं। हर विचारधारा ने एक दल का रूप ले लिया। कोई वामपंथी बन गया तो कोई दक्षिणपंथी। कोई जातिगत संगठन का हिस्सा तो कोई धर्मगत दल का। सभी हक की लड़ाई लड़ रहे थे और सभी ने विकल्प तलाशे। सबको साथ लेकर चलने की नीति के कारण सत्ता कांग्रेस के हाथ आई। देश ने उस पर यकीन किया। उस वक्त कांग्रेस का विकल्प क्या है? सवाल था मगर एक नहीं, कई विकल्प उभरे। अब कांग्रेस कुछ राज्यों में सिमट गई है, जबकि विकल्प डेढ़ दर्जन राज्यों में हैं। ऐसा भी नहीं है कि इन विकल्पों का विकल्प नहीं है। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में सबको ‘साफ’ करके बता दिया कि जनता जब चाहे, आमजन के बीच में ही विकल्प बना देती है। पंजाब में दशकों से धर्म की सियासत करने वाले अकाली-भाजपा गठबंधन को जनता ने तीसरे पायदान पर धकेल दिया। प्रतिपक्ष के रूप में पांच साल पहले उभरी आम आदमी पार्टी को बैठा दिया। डा. मनमोहन सिंह जैसे श्रेष्ठतम अर्थशास्त्री, जो बगैर कुछ बोले ईमानदारी से काम करने वाले नेता हैं, के विकल्प के रूप में सामने, बहुत अधिक बोलने वाले नरेंद्र मोदी को जनता ने नेता मान लिया मगर यह अंत नहीं है।

भाजपा में ही शैक्षिक, बौद्धिक और राजनीतिक खूबियों से परिपूर्ण दर्जनों नेता हैं। इसी तरह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर मणिशंकर अय्यर तक सैकड़ों योग्य नेताओं की भरमार है। सभी बहुत अधिक शिक्षित, बौद्धिक और राजनीतिक समझ रखने वाले हैं। किसी की बातों को तोड़मरोड़ के प्रस्तुत करने के अभियान भले ही कुछ देर किसी को अयोग्य बना दें मगर लंबे समय में यह सभी समझ जाते हैं कि कौन क्या है। किसी के कामों में अड़ंगा डालने से वह अयोग्य नहीं होता, बल्कि वह परिपक्व होता है। बीते कुछ वक्त में ऐसा ही हुआ है। सुरक्षा घेरे में कुछ अपनों से सदैव घिरे रहने वाले राहुल गांधी अब धूप-छांव और बारिश को झेलकर देश की समस्याओं को बारीकी से समझने लगे हैं। एक आंदोलन से राजनीति में आए अरविंद केजरीवाल अब बक-बक नहीं करते, बल्कि काम के जरिए अपनी पहचान बनाते दिखते हैं। बक-बक करने वाले अब जनता की निगाह से उतरने लगे हैं। सियासी दांव और वादों के तो इतने अधिक विकल्प हैं कि उन्हें चुनने में ही मतदाता भ्रमित हो जाए। नई पीढ़ी के नेता अपने पहले की पीढ़ी से ज्यादा समझदार हैं। वो युवा देश के करोड़ों बेरोजगारों का दर्द भी समझते हैं और आमजन से जुड़कर खुद को खुशकिस्मत भी।

हमने दोनों राष्ट्रीय दलों सहित आधा दर्जन क्षेत्रीय दलों के दो सौ ऐसे नाम निकाले जो शैक्षिक से लेकर बौद्धिक रूप से नेतृत्व क्षमता वाले हों। किसी भी मानक पर उनकी योग्यता के आधार पर विकल्प होने से कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता, मगर सवाल विकल्प या योग्यता का नहीं, बल्कि जनता की स्वीकार्यता का है। 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी जैसे कर्मठ और विकासवादी सोच रखने वाले नेता के विकल्प के तौर पर सोनिया गांधी के नेतृत्व में चुनाव जीता गया। जनता ने सोनिया को स्वीकारा तो उन्होंने डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया। 2009 का लोकसभा चुनाव राहुल गांधी के युवा चेहरे और मनमोहन सिंह के काम पर सोनिया के नेतृत्व में लड़ा गया और कांग्रेस की सीटें बढ़ीं। वजह साफ है कि दोनों की स्वीकार्यता थी मगर 2014 में वही राहुल गांधी पप्पू घोषित कर दिया गया और डा. मनमोहन सिंह जैसा काबिल व्यक्ति मौनी बाबा सहित न जाने कितनी संज्ञाओं से नवाज दिया गया। जनता ने नरेंद्र मोदी को पूर्ण बहुमत से नेता मान लिया।

हमें विकल्प का सवाल उठाने का न तो हक है और न ही ऐसा करके हमें 130 करोड़ नागरिकों का अपमान करना चाहिए। हमें गुण-दोष के आधार पर नेता का चयन करना चाहिए, क्योंकि भ्रष्ट भी सभी दलों में हैं और भ्रष्टाचार-अनैतिकता भी। इन सब बुराइयों से परे हमें वह विकल्प खोजना है जो जनहित को सर्वोपरि माने। वो हमारे देश के भविष्य के साथ छल न करे, बल्कि उसे सुदृढ़ बनाए। सच बोले और अगर कोई गलती हो जाए तो तो उसे स्वीकारने। भविष्य में उसे न दोहराने का संकल्प ले, वही नेता हमारा विकल्प होना चाहिए, न कि झूठ और प्रपंच का जाल बुनने वाला। आपस में लड़ाकर सत्ता सुख भोगने वाला हमारा विकल्प नहीं होना चाहिए। हम सबको जोड़कर ‘एक बड़े भारतीय परिवार’ में रहना सिखाने वाला ही हमारा विकल्प हो सकता है। एक वाक्य में बात यह है कि संकल्प का कोई विकल्प नहीं होता, तो सर्वे भवंतु सुखिना, सर्वे भवंतु निरामया की सोच रखने वाला ही हमारा विकल्प होना चाहिए। 

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‘एक राष्ट्र, एक भाषा’ का विरोध करने वालों को कौन समझाए ये बड़ी बात

यह हिंदी का दुर्भाग्य है कि जब-जब उसे आगे बढ़ाने के ईमानदार प्रयास होने लगते हैं, वह राजनीति की शिकार हो जाती है

Last Modified:
Friday, 20 September, 2019
Govind Singh

प्रो. गोविंद सिंह।।

गृह मंत्री अमित शाह ने ‘एक राष्ट्र, एक भाषा’ की बात क्या कह दी कि लगा जैसे उन्होंने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया हो। दक्षिण में स्टालिन और कुमारस्वामी से लेकर पूर्व में ममता बनर्जी और इस्लाम के नाम पर राजनीति करने वाले नेता असदुद्दीन ओवेसी तक सभी केंद्र सरकार को कोसने लगे। उन्हें लगा कि सस्ते में अपनी राजनीति की रोटियां सेकने का वक्त आ गया है। यह हिंदी का दुर्भाग्य है कि जब-जब उसे आगे बढ़ाने के ईमानदार प्रयास होने लगते हैं, वह राजनीति की शिकार हो जाती है।

विरोध के स्वरों में से इस बार दो बातें प्रमुखता से उभरकर आ रही हैं। पहली यह कि हिंदी जैसे हिंदुओं की भाषा है। ओवेसी ने कहा कि देश हिंदी, हिंदू और हिंदुत्व से ऊपर है। शायद वे भारतीय जनसंघ के उस पुराने नारे को याद करना चाह रहे थे, जिसमें हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान यानी हिंदू राष्ट्र का सपना देखा गया था। हालांकि गृहमंत्री के हिंदी दिवस के भाषण से ऐसी कोई भी ध्वनि नहीं निकल रही है, लेकिन फिर भी ओवेसी जैसे नेताओं को टीवी चैनलों की फुटेज तो मिल ही गई।

यह वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है कि ओवेसी जिस हिंदी को सिर्फ हिंदुओं की भाषा बता रहे हैं, उसका नामकरण ही अमीर खुसरो ने किया था, जिन्होंने ब्रजभाषा-हिंदी में मुकरियां और शेर लिखे थे। रसखान, रहीम, जायसी जैसे महान कवियों की हिंदी सेवा को वे कैसे भुला सकते हैं?  हिंदी मजहब की बजाय भूगोल की प्रतीक ज्यादा रही है। उसे हिंदुस्तानियों की भाषा कहना ज्यादा प्रासंगिक है।

दुर्भाग्य से ओवेसी उन अंग्रेजों की बोली बोल रहे हैं, जिन्होंने हिंदी और उर्दू को मजहबी आधार पर बांटकर फूट डालने का काम किया था। 1842 से पहले उत्तर प्रदेश की राजभाषा फारसी हुआ करती थी। सत्ता में आते ही सबसे पहले उन्होने हिंदी और उर्दू दोनों को राजभाषा का दर्जा दिया। कुछ ही वर्षों बाद दोनों के बीच फूट डालने के मकसद से सिर्फ उर्दू को ही राजभाषा बना दिया। इससे दोनों के बीच झगड़ा बढ़ गया। धीरे-धीरे उन्होंने यह स्थापित कर दिया कि हिंदी और उर्दू का रिश्ता हिंदू और मुस्लिम समुदायों से है।

राष्ट्रभाषा को लेकर 1928 में कांग्रेस पार्टी की तरफ से मोतीलाल नेहरू समिति ने जो रिपोर्ट दी, उसमें भी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की पैरवी की थी, जिसका मुस्लिम लीग ने कड़ा विरोध किया। बाद के वर्षों में मुस्लिम लीग ने इसका और तीखा विरोध शुरू कर दिया। पाकिस्तान इसका ज्वलंत उदाहरण है। पंजाबी, सिंधी, पश्तो, बलोची और सेराइकी के ऊपर उर्दू थोप दी गई। यही हाल शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर में किया। डोगरी, कश्मीरी, लद्दाखी और बलती के ऊपर उर्दू को थोप दिया, क्योंकि वे इसे इस्लामी देश बनाना चाहते थे। लेकिन इस तरह के फर्जी फैसले बहुत दूर तक नहीं चलते।

सच बात यह है कि हिंदी और उर्दू के बीच कोई झगड़ा है ही नहीं। झगड़ा तो देवनागरी और नशतालिक (अरबी) लिपियों के बीच है। ओवेसी जैसे लोगों को कौन समझाये कि लिपियां भाषा नहीं होतीं, वे भाषा को रिकॉर्ड करने का जरिया भर होती हैं। इसलिए तमाम पश्चिमी देशों में हिंदी और उर्दू को ‘दो लिपियों में लिखी जाने वाली एक भाषा’ कहा जाता है। अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में इस संबंध में एक प्रोजेक्ट भी चल रहा है-हिंदी-उर्दू फ्लैगशिप प्रोजेक्ट। वाकई आज हिंदी और उर्दू एक हो जाएं तो वे दुनिया की सबसे बड़ी भाषा बन जाएंगी। आंकड़े इसके गवाह हैं। दुर्भाग्य से हमारे पास ऐसे नेता हैं, जो एकता की हर डाल को काट डालना चाहते हैं।

विरोध के स्वरों के बीच से जो चिंताएं उठ रही हैं, उनमें एक चिंता यह भी है कि हिंदी अन्य भाषाओं को खा जाएगी। दक्षिण भारत के नेता हों या पूरब के, उन्हें यही चिंता सताती रहती है। 1965 में भी, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री हिंदी को लागू करवाना चाहते थे, तब भी इन्हीं तर्कों के सहारे हिंदी के मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल देना पड़ा था। उस प्रसंग को यहां याद करना प्रासंगिक होगा।

हुआ यह कि 1949 में जब संविधान में हिंदी को राजभाषा बना दिया गया, तब यह दुमछल्ला भी साथ में जोड़ दिया गया कि 15 वर्ष तक अंग्रेजी जारी रहेगी। क्योंकि इस बीच हिंदी को राजभाषा बनाने की तैयारी कर ली जाएगी। 26 जनवरी 1965 को 15 वर्ष पूरे हो गए। लाल बहादुर शास्त्री इसे लागू करना चाहते थे। जैसे ही दक्षिण के नेताओं को यह सूचना मिली, उन्हें लगा कि राजनीति चमकाने का सही वक़्त आ गया है।

द्रविड़ आंदोलन के सबसे बड़े नेता अन्ना दुरई ने इसे हवा दी और आंदोलन भड़क गया। दक्षिण और पूरब के जिन कांग्रेसी नेताओं ने 1949 में हिंदी को राजभाषा बनाने की वकालत की थी, वे भी इसके विरोध में आ गए। तब मोरारजी देसाई ने उन्हें जवाब दिया था, ‘हिंदी सीखकर तमिल भाषी पूरे हिंदुस्तान में अपना प्रभाव बढ़ा सकते हैं।‘ उन्होनें कहा था कि हिंदी ही भारत में संपर्क भाष का काम कर सकती है, क्योंकि अंग्रेजी हमारी अपनी भाषा नहीं है। देसाई ने इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने वाले इस कदम के रास्ते में कोई भी क्षेत्रीय भावना नहीं आनी चाहिए।“

दरअसल, राष्ट्रीय एकता के विरोधी राजनेता और अंग्रेजीदां बुद्धिजीवी लगातार यह भ्रम फैलाते रहे हैं कि हिंदी आ जाएगी तो अन्य क्षेत्रीय भाषाएं विलुप्त हो जाएंगी, मर जाएंगी। जबकि हिंदी का झगड़ा इन भाषाओं से है ही नहीं। उसका झगड़ा तो अंग्रेजी की सत्ता से है, जो वह सात दशकों से अवैध तरीके से कब्जाए हुए है। आश्चर्य की बात यह है कि किसान-मजदूर की बात करने वाले वामपंथी भी इस संदर्भ में हिंदी विरोधी हवा बनाने में पीछे नहीं हैं जबकि हिंदी की बात तो राष्ट्रीय स्तर पर होती है।

प्रादेशिक स्तर पर आप अपनी भाषा को बढ़ाते रहिए, किसने रोका है? मातृभाषा तो वैसे भी सबसे अहम है। उसे कैसे नकारा जा सकता है। हाल ही में अमेरिका में रह रहे विद्वान संक्रांत सानु ने एक पुस्तक में लिखा है कि ज्ञान-विज्ञान और आर्थिक तरक्की में वे ही देश आगे हैं, जिनकी शिक्षा अपनी मातृभाषा में है। क्या वजह है कि अंग्रेजी के पीछे इतना भागते हुए भी हमारा एक भी विश्वविद्यालय दुनिया के टॉप 300 विश्वविद्यालयों में जगह नहीं बना पाया है। इसलिए यह जरूरी है कि राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी बढ़े और प्रांतीय स्तर पर क्षेत्रीय भाषाएं बढ़ें। इसके बिना गुजारा नहीं है।
(लेखक जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं)

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कश्मीरियों को सोचना चाहिए कि उनकी जुबान ज्यादा कीमती है या जान?

पाकिस्तान की फौज और सरकार को खुश होना चाहिए कि कश्मीरियों से प्रतिबंध उठाने की मांग वे जितने जोरों से कर रहे हैं, उससे ज्यादा जोरों से भारत में हो रही है

Last Modified:
Thursday, 19 September, 2019
Dr. Vaidik

डॉ. वेदप्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार।।

आज कश्मीर में प्रतिबंध लगे हुए पूरा डेढ़ महीना हो गया है। सरकार कहती है कि कश्मीर के हालात ठीक हैं। कोई पत्थरबाजी नहीं है। कोई लाठी या गोलीबारी नहीं है। न लोग मर रहे हैं और न घायल हो रहे हैं। मरीज़ों के इलाज के लिए अस्पताल खुले हुए हैं। हजारों आपरेशन हुए हैं। लोगों को राशन वगैरह ठीक से मिलता रहे, उसके लिए दुकानें खुली रहती हैं लेकिन मैंने अपने कश्मीरी दोस्तों और नेताओं से लैंडलाइन टेलिफोन पर बात की है। कुछ जेल से छूटे हुए कार्यकर्ता भी दिल्ली और गुरुग्राम में आकर मुझसे मिले हैं। वे जो कह रहे हैं, वह बिल्कुल इससे उल्टा है।

इन लोगों का कहना है कि कश्मीर में लोग बेहद तकलीफ में हैं। सड़कों पर कर्फ्यू लगा हुआ है। स्कूल-कॉलेज बंद हैं। सैलानियों ने कश्मीर आना लगभग बंद कर दिया है। गरीब लोगों के पास रोजमर्रा की चीजें खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। कोई किसी से बात नहीं कर पा रहा है। इंटरनेट और मोबाइल फोन बंद हैं। ज्यादातर घरों में लैंडलाइन फोन अब है ही नहीं। अखबार और टीवी चैनल्स भी पाबंदियों के शिकार हैं। शुक्रवार को कई मस्जिदों में नमाज भी नहीं पढ़ने दी जाती है, क्योंकि सरकार को डर है कि कहीं भीड़ भड़ककर हिंसा पर उतारू न हो जाए। दिल्ली से जाने वाले कई नेताओं को श्रीनगर हवाई अड्डे से ही वापस कर दिया जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने कई याचिकाओं के जवाब में कहा है कि सरकार वहां जल्दी से जल्दी हालात ठीक करने के लिए कदम उठाए। लगभग सभी अखबारों और टीवी चैनलों पर मांग की जा रही है कि कश्मीरियों को अभिव्यक्ति की आजादी शीघ्रातिशीघ्र दी जाए। मुझे लगता है कि इस मांग पर अमल होना शायद अगले हफ्ते से शुरू हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक बार भारत-पाक वाग्युद्ध हो ले, उसके बाद भारत सरकार जरूर कुछ नरम पड़ेगी।

पाकिस्तान की फौज और सरकार को इस बात पर खुश होना चाहिए कि कश्मीरियों पर से प्रतिबंध उठाने की मांग वे जितने जोरों से कर रहे हैं, उससे ज्यादा जोरों से भारत में हो रही है। फिर भी यह प्रश्न उठता है कि मोदी सरकार ने इतने कड़े प्रतिबंध क्यों लगाए हैं? क्योंकि वह कश्मीर में खून की नदियां बहते हुए नहीं देखना चाहती। कश्मीर के लोगों को सोचना चाहिए कि उनकी जुबान ज्यादा कीमती है या उनकी जान? यही सवाल सबसे बड़ा है।

मैं तो समझता हूं कि कश्मीरी लोगों को अपना क्रोध या गुस्सा प्रकट करने की इजाजत वैसे ही मिलनी चाहिए, जैसी कि चीन ने हांगकांग के लोगों को दे रखी है। अहिंसक प्रदर्शन करने का पवित्र अधिकार सबको है। अब सही मौका है, जबकि जेल में बंद कश्मीरी नेताओं से सरकार मध्यस्थों के जरिये बात करना शुरू करे।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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मिस्टर मीडिया: बेशर्मी के साथ हो रही है अखबार के इस गरिमावान अंग की चरित्र हत्या

सितंबर में हिंदी पर केंद्रित अनेक कार्यक्रम होते हैं, लेकिन यह माह निकलने के बाद जैसे हमारा हिंदी प्रेम गहरी नींद में चला जाता है

राजेश बादल by समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
Published - Wednesday, 18 September, 2019
Last Modified:
Wednesday, 18 September, 2019
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

सितंबर का महीना आमतौर पर हिंदी के लिए समर्पित होता है। इस दौरान हिंदी पर केंद्रित अनेक कार्यक्रम होते हैं। हिंदी माह निकलने के बाद जैसे हमारा हिंदी प्रेम गहरी नींद में चला जाता है। हिंदी के प्रति एक किस्म की उदासीनता और हीनता का भाव हमारे सोच-विचार की जड़ों को बहुत नुकसान पहुंचा रहा है।

बीते तीन-चार दशकों में हिंदी समाचार पत्रों के पन्नों पर शीर्षक से लेकर संपादकीय टिप्पणी और लेखों की गुणवत्ता में भी गिरावट आई है। इस गिरावट का परिणाम यह है कि हमारी नई पीढ़ियां अखबार-संस्कृति से कटती जा रही हैं। इसका दूरगामी नुकसान किसको होने जा रहा है? जाहिर है पत्रकारिता को ही इसका खामियाजा उठाना पड़ेगा। यानी हम उसी पेड़ को काट रहे हैं, जिस डाल पर बैठे हुए हैं।

अखबार संस्कृति में परंपरा यह है कि पढ़ने वाला सबसे पहले संपादकीय पन्ना खोले और उसे पूरा पढ़ जाए। यह उसकी मानसिक भूख़ शांत करता है। इसके बाद ही प्रथम या कोई अन्य पृष्ठ पर जाकर सूचना संसार में झांके। आज हम देखते हैं कि यह पेज चूं चूं का मुरब्बा बन गया है। उस पर कार्टून भी मिल जाता है तो कहीं आध्यात्मिक जीवन दर्शन समझाने वाले ज्ञानी पुरुष ज्ञान बघारते हैं।

किसी अखबार में संपादकीय पन्ना किसी छुटभैए राजनेता के फोटो के साथ पहला आलेख प्रकाशित कर जगह बरबाद करता है। किसी संपादकीय पन्ने पर तस्वीरों की नुमाइश होती है तो किसी एक पृष्ठ पर पांच से छह आलेखों की बेकाबू भीड़ नजर आती है।

एक पाठक के विचारों को इसी पन्ने पर जगह मिलती थी-संपादक के नाम पत्र स्तंभ में। इससे आम अवाम की सोच की दिशा भी पता चलती थी। यह एक अखबार की अपनी खुराक भी थी। अब तो यह स्तंभ शायद ही कहीं दिखाई देता है। तकलीफ तब बढ़ जाती है, जब इस बेहद जिम्मेदार पेज पर कहानी, कविता या धार्मिक ग्रंथों के किस्से पढ़ने को मिलते हैं। इस सामग्री के लिए साप्ताहिक परिशिष्ट होते हैं। उनको वहीं देना जरूरी है। लब्बोलुआब यह कि एक समाचारपत्र के इस गरिमावान अंग की चरित्र हत्या बेशर्मी के साथ हो रही है। किसी को इसका अफसोस तक नहीं है।

इसके उलट भारतीय भाषाओं के चंद रिसाले और अंग्रेजी के समाचारपत्र संपादकीय पृष्ठ की गुणवत्ता पर अभी भी गंभीर ध्यान दे रहे हैं। ऐसा क्यों है? वेतन से लेकर क्वालिटी तक हिंदी के साथ यह अत्याचार हम हिंदी वाले ही कर रहे हैं।

सुनाएं गम की किसे कहानी, हमें तो अपने सता रहे हैं/

न कोई रशियन, न कोई जर्मन,न कोई इंग्लिश, न कोई टर्की/

मिटाने वाले हैं अपने हिंदी, जो आज हमको मिटा रहे हैं/

जिस तरह एक अखबार को उसके मत्थे से पहचानते हैं, उसी तरह संपादकीय पन्ने से उसकी मानसिक सेहत का पता चलता है। क्या हम इस स्थान की गरिमा और प्रतिष्ठा वापस लाएंगे मिस्टर मीडिया?

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: हम कितने गैर जिम्मेदार और देहाती हैं 

मिस्टर मीडिया: पत्रकारों के खिलाफ आखिर यह किस तरह की मानसिकता है?

मिस्टर मीडिया: प्रेस काउंसिल को क्या हो गया है? क्या दायरे से बाहर गए मुखिया?

मिस्टर मीडिया: मत भूलिए कि अदालती कार्रवाई के लिए पर्याप्त है इस तरह की कवरेज

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पूरी दुनिया यूं ही नहीं करती हिंदी को सलाम, ये है बड़ी वजह: अनुराग दीक्षित

बदलते वक्त में हिंदी भाषा बाजार की जरूरत बन चुकी है। देश का करीब 60 फीसदी बाजार हिंदी बोलने वालों का है।

Last Modified:
Saturday, 14 September, 2019
Anurag Dixit

अनुराग दीक्षित, वरिष्ठ पत्रकार।।

आज हिंदी दिवस है। हमारे देश की राजभाषा हिंदी के बढ़ते दायरे को समझने का ये एक मौका भर है। ये दिन सभी भाषाओं को खुद में शामिल करने वाली और सभी को जोड़ने वाली भाषा हिंदी की सांस्कृतिक और पारंपरिक विरासत को सहेजकर रखने की चुनौती का एहसास भी कराता है। ये एक ऐसा मौका है, जबकि हिंदी के बढ़ते दायरे और उसके समक्ष पैदा होती रही चुनौतियों पर मंथन होता है। राजभाषा जैसे मुद्दों को लेकर सरकारी नीतियों पर सवाल खड़े होते हैं, लेकिन इन तमाम सवालों के बीच हिंदी का दायरा साल दर साल बढ़ता जा रहा है।

संविधान बनाते वक्त सबसे पहले उठा था भाषा का मुद्दा

भारत का संविधान बनाने का जिम्मा संभालने के लिए बनी संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई थी। लेकिन इसके अगले ही दिन यानी 10 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की हुई दूसरी बैठक में डॉ. सच्च्दिानंद सिन्हा और आर.वी धूलेकर ने भाषा का मुद्दा उठा दिया। इसके बाद मार्च 1947 में मौलिक अधिकारों को लेकर बनी एक उप—कमेटी में हिंदी पर बात आगे बढ़ी।

संविधान सभा में भाषा को लेकर हुए मंथन में 'हिन्दुस्तानी' भाषा पर चर्चा हुई लेकिन कांग्रेस की एक बैठक में हिन्दुस्तानी के मुकाबले हिंदी को राजभाषा बनाने का प्रस्ताव 32 के मुकाबले 63 वोटों से जीत गया। दूसरी ओर, महात्मा गांधी भी हिंदी पर ही जोर दे रहे थे। इन सबके बीच 1948 के मार्च और नवंबर में एक बार फिर भाषा का मुद्दा जोर-शोर से उठा। हिंदी के दायरे के बढ़ाने की मांग पर एक संन्यासिनी के अनशन पर बैठने के चलते पं.नेहरू को के.एम. मुंशी की अगुवाई में एक कमेटी बनानी पड़ी। 12 सितंबर को कमेटी की रिपोर्ट संसद में पेश हुई। हिंदी को सरकारी कामकाज की भाषा चुना गया। इसी दौरान हिंदी भाषा पर सेठ गोविंद दास, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और मौलाना अबुल कलाम के भाषण यादगार रहे।

देश में 77 फीसदी लोग समझते हैं हिंदी

आज भारत में भी करीब 77 फीसदी लोग हिंदी बोलते और समझते हैं। दुनियाभर की बात करें तो करीब 50 करोड़ लोग हिंदी बोलते और समझते हैं। दुनिया के 150 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली ये भाषा अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, मॉरीशस जैसे कई देशों के साथ-साथ नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश में काफी लोकप्रिय है। साफ है कि हिंदी दुनियाभर की चहेती भाषा है।

बाजार की जरूरत है हिंदी

हिंदी शब्द संस्कृत के सिंधु शब्द का अपभ्रंश माना जाता है। हिंदी का इतिहास वैसे तो करीब 1 हजार साल पुराना बताया जाता है, लेकिन बदलते वक्त में हिंदी भाषा बाजार की जरूरत बन चुकी है। देश का करीब 60 फीसदी बाजार हिंदी बोलने वालों का है। हर कंपनी के विज्ञापन का आधार सिर्फ और सिर्फ हिंदी है। तभी विदेशी कंपनियों के मोबाइल फोन हिंदी में टाइपिंग की सुविधा दे रहे हैं। आज हर 5 में से 1 व्यक्ति इंटरनेट का इस्तेमाल हिंदी में ही करता है और इंटरनेट पर हिंदी सामग्री की खपत में सालाना 90 फीसदी की रफ्तार से तेजी देखने को मिल रही है।

पूरी दुनिया करती है हिंदी को सलाम

10 जनवरी दुनियाभर में विश्व हिंदी दिवस के तौर पर याद किया जाता है। इसी दिन साल 1975 में नागपुर में पहले विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया गया था। करीब 4 दशक पहले हुए इस आयोजन में दुनियाभर के 30 मुल्कों के करीब सवा सौ प्रतिनिधियों ने शिरकत की थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी कार्यक्रम में शामिल होकर दुनियाभर में हिंदी के बढ़ते प्रभाव को सलाम किया था। तब से लेकर अब तक कई देशों में इसका आयोजन हो चुका है। मकसद है हिंदी भाषियों को आपस में जोड़ना।

(साभार: न्यूज स्टेट)

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वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने यूं समझाया भाषाओं का ‘गणित’

भाषा के बिना किसी समाज/समूह की संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती। संस्कृति की सबसे बड़ी, सबसे प्रभावी और शक्तिशाली वाहिका भाषा ही होती है।

Last Modified:
Saturday, 14 September, 2019
Rahul Dev

राहुल देव, वरिष्ठ पत्रकार।।

सारी भारतीय भाषाएं अपने जीवन के सबसे गंभीर संकट के मुहाने पर खड़ी हैं। यह संकट अस्तित्व का है, महत्व का है, भविष्य का है। कुछ दर्जन या सौ लोगों द्वारा बोली जाने वाली छोटी आदिवासी भाषाओं से लेकर 45-50 करोड़ भारतीयों की विराट भाषा हिंदी तक इस संकट के सामने अलग-अलग अंशों में लेकिन लगभग अटल और अपरिहार्य दिखते लोप के सामने निरुपाय खड़ी दिखती हैं।

भाषाओं का यह संकट अपने दीर्घावधि निहितार्थों और बहुआयामी प्रभावों में भारतीय सभ्यता का संकट बन जाता है। कारण सीधा है। भाषा और संस्कृति,राष्ट्र, राष्ट्बोध और राष्ट्रीयता का गर्भनाल जैसा संबंध है। भाषा इनकी गर्भनाल है। भाषा के बिना किसी समाज/समूह की संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती। संस्कृति की सबसे बड़ी, सबसे प्रभावी और शक्तिशाली वाहिका भाषा ही होती है। भाषा में ही संस्कृति के सबसे महत्वपूर्ण उपादान, उसकी चिन्तन-आध्यात्मिक-ज्ञान-साहित्य-शास्त्रीय-लोक संपदा निर्मित, संचारित और प्रवाहित होती है। संस्कृति के अन्य रूप- साहित्य, ललित कलाएं, गीत संगीत, स्थापत्य, वेशभूषा, खानपान, पर्व त्यौहार, सामाजिक रीतियां, परंपराएं, लोकाचार आदि मुख्यतः भाषा के कारण और माध्यम से ही प्रकट होते हैं।

100 साल पहले 1918 में चेन्नई में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति स्थापित करने वाले महात्मा गांधी और उसके 40 साल बाद भारत के संविधान निर्माताओं ने भाषा संबंधी प्रावधान बनाते समय इसकी दूर-दूर तक कल्पना नहीं की थी कि जिन महान उद्देश्यों, राष्ट्रनिर्माण के जिन सपनों को सामने रखकर उन्होंने यह पुरुषार्थ किए थे, भारतीय राष्ट्र और उसके भविष्य का जो चित्र उन्होंने अपने सामने रखा था उसका साकार रूप 70 साल में ही इतना अलग, इतना विकृत हो जाएगा।  लेकिन हमारी आंखों के सामने आज जो दृश्य है और निकट भविष्य में आकार लेता दिखाई दे रहा है, वह इतना विकराल है, गहरे संस्कृतिमूलक आयामों में राष्ट्र निर्माताओं की कल्पना के इतना विपरीत है कि विश्वास नहीं होता।

ब्रिटिश साम्राज्यवाद की दासता से मुक्त अपनी मौलिक अंतःप्रेरणा और साभ्यतिक आभा के आलोक में भारत एक बार फिर चमचमाकर खड़ा होगा, अपना नवनिर्माण करेगा वह सपना आज अंग्रेजी के ऐसे भाषायी साम्राज्यवाद की जकड़ में है जो दिनोंदिन मजबूत होती जा रही है। 150 वर्षों के प्रयासों के बाद भी 15% भारतीयों की कार्यभाषा बन सकी, अपने भक्तों के सम्मोहन से प्राण वायु पाती अंग्रेजी इस देश की 85% प्रतिभा, उद्यमिता के उच्चतम विकास के आगे पत्थर की दीवार की तरह खड़ी है। अंग्रेजी़ न जानने के कारण उच्च शिक्षा, ऊंचे अवसरों, रोज़गारों से वंचित करोड़ों युवा प्रतिभाएं आज रोज कुंठित, अपमानित होने, अपने आत्मसम्मान, आत्मविश्वास को तिल तिल कर मरते देखने, पिछड़ जाने के लिए अभिशप्त हैं। अंग्रेज़ी से वंचित होना दोयम दर्जे का भारतीय होना है। केवल किसी भारतीय भाषा में जीने-काम करने वाला व्यक्ति अंग्रेज़ी वालों के सामने दीन हो जाता है। इस आत्मदैन्य को अपनी बातचीत में अधिक से अधिक अंग्रेज़ी शब्दों, अभिव्यक्तियों को ढूंसता हिन्दुस्तानी ही आज प्रतिनिधि हिन्दुस्तानी है।

वर्तमान से अब ज़रा भविष्य में चलते हैं। सन 2050 की कल्पना कीजिए। तब तक हमारा भारत विश्व की एक बड़ी आर्थिक महाशक्ति बन चुका होगा। भारतीय प्रतिभा, उद्यमशीलता और हमारी बुनियादी लोकतांत्रिकता विश्वमंच पर भारत का अटल उदय सुनिश्चित कर चुके हैं। चरम गरीबी, कुपोषण, भुखमरी, शैक्षिक-आर्थिक पिछड़ापन बड़ी हद तक मिट चुके होंगे। आम भारतीयों का जीवन स्तर, सुविधाएं काफी ऊपर आ चुके होंगे। देश के 50-60% भाग का शहरीकरण हो चुका होगा। आधुनिक सुख सुविधाएं, तकनीकी यंत्र, साधन गांव-गांव तक पहुंच चुके होंगे। सारा देश डिजिटल जीवन पद्धति को बहुत बड़ी हद तक अपना चुका होगा। ब्रॉडबैंड और उसके माध्यम से मिलने वाली अनंत सेवाएं आम हो चुकी होंगे।

अब कल्पना के घोड़े दौड़ाइए और सोचिए-उस भारत के अधिकतर नागरिक अपने जीवन के सारे प्रमुख काम किस भाषा में कर रहे होंगे? पूरे देश में शिक्षा, प्रशासन, व्यापार, शोध, पत्रकारिता, स्वास्थ्य, न्याय जैसे हर बड़े क्षेत्र में किस भाषा का प्रमुखता से उपयोग हो रहा होगा? वह देश भारत होगा, भिंडिया या सिर्फ़ इंडिया?  उस इंडिया में संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हमारी बड़ी 22 और 16 सौ से अधिक छोटी भाषाओं-बोलियों की स्थिति क्या होगी? कहां होंगी वे? होंगी भी कि नहीं?

मेरा अपना आकलन है कि रहेंगी तो जरूर लेकिन गरीबों की गरीब भाषाएं बनकर। हाशियों की भाषा बन कर। गालियों की भाषा बन कर। गीत-संगीत, मनोरंजन, फिल्में, ये भाषाओं में बचे रहेंगे, हालांकि इनमें भी तब तक आधी से ज्यादा अंग्रेजी प्रवेश कर चुकी होगी। आज बनने वाली हिंदी फिल्मों में आधी से ज्यादा के शीर्षक अब अंग्रेजी के होते हैं। उनके संवादों में हिंदी नहीं हिंग्लिश ज्यादा होती है। पूरी तरह अंग्रेजी में बनने वाली फिल्में और नेटफ्लिक्स जैसे आधुनिक मंचों पर भारतीय अंग्रेजी धारावाहिक आम हो चले हैं। यह प्रक्रिया बढ़ती ही जाएगी।

भाषाई अखबारों, फिल्मों और धारावाहिकों का विस्तार हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों का आंखों देखा विवरण भी अब हिंदी व भाषाओं में होने लगा है। इस विस्तार पर मुग्ध भाषायी मीडिया और साहित्यकार अपनी भाषाओं पर किसी तरह के संकट की बात को अरण्य रोदन कह देते हैं। यह दूरदृष्टिहीनता है। भविष्य देखना है तो बच्चों की ओर देखना चाहिए। बच्चों की जो पीढ़ियां अधिकाधिक अंग्रेजी माध्यम से पढ़कर बड़ी होंगी वे क्या भाषाई अखबारों, साहित्य, पुस्तकों, टीवी समाचारों की पाठक- दर्शक होंगी? हिंदी के कितने लेखकों, पत्रकारों, राजभाषा अधिकारियों के बच्चे हिंदी माध्यम में पढ़ते हैं? इसलिए आज यह जो विस्तार दिख रहा है अगले 20-25 साल का खेल है। उसके बाद ऊपर से नीचे तक अंग्रेजी का ही वर्चस्व हर क्षेत्र में दिखेगा।

संसार में लगभग 6000 भाषाओं के होने का अनुमान है। भाषा शास्त्रियों की भविष्यवाणी है कि 21वीं सदी के अंत तक इनमें केवल 200 भाषाएं जीवित बचेंगी। इनमें भारत की सैकड़ों भाषाएं होंगी। भारत की आदिवासी भाषाओं में 196 तो अभी यूनेस्को के अनुसार ही गंभीर संकटग्रस्त भाषाएं हैं। संकटग्रस्त भाषाओं की इस वैश्विक सूची में भारत सबसे ऊपर है। यूनेस्को का भाषा एटलस 6000 में से 2500 भाषाओं को संकटग्रस्त बताता है। यूनेस्को के पूर्व महानिदेशक कोचिरो मत्सूरा ने कहा था, ‘एक भाषा की मृत्यु उसे बोलने वाले समुदाय की अमूर्त विरासत, परंपराओं और वाचिक अभिव्यक्तियों का नष्ट हो जाना है।‘

भारत की अनुमानित 1957 में कम से कम 1416 लिपिहीन मातृभाषाएं हैं। ये सब आसन्न संकट में हैं। पर भारत के प्रभु और बुद्धिजीवी वर्ग तथा सामान्य जन को इन छोटी भाषाओं की तो क्या अपनी बड़ी भाषाओं की भी चिन्ता और उनके संकट को देखने समझने, बचाने में कोई रुचि नहीं है। ये वे विशाल,10 लाख से ज्यादा जनसंख्या वाली भाषाएं हैं, जिन्हें भारत के 90% लोग बोलते-बरतते हैं।

किसी भी समाज में भाषा के नियामक-निर्णायक तत्व क्या हैं? भाषा और समावेशी, समतामूलक, लोकतांत्रिक विकास का क्या संबंध है? भाषा और शिक्षा का क्या संबंध है? भाषा का राष्ट्र, राष्ट्र भाव और राष्ट्र निर्माण से क्या संबंध है? राष्ट्र बोध के केंद्रीय महत्व के इन बिंदुओं पर स्वतंत्रता के बाद भारत में सिर्फ एक बार 1967 में उच्चतम स्तर पर समग्रता से विचार मंथन हुआ था राष्ट्रीय उच्चतर अध्ययन संस्थान, शिमला में। उसके बाद उस तरह का कोई विचार कुंभ भाषाओं की बदलती स्थितियों, चुनौतियों और भविष्य पर हुआ हो, ऐसा मेरी जानकारी में नहीं है।

इसलिए कोई आश्चर्य नहीं है कि विरल भाषिक समृद्धि और विविधताओं के भारत के पास 70 साल में भी अपनी कोई भाषा नीति नहीं है,  न ही उसको बनाने का कोई गंभीर प्रयास किया गया है। अब भी अगर वह नहीं बनाई गई तो अपनी इस अमूल्य और आधारभूत सांस्कृतिक संप्रभुता से दो-तीन पीढ़ियों में ही वंचित होकर हम पश्चिम, मुख्यतः अमेरिका के सांस्कृतिक, बौद्धिक, सामाजिक, आर्थिक उपनिवेश बन जाएंगे।

भाषा मनुष्य की श्रेष्ठतम संपदा है। सारी मानवीय सभ्यताएं भाषा के माध्यम से ही विकसित हुई हैं। आदिम समाज तो हो सकते हैं लेकिन आदिम भाषाएं नहीं होतीं। संचार के वाचिक और लिखित माध्यम रूप में यह एक समाज के भावनात्मक जीवन और संस्कृति का सर्वोत्तम उद्घोष है। एक सांस्कृतिक संस्थान होने के कारण यह अपने बोलने-बरतने वालों को एक जन्मसिद्ध अधिकार के रूप में पहचान और अद्वितीयता देती है। जातीयता का एक प्रबल कारक होती है। समाज के सभी क्षेत्रों में-प्रबंधन, प्रशासन, वैज्ञानिक सूचनाओं, शिक्षा और शोध का माध्यम हो या ज्ञान निर्माण का, भाषा विकास का सबसे शक्तिशाली उपकरण है।

भाषा के विकास को हम उन भूमिकाओं से परिभाषित कर सकते हैं जिन्हें वह अपने समुदाय में निभाती है और जिन क्षेत्रों में वह प्रमुखता से इस्तेमाल की जाती है। किसी समुदाय में कोई भाषा कितनी प्रतिष्ठा पाती है, यह सीधा इस बात पर निर्भर करता है कि वह भाषा अपने समुदाय की कितनी तरह की अभिव्यक्ति-आवश्यकताओं को पूरा करती है-जैसे व्यापार, अर्थतंत्र, तकनीकी, नवाचार, शोध, मौलिक वैज्ञानिक चिंतन,  उद्यमिता, प्रबंधकीय निर्णय आदि। एक बहुभाषी और बहुजातीय समाज में उसकी आधिकारिक भाषा/भाषाएं सभी सभी वर्गों को तभी स्वीकार्य होती हैं जब वे शिक्षा, आजीविका, व्यवसाय, शोध, तकनीक, नवाचार, विकास और प्रशासनात्मक, प्रबंधकीय निर्णय प्रक्रियाओं की प्रमुख भाषा होती है।

भाषाओं के संकट से भी बड़ा संकट है उसको न देख पाना। कमोबेश यह समस्या सारे भाषा समूहों के साथ है। लेकिन हिंदी वालों के साथ तो रोग की हद तक है। बड़े-बड़े हिंदी के विद्वान और पत्रकार प्रतिप्रश्न करते हैं कि जब हिंदी अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ रही है, हिंदी में सबसे ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं, हिंदी फिल्म और टीवी उद्योग बढ़ रहा है तब हिंदी के सामने संकट कैसे हो सकता है?

संक्षिप्त उत्तर यह है। अब हम वाचिक युग में नहीं लिखित और डिजिटल युग में हैं। इसलिए भाषा का बोली रूप उसे बनाए रखने और बढ़ाने के लिए अपर्याप्त है। यह देखने की बजाय कि हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं को समझने-बोलने वालों की संख्या कितनी बढ़ रही है जो हमें देखना चाहिए वह यह है कि उस भाषा को अपनी इच्छा से पढ़ने-लिखने और सभी गंभीर कार्य क्षेत्रों में व्यवहार करने वाले लोग बढ़ रहे हैं या घट रहे हैं? उस भाषा माध्यम के विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या घट रही है या बढ़ रही है? ज्ञान ग्रहण, ज्ञान निर्माण, भविष्य निर्माण, न्याय,विज्ञान, प्रशासन, व्यापार, प्रबंधन, शोध आदि जीवन के निर्णायक क्षेत्रों में उस भाषा का प्रयोग घट रहा है या बढ़ रहा है?

सबसे बड़ा प्रश्न, जिसे पूछते ही आपके सामने अपनी भाषा का भविष्य साकार खड़ा हो जाएगा यह है-आपकी भाषा की मांग कितनी है? है कि नहीं? घट रही है या बढ़ रही है? इस कसौटी पर हिंदी सहित सारी भारतीय भाषाओं को कसें तो उत्तर बिल्कुल साफ है। आज देश के छोटे से छोटे गांव में गरीब से गरीब व्यक्ति अपने बच्चों के लिए सिर्फ एक भाषा मांग रहा है-अंग्रेजी। किसी भी भारतीय भाषा की मांग नहीं है भारत में। इस बाजार युग में जिस चीज की मांग नहीं है वह कैसे चलेगी, कैसे बचेगी?

अभी देश के 30 से 40% बच्चे अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में पढ़ रहे हैं। भले ही कितनी अधकचरी अंग्रेजी वहां पढ़ाई जाती हो, खुद शिक्षकों को ठीक से आती हो या नहीं, यह निर्विवाद रूप से सबका अनुभव है कि जो बच्चा बचपन से एक बार अंग्रेजी माध्यम में पढ़़ गया, वह कभी अपने परिवार और परिवेश की, विरासत की भाषा का नहीं होता। उसमें अपनी मातृभाषा/परिवेश भाषा से प्रेम,  लगाव, गर्व की जगह एक हेयभाव और नापसंदगी पैदा होती जाती है जो आयु के साथ बढ़ती ही रहती है। अपनी भाषा से यह दूरी उसे भाषा से परिचित तो बनाए रखती है, लेकिन उसमें कुछ भी गंभीर पढ़ने वाला और काम करने वाला नहीं रहने देती। भारत के हर मध्यवर्गीय परिवार की यही स्थिति है।

10 साल पहले के एक सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार भारत की सभी भाषा-माध्यम विद्यालयों में प्रवेश दर हर साल घट रही थी। सिर्फ दो भाषाएं अपवाद थीं-अंग्रेजी और हिंदी। अंग्रेजी में यह वार्षिक वृद्धि दर 250% से अधिक थी। हिंदी में लगभग 35%। अब जब हिंदीभाषी राज्यों में भी सरकारें हिंदी-माध्यम विद्यालय बंद या बदल कर उन्हें अंग्रेजी-माध्यम करती जा रही है तो हिंदी का भविष्य स्पष्ट है। ठीक यही चीज़ हर प्रदेश में हो रही है।

यूनेस्को के कहने पर विश्व के श्रेष्ठ भाषाविदों ने किसी भी भाषा की जीवंतता और संकटग्रस्तता नापने के लिए 9 कसौटियां निर्धारित की हैं। पहली है, एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी के बीच उस भाषा का अंतरण, जाना कितना हो रहा है? दूसरी कसौटियों में प्रमुख हैं ज्ञान विज्ञान के आधुनिक क्षेत्रों में उस भाषा में काम हो रहा है या नहीं,  घट रहा है या बढ़ रहा है? वह भाषा नई तकनीक और आधुनिक माध्यमों को कितना अपना रही है? उस भाषा के विविध रूपों का दस्तावेजीकरण कितना और किस स्तर का है? उस समाज की महत्वपूर्ण राजकीय/अराजकीय संस्थाओं की उस भाषा के बारे में नीतियां और रुख़ कैसे हैं? अंतिम लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण कसौटी है उस भाषा समुदाय का अपनी भाषा के प्रति रुख़ क्या है, भाव क्या है?

इनमें से किसी भी कसौटी पर किसी भी भारतीय भाषा को तोल लीजिए तुरंत समझ में आ जाएगा कि भविष्य के संकेत संकट की ओर इशारा करते हैं या विकास-विस्तार की ओर।

एक बार फिर 2050 पर चलते हैं। उस वैश्विक महाशक्ति, आधुनिक, वैश्वीकृत, संपन्न-सबल इंडिया में जब हर नागरिक अपने जीवन का हर महत्वपूर्ण काम सिर्फ अंग्रेजी में कर रहा होगा, उसमें भारत, भारतीयता और भारतीय सभ्यता ने 5000-6000 वर्ष की अपनी अविच्छिन्न यात्रा में जो समूची साहित्यिक-सांस्कृतिक-ज्ञान-लौकिक-आध्यात्मिक संपदा अर्जित की है वह इस संपदा की निर्मात्री भाषाओं के बिना कैसे जीवंत और जीवित रहेगी, अगली पीढ़ियों तक कैसे पहुंचेगी? क्या अंग्रेज़ी यह कर सकती है?

रंगरूप में भारतीय लेकिन दिलो-दिमाग, जीवन शैली, सोच-संस्कार से अमेरिका के उन नकलची नागरिकों का भारत-बोध, अपनी साभ्यतिक ऊंचाईयों-विरासत की स्मृति, सांस्कृतिक संप्रभुता का अहसास कैसा होगा?

कम से कम मुझे स्पष्ट दिखता है कि समूची भारतीय सभ्यता लोप, विस्मृति और भयानक हाशियाकरण की कगार पर खड़ी है। उसके पास शायद सिर्फ दो पीढ़ियों का समय है बचने के लिए। यानि हमारी और हमारे बच्चों की पीढ़ी आज अगर चाहे, राजसत्ता को बुद्धि आ जाए, समूचा राष्ट्र संकल्पबद्ध हो, राष्ट्रीय और निजी महत्व के हर क्षेत्र में भारतीय भाषाओं को स्थापित करने में जुटे तो इस प्रक्रिया को हम रोककर उलट सकते हैं। वरना शैशव से ही अंग्रेजी/अंग्रेज़ियत में पली, पढ़ी और बढ़ी पीढ़ियां चाहेंगी भी तो इस संपदा और सभ्यता को पुनर्जीवित करना उनके लिए असंभव नहीं तो असंभव जैसा जरूर होगा।

यहां महत्वपूर्ण हो जाती है प्रत्येक भाषा में काम करने,, लिखने वाले साहित्यकारों-लेखकों-विद्वानों- बुद्धिजीवियों-शिक्षाविदों, मीडिया, पत्रकारों और संपूर्ण नागर समाज की भूमिका। यही वे वर्ग हैं जो अपने अपने क्षेत्रों में, अपने भाषा समाज में एक विमर्श उत्पन्न करते हैं, चिंतन को आगे बढ़ाते हैं, महत्वपूर्ण चिंताओं,संकटों और सरोकारों के प्रति समाज को जागरूक करते हैं।

कमाल यह है कि ऐसे अभूतपूर्व प्राणांतक संकट से देश का लगभग समूचा नियंता प्रभु वर्ग, नीति निर्माता, बुद्धिजीवी, शिक्षाविद, राजनीतिक दल, संसद, विधानसभाएं, सरकारें, मीडिया और व्यापक नागर समाज अनभिज्ञ और इसलिए उदासीन दिखते हैं। इस विराट सभ्यतामूलक संकट का मुख्य कारण, उस का सबसे बड़ा स्रोत सीधा और स्पष्ट है-अंग्रेज़ी और उसके प्रति हमारा शर्मनाक दासतापूर्ण और शर्मनाक  सम्मोहन।

भारतीय चरित्र इजराइली चरित्र जैसा नहीं है जिसने 2000 साल से मृत पड़ी हिब्रू को आज वैज्ञानिक शोध, नवाचार और आधुनिक ज्ञान निर्माण की श्रेष्ठतम वैश्विक भाषाओं में एक बना दिया है। जिसके बल पर 40 लाख की जनसंख्या वाला इजरायल एक दर्जन से ज्यादा विज्ञान के नोबेल पुरस्कार जीत चुका है। सारे इस्लामी देशों की शत्रुता के बावजूद अपनी पूरी अस्मिता, धमक और शक्ति के साथ अजेय बना विश्व पटल पर विराजमान है। विश्व गुरु बनने के सपने देखता भारत चाहे तो इजराइल से प्रेरणा ले सकता है।

(नवनीत पत्रिका से साभार)

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विकसित देशों के पत्रकारों की अपेक्षा भारत के पत्रकारों में ये 'गुण' ज्यादा है

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक गुप्ता का कहना है कि भारत का संविधान नागरिकों को सरकार की आलोचना करने का अधिकार देता है

Last Modified:
Saturday, 14 September, 2019
Ajay

अजय शुक्ल, प्रधान संपादक, आईटीवी नेटवर्क।।

खबरनवीसों पर हमले से नहीं बदलेगा यथार्थ

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक गुप्ता ने पिछले सप्ताह ‘राजद्रोह और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ विषय पर अपने व्याख्यान में कहा कि भारत का संविधान नागरिकों को सरकार की आलोचना करने का अधिकार देता है। उनका कहना था, ‘कार्यपालिका, न्यायपालिका, नौकरशाही और सशस्त्र बलों के कार्यों की आलोचना करना राजद्रोह नहीं हो सकता है। अगर हम इन संस्थानों की आलोचना करना बंद कर देंगे तो हम लोकतंत्र के बजाय पुलिस राज्य बन जाएंगे।’

बीते कुछ महीनों में हमें देखने को मिल रहा है कि खबरनवीसों पर हमले बढ़े हैं। कहीं उन्हें धमकाया जा रहा है तो कहीं उनकी हत्याएं की जा रही हैं। यही नहीं, उनके खिलाफ सत्ता प्रतिष्ठान गंभीर धाराओं में आपराधिक मुकदमे दर्ज करा रहे हैं। वजह सिर्फ यह है कि उन्होंने वह सच दिखाया, जिसे भ्रष्ट व्यवस्था छिपाना चाहती थी। खबरनवीसों और सच की आवाज बनने वालों को कुचलने की कोशिश करने वाले अफसरों के खिलाफ सरकार ने कोई कार्रवाई न करके, यह भी जता दिया कि वह इन भ्रष्ट अफसरों के साथ खड़ी है।

यह ईमानदारी से निष्पक्ष और सच दिखाने की कोशिश करने वालों का मनोबल तोड़ने की ऐसी साजिश है, जिसमें सियासतदां, नौकरशाह और भ्रष्ट धंधेबाज शामिल हैं। लोकतांत्रिक देश होने का दम भरने वाले जिम्मेदार लोगों के मुंह से निंदा का एक भी शब्द न निकलना इसे पुलिस राज्य (तानाशाही) की ओर ले जाने के लिए काफी है।

‘नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो’ (NCRB) के आंकड़ों से पता चलता है पिछले कुछ सालों में खबरनवीसों पर हमले के 190 मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें डेढ़ दर्जन पत्रकारों की हत्या भी हुई। इसके साथ ही जो मामले दर्ज नहीं हुए, उनकी संख्या 10 गुणा अधिक है। यूपी में पुलिस ने पत्रकारों पर हमले के 67 मामले पिछले साल तक दर्ज किए हैं। केवल 2017 में 13 ऐसे मामले सामने आये, जिनमें पत्रकारों पर हमला करने वाले पुलिसवाले ही थे।

हाल के दिनों में यूपी में मिड-डे मील से लेकर तमाम कल्याणकारी योजनाओं में हो रहे घपले को दिखाने पर खबरनवीसों पर गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज की गईं। हरियाणा के उकलाना में खाद्य आपूर्ति विभाग के घपले को दिखाने वाले पत्रकार पर आपराधिक मामला दर्ज कर लिया गया। जम्मू-कश्मीर में खबरनवीसों के साथ सत्ता ऐसे पेश आ रही है, जैसे पत्रकार देशद्रोही हों। उन्हें भी नजरबंदी जैसे हालातों से रूबरू होना पड़ रहा है। इसको लेकर वहां के एक अखबार के संपादक ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की।

यह सभी वे मामले हैं, जो हमें नजर आ रहे हैं मगर इनसे कई गुणा अधिक घटनाएं रोज हो रही हैं। सत्ता मूकदर्शक बनी है। सरकार का चारण करने वाले पत्रकार संगठन मौन साधे हुए हैं। इनको अपने अनुदान और दूसरे धंधे बंद हो जाने का खौफ नजर आता है।

हमारे लिए एक और शर्मनाक बात यह है कि ग्लोबल प्रेस फ्रीडम इंडेक्स की रिपोर्ट के मुताबिक भारत निष्पक्ष खबरों के मामले में नीचे चला गया है। यहां खबरनवीसों पर हमले बढ़े हैं। कई बार भीड़ ने पत्रकारों पर हमले किये। हमें लगता है कि भारत देश के पत्रकार अन्य तमाम विकसित देशों के पत्रकारों की अपेक्षा बड़े राष्ट्रभक्त और राष्ट्रवादी हैं। अपने देश और देशवासियों के सामने सच लाने को वे अपनी जिम्मेदारी समझते हैं।

सत्ता-प्रशासन के भ्रष्ट आचरण को सामने लाना और उन पर सवाल उठाना किसी भी देश प्रेमी पत्रकार का कर्तव्य है। अगर वे ऐसा नहीं करते तो यह देश के साथ धोखा करने जैसा है, क्योंकि देश को खोखला करने वालों को सजा दिलाने तक सच की आवाज बनना उनका ही काम है। सत्ता प्रतिष्ठान की यह महती जिम्मेदारी है कि वह पत्रकारों-आलोचकों और खबरनवीसों को संरक्षण प्रदान करे।

हमारे यहां कबीरदास ने इसको लेकर बड़ा स्पष्ट मत दिया है-‘निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।‘ हमारे देश और उसके लोकतंत्र की यही खूबी है कि हमें बेहतरीन विचारों के लिए किसी दूसरे देश के विचारकों पर आश्रित होने की आवश्यकता नहीं है। हमारे वेद राज सत्ता और उसके कर्तव्यों से लेकर उसकी आलोचना करने तक को बेहतरीन तरीके से समझाते हैं।

विश्वसनीयता और निडरता के साथ सच्चाई को सामने रखना ही खबरनवीसों की जिम्मेदारी है। इस कर्तव्य को उन्हें बेखौफ निभाना चाहिए। उन्हें तुलसीदास की रामचरित मानस में लिखी यह चौपाई ध्यान में रखनी चाहिए-‘सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेहुं मुनिनाथ। हानि, लाभ, जीवन, मरण,यश, अपयश विधि हांथ।’ इसके साथ ही अथर्ववेद का श्लोक है- ‘यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा मे प्राण मा विभेः।।’ इसका अर्थ है कि जिस प्रकार आकाश एवं पृथ्वी न भयग्रस्त होते हैं और न इनका नाश होता है, उसी प्रकार हे मेरे प्राण! तुम भी भयमुक्त रहो।

हमारे वेद जीवन संघर्ष को आनंद के रूप में परिभाषित करते हैं। ‘जिंदगी है तो संघर्ष हैं, तनाव है, काम का दबाब है, खुशी है, डर है, लेकिन अच्छी बात यह है कि यह सभी स्थायी नहीं हैं। समय रूपी नदी के प्रवाह में सब प्रवाहमान हैं। कोई भी परिस्थिति चाहे खुशी की हो या गम की, कभी स्थाई नहीं होती, समय के अविरल प्रवाह में विलीन हो जाती है।’ जो लोग धन-संपदा या किसी अन्य लालच में सच को छिपाते हैं, वो भले ही कुछ वक्त खुद को सुखी महसूस करें, मगर अंततः उनकी दुर्गति तय है।

हमें यह भी देखना होगा कि विश्व में जहां क्रांतियां हुईं, वहां देशकाल और स्थितियों के अनुसार ही इनका सूत्रपात हुआ। दिन-प्रतिदिन बढ़ते साधनों से हिंसक और अहिंसक दोनों ही रूपों की क्रांतियां सामने आईं, उनके कारण विचारकों की सोच सर्वोच्च थी। 17वीं शताब्दी के अंत में विश्व का क्रांति से परिचय हुआ, जो 21वीं शताब्दी के आधुनिक युग में भी अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है।

तानाशाही, साम्राज्यवादी, निरंकुश और अयोग्य शासकों से आमजन को बचाकर आधुनिकता की ओर बढ़ने में इन्हीं क्रांतियों का हाथ रहा है। इंग्लैंड की महान् क्रांति, फ्रांस की गौरवपूर्ण क्रांति, इटली की संघर्ष-क्रांति, भारत छोड़ो आंदोलन, जर्मनी की एकीकरण क्रांति, तिब्बत की धार्मिक क्रांति, जापान की तकनीकी क्रांति, औद्योगिक क्रांति और वैज्ञानिक क्रांति तक निष्पक्ष समकालीन विचारधारा का नतीजा रही हैं न कि किसी भीड़ का।

ये क्रांतियां तब संभव हो सकीं, जब निष्पक्ष और निडर खबरनवीसी की गई। हमारा देश विश्व पटल पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे में निष्पक्ष समीक्षा और खोजपूर्ण तथ्यात्मक खबरों को सामने लाकर सत्ता प्रतिष्ठान को आईना दिखाना हमारी महती जिम्मेदारी है। इसे हर उस खबरनवीस और समीक्षक को करना चाहिए, जो देश से प्यार करता है।

कमियों को सामने लाकर उनको दुरुस्त करने से एक सशक्त देश बनता है, न कि सच दिखाने वालों को कुचलने से। सच्चाई को छिपाने या सच दिखाने वालों पर हमलों से व्यवस्था गर्त में जाती है। दमनकारी नीति सरकार और देश के आचरण को दर्शाती है। सरकार को चाहिए कि वह उनकी कमियां गिनाने वालों को सम्मान सहित प्राश्रय दे और कमियां दूर करके सुशासन स्थापित करे।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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पढ़कर मुस्कराइए, क्योंकि हिंदी दिवस पर न्यूज चैनल ने की ऐसी जोरदारी तैयारी

कुछ टिकटॉक से गाने निकाल लो...आजकल जो विडियो यूट्यूब पर नहीं मिलते, टिकटॉक पर मिलते हैं। हिंदी पर भी जरूर होंगे

Last Modified:
Friday, 13 September, 2019
Channel Meeting

पीयूष पांडे, व्यंग्यकार व वरिष्ठ पत्रकार।।

‘हमें भी हिंदी दिवस को सेलीब्रेट करना चाहिए।‘ संपादक ने फरमाया।

‘यस सर, बिलकुल करना चाहिए। ये हमारी रिस्बॉन्सिबिलिटी है।‘ मीटिंग में संपादक के सबसे खास एडवाइजर कम ‘कार साकी’ ने कहा।

‘अच्छा बुलाओ किसी को। हम समझाते हैं कि क्या करना है कैसे करना है।‘ संपादक ने स्वयं को लगभग बुद्ध की अवस्था में पाते हुए नया आदेश दिया।

मीटिंग में भगदड़ मच गई। एक साथ कई लोग उस एक शख्स को बुलाने के लिए भागे, जिसे बताया जाना था कि क्या करना है और कैसे करना है। दरअसल, हलकारा तो बहाना था, बॉस की नजर में खुद को 100 मीटर रेस का चैंपियन बताना था।

खैर, बुद्ध ज्ञान सुनने के लिए बंदा मीटिंग में हाजिर हो गया।

सुनो....

जी...

‘अच्छा...हिंदी दिवस है। एक प्रोग्राम बनाओ। हिंदी राष्ट्रभाषा-राजभाषा वगैरह जो भी है, उसका इतिहास वगैरह बता देना एक पैकेज में। हिंदी के दो-चार साहित्यकारों के कोट वगरैह डालकर उसमें तीन चार गाने घुसेड़ दो। अलग-अलग जगह से दो-चार सेलेब्रिटी की बाइट मंगा लो, जिसमें वो बताएं कि हिंदी के बिना उनका जीवन अधूरा है। और फिर एक धांसू सा नाम रखकर शाम को चला दो पांच बजे। हिंदी की सेवा करना हमारा धर्म है। हम हिंदी न्यूज चैनल हैं। हमें हिंदी दिवस पर कुछ खास करना ही चाहिए।

‘बिलकुल ये हमारा कर्तव्य है।‘ कार साकी ने फिर दोहराया।

‘लेकिन सर फिल्मों में हिंदी भाषा पर कौन से गाने बने हैं?’ कार्यक्रम बनाने वाले अज्ञानी बालक ने सवाल किया।

‘यार ढूंढो..मिलेंगे। दो-चार गाने जरूर बने होंगे। एक लाख गाने बने हैं फिल्मों में। दो गाने हिंदी पर नहीं होंगे क्या। गूगल करो। क्या मूर्खों जैसी बात करते हो।‘ अब संपादक बुद्ध की मुद्रा से बाहर आ रहा था।

‘कुछ टिकटॉक से गाने निकाल लो...आजकल जो विडियो यूट्यूब पर नहीं मिलते, टिकटॉक पर मिलते हैं। हिंदी पर भी जरूर होंगे।‘ कार साकी ने फिर ज्ञान बांटा।

‘जी सर’, अज्ञानी बालक ने जी पर अतिरिक्त जोर डालते हुए जवाब दिया। फिर पूछा-‘नाम सर’

नाम....रख दो ‘हिंद की हिंदी की जय जय'।

‘वाह सर, क्या नाम है।‘ कार साकी बोला।

चूंकि हर मीटिंग में एक-दो पथ विमुख, नौकरी से बेपरवाह लोग होते हैं। इस मीटिंग में भी थे। एक ने सवाल किया।

सर, हिंदी दिवस से अच्छा है कि हम मंदी पर एक जोरदार कार्यक्रम कर दें।

‘मंदी। कहां है मंदी? तुम्हें दो लाख रुपए सैलरी मिल रही है ना। बराबर मिल रही है ना? तो कहां है मंदी।‘ संपादक चिढ़कर बोला।

सर लेकिन...

‘कुछ लेकिन वेकिन नहीं। हिंदी दिवस पर ही कार्यक्रम बनेगा और धूमधाम से चैनल पर चलेगा।‘ संपादक ने आदेश दिया।

अब दूसरा अड़ंगेबाज बोला।

सर, लेकिन हिंदी दिवस पर कार्यक्रम से पहले मेरा एक सुझाव है।

बोलो?

सर, हमें भी चैनल के भीतर हिंदी को बढ़ावा देना चाहिए।

‘बिलकुल देना चाहिए।‘ संपादक बोला।

‘ तो सर एंकर को कल से क्या कहें।‘ अड़ंगेबाज बोला।

संपादक ने महिला एंकर का मुंह देखा। एंकर ने संपादक का। मीटिंग के बाकी लोगों ने उन दोनों का।

अड़ंगेबाज बोला- ‘सर प्रोड्यूसर को कल से निर्माता कह दें क्या?‘

संपादक फिर सोच में डूब गया।

अड़ंगेबाज फिर बोला-‘सर आउटपुट डेस्क, इनपुट डेस्क, असाइनमेंट डेस्क, रिपोर्टर का भी हिंदीकरण जरूरी है। आप सुझाएं क्या बोला जाना चाहिए?‘

संपादक अब सोच से आगे की अवस्था चिंता में चला गया।

अड़ंगेबाज को मजा आने लगा। बोला-‘सर ओबी वैन, कंप्यूटर, माइक, टेलीप्रॉम्पटर, स्टूडियो वगैरह की भी हिंदी लगे हाथ बता दीजिए ताकि एक बार में ही सारा चैनल हिंदीमय हो जाए।‘

संपादक अब चिंता से आगे की मुद्रा निद्रा में जाने को बेकरार दिखने लगा।

‘कार साकी’ भी चुप था। लेकिन जानता था कि ऐसे चुप रहा तो अगला इंक्रीमेंट नहीं हो पाएगा। क्योंकि उसका इंक्रीमेंट संपादक को मुश्किल वक्त से निकालने की उसकी कोशिशों पर ही निर्भर था।

‘सर, मुझे लगता है कि हिंदी दिवस पर कार्यक्रम की टीआरपी नहीं आएगी। और बिना टीआरपी के प्रोग्राम का कोई मतलब नहीं।‘ कार साकी बोला

संपादक ने हां में सिर हिलाया।

कार साकी ने आगे कहा-‘सर, हिंदू-मुसलमान खोज लेते हैं कोई.....उसी पर बना देते हैं कोई प्रोग्राम। हिंदी दिवस पर मिठाई मंगा लेंगे।’

संपादक निद्रा से बाहर आने लगा।

‘हां, अच्छा आइडिया है....टीआरपी इज मस्ट।  वी ऑल शुड कंसन्ट्रेट ऑन टीआरपी ओनली.....’ संपादक ने कहा और मीटिंग खत्म हो गई।

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मिस्टर मीडिया: हम कितने ग़ैर ज़िम्मेदार और देहाती हैं 

 पत्रकारिता अभिव्यक्ति का माध्यम है। पेशा नहीं। यह दाल रोटी की जुगाड़ का ज़रिया हो सकता है

Last Modified:
Friday, 13 September, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल

वरिष्ठ पत्रकार 

पत्रकारिता अभिव्यक्ति का माध्यम है। पेशा नहीं। यह दाल रोटी की जुगाड़ का ज़रिया हो सकता है। किसी भी अन्य रोज़गार की तरह, लेकिन अभिव्यक्ति रोज़गार नहीं हो सकती। स्वतंत्र अभिव्यक्ति हमारा मौलिक अधिकार है। बशर्ते उसमें कोई दुर्भावना न छिपी हो। 

अफ़सोस यह है कि पत्रकारिता में भी एक वर्ग ऐसा पनप रहा है,जो रोज़गार देने वाले संस्थान के पास अपनी अभिव्यक्ति भी जैसे गिरवी रख देता हैं। किसी के आठ घंटे उसे सौंपे गए काम का हिस्सा हो सकते हैं। उस काम को उसे पेशेवर (प्रोफेशनल) तरीक़े से करना ही चाहिए। इसमें दो मत नहीं हो सकते। मगर, सौंपे गए काम से उसके विचारों की उड़ान के पंख नहीं कुतरे जा सकते। जहां यह घालमेल होता है, उस प्रोफेशनल की अपनी पहचान ख़त्म हो जाती है।

बीते सप्ताह अनेक उदाहरण देखने को मिले। सबसे बड़ा सुबूत पाकिस्तान के मामले में सामने आया। पाकिस्तान को एक शत्रु देश की श्रेणी में रखे जाने पर शायद ही किसी को एतराज हो। अपने जन्म से ही वह एक ऐसे नक़ली मुल्क़ के रूप में उभरकर सामने आया है, जो सिर्फ़ हिन्दुस्तान से नफ़रत के आधार पर जीवित है। अवाम वही है, जो शान्ति से दो पड़ोसियों की तरह रहना चाहती है, पर हुक़्मरानों ने उसे केवल अपने स्वार्थों के लिए एक सत्यानाशी देश की श्रेणी में खड़ा किया है। 

भारतीय मीडिया में हाल के दिनों में पाकिस्तान का ज़िक्र कुछ इसी तरह हो रहा है। विडंबना यह है कि पाकिस्तान को मीडिया नष्ट करने के लिए जिस भाषा का इस्तेमाल करता है, वह किसी भी सूरत में शिष्ट नहीं है। हम उस देश को कुछ इस तरह प्रस्तुत करते हैं, जैसे उसकी हैसियत एक चींटी से अधिक नहीं है और उसे आप चुटकियों में मसल कर रख देंगे। निवेदन है कि मौजूदा माहौल में दो मुल्क़ों के बीच जंग लड़ना भी इतना आसान नहीं रहा है। पाकिस्तान के मित्र देश भले ही अधिक न हों, लेकिन अकेला चीन ही पर्याप्त है। 

परदे पर या अख़बार के पन्नों पर जंग की भाषा का प्रस्तुतिकरण शर्मनाक और स्तरहीन हो सकता है, हाल के दिनों का कवरेज उसका नमूना है। ऐसा लगता है कि अगर न्यूज़रूम के प्रोड्यूसरों के हाथ में रायफलें दे दी जाएं तो लाहौर से लेकर पेशावर तक ये लोग क़ब्ज़ा करके तिरंगा लहरा देंगे। भारतीय सेना को अपने क़दम बैरकों से निकालने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। आज समूचे संसार में जितने भी संवेदनशील जंगी मसले हैं ,कृपया उनका कवरेज भी अंतर्राष्ट्रीय चैनलों और माध्यमों में देखिए। साफ़ पता लगता है कि हम कितने ग़ैर ज़िम्मेदार और देहाती हैं। जंग के लिए आम अवाम को उकसाना और भड़काना ही देशभक्ति नहीं है। मसले का तर्कपूर्ण, तथ्यपरक और संतुलित विश्लेषण भी देशभक्ति है मिस्टर मीडिया !  

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मेरे जहन में हमेशा ताजा रहेगा राम जेठमलानी का वह इंटरव्यू

जेठमलानी विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। महज 17 साल की उम्र में उन्होंने न केवल लॉ की डिग्री हासिल की, बल्कि अपना पहला केस भी लड़ा

Last Modified:
Monday, 09 September, 2019
Ram Jethmalani

तरुण नांगिया, वरिष्ठ पत्रकार।।

आठ सितंबर 2019, रविवार, सुबह 7.45 बजे, राम जेठमलानी निचली अदालत यानी पृथ्वी छोड़कर भगवान की अदालत में बहस के लिए प्रस्थान कर गए। कई मौकों पर आपने मुझसे कहा था कि आप खुलकर और बेवाकी से अपनी बात रखते हैं, क्योंकि आप जीवन रूपी हवाईअड्डे के प्रतीक्षा कक्ष में बैठे हैं और विमान किसी भी समय उड़ान भर सकता है। आज आप उस विमान में सवार होकर भगवान की अदालत में बहस के लिए चले गए हैं, लेकिन आपके यूं जाने से जो एक खालीपन हमारे जीवन में आया है, उसे भरा नहीं जा सकता।

जेठमलानी विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। महज 17 साल की उम्र में उन्होंने न केवल लॉ की डिग्री हासिल की, बल्कि अपना पहला केस भी लड़ा। उस दौर में वकील बनने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष थी। जेठमलानी ने इसके खिलाफ अदालत में याचिका दायर की, जिसके बाद उन्हें कोर्ट से विशेष अनुमति मिल गई।

भारत-पाक बंटवारे के बाद जेठमलानी मुंबई में बस गए। ये उनकी जिंदगी का सबसे कठिन समय था। उन्होंने कई रातें रिफ्यूजी कैंप में गुजारीं, लेकिन मेहनत के बल पर वह अपनी एक अलग पहचान बनाने में कामयाब रहे। सबसे पहले वह केएम नानावती केस हाथ में लेने के चलते सुर्खियों में आये, जिसे हाल ही में अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म ‘रुस्तम’ के माध्यम से बड़े पर्दे पर दिखाया गया है।

आपातकाल की खिलाफत में  जब करीब 1.5 लाख लोगों को बिना मुकदमे के जेलों में बंद कर दिया गया था। एडीएम जबलपुर बनाम एसएस शुक्ला मामले की सुनवाई के दौरान, जिसे बंदी प्रत्यक्षीकरण मामले के रूप में भी जाना जाता है, उस समय के अटॉर्नी जनरल नीरेन डे ने अदालत को बताया कि जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत हैं। आपातकालीन शक्तियों के तहत हिरासत में लिए गए लोगों के पास कोई लोकल स्टैंडी नहीं है और उनकी याचिकाओं को खारिज करना होगा। इस पर न्यायमूर्ति एचआर खन्ना ने पूछा, ‘अनुच्छेद 21 में भी जीवन का उल्लेख है और क्या सरकार इसे भी इस हद तक आगे बढ़ाएगी?’ जिस पर डे ने जवाब दिया, ‘भले ही जीवन अवैध रूप से छीना गया हो, अदालतें असहाय हैं।‘

बहस पूरी होने के बाद अदालत को संबोधित करते हुए राम जेठमलानी ने कुछ ऐसा कहा, जिसने उनके समर्थकों की संख्या को एकाएक बढ़ा दिया। उन्होंने अदालत से कहा, ‘इस कोर्ट ने कभी भी किसी मामले को इतने महत्वपूर्ण तरीके से नहीं निपटाया। एक ऐसा मामला जिस पर कुछ लोगों को छोड़कर सभी की आजादी निर्भर करती है, यह कहना गलत नहीं होगा कि लोकतंत्र पहले से ही कॉफिन में हैं। सरकार अपने किये पर पर्दा डालना चाहती है, पूरी दुनिया की निगाहें आज अदालत पर हैं। लोग यह देखना चाहते हैं कि आप (न्यायाधीश) एक भयानक त्रासदी से जुड़े गंभीर मामले पर क्या रुख अख्तियार करते हैं। आप समकालीन राय के लिए तिरस्कारपूर्ण व्यवहार का सामना कर सकते हैं, लेकिन लंबे समय बाद भावी पीढ़ी आपके फैसलों को पढ़ेगी और अपने निष्कर्ष निकालेगी।’

उन्होंने यह भी कहा, ‘अब आप इसे एक आदर्श उदाहरण की तरह सामने रखना चाहते हैं या अवमानना की तरह, यह आपको चुनना है। लेकिन याद रखें कि आपातकाल को उन लोगों द्वारा स्थायी किया जा सकता है जो खुद को स्थायी बनाने के लिए दृढ़ हैं।’

इसके बाद जेठमलानी, स्वत: निर्वासन पर कनाडा चले गए। आपातकाल हटने के बाद वह वापस लौटे और बंबई उत्तर पश्चिम लोकसभा क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। अपने राजनीतिक करियर में उन्हें दो बार कानून मंत्री बनने का मौका मिला, लेकिन उनके जीवन का दूसरा पक्ष भी था। उन्हें पढ़ाना पसंद था और इसलिए उन्होंने नेशनल लॉ स्कूलों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लगभग चार दशक पहले बार काउंसिल के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने एनआर माधव मेनन को प्रभावित किया। फिर दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय में पहुंचकर भारतीय कानूनी शिक्षा में एक नया प्रयोग शुरू किया, जिसके बाद मेनन ने दिल्ली विश्वविद्यालय से तीन साल का विश्राम लिया और बार काउंसिल ऑफ इंडिया से जुड़ गए, जिसने राज्यों के लिए लॉ स्कूलों का एक नया मॉडल पेश किया। इसके आधार पर पहला लॉ स्कूल कर्नाटक में स्थापित किया गया, जिसे नेशनल लॉ स्कूल, बेंगलुरु के रूप में जाना जाता है।

एक बार जेठमलानी के निवास पर उनका साक्षात्कार करते हुए मैंने उनसे पूछा था कि आप किंग सोलोमन की बहुत प्रशंसा करते हैं? जिसके जवाब में उस समय 91 वर्षीय जेठमलानी ने कहा ‘यंग मैन, मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूं, आदमी जितना बूढ़ा होता जाता है, उसके साथी उतने ही जवान होने चाहिए’, इतना कहते ही उन्होंने एक बड़ी मुस्कान के साथ मुझे देखा। कुछ साल पहले लिया गया उनका यह इंटरव्यू आज भी मेरे जहन में ताजा है और हमेशा रहेगा।

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‘पत्रकारिता में गुरु बनाने से पहले इस बात का रखें खास ध्यान’

कुछ पेशे तो ऐसे हैं, जो गुरुओं के आशीर्वाद से ही चलते हैं। मसलन, राजनीति और पत्रकारिता

Last Modified:
Thursday, 05 September, 2019
KM Sharma

कृष्ण मोहन शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार।।

‘सफलता’ से ज्यादा ‘गरिमा’ को महत्व देने की जो बात कहे, वही आपका गुरु है। वो व्यक्ति कोई भी हो सकता है। आपकी मां हो सकती है, आपके पिता हो सकते हैं। हो सकता है कि आपकी पत्नी हो, आपके दोस्त हों, आपके शुभचिंतक हों या फिर वास्तव में आपके शैक्षणिक गुरु। रिश्तों का गुरु के अस्तित्व में होने या नहीं होने से कोई मतलब नहीं होता, कोई भी व्यक्ति आपका गुरु हो सकता है।

कुछ पेशे तो ऐसे हैं, जो गुरुओं के आशीर्वाद से ही चलते हैं। मसलन, राजनीति और पत्रकारिता। दोनों में फर्क सिर्फ इतना है कि राजनेता अपने शिष्य की मदद दलगत राजनीति से ऊपर उठकर भी करते हैं, लेकिन पत्रकारिता में अक्सर यह देखा गया है कि आप अगर किसी वजह से फिसल गए तो आपका गुरु सबसे पहले आपको त्याग देगा।

लेकिन गुरु तो गुरु होता है। ये बात अलग है कि कोई सिर्फ अपनी जाति के लोगों को अपना शिष्य बनाता है, कोई किसी खास धर्म के लोगों को शिष्य बनाता है, कोई किसी राज्य विशेष के लोगों को शिष्य बनाता है। कई की पसंद लैंगिक भी होती है, लेकिन फिर भी कहूंगा कि गुरु तो गुरु होता है, चाहे वो बौद्धिक गुरु हो या फिर शैक्षणिक गुरु। सही मायने में जो ‘सफलता’ से ज्यादा ‘गरिमा’ को महत्व देने की बात कहे, वही आपका असली गुरु है ।

गुरु की बात को जेहन में रखकर सदैव काम करना यूं तो कहने में बहुत अच्छा लगता है, लेकिन इसे अमल में लाकर काम करना बहुत मुश्किल है। खासकर तब, जब इंडस्ट्री के तथाकथित गुरु खुद को बचाने के लिए शिष्यों की बलि ले रहे हों। बात ‘मैनेजेरियल इथिक्स’ की कर रहें हो और एचआर (HR) मैनेजर को अपना दोस्त बना लिया हो।

मुझे श्री कन्हैया लाल नंदन, त्रिनेत्र जोशी, वीरेन्द्र सेंगर, शेष नारायण सिंह, विनोद अग्निहोत्री, अमिताभ, सुप्रिय प्रसाद, संतोष भारतीय, शैलेष कुमार, राम कृपाल सिंह और कमर वाहिद नकवी, जी कृष्णन जैसे लोगों के मार्गदर्शन में काम करने का मौका मिला। इनमे से कई को मुझमें ‘शिष्य’ नहीं मिला तो मुझे भी इनमें से कई लोगों में अपना ‘गुरु’ नहीं मिला। इसे मैं अपना दुर्भाग्य ही मानूंगा कि कई ने मुझे अपना शिष्य नहीं बनाया और कई को मैं अपना गुरु नहीं बना पाया।

ईमानदारी और उसूलों के साथ नौकरी करना आज के दौर में बहुत कठिन काम है। खासकर तब, जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ‘म्यूजिकल चेयर’ का खेल चल रहा हो। जब टीवी में नौकरी करने वाले 20 प्रतिशत पत्रकारों की योग्यता साल के अंत में संस्थान के लिए अप्रासंगिक हो जा रही हो। ऐसे में गुरु की तलाश निश्चित ही एक मुश्किल काम है। लेकिन, इन तमाम सारी थ्योरी और खामियों के बावजूद आज भी पत्रकारिता के पेशे में ‘गुरु-शिष्य’ परंपरा कायम है। रजत शर्मा, प्रणॉय रॉय राय, कमर वाहिद नकवी, हेमंत शर्मा, सुप्रिय प्रसाद जैसे लोग आज भी अपने शिष्यों का ख्याल रखते हैं। यह बात अलग है कि इनमें से कोई आपको अपना शिष्य बनाएगा या नहीं, लेकिन परंपरा अब भी जिंदा है।

बात 2006 की है जब ‘आजतक’ में नौकरी के लिए शैलेष, राम कृपाल सिंह और कमर वाहिद नकवीजी के पैनल में मेरा साक्षात्कार हो रहा था। काफी देर तक सवाल-जवाब के बाद कमर वाहिद नकवीजी ने एक सवाल पूछा कि आखिर आपने नौकरी क्यों छोड़ी? मेरा जवाब था, ‘सर, स्वाभिमान बेचकर नौकरी नहीं हो सकती।’ इस जवाब के बाद नकवीजी ने कहा कि ठीक है जाइए, देखता हूं। चार दिनों के बाद मुझे जानकारी मिली कि मुझे ‘आजतक’ में नौकरी मिल गई है। जॉइन करने के करीब तीन साल बाद नकवीजी ने एक दिन कहा कि जो व्यक्ति सफलता से ज्यादा गरिमा को तव्वजो देता है,वही एक दिन बड़ा आदमी बनता है।

नकवीजी मुझे अपना शिष्य मानते हैं या नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन मैं उन्हें अपना गुरु मानता हूं। इसलिए शिक्षक दिवस के अवसर पर पत्रकारिता के छात्रों को यह मान लेना चाहिए कि ‘सफलता’ से ज्यादा ‘गरिमा’ को महत्व देने की जो बात कहे, वही आपका गुरु है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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