उदार प्रजातंत्र में सुरक्षा बलों को करना होगा ये काम, बोले वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह

यह समस्या चीन में नहीं हो सकती, पाकिस्तान में नहीं हो सकती (अगर वहां इच्छाशक्ति हो), यहां तक कि अमेरिका में भी...

Last Modified:
Tuesday, 26 February, 2019
NK Singh

एनके सिंह
वरिष्ठ पत्रकार।।

उदार प्रजातंत्र और आतंकवाद की बदलती प्रकृति

यह समस्या चीन में नहीं हो सकती, पाकिस्तान में नहीं हो सकती (अगर वहां इच्छाशक्ति हो), यहां तक कि अमेरिका में भी नहीं हो सकती, लेकिन भारत इसके लिए फिलहाल सबसे जरखेज (उपजाऊ) जमीन हो सकता है। उदार प्रजातंत्र, संविधान में तत्कालीन परिस्थितियों को साधने की मजबूरी में किये गए समझौते, निम्न सामाजिक चेतना, अभेद्य गरीबी, तर्क-शक्ति और वैज्ञानिक सोच का आदतन अभाव और धार्मिक-जातिगत आधार पर जबरदस्त पारस्परिक सामाजिक दुराव है।

पुलवामा में फिदायीन हमले का जो स्वरुप उभरकर आया है– यानी आरडीएक्स की बड़ी मात्र के साथ आइईडी (संवर्धन करके बनाया गया विस्फोटक) तैयार कर फिदायीन हमला, इसमें बहुत कुछ पहली बार हुआ है। मसलन, फिदायीन भी स्थानीय, हमला भी सॉफ्ट टारगेट यानी भीड़ वाला बाज़ार या ट्रेन न होकर अर्ध-सैनिक बल के जवानों से भरी बसों का काफिला, अभी तक की जानकारी के अनुसार पूरा ऑपरेशन पाकिस्तान से लेकिन आइईडी का संश्लेषण कश्मीर में और वह भी ‘हैंडलरों’ के उस जत्थे द्वारा जो पाकिस्तान का है। सबसे खास पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मुहम्मद द्वारा फिदायीन का विडियो जारी करना। कल्पना कीजिये, अगर यह दिल्ली के भीड़ वाले रेलवे स्टेशन, कनॉट प्लेस में या त्यौहार के दिन हुआ होता तो क्या स्थिति होती?

भारत की इंटेलिजेंस, सुरक्षा बलों और सीमा पर टुकड़ियों के लिए पूरा लॉजिस्टिक बदलना पड़ेगा और वह ऐसे प्रजातंत्र में, जहां मौलिक अधिकारों का अक्सर गलत मायने निकाल लिया जाता है और मानवाधिकार के अलमबरदार आतंकी हमले के बाद के पुलिस ऑपरेशन में फायरिंग कर रहे सुरक्षा बालों पर पत्थर चलाने वालों को ‘गुमराह बच्चे’  कहकर अपने बौद्धिक निष्पक्षता और सोच की साम्यवादी उड़ान का परिचय देते हैं, वैसे ही जैसे मुलायम सिंह यादव बलात्कारियों को ‘जवानी मे गुमराह बच्चे’ की संज्ञा से नवाजते हैं।

बहरहाल, नए खतरे किस प्रकृति के हैं, ये समझना जरूरी है। पूरी दुनिया में कानून की व्यवस्था में लगा सुरक्षा बल या पुलिस एक ही सिद्धांत पर काम करती है-अगर इसे तोड़ा तो रोकने के लिए और अगर टूट गया तो पकड़ने के लिए बल प्रयोग करना। वह बल प्रयोग परिस्थिति के अनुसार शारीरिक रूप से अशक्त करने से लेकर गोली मारने तक हो सकता है। यानी एक आतंकवादी को रोकने के लिए उसकी जान लेने की हद तक। लेकिन अगर आतंकी फिदायीन हो तो पूरी स्थिति बदल जाती है। क्योंकि अगर वह नजदीक पहुंच गया तो चुनौती वह देता है- ‘गोली तुम चलाओगे या अपने शरीर पर लादे सुसाइड जैकेट का बटन हम दबाएं ! लब्बोलुआब यह कि खुफिया एजेंसियों की ऐसी सतर्कता कि आरडीएक्स तो छोड़िये, कोई बारूदी तत्व आम हाथों में न लग पाए, जैकेट्स न बन सकें और उन संस्थाओं को न पनपने देना, जिनके यहां ‘गुमराह युवा’ इनडॉक्टरीनेशन के जरिये ‘फिदायीन’ बनाए जाए हैं।          

पुलवामा हमले के बाद यह कहा जा सकता है कि पाकिस्तान की ‘फौजी’ खुफिया एजेंसी आईएसआई का भारत में उपद्रव का यह पांचवां और शायद सबसे खतरनाक चरण है। पहला चरण 1980 के दशक में ‘पीटीपीएम’ –यानी पाक-ट्रेंड-पाक-मिलिटेंट (पाकिस्तान में ही प्रशिक्षित पाकिस्तानी उग्रवादी) का था, लेकिन जब भारत में वह घटना करता था और अगर पकड़ा जाता था तो पाकिस्तान की दुनिया में किरकिरी होती थी। लिहाज़ा नब्बे के दशक तक आते आते पीटीआइएम यानी पाक-ट्रेंड-इंडियन-मिलिटेंट (भारतीय आतंकवादी जिसकी ट्रेनिंग पाकिस्तान में हुई) का सिलसिला शुरू हुआ। लेकिन इसमें भी पाकिस्तान को तब दिक्कत होती थी, जब पकड़े जाने पर वह यह कबूल करता था कि उसकी ट्रेनिंग किसने और पाकिस्तान के किस ट्रेनिंग कैंप या शहर में दी थी)।

तीसरा चरण सन 2000 से ‘स्लीपर सेल्स’  का था, जिसमें तीन-से पांच की संख्या में हर स्लीपर सेल का सदस्य होता था जो भारत का ही था और उसे कभी-कभी अचानक किसी एक कार्य के लिए आदेश मिलता था। मसलन केरल के किसी सेल को आदेश होता था-उत्तर भारत के अमुक शहर में किसी धर्मस्थल के पास रात में कोई कटा जानवर रखने का ताकि सुबह उस धर्मस्थल के अनुयायिओं में आक्रोश पैदा हो। इस सेल का काम बस इतना ही था। अगला स्लीपर सेल हजारों किलोमीटर के सुदूर भाग से था,  जिसे आदेश होता था इस धार्मिक स्थल के बगल के मोहल्ले या आसपास के शहर में किसी समुदाय-विशेष के संभ्रांत व्यक्ति को गोली मार देना (और इसके लिए उसे सभी जानकारी पहले से मुहैया होती थी) या किसी धर्म के खिलाफ आग उगलने वाले मजमून की पर्चियां बांटना। तीसरे सेल से उसी दिन किसी परम्परागत उपद्रव वाले मोहल्ले में हथियार की सप्लाई करना। जब अदालत में केस जाता था तो अलग-अलग शहरों में अलग-अलग जज मामले को देखते थे और अगर केरल का स्लीपर सेल पकड़ा भी गया तो जज को यह समझ में नहीं आता था कि केरल के किसी इदरीस ने मेरठ के किसी पंडित दीनदयाल को क्यों मारा। लिहाज़ा, आतंक की घटनाओं में सजा की दर काफी गिर जाती थी। आरोप लगता था कि पुलिस सांप्रदायिक विद्वेष से गलत लोगों को फंसाती है। टाडा कानून ख़त्म करने के पीछे यही कारण था।

 चौथा चरण आइएसआई का था ‘होम ग्रोन टेररिज्म’ का यानी भारत में ही आतंकवादियों की पौध तैयार करना उन्हें आर्थिक और हथियार की मदद देकर। अबकी उनके प्रशिक्षण की जगह भी पाकिस्तान न होकर नेपाल और बांगलादेश कर दी गयी। अगर आतंकी पकड़ा भी गया तो पाकिस्तान किसी आरोप से साफ़ बच जाता था, यह कहकर कि आतंकी भारत का, ट्रेनिंग किसी गैर मुल्क में लिहाज़ा भारत झूठे आरोप लगा रहा है। कश्मीर में पूर्व में कुछ आत्मघाती हमले हुए लेकिन फिदायीन अफगानिस्तान या उत्तर वजीरिस्तान और फाटा (फेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरियाज) क्षेत्र तैयार किये जाते थे, जहां यह कुटीर उद्योग की मानिंद है और जहां से फिदायीन और आत्मघाती जैकेट कुछ लाख रुपये में मिल जाते हैं।

लेकिन पुलवामा में पहली बार एक स्थानीय कश्मीरी फिदायीन ने इसे अंजाम दिया है। लिहाजा सुरक्षा बलों को के लिए नयी मुश्किल है यह पता करना कि प्रारंभिक इनडॉक्ट्रिनेशन (मानसिक रूप से कट्टरवाद के चरम लक्ष्य के लिए तैयार करना) कहां हुआ,  कैसे वह पाकिस्तान में मूल इनडॉक्टरीनेशन के लिए पहुंचा और कैसे वापस भारत आया और चूंकि आरडीएक्स केवल सेना इस्तेमाल करती है, लिहाज़ा कैसे पाकिस्तान आर्मी से आरडीएक्स का इतना जखीरा कश्मीर में आया। इस बात से भी सतर्क रहना होगा कि यह कुप्रयास देश के अन्य भागों में परिणति तक न पहुंचे। आरडीएक्स स्वयं विस्फोट नहीं करता और इसे किसी अन्य विस्फोटक के साथ और प्लास्टीसाइजर प्रक्रिया से घटक बनाया जाता है। लिहाज़ा, यह तकनीक कैसे आतंकियों को जैश जैसी खतरनाक संस्थाओं से मिली।

एक उदार प्रजातंत्र में बगैर जन-संचरण ही नहीं, मौलिक अधिकारों को सख्ती से बाधित किये इस नयी समस्या से जूझना सुरक्षा बलों और खुफिया एजेंसियों के लिए नयी चुनौती होगी। भूलना न होगा कि 9/11 की घटना के बाद अमरीकी सरकार ने होमलैंड सिक्यूरिटी एक्ट बनाया, जिसके तहत किसी भी नागरिक की निजता पुलिस चाहे तो भंग कर सकती है लेकिन किसी एक नागरिक ने भी चूं तक नहीं किया था। क्या भारत में हम ओवैसी-ब्रैंड राजनीति इसका अहतराम करेगी?

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