#MeToo: हमेशा पुरुष ही गलत नहीं होते, लड़कियां रिश्ते के टूटने पर होती हैं आक्रामक

हैशटैग- मी टू की गुहार हमारे यहां भी पहुंच ही गई। इस अभियान के लिए शक्ति के पर्व...

Last Modified:
Thursday, 11 October, 2018
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‘मुंबई में रहते हुए लंबे समय तक मैंने फिल्म और टीवी जगत को काफी नजदीक से देखा है। इस इंडस्ट्री का खेल दौलत-शोहरत और सेक्स पर टिका है। जिसके पास यह सब कुछ है, वह इस खेल में सबसे पावरफुल माना जाता है। इंडस्ट्री में येन-केन-प्रकारेण पैर जमाने को आतुर युवा अपने हिस्से का छोटा सा खेल खेलते हैं। इसमें कभी उनकी जीत होती है, तो कभी हार।’ हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान में छपे अपने लेख के जरिए ये कहना है कि हिन्दुस्तान की कार्यकारी संपादक जयंती रंगनाथन। उनका पूरा लेख आप यहां पढ़ सकते हैं-

लंबा रास्ता तय करना है हमारे मी टू को

हैशटैग- मी टू की गुहार हमारे यहां भी पहुंच ही गई। इस अभियान के लिए शक्ति के पर्व से बेहतर मौका और क्या हो सकता है? हर दिन कुछ नए नाम सामने आ रहे हैं, नए खुलासे हो रहे हैं, बातें बन रही हैं। फिल्म जगत, मीडिया, मनोरंजन जगत, राजनीति... औरतें सामने आ रही हैं, बता रही हैं कि बरसों पहले उनके साथ क्या हुआ था? कइयों ने कहा, हमारे पास उस समय आवाज उठाने का साहस नहीं था। वह शक्तिशाली था, उसके हाथ में हमारा भविष्य था। अब जब सब आवाज उठा रहे हैं, तो लग रहा है कि यही सही वक्त है, अपने साथ हुए यौन शोषण को दुनिया के सामने लाने का।

क्या यह सिर्फ शक्ति और सेक्स की जंग है? क्या हमारा समाज औरत विरोधी है? क्या यहां किसी भी क्षेत्र में महिलाएं सुरक्षित नहीं? मैं ऐसा नहीं पाती।  

तीस साल पहले, जब मैंने अपने लिए पत्रकारिता का पेशा चुना था, तब पता था कि इस क्षेत्र में नाममात्र स्त्रियां होंगी। साथ काम करने वाले कुछ हमउम्र, तो कुछ वरिष्ठ पुरुष थे। धर्मयुग के संपादक धर्मवीर भारती ने काम करने का माहौल जरूर सख्त रखा था, पर महिलाओं के लिए सौहार्दपूर्ण और स्नेहिल माहौल था। कभी यह एहसास नहीं हुआ कि आपको स्त्री होने की वजह से कम आंका जा रहा है। अपने आसपास दूसरी संस्थाओं में भी आमतौर पर ऐसा ही माहौल पाया। पूरे संस्थान में कोई एक पुरुष साथी ऐसा होता था, जिससे युवा लड़कियों को दूर रहने की सलाह दी जाती। और यह सलाह भी पुरुष और महिलाएं, दोनों देते थे। इसके अलावा स्त्री-पुरुष के बीच जो भी रिश्ते बनते, उनकी आपसी सहमति से बनते थे।  

हैशटैग मी टू इंडिया की लहर शुरू हुई नब्बे के दशक की मिस इंडिया और फिल्म अभिनेत्री तनुश्री दत्त के उस बयान से, जिसमें उन्होंने दस साल पहले नाना पाटेकर पर फिल्म हॉर्न ओके प्लीज के एक आइटम गाने की शूटिंग के दौरान यौन प्रताड़ना और हिंसा का इल्जाम लगाया था। पिछले कुछ साल से तनुश्री देश से बाहर हैं। इस घटना के तुरंत बाद भी वह मुंबई में पुलिस के पास गई थीं। लेकिन केस तब रफा-दफा हो गया। वर्षों बाद जब वह वतन लौटीं, तो उन्होंने एक बार फिर अपने साथ हुई प्रताड़ना का जिक्र छेड़ दिया।  

तनुश्री के बयान के बाद बेशक इंडस्ट्री के बहुत कम लोगों ने उनका साथ दिया, पर कुछ ही दिनों में फिल्म इंडस्ट्री, मनोरंजन, राजनीति, पत्रकारिता और दूसरे भी क्षेत्र से जुड़ी कई हस्तियों के नाम सामने आने लगे। तीन दिन पहले रात को फेसबुक पर जब नब्बे के दशक में चर्चित धारावाहिक तारा की निर्माता और लेखिका विनीता नंदा की पोस्ट पढ़ी, तो अवाक रह गई। विनीता से तारा के निर्माण के दौरान और उसके बाद भी कई बार मिल चुकी हूं। हमारी पीढ़ी की वह एक स्मार्ट और प्रतिभाशाली नाम थीं। 19 साल बाद विनता ने यह राज खोला है कि कैसे तारा में काम करने वाले मुख्य कलाकार आलोक नाथ ने उनके साथ न सिर्फ बलात्कार किया, बल्कि उन्हें प्रताड़ित भी किया था। विनता कहती हैं, ‘आलोक को सजा हो न हो, इससे अब मुझे फर्क नहीं पड़ता। मैं लंबे समय तक अवसाद में रही। मेरा करियर लगभग खत्म हो गया। मुझे इस हादसे से निकलने में वक्त लगा। अब जाकर हिम्मत जुटा पाई हूं कि जो मेरे साथ हुआ, वह दुनिया को बता सकूं।'

मुंबई में रहते हुए लंबे समय तक मैंने फिल्म और टीवी जगत को काफी नजदीक से देखा है। इस इंडस्ट्री का खेल दौलत-शोहरत और सेक्स पर टिका है। जिसके पास यह सब कुछ है, वह इस खेल में सबसे पावरफुल माना जाता है। इंडस्ट्री में येन-केन-प्रकारेण पैर जमाने को आतुर युवा अपने हिस्से का छोटा सा खेल खेलते हैं। इसमें कभी उनकी जीत होती है, तो कभी हार। हैशटैग मी टू के बारे में चर्चित अभिनेत्री और निर्माता पूजा भट्ट कहती हैं, ‘आप दुनिया के हर मर्द को कठघरे में नहीं खड़ा कर सकते। उसी तरह, आप यह भी नहीं कह सकते कि हमेशा औरत ही सही होती है। मैं इस इंडस्ट्री की बेटी हूं और यहां पर हर रिश्ता आपसी लेन-देन का होता है। अगर किसी के साथ कुछ गलत हुआ है, तो उसे आवाज उठानी ही चाहिए, ताकि जो गलत है, उसे और आगे बढ़ने का मौका न मिले।'

पिछले साल लगभग इसी समय हॉलिवुड मी टू कैंपेन से थर्रा गया था। अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने सोशल मीडिया पर मी टू हैशटैग के साथ नामी निर्माता हार्वे वांइस्टीन के यौन शोषण की करतूतों को जगजाहिर किया। इसके बाद तो कई अभिनेत्रियों ने अपनी बात सामने रखी। देखते-देखते मी टू कैंपेन ने हॉलिवुड के कई नए-पुराने नामों की धज्जियां उड़ाकर रख दी।  

हॉलिवुड और अब अपने यहां भी यही लगता है कि मी टू जैसे अभियान के लिए कोई तैयारी जैसी चीज नहीं करनी पड़ती। आपको बस खुले दिल से यह स्वीकार करना होगा कि आप अपने सामने कुछ गलत नहीं होने देंगे। अभी तक जो भी मामले सामने आए हैं, उनमें अधिकांश मामले वर्षों पहले घटे हैं। अभी तो आरोप तय होना है। पुरुषों को भी अपना पक्ष सामने रखना है। लेकिन यह बात भी अहम है कि स्त्रियां अपनी हर असफलता का दारोमदार मी टू पर नहीं बांध सकतीं। आपको अपने कुछमसले खुद ही सुलझाने होंगे।  

पिछले पांच साल से अपने संस्थान में यौन अपराध कमेटी की अध्यक्ष होने के लिहाज से मैंने यह पाया कि किसी भी कृत्य में भागीदारी सिर्फ पुरुष की या सिर्फ स्त्री की नहीं होती। हमेशा पुरुष ही गलत नहीं होते, कुछ मामले ऐसे भी सामने आए, जहां लड़कियां अपनी मर्जी से बने रिश्ते के टूट जाने के बाद आक्रामक हो गईं। मामले की सच्चाई जाने बिना किसी एक का पक्ष लेना अभियान की आंच को ध्वस्त कर सकता है। लेकिन यह भी सही है कि किसी स्त्री के साथ अगर कभी भी गलत हुआ है, तो उसे न्याय मिलना चाहिए और आरोपी को सजा। चाहे मी टू हो या न हो।  

जिस तरह रोज खुलासे हो रहे हैं, उससे लग रहा है, अभी तो बस यह शुरुआत भर है। अभी तो और आवाजें उठनी हैं। इन आवाजों के जरिए ही इस अभियान की दिशा तय होगी और अंजाम भी। कहीं ऐसा न हो कि यह अभियान कुछ पुराने झगड़े निपटाने और अपना गुस्सा उतारने का एक मंच भर बनकर रह जाए।

 

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मिस्टर मीडिया! ऐसी भी हकीकत रही है एग्जिट पोल की

हर चुनाव में एग्जिट पोल किए जाते हैं। कभी सच निकलते हैं तो कभी उनके आकलन सटीक नहीं बैठते

Last Modified:
Wednesday, 22 May, 2019
Mister Media

राजेश बादल

वरिष्ठ पत्रकार

हर चुनाव में एग्जिट पोल किए जाते हैं। कभी सच निकलते हैं तो कभी उनके आकलन सटीक नहीं बैठते। देखा जाए तो इन एग्जिट पोल की सफलता का प्रतिशत क़रीब-क़रीब साठ फ़ीसदी है। जब इनके निष्कर्ष सही निकलते हैं तो तारीफ़ के पुल बाँध दिए जाते हैं। मगर जब ये अनुमान सच साबित नहीं होते तो एग्जिट पोल करने वालों के ख़िलाफ़ आसमान सर पर उठा लिया जाता है। यहां तक कहा जाता है कि एग्जिट पोल पहले ही अमुक राजनीतिक दल ने खरीद लिए थे। अचानक ही सर्वेक्षण करने वाले खलनायक की तरह देखे जाने लगते हैं। 

यह सच है कि सर्वेक्षण करने वाले सारे पत्रकार नहीं होते। जहां पेशेवर एजेंसियों को अनुबंधित किया जाता है, उनके अपने प्रोफेशनल होते हैं। एजेंसियां उन्हें प्रशिक्षित करती हैं। इसके बाद ही वे सर्वेक्षण करते हैं। इनमें मीडिया संस्थानों से निकले छात्र भी होते हैं और अन्य नौजवान भी। जब ये पेशेवर  लोगों के बीच जाते हैं तो कुछ बिंदुओं पर वे एक रोबोट की तरह फॉर्म भराते हैं और अपने संस्थान को दे देते हैं। एक कम्प्यूटर में इन सारे नमूनों को संयोजित किया जाता है। फिर उनका निष्कर्ष निकाल कर संबंधित चैनल ,समाचारपत्र या अन्य माध्यमों को भेजा जाता है। यह त्रुटिपूर्ण है।

पेशेवर सर्वेक्षणकर्ता का उद्देश्य दरअसल उन बिंदुओं पर एक प्रामाणिक फॉर्म अपने दफ़्तर में जमा कराना होता है। एक पत्रकार की तरह ख़बर निकालने की स्वाभाविक कला का इसमें कोई इस्तेमाल नहीं किया जाता। इन दिनों मतदाता अपेक्षाकृत अधिक जागरूक है और सतर्क रहता है। आप सोच सकते हैं कि एक नौजवान किसी मतदाता से जब पूछेगा कि वह किसको वोट देगा तो क्या वह सौ फीसदी ईमानदारी भरा सच उत्तर देगा। अगर आप ऐसा सोचते हैं तो माफ़ कीजिए आप भ्रम में हैं। इसलिए असत्य उत्तरों के आधार पर किया गया सर्वेक्षण सत्य कैसे हो सकता है? 

क़रीब पंद्रह-सोलह साल पहले की बात है। मैं एक चैनल में संपादक था। ऐसे ही एक एग्जिट पोल का अनुबंध चैनल की ओर से एक बड़ी एजेंसी को दिया गया। जब उस एजेंसी ने एग्जिट पोल के कुछ बिंदुओं पर सांसद का रिपोर्ट कार्ड दिखाना शुरू किया तो हम लोग हैरान रह गए। उस सर्वेक्षण में ऐसे ऐसे उत्तर पाए गए, जो किसी भी रूप में सच नहीं हो सकते थे। तब एजेंसी से हम लोगों ने भरे हुए नमूना फॉर्म मँगाए। इसके बाद नागपुर के कुछ लोगों को चुना, जिनके नाम से वे सर्वेक्षण फॉर्म भराए गए थे। हमारे संवाददाता उन लोगों से मिले तो हैरान रह गए। एग्जिट पोल करने वाली एजेंसी के प्रोफेशनल उनके पास गए ही नहीं थे। कहीं से नाम -पते लेकर उन सर्वेक्षकों ने ये फॉर्म भर दिए थे। इसके बाद तो हड़कंप मचा। एजेंसी के बिलों से लाखों रूपए हमें काटने पड़े।

इसी तरह एक अन्य एजेंसी में पत्रकारिता के छात्रों को इंटर्नशिप और उसके बाद नौकरी का अवसर मिला। उनमें से कुछ मेरे छात्र रह चुके थे। एक दिन परेशान छात्र मेरे पास आए।  उन्होंने जो जानकारी दी ,वह चौंकाने वाली थी। एजेंसी ने शहरों में भेजकर अपने सेम्पल सर्वे तो कराए, लेकिन जब चैनल ने उस एजेंसी के निष्कर्ष दिखाए तो छात्र हैरान रह गए। वे निष्कर्ष उलट थे। जिस दल की सरकार बनती दिखाई गई ,वह हार गया और जो दल हार रहा था, उसकी सरकार बन गई। मैंने उन छात्रों से सहानुभूति दिखाई और कहा कि अगर वे कुछ समय बेरोज़गारी बर्दाश्त कर सकते हैं तो फ़ौरन एजेंसी छोड़ दें। छात्रों ने ऐसा ही किया।

जब मैंने पत्रकारिता शुरू की तो  अगले साल ही 1977 के आम चुनाव थे। उन दिनों एग्जिट पोल की कोई परंपरा नहीं थी। न टेलीविज़न था और न निजी रेडियो। जिस अखबार का मैं संवाददाता था, उसके समाचार संपादक ने एक दिन बुलाया और चुनाव कवर करने के अनेक नए नए तरीक़े बताए। उनमें से एक मतदाताओं के दिल की थाह लेने की विधि भी थी। इससे आप जान सकते थे कि वह मतदाता किसको वोट दे सकता है। हम नए पत्रकारों ने वह गांठ बाँध ली।  तब से वही काम आ रही है। हालांकि बाद में नई दुनिया और नवभारत टाइम्स में प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर ने कुछ मार्गदर्शक सिद्धांत तथा चुनाव कवरेज के कुछ गुर सिखाए। वे भी आज तक काम आ रहे हैं। लेकिन आजकल शायद इस तरह का प्रशिक्षण देने वाले संपादक कम ही नज़र आते हैं। मैं तो जहां भी अवसर मिलता है, छात्रों को बताने से नहीं चूकता।      

अनेक चैनलों में इस बार इन आकलन अनुमानों पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। वैसे कुछ समाचार चैनलों ने अतीत के अनुभवों से सीखते हुए अपने संवाददाता नेटवर्क की मदद से अपने स्तर पर ही ये एग्जिट पोल कराए हैं। मुझे लगता है कि यह एक बेहतर तरीक़ा हो सकता है। बशर्ते संवाददाताओं  को पूरी तरह प्रशिक्षण दिया जाए।  लोकतंत्र के इस बेहद गंभीर अनुष्ठान को हल्के फुल्के ढंग से नहीं ले सकते मिस्टर मीडिया! 

 

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यदि सारे एग्जिट पोल गलत निकल गये तो क्या जवाब देंगें ये टीवी पत्रकार

19 तारीख की शाम 4 बजे से एग्जिट पोल का खेल शुरू हो गया है

Last Modified:
Wednesday, 22 May, 2019
EXIT POLL

निर्मलेंदु 
वरिष्ठ पत्रकार

19 तारीख की शाम 4 बजे से एग्जिट पोल का खेल शुरू हो गया है। बीजेपी के खेमे में एग्जिट पोल के नतीजों पर ढोल बजना शुरू हो गया है। उसके बाद न केवल मेनस्ट्रीम मीडिया में, बल्कि सोशल मीडिया में भी इसकी खूब आलोचना हो रही है। 

एग्जिट पोल पर मजे ले रहा है सोशल मीडिया। सुगम शर्मा नाम के ट्विटर यूजर लिख रहे हैं, चाणक्य ने अपने एग्जिट पोल में एनडीए को इतनी सीटें दे दी हैं कि उससे पीएम की कुर्सी के अलावा सेंटर टेबल, डाइनिंग टेबल, बुक शेल्फ, टीवी कैबिनेट और मंझले साइज के 2 स्टूल भी बन सकते हैं...। वहीं दूसरी ओर एक ट्विटर यूजर कैलाश चैधरी ने लिखा, ये जो एग्जिट पोल आ रहे हैं, वे बिल्कुल अखबार में आई राशिफल के समान है, जो कुंवारों को भी संतान प्राप्ति करा देते हैं। यदि एग्जिट पोल को बोतल में से निकला जिन्न है, जो चुनावी नतीजे उलट जाते ही वापस बोतल में चला जाता है, तो शायद गलत नहीं होगा। कोई इसे मोदी सरकार की मीडिया बता रहा है, तो वहीं ज्यादातर चैनलों में यही दिखाया जा रहा है कि इस पोल के मायने क्या हैं। कुछ लोग ये सवाल भी कर रहे हैं कि क्या ये एग्जिट पोल विश्वसनीय हैं। ऐसे में सवाल ये भी उठ रहे हैं कि यदि सारे एग्जिट पोल गलत निकल गये तो... 

मेरा भी यही सवाल चैनल्स और अखबारों से है कि जो आंकड़े एग्जिट पोल्स में दिखाये गये हैं, वे यदि 23 मई को बदल गये और उल्टा हो गया, तो क्या होगा, तो क्या उन पत्रकारों को उल्टा टांग दिया जाएगा, जिन्होंने ऐसी खबरें परोसी हैं। जिन अखबार वालों, चैनल्स और पत्रकारों ने दिन रात मेहनत करके एग्जिट पोल को 19 तारीख तक लोगों तक पहुंचाया, वाहवाही लूटी, एक दूसरे का पीठ थपथपायी, एक दूसरे को बधाइयां दी, जनता को यह अहसास दिलाने की कोशिश भी की कि वे सर्वश्रेष्ठ पत्रकार हैं, उनके आंकड़े गलत नहीं हो सकते, तो जब उनके बारे में सोचता हूं, तो पीड़ा होती है कि उनकी मेहनत बेकार चली जाएगी, यदि ये सब गलत साबित हो गये तो। 

अब सवाल यह है कि यदि एग्जिट पोल के आंकड़े उलट जाते हैं, तो क्या ये सभी पत्रकार जनता से अपनी गलती के लिए माफी मांगंगे या फिर चुनाव आयोग इन पत्रकारों के खिलाफ कोई ऐक्शन लेगा। इन्हें इस बात का अहसास हो कि इनकी जनता और देश के प्रति एक नैतिक जिम्मेदारी है, जो ये नहीं निभा पा रहे हैं। 

मेरे हिसाब से एग्जिट पोल्स की यह परंपरा ही हटा देना चाहिए। चुनाव आयोग इस बात पर गौर करे। वैसे पूर्व राष्टपति ने भी चुनाव आयोग पर उंगली उठाई है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग पर जनता का विश्वास नहीं टूटना चाहिए। ऐक्शन लेना होगा। चुनाव आयोग से प्रणब मुखर्जी ने कहा कि ईवीएम की सुरक्षा जरूरी है। ऐसा करने से लोगों में भ्रम पैदा नहीं होगा और चैनल्स एवं अखबारवाले भी आराम की नींद सोएंगे। दरअसल, अखबार और चैनल्स वालों को सोने के लिए वक्त नहीं मिलता, परिवार को घुमाने के लिए वक्त नहीं मिलता, दोस्तों के साथ चाय पकौड़े खाने का वक्त नहीं मिलता, मां और बाबूजी से बतियाने का वक्त नहीं मिलता और न ही अपने बच्चों को एक दिन स्कूल छोड़ने का वक्त मिलता है, तो उन पत्रकारों को भरपूर वक्त मिलेगा। इस दौरान वे न वे किसी का कुछ खाएंगे, न किसी को खाने देंगे।

खबर यही है कि एग्जिट पोल में मिली खुशी के कारण बीजेपी खेमें में लड्डू बंट रहे हैं। बिहार से यह खबर आई है कि 301 किलो लड्डू का ऑर्डर दे दिया गया है। हालांकि एग्जिट पोल की आंधी में बीजेपी के लिए एक बुरी खबर आई है। खबर यह है कि बीजेपी ने एग्जिट पोल में बड़े घपले किये हैं और इस घपले के निशान बीजेपी छुपा नहीं पाई। दो ट्रक ईवीएम सहित हरियाणा में पकड़े गये हैं। हम सब जानते हैं कि पाप का घड़ा जब भर जाता है, तो वह अपने आप ही फूट जाता है। अब यदि यह कहें कि बीजेपी के हर्ता, कर्ता, विधाता के पाप का घड़ा भर गया है, तो शायद गलत नहीं होगा। खबर तो इन दिनों यही आ रही है कि बीजेपी का सूपड़ा लोकसभा के इस चुनाव में साफ हो जाएगा। जीत की खुशी के बावजूद बीजेपी में खलबली मची हुई है। इन दिनों यह भी कहा जा रहा है कि मोदी के सिपहसालारों ने सर्वे एजेंसियों से कहा था कि बीजेपी के पक्ष में सर्वे दिखाया जाए और साथ ही सूत्रों से यह खबर भी आ रही है कि इसके बदले में न्यूज एजेंसियों को मोटी रकम मिली है। 

कांग्रेस के दिग्गज नेता राशीद अल्वी ने भी कई सवाल खड़े किये हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सर्वे में मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जीत इसलिए दिखाया गया, ताकि लोग यह कहें कि ईवीएम में कोई गड़बड़ी नहीं है। राशीद अल्वी ने इसे साजिश करार दिया है। बता दें कि बीजेपी को 300 सीट दिलाने वाला यह वही मीडिया है, जिसने बालाकोट में मरने वालों की संख्या 300 बताई थी। दरअसल, इन तथाकथित पत्रकारों के कारण देश दो ध्रुवों में बंट गया है। एक तरफ मोदी के प्रशंसक हैं, तो दूसरी ओर उनके आलोचक। देश को बांटने का काम ये तथाकथित पत्रकार ही कर रहे हैं।

लोकतंत्र में पत्रकार, पत्रकारिता, सरकार और कॉरपोरेट घरानों का बहुत बड़ा महत्व होता है। लोकतंत्र में पत्रकार और पत्रकारिता दोनों की ही महत्वपूर्ण भूमिका होती है। समाज में आई गिरावट का पत्रकारिता पर भी प्रभाव पड़ता है, हालांकि अभी भी हमारे कुछ पत्रकार साथी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद पत्रकारिता को गौरवान्वित कर सार्थकता प्रदान कर रहे हैं। कुछ पत्रकार तो ऐसे भी हैं, जिन पर केंद्र सरकार ने बहुत दबाव डाला कि केंद्र पर हमला न करें, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। मुकाबला करना बेहतर समझा, झुके नहीं, हारे नहीं। इस श्रेणी में रवीश कुमार, पुण्य प्रसून वाजपेयी, करण थापर, विनोद दुआ, अजीत अंजुम, आशुतोष, अभिसार शर्मा जैसे वरिष्ठ पत्रकार शामिल हैं। हमें यह याद रखना होगा कि व्यक्ति अपने गुणों से उपर उठता है, उंचे स्थान पर बैठने से नहीं। 

लेकिन एक सच यह भी है। आजकल पत्रकारिता सरकार के विवेक पर नहीं, बल्कि संपादक की इच्छा पर तथा संपादक की इच्छा सरकार की इच्छा पर आधारित होती जा रही है। सरकार चाहे, तो वे पत्रकार बना रहे, सरकार नहीं चाहेगी, तो उसे संस्थान छोड़ना होगा। सरकार के विरुद्ध लिखना और चैनलों में दिखाना अपराध जैसा हो गया है। इस अपराध का दंड भी मिलता है। अब पत्रकारों पर कड़ी नजर रखी जाती है कि वह कहां जा रहा है और किससे मिल रहा है। विरोधियों को अखबार और चैनल्स में कितना स्पेस मिलता है, इसकी भी स्क्रूटिनी लगातार सरकार करती रहती है। अगर सरकार के खिलाफ किसी चैनल ने ज्यादा कुछ दिखा दिया, तो उसे कटघरे में लाकर खड़ कर दिया जाता है। उस चैनल पर तरह तरह से दबाव पड़ने लगता है। दरअसल, आज के तथाकथित चैनल मालिक चैनल के कन्टेंट पर अपनी पकड़ बनाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, क्योंकि उनके ऐसे कदम पर मीडियाकर्मियों या उनके संगठनों की तरफ से प्रतिरोध नाममात्र का ही होता है। विडंबना तो यही है कि न तो काॅरपोरेट घरानों और न ही उनके नुमांइदे बने संपादकों को अब काॅन्टेंट से ज्यादा कुछ लेना देना रह गया है और न ही सच्चाई से। इसी वजह से पत्रकारिता अब एक नौकरी का रूप धारण कर चुकी है। या तो संपादक गायब हो चुके हैं, या फिर उनमें संपादकीय शक्ति का क्षरण हुआ है। आश्चर्य की बात तो यही है कि दूसरों के लिए आवाज उठानेवाले पत्रकार आज अपने ही संस्थानों में शोषित और दमित हैं। उनकी आवाज दबा दी जाती है। सरकार के रहमो करम पर नौकरी कर रहे हैं कुछ तथाकथित पत्रकार। जरूरत से ज्यादा सैलरी देकर कुछ पत्रकारों को खरीद लिया जाता है। वे वही दिखाते हैं, जो सरकार चाहती है। पत्रकारों पर दबाव डाल कर सरकार जिस तरह से इस बिरादरी को नुकसान पहुंचा रही है, वह देखकर ऐसा महसूस होता है कि आने वाले समय में सरकार को आईना दिखाने वाला कोई नहीं होगा। हालांकि इससे सरकार को ही नुकसान होगा, क्योंकि सरकार को भले काम में और बुरे काम में कोई फर्क महसूस नहीं होगा। 

दरअसल, पत्रकारिता पर व्यवसाय के हावी होने के कारण ही बाजार में बिकनेवाली आम सामग्री की तरह समाचार भी अब एक सामग्री बनकर रह गया है। हैरानी तो इस बात की है कि न केवल अखबार, बल्कि न्यूज चैनल्स भी अब दूसरों को प्रचार देने के बजाय खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने में लगे हुए हैं। ऐसे में यदि यह कहें कि बाजारवाद की दुहाई ज्यादातर पत्रकार जी हुजूरी में लग गये हैं, तो शायद गलत नहीं होगा।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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‘वर्ना कहीं तो सजेगी ही स्ट्रिंगर्स की दुकान’

स्ट्रिंगर्स को पैसा नहीं देने के मामले में नेशनल के साथ ही कई क्षेत्रीय चैनल्स भी शामिल हैं

Last Modified:
Tuesday, 21 May, 2019
Media

एक स्ट्रिंगर, बरेली।।

देश में एक से बढ़कर एक न्यूज चैनल ने दस्तक दी और एक से बढ़कर एक टैगलाइन के साथ मीडिया के क्षेत्र में प्रवेश किया| लोगों ने भी बड़ी उम्मीद के साथ नए चैनलों का साथ पकड़ा कि उन्हें अपनी मेहनत का पैसा मिलेगा, लेकिन यह सिर्फ उम्मीद बनकर रह गई|

आपको जानकर हैरानी होगी कि एक तरफ चैनल के मालिक राजनीतिक दलों से मोटा पैसा कमाते रहे, वहीं अपने स्ट्रिंगर को एक टका रुपया नहीं दिया| ऐसा नहीं कि यह देश में पहली बार हुआ, पहले भी होता रहा है, लेकिन कोई सरकार आज तक टीवी चैनल के मालिकों के खिलाफ कार्यवाही की हिम्मत नहीं जुटा सकी, आखिर उन्हें भी टीवी चैनल के मालिकों से डर लगता है| पैसा नहीं देने के मामले में नेशनल चैनल के साथ क्षेत्रीय चैनल भी शामिल हैं | मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि 100 में से 99 चैनल ऐसे होंगे जो स्ट्रिंगर से फ्री में या फिर पेमेंट देने के आश्वासन पर काम करा रहे होंगे |

अब सवाल इन चैनलों के संपादकों का उठता है कि आखिर वह चैनल में बैठकर क्या कर रहे होंगे| क्या उन्हें अपने स्ट्रिंगर और चैनल की रीढ़ कहे जाने वाले शख्स की चिंता नहीं है तो आपको बता दें उन्हें किसी की समस्या से क्या मतलब? संपादक जी को अपनी मेहनत का पैसा मिल रहा है, साथ ही साधु-संतों की तरह अच्छी बातें करने को मिल रही हैं और अगर कोई पेमेंट मांग रहा है तो उनके पास बाहर का रास्ता दिखाने का अधिकार भी है। इस अधिकार को वे जब चाहें, तब प्रयोग कर लेते हैं|

अब सवाल उन स्ट्रिंगरों का आखिर कि वह अपने परिवार की जिम्मेदारी कैसे निभाएं तो उन्होंने भी इसका थोड़ा सा इंतजाम कर लिया है। कहीं से कुछ दाल-दलिया मिल गया तो बेहतर, वर्ना उनकी दुकान कहीं तो सजेगी ही| अब समाज भी यह बात समझ गया है आखिर मीडिया को बिकाऊ मीडिया का तमगा क्यों मिला है| मेरी मालिकान से गुजारिश है कि अपनी ‘लेबर’ का भुगतान करें, नहीं तो लाखों उन स्ट्रिंगरों की हाय आपको सुनामी की गति से तेज उड़ाकर ले जाएगी| फिर नहीं बचेगा आपका साम्राज्य|

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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Exit Poll तो आपने खूब देख लिए, अब पढ़िये ये मजेदार विश्लेषण

चुनाव को लेकर सोशल मीडिया पर भी क्रिएटिविटी की बहार

Last Modified:
Monday, 20 May, 2019
Pramia Dixit

प्रमिला दीक्षित

वरिष्ठ पत्रकार

‘शुरू करो एक्ज़िट पोल, लेकर प्रभु का नाम, समय बिताने के लिए करना है कुछ काम....म...म से। म से मोदी.....द से दोबारा मोदी! कुछ भी कर लो, लेकिन आएगा तो मोदी ही! कुल मिलाकर इसी थीम पर हर एग्ज़िट पोल ने नतीजा दिखाया. अब चूंकि बात एक ही है और एक्सक्लूसिव या सबसे पहले भी कहलानी है, सो हर चैनल ने अपना-अपना कोडवर्ड अलग रखा। ‘आजतक’ ने उसे सबसे चौंकाने वाले नतीजे कहा, ये अलग बात है पिछले दिनों ‘आजतक’ के तेवर जो रहे हैं, वो खुद ही इससे चौंक गए होंगे। लेकिन भव्य सेट से एकदम संजय लीला भंसाली टाइप माहौल कैसे तानना है ‘आजतक’ जानता है, इसीलिए कभी मैदान में दौड़ते घोड़े और कभी सुपर मारियो की तर्ज़ पर कूदकर आते राहुल-मोदी के कार्टून, एग्ज़िट पोल में दिलचस्पी न रखने वालों को भी थोड़े समय तो बाँध ही रहे होंगे।

इलेक्शन मतलब ‘एबीपी न्यूज़’ कहने वाले ‘एबीपी’ ने भी विशेषज्ञों की अलग-अलग रेजींमेंट बुला रखी थी और काउंट डाउन चलाकर ठीक छह बजे दर्शकों के लिए कूच कर दिया। एबीपी ने चुनाव नतीजों और कवरेज में पिछले कई वर्षों में एक पहचान ज़रूर बनाई है, लेकिन हाल-फ़िलहाल उसका वही हमेशा वाला फ़ॉर्मैट अब थोड़ा उबाने लगा है।

‘एनडीटीवी’ को आप लाख बायस्ड समझें, लेकिन उन्होंने अपने अलावा हर चैनल का एग्ज़िट पोल दिखाया, बीच-बीच में-ये नतीजे नहीं हैं, कहकर मरहम भी लगातार लगाया। रवीश कुमार हमेशा की तरह मोदी के साथ गोदी पर पूरा ज़ोर दिए रहे, ये कहकर कि अगर नतीजे वैसे ही आते हैं, जैसे एग्ज़िट पोल हैं तो कुछ एंकर्स और मीडिया मालिकों को भी मंत्री पद दिया जाना चाहिए। अगर यही रवायत रहनी है तो तैयार रहिए, कुछ एंकर राहुल गांधी के बग़ल में बैठकर विपक्ष की प्रेस कांफ्रेंस भी करते दिखाई दिया करेंगे।

आज फिर ‘ज़ी’ ने की तमन्ना है। कहते हैं किसी नतीजे को दिल से चाहो तो सारे एग्ज़िट पोल उससे मिलाने में जुट जाते हैं, ‘जी’ देखकर कुछ ऐसा ही फ़ील आ रहा था, जहाँ चैनल का पूरा ज़ोर अपना एग्ज़िट पोल दिखाने से ज़्यादा दूसरों के एग्ज़िट पोल का DNA टेस्ट करने के प्रचार पर था।

‘आजतक’ के घोड़े जब तक दौड़ते, ‘रिपब्लिक भारत’ सरकार बना चुका था और शान से ‘तक वाले चैनल कहां रह गए’  कह-कहकर नंबर वन या गुप्त दौड़ के लिए अपना दावा पेश करता रहा। ‘न्यूज़ नेशन’ ने दीपक चौरसिया के आने के बाद एक बार फिर से मार्केट में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश की है। वैसे भी प्रधानमंत्री का जो इंटरव्यू सबसे ज्यादा रडार पर रहा, वो दीपक चौरसिया ने ही लिया था।

बाकी रही राहुल गांधी के इंटरव्यू की बात, मेरा पर्सनल फेवरेट वो ‘आँखों की ग़ुस्ताख़ियां माफ हों’ वाला था। ख़ैर मोदी जी की माया मोदी जी ही जानें। हर चरण के लिए उनके तरकश में नया तीर था। आख़िरी में उन्होंने साधना से जो साधा है, उन्हें ‘ द मॉन्क हू ध्वस्त एवरीबडीज़ तैयारी’ का ख़िताब तो बनता ही है।

पूजा अर्चना की इन विधियों और प्रणालियों का इतिहास में भी महत्व रहा है, फ़ौरन सोशल मीडिया पर इसके सुबूत मिल गए। सुबूत से याद आया, सोशल मीडिया पर अरविंद केजरीवाल का ‘मौत से डर लगता है साहब’ टाइप बयान  ‘मोदी जी मुझे मरवाना चाहते हैं’ बहुत चर्चा में रहा। ये अलग बात है कि इस बयान की मौज सबने ली, संज्ञान किसी ने नहीं लिया।

एग्ज़िट पोल से भक्तों में उत्साह है और उन पत्रकारों में रोष और दुख, जिन्हें राहुल गांधी अपनी ओर से नरेंद्र मोदी की प्रेस कांफ़्रेंस में भेजना चाहते थे। इंडिया शाइनिंग के जले इस एक्ज़िट पोल पर फूंक-फूंक के प्रतिक्रिया दे रहे हैं, हालांकि खुशी फिर भी छिपाए नहीं छुप रही।

सोशल मीडिया पर क्रिएटिविटी की बयार है। लोग कह रहे हैं हलवाई सौ प्रतिशत एडवांस पेमेंट पर ही कांग्रेसियों के लड्डू का आर्डर ले रहे हैं। मेरी तो सलाह है पार्टियां लड्डू की बजाय पटाखे ले लें। जीत गए तो कांफिडेंस के साथ कह सकते हैं ‘हम अपनी जीत के लिए आश्वस्त थे’ वरना वर्ल्ड कप तो नज़दीक है ही!

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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वरिष्ठ पत्रकार अमर आनंद ने उठाया सवाल, आखिर क्या था पीएम की इस भाव भंगिमा के पीछे का राज?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी प्रेजिडेंट अमित शाह ने शुक्रवार को की थी प्रेस कांफ्रेंस

Last Modified:
Saturday, 18 May, 2019
Amar Anand

अमर आनंद, वरिष्ठ पत्रकार।।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर एक भी प्रेस कांफ्रेंस नहीं करने के आरोप लगते रहे हैं तो लीजिए उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस कर दी, लेकिन एक तरह से नहीं भी की। नरेंद्र मोदी जिस प्रेस कांफ्रेंस में बैठे और मीडिया से बात करते नजर आए, उस प्रेस कांफ्रेंस को बीजेपी ने किया। पार्टी अध्यक्ष की हैसियत से अमित शाह द्वारा आयोजित इस प्रेस कांफ्रेंस में नरेंद्र मोदी महज एक संबोधन के लिए मौजूद रहे और इस आरोप को झुठलाने के लिए भी कि उन्होंने अब तक कोई प्रेस कॉफ्रेंस नहीं की है। यहां तक कि प्रज्ञा ठाकुर और गोडसे को लेकर किए गए ‘आजतक’ की पत्रकार अंजना ओम कश्यप के सवाल को भी खुद को पार्टी का अनुशासित सिपाही बताते हुए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की तरफ मोड़ते नजर आए। ये सच है नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री की हैसियत से इस प्रेस कांफ्रेंस में हिस्सा नहीं लिया, बल्कि वो यहां पीएम उम्मीदवार की हैसियत से नज़र आ रहे थे।

प्रधानमंत्री ने इस मौके पर मेरठ से एमपी तक अपने चुनाव अभियानों की चर्चा की और उसे 1857 की क्रांति से भी जोड़ा। जनता का पूरा मिजाज भी बताया, जनता और मीडिया को धन्यवाद भी दिया और ये उम्मीद भी जताई वो फिर से वापस आने वाले हैं और वो भी अपने दम पर। नरेंद्र मोदी की पार्टी भी पूरे आत्मविश्वास के साथ 300 का आंकड़ा पार होने के दावा कर रही है और नए सहयोगियों पर उनकी निगाह भी है। बाद में अमित शाह पत्रकारों के सवालों के जवाब में ये भी कह रहे हैं दोनों को नहीं जोड़कर नहीं देखना चाहिए। हम बेशक जीतेँगे और एनडीए की सरकार बनेगी, लेकिन इसके बावजूद हमारी नीतियों के साथ कोई चलना चाहे तो वो आ सकता है और उसका स्वागत है।

प्रेस कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके पार्टी अध्यक्ष जीत की जिस लैंग्वेज का इस्तेमाल कर रहे थे, वो मोदी जी की बॉडी लैंग्वेज यानी भाव भंगिमाओं में गायब दिखी। खुद मोदी जी ने कहा कि पूरे उमंग और उत्साह से चुनाव अभियान को अंजाम दिया और वो आज भी उसी उमंग और उत्साह से मीडिया के बीच मौजूद हैं, लेकिन ऐसा लोगों को नजर क्यों नहीं आया। पूरी प्रेस कांफ्रेंस के दौरान नरेंद्र मोदी ने मीडिया सें तकरीबन 12 मिनट 12 सेकेंड तक बात की और इसके ठीक बाद पानी पीया। इस बीच बामुश्किल एक-दो बार उनके चेहरे पर मुस्कुराहट आई होगी। ज्यादातर समय वो चिंतातुर नजर आए और मीडिया के सवालों को सुनते और उनके जवाब के लिए अमित शाह की ओर देखते नजर आए। यहां तक कि उन्होने खुद से पूछे गए सवाल का भी जवाब देना जरूरी नहीं समझा।

सवाल ये उठते हैं कि क्या नरेंद्र मोदी की चुनाव प्रचार की थकान उनके चेहरे पर हावी थी या कोई ऐसे संकेत का अक्स उनके चेहरे पर नजर आ रहा था, जो उनके लिए और पार्टी के लिए उत्साहजनक नहीं था। क्या मोदी की भाव-भंगिमाओं को ‘इंडिया टुडे’ के लीक हुए ओपिनियन पोल से जोड़कर देखा जाना चाहिए, जिसमें एनडीए को महज 177 सीटें दी गई हैं या फिर नागपुर से कोई ऐसे संकेत देने की कोशिश की जा रही हो, जिसमें ये 'अबकी बार किसकी सरकार?' का संदेश साफ नजर आ रहा हो। चुनाव नतीजों से पहले बहुत सी बातों का सिर्फ कयास ही लगाया जा सकता है। इन बातों पर चुनाव परिणाम के बाद ही सब कुछ साफ-साफ नजर आएगा।

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रवीश कुमार ने किया कटाक्ष- पीएम इस 'कबाड़' को देखने आए थे, सवालों के जवाब देने नहीं

शुक्रवार को हुई प्रेस कांफ्रेंस में नरेंद्र मोदी ने एक भी सवाल का नहीं दिया जवाब

Last Modified:
Saturday, 18 May, 2019
Ravish Kumar

ख़ान मार्केट गैंग नहीं है, गैंग है तो मोदी का मीडिया सिस्टम है

जगह-जगह पहली बार पहुंचने का इतिहास बनाने के शौक़ीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पार्टी के मुख्यालय में ही पहली बार का इतिहास बना दिया। प्रधानमंत्री के नाम पर हुई प्रेस कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री ने एक भी सवाल का जवाब नहीं दिया। यह पहली बार हुआ है। यह भी पहली बार हुआ कि दर्शकों ने प्रधानमंत्री मोदी को 22 मिनट तक चुप देखा और 22 मिनट तक दूसरे को सुनते देखा। अमित शाह 22 मिनट तक बोलते गए। लगा कि अमित शाह जल्दी माइक प्रधानमंत्री को सौंप देंगे और सवाल-जवाब का सिलसिला शुरू होगा।

अमित शाह ऐसा कुछ भी नहीं बता रहे थे जो भाजपा कवर करने वाले पत्रकारों को पता नहीं था। जो जानकारियां चुनाव शुरू होने से पहले की थीं, उसे ख़त्म होने के बाद बता रहे थे। प्रधानमंत्री इस तरह से सुन रहे थे जैसे उन्हें भी पहली बार पता चल रहा हो। इस तरह इंटरव्यू के बाद दोनों ने प्रेस कांफ्रेंस की गरिमा भी समाप्त कर दी। बता दिया कि प्रधानमंत्री दिख रहे हैं आपके सामने, यही बहुत है और यही न्यूज़ है। चैनलों पर चला भी कि यह प्रधानमंत्री की पहली प्रेस कांफ्रेंस है। पांच साल में उन्होंने एक भी प्रेस कांफ्रेंस नहीं की। कांफ्रेंस हॉल में प्रधानमंत्री का दिखना अब प्रेस कांफ्रेंस कहलाएगा। हिंदी में इसे प्रेस-दर्शन कहा जाएगा।

इस प्रेस कांफ्रेंस में प्रेस प्रधानमंत्री को कवर करने गया था, लेकिन अमित शाह प्रधानमंत्री को कवर करने आए थे। अमित शाह ने पहले 22 मिनट और बाद में 17 मिनट बोलकर प्रधानमंत्री को ख़ूब कवर किया। अपने नोट्स से लगातार 22 मिनट तक बोलकर उन्होंने बता दिया कि उनके दिमाग़ में राजनीति की रेखाएं कितनी स्पष्ट हैं। उन्होंने राजनीति को निर्जीव बना दिया है, जिसमें सिर्फ संख्या प्रमुख है। अमित शाह ख़ुद को प्रमाणित कर रहे थे कि उन्होंने एक अच्छे प्रबंधन की भूमिका निभाई है। जिस तरह से बूथों की संख्या गिना रहे थे, मुझे उम्मीद हो गई थी कि वे शामियानों और उनमें लगी बल्लियों की संख्या भी बता देंगे। पंखे कितने लगे और कुर्सियां कितनी लगीं, ये भी बता देंगे। मैं थोड़ा निराश हुआ। उन्होंने यह नहीं बताया कि प्रधानमंत्री की सभाओं में गेंदे की माला पर कितना ख़र्च हुआ।

अमित शाह जो जानकारी दे रहे थे, वो नई नहीं थीं। भाजपा कवर करने वाले पत्रकार यही सब तो रिपोर्ट करते रहे हैं। पार्टी के भीतर की कब आपने कोई बड़ी ख़बर देखी। कब आपने देखा कि पत्रकारों ने अपनी तरफ से सवालों की बौछारें कर दी हों। मोदी-शाह के कार्यकाल में क्या आपको भाजपा की एक भी प्रेस कांफ्रेंस याद है, जिसमें सवालों की बौछार हुई है। जो काम पांच सालों से बंद पड़ा था वो अचानक कैसे शुरू हो जाता। बीजेपी ने अपने पत्रकारों को रैलियों की संख्या और उनका विश्लेषण करने वाले संपादक में बदल दिया है। 17 मई को लगा कि अमित शाह उन पत्रकारों की कापी चेक कर रहे हैं कि जो बताया है वो ठीक से याद है कि नहीं। नहीं याद है तो फिर से सुनो। भाव ऐसा था कि आप लोगों को पता ही नहीं चला कि हमने चुनाव कैसे लड़ा। मोदी ने भी कहा कि हम बहुत पहले से तैयारियां करते हैं। आपको पता नहीं चलता है। इस तरह दोनों ने औपचारिक और सार्वजनिक रूप से प्रमाणित किया कि आप भाजपा कवर तो करते हैं लेकिन भाजपा के बारे में ख़बर नहीं रखते, क्योंकि ख़बर तो हम देते नहीं हैं।

जैसे इम्तिहान में फेल होने पर मास्टर लेक्चर देता है कि छुट्टियों में किताबें पढ़ लेना, उसी तरह प्रधानमंत्री ने रिपोर्टिंग में फेल पत्रकारों को लेक्चर दिया कि बाद में रिसर्च कर लेना कि हम चुनाव कैसे लड़ते हैं। साफ-साफ कह रहे थे कि आप किस बात के पत्रकार हो, हमने आपको कुछ भी ख़बर नहीं लगने दी। प्रधानमंत्री ने जिस प्रेस को ख़त्म कर दिया है, उसे कंफर्म किया कि ये पूरी तरह कबाड़ में बदला है या नहीं। 17 मई को प्रधानमंत्री उस कबाड़ को एक कमरे में देखने आए थे न कि उसके सवालों का जवाब देने।

प्रधानमंत्री 12 मिनट बोले। सट्टा बाज़ार से लेकर कुछ भी कि चुनाव के समय आईपीएल भी हुआ, रमज़ान भी हुआ और हनुमान जयंती भी हुई। पत्रकार भी कंफ्यूज़ हो गए कि यह सब मोदी सरकार करा रही थी। चुनाव तो पहले भी हुए और पहले भी चुनावों के दौरान इम्तिहान से लेकर रमज़ान तक हुआ होगा। 17 मई को मोदी शाह ने साबित किया कि उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस को ही ख़त्म कर दिया है तो करें क्या। वे प्रेस-डिक्टेशन करते हैं, कांफ्रेंस नहीं करते हैं। हैरानी की बात यह है कि सवाल न पूछे जाने की पूरी गारंटी के बाद भी प्रधानमंत्री ने सवालों को प्रोत्साहित नहीं किया।

पांच साल पहले मोदी की यात्रा को याद कीजिए। उन्होंने यकीन दिलाया था कि वे बोलने वाले प्रधानमंत्री हैं। वे मौन-मोहन नहीं हैं। किसी की बोलने की क्षमता का मज़ाक उड़ाया गया। कहा गया कि मनमोहन लिखा हुआ भाषण पढ़ते हैं। दस जनपथ से जो लिख कर आता है, वही पढ़ते हैं। धीमे-धीमे पढ़ते हैं। पांच साल ख़त्म होते होते देश ने देखा कि हमने बोलने वाला प्रधानमंत्री मांगा था, मगर मिला बड़बोला प्रधानमंत्री। उनके जवाब के मज़ाक उड़े। बादल और रडार से लेकर डिजिटल कैमरा और ईमेल के जवाब से साबित हुआ कि प्रधानमंत्री कुछ भी बोलते हैं। यही नहीं, देश ने यह भी देखा कि प्रधानमंत्री लिखा हुआ भाषण पढ़ते हैं। उनकी रैलियों में टेलिप्राम्टर लग गया। यकीन जानिए कि यह टेलिप्राम्टर अगर मनमोहन सिंह लगाकर बोलते या राहुल गांधी तो मीडिया रोज़ इस पर बहस करता और आप रोज़ इसकी चर्चा करते। मगर मीडिया ने आपको सिखा दिया है कि कैसे मोदी की कमज़ोरी को ताकत और उनके झूठ को सत्य समझना है।

जो लोग प्रेस कांफ्रेंस में अमित शाह और मोदी की देह-भाषा की अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं, उन्हें अपनी समझ ताज़ा कर लेनी चाहिए। दोनों ने कहा कि 300 सीटें आएंगी। दोनों को मतलब शपथ लेने और सरकार बनाने से है। सवालों और जवाब से नहीं है। किसी को यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि 22 मिनट बोलकर अमित शाह प्रधानमंत्री मोदी के बॉस हो गए हैं। इन दोनों के बीच वर्चस्व की लड़ाई देखने वाले इनके रिश्तों की गहराई नहीं जानते। प्रधानमंत्री भरी सभा में इस तरह से अपने वर्चस्व की हार का लाइव टेलिकास्ट कराने नहीं आएंगे। आइये, देखिए, अमित शाह ने मोदी को जवाब नहीं देने दिया। अमित शाह का युग शुरू हो रहा है। मोदी का युग जा रहा है। थोड़ा सब्र रखिए। ऐसा कुछ नहीं होगा। नरेंद्र मोदी को लालकृष्ण आडवाणी समझने की भूल न करें। अमित शाह को नरेंद्र मोदी समझने की महाभूल कभी न करें। मोदी का मन किया होगा कि आज अमित शाह 22 मिनट बोलकर दिखाएंगे। वही सवालों के जवाब देंगे।

मोदी और मीडिया की समझ बहुत ज़रूरी है। जैसे दिल्ली में सल्तनत कायम करने के लिए बल्बन सज़दा और पायबोश की फ़ारसी परंपरा ले आया था, वैसे ही कांग्रेसी राज को सल्तनत कहने वाले मोदी ख़ुद भी बादशाही मिज़ाज के शिकार हो गए। बल्बन ऊंचाई पर बैठता था। उसके दरबार में आने वाला सर झुका कर सलाम करता था। दूरी और ऊंचाई की रेखा उसने साफ साफ खींच दी थी। उसी तरह से मीडिया को लेकर एक मोदी सिस्टम कायम हुआ। इस मोदी सिस्टम में दूरी की अपनी जगह है। आप प्रधानमंत्री के सारे इंटरव्यू देखिए। उसमें दूरी और भव्यता का भाव दिखेगा। उनके दफ्तर का सेट एक सा होता है। कुर्सियां कभी इस तरफ होती हैं तो कभी उस तरफ, मगर सवाल पूछने वाला एक ख़ास दूरी पर बैठा होता है। हर इंटरव्यू का फ्रेम और शॉट एक सा होता है।

मैं नहीं जानता तो नहीं कहूंगा कि रिकार्डिंग भी प्रधानमंत्री के कैमरे से होती होगी। अगर सारे चैनल अपने कैमरे से करते हैं तो यह भी कमाल है कि हर किसी का फ्रेम एक सा होता है। आप व्हाइट हाउस में ट्रंप की प्रेस कांफ्रेंस याद कीजिए। प्रेस और राष्ट्रपति के बीच की दूरी कम होती है। लगता है कि राष्ट्रपति प्रेस के बीच हैं। आप प्रेस के सामने मोदी की मौजूदगी देखिए, लगता है कि अवतार पुरुष हैं। देश कभी तो उनके इंटरव्यू की सच्चाई जानेगा। जो आज मजबूर हैं, वही लिखेंगे।

मोदी सिस्टम ने इंटरव्यू की कला को समाप्त कर दिया। उन्होंने साबित किया कि सवाल नहीं भी पूछा जाएगा तो भी दर्शक देखेगा। क्योंकि वे मोदी हैं, दर्शक उनका भक्त है। आम, बटुआ, पतंग, रोटी से लेकर न जाने कितने बकवास सवाल उनसे पूछे गए। मोदी ने उन सवालों का गंभीरता से जवाब देकर स्थापित किया कि यही पूछा जाएगा और ऐसे ही पूछा जाएगा। इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में उनका जवाब ख़तरनाक है। उन्होंने कहा है कि न्यूज़ छपे या न छपे लोकतंत्र में सिर्फ यही एक काम नहीं है। इसके बाद भी प्रेस उनके इंटरव्यू के लिए गिड़गिड़ा रहा है। मोदी न्यूज़ देने के लिए कैमरे के सामने नहीं आते हैं, बल्कि कैमरे को दर्शन देने आते हैं।

इंटरव्यू और प्रेस कांफ्रेंस मीडिया के ये दो आधार स्तंभ हैं। मोदी सिस्टम ने इन दोनों को समाप्त कर दिया। बड़े-बड़े न्यूज़ चैनलों ने मोदी सरकार की योजनाओं की कमियों और धांधलियों की रिपोर्टिंग बंद कर दी। यह तीसरा हमला था। सवाल की हर संभावना कुचल दी गई। उनके इंटरव्यू को लेकर यह धारणा बन गई है कि सवाल ही नहीं थे और जो थे वो पहले से तय किए गए थे। न्यूज़ नेशन पर कविता वाले सवाल ने इस धारणा को साबित कर दिया। बस, अब एक जवाब और चाहिए। प्रधानमंत्री के इंटरव्यू से पहले पत्रकार सवाल लिखकर देता है या प्रधानमंत्री पत्रकार को सवाल लिख कर देते हैं कि क्या पूछना है।

मीडिया के सामने मोदी एक्सपोज़ हो चुके हैं। मोदी के सामने मीडिया एक्सपोज़ हो चुका है। दोनों के बीच कोई राज़ नहीं है। दोनों के सामने दोनों नहीं हैं। उन्होंने यह साबित किया है कि बग़ैर सवाल के भी इंटरव्यू एक्सक्लूसिव हो सकता है। मीडिया को लेकर जो मोदी सिस्टम बना है, वो मोदी को ही एक्सपोज़ कर देगा, यह किसी ने नहीं सोचा था। 2019 के चुनाव की सबसे बड़ी देन यही है। 2019 आपको बता गया कि जिस मीडिया ने मोदी को बनाया अब उसी मीडिया में मोदी को देख लो। उस झूठ को देख लो।

मोदी-सिस्टम एक गैंग की तरह काम करता है। ज़रूर प्रधानमंत्री ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि सवाल पूछने वाले ख़ान मार्केट गैंग हैं। उन्हें फर्क नहीं पड़ता है। हो सकता है कि कोई ख़ान मार्केट गैंग रहा हो, जिसे मोदी ने ध्वस्त कर दिया। मगर मोदी के आसपास मीडिया का जो गैंग दिख रहा है, उसका नाम भले ही आज़ादपुर मंडी गैंग नहीं है, लेकिन वह काम करता है गैंग की तरह ही है।

मीडिया के मालिकों को धंधा देकर एंकरों से भजन कराने का एक सिस्टम अब मान्यता प्राप्त हो चुका है। मीडिया मालिकों की आज़ाद हैसियत मोदी ने समाप्त कर दी। मोदी के सामने मालिक और एंकर अब एक समान नज़र आते हैं। मोदी ने ऐसे पत्रकारों का गैंग खड़ा कर दिया है, जो सवाल के नाम पर आम और इमली के औषधीय गुण पूछते हैं। मोदी सिस्टम भी एक गैंग है, जो किसी भी हाल में पता नहीं चलने देता है कि अक्षय कुमार का इंटरव्यू किसने रिकार्ड किया। किसने एडिटिंग की, लेकिन न्यूज़ एजेंसी एएनआई के ज़रिये सारे चैनलों पर चल जाता है। क्या वह कार्यक्रम हवा में बन गया था?

मोदी ने प्रेस कांफ्रेंस नहीं की। यह तथ्य है। यह भी एक तथ्य है कि मोदी से पूछने वाला प्रेस ही नहीं है। होता तो उसे प्रेस कांफ्रेंस की ज़रूरत नहीं होती। वह अपनी ख़बरों से मोदी को जवाब के लिए मजबूर कर देता। न्यूज़ चैनल आप देखते हैं, यह आप दर्शकों की महानता है। इसकी शिकायत मुझसे न करें। मैंने तो न्यूज़ चैनल न देखने की अपील की है। मोदी सिस्टम में जब न्यूज़ की जगह मोदी को ही देखना है तो क्यों न आप अपने घर में चारों तरफ मोदी की तस्वीर लगा दें। अख़बार और टीवी पर ख़र्च होने वाला पैसा गौशाला को दान दे दें।

(वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की फेसबुक वॉल से)

रवीश कुमार ने द टेलिग्राफ अखबार में छपे इस प्रेस कांफ्रेंस का स्क्रीनशॉट भी अपनी फेसबुक वॉल पर शेयर किया है, जिसे आप यहां देख सकते हैं-

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यूनिसेफ ने भी माना रेडियो का लोहा, RJ के काम को दी नई पहचान

मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम के द्वारा रेडियो की पहुंच में और ज्यादा इजाफा हुआ है

Last Modified:
Saturday, 18 May, 2019
Radio

के.जी सुरेश, वरिष्ठ पत्रकार।।

जिस समय देश भर का मीडिया आम चुनावों की व्यापक कवरेज में लगा हुआ है, उसी दौरान देश भर के रेडियो जॉकी (आरजे) को मुंबई में शुक्रवार में हुए एक बड़े समारोह में सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें एंटरटेनमेंट के लिए नहीं, बल्कि उनकी क्रिएटिविटी के लिए दिया गया। पिछले दिनों मुंबई के गड्ढों को लेकर चलाए गए कैंपेन को लेकर आरजे मलिष्का ने काफी चर्चा बटोरी थी। इसके अलावा फिल्मों की बात करें तो अभिनेत्री विद्या वालन भी फिल्म ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ और ‘तुम्हारी सुलु’ में आरजे की भूमिका को समाज के सामने रख चुकी हैं।

दरअसल, इस साल ‘UNICEF-AROI Radio4Child Awards’ के तीसरे एडिशन के तहत न सिर्फ पब्लिक ब्रॉडकास्टर जैसे-ऑल इंडिया रेडियो बल्कि निजी एफएम रेडियो समेत कम्युनिटी रेडियो स्टेशनों में कार्यरत रेडियो प्रोफेशनल्स को नियमित टीकाकरण और बाल यौन शोषण के खिलाफ जागरूकता संदेश फैलाने के लिए अवॉर्ड्स से सम्मानित किया गया। यूनिसेफ की सेलेब्रिटी एडवोकेट करीना कपूर खान की मौजूदगी ने कार्यक्रम में चार चांद लगा दिए।   

इस बारे में करीना कपूर का कहना था, ‘यूनिसेफ के #EveryChildAlive जैसी पहल से जुड़कर मैं काफी खुश हूं, क्योंकि इनके द्वारा बच्चों को खतरनाक बीमारियों से बचाने के लिए टीकाकरण का महत्व बताने के लिए नए-नए तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है और उन्हें जागरूक किया जा रहा है। मेरा मानना है कि युवाओं के साथ ही विभिन्न परिवारों और समाज में हाशिये पर रह रहे समुदायों को टीकाकरण के महत्व के बारे में शिक्षित करने का यह बहुत ही बेहतरीन तरीका है। एक मां होने के नाते मैं हर बच्चे को एक स्वस्थ शुरुआत देने में टीकाकरण के महत्व को समझती हूं और इस महत्वपूर्ण संदेश को फैलाने में यूनिसेफ के सपोर्ट में मैं हर समय तैयार हूं।’

यूनिसेफ और एसोसिएशन ऑफ रेडियो ऑपरेटर्स फॉर इंडिया (AROI) की ओर से वर्ष 2018 में ऑल इंडिया रेडियो और निजी एफएम रेडियो के 40 से ज्यादा प्रोफेशनल्स के लिए एक कार्यशाला का आयोजन किया गया था। इस कार्यशाला का उद्देश्य टीकाकरण और बच्चों से जुड़े मुद्दों पर रेडियो जिंगल्स और टॉक शो तैयार करने में उनकी मदद करना था। इन अवॉर्ड्स के विजेताओं का चुनाव एक जूरी द्वारा किया गया, जिसमें शिक्षा के क्षेत्र के साथ-साथ रेडियो इंडस्ट्री और कॉरपोरेट सेक्टर से जुड़े दिग्गज शामिल थे।

इन अवॉर्ड्स की शुरुआत वर्ष 2014 में की गई थी और हर साल इनका दायरा लगातार बढ़ रहा है। उस दौरान इसे सिर्फ 21 एंट्रीज मिली थीं। दूसरे एडिशन में इन एंट्रीज की संख्या 120 हो गई और तीसरे एडिशन में इसे 17 राज्यों से 152 एंट्रीज प्राप्त हुईं। इनमें सबसे ज्यादा 18 एंट्रीज झारखंड से मिलीं। इसके बाद 15 एंट्रीज के साथ दिल्ली दूसरे नंबर पर रही और ओडिशा से 11 एंट्रीज मिलीं। इस प्रतियोगिता में पूर्व और पूर्वोत्तर से असम, झारखंड और पश्चिम बंगाल के रेडियो स्टेशनों ने भी अपनी भागीदारी निभाई। दक्षिण की बात करें तो इन अवॉर्ड्स के लिए केरल और तमिलनाडु से एंट्रीज मिलीं।   

इन अवॉर्ड्स ने न सिर्फ कॉमर्शियल रेडियो का मानवीय पहलू दिखाया, बल्कि यह भी दिखा दिया है कि बड़े पैमाने पर लोगों को प्रभावित करने में रेडियो के पास कितनी बड़ी ताकत है। खासकर पिछले और हाशिये पर धकेल दिए गए लोगों के बीच भी इसकी पहुंच काफी ज्यादा है।

देश में रेडियो की काफी पहुंच है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए रेडियो का चुनाव किया। मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम के द्वारा रेडियो की पहुंच में और ज्यादा इजाफा हुआ है। इस कार्यक्रम के जरिये पीएम मोदी विभिन्न मुद्दों पर रेडियो पर अपने विचार देश के लोगों के सामने रखते हैं। इस कार्यक्रम के द्वारा पीएम मोदी अब तक परीक्षाओं की शुचिता से लेकर टायलेट्स तक पर देश के लोगों के सामने अपनी बात रख चुके हैं।

यहां तक कि यूएसए जैसे विकसित देशों में जहां पर डिजिटल मीडिया के तेजी से पैर पसारने के बाद प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर काफी विपरीत प्रभाव पड़ा है, वहीं रेडियो अभी भी काफी लोकप्रिय माध्यम बना हुआ है। रेडियो के साथ एक खास बात ये है कि आप दूसरा काम करते हुए भी इसे सुन सकते हैं, लेकिन टीवी और अखबार के साथ ऐसा नहीं है। इसके अलावा रेडियो को आप कहीं पर भी एक स्थान से दूसरे स्थान तक आसानी से ले जा सकते हैं।

ऐसे में यूनिसेफ जैसे संगठनों ने न सिर्फ मनोरंजन के लिए बल्कि लोगों को सूचना देने और उन्हें शिक्षित करने में रेडियो की क्षमता को महसूस किया है। एक तरफ पब्लिक ब्रॉडकास्टर्स स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर लंबे समय से न सिर्फ लोगों को जागरूक करने में लगे हुए हैं और इसके जरिये देश को पोलियो मुक्त बनाने में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, वहीं निजी एफएम स्टेशन भी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को निभाने में किसी भी तरह से पीछे नहीं हैं। इसके लिए रेडियो वाकई में बधाई का पात्र है।  

(लेखक इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन के डायरेक्टर जनरल भी रह चुके हैं। इसके अलावा वह वर्ष 2018 और 2019 में यूनिसेफ रेडियो4चिल्ड अवॉर्ड्स जूरी के सदस्य भी रह चुके हैं।)

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इन हालातों में कोई कैसे कहे कि वह पत्रकार है

मीडिया की विश्वसनीयता,नैतिकता, निष्पक्षता और स्वतंत्रता को लेकर लंबे समय से होती रही है बहस

Last Modified:
Saturday, 18 May, 2019
Media Coverage

मीडिया की विश्वसनीयता,नैतिकता, निष्पक्षता और स्वतंत्रता को लेकर बहस बहुत पुरानी है। इसी बहस के बीच मीडिया लोकतंत्र को ताकत भी देता रहा है और उसकी विश्वसनीयता भी बनी रही। मगर मौजूदा हालात ऐसे नहीं हैं। मीडिया का रिश्ता अब लोकतंत्र से नहीं बल्कि पूंजी और राजनीति से है। पहले के मुकाबले अखबार प्रसार और पहुंच में आज काफी आगे निकल चुके हैं, टीवी अधिक प्रभावी हुआ है और वेब जर्नलिज्म नए आयाम छू रहा है। आश्चर्य है कि इसके बावजूद मीडिया की आजादी पर ग्रहण, और विश्वसनीयता पर सवाल है। मीडिया ने आम लोगों को पोस्ट-ट्रुथ, गलत सूचनाओं और झूठी खबरों के एक नये युग में धकेल दिया है।

रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स’ के मुताबिक मीडिया फ्रीडम इंडेक्स में भारत काफी नीचे स्थान पर है। मगर इससे भी ज्यादा गंभीर ‘एडलमैन’ की वह रिपोर्ट है, जिसमें कहा गया है भारतीय मीडिया पूरी तरह भ्रष्ट होकर आमजन में अपनी विश्वसनीयता खो चुका है। सही मायने में देखा जाए तो यह सवाल मीडिया का ही नहीं, नैतिक मूल्यों की पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों की साख और उनके पेशागत भविष्य का भी है। मगर दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि पत्रकारिता के मूल्यों और पत्रकार के भविष्य को बचाने की बात कहीं नहीं होती। यह अब छिपी नहीं है कि भारतीय मीडिया पूरी तरह राजनीतिक तंत्र का हथियार बन चुका है। पत्रकारिता की धार ही बदल चुकी है, सामाजिक सरोकारों और मानवीय मूल्यों के प्रति मुख्य धारा का मीडिया बहुत संवेदनशील भी नहीं रह गया है। आम आदमी से जुड़े बुनियादी मुद्दों पर जमीनी रिपोर्टें अब टीवी और अखबारी सुर्खियों में नहीं होतीं।

आम चुनाव जैसे अहम मौके पर भी आमजन के मुद्दे हाशिए पर होते हैं। अफसोसजनक यह है कि जिस वक्त देश के लोकतंत्र को ज्यादा प्रासंगिकता और विश्वसनीयता की दरकार थी, तब भी मीडिया महज बयानों और प्रतिक्रियाओं का मंच बना रहा। विडंबना देखिए, सैद्धांतिक तौर पर जिस मीडिया को तटस्थ रहना चाहिए, वह साफ-साफ लेफ्ट-राइट में बंटा है।अखबारों के फ्रंट पेज, संपादकीय पन्ने, टीवी चैनलों की हेडलाइन्स और बहस से साफ पता लगने लगा है कि कौन किसके पक्ष में और किसके विरोध में खड़ा है।

इस पूरे क्रम में दुखद यह है कि पत्रकार भी पत्रकारिता के मूलसिद्धांत और उद्देश्यों को छोड़ते जा रहे हैं। कोई खुलकर मोदी का भोंपू बजा रहा है तो कोई सीमा से बाहर निकलकर मोदी के विरोध में झंडा उठाए हुए है। पूरी पत्रकारिता मोदी के समर्थन और विरोध में सिमटकर रह गयी है। गाहे-बगाहे कोई मुद्दा उठता भी है तो उसे भी इसी बीच में झुलाया जाता है। अब तो गली-मुहल्लों से लेकर बड़े शहरों तक में पत्रकारों की ऐसी फौज खड़ी होती जा रही है, जो पेशेवर न होकर प्रोपेगैंडा पत्रकारिता कर रही है। इसके दुष्परिणाम भी सामने हैं। दिल्ली से लेकर बड़े शहरों और गांव कस्बों तक से आए दिन मीडिया के नाम पर दलाली और ब्लैकमेलिंग की खबरें भी सुनायी देने लगी हैं। ऐसे में संकट सिर्फ मीडिया पर ही नहीं है, पत्रकार पर भी है। एक पत्रकार की सामान्य छवि भी आमजन के बीच बहुत अच्छी नहीं रह गयी है।

कहने का मतलब यह है कि रोना तो मीडिया की आजादी का रोया जा रहा है, जबकि बड़ा मुद्दा पत्रकार नाम की संस्था के पतन का है। जहां तक मीडिया की आजादी का सवाल है तो अकेले भारत में ही नहीं दुनिया के करीब दो-तिहाई देशों में मीडिया की स्थिति खराब हुई है। खासकर उन देशों में जहां कि ताकतवर नेताओं का उदय हुआ है। रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स के महासचिव क्रिस्टोफ डेलॉयर के मुताबिक लोकतांत्रिक देशों में मीडिया की आजादी सीमित होती जा रही है । यह उन सभी के लिए चिंताजनक है जो समझते हैं कि मीडिया की स्वतंत्रता को सुरक्षित नहीं रखा गया, तो अन्य स्वतंत्रताओं के बचे रहना भी मुश्किल है।

भारतीय मीडिया के लिए मीडिया फ्रीडम इंडेक्स से ज्यादा चिंताजनक एडलमैन ट्रस्ट औररॉयटर्स की रिपोर्टें हैं। मीडिया बिजनेस में तकरीबन 38 देशों में काम करने वाले एडलमैन ट्रस्ट के सर्वे के मुताबिक मीडिया की विश्‍वसनीयता सभी जगह प्रभावित हुई है, लेकिन भारतीय मीडिया पूरी तरह विश्वसनीयता खो चुका है। यहां मीडिया संस्थानो का उद्देश्य और विश्‍वसनीयता सवालों के घेरे में है। एडलमैन के अनुसार खुद को पत्रकार कहने वाले यहां निजी स्वार्थ के लिए राजनैतिक दलों के पीआर एजेंट बनकर रह गए हैं। रॉयटर्स जर्नलिज्म इंस्टीट्यूट की ‘इंडिया डिजिटल न्यूज़ 2019’ सर्वे रिपोर्ट तो पत्रकार और पत्रकारिता के लिए और भी चिंताजनक है । इसके मुताबिक सोशल मीडिया के दौर में न्यूज चैनल्स और अखबारों की विश्वसनीयता खत्म होती जा रही है।

रॉयटर्स ने यह सर्वे ‘द हिंदू’, ‘इंडियन एक्सप्रेस’, ‘द क्विंट’ और ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया’ के साथ मिलकर किया। इसमें अधिकांश लोग फर्जी न्यूज और पत्रकारिता के घटते स्तर को लेकर चिंतित नजर आए। सर्वे के मुताबिक 39 फीसदी लोग जिस न्यूज का इस्तेमाल करते हैं, उस पर भी उन्हें ज्यादा विश्वास नहीं होता। घटती विश्वसनीयता का यह आंकड़ा कई अन्य देशों के मुकाबले काफी ज्यादा है। निश्चित तौर पर भारतीय मीडिया की साख गिर रही है, वह सरोकारों से कटा और अपरिपक्व भी नजर आता है । फिर भी हम यह नहीं भूल सकते कि उसकी तमाम उपलब्धियां भी रही हैं। सामाजिक जागरूकता के साथ ही उसने देश में व्याप्त गरीबी, भुखमरी व भ्रष्टाचार के खिलाफ बेहतरीन भूमिका निभायी है।

एक पहलू यह भी है कि आज भी आम आदमी जब विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका से हताश होता है तो मीडिया में ही जाता है। यह अनदेखी भी नहीं की जा सकती कि मीडिया विश्वसनीय भले ही न हो, मगर पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर है। देश में इस वक्त तकरीबन 70 हजार अखबार और 800 से अधिक चैनल हैं न्यूजपोर्टल,वेबसाइट और वेब चैनलों की तो कोई गिनती ही नहीं है। ऐसे-ऐसे समाचार पत्र भी हैं, जिनके पचास से अधिक संस्करण निकल रहे हैं। मीडिया की इस बढ़ती ताकत के बीच जब हम आधुनिक पत्रकारिता पर गौर करते हैं तो इस पर उठते सवाल जायज भी नजर आते हैं ।

आखिर ऐसा क्यों है? सच यह है कि ज्यादातर मीडिया मालिकान चाहते ही नहीं कि प्रेस आजाद और पत्रकार नैतिक रहे। आज अधिकांश अखबार और टीवी चैनल किसी पूंजीपति या कंपनी के स्वामित्व में हैं। हर कोई उसका इस्तेमाल सिर्फ अपने व्यवसायिक हितों के लिए करना चाहता है। कई राजनेता और उनके पारिवारिक सदस्य भी मीडिया संस्थानों के मालिक हैं , वो खुलेआम इनका इस्तेमाल अपनी राजनीति के लिए करते हैं। थोड़ा और गहराई में जाएं तो पता चलता है कि जिस मीडिया से हम सुचिता और मूल्यों की अपेक्षा कर रहे हैं, वह परोक्ष या अपरोक्ष रियल एस्टेट से लेकर ठेकेदारी, शराब, खनन और शिक्षा के कारोबार में भी लगा है।

अब बताइये, ऐसे में सामाजिक सरोकार से जुड़ी खबरों और विश्वसनीयता की उम्मीद आखिर कैसे की जा सकती है? यही कारण है कि आज रिपोर्टिंग की अहमियत खत्म होती जा रही है, मुद्दों की पत्रकारिता हाशिये पर है। पत्रकार भी निडर रिपोर्टिंग नहीं कर पा रहे हैं। बेबाक सवालों और सार्थक बहस की जगह तो मीडिया में रह ही नहीं गयी है। इन हालात में श्रमजीवी पत्रकार होना और किसी भी मीडिया संस्थान में काम करना निसंदेह पत्रकारों के लिएबेहद जोखिम पूर्ण बना हुआ है ।

चलिए वापस मुद्दे पर लौटते हैं। मुद्दा है तस्वीर बदलने और मीडिया के प्रति विश्वास की बहाली का, जो तब तक संभव नहीं हो सकती जब तक कि पत्रकार की छवि साफ नहीं होती। देश में ईमानदार पत्रकारों की कमी नहीं है, आज भी ईमानदार पत्रकारों की संख्या ज्यादा है मगर मौजूदा हालात में कोई कैसे कहे कि वह पत्रकार है। आज देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ अपराधी, पूंजीपति व शासक वर्ग किस तरह खेल रहे हैं, यह सब जानते हैं। न बने कोई कानून मीडिया की आजादी के लिए, लेकिन नैतिक मूल्यों के लिए पत्रकारिता करने वालों की पहचान तो स्पष्ट होनी ही चाहिए। मीडिया में बेहतर माहौल के लिए एक आदर्श आचार संहिता तो बननी ही चाहिए। मीडिया और पूँजी का जो रिश्ता पत्रकारिता और पत्रकार को खोखला करने में लगा है उस पर लगाम तो लगनी ही चाहिए। यह सिर्फ पत्रकार या पत्रकारिता को बचाने के लिए नहीं, बल्कि लोकतंत्र को बचाने के लिए भी जरूरी है।

सनद रहे, मीडिया आज संदेह के घेरे में है तो इसके लिए सरकारें या मीडिया संस्थान नहीं, बल्कि पत्रकार और पत्रकारों के संगठन भी जिम्मेदार हैं। पेशागत सुचिता बनाए रखने की पहल भी पत्रकारों को ही करनी होगी। आज सोशल मीडिया के रूप न्यू-मीडिया से पत्रकारों की उम्मीदें जरूर बंधी है लेकिन सोशल मीडिया के लिए तो अभी खुद यह इम्तेहान का वक्त है। यहां पत्रकारिता एक अनुभव से गुजर रही है, भविष्य कैसा रहेगा यह कहना मुश्किल है। बहरहाल मीडिया कोई भी हो पत्रकारिता तभी बचेगी जब पत्रकार नाम की संस्था बची रहेगी।

(वरिष्ठ पत्रकार योगेश भट्ट की फेसबुक वॉल से)

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पत्रकार हैं तो बस ख़बरों के लिए समय निकालिए या फ्रांस चलने के बारे में सोचिये

पत्रकारों को दिन में भी उतना ही मुस्तैद रहना पड़ता है, जितना रात में

Last Modified:
Thursday, 16 May, 2019
Reporter

नीरज नैयर, वरिष्ठ पत्रकार।।

अगर आप पत्रकार हैं तो आपकी सोशल और फैमिली लाइफ कैसी चल रही है, यह पूछने का कोई मतलब ही नहीं बनता। क्यों? क्योंकि पत्रकारिता न तो नौ से पांच बजे वाली नौकरी है और न ही इसमें वीक ऑफ की कोई गारंटी होती है। इतना ही नहीं, आप ऑफिस कब आएंगे, ये तय होता है, लेकिन जाने का कोई ठिकाना नहीं।

लिहाजा ऐसे में यदि कुछ बचता है, तो वो है बस प्रोफेशनल लाइफ। शायद यही वजह है कि पत्रकारों को उनके परिजन ‘उल्लू’ कहते हैं, वो इसलिए कि जब दुनिया चादर तानकर सोती है, हम ख़बरों में सिर खपा रहे होते हैं। फिर भी मुझे लगता है कि हमारी बिरादरी के लिए ‘उल्लू’ नहीं, कोई नया शब्द ईजाद होना चाहिए। क्योंकि हमें दिन में भी उतना ही मुस्तैद रहना पड़ता है, जितना रात में। शुरुआत में सबकुछ बहुत सुहाना लगता है, फिर बीच में एक वक़्त आता है, जब इस ‘रतजगे’ और ‘कटाव’ से झुंझलाहट होने लगती है, लेकिन फिर इसकी आदत पड़ जाती है। यकीन न हो तो पत्रकारिता त्यागकर कहीं और धूनी ज़माने वालों से पूछ लीजिये, आज भी उनकी आँखों में आम आदमी वाली नींद नहीं आती होगी।

दुनिया कहती है ‘शराब में नशा है’, वो बिल्कुल सही कहती है, लेकिन पत्रकारिता भी उससे कम नहीं है। एक बार जिसने इसका रसपान कर लिया या कहें कि अपना सबकुछ इसके नाम कर दिया, वो लाख पीछा छुड़ाना चाहे, सफल नहीं हो पता। संभव है कि वो अपना प्रोफेशन बदल ले, आजकल बड़ी संख्या में पत्रकार ऐसा कर भी रहे हैं, मगर ‘ख़बरों का ये नशा’ उनके अंदर के पत्रकार को मरने नहीं देता। मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं, जो अब पेशे से पत्रकार नहीं हैं, पर समय-समय पर पत्रकारिता के नमूने पेश करते रहते हैं।

एक पत्रकार के लिए समय सबसे कीमती है, क्योंकि सबकुछ समय के हिसाब से होता है, सिवाय परिवार के साथ समय बिताने को छोड़कर। यानी ताउम्र समय का पाबंद रहने वाला पत्रकार अपनों के लिए ही वक़्त नहीं निकाल पाता। उसे यह पता ही नहीं होता कि सूरज ढलने और रात के परवान चढ़ने के बीच कितना कुछ हो जाता है। सच कहूँ तो मुझे भी नहीं पता था। पुणे में जब मैं लोकमत के साथ था, तो सुबह 12 बजे घर से निकलना और रात दो-ढाई बजे वापस पहुंचना, यही रूटीन था। यानी शाम की खुमारी क्या होती है, इसका अहसास ही नहीं था। इस खुमारी के अलावा और भी बहुत कुछ था, जो अपनी आँखों से छिपा हुआ था।

एक दिन शाम 6 बजे छुट्टी मिलने का सौभाग्य मिला, सौभाग्य इसलिए कि वह ‘ऑफ’ के लिए संकट काल था। अधिकांश संस्थानों में पत्रकारों पर इस संकट का साया रहता है। बाइक लेकर जब सड़क पर निकला तो पता चला कि शाम वास्तव में सुहानी होती है। कुछ आगे बढ़ने पर देखा कि सभी वाहन रुके हुए हैं, समझ नहीं आया कि यहाँ क्या हुआ है। मैं तो हमेशा फर्राटा भरता हुआ जाता हूं, कभी ऐसा नहीं हुआ। अब देखिये, दिमाग को भी अँधेरे की इतनी आदत हो जाती है कि उसे दिन-रात के ट्रैफिक का अंतर भी समझ नहीं आता। ख़ैर, कुछ देर बाद सब आगे बढ़े तो पूरा माजरा समझ आया और अपने आप ही चेहरे पर मुस्कान आ गई, ये खुश होने वाली मुस्कान नहीं, बल्कि अपनी बेवकूफी...नहीं-नहीं..बेचारगी कहना ज्यादा बेहतर होगा...पर हंसने वाली मुस्कान थी। दरअसल, वहां ट्रैफिक लाइट थी और सभी उसके ग्रीन होने के इंतजार में रुके थे। पुणे में ट्रैफिक इस कदर होता है कि एक बार में आप तभी निकल सकते हैं, जब आप सबसे आगे हों। रात के दो बजे कहाँ कोई ट्रैफिक लाइट जलती है, इसलिए कभी पता ही नहीं चला, जब चला तो मुस्कुराना तो बनता था।

कभी-कभी लगता है कि फ्रांस चला जाऊं, वहां कर्मचारियों को भी इंसान की श्रेणी में रखा जाता है, फिर यह सोचकर रुक जाता हूं कि पासपोर्ट एक्सपायर हो गया है (बिना किसी ठप्पे के), उसे रिन्यू तो करवा लूँ। ख़ैर, ये तो खालिस मजाक है। अपना देश ही सबसे बेहतर है, लेकिन कर्मचारियों खासकर पत्रकारों के दोहन...(शोषण कहना भी ज्यादा बुरा नहीं होगा) को रोकने के लिए अभी काफी कुछ किये जाने की ज़रूरत है। फ्रांस में कुछ वक़्त पहले ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ कानून अस्तित्व में आया था। इसके तहत कामकाजी घंटों के बाद कंपनियां अपने कर्मचारियों को काम के नाम पर परेशान नहीं कर सकतीं, इसमें फ़ोन कॉल या ईमेल भी शामिल हैं। यानी छुट्टी मतलब छुट्टी। वैसे, अपने देश में भी सांसद सुप्रिया सुले ने ऐसा बिल संसद में रखा है, लेकिन उसके भविष्य पर वैसा ही संकट मंडरा रहा है जैसा पत्रकारों के ‘ऑफ’ पर मंडराता है। क्यों? क्योंकि अपने देश में इस तरह की पहल पर समर्थन आसान कहाँ है?

मान भी लीजिये कि यदि ऐसा कुछ हो गया तो क्या पत्रकारों को उस श्रेणी में रखा जायेगा? जनाब, जो मीडिया संस्थान ‘मजीठिया’ को पत्रकारों के खिलाफ इस्तेमाल कर सकते हैं, वो क्या नहीं कर सकते ज़रा सोचिये? मुझे याद है कि पहले मजीठिया के नाम से हम लोगों के चेहरे खिल जाया करते थे। लगता था कि चलो ‘कम दाम, ज्यादा काम’ से मुक्ति मिलेगी, लेकिन हुआ क्या? मजीठिया से हमारा भला तो नहीं हुआ, बुरा ज़रूर हो गया। लिहाजा, पत्रकार बने हैं तो सोशल और फैमिली लाइफ के लिए नहीं, ख़बरों के लिए समय निकालिए। ’उल्लू’ कहलाइए या प्रोफेशन छोड़ दीजिये (लेकिन पत्रकारिता का नशा नहीं छूटेगा) या फिर मेरी तरह फ्रांस चलने के बारे में सोचिये...सोचने में क्या जाता है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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जानें क्यों, हरिशंकर व्यास के नया इंडिया के लिए अहम है आज का दिन

'नया इंडिया' अखबार की 10वीं वर्षगांठ पर वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने इस अखबार को बताया पत्रकारिता का सूर्य

Last Modified:
Thursday, 16 May, 2019
Naya India

‘नया इंडिया’ का आज अंक 1और वर्ष 10 है। जब 16 मई 2010 में चलते-चलाते मैंने यों ही ‘नया इंडिया’ शुरू किया, तब कल्पना नहीं की थी कि ‘नया इंडिया’ अपनी जिद्द बनेगा। प्राणवायु सोख लेने वाला मामला बनेगा! बेबाक, बेधड़क लिखने की आदत पर सुनने को मिलेगा कि आपको डर नहीं लगता लिखते हुए! ठीक पांच साल पहले 16 मई के दिन जो जनादेश था, उससे पहले उस जनादेश को बूझते हुए भी ‘नया इंडिया’ सौ टका बेबाक था। वह सब कुछ लिखा, जो पिछले पांच वर्षों मे दिखा है। मतलब जो सत्य है, उसे बेबाकी और निर्ममता से लिखना। बावजूद इसके तब और अब का फर्क बना है कि सत्य और पत्रकारिता दोनों अब दुर्लभ हैं।

अखबार, पत्रकार, मीडिया का मतलब बदल गया है। दस साल पहले समाज में मीडिया का जो मान था, उसका क्या हुआ, इसकी हकीकत ने मुझमें जिद्द पैदा की है कि ‘नया इंडिया’ का दीया जलाए रखना है। लेकिन कब तक?... देखते हैं! मैं ‘नया इंडिया’ और भारत की पत्रकारिता पर विस्तार से बहुत कुछ लिखना चाहता हूं लेकिन इस वक्त मैं तलवार की धार पर टिके लोकतंत्र पर ध्यानस्थ हूं। बाद में लिखूंगा। अच्छा हुआ जो वैदिकजी ने ‘नया इंडिया’ पर लिखा। उनका आभार और साथ में उन तमाम शुभेच्छुओं, पाठकों के प्रति भी कृतज्ञता ज्ञापन, जिनकी सद्इच्छा से ‘नया इंडिया’ की प्राणवायु अभी भी शेष है।– हरिशंकर व्यास।

डॉ. वेदप्रताप वैदिक-आज ‘नया इंडिया’ की 10वीं वर्षगांठ है। हिंदी पत्रकारिता के पिछले 200 साल के इतिहास में ऐसे कितने दैनिक पत्र निकले हैं, जिनकी तुलना ‘नया इंडिया’ से की जा सकती है? अंग्रेजों के काल में, कुछ पत्र ऐसे जरूर निकले हैं, जिन्होंने अपनी लौह-लेखनी से अंग्रेजों के कान उमेठे थे, लेकिन उन्हें या तो अंग्रेजों ने जब्त कर लिया या उसके संपादकों को गिरफ्तार कर लिया। आजाद भारत में भी कुछ ऐसे अखबार निकले, जैसे महाशय कृष्ण का ‘वीर अर्जुन’ लेकिन जितने भी बड़े अखबार निकले, उनके पीछे मुनाफा सबसे बड़ा लक्ष्य रहा। इस लक्ष्य को साधना इतना कठिन है कि बड़े से बड़े अखबार मालिक और बड़े से बड़े संपादक को फूंक-फूंककर कदम रखना पड़ता है। सत्ताधीशों के सामने नरमी से पेश आना पड़ता है, घुटने भी टेकने पड़ते हैं और कभी-कभी भांडगीरी भी करनी पड़ती है। रामनाथ गोयनका के ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की तरह के अखबार देश में बहुत ही कम हैं। लेकिन हरिशंकर व्यास का ‘नया इंडिया’ अपने आप में एक मिसाल है। इसकी तुलना पराधीन और स्वाधीन भारत के किसी भी सर्वश्रेष्ठ अखबार से की जा सकती है। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में इसका नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। इसके पीछे न तो कोई बड़ी पूंजी है, न कोई राजनीतिक दल है, न कोई नेता है, न सेठ है। इसके पीछे कोई भी निहित स्वार्थ नहीं है।

इस महान अखबार को व्यासजी, अजीत द्विवेदी, विवेक सक्सेना, अनिल चतुर्वेदी, जगदीप, श्रुति और सत्येंद्र, शंकर शरण, श्रीश, पकंज जैसे लेखक अपने खून से सींच रहे हैं। इस अखबार को मुनाफे का कोई ख्याल ही नहीं है। विज्ञापन के लिए यह किसी सरकार या सेठ के तलुए चाटने को तैयार नहीं है। यह समाचार-पत्र कम, विचार-पत्र ज्यादा है। मैं यह मानता हूं कि विचार की ताकत परमाणु बम से भी ज्यादा होती है। यह अखबार लाखों की संख्या में नहीं छपता है, लेकिन कौन विचारशील नेता है, जो रोज सुबह सबसे पहले इस अखबार को नहीं पढ़ता है। यह अखबारों का अखबार है। यह भारत के नेताओं, पत्रकारों, नौकरशाहों, विद्वानों, समझदारों का अखबार है।

पिछले कई वर्षों से मैंने इसमें लगातार लिखा है। रोज़ लिखा है। एक दिन भी नागा नहीं की। पिछले 65 सालों से लिख रहा हूं और देश के सबसे बड़े अखबार ‘नवभारत टाइम्स’  और सबसे बड़ी न्यूज एजेंसी पीटीआई (भाषा) का संपादक भी लंबे समय तक रहा हूं और विश्व प्रसिद्ध साप्ताहिक ‘धर्मयुग’ के सबसे महत्वपूर्ण लेखकों में भी मैं रहा हूं। लेकिन जितना आनंद और आत्मिक संतोष मुझे ‘नया इंडिया’ में लिखकर मिल रहा है, पहले मुझे कभी नहीं मिला।

जो निष्पक्षता, निर्भयता और निर्ममता ‘नया इंडिया’ की नीतियों में है, वह देश की समस्त खबरपालिका के लिए अनुकरणीय है। यह भारतीय लोकतंत्र के भविष्य की रक्षा का दस्तावेज है। भारत में जब तक ‘नया इंडिया’ जैसे अखबार निकलते रहेंगे, हमारे सत्ताधीश, जो कि जनता के सेवक हैं, सेवक बनकर ही रहेंगे। उनकी अकड़ ढीली होती रहेगी। उनकी अकड़ के गुब्बारे को पंक्चर करने के लिए ‘नया इंडिया’ की नुकीली कलम काफी है। पिछले पांच वर्षों में पत्रकारिता का जो पराभव हुआ है, उसके गहरे अंधकार के बीच 'नया इंडिया' सूर्य की तरह चमकता रहा है।

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