डॉ. वैदिक का सवाल: अजित डोभाल को वॉशिंगटन दौड़ना पड़ा, यह चिंता का विषय है...

अमेरिका के रक्षा मंत्री जेम्स मेटिस और विदेश मंत्री माइक पोंपियो अभी पिछले हफ्ते ही भारत होकर गए हैं...

Last Modified:
Tuesday, 18 September, 2018
daval

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

वरिष्ठ पत्रकार ।।

अमेरिका के रक्षा मंत्री जेम्स मेटिस और विदेश मंत्री माइक पोंपियो अभी पिछले हफ्ते ही भारत होकर गए हैं। फिर क्या वजह है कि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को वॉशिंगटन जाना पड़ा है? डोभाल तो वास्तविक उप-प्रधानमंत्री ही माने जाते हैं। हमारी रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री से भी ज्यादा महत्व उनका है? उन्हें वॉशिंगटन दौड़ना पड़ गया, यह चिंता का विषय है।

अखबार कहते हैं कि वे दोनों देशों के मंत्रियों की वार्ता को आगे बढ़ाने गए हैं। दोनों देशों के मंत्रियों ने अपनी बातचीत के बाद दिल्ली में यह प्रभाव छोड़ा था कि ईरान और रूस के मामले में अमेरिका भारत को छूट दे देगा। भारत पर अमेरिका यह दबाव नहीं डालेगा कि वह ईरान से तेल और रुस से शस्त्रास्त्र न खरीदे लेकिन लगता यह है कि वॉशिंगटन पहुंचते ही डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दोनों मंत्रियों की परेड ले ली है। इसीलिए अमेरिकी सरकार की एक उप-मंत्री ने दो-तीन दिन पहले एक बयान में दो-टूक शब्दों में कहा कि अमेरिका ऐसे किसी भी देश को बख्शनेवाला नहीं है, जो ईरान से तेल खरीदना बंद नहीं करेगा। उसने यह बात चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप का नाम लेकर कही है।

दूसरे शब्दों में मेटिस और पोंपियो की भारत-यात्रा खाली झुनझुना सिद्ध हो गई है। वे भारत के साथ सामरिक संचार का समझौता कर गए और अपना माल बेचने की हवा बना गए। भारत को क्या मिला? भारत का कौनसा फायदा हुआ? यह स्पष्ट है कि यदि भारत ईरान से तेल खरीदना बंद कर देगा तो उसे काफी महंगे भाव पर अन्य सुदूर देशों से मंगाना होगा। तेल की कीमतें बढ़ेंगी और उसके साथ-साथ सरकार का सिरदर्द भी।

अमेरिका ने ईरान के साथ हुए परमाणु-सौदे को रद्द कर दिया है और वह उसे दंडवत करवाना चाहता है। उसे इसकी परवाह नहीं है कि इस कारण भारत का दम फूल सकता है। इस संबंध में भारत को जरा सख्ती से पेश आना चाहिए। अमेरिकी दबाव के आगे बिल्कुल नहीं झुकना चाहिए और यदि अमेरिका निवेदन करे तो ईरान और उसके बीच वह मध्यस्थता भी कर सकता है।

 

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

संतोष भारतीय बोले, राहुल के इस्तीफे के बाद कल ये बन सकते हैं नए कांग्रेस अध्यक्ष

राहुल के इस्तीफे के साथ ही वर्किंग कमेटी के पदाधिकारी भी देंगे अपने पदों से इस्तीफा

Last Modified:
Friday, 24 May, 2019
Rahul-Santosh

लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे घोषित हो चुके हैं और इनमें भाजपा ने काफी शानदार प्रदर्शन करते हुए बड़ी जीत हासिल की है। इस बारे में ‘चौथी दुनिया’ के प्रधान संपादक संतोष भारतीय का कहना है, ‘चुनाव के नतीजे सामने आते ही सभी तरह के सवाल समाप्त हो चुके हैं और भाजपा में जीत का जश्न शुरू हो चुका है। कल हमने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की विनम्रता का पैमाना देखा। बीजेपी मुख्यालय में हुए स्वागत समारोह के दौरान उन्होंने जिस तरह का भाषण दिया, उससे लगा कि देश में विनम्र सरकार होगी और अति विनम्र तरीके से प्रशासन चलेगा।’

अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट एक विडियो में संतोष भारतीय का कहना था, ‘लोकतंत्र में लोग सवाल उठाएंगे भी, लेकिन उनका कोई उत्तर नहीं मिलेगा। लेकिन लोकतंत्र में अब अगर ये कोशिश हो कि सवाल भी न उठें तो फिर हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए कि इस लोकतंत्र को किसी भी दिन हम शीर्षासन की स्थिति में पाएंगे। ये भी सवाल चलते रहेंगे कि राहुल गांधी अपनी हार स्वीकार कर कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने वाले थे और वे मीडिया के सामने इसी उद्देश्य से आए थे, लेकिन पार्टी की पूर्व अध्यक्ष और उनकी मां सोनिया गांधी ने राहुल को ऐसा करने से रोक दिया। सोनिया का कहना था कि इस निर्णय से कांग्रेस बिल्कुल अधर में रह जाएगी और अफरातफरी मच जाएगी।’

संतोष भारतीय ने बताया, ‘अब ये तय हो गया है कि 25 मई को राहुल गांधी अपने पद से इस्तीफा दे देंगे। उनके इस्तीफे के साथ ही कांग्रेस की वर्किंग कमेटी के पदाधिकारी भी इसी दिन अपने पदों से इस्तीफा दे देंगे। राहुल की जगह अगले कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी दो लोगों के नामों पर अपना मन बना चुकी हैं, इनमें से एक के नाम पर कल मुहर लग जाएगी। इनमें राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंद्र सिंह में से किसी एक के नाम पर मुहर लग सकती है। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक,माना जा रहा है कि अगर अमरिंदर का नाम तय हुआ तो फिलहाल उनकी पत्नी परनीत कौर, जो हाल ही में पटियाला से लोकसभा चुनाव जीती हैं, वे सूबे की कमान संभाल सकता है। और अगर अशोक गहलोत का नाम फाइनल हुआ, तो सचिन पायलट को राजस्थान सरकार की जिम्मेदारी पूरी तौर पर दी जाएगा ।’

संतोष भारतीय के इस विडियो को आप यहां देख सकते हैं-

आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो करने के लिए यहां क्लिक कीजिए

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

रवीश कुमार बोले, क्या 2019 के चुनाव में मैं भी हार गया हूं?

वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने मतगणना के दिन वॉट्सऐप पर मिले तीन तरह के मैसेज का किया जिक्र

Last Modified:
Friday, 24 May, 2019
Ravish Kumar

रवीश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार।।

क्या 2019 के चुनाव में मैं भी हार गया हूं?

23 मई 2019 के दिन जब नतीजे आ रहे थे, मेरे वॉट्सऐप पर तीन तरह के मैसेज आ रहे थे। अभी दो तरह के मैसेज की बात करूंगा और आख़िर में तीसरे प्रकार के मैसेज की। बहुत सारे मैसेज ऐसे थे कि आज देखते हैं कि रवीश कुमार की सूजी है या नहीं। उसका चेहरा मुरझाया है या नहीं। एक ने लिखा कि वह रवीश कुमार को ज़लील होते देखना चाहता है। डूबकर मर जाना देखना चाहता है। पंचर बनाते हुए देखना चाहता है। किसी ने पूछा कि बर्नोल की ट्यूब है या भिजवा दें। किसी ने भेजा कि अपनी शक्ल की फोटो भेज दो, ज़रा हम देखना चाहते हैं।

मैंने सभी को जीत की शुभकामनाएं दीं और लाइव कवरेज़ के दौरान इस तरह के मैसेज का ज़िक्र किया और ख़ुद पर हंसा। दूसरे प्रकार के मैसेज में यह लिखा था कि आज से आप नौकरी की समस्या, किसानों की पीड़ा और पानी की तकलीफ दिखाना बंद कर दीजिए। यह जनता इसी लायक है। बोलना बंद कर दो। क्या आपको नहीं लगता है कि आप भी रिजेक्ट हो गए हैं। आपको विचार करना चाहिए कि क्यों आपकी पत्रकारिता मोदी को नहीं हरा सकी। मैं मुग़ालता नहीं पालता। इस पर भी लिख चुका हूं कि बकरी पाल लें, मगर मुग़ालता न पालें।

2019 का जनादेश मेरे ख़िलाफ कैसे आ गया? मैंने जो पांच साल में लिखा-बोला है, क्या वह भी दांव पर लगा था? जिन लाखों लोगों की पीड़ा हमने दिखाई, क्या वह ग़लत थी? मुझे पता था कि नौजवान, किसान और बैंकों में गुलाम की तरह काम करने वाले लोग भाजपा के समर्थक हैं। उन्होंने भी मुझसे कभी झूठ नहीं बोला। सबने पहले या बाद में यही बोला कि वे नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं। मैंने इस आधार पर उनकी समस्या को खारिज नहीं किया कि वे नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं। उनकी समस्या वास्तविक थी, इसलिए दिखाई। आज एक सांसद नहीं कह सकता कि उसने पचास हज़ार से अधिक लोगों को नियुक्ति पत्र दिलवाया है। मेरी नौकरी सीरीज़ के कारण दिल्ली से लेकर बिहार तक में लोगों को नियुक्ति पत्र मिला है। कई परीक्षाओं के रिज़ल्ट निकले। उनमें से बहुतों ने नियुक्ति पत्र मिलने पर माफी मांगी कि वे मुझे गालियां देते थे। मेरे पास सैकड़ों पत्र और मैसेज के स्क्रीन शॉट पड़े हैं, जिनमें लोगों ने नियुक्ति पत्र मिलने के बाद गाली देने के लिए माफी मांगी है। इनमें से एक भी यह प्रमाण नहीं दे सकता कि मैंने कभी कहा हो कि नरेंद्र मोदी को वोट नहीं देना। यह ज़रूर कहा कि वोट अपने मन से दें, वोट देने के बाद नागरिक बन जाना।

पचास हज़ार से अधिक नियुक्ति पत्र की कामयाबी वो कामयाबी है, जो मैं मोदी समर्थकों के द्वारा ज़लील किए जाने के क्षण में भी सीने पर बैज की तरह लगाए रखूंगा। क्योंकि वे मुझे नहीं उन मोदी समर्थकों को ही ज़लील करेंगे, जिन्होंने मुझसे अपनी समस्या के लिए संपर्क किया था। नौकरी सीरीज़ का ही दबाव था कि नरेंद्र मोदी जैसी प्रचंड बहुमत वाली सरकार को रेलवे में लाखों नौकरियां निकालनी पड़ीं। इसे मुद्दा बनवा दिया। वर्ना आप देख लें कि पूरे पांच साल में रेलवे में कितनी वैकेंसी आईं और आखिरी साल में कितनी वैकैंसी आई। क्या इसकी मांग गोदी मीडिया कर रहा था या रवीश कुमार कर रहा था? प्राइम टाइम में मैंने दिखाया। क्या रेल सीरीज़ के तहत स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस जैसी ट्रेन को कुछ समयों के लिए समय पर चलवा देना मोदी का विरोध था? क्या बिहार के कालेजों में तीन साल के बीए में पांच-पांच साल से फंसे नौजवानों की बात करना मोदी विरोध था?

इन पांच सालों में मुझे करोड़ों लोगों ने पढ़ा। हज़ारों की संख्या में आकर सुना। टीवी पर देखा। बाहर मिला तो गले लगाया। प्यार दिया। उसमें नरेंद्र मोदी के समर्थक भी थे। संघ के लोग भी थे और विपक्ष के भी। बीजेपी के लोग भी थे, मगर वे चुपचाप बधाई देते थे। मैंने एक चीज़ समझी। मोदी का समर्थक हो या विरोधी, वह गोदी मीडिया और पत्रकारिता में फर्क करता है। चूंकि गोदी मीडिया के एंकर मोदी की लोकप्रियता की आड़ में मुझ पर हमला करते हैं, इसलिए मोदी का समर्थक चुप हो जाता है। भारत जैसे देश में ईमानदार और नैतिक होने का सामाजिक और संस्थागत ढांचा नहीं है। यहां ईमानदार होने की लड़ाई अकेले की है और हारने की होती है। लोग तंज करते हैं कि कहां गए सत्यवादी रवीश कुमार। कहां गए पत्रकारिता की बात करने वाले रवीश कुमार। मुझमें कमियां हैं। मैं आदर्श नहीं हूं। कभी दावा नहीं किया, लेकिन जब आप यह कहते हैं आप उसी पत्रकारिता के मोल को दोहरा रहे होते हैं, जिसकी बात मैं कहता हूं या मेरे जैसे कई पत्रकार कहते हैं।

मुझे पता था कि मैं अपने पेशे में हारने की लड़ाई लड़ रहा हूं। इतनी बड़ी सत्ता और कारपोरेट की पूंजी से लड़ने की ताकत सिर्फ गांधी में थी। लेकिन जब लगा कि मेरे जैसे कई पत्रकार स्वतंत्र रूप से कम आमदनी पर पत्रकारिता करने की कोशिश कर रहे हैं तब लगा कि मुझे कुछ ज़्यादा करना चाहिए। मैंने हिंदी के पाठकों के लिए रोज़ सुबह अंग्रेज़ी से अनुवाद कर मोदी विरोध के लिए नहीं लिखा था, बल्कि इस खुशफहमी में लिखा कि हिंदी का पाठक सक्षम हो। इसमें घंटों लगा दिए। मुझे ठीक ठीक पता था कि मैं यह लंबे समय तक अकेले नहीं कर सकता। मोदी विरोध की सनक नहीं थी। अपने पेशे से कुछ ज्यादा प्रेम था, इसलिए दांव पर लगा दिया। अपने पेश पर सवाल खड़े करने का एक जोखिम था, अपने लिए रोज़गार के अवसर गंवा देना। फिर भी जीवन में कुछ समय के लिए करके देख लिया। इसका अपना तनाव होता है, जोखिम होता है मगर जो सीखता है वह दुर्लभ है। बटुआ वाले सवाल पूछकर मैं मोदी समर्थकों के बीच तो छुप सकता हूं लेकिन आप पाठकों के सामने नहीं आ सकता।

मैंने ज़रूर सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ सबके बीच आकर बोला। आज भी बोलूंगा। आपके भीतर धार्मिक और जातीय पूर्वाग्रह बैठ गया है। आप मशीन बनते जा रहे हैं। मैं फिर से कहता हूं कि धार्मिक और जातीय पूर्वाग्रह से लैस सांप्रदायिकता आपको एक दिन मानव बम में बदल देगी। स्टूडियो में नाचते एंकरों को देख आपको भी लगता होगा कि यह पत्रकारिता नहीं है। बैंकों में ग़ुलाम की तरह काम करने वाली सैंकड़ों महिला अफसरों ने अपने गर्भ गिर जाने से लेकर शौचालय का भय दिखाकर काम कराने का पत्र क्या मुझसे मोदी का विरोध कराने के लिए लिखा था? उनके पत्र आज भी मेरे पास पड़े हैं। मैंने उनकी समस्या को आवाज़ दी और कई बैंक शाखाओं में महिलाओं के लिए अलग से शौचलय बने। मैंने मोदी का एजेंडा नहीं चलाया। वो मेरा काम नहीं था। अगर आप मुझसे यही उम्मीद करते हैं तब भी यही कहूंगा कि एक बार नहीं सौ बार सोच लीजिए।

ज़रूर पत्रकारिता में भी ‘अतीत के गुनाहों की स्मृतियां’ हैं, जिन्हें मोदी वक्त-बेवक्त ज़िंदा करते रहते हैं, लेकिन वह भूल जा रहे हैं कि उनके समय की पत्रकारिता का मॉडल अतीत के गुनाहों पर ही आधारित है। मैं नहीं मानता कि पत्रकारिता हारी है। पत्रकारिता ख़त्म हो जाएगी, वह अलग बात है। जब पत्रकारिता ही नहीं बची है तो फिर आप पत्रकारिता के लिए मेरी ही तरफ क्यों देख रहे हैं। क्या आपने संपूर्ण समाप्ति का संकल्प लिया है। जब मैं अपनी बात करता हूं तो उसमें वे सारे पत्रकारों की भी बातें हैं, जो संघर्ष कर रहे हैं। ज़रूर पत्रकारिता संस्थानों में संचित अनैतिक बलों के कारण पत्रकारिता समाप्त हो चुकी है। उसका बचाव एक व्यक्ति नहीं कर सकता है। ऐसे में हम जैसे लोग ही क्या कर लेंगे। फिर भी ऐसे काम को सिर्फ मोदी विरोध के चश्मे से देखा जाना ठीक नहीं होगा। यह अपने पेशे के भीतर आई गिरावट का विरोध ज्यादा है। यह बात मोदी समर्थकों को इस दौर में समझनी होगी। मोदी का समर्थन अलग है। अच्छी पत्रकारिता का समर्थन अलग है। मोदी समर्थकों से भी अपील करूगा कि आप गोदी मीडिया का चैनल देखना बंद कर दें। अख़बार पढ़ना बंद कर दें। इसके बग़ैर भी मोदी का समर्थन करना मुमकिन है।

बहरहाल, 23 मई 2019 को आई आंधी गुज़र चुकी है, लेकिन हवा अभी भी तेज़ चल रही है। नरेंद्र मोदी ने भारत की जनता के दिलो-दिमाग़ पर एकछत्र राज कायम कर लिया है। 2014 में उन्हें मन से वोट मिला था, 2019 में तन और मन से वोट मिला है। तन पर आई तमाम तक़लीफों को झेलते हुए लोगों ने मन से वोट किया है। उनकी इस जीत को उदारता के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए। मैं भी करता हूं। जन को ठुकरा कर आप लोकतांत्रिक नहीं हो सकते हैं। उस ख़ुशी में भविष्य के ख़तरे देखे जा सकते हैं लेकिन उसे देखने के लिए भी आपको शामिल होना होगा। यह समझने के लिए भी शामिल होना चाहिए कि आख़िर वह क्या बात है जो लोगों को मोदी बनाती है। लोगों को मोदी बनाने का मतलब है अपने नेता में एकाकार हो जाना। एक तरह से विलीन हो जाना। यह अंधभक्ति कही जा सकती है, मगर इसे भक्ति की श्रेष्ठ अवस्था के रूप में भी देखा जाना चाहिए। मोदी के लिए लोगों का मोदी बन जाना उस श्रेष्ठ अवस्था का प्रतीक है। घर-घर मोदी की जगह आप जन-जन मोदी कह सकते हैं।

मैं हमेशा से कहता रहा हूं कि 2014 के बाद से इस देश के अतीत और भविष्य को समझने का संदर्भ बिन्दु( रेफरेंस प्वाइंट) बदल गया है। चुनाव से पहले ही प्रधानमंत्री मोदी नए भारत की बात करने लगे थे। वह नया भारत उनकी सोच का भारत बन गया है। हर जनादेश में संभावनाएं और आशंकाएं होती हैं। इससे मुक्त कोई जनादेश नहीं होता है। जनता ने तमाम आशंकाओं के बीच अगर एक संभावना को चुना है तो इसका मतलब है कि उसमें उन आशंकाओं से निपटने का पर्याप्त साहस भी है। वह भयभीत नहीं है। न तो यह भय का जनादेश है और न ही इस जनादेश से भयभीत होना चाहिए। ऐतिहासिक कारणों से जनता के बीच कई संदर्भ बिंदु पनप रहे थे। दशकों तक उसने इसे अपने असंतोष के रूप में देखा। बहुत बाद में वह अपने इस अदल-बदल के असंतोष से उकता गई। उसने उस विचार को थाम लिया, जहां अतीत की अनैतिकताओं पर सवाल पड़े हुए थे। जनता ‘अतीत के असंतोषों की स्मृतियों’ से उबर नहीं पाई है। इस बार असंतोष की उस स्मृति को विचारधारा के नाम पर प्रकट कर आई है, जिसे नया भारत कहा जा रहा है।

मैंने हमेशा कहा है कि नरेंद्र मोदी का विकल्प वही बनेगा, जिसमें नैतिक शक्ति होगी। आप मेरे लेखों में नैतिक बल की बात देखेंगे। बेशक नरेंद्र मोदी के पक्ष में अनैतिक शक्तियों और संसाधनों का विपुल भंडार है, मगर जनता उसे ‘अतीत के असंतोष की स्मृतियों’ के गुण-दोष की तरह देखती है। बर्दाश्त कर लेती है। नरेंद्र मोदी उस ‘अतीत के असंतोष की स्मृतियों’ को ज़िंदा भी रखते हैं। आप देखेंगे कि वह हर पल इसे रेखांकित करते रहते हैं। जनता को ‘अतीत के वर्तमान’ में रखते हैं। जनता को पता है कि विपक्ष में भी वही अनैतिक शक्तियां हैं जो मोदी पक्ष में हैं। विपक्ष को लगा कि जनता दो समान अनैतिक शक्तियों में से उसे भी चुन लेगी। इसलिए उसने बची-खुची अनैतिक शक्तियों का ही सहारा लिया। नरेंद्र मोदी ने उन अनैतिक शक्तियों को भी कमज़ोर और खोखला भी कर दिया। विपक्ष के नेता बीजेपी की तरफ भागने लगे। विपक्ष मानव और आर्थिक संसाधन से ख़ाली होने लगा। दोनों का आधार अनैतिक शक्तियां ही थीं, लेकिन इसी परिस्थिति ने विपक्ष के लिए नया अवसर उपलब्ध कराया। उसे चुनाव की चिंता छोड़ अपने राजनीतिक और वैचारिक पुनर्जीवन को प्राप्त करना था, उसने नहीं किया।

विपक्ष को अतीत के असंतोष के कारणों के लिए माफी मांगनी चाहिए थी। नया भरोसा देना था कि अब से ऐसा नहीं होगा। इस बात को ले जाने के लिए तेज़ धूप में पैदल चलना था। उसने यह भी नहीं किया। 2014 के बाद चार साल तक घर बैठे रहे। जनता के बीच नहीं गए। उसकी समस्याओं पर तदर्थ रूप से बोले और घर आकर बैठ गए। 2019 आया तो बची-खुची अनैतिक शक्तियों के समीकरण से वह एक विशालकाय अनैतिक शक्तिपुंज से टकराने की ख्वाहिश पाल बैठा। विपक्ष को समझना था कि अलग-अलग दलों की राजनीतिक प्रासंगिकता समाप्त हो चुकी है। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी या राष्ट्रीय जनता दल के ज़रिये लोकतंत्र में जो सामाजिक संतुलन आया था उसकी आज कोई भूमिका नहीं रही।

बेशक इन दलों ने समाज के पिछड़े और वंचित तबकों को सत्ता-चक्र घुमाकर शीर्ष पर लाने का ऐतिहासिक काम किया, लेकिन इसी क्रम में वे दूसरे पिछड़े और वंचितों को भूल गए। इन दलों में उनका प्रतिनिधित्व उसी तरह बेमानी हो गया जिस तरह अन्य दलों में होता है। अब इन दलों की प्रासंगिकता नहीं बची है तो दलों को भंग करने का साहस भी होना चाहिए। अपनी पुरानी महत्वकांक्षाओं को भंग कर देना था। भारत की जनता अब नए विचार और नए दल का स्वागत करेगी तब तक वह नरेंद्र मोदी के विचार पर चलेगी।

समाज और राजनीति का हिंदूकरण हो गया है। यह स्थायी रूप से हुआ है, मैं नहीं मानता। उसी तरह जैसे बहुजन शक्तियों का उभार स्थायी नहीं था, इसी तरह से यह भी नहीं है। यह इतिहास का एक चक्र है, जो घूमा है। जैसे मायावती सवर्णों के समर्थन से मुख्यमंत्री बनी थी, उसी तरह आज संघ बहुजन के समर्थन से हिंदू राष्ट्र बना रहा है। जो सवर्ण थे वो अपनी जाति की पूंजी लेकर कभी सपा-बसपा और राजद के मंचों पर अपना सहारा ढूंढ रहे थे। जब वहां उनकी वहां पूछ बढ़ी तो बाकी बचा बहुजन सर्वजन के बनाए मंच पर चला गया।

बहुजन राजनीति ने कब जाति के ख़िलाफ़ राजनीतिक अभियान चलाया। जातियों के संयोजन की राजनीति थी तो संघ ने भी जातियों के संयोजन की राजनीति खड़ी कर दी। बेशक क्षेत्रिय दलों ने बाद में विकास की भी राजनीति की और कुछ काम भी किया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर के लिए अपनी भूमिका को हाईवे बनाने तक सीमित कर गए। चंद्रभान प्रसाद की एक बात याद आती है। वह कहते थे कि मायावती क्यों नहीं आर्थिक मुद्दों पर बोलती हैं, क्यों नहीं विदेश नीति पर बोलती हैं। यही हाल सारे क्षेत्रीय दलों का है। वह प्रदेश की राजनीति तो कर लेते हैं मगर देश की राजनीति नहीं कर पाते हैं।

बहुजन के रूप में उभरकर आए दल अपनी विचारधारा की किताब कब का फेंक चुके हैं। उनके पास अंबेडकर जैसे सबसे तार्किक व्यक्ति हैं लेकिन अंबेडकर अब प्रतीक और अहंकार का कारण बन गए हैं। छोटे-छोटे गुट चलाने का कारण बन गए हैं। हमारे मित्र राकेश पासवान ठीक कहते हैं कि दलित राजनीति के नाम पर अब संगठनों के राष्ट्रीय अध्यक्ष ही मिलते हैं, राजनीति नहीं मिलती है। बहुजन राजनीति एक दुकान बन गई है जैसे गांधीवाद एक दुकान है। इसमें विचारधारा से लैस व्यक्ति आज तक राष्ट्रीय स्तर पर एक राजनैतिक विकल्प नहीं बना पाया। वह दल नहीं बनाता है। अपने हितों के लिए संगठन बनाता है। अपनी जाति की दुकान लेकर एक दल से दूसरे दल में आवागमन करता है। उसके भीतर भी अहंकार आ गया। वह बसपा या बहुजन दलों की कमियों पर चुप रहने लगा।

वह अहंकार ही था कि मेरे जैसों के लिखे को भी जाति के आधार पर खारिज किया जाने लगा। मैं अपनी प्रतिबद्धता से नहीं हिला, लेकिन प्रतिबद्धता की दुकान चलाने वाले अंबेडकर के नाम का इस्तेमाल हथियार की तरह करने लगे। वे लोगों को आदेश देने लगे कि किसे क्या लिखना चाहिए। जिस तरह भाजपा के समर्थक राष्ट्रवाद का सर्टिफिकेट बांटते हैं, उसी तरह अंबेडकरवादियों में भी कुछ लोग सर्टिफिकेट बांटने लगे हैं। हमें समझ लेना चाहिए कि बहुजन पक्ष में कोई कांशीराम नहीं है। कांशीराम की प्रतिबद्धता का मुकाबला नहीं है। वह वैचारिक प्रतिबद्धता थी। अब हमारे पास प्रकाश आंबेडकर हैं जो अंबेडकर के नाम पर छोटे मकसद की राजनीति करते हैं। यही हाल लोहिया का भी हुआ है। जो अंबेडकर को लेकर प्रतिबद्ध हैं उनकी भी हालत गांधी को लेकर प्रतिबद्ध रहने वाले गाधीवादियों की तरह है। दोनों हाशिये पर जीने के लिए अभिशप्त हैं। विकल्प गठजोड़ नहीं है। विकल्प विलय है। पुनर्जीवन है। अगले चुनाव के लिए नहीं है। भारत के वैकल्पिक भविष्य के लिए है।

आपने देखा होगा कि इन पांच सालों में मैंने इन दलों पर बहुत कम नहीं लिखा। लेफ्ट को लेकर बिल्कुल ही नहीं लिखा। मैं मानता हूं कि वाम दलों की विचारधारा आज भी प्रासंगिक हैं मगर उनके दल और उन दलों में अपना समय व्यतीत कर रहा राजनीतिक मानवसंसाधन प्रासंगिक नहीं हैं। उसकी भूमिका समाप्त हो चुकी है। वह सड़ रहा है। उनके पास सिर्फ कार्यालय बचे हैं। काम करने के लिए कुछ नहीं बचा है। वाम दलों के लोग शिकायत करते रहते थे कि आपके कार्यक्रम में लेफ्ट नहीं होता है। क्योंकि दल के रूप में उसकी भूमिका समाप्त हो चुकी थी। बेशक महाराष्ट्र में किसान आंदोलन खड़ा करने का काम बीजू कृष्णन जैसे लोगों ने किया। यह उस विचारधारा की उपयोगिता थी। न कि दल की। दल को भंग करने का समय आ गया है। नया सोचने का समय आ गया है। मैं दलों की विविधता का समर्थक हूं, लेकिन उपयोगिता के बग़ैर वह विविधता किसी काम की नहीं होगी। यह सारी बातें कांग्रेस पर भी लागू होती है। भाजपा के कार्यकर्ताओं में आपको भाजपा दिखती है। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में आपको कांग्रेस छोड़ सबकुछ दिखता है। कांग्रेस चुनाव लड़ना छोड़ दे या चुनाव को जीवन-मरण के प्रश्न की तरह न लड़े। वह कांग्रेस बने।

कांग्रेस नेहरू का बचाव नहीं कर सकी। वह पटेल से लेकर बोस तक का बचाव नहीं कर सकी। आज़ादी की लड़ाई की विविधता और खूबसूरती से जुड़ी ‘अतीत की स्मृतियों’ को ज़िंदा नहीं कर पाई। गांधी के विचारों को खड़ा नहीं कर पाई। आज आप भाजपा के एक सामान्य कार्यकर्ता से दीनदयाल उपाध्याय के बारे में ग़लत टिप्पणी कर दीजिए वह अपनी तरह से सौ बातें बताएंगे, पांच साल में कांग्रेस पार्टी नेहरू को लेकर समानांतर विमर्श पैदा नहीं कर पाई, मैं इसी एक पैमाने से कांग्रेस को ढहते हुए देख रहा था। राजनीति विचारधारा की ज़मीन पर खड़ी होती है, नेता की संभावना पर नहीं। एक ही रास्ता बचा है। भारत के अलग अलग राजनीतिक दलों में बचे मानव संसाधान को अपना अपना दल छोड़ कर किसी एक दल में आना चाहिए। जहां विचारों का पुनर्जन्म हो, नैतिक बल का सृजन हो और मानव संसाधन का हस्तांतरण। यह बात 2014 में भी लोगों से कहा था। फिर खुद पर हंसी आई कि मैं कौन सा विचारक हूं जो यह सब कह रहा हूं। आज लिख रहा हूं।

इसके बाद भी विपक्ष को लेकर सहानुभूति क्यों रही। हालांकि उनके राजनीतिक पक्ष को कम ही दिखाया और उस पर लिखा बोला क्योंकि 2014 के बाद हर स्तर पर नरेंद्र मोदी ही प्रमुख हो गए थे। सिर्फ सरकार के स्तर पर ही नहीं, सांस्कृतिक से लेकर धार्मिक स्तर पर मोदी के अलावा कुछ दिखा नहीं और कुछ था भी नहीं। जब भारत का 99 प्रतिशत मीडिया लोकतंत्र की मूल भावना को कुचलने लगा तब मैंने उसमें एक संतुलन पैदा करने की कोशिश की। असहमति और विपक्ष की हर आवाज़ का सम्मान किया। उसका मज़ाक नहीं उड़ाया। यह मैं विपक्षी दलों के लिए नहीं कर रहा था बल्कि अपनी समझ से भारत के लोकतंत्र को शर्मिंदा होने से बचा रहा था। मुझे इतना बड़ा लोड नहीं लेना चाहिए था क्योंकि यह मेरा लोड नहीं था फिर भी लगा कि हर नागरिक के भीतर और लोकतंत्र के भीतर विपक्ष नहीं होगा तो सबकुछ खोखला हो जाएगा। मेरी इस सोच में भारत की भलाई की नीयत थी।

नरेंद्र मोदी की प्रचंड जीत हुई है। मीडिया की जीत नहीं हुई है। हर जीत में एक हार होती है। इस जीत में मीडिया की हार हुई है। उसने लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन नहीं किया। आज गोदी मीडिया के लोग मोदी को मिली जीत के सहारे ख़ुद की जीत बता रहे हैं। दरअसल उनके पास सिर्फ मोदी बचे हैं। पत्रकारिता नहीं बची है। पत्रकारिता का धर्म समाप्त हो चुका है। मुमकिन है भारत की जनता ने पत्रकारिता को भी खारिज कर दिया हो। उसने यह भी जनादेश दिया हो कि हमें मोदी चाहिए, पत्रकारिता नहीं। इसके बाद भी मेरा यकीन उन्हीं मोदी समर्थकों पर है। वे मोदी और मीडिया की भूमिका में फर्क देखते हैं। समझते हैं। शायद उन्हें भी ऐसा भारत नहीं चाहिए, जहां जनता का प्रतिनिधि पत्रकार अपने पेशेवर धर्म को छोड़ नेता के चरणों में बिछा नज़र आए। मुझे अच्छा लगा कि कई मोदी समर्थकों ने लिखा कि हम आपसे असहमत हैं, मगर आपकी पत्रकारिता के कायल हैं। आप अपना काम उसी तरह से करते रहिएगा। ऐसे सभी समर्थकों का मुझ में यकीन करने के लिए आभार। मेरे कई सहयोगी जब चुनावी कवरेज के दौरान अलग-अलग इलाकों में गए तो यही कहा कि मोदी फैन भी तुम्हीं को पढ़ते और लिखते हैं। संघ के लोग भी एक बार चेक करते हैं कि मैंने क्या बोला। मुझे पता है कि रवीश नहीं रहेगा तो वे रवीश को मिस करेंगे।

दो साल पहले दिल्ली में रहने वाले अस्सी साल के एक बुज़ुर्ग ने मुझे छोटी सी गीता भेजी। लंबा सा पत्र लिखा और मेरे लिए लंबे जीवन की कामना की। आग्रह किया कि यह छोटी सी गीता अपने साथ रखूं। मैंने उनकी बात मान ली। अपने बैग में रख लिया। जब लोगों ने कहा कि अब आप सुरक्षित नहीं हैं। जान का ख़्याल रखें तो आज उस गीता को पलट रहा था। उसका एक सूत्र आपसे साझा कर रहा हूं।

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि, तत: स्वधर्मं कीर्ति च हित्वा पापमवाप्स्यसि।।

मुझे प्यार करते रहिए। मुझे ज़लील करने से क्या मिलेगा। आपका ही स्वाभिमान टूटेगा कि इस महान भारत में आप एक पत्रकार का साथ नहीं दे सके। मेरे जैसों ने आपको इस अपराध बोध से मुक्त होने का अवसर दिया है। यह अपराध बोध आप पर उसी तरह भारी पड़ेगा, जैसे आज विपक्ष के लिए उसकी अतीत की अनैतिकताएं भारी पड़ रही हैं। इसलिए आप मुझे मज़बूत कीजिए। मेरे जैसों के साथ खड़े होइये। आपने मोदी को मज़बूत किया। आपका ही धर्म है कि आप पत्रकारिता को भी मज़बूत करें। हमारे पास जीवन का दूसरा विकल्प नहीं है। होता तो शायद आज इस पेशे को छोड़ देता। उसका कारण यह नहीं कि हार गया हूं। कारण यह है कि थक गया हूं। कुछ नया करना चाहता हूं। लेकिन जब तक हूं, तब तक तो इसी तरह करूंगा। क्योंकि जनता ने मुझे नहीं हराया है। मोदी को जिताया है। प्रधानमंत्री मोदी को बधाई।

साभार: https://naisadak.org/is-2019-mandate-is-against-me-also/

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

पुण्य प्रसून बाजपेयी बोले, बीजेपी की जीत ने दे दिए हैं भविष्य के ये संकेत

वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी ने लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजों का किया विश्लेषण

Last Modified:
Friday, 24 May, 2019
Punya Prasun

पुण्य प्रसून बाजपेयी, वरिष्ठ पत्रकार।।

न मुद्दे, न उम्मीदवार सिर्फ मोदी सरकार

गुलाब की पंखुडियों से पटी पड़ी जमीन। गेंदा के फूलों से दीवार पर लिखा हुआ धन्यवाद। दरवाजे से लेकर छत तक लड्डू बांटते हाथ। सड़क पर एसयूवी गाड़ियों की कतार और पहली बार पांचवीं मंजिल तक पहुंचने का रास्ता भी खुला हुआ, ये नजारा कल दिल्ली के नये बीजेपी हेडक्वार्टर का था। दीनदयाल मार्ग पर बने इस पांच सितारा हेडक्वार्टर को लेकर कई बार चर्चा यही रही कि दीनदयाल के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचने की सोच के उलट आखिरी व्यक्ति तो दूर, बीजेपी कार्यकर्ताओं के लिये हेडक्वार्टर एक ऐसा किला है, जिसमें कोई आसानी से दस्तक दे नहीं सकता, जबकि अशोक रोड के बीजेपी हेडक्वार्टर में तो हर किसी की पहुंच हमेशा से होती रही।

2014 की जीत का नजारा कैसे 2019 में कहीं ज्यादा बड़ी जीत के जश्न के साथ अशोका रोड से दीनदयाल मार्ग में इस तरह तब्दील हो जायेगा कि बीजेपी को समाज का पहला और आखिरी व्यक्ति एक साथ वोट देंगे, ऐसा कभी पहले हुआ नहीं था। ये कभी किसी ने सोचा नहीं होगा कि बहुमत की सरकार दूसरी बार अपने बूते करीब 50 फीसदी वोट के साथ सत्ता में बरकरार रहेगी और सिर्फ चार राज्य छोड़कर (तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश,केरल और पंजाब) हर जगह बीजेपी ऐसी धमक के साथ सत्ता की डोर अपने हाथ रखेगी कि न सिर्फ क्षत्रप बल्कि राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को भी अपनी राजनीति को बदलने या फिर नये सिरे से सोचने की जरूरत पड़ेगी, जबकि देश के सामने सारे मुद्दे बरकरार हैं।

बेरोजगारी, किसान, मजदूर, उत्पादन कुछ इस तरह गहराया हुआ है कि आर्थिक हालात बिगड़े हुये हैं। उस पर घृणा, पाकिस्तान से युद्ध, हिंदू राष्ट्र की सोच और गोडसे को ‘जिंदा’ भी किया गया, लेकिन फिर भी जनादेश के सामने मुद्दे-उम्मीदवार मायने रखे ही नहीं। जातियां टूटती नजर आयीं। उम्मीद और आस हिंदुत्व का चोगा ओढ़कर देशभक्ति व राष्ट्रवाद में इस तरह खोया कि न सिर्फ पारंपरिक राजनीतिक सोच, बल्कि अतीत की समूची राजनीतिक थ्योरी ही काफूर हो गई।

पश्चिम बंगाल में धर्म को अफीम कहने-मानने वाले वामपंथी वोटर खिसककर धर्म का जाप करने वाली बीजेपी के साथ आ खड़े हुये। जिस तरह 22 फीसदी वामपंथी वोट एकमुश्त बीजेपी के साथ जुड़ गया, उसने तीन संदेश साफ दे दिये। पहला, वामपंथी जमीन पर जब वर्ग संघर्ष के नारे तले काली पूजा मनायी जाती है तो फिर वही काली पूजा, दशहरा और राम की पूजा तले धार्मिक होकर मानने में क्या मुश्किल है। दूसरा, वाम जमीन पर सत्ता विरोध का स्वर हमेशा रहा है। वाम के तेवर-संगठन-पावर खत्म हुआ तो फिर विरोध के लिये बीजेपी के साथ ममता विरोध में जाने से कोई परेशानी है नहीं। तीसरा, मुस्लिम के साथ किसी जाति का कोई साथ न हो तो फिर मुस्लिम तुष्टिकरण या मुस्लिम के हक के सवाल भी मुस्लिमों के एकमुश्त वोट के साथ सत्ता दिला नहीं सकते या फिर सत्ता को चुनौती देने की स्थिति में नहीं आ सकते हैं।

दरअसल, जनादेश तले कुछ सच उभरकर आ गये और कुछ सच छुप भी गये। क्योंकि 2019 का जनादेश इतना स्थूल नहीं है कि उसे सिर्फ मोदी सत्ता की ऐतिहासिक जीत बताकर खामोशी बरती जाये। लालू यादव की गैरमौजूदगी में लालू परिवार के भीतर के झगड़े और महागठबंधन के तौर तरीके ने उस मिथ को तोड़ दिया, जिसमें यादव सिर्फ आरजेडी से बंधा हुआ है और मुस्लिमों को ठौर महागठबंधन में ही मिलेगी, ये मान लिया गया था। चूंकि तेजस्वी, राहुल, मांझी, कुशवाहा, साहनी के एक साथ होने के बावजूद अगर महागठबंधन की हथेली खाली रह गयी तो ये सिर्फ नीतीश-मोदी-पासवान की जीत भर नहीं है, बल्कि सामाजिक समीकरण के बदलने के संकेत भी हैं।

जिस तरह बिहार से सटे यूपी में अखिलेश-मायावती के साथ आने के बावजूद यादव-जाटव तक के वोट ट्रांसफर नहीं हुये, उसने भविष्य के संकेत तो दे ही दिये कि अखिलेश यादव ओबीसी के नेता हो नहीं सकते और मायावती का सामाजिक विस्तार अब सिर्फ जाटव भर है और उसमें भी बिखराव हो रहा है। फिर बीजेपी ने जिस तरह हिंदू राष्ट्रवाद और देशभक्ति के नाम पर वोट का ध्रुवीकरण किया, उसने भी संकेत उभार दिये कि कांग्रेस जिस तरह सपा-बसपा से अलग होकर ऊंची जातियों के वोट बैंक को बीजेपी से छीनकर अपने अनुकुल करने की सोच रही थी कि जिससे 2022 (यूपी विधानसभा चुनाव) तक उसके लिये जमीन तैयार हो जाये और संगठन खड़ा हो जाये, उसे भारी धक्का लगा है।

जाहिर है बीजेपी और कांग्रेस के लिये भी बड़ा संदेश इस जनादेश में छुपा है। एक तरफ बीजेपी का संकट ये है कि अब वह संगठन वाली पार्टी कम कद्दावर नेता की पहचान के साथ चलने वाली सफल पार्टी के तौर पर ज्यादा है। यानी यहां पर बीजेपी कार्यकर्ता और संघ के स्वयंसेवक की भूमिका भी मोदी के सामने लुप्त सी हो गई। यह वाजपेयी-आडवाणी युग से आगे और बहुत ज्यादा बदली हुई सी पार्टी है, क्योंकि वाजपेयी काल तक नैतिकता का महत्व था। मौरल राजनीति के मायने थे। तभी तो मोदी को भी राजधर्म बताया गया और भ्रष्ट यदुरप्पा को भी बाहर का रास्ता दिखाया गया। लेकिन मोदी काल में महत्वपूर्ण सिर्फ जीत है, इसलिये महात्मा गांधी का हत्यारा गोडसे भी देशभक्त है और सबसे ज्यादा कालाधन खर्च कर चुनाव जीतने का शाह मंत्र भी मंजूर है।

इसके समानांतर कांग्रेस के लिये संभवतः ये सबसे मुश्किल दौर है, क्योंकि बीजेपी तो मोदी सरीखे लारजर दैन लाइफ वाले नेता को साथ लेकर भी पार्टी के तौर पर लड़ती दिखायी दी, लेकिन कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी होकर भी सिर्फ अपने नेता राहुल गांधी को ही देखकर मंद-मंद खुश होती रही। लड़ सिर्फ राहुल रहे थे। प्रियंका गांधी का जादुई स्पर्श अच्छा लग रहा था, लेकिन कांग्रेस कहीं थी ही नहीं। शायद 2019 के जनादेश में जिस तरह की सफलता जगन रेड्डी को आंध्र प्रदेश में मिली, उसने कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी को भी उभार दिया कि उसे न तो अपनों को सहेजना आता है और न ही राजनीतिक दल के तौर पर संभालना आता है।

एक वक्त ममता भी कांग्रेस से निकलीं और जगन रेड्डी भी कांग्रेस से निकले। दोनों वक्त गांधी परिवार में सिमटी कांग्रेस ने दिल बड़ा नहीं किया, उल्टे अपने ही पुराने नेताओं के सामने कांग्रेस के ऐतिहासिक सफर के अहंकार में खुद को डुबो लिया। जिस मोड़ पर राहुल गांधी ने कांग्रेस संभाली, वह पार्टी को कम, नेताओं को ही ज्यादा तरजीह दे मान बैठे कि नेताओं से कांग्रेस चलेगी। इसी का असर है कि कांग्रेस शासित किसी भी राज्य में नेता को इतनी पावर नहीं कि वह बाकियों को हांक सके। मध्य प्रदेश में कमलनाथ के समानांतर दिग्विजय हों या सिंधिया या फिर राजस्थान में गहलोत हो या पायलट या फिर छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल हों या ताम्रध्वज साहू व टीएस सिंह देव, सभी अपने-अपने तरीके से अपने ही राज्य में कांग्रेस को हांकते रहे।

कार्यकर्ता भी इसे ही देखता रहा कि कौन सा नेता कितना पावरफुल है और किसके साथ खड़ा हुआ जा सकता है या फिर अपनी-अपनी कोटरी में सिमटे कांग्रेसी नेताओं को संघर्ष की जरूरत क्या है। ये सवाल न तो किसी ने जानना चाहा और न किसी ने पूछा। तीन महीने पहले अपने ही जीते राज्य में कांग्रेस की 2014 से भी बुरी गत क्यों हो गई, इसका जवाब कांग्रेसी होने में ही छिपा है, जो मानकर चलते हैं कि वे सत्ता के लिये ही बने हैं।

आखिरी सवाल है,  इस जनादेश के बाद होगा क्या? क्योंकि देश न तो विज्ञान को मान रहा है। न ही विकास को समझ सका। न ही सच जानना चाह रहा है। न ही प्रेम या सौहार्द उसकी रगों में दौड़ रहा है। वह तो हिंदू होकर, देशभक्त बनकर कुछ ऐसा करने पर आमादा है, जहां शिक्षा-स्वास्थ्य-पानी-पर्यावरण बेमानी से लगे। देश का प्रधानमंत्री उस राजा की तरह नजर आये, जिसे जनता की फिक्र इतनी है कि वह दुश्मन के घर में घुसकर वार करने की ताकत रखता हो। राजा किसी देवता सरीखा नजर आये, जहां संविधान, सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग भी बेमानी हो जाये, क्योंकि तीन महीने पहले ‘इस बार 300 पार’ का ऐलान करते हुये तीन महीने बाद तीन सौ पार कर देना किसी पीएम के लिये चाहे मुश्किल हो, लेकिन किसी राजा या देवता के लिये कतई मुश्किल नहीं है।

साभार: http://prasunbajpai.itzmyblog.com/

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ अग्निहोत्री ने इस जनादेश से निकाले ये 10 सबक

लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे सामने आने के बाद रखी अपनी राय

Last Modified:
Friday, 24 May, 2019
Amitabh Agnihotri

अब जब लोकसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं और भाजपा ने इनमें शानदार जीत दर्ज की है, ‘नेटवर्क18’ (हिंदी नेटवर्क) के एग्जिक्यूटिव एडिटर अमिताभ अग्निहोत्री ने जनादेश के 10 सबक बताए हैं। इसमें उन्होंने विभिन्न राज्यों का जिक्र करते हुए बताया है कि कैसे जनता के बीच नेता अपनी छवि बरकरार रख पाएंगे और आने वाले चुनावों में जीत दर्ज कर पाएंगे। आइए, जानते हैं कि जनादेश के इन दस सबक के बारे में अमिताभ अग्निहोत्री ने क्या लिखा है।

1:  राजनीतिक पर्यटन करने वाले नेताओं के दिन लदने के संकेत-365 दिन की सक्रियता ही देगी परिणाम।

2: विकास और सुशासन को थाम कर रखने वाले दल ही सियासी सुनामियों में बचा सकेंगे अपने घर-(ओडिशा)।

3:  इलाकों पर पुश्तैनी दावेदारी का युग भी समाप्ति की ओर, जमीन पर सक्रिय रहेंगे तभी टिकेंगे। जैसे-गुना, बागपत, अमेठी।

4: परंपरागत जातीय समीकरणों से परे भी आर्थिक आधार पर बन रहा है एक नया मतदाता समूह। जातियां हैं, लेकिन उनकी जकड़न ढीली हो रही है-यूपी, बिहार इसके उदाहरण हैं।

5: बड़े नाम वालों को अब तुलनात्मक रूप से छोटे नाम वालों से हारने के लिए भी तैयार रहना होगा।

6: मोटेतौर पर दबंग नेताओं के प्रति देश भर में नकार का भाव- हालांकि कुछ अपवाद अभी भी हैं।

7: राज्य और केंद्र को लेकर जनता में पसंद अलग-अलग। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो रीजनल पार्टियां विधानसभा चुनाव में जनता की पसंद हो सकती हैं, लेकिन केंद्र को लेकर जन-मन अलग।

8: गरीब जनता से जुड़ी योजनाओं का मतदान में निर्णायक असर-चाहे राज्य हों या केंद्र।

9: राजशाही की पृष्टभूमि से जुड़े नेताओं को लेकर जनता का सम्मोहन तेजी से टूट रहा है।

10: 40 फीसदी तक भी काम करेंगे तो जनता शेष 60 फीसदी के लिए वादों पर भरोसा कर सकती है, लेकिन बिना डिलीवरी के वादों पर अब भरोसा मुश्किल।

आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो करने के लिए यहां क्लिक कीजिए

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

क्यों इस विदेशी नेता के ट्वीट से पुख्ता हुआ कि ‘मोदी है तो मुमकिन है’?

नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में हिंदी की रौनक बढ़ी है

Last Modified:
Thursday, 23 May, 2019
Narendra Modi

नीरज नैयर, वरिष्ठ पत्रकार।।

‘मोदी है तो मुमकिन है’, यह बात केवल चुनावी परिणामों पर ही लागू नहीं होती, ऐसा बहुत कुछ है जो नरेंद्र मोदी ने मुमकिन कर दिखाया है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को आज जिस नज़रिये से देखा जाता है, उसकी एक बहुत बड़ी वजह मोदी हैं। पाकिस्तान जिस तरह से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है, उसकी एक बहुत बड़ी वजह मोदी हैं। हठी चीन के अपनी हठधर्मिता छोड़ने के पीछे एक बड़ी वजह मोदी हैं। हालांकि, ये बात अलग है कि इन मुद्दों को सियासी चश्मे से देखा जाता है और इसीलिए ‘मोदी है तो मुमकिन है’ केवल पार्टी विशेष का नारा बनकर रह गया है। इसलिए चलिए इसे छोड़ देते हैं।

अब एक ऐसे ‘मुमकिन’ की बात करते हैं, जिसे यकीकन मोदी ही मुमकिन कर पायें हैं और शायद ही कोई इससे इनकार करे। वो ‘मुमकिन’ है हिंदी की रौनक बढ़ाना। पिछली सरकार यानी यूपीए काल में हिंदी और अंग्रेजी में से कौन आगे था, सभी जानते हैं। सरकार के अधिकांश सदस्य तक अंग्रेजी में संवाद करते थे, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह से बदल गई है। मोदी खुद हिंदी में बोलते हैं। ऐसा नहीं है कि उनकी इंग्लिश कमजोर है।

आप गूगल में सर्च करके देख लीजिये, उनके अंग्रेजी वाले सवाल-जवाब भी मिल जायेंगे। वह हिंदी में बोलने में ज्यादा सहज महसूस करते हैं, इसलिए हिंदी बोलते हैं, दूसरों को प्रोत्साहित करते हैं और ‘हिंदी में हर कार्य संभव’ को सरकारी दफ्तरों में टंगे बोर्ड से बाहर निकालकर अमल में लाते हैं। वैसे भी हमारे देश में हिंदी बोलने वालों के विषय में यह मान लिया जाता है कि उनकी अंग्रेजी अच्छी नहीं होगी। अब ऐसा क्यों है, यह शोध का विषय है, क्योंकि हम सभी हिंदी बोलते हुए ही बड़े हुए हैं।

मोदी के होने से यह मुमकिन हुआ है कि सात समुन्दर पार रहने वाले भी हिंदी से प्रेम करने लगे हैं। यदि यकीन न हो तो इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का ट्वीट देख लीजिये। नेतन्याहू सिर्फ अंग्रेजी में मोदी को जीत की शुभकामनाएं देते तो कोई उनसे सवाल नहीं करता, कोई उनकी आलोचना नहीं करता। हम अपने ही देश में हिंदी की अनदेखी करने वालों के साथ ऐसा नहीं करते तो फिर नेतन्याहू तो विदेशी हैं। उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल पर मोदी के बारे में हिंदी में लिखा है।

जीत पर बधाई मिलना स्वाभाविक है, और प्रधानमंत्री बनने पर मनमोहन सिंह को भी दूसरे देशों के प्रमुख से बधाई मिली होगी, लेकिन मुझे याद नहीं पड़ता कि किसी विदेशी पीएम या राष्ट्रपति ने इस तरह हिंदी के प्रति प्रेम दर्शाया हो। संभव है कि मेरी याददाश्त कमजोर हो गई हो या बधाई संदेश बेहद गुप्त रूप से भेजा हो, लेकिन इतना तो तय है कि मोदी ने हिंदी को लेकर जो ‘मुमकिन’ कर दिखाया है, वो पहले नहीं हुआ। इस ‘मुमकिन’ के चलते हिंदी में कामकाज बढ़ा है, काम बढ़ा है तो रोज़गार बढ़ा है। कम से कम हिंदी से जुड़े पत्रकारों या लेखकों के पास तो विकल्प बढ़े ही हैं। हाँ, रोज़गार के आंकड़ों में यदि आप उलझाएंगे तो शायद मैं गलत हो जाऊं, लेकिन इसे सिरे से कोई नहीं नकार पायेगा।

मोदी है तो मुमकिन है, यह बात चुनाव से पहले भी कही जा रही थी, मगर स्वीकार नहीं किया गया। अब परिणाम सबके सामने हैं तो विपक्षी भी यही कहते सुने जा सकते हैं कि ‘मोदी है तो मुमकिन है।’ लिहाजा हिंदी से जुड़े हम लोगों को उम्मीद करनी चाहिए कि मोदी इस मुमकिन को गाड़ी को और आगे ले जायेंगे। उनके पास फ़िलहाल पांच साल हैं, पांच इसलिए कि इससे आगे का मैं नहीं बता सकता, क्योंकि एग्जिट पोल्स वाली एजेंसियों के लिए भी कुछ छोड़ना ज़रूरी है। हाँ, तो उनके पास हिंदी की चमक को और निखारने के लिए फ़िलहाल पांच साल हैं और हम सभी जानते हैं कि ‘मोदी है तो मुमकिन है।’

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो करने के लिए यहां क्लिक कीजिए

 

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

पढ़ें, मोदी की इतनी बड़ी वापसी पर वरिष्ठ पत्रकारों की त्वरित टिप्पणी

लोकसभा चुनाव 2019 में नरेंद्र मोदी की जीत के बताए कई कारण

Last Modified:
Thursday, 23 May, 2019
Senior Journalist

संतोष भारतीय, प्रधान संपादक, चौथी दुनिया

नरेंद्र मोदी की इतनी बड़ी जीत की मुझे कतई उम्मीद नहीं थी। इसके पीछे के त्वरित कारण के तौर पर मैं राहुल गांधी द्वारा पिछले 5 सालों में मजबूत तैयारी न करना मानता हूं।  राहुल गांधी की विफलता है कि वे उन राज्यों में कांग्रेस के संगठन को दुरुस्त नहीं कर पाए, जहां कांग्रेस बेहतर कर सकती थी। साथ ही राहुल गांधी के भाषणों पर देश की जनता भरोसा नहीं कर पाई और वे अपनी बात को कम्युनिकेट करने में फेल रहे। एक बड़ा कारण राहुल गांधी का 24 घंटे पॉलिटिक्स न करने वाली शख्सियत का होना रहा, जबकि इसके उलट नरेंद्र मोदी ने पूरे 5 साल जमकर राजनीति की, चाहे वे विदेश में हो या देश के किसी राज्य में, उन्होंने अपना मजबूत प्रचार किया।

अमित शाह ने जहां लोकसभा चुनावों की भरपूर तैयारी की, वहीं कांग्रेस तो इस चुनाव में लॉजिस्टिक की भी तैयारी करने में असफल रही थी। प्रियंका गांधी ने अपनी टीम जरूर बनाई, पर वे पूरी कांग्रेस को साथ लेकर चलने में चूक गईं। देश के गरीब तबके ने भी ये माना कि मोदी सरकार उसके लिए कुछ योजनाओं पर काम कर रही है। उज्ज्वला योजना, शौचालय निर्माण का सकारात्मक असर दिखा। फर्स्ट टाइम वोटर ने इस उम्मीद में इस सरकार को चुना है कि उसे नौकरी मिल सकेगी। पर आज भी मेरा ये कहना है कि जिस बड़े बहुमत से सरकार चुनकर आती है, अगर वो जनता को किए वादे पूरे न कर पाई तो उसका बुरी तरह से हारना भी निश्चित होता है।

अजय शुक्ल, प्रधान संपादक, आईटीवी (मल्टीमीडिया)

इस जीत के पीछे मैं दो कारणों को अहम मानता हूं। पहला जिस तरह बालाकोट की एयर स्ट्राइक का प्रचार-प्रसार हुआ, उसके चलते राष्ट्रवाद का मुद्दा बहुत मजबूत हुआ। पाकिस्तान के खिलाफ हुए एक्शन के बाद मोदी की छवि आमजन के बीच मजबूत हुई।

दूसरा, मैं इस चुनाव में हुई बड़ी जीत को हिंदू सेंटिमेंट्स से भी जोड़कर देखता हूं। महाकुंभ के जरिये बीजेपी हिंदू सेंटिमेंट्स को भुनाने में कामयाब रही। सांप्रदायिक धुव्रीकरण ने भी इस जीत में अहम भूमिका निभाई है।

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार

जिस तरह पीएम मोदी ने इस चुनाव में हर रैली में उम्मीदवार के बजाय खुद को चुनने की बात कही,उसने इस इलेक्शन का सिनोरियो चेंज किया। ये चुनाव सांसद चुनने का चुनाव न रहकर सीधे पीएम चुनने का चुनाव हो गया। ऐसे में आमजन पर उनकी ये ट्रिक काम कर गई।

दूसरा, जिस तरह लगातार उन्होंने 2022 को लेकर कई योजनाओं का जिक्र किया, ऐसे में पब्लिक ने उन्हें एक और मौका देने का मन बनाया। साथ ही सांप्रदायिक धुव्रीकरण और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर फोकस कर बीजेपी ने इस चुनाव से अहम मुद्दों को नगण्य करने की रणनीति बनाई, जो सफल रही।

आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो करने के लिए यहां क्लिक कीजिए

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

मिस्टर मीडिया! ऐसी भी हकीकत रही है एग्जिट पोल की

हर चुनाव में एग्जिट पोल किए जाते हैं। कभी सच निकलते हैं तो कभी उनके आकलन सटीक नहीं बैठते

Last Modified:
Wednesday, 22 May, 2019
Mister Media

राजेश बादल

वरिष्ठ पत्रकार

हर चुनाव में एग्जिट पोल किए जाते हैं। कभी सच निकलते हैं तो कभी उनके आकलन सटीक नहीं बैठते। देखा जाए तो इन एग्जिट पोल की सफलता का प्रतिशत क़रीब-क़रीब साठ फ़ीसदी है। जब इनके निष्कर्ष सही निकलते हैं तो तारीफ़ के पुल बाँध दिए जाते हैं। मगर जब ये अनुमान सच साबित नहीं होते तो एग्जिट पोल करने वालों के ख़िलाफ़ आसमान सर पर उठा लिया जाता है। यहां तक कहा जाता है कि एग्जिट पोल पहले ही अमुक राजनीतिक दल ने खरीद लिए थे। अचानक ही सर्वेक्षण करने वाले खलनायक की तरह देखे जाने लगते हैं। 

यह सच है कि सर्वेक्षण करने वाले सारे पत्रकार नहीं होते। जहां पेशेवर एजेंसियों को अनुबंधित किया जाता है, उनके अपने प्रोफेशनल होते हैं। एजेंसियां उन्हें प्रशिक्षित करती हैं। इसके बाद ही वे सर्वेक्षण करते हैं। इनमें मीडिया संस्थानों से निकले छात्र भी होते हैं और अन्य नौजवान भी। जब ये पेशेवर  लोगों के बीच जाते हैं तो कुछ बिंदुओं पर वे एक रोबोट की तरह फॉर्म भराते हैं और अपने संस्थान को दे देते हैं। एक कम्प्यूटर में इन सारे नमूनों को संयोजित किया जाता है। फिर उनका निष्कर्ष निकाल कर संबंधित चैनल ,समाचारपत्र या अन्य माध्यमों को भेजा जाता है। यह त्रुटिपूर्ण है।

पेशेवर सर्वेक्षणकर्ता का उद्देश्य दरअसल उन बिंदुओं पर एक प्रामाणिक फॉर्म अपने दफ़्तर में जमा कराना होता है। एक पत्रकार की तरह ख़बर निकालने की स्वाभाविक कला का इसमें कोई इस्तेमाल नहीं किया जाता। इन दिनों मतदाता अपेक्षाकृत अधिक जागरूक है और सतर्क रहता है। आप सोच सकते हैं कि एक नौजवान किसी मतदाता से जब पूछेगा कि वह किसको वोट देगा तो क्या वह सौ फीसदी ईमानदारी भरा सच उत्तर देगा। अगर आप ऐसा सोचते हैं तो माफ़ कीजिए आप भ्रम में हैं। इसलिए असत्य उत्तरों के आधार पर किया गया सर्वेक्षण सत्य कैसे हो सकता है? 

क़रीब पंद्रह-सोलह साल पहले की बात है। मैं एक चैनल में संपादक था। ऐसे ही एक एग्जिट पोल का अनुबंध चैनल की ओर से एक बड़ी एजेंसी को दिया गया। जब उस एजेंसी ने एग्जिट पोल के कुछ बिंदुओं पर सांसद का रिपोर्ट कार्ड दिखाना शुरू किया तो हम लोग हैरान रह गए। उस सर्वेक्षण में ऐसे ऐसे उत्तर पाए गए, जो किसी भी रूप में सच नहीं हो सकते थे। तब एजेंसी से हम लोगों ने भरे हुए नमूना फॉर्म मँगाए। इसके बाद नागपुर के कुछ लोगों को चुना, जिनके नाम से वे सर्वेक्षण फॉर्म भराए गए थे। हमारे संवाददाता उन लोगों से मिले तो हैरान रह गए। एग्जिट पोल करने वाली एजेंसी के प्रोफेशनल उनके पास गए ही नहीं थे। कहीं से नाम -पते लेकर उन सर्वेक्षकों ने ये फॉर्म भर दिए थे। इसके बाद तो हड़कंप मचा। एजेंसी के बिलों से लाखों रूपए हमें काटने पड़े।

इसी तरह एक अन्य एजेंसी में पत्रकारिता के छात्रों को इंटर्नशिप और उसके बाद नौकरी का अवसर मिला। उनमें से कुछ मेरे छात्र रह चुके थे। एक दिन परेशान छात्र मेरे पास आए।  उन्होंने जो जानकारी दी ,वह चौंकाने वाली थी। एजेंसी ने शहरों में भेजकर अपने सेम्पल सर्वे तो कराए, लेकिन जब चैनल ने उस एजेंसी के निष्कर्ष दिखाए तो छात्र हैरान रह गए। वे निष्कर्ष उलट थे। जिस दल की सरकार बनती दिखाई गई ,वह हार गया और जो दल हार रहा था, उसकी सरकार बन गई। मैंने उन छात्रों से सहानुभूति दिखाई और कहा कि अगर वे कुछ समय बेरोज़गारी बर्दाश्त कर सकते हैं तो फ़ौरन एजेंसी छोड़ दें। छात्रों ने ऐसा ही किया।

जब मैंने पत्रकारिता शुरू की तो  अगले साल ही 1977 के आम चुनाव थे। उन दिनों एग्जिट पोल की कोई परंपरा नहीं थी। न टेलीविज़न था और न निजी रेडियो। जिस अखबार का मैं संवाददाता था, उसके समाचार संपादक ने एक दिन बुलाया और चुनाव कवर करने के अनेक नए नए तरीक़े बताए। उनमें से एक मतदाताओं के दिल की थाह लेने की विधि भी थी। इससे आप जान सकते थे कि वह मतदाता किसको वोट दे सकता है। हम नए पत्रकारों ने वह गांठ बाँध ली।  तब से वही काम आ रही है। हालांकि बाद में नई दुनिया और नवभारत टाइम्स में प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर ने कुछ मार्गदर्शक सिद्धांत तथा चुनाव कवरेज के कुछ गुर सिखाए। वे भी आज तक काम आ रहे हैं। लेकिन आजकल शायद इस तरह का प्रशिक्षण देने वाले संपादक कम ही नज़र आते हैं। मैं तो जहां भी अवसर मिलता है, छात्रों को बताने से नहीं चूकता।      

अनेक चैनलों में इस बार इन आकलन अनुमानों पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। वैसे कुछ समाचार चैनलों ने अतीत के अनुभवों से सीखते हुए अपने संवाददाता नेटवर्क की मदद से अपने स्तर पर ही ये एग्जिट पोल कराए हैं। मुझे लगता है कि यह एक बेहतर तरीक़ा हो सकता है। बशर्ते संवाददाताओं  को पूरी तरह प्रशिक्षण दिया जाए।  लोकतंत्र के इस बेहद गंभीर अनुष्ठान को हल्के फुल्के ढंग से नहीं ले सकते मिस्टर मीडिया! 

 

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

यदि सारे एग्जिट पोल गलत निकल गये तो क्या जवाब देंगें ये टीवी पत्रकार

19 तारीख की शाम 4 बजे से एग्जिट पोल का खेल शुरू हो गया है

Last Modified:
Wednesday, 22 May, 2019
EXIT POLL

निर्मलेंदु 
वरिष्ठ पत्रकार

19 तारीख की शाम 4 बजे से एग्जिट पोल का खेल शुरू हो गया है। बीजेपी के खेमे में एग्जिट पोल के नतीजों पर ढोल बजना शुरू हो गया है। उसके बाद न केवल मेनस्ट्रीम मीडिया में, बल्कि सोशल मीडिया में भी इसकी खूब आलोचना हो रही है। 

एग्जिट पोल पर मजे ले रहा है सोशल मीडिया। सुगम शर्मा नाम के ट्विटर यूजर लिख रहे हैं, चाणक्य ने अपने एग्जिट पोल में एनडीए को इतनी सीटें दे दी हैं कि उससे पीएम की कुर्सी के अलावा सेंटर टेबल, डाइनिंग टेबल, बुक शेल्फ, टीवी कैबिनेट और मंझले साइज के 2 स्टूल भी बन सकते हैं...। वहीं दूसरी ओर एक ट्विटर यूजर कैलाश चैधरी ने लिखा, ये जो एग्जिट पोल आ रहे हैं, वे बिल्कुल अखबार में आई राशिफल के समान है, जो कुंवारों को भी संतान प्राप्ति करा देते हैं। यदि एग्जिट पोल को बोतल में से निकला जिन्न है, जो चुनावी नतीजे उलट जाते ही वापस बोतल में चला जाता है, तो शायद गलत नहीं होगा। कोई इसे मोदी सरकार की मीडिया बता रहा है, तो वहीं ज्यादातर चैनलों में यही दिखाया जा रहा है कि इस पोल के मायने क्या हैं। कुछ लोग ये सवाल भी कर रहे हैं कि क्या ये एग्जिट पोल विश्वसनीय हैं। ऐसे में सवाल ये भी उठ रहे हैं कि यदि सारे एग्जिट पोल गलत निकल गये तो... 

मेरा भी यही सवाल चैनल्स और अखबारों से है कि जो आंकड़े एग्जिट पोल्स में दिखाये गये हैं, वे यदि 23 मई को बदल गये और उल्टा हो गया, तो क्या होगा, तो क्या उन पत्रकारों को उल्टा टांग दिया जाएगा, जिन्होंने ऐसी खबरें परोसी हैं। जिन अखबार वालों, चैनल्स और पत्रकारों ने दिन रात मेहनत करके एग्जिट पोल को 19 तारीख तक लोगों तक पहुंचाया, वाहवाही लूटी, एक दूसरे का पीठ थपथपायी, एक दूसरे को बधाइयां दी, जनता को यह अहसास दिलाने की कोशिश भी की कि वे सर्वश्रेष्ठ पत्रकार हैं, उनके आंकड़े गलत नहीं हो सकते, तो जब उनके बारे में सोचता हूं, तो पीड़ा होती है कि उनकी मेहनत बेकार चली जाएगी, यदि ये सब गलत साबित हो गये तो। 

अब सवाल यह है कि यदि एग्जिट पोल के आंकड़े उलट जाते हैं, तो क्या ये सभी पत्रकार जनता से अपनी गलती के लिए माफी मांगंगे या फिर चुनाव आयोग इन पत्रकारों के खिलाफ कोई ऐक्शन लेगा। इन्हें इस बात का अहसास हो कि इनकी जनता और देश के प्रति एक नैतिक जिम्मेदारी है, जो ये नहीं निभा पा रहे हैं। 

मेरे हिसाब से एग्जिट पोल्स की यह परंपरा ही हटा देना चाहिए। चुनाव आयोग इस बात पर गौर करे। वैसे पूर्व राष्टपति ने भी चुनाव आयोग पर उंगली उठाई है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग पर जनता का विश्वास नहीं टूटना चाहिए। ऐक्शन लेना होगा। चुनाव आयोग से प्रणब मुखर्जी ने कहा कि ईवीएम की सुरक्षा जरूरी है। ऐसा करने से लोगों में भ्रम पैदा नहीं होगा और चैनल्स एवं अखबारवाले भी आराम की नींद सोएंगे। दरअसल, अखबार और चैनल्स वालों को सोने के लिए वक्त नहीं मिलता, परिवार को घुमाने के लिए वक्त नहीं मिलता, दोस्तों के साथ चाय पकौड़े खाने का वक्त नहीं मिलता, मां और बाबूजी से बतियाने का वक्त नहीं मिलता और न ही अपने बच्चों को एक दिन स्कूल छोड़ने का वक्त मिलता है, तो उन पत्रकारों को भरपूर वक्त मिलेगा। इस दौरान वे न वे किसी का कुछ खाएंगे, न किसी को खाने देंगे।

खबर यही है कि एग्जिट पोल में मिली खुशी के कारण बीजेपी खेमें में लड्डू बंट रहे हैं। बिहार से यह खबर आई है कि 301 किलो लड्डू का ऑर्डर दे दिया गया है। हालांकि एग्जिट पोल की आंधी में बीजेपी के लिए एक बुरी खबर आई है। खबर यह है कि बीजेपी ने एग्जिट पोल में बड़े घपले किये हैं और इस घपले के निशान बीजेपी छुपा नहीं पाई। दो ट्रक ईवीएम सहित हरियाणा में पकड़े गये हैं। हम सब जानते हैं कि पाप का घड़ा जब भर जाता है, तो वह अपने आप ही फूट जाता है। अब यदि यह कहें कि बीजेपी के हर्ता, कर्ता, विधाता के पाप का घड़ा भर गया है, तो शायद गलत नहीं होगा। खबर तो इन दिनों यही आ रही है कि बीजेपी का सूपड़ा लोकसभा के इस चुनाव में साफ हो जाएगा। जीत की खुशी के बावजूद बीजेपी में खलबली मची हुई है। इन दिनों यह भी कहा जा रहा है कि मोदी के सिपहसालारों ने सर्वे एजेंसियों से कहा था कि बीजेपी के पक्ष में सर्वे दिखाया जाए और साथ ही सूत्रों से यह खबर भी आ रही है कि इसके बदले में न्यूज एजेंसियों को मोटी रकम मिली है। 

कांग्रेस के दिग्गज नेता राशीद अल्वी ने भी कई सवाल खड़े किये हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सर्वे में मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जीत इसलिए दिखाया गया, ताकि लोग यह कहें कि ईवीएम में कोई गड़बड़ी नहीं है। राशीद अल्वी ने इसे साजिश करार दिया है। बता दें कि बीजेपी को 300 सीट दिलाने वाला यह वही मीडिया है, जिसने बालाकोट में मरने वालों की संख्या 300 बताई थी। दरअसल, इन तथाकथित पत्रकारों के कारण देश दो ध्रुवों में बंट गया है। एक तरफ मोदी के प्रशंसक हैं, तो दूसरी ओर उनके आलोचक। देश को बांटने का काम ये तथाकथित पत्रकार ही कर रहे हैं।

लोकतंत्र में पत्रकार, पत्रकारिता, सरकार और कॉरपोरेट घरानों का बहुत बड़ा महत्व होता है। लोकतंत्र में पत्रकार और पत्रकारिता दोनों की ही महत्वपूर्ण भूमिका होती है। समाज में आई गिरावट का पत्रकारिता पर भी प्रभाव पड़ता है, हालांकि अभी भी हमारे कुछ पत्रकार साथी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद पत्रकारिता को गौरवान्वित कर सार्थकता प्रदान कर रहे हैं। कुछ पत्रकार तो ऐसे भी हैं, जिन पर केंद्र सरकार ने बहुत दबाव डाला कि केंद्र पर हमला न करें, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। मुकाबला करना बेहतर समझा, झुके नहीं, हारे नहीं। इस श्रेणी में रवीश कुमार, पुण्य प्रसून वाजपेयी, करण थापर, विनोद दुआ, अजीत अंजुम, आशुतोष, अभिसार शर्मा जैसे वरिष्ठ पत्रकार शामिल हैं। हमें यह याद रखना होगा कि व्यक्ति अपने गुणों से उपर उठता है, उंचे स्थान पर बैठने से नहीं। 

लेकिन एक सच यह भी है। आजकल पत्रकारिता सरकार के विवेक पर नहीं, बल्कि संपादक की इच्छा पर तथा संपादक की इच्छा सरकार की इच्छा पर आधारित होती जा रही है। सरकार चाहे, तो वे पत्रकार बना रहे, सरकार नहीं चाहेगी, तो उसे संस्थान छोड़ना होगा। सरकार के विरुद्ध लिखना और चैनलों में दिखाना अपराध जैसा हो गया है। इस अपराध का दंड भी मिलता है। अब पत्रकारों पर कड़ी नजर रखी जाती है कि वह कहां जा रहा है और किससे मिल रहा है। विरोधियों को अखबार और चैनल्स में कितना स्पेस मिलता है, इसकी भी स्क्रूटिनी लगातार सरकार करती रहती है। अगर सरकार के खिलाफ किसी चैनल ने ज्यादा कुछ दिखा दिया, तो उसे कटघरे में लाकर खड़ कर दिया जाता है। उस चैनल पर तरह तरह से दबाव पड़ने लगता है। दरअसल, आज के तथाकथित चैनल मालिक चैनल के कन्टेंट पर अपनी पकड़ बनाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, क्योंकि उनके ऐसे कदम पर मीडियाकर्मियों या उनके संगठनों की तरफ से प्रतिरोध नाममात्र का ही होता है। विडंबना तो यही है कि न तो काॅरपोरेट घरानों और न ही उनके नुमांइदे बने संपादकों को अब काॅन्टेंट से ज्यादा कुछ लेना देना रह गया है और न ही सच्चाई से। इसी वजह से पत्रकारिता अब एक नौकरी का रूप धारण कर चुकी है। या तो संपादक गायब हो चुके हैं, या फिर उनमें संपादकीय शक्ति का क्षरण हुआ है। आश्चर्य की बात तो यही है कि दूसरों के लिए आवाज उठानेवाले पत्रकार आज अपने ही संस्थानों में शोषित और दमित हैं। उनकी आवाज दबा दी जाती है। सरकार के रहमो करम पर नौकरी कर रहे हैं कुछ तथाकथित पत्रकार। जरूरत से ज्यादा सैलरी देकर कुछ पत्रकारों को खरीद लिया जाता है। वे वही दिखाते हैं, जो सरकार चाहती है। पत्रकारों पर दबाव डाल कर सरकार जिस तरह से इस बिरादरी को नुकसान पहुंचा रही है, वह देखकर ऐसा महसूस होता है कि आने वाले समय में सरकार को आईना दिखाने वाला कोई नहीं होगा। हालांकि इससे सरकार को ही नुकसान होगा, क्योंकि सरकार को भले काम में और बुरे काम में कोई फर्क महसूस नहीं होगा। 

दरअसल, पत्रकारिता पर व्यवसाय के हावी होने के कारण ही बाजार में बिकनेवाली आम सामग्री की तरह समाचार भी अब एक सामग्री बनकर रह गया है। हैरानी तो इस बात की है कि न केवल अखबार, बल्कि न्यूज चैनल्स भी अब दूसरों को प्रचार देने के बजाय खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने में लगे हुए हैं। ऐसे में यदि यह कहें कि बाजारवाद की दुहाई ज्यादातर पत्रकार जी हुजूरी में लग गये हैं, तो शायद गलत नहीं होगा।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

‘वर्ना कहीं तो सजेगी ही स्ट्रिंगर्स की दुकान’

स्ट्रिंगर्स को पैसा नहीं देने के मामले में नेशनल के साथ ही कई क्षेत्रीय चैनल्स भी शामिल हैं

Last Modified:
Tuesday, 21 May, 2019
Media

एक स्ट्रिंगर, बरेली।।

देश में एक से बढ़कर एक न्यूज चैनल ने दस्तक दी और एक से बढ़कर एक टैगलाइन के साथ मीडिया के क्षेत्र में प्रवेश किया| लोगों ने भी बड़ी उम्मीद के साथ नए चैनलों का साथ पकड़ा कि उन्हें अपनी मेहनत का पैसा मिलेगा, लेकिन यह सिर्फ उम्मीद बनकर रह गई|

आपको जानकर हैरानी होगी कि एक तरफ चैनल के मालिक राजनीतिक दलों से मोटा पैसा कमाते रहे, वहीं अपने स्ट्रिंगर को एक टका रुपया नहीं दिया| ऐसा नहीं कि यह देश में पहली बार हुआ, पहले भी होता रहा है, लेकिन कोई सरकार आज तक टीवी चैनल के मालिकों के खिलाफ कार्यवाही की हिम्मत नहीं जुटा सकी, आखिर उन्हें भी टीवी चैनल के मालिकों से डर लगता है| पैसा नहीं देने के मामले में नेशनल चैनल के साथ क्षेत्रीय चैनल भी शामिल हैं | मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि 100 में से 99 चैनल ऐसे होंगे जो स्ट्रिंगर से फ्री में या फिर पेमेंट देने के आश्वासन पर काम करा रहे होंगे |

अब सवाल इन चैनलों के संपादकों का उठता है कि आखिर वह चैनल में बैठकर क्या कर रहे होंगे| क्या उन्हें अपने स्ट्रिंगर और चैनल की रीढ़ कहे जाने वाले शख्स की चिंता नहीं है तो आपको बता दें उन्हें किसी की समस्या से क्या मतलब? संपादक जी को अपनी मेहनत का पैसा मिल रहा है, साथ ही साधु-संतों की तरह अच्छी बातें करने को मिल रही हैं और अगर कोई पेमेंट मांग रहा है तो उनके पास बाहर का रास्ता दिखाने का अधिकार भी है। इस अधिकार को वे जब चाहें, तब प्रयोग कर लेते हैं|

अब सवाल उन स्ट्रिंगरों का आखिर कि वह अपने परिवार की जिम्मेदारी कैसे निभाएं तो उन्होंने भी इसका थोड़ा सा इंतजाम कर लिया है। कहीं से कुछ दाल-दलिया मिल गया तो बेहतर, वर्ना उनकी दुकान कहीं तो सजेगी ही| अब समाज भी यह बात समझ गया है आखिर मीडिया को बिकाऊ मीडिया का तमगा क्यों मिला है| मेरी मालिकान से गुजारिश है कि अपनी ‘लेबर’ का भुगतान करें, नहीं तो लाखों उन स्ट्रिंगरों की हाय आपको सुनामी की गति से तेज उड़ाकर ले जाएगी| फिर नहीं बचेगा आपका साम्राज्य|

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

Exit Poll तो आपने खूब देख लिए, अब पढ़िये ये मजेदार विश्लेषण

चुनाव को लेकर सोशल मीडिया पर भी क्रिएटिविटी की बहार

Last Modified:
Monday, 20 May, 2019
Pramia Dixit

प्रमिला दीक्षित

वरिष्ठ पत्रकार

‘शुरू करो एक्ज़िट पोल, लेकर प्रभु का नाम, समय बिताने के लिए करना है कुछ काम....म...म से। म से मोदी.....द से दोबारा मोदी! कुछ भी कर लो, लेकिन आएगा तो मोदी ही! कुल मिलाकर इसी थीम पर हर एग्ज़िट पोल ने नतीजा दिखाया. अब चूंकि बात एक ही है और एक्सक्लूसिव या सबसे पहले भी कहलानी है, सो हर चैनल ने अपना-अपना कोडवर्ड अलग रखा। ‘आजतक’ ने उसे सबसे चौंकाने वाले नतीजे कहा, ये अलग बात है पिछले दिनों ‘आजतक’ के तेवर जो रहे हैं, वो खुद ही इससे चौंक गए होंगे। लेकिन भव्य सेट से एकदम संजय लीला भंसाली टाइप माहौल कैसे तानना है ‘आजतक’ जानता है, इसीलिए कभी मैदान में दौड़ते घोड़े और कभी सुपर मारियो की तर्ज़ पर कूदकर आते राहुल-मोदी के कार्टून, एग्ज़िट पोल में दिलचस्पी न रखने वालों को भी थोड़े समय तो बाँध ही रहे होंगे।

इलेक्शन मतलब ‘एबीपी न्यूज़’ कहने वाले ‘एबीपी’ ने भी विशेषज्ञों की अलग-अलग रेजींमेंट बुला रखी थी और काउंट डाउन चलाकर ठीक छह बजे दर्शकों के लिए कूच कर दिया। एबीपी ने चुनाव नतीजों और कवरेज में पिछले कई वर्षों में एक पहचान ज़रूर बनाई है, लेकिन हाल-फ़िलहाल उसका वही हमेशा वाला फ़ॉर्मैट अब थोड़ा उबाने लगा है।

‘एनडीटीवी’ को आप लाख बायस्ड समझें, लेकिन उन्होंने अपने अलावा हर चैनल का एग्ज़िट पोल दिखाया, बीच-बीच में-ये नतीजे नहीं हैं, कहकर मरहम भी लगातार लगाया। रवीश कुमार हमेशा की तरह मोदी के साथ गोदी पर पूरा ज़ोर दिए रहे, ये कहकर कि अगर नतीजे वैसे ही आते हैं, जैसे एग्ज़िट पोल हैं तो कुछ एंकर्स और मीडिया मालिकों को भी मंत्री पद दिया जाना चाहिए। अगर यही रवायत रहनी है तो तैयार रहिए, कुछ एंकर राहुल गांधी के बग़ल में बैठकर विपक्ष की प्रेस कांफ्रेंस भी करते दिखाई दिया करेंगे।

आज फिर ‘ज़ी’ ने की तमन्ना है। कहते हैं किसी नतीजे को दिल से चाहो तो सारे एग्ज़िट पोल उससे मिलाने में जुट जाते हैं, ‘जी’ देखकर कुछ ऐसा ही फ़ील आ रहा था, जहाँ चैनल का पूरा ज़ोर अपना एग्ज़िट पोल दिखाने से ज़्यादा दूसरों के एग्ज़िट पोल का DNA टेस्ट करने के प्रचार पर था।

‘आजतक’ के घोड़े जब तक दौड़ते, ‘रिपब्लिक भारत’ सरकार बना चुका था और शान से ‘तक वाले चैनल कहां रह गए’  कह-कहकर नंबर वन या गुप्त दौड़ के लिए अपना दावा पेश करता रहा। ‘न्यूज़ नेशन’ ने दीपक चौरसिया के आने के बाद एक बार फिर से मार्केट में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश की है। वैसे भी प्रधानमंत्री का जो इंटरव्यू सबसे ज्यादा रडार पर रहा, वो दीपक चौरसिया ने ही लिया था।

बाकी रही राहुल गांधी के इंटरव्यू की बात, मेरा पर्सनल फेवरेट वो ‘आँखों की ग़ुस्ताख़ियां माफ हों’ वाला था। ख़ैर मोदी जी की माया मोदी जी ही जानें। हर चरण के लिए उनके तरकश में नया तीर था। आख़िरी में उन्होंने साधना से जो साधा है, उन्हें ‘ द मॉन्क हू ध्वस्त एवरीबडीज़ तैयारी’ का ख़िताब तो बनता ही है।

पूजा अर्चना की इन विधियों और प्रणालियों का इतिहास में भी महत्व रहा है, फ़ौरन सोशल मीडिया पर इसके सुबूत मिल गए। सुबूत से याद आया, सोशल मीडिया पर अरविंद केजरीवाल का ‘मौत से डर लगता है साहब’ टाइप बयान  ‘मोदी जी मुझे मरवाना चाहते हैं’ बहुत चर्चा में रहा। ये अलग बात है कि इस बयान की मौज सबने ली, संज्ञान किसी ने नहीं लिया।

एग्ज़िट पोल से भक्तों में उत्साह है और उन पत्रकारों में रोष और दुख, जिन्हें राहुल गांधी अपनी ओर से नरेंद्र मोदी की प्रेस कांफ़्रेंस में भेजना चाहते थे। इंडिया शाइनिंग के जले इस एक्ज़िट पोल पर फूंक-फूंक के प्रतिक्रिया दे रहे हैं, हालांकि खुशी फिर भी छिपाए नहीं छुप रही।

सोशल मीडिया पर क्रिएटिविटी की बयार है। लोग कह रहे हैं हलवाई सौ प्रतिशत एडवांस पेमेंट पर ही कांग्रेसियों के लड्डू का आर्डर ले रहे हैं। मेरी तो सलाह है पार्टियां लड्डू की बजाय पटाखे ले लें। जीत गए तो कांफिडेंस के साथ कह सकते हैं ‘हम अपनी जीत के लिए आश्वस्त थे’ वरना वर्ल्ड कप तो नज़दीक है ही!

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए