केजरीवाल से अलग हुए आशुतोष के बारे में आप ये सब कतई नहीं जानते होंगे...

जनवरी 2014 की कोई तारीख थी। मैं ‘न्यूज 24’ के अपने दफ्तर में बैठा था। तभी...

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Wednesday, 22 August, 2018
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अजीत अंजुम

वरिष्ठ पत्रकार

जनवरी 2014 की कोई तारीख थी। मैं ‘न्यूज 24’ के अपने दफ्तर में बैठा था। तभी ‘आईबीएन7’ में काम करने वाले दोस्त संजीव पालीवाल का उदयपुर से फोन आया। उठाते ही एक सूचना ठक्क से कान में गिरी- ‘आशुतोष ने इस्तीफा दे दिया है।’ मेरे जुबान से बेसाख्ता निकला- क्या? इस्तीफा दे दिया? कैसे? कब? क्यों? सारे बेसब्र सवाल एक साथ मैंने झोंक दिए। हमेशा की तरह ठंडे दिमाग से बात करने वाले शांत चित्त संजीव पालीवाल ने जो बताया, उससे एक बार फिर चौंका।

संजीव से पता चला कि अब आशुतोष केजरीवाल की पार्टी जॉइन करने जा रहा है। मैंने उनसे एक-दो सवाल और पूछे फिर तुरंत उनका फोन काटा। मेरे भीतर तब तक इतनी बेचैनी पैदा हो चुकी थी, जो संजीव के जवाबों से शांत नहीं होने वाली थी। मैंने तुरंत आशुतोष को फोन मिलाया। उसका फोन लगातार बिजी आ रहा था। मेरा वश चलता तो उसके फोन में जबरन प्रवेश कर उस तक पहुंचता कि ये सब कर दिया और हमें बताया तक नहीं लेकिन ये मुमकिन न था।


बेचैन आत्मा की तरह मैंने ‘आईबीएन7’ के ही पत्रकार मित्र अनंत विजय समेत उनके कुछ सहयोगियों को फोन किया और जानने की कोशिश की कि क्या आशुतोष दफ्तर में हैं? बताया गया कि वो लोगों से मिल-जुल रहे हैं। उनकी विदाई की तैयारी हो रही है। मैंने इतनी देर में ‘आजतक’ के एडिटर सुप्रिय प्रसाद और ‘एबीपी न्यूज’ के मिलिंद खांडेकर से लेकर ‘इंडिया टीवी’ के एडिटर रहे विनोद कापड़ी तक, कई लोगों को फोन खटखटा दिया, इसी बेचैनी में कि आशुतोष के बारे में अब तक किसे क्या पता है? सबको तब तक उतना ही पता था, जितना मुझे। किसी को पहले से कोई भनक नहीं थी और आशुतोष ने बम फोड़ दिया था। कुछ ऐसे भी थे, जिनके लिए ये कोई चौंकाने वाली जानकारी नहीं थी क्योंकि बीते कुछ महीनों से आशुतोष अपने विचारों, अपनी बहसों और अपनी टिप्पणियों की वजह से आम आदमी पार्टी के करीबी और सिंपेथाइजर माने जाने लगे थे।


उन दिनों दिल्ली में कांग्रेस के बाहरी समर्थन से सरकार चला रहे केजरीवाल के ‘वृहद सलाहकार मंडल’ के सदस्य के तौर पर आशुतोष, एनके सिंह, अभय दूबे, पुण्य प्रसून बाजपेयी समेत कई पत्रकारों का जिक्र होता रहता था। दोस्त होकर भी मैंने कभी आशुतोष से इस बारे में पूछा नहीं और उन्होंने कभी कुछ बताया भी नहीं। पूछता तो भी नहीं बताता, शायद इस वजह से भी मैं अपनी जिज्ञासाओं को दूसरों से मिली आधी-अधूरी जानकारियों से शांत करता रहा। आशुतोष पेट का जितना गहरा है, मैं उतना ही हल्का। मेरे पेट में बात पचती नहीं, जब तक एक -दो मित्रों से ये कहते हुए बता न दूं कि किसी से कहिएगा मत, सिर्फ आपको बता रहा हूं। इस मामले में आशुतोष का हाजमा इतना दुरुस्त है कि उसे किसी किस्म के हाजमोला की जरुरत नहीं होती।


बीते चार-पांच महीनों के दौरान भी हम कई बार आशुतोष से मिलते रहे। घंटों बैठते रहे। दुनिया भर की बातें करते रहे। लिखी जा रही उसकी किताब पर पर बात होती रही। इतना तो समझ चुके थे कि अब वो लंबे समय तक केजरीवाल की पार्टी में नहीं रहेगा। मंगलवार को भी उनके पढ़ने-लिखने को लेकर बात हुई लेकिन ये नहीं कहा कि कल उसके इस्तीफे की खबर सरेआम होने वाली है। पिछली बार की तरह इस बार भी संजीव पालीवाल ने ही अमर उजाला वेबसाइट की खबर का लिंक भेजा तो पता चला कि हो गया, जो होना था।


‘आईबीएन7’ से इस्तीफे के दिन भी मैं आशुतोष से बात होने के पहले और बाद होने के बाद बहुत देर तक चिढ़ा रहा कि इतना बड़ा फैसला कर लिया और हमें बताया तक नहीं। घंटा दोस्त हैं हम लोग। एक हम हैं कि सारी बातें एकतरफा पाइपलाइन से सप्लाई करते रहते हैं, एक ये आदमी है कि कुछ भनक ही नहीं लगने देता।


खैर, आशुतोष ‘आईबीएन7’ से अपना सामान समेटकर बाहर निकला और दो-चार दिन यार-दोस्तों के बीच बैठकी के बाद केजरीवाल की 'अंतरंग मंडली' में समाहित हो गया। उसके इस्तीफे के साथ ही चर्चा होने लगी थी कि वो दिल्ली के किसी इलाके से लोकसभा चुनाव लड़ेंगे। मैंने दो-चार ये भी पूछा तो उसने हां -ना -देखेंगे टाइप का ही जवाब दिया लेकिन उनकी बातों से लगता था कि रास्ता उसी तरफ जा रहा है। भले वो खुलकर न बोले। खैर, वो दौर केजरीवाल के उठान का दौर था। दिल्ली में अन्ना आंदोलन के गर्भ गृह से निकली आम आदमी पार्टी की कांग्रेस के बाहरी सपोर्ट से सरकार बन गई थी। मीडिया के बड़े हिस्सा देश में वैकल्पिक राजनीति के योद्धा के तौर पर केजरीवाल को प्रोजेक्ट कर रहा था। उनके नाम की मुनादी की जा रही थी। तो लोगों ने यही माना कि आशुतोष ने लोकसभा के लिए ही संपादक की नौकरी और पत्रकारिता छोड़ी है। चैनल में रहते हुए पहले अन्ना आंदोलन, फिर केजरीवाल की पार्टी का सपोर्ट करते दिखने की वजह से पहले भी उनकी आलोचना होती रही थी। हम जैसे दोस्ते भी गाहे-बगाहे तंज कसकर उसे सुलगा देते थे। अपने को सही मानने के उसके तर्क जब तू-तू-मैं-मैं का माहौल क्रिएट करना लगता तो या तो मैं चुप हो जाता, या वो।


आशुतोष का हमेशा यही तर्क होता था कि देश एक नए किस्म की क्रांति का चश्मदीद बन रहा है और इस क्रांति का हिस्सा बनने के लिए मैं एक बार अपने रास्ते बदलना चाहता हूं। वो क्रातंकारी इतिहास का किरदार बनने पर आमादा था, अदना ही सही। एक दोस्त के नाते मुझे हर वक्त लगता था कि ये आदमी राजनीति में चलेगा कैसे? वोट मांगने से लेकर चंदा मांगने तक और कार्यकर्ताओं को खुश रखने से लेकर केजरीवाल के गुड बुक में लंबे समय तक बने रहने के लिए जरुरी शर्तें कैसे पूरा करेगा? औपचारिक मुलाकातों, बातों या मीटिगों में टू द पॉइंट बात करने वाला, ‘मैं सही सोचता हूं’ जैसे आत्मरचित इगो को ढ़ोने वाला, जरूरी मौकों पर भी कदम पीछे खीचने की बजाय दो कदम आगे बढ़ जाने वाला और किसी के प्रति अपनी नापसंदगी को अक्सर सहेजकर रखने वाला आशुतोष नेतागीरी की मायावी दुनिया में टिकेगा कैसे?


जिस दिन आशुतोष ने औपचारिक तौर 'केजरीवाल की टोपी' पहनी, उस दिन उसे मैंने 'न्यूज 24' पर अपने शो 'सबसे बड़ा सवाल' में गेस्ट के तौर पर बुलाया और पत्रकार के नेता बने आशुतोष को बेमुरौवत होकर जितना छील सकता था, छीलने की कोशिश की। वो हंस-हंसकर जवाब देता रहा। ऐसा लगा जैसे वो कायांतरण करके ही स्टूडियो आया था। कुछ ये भी कह सकते हैं कि मेरा लिहाज था कि तीखे तंज झेलता रह गया। शायद किसी दूसरे को अपनी आदत के मुताबिक थोड़ा जवाब देता।

इसी बीच 2014 के लोकसभा चुनाव का ऐलान हो गया। आशुतोष चांदनी चौक से ‘आप’ के उम्मीदवार घोषित हो गए। मैं ‘न्यूज24’ का मैनेजिंग एडिटर था, लिहाजा एक दोस्त होकर भी उनके साथ कभी उनके लोकसभा क्षेत्र में नहीं गया। न जाने और साथ न खड़े होने का मलाल भी कभी हुआ, लेकिन नेता हो चुके मित्र के साथ मैं संपादक रहते मैदान में नहीं दिख सकता था। हां, कभी-कभार उसका हालचाल उससे या उनकी पत्नी मनीषा से पूछता रहा। उसके प्रचार में लगे कुछ लोगों से भी बात होती रही। चुनाव के दौरान लाखों के फंड के जरूरत होती है। आशुतोष के हाथ तंग थे। पार्टी ने भी शायद उसे चुनाव मैदान में उतारकर खुद अपना इंतजाम करने के लिए छोड़ दिया था। कुछ दोस्तों ने उसकी कुछ मदद भी की।

कांग्रेस के अरबपति उम्मीदवार कपिल सिब्बल और बीजेपी के दिग्गज हर्षवर्धन के मुकाबले आशुतोष मजबूती से लड़ा, लेकन तीन लाख वोट पाकर भी करीब एक लाख से हार गया। लोकसभा के दरवाजा उसके लिए खुलने से पहले ही बंद हो गए। लगा कि ये आदमी हताश हो जाएगा। लाखों की ग्लैमरस नौकरी छोड़कर राजनीति में धक्के कब तक खाता रहेगा, लेकिन आशुतोष ने कभी ऐसा अहसास ही नहीं होने दिया कि वो अपने फैसले पर पछता रहा हो। उसने लगातार तीन सालों तक पार्टी के लिए पूरी वफादारी से काम किया। निजी बातचीत में भी उसने कभी केजरीवाल या पार्टी के तौर-तरीकों को लेकर नाराजगी नहीं जाहिर की। कई मौकों पर हम जैसे दोस्त उसके बयानों, उसकी पार्टी के फैसलों या तौर-तरीकों को लेकर रपेटते रहे लेकिन वो हमेशा प्रवक्ता ही बना रहा। भिड़कर, लड़कर हमेशा हावी होने की कोशिश करता रहा।

एक बार दिल्ली के फॉरेन कॉरेस्पोंडेंट क्लब में हमारी बहस के दौरान आशुतोष मीडिया में काम कर रहे हम जैसों को रीढ़विहीन और टीवी संपादकों को सत्ता का चाटूकार कहने लगा तो गुस्से में मैंने कई अप्रिय सवालों से उसे घेर दिया। उसे यहां तक कह दिया कि जब सब मिलकर केजरीवाल की डुगडुगी बजा रहे थे, तब आप लोगों को पत्रकारिता सही कैसे लग रही थी? किसी भी नेता के लिए आंख मूंदकर बिछ जाना सही कैसे है, चाहे केजरीवाल हों या मोदी? आईबीएन7 से आपके कार्यकाल में छंटनी हुई तो आप तमाशबीन क्यों बने रहे? उसी समय क्यों नहीं इस्तीफा दे दिया था? आपने इस्तीफा चुनाव के चार-पांच महीने पहले या दिल्ली में केजरीवाल सरकार बनने के बाद क्यों दिया? ये वो सवाल थे, जो सोशल मीडिया पर भी लगातार आशुतोष का पीछा कर रहे थे। जवाब उसके पास भी था लेकिन बहस ने इतना आक्रामक रुख ले लिया कि हम दोनों एक दूसरे की बात सुनने-समझने के दायरे से बाहर निकल गए। वहां मौजूद वरिष्ठ पत्रकार शैलेश के साथ हमारी पत्नियों को बीच-बचाव करना पड़ा। मैं जानता हूं कि आईबीएन7 के अपने उस दौर में भी आशुतोष बहुत बेचैनियों से गुजरा था। अपने तरीके से उसने संस्थान में अपना विरोध भी दर्ज कराया था। कुछ हद तक कॉरपोरेट पत्रकारिता की मजबूरियों के कैदी आशुतोष के लिए आज इतना ही कह सकता हूं कि ‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं कोई बेवफा नहीं होता’।

खैर, उस रात की बहस का नतीजा ये हुआ कि हम लंबे समय के लिए एक दूसरे से दूर हो गए। दोनों ने सोचा कि ऐसी बाता-बाती और लड़ाई होने से बेहतर है कम मिलना। तो हम कम मिलने लगे। मुझे लगता था कि यार कभी तो अपनी कमियां भी मानों। रैली में मत मानों। मीटिंग में मत मानों। सार्वजनिक जगहों पर मत मानों। मीडिया के सामने मत मानों। विरोधियों के सामने मत मानों लेकिन जब आपस में दोस्त की तरह बात कर रहे हैं, तब तो अपने को थोड़ा ढ़ीला छोड़ो। आशुतोष की दाद देनी पड़ेगी कि उसने कभी अपने को ढीला नहीं छोड़ा। आप इसे खूबी मानें या खामी। उसके जाने के बाद हम जरूर कहते कि यार ये कैसा आदमी है, कभी तो मान ले कि इसकी पार्टी या ये खुद भी गलत हो सकता है।

आशुतोष ऐसा ही है। उसे जो बात जहां कहनी और जहां माननी होगी, वहीं कहेगा और वहीं मानेगा। चैनल में राजदीप सरदेसाई अगर उसके बॉस थे, तो संस्थान के बारे कुछ कहना होगा तो उन्हीं से कहेगा। पार्टी में जो कहना होगा, पार्टी नेतृ्त्व से कहेगा। बाकी जगह वो लूज कैनन बनकर हल्का नहीं होगा। यही उसकी खासियत है। यही उसकी ताकत है और यही बात उसे औरों से अलग करती है।

आशुतोष ने पत्रकारिता में अपने करियर का पीक देखा है। लंबे अरसे तक ‘आजतक’ जैसे चैनल के ऊंचे ओहदे पर रहा। नामचीन एंकर रहा। उसके बाद करीब आठ साल तक आईबीएन7 का संपादक रहा। चैनल का प्रमुख चेहरा रहा। लाखों की सैलरी सालों-साल पाता रहा लेकिन उसका रहन-सहन और लापरवाह अंदाज किसी संघर्षशील पत्रकार की तरह ही रहा। दो जींस। ढीले-ढाले, एक दो पैजामे, कुछ पुराने टी-शर्ट। पत्नी मनीषा की खरीदी हुई दो-तीन शर्ट्स और साधारण सी सैंडिल। गाड़ी के नाम पर जब कंपनी ने लंबी गाड़ी दे दी तो आशुतोष ने वो गाड़ी अपनी पत्नी के हवाले करके अपने लिए छोटी गाड़ी ले ली। कई बाहर जाना हो अपने बैग पैक में दो मुड़े-तुड़े कपड़े रख लिया और चलने को तैयार। एंकर था तो सबसे घटिया और पुरानी टाई और बेमेल शर्ट पहनकर टीवी पर अवतरित हो जाता। मैं कई बार मनीषा को फोन करता कि इस बंदे को स्क्रीन के लिए कुछ कायदे के कपड़े खरीदवा दीजिए। वो कहतीं क्या करें अजीत जी, ला भी देती हूं तो पता नहीं कहां रख देता है और वही घिसी हुई टाई पहनकर बैठ जाता है। कोई दिखावा नहीं। भौतिक चीजें हासिल करने का कोई शौक नहीं, जो दुर्भाग्य से हम जैसों के भीतर कुछ हद तक पैदा हो गया है।

हां, ये ठीक है कि अच्छी सैलरी होने की वजह से नोएडा में दो फ्लैट हो गया, जिसका मोटा लोन अब भी उसके माथे पर चिपका है। कुछ बैंक बैलेंस हो गया। इसका भी हिसाब-किताब आशुतोष को पक्के तौर पर नहीं पता होता है। कॉलेज में प्रोफेसर पत्नी ही उनकी वित्त मंत्री भी हैं और तमाम ऐसे मामलों में उनकी जरुरतों का ख्याल रखने वाली दोस्त भी। नौकरी छोड़ने के बाद आशुतोष मेट्रो में चलते रहे हैं। बाद में उन्होंने मारुति की सबसे छोटी गाड़ी खरीद ली। बड़ी गाड़ी के नाम पर उनके पास सरकारी मेट्रो तो है ही। आशुतोष ने कभी ऐसे शौक पाले ही नहीं, जो उसे गुलाम बना ले।

आशुतोष ने जब लोकसभा चुनाव का पर्चा भरा तो लोन पर खरीदे गए उसके फ्लैट और उसके बैंक बैलेंस को जोड़जाड़ कर उसे करोड़पति घोषित करके ट्रोल किया जाने लगा। जबकि मैं दावे के साथ कह सकता हूं आशुतोष ने जो भी अर्जित किया, उसमें सेटिंग-गेटिंग का एक टका भी नहीं है। सैलरी से मिले और टैक्स काटकर अकाउंट में ट्रांसफर हुए पैसे के अलावा एक पैसा इधर-उधर का उसके पास आया नहीं। आ ही नहीं सकता। उसे कोई खरीद नहीं सकता। कोई कीमत देकर उससे कोई फायदा नहीं उठा सकता। दमदार और वजनदार संपादक रहते हुए आशुतोष नेताओं, मंत्रियों, नौकराशाहों से सजे सत्ता के गलियारों में कभी देखा नहीं गया। नार्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक में बैठने वाले सत्ताधीशों की निकटता पाने में कभी उसमें चाह ही नहीं रही।

यूपीए -2 के दौर में जब आनंद शर्मा के सूचना प्रसारण मंत्रालय मीडिया के हाथ बांधने की साजिशें कर रहा था, तब आशुतोष सबसे अधिक मुखर और आक्रामक था। ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स के साथ संपादकों की बैठक में कपिल सिब्बल समेत बड़े मंत्रियों की मौजूदगी में भी अगर सबसे अधिक बेफिक्र होकर कोई मनमोहन सरकार के मठाधीशों को खरी -खोटी सुना सकता था, तो वो आशुतोष था। ऐसे एकाध मौकों पर तो दूसरे संपादकों को बीच-बचाव करके आशुतोष को शांत करना पड़ा। वो चाहता तो इतने लंबे अरसे तक संपादक रहते हुए कुछ दूसरे पत्रकारों की तरह ‘मालदार’ और ‘नेटवर्कर’ बन ही सकता था, लेकिन वो नहीं बना। ठोक कर खबरें चलाता रहा। तमाम बड़े नेताओं को अपनी हॉट सीट के सामने बैठाकर तीखे और बेखौफ सवाल पूछता रहा। किसी भी कीमत पर नहीं बिकने वाले संपादकों की फेहरिश्त में टॉप पर बना रहा, क्योंकि सत्ता के अंत!पुर में अपनी जगह बनाने का ख्वाहिशमंद कभी वो रहा ही नहीं। हां, विचार के तौर पर उसे केजरीवाल में संभावना दिखी तो लाखों की नौकरी छोड़कर उनकी रथयात्रा में शामिल हो गया। विचार रखना कोई गुनाह नहीं। विचारहीन तो मुर्दे होते हैं।

आशुतोष ने करियर में जो हासिल किया, अपने दम पर किया। अपनी मेहनत से किया। किसी बड़े बॉस को मस्का नहीं लगाया। किसी को खुश करने-रखने की कोशिशें कभी नहीं की। ये उनका स्वभाव ही नहीं है। तभी मेरे भीतर हमेशा ये ख्याल कौंधता रहा कि आशुतोष ‘आप’ के नेताओं से कैसे तालमेल बिठाएगा? तमाम तरह की विरोधाभासी छवियों वाले केजरीवाल के साथ कैसे और कितनी दूर तक चल पाएगा? जैसे-तैसे ही सही, चार साल तक तो आशुतोष चले ही। चार साल के इस सियासी सफर में आशुतोष ने बहुत कुछ देखा और झेला होगा लेकिन उनसे मीडिया वाला कोई उनके भीतर की भड़ास नहीं निकलवा सकता। आगे की बात तो राम जाने।

कभी अपने बयानों की वजह से तो कभी पार्टी के स्टैंड की वजह से आशुतोष ट्विटर पर लगातार गालियां पड़ती रही। आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा। ‘देशभक्त’ ट्रोल्स की जमात तो उसके पीछे आए दिन दाना-पानी लेकर लगी रही लेकिन उसने कभी इसकी परवाह नहीं की।

कुत्ते-बिल्लियों से प्यार करने वाला आशुतोष आए दिन अपने ‘पोको-लोको’ के साथ अपनी तस्वीरें ट्विटर पर चिपका देता हैं, बदले में न जाने क्या सुनता है। दिन भर में उसके ट्विटर टाइम लाइन पर उसे नीचा दिखाने वाले बेहूदे किस्म के कमेंट थोक भाव से गिरते रहते हैं। मैंने भी कई बार कहा कि यार क्यों कुत्ते-बिल्ली की इतनी पिक्चर लगाकर लोगों को गालियों के इतने आविष्कार का मौका देते हो, लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। देखता-पढ़ता भी नहीं कि उसका मनोबल तोड़ने में जुटे भक्तों की ब्रिगेड उसके ट्विटर टाइम लाइन पर कितने तरह की ‘गटर गैस’ छोड़कर गई है।

आशुतोष इस मामले में बहुत क्लियर है। जो सोच लिया, सोच लिया। एक बार स्टैंड ले लिया तो ले लिया। अपने दोस्तों से ज्यादा रायशुमारी करने में भी शायद उसका यकीन नहीं। इसका कई बार उसे नुकसान भी उठाना पड़ा है लेकिन वो ऐसा ही है। पिछले साल के आखिरी महीनों में ये चर्चा जोरों पर थी कि राज्यसभा के लिए खाली हो रही सीटों के लिए केजरीवाल की तरफ से आशुतोष की उम्मीदवारी पक्की है। हम सबने आशुतोष के दर्जनों बार पूछा लेकिन हर बार उसने ये कहा कि पता नहीं किसका नाम होगा, किसका नहीं। पार्टी को जो तय करना होगा, करेगी। कभी उसने राज्यसभा के लिए बेचैनी या अपनी महत्वकांक्षाओं का इजहार नहीं किया। उसके भीतर कुछ चलता भी होगा, भीतर ही दबाए रखा उसने। बावजूद इसके, हम जैसे तमाम लोग मानकर चल रहे थे कि जिस ढंग से उसने अपना करियर छोड़कर इतने लंबे समय के लिए पार्टी के लिए दिन रात काम किया है और दिल्ली से गोवा तक में अपनी ड्यूटी निभाई है, उसकी उम्मीदवारी तो पक्की ही होगी। कुमार विश्वास की केजरीवाल से तनातनी और मतभेद की खबरें इस बात की तस्दीक कर रही थी कि शायद कुमार का नंबर न आए लेकिन आशुतोष के नाम कटने या नहीं होने की कोई वजह नहीं दिखती थी।

तभी एक दिन दिल्ली से आम आदमी पार्टी के तीन उम्मीदवारों के नामों का ऐलान हुआ। इन नामों में आशुतोष का नाम नहीं था। पता नहीं आशुतोष को कितना झटका लगा था, हम जैसे कई लोगों को जरूर लगा था। कोई वजह समझ में नहीं आई कि ऐसा क्यों हुआ? मैंने इस बारे में आशुतोष से बहुत ज्यादा पूछताछ नहीं की। उसने भी हमेशा की तरह कुछ बताया नहीं लेकिन इस बीच वो खुद पार्टी से लगभग कट गया। मीटिंगों में जाना बंद कर दिया। इस बीच वो लिखने-पढ़ने में पहले से ज्यादा वक्त देने लगा। कई वेबसाइट के लिए कॉलम भी लिखने लगा। यानी वो अपनी उसी दुनिया में लौट रहा था, जहां से वो सियासत में आया था। अब जब उसके पार्टी छोड़ने की खबर आई है तो ये जानकारी भी सरेआम हुई है कि ‘केजरीवाल ने सुशील गुप्ता जैसे उद्योगपति को टिकट दिया था। साथ ही वह आशुतोष और संजय सिंह को राज्यसभा भेजना चाहते थे लेकिन आशुतोष ने स्पष्ट कहा कि उनका जमीर उन्हें सुशील गुप्ता के साथ राज्यसभा जाने की इजाजत नहीं देता है। चाहें उन्हें टिकट मिले या न मिले, सुशील गुप्ता को राज्यसभा नहीं भेजा जाना चाहिए। तब केजरीवाल ने उनकी जगह चार्टर्ड अकाउंटेंट एनडी गुप्ता का नामांकन करा दिया।’ 

आशुतोष के नाम नहीं होने और दिल्ली के सियासी सर्किल में पैसे वाले सेटर के तौर जाने-पहचाने वाले सुशील गुप्ता की उम्मीदवारी पर केजरीवाल की खूब आलोचना हुई लेकिन आशुतोष ने तब भी अपना मुंह बंद रखा। अब जब आशुतोष पार्टी का हिस्सा नहीं रहा, तब भी उसने मीडिया से यही गुजारिश की है कि बयान देने के लिए कोई रिपोर्टर उसे तंग नहीं करे।

केजरीवाल ने उसके इस्तीफे को अस्वीकार करते हुए ट्विटर पर इतना लिख दिया कि ‘हम आपका इस्तीफा कैसे स्वीकार कर सकते हैं। न, इस जन्म में तो नहीं।’ आप के कई और नेताओं ने भी ऐसी ही प्रतिक्रया दी है लेकिन आशुतोष को जानने वाले जानते हैं कि एक बार उसने फैसला कर लिया तो कर लिया। अब वो टस से मस नहीं होगा।

केजरीवाल के साथ रहते हुए आशुतोष ने थोक भाव से अपने दुश्मन बनाए। मोदी और मोदी की बीजेपी के खिलाफ अपने तीखे तेवरों और अतिरेकी बयानों की वजह से सोशल मीडिया पर खूब नश्तर झेले। टीवी चैनलों पर कई बार एंकर से इस कदर उलझा कि बहसें बदमगजी में तब्दील हो गई। मीडिया वालों को लंबे समय तक बीजेपी के खिलाफ बोलने-लिखने के लिए ललकारता रहा, इस वजह से अपने हमपेशा रहे कई रिपोर्टरों, संपादकों और एंकरों से उसके रिश्ते खराब हुए। शाम को चैनलों पर जमने वाले मजमों में केजरीवाल के प्रवक्ता के तौर पर बैठे आशुतोष ने कई बार आपा खोया। पार्टी की प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान रिपोर्टर्स से उलझा। कई बार मुझे लगता था कि आशुतोष खुद को अपने को ‘डबल रोल’ में क्यों देख रहा है। संपादक भी। नेता भी। वो रिपोर्टर और एंकर से कहने लगता था कि मैं भी पत्रकार रहा हूं। बलां… बलां… तब मुझे भी गुस्सा आता था कि अरे भाई रहे होगे पत्रकार, अब आप नेता हैं और आपका एक एजेंडा है। आप अपने केजरीवाल के एजेंडे से चलिए। हमें सामूहिक नसीहत मत दीजिए। ज्ञान मत दीजिए। कुछ दोस्तों की मौजूदगी में एक दो मौकों पर यही सब मैंने मुंह पर बोल दिया तो हमारे बीच फिर तनाव पैदा हो गया। वहां भी किसी को बीच बचाव करना पड़ा।

आशुतोष मानें या न मानें लेकिन शायद आज उन्हें लगता होगा कि जिन लोगों के लिए, जिस ‘क्रांतिकारी पार्टी’ के लिए उन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगाया, वो इसकी हकदार नहीं थी। या ये कहें कि वो सुशील गुप्ताओं की तरह पार्टी के ‘लायक’ नहीं थे। चार साल में आशुतोष को इस पार्टी ने क्या दिया? उसकी पत्नी नौकरी नहीं कर रही होती और सेविंग न की होती तो घर चलाना मुश्किल हो जाता। वो तो उसकी जररुतें ही इतनी कम हैं कि हताश हुए बगैर चार साल तक वो टिका रहा।

आशुतोष जब चैनल में था, तब उसने छुट्टी लेकर अन्ना पर अंग्रेजी में किताब लिख दी। जब राजनीति में आया तो केजरीवाल के आंदोलन को अपनी किताब का विषय बनाया। मुझे लगता है कि किताब तो उसे अब लिखनी चाहिए। अपने अनुभवों पर। अपने साथ हुए गच्चे पर। आंदोलन के गर्भगृह से निकली और उम्मीदों की कब्र पर टिकी ‘क्रांतिकारी पार्टी’ पर। सैकड़ों लेख और तीन किताबें लिख चुके आशुतोष के घर में सैकड़ों किताबों की लाइब्रेरी है। पढ़ना-लिखना उसका सबसे खास शौक है। अब उसके पास इन सब के लिए पहले से ज्यादा वक्त होगा। उसकी एक और किताब लगभग लिखी जा चुकी है। अगली किताब का विषय वो चाहें तो खुद हो सकते हैं - ‘मैं आशुतोष’।

आशुतोष जब तक केजरीवाल की पार्टी में रहे, मैं सार्वजनिक मौकों पर उनके साथ ली जाने वाली तस्वीरों से भी बचता रहा कि कहीं सोशल मीडिया पर खामखा ट्रोल होने का कोई बहाना ये तस्वीर न बन जाए। उसके हिस्से की गालियों में मैं साझेदार नहीं बनना चाहता था। नेता बनने से पहले दोस्तों की महफिल में जब तस्वीरें खींची जाती थी, तो आशुतोष मुझे चिढ़ाते हुए कहता था कि ये फेसबुक पर मत डाल दीजिएगा। नेता बनने के बाद अगर कभी किसी मौके पर तस्वीर खींची भी गई तो मैंने कहा कि मैं आपके साथ फोटो खिंचा रहा हूं, यही बहुत है। फेसबुक पर डालने का जोखिम मैं नहीं मोल लूंगा। चार साल में मैंने आशुतोष के साथ अपनी तस्वीरें सार्वजनिक होने से बचता रहा। अब मैं अपनी तरफ से लगाई गई इस पाबंदी से मुक्त हूं क्योंकि हमारा आशु मुक्त है।

2002 में ‘आजतक’ में हम सब साथ काम करते थे। मैं, सुप्रिय प्रसाद, अमिताभ श्रीवास्तव, आशुतोष और संजीव पालीवाल। हमने अपने इस पांच सदस्यीय मंडली का नाम ‘पी-5’ रखा था। ‘पी-5’ के हम पांच अक्सर दफ्तर से फ्री होने के बाद किसी न किसी के घर पर आधी रात या सुबह तक बैठकी जमाया करते थे। बाद में अलग अलग चैनलों के हिस्सा बने और ‘पी-5’  की बैठकें भी कम हो गईं। अब एक बार फिर हम बैठेंगे आशुतोष। उस आशुतोष के साथ, जो अब नेता नहीं हैं। वैसे ही कभी साथ छुट्टियां मनाने जाएंगे, जैसे नेता बनने से पहले वाले आशुतोष के साथ जाया करते थे।


आखिरी बात, ऐसा नहीं है कि आशुतोष ने जिंदगी में समझौते नहीं किए होंगे या अपने संपादन काल में अपने चैनल की रेटिंग के लिए ‘स्वर्ग की सीढ़ी’ नहीं बनाई होगी, मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा कि ‘हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी। जिस को भी देखना हो कई बार देखना’

देखें विडियो: आशुतोष का ये अलहदा अंदाज, जो आपने कभी न देखा होगा- 


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भारत के मुसलमान सर्वश्रेष्ठ: डॉ. वेदप्रताप वैदिक

मैं दुनिया के लगभग 70-80 देशों में गया हूं, उनमें रहा हूं, पढ़ा हूं और पढ़ाता रहा हूं। उन देशों के अल्पसंख्यकों से मेरा निकट संपर्क भी होता रहा है

Last Modified:
Tuesday, 15 October, 2019
DR. VEDPRATAP

डॉ. वेदप्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार।।

लंदन में बैठे-बैठे मैंने जैसे ही भारतीय टीवी चैनल खोले, मैंने देखा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयानों को काफी प्रमुखता मिल रही है। मोदी का कहना था कि विरोधियों में दम हो तो वे अनुच्छेद 370 और 35ए की वापसी का वादा करें। जाहिर है कि पांच अगस्त को हुए कश्मीर के पूर्ण विलय का विरोध करके कांग्रेस ने अपनी फजीहत करवा ली है। लेकिन मोहन भागवत का बयान अपने आप में अजूबा है। कुछ मुस्लिम नेता इसका डटकर विरोध भी कर रहे हैं।

भागवत ने कहा कि मुसलमान यानी अल्पसंख्यक भारत में जितने खुश हैं, उतने दुनिया में कहीं नहीं हैं। बहुत हद तक यह बात सही है, लेकिन इसकी कुछ सीमाएं भी हैं। मैं दुनिया के लगभग 70-80 देशों में गया हूं, उनमें रहा हूं, पढ़ा हूं और पढ़ाता रहा हूं। उन देशों के अल्पसंख्यकों से मेरा निकट संपर्क भी होता रहा है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का शोध छात्र होने के नाते इनके बारे में पढ़ता और लिखता भी रहा हूं। वे चाहे ईसाई देश हों या मुस्लिम देश हों, वे चाहे पूंजीवादी देश हों या साम्यवादी देश हों, वे चाहे गरीब देश हों या अमीर देश हों, उनमें रहनेवाले अल्पसंख्यक लोग अक्सर डरे हुए, कमजोर, गरीब और पीड़ित ही दिखाई पड़ते रहे हैं। जैसे चीन में उइगर मुसलमान, कम्युनिस्ट रूस में मध्य एशिया के पांचों मुस्लिम गणतंत्रों के नागरिक, अमेरिका में नीग्रो लोग, यूरोपीय देशों के एशियाई नागरिक, नेपाल, श्रीलंका और बर्मा के मुसलमान, पाकिस्तान के शिया और हिंदू आदि!

लेकिन, भारत में तीन मुसलमान राष्ट्रपति हो चुके हैं। उपराष्ट्रपति और मुख्यमंत्री भी कई हुए हैं। केंद्रीय मंत्री, राज्यों के मंत्री, सांसदों और विधायकों की संख्या भी बड़ी रही है। एक सिख प्रधानमंत्री भी बन चुके हैं। यह ठीक है कि मुसलमानों में गरीब और अशिक्षितों की संख्या का अनुपात ज्यादा है, लेकिन इसका मूल कारण यह है कि भारत की छोटी जातियों और गरीब वर्गों के लोग ही ज्यादा करके मुसलमान बने हैं। हिंदुओं के दलितों और पिछड़ों में भी मुसलमानों से ज्यादा पिछड़ापन, गरीबी और अशिक्षा है। असली प्रश्न यह है कि भारत के अल्पसंख्यकों को हर क्षेत्र में शिखर तक पहुंचने के अवसर हैं या नहीं? अवसर हैं, लेकिन आजकल वे असुरक्षित भी महसूस कर रहे हैं, यह भी सच्चाई है।

असुरक्षा का कारण न तो सरकार है और न ही व्यापक समाज है, बल्कि वे सिरफिरे लोग हैं, जो अपने आप को गोरक्षक कहते हैं, लेकिन वे खुद नरभक्षक हैं। गोरक्षा के नाम पर वे मुसलमानों पर हमला कर देते हैं। उनकी निंदा मोदी, भाजपा, कांग्रेस, समाजवादी कम्युनिस्ट, आरएसएस, सबने एक स्वर से की है। भारत के मुसलमानों को मैंने दुबई के अपने एक भाषण में ‘दुनिया के सर्वश्रेष्ठ मुसलमान’ कह दिया था, क्योंकि भारत के हजारों सालों के संस्कार उनकी रग-रग में दौड़ रहे होते हैं। कई अरब शेख मेरी बात सुनकर अचंभे में पड़ गए। जिन्हें मैं भारतीय संस्कार कहता हूं, उन्हें ही मोहन भागवत हिंदू संस्कार कहते हैं।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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‘तो पत्रकार किसी को कटघरे में खड़ा करने की नैतिकता खो देंगे’

ब्रह्रमकुमारी विश्वविद्यालय की ओर से माउंट आबू के शांतिवन में पिछले दिनों राष्ट्रीय मीडिया सम्मेलन का किया गया आयोजन

Last Modified:
Monday, 14 October, 2019
Mount Abu

माधवी श्री, वरिष्ठ पत्रकार।।

ब्रह्रमकुमारी विश्वविद्यालय द्वारा माउंट आबू के शांतिवन में हाल में हुए राष्ट्रीय मीडिया सम्मेलन (National Media Convention) में जहां आयोजकों का पूरा प्रयास पत्रकारों को ‘आत्मबल’ की शक्ति से परिचय करवाना था, वहीं ज्यादातर पत्रकारों का मूड पिकनिकनुमा था।

लगभग सभी पत्रकार अपने परिवार और मित्रों के साथ अगल-बगल के स्थलों पर जाकर घूमने में ज्यादा दिलचस्पी ले रहे थे। कुछ तो मेडिटेशन के कक्ष में सेल्फी लेने में व्यस्त दिखे। ऐसा नहीं था कि अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर परिचर्चा नहीं हुई, लेकिन कई पत्रकारों का गंभीरता से मुख्य विषय पर केंद्रित न होना चिंता का विषय जरूर था।

ऐसा केवल इस सेमिनार से सम्बंधित नहीं है, वरन यह हाल सभी प्रेस कॉन्फ्रेंस और सेमिनारों का है। अगर पत्रकारों का यही हाल रहा तो हम किसी को कटघरे में खड़ा करने की नैतिकता खो चुके होंगे। 

(यह लेखिका के निजी विचार हैं)

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‘ताकि कोई यह न कह सके कि हमने जमीर बेच दिया!’

अब कितने फैसले नजीर बन रहे हैं? जिनको कोई कानूनविद् अपनी बहस में हक से कोट करता हो। कारण साफ है, सत्ता का चारण करके पद-पैसा भले मिल जाये, आपकी शर्तों पर सम्मान नहीं मिल सकता

Last Modified:
Saturday, 12 October, 2019
Ajay Shukla

अजय शुक्ल, प्रधान संपादक, आईटीवी नेटवर्क।।

पिछले साल जनवरी के दूसरे सप्ताह में देश की सर्वोच्च अदालत के चार न्यायमूर्तियों ने इतिहास में पहली बार मीडिया से औपचारिक चर्चा की थी। इसमें जस्टिस जे. चेलमेश्वर ने कहा था, ‘अगर संस्था को नहीं बचाया गया  तो देश में लोकतंत्र खत्‍म हो जाएगा।’ उन्होंने मीडिया के सामने यह सब क्यों बताया, इस सवाल का जवाब भी दिया था। उन्होंने कहा था, ‘हमने यह प्रेस कॉन्‍फ्रेंस इसलिए की, ताकि हमें कोई यह न कह सके कि हमने आत्मा को बेच दिया है।’

इस कॉन्‍फ्रेंस में मौजूदा चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ भी थे। उन्होंने कहा था कि हम चारों मीडिया का शुक्रिया अदा करना चाहते हैं। किसी भी देश के कानून के इतिहास में यह बहुत बड़ा दिन, अभूतपूर्व घटना है, क्‍योंकि हमें यह ब्रीफिंग करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। पूरी घटना का निचोड़ यह था कि उस समय देश के मुख्य न्यायमूर्ति दीपक मिश्र के कुछ कार्यों से न्यायिक संकट की स्थिति बन रही थी, जिसका विरोध किया गया था। सबका लब्बोलुआब यह कि संस्था को ठीक नहीं किया गया तो लोकतंत्र की आत्मा मर जाएगी।

आप सोचेंगे कि अचानक हम पौने दो साल पहले की घटना का जिक्र क्यों कर रहे हैं? सुबह हमारे एक जज मित्र का फोन आया। न्यायिक हालातों पर चर्चा हुई तो बोले, ‘जब जज बना था, उस वक्त इतना सम्मान मिलता था कि महसूस होता था कि हम किसी पवित्र दुनिया से आये हैं। अब जब कोई सुनता है कि जज हैं तो ऐसे देखता है, मानो हमने कोई गुनाह किया हो। डर से वह भले ही कुछ न बोले, मगर जब खुलकर चर्चा होती है तो उसकी भावनायें सामने आती हैं। जो हमें शर्मसार करने के लिए काफी होती हैं।’

एक पूर्व महाधिवक्ता से इन हालात को लेकर चर्चा चली तो उन्होंने कहा कि जिसे पद-पैसे चाहिए, वो जज बने ही क्यों? सम्मान से मेरिट की वकालत करे। मन चाही फीस ले, किसने रोका है? सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व जज से इस मुद्दे पर चर्चा हुई तो उन्होंने कहा, ‘मैंने हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक डंके की चोट पर मेरिट पर फैसले किये। न्यायमूर्ति होने की हैसियत से कई बार ऐतिहासिक फैसले किये, जिनके लिए कानून में व्यापक व्यवस्था नहीं भी थी। कई फैसले नजीर बन गये।’ अब कितने फैसले नजीर बन रहे हैं? जिनको कोई कानूनविद् अपनी बहस में हक से कोट करता हो। कारण साफ है, सत्ता का चारण करके पद-पैसा भले मिल जाये, आपकी शर्तों पर सम्मान नहीं मिल सकता।

22 साल पहले हमने यूपी के डीजीपी नियुक्त हुए श्रीराम अरुण का इंटरव्यू किया था। उन्होंने उस वक्त कहा था, ‘जब नेतृत्व ही बेईमान हो जाये तो निचले स्तर पर ईमानदारी की उम्मीद बेमानी है।’ कुछ ऐसा ही न्यायिक इतिहास में हो रहा है। पहले सेवानिवृत्त न्यायाधीशों से आग्रह करके उनको पद दिये जाते थे, मगर अब जज सरकारी नुमाइंदों के पास लार टपकाते घूमते हैं। बेईमानों का यही कॉकस उन्हें बेईमानी करने के अवसर उपलब्ध कराता है। शायद यही कारण है कि कानूनी नजीर बनने वाले फैसले अब अदालतों से नहीं निकल रहे। न्याय की देवी की आंख पर बंधी पट्टी में सुराख कर दिया गया है। उसके हाथ-पैर जंजीर से जकड़ दिये गये हैं।

हमें भारत के एक अपर महान्यावादी से पता चला कि जिन मामलों में सरकार की रुचि होती है, उनके फैसले वही ‘पेन ड्राइव’ में जस्टिस के पास भेज देते हैं। जहां सरकारी स्तर पर गलती हो जाये और उसमें शीर्ष सत्ता के हित प्रभावित होते हों तो किस तरह और कब क्या आदेश देना है, यह भी हम ही तय करते हैं। शीर्ष सत्ता की मर्जी पूरी करने वाले जज ऐसा दो कारणों से करते हैं। पहला, उन्हें कुछ पाने का लालच होता है और दूसरा, सरकार के पास उनके आचरण की फाइल होती है।

साहसिक फैसलों के जरिए अपनी पहचान बनाने वाले जस्टिस जे. चेलमेश्वर इन दिनों एक किसान की तरह अपने गांव के खेतों में काम करते हैं, मगर उनकी रीढ़ सम्मान से सीधी है। दलित जाति का होने के कारण वह उनकी पीड़ा भी समझते हैं। चेलमेश्वर ने अपनी जगह सदैव मेरिट से बनाई थी तो वह हर काम मेरिट पर करने की सीख भी देते हैं। उन्होंने बतौर जस्टिस जो काम किये और फैसले दिये, वह नजीर बन गये, जिसमें निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित करना भी शामिल है।

जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा,’मुझे भी सत्ता शीर्ष के लोगों से बहुत से प्रलोभन दिये गये, मगर मैंने समझौता नहीं किया। मैंने गुणदोष को देखा और वही किया जो न्यायहित में था। मैंने यह कभी नहीं देखा कि सामने कौन है।’ कमोबेश यही बात जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने भी कही। उन्होंने कहा कि उस न्यायिक लकीर पर लोग न्याय की गाड़ी दौड़ाते हैं, जो साहस के साथ गुणदोष को देखती है, उस पर नहीं जो केचुए की तरह रेंगती है। निश्चित रूप से दोनों जजों की बात खरे सोने जैसी है। अगर न्याय की आत्मा ही मर गई तो मिले न्याय से किसका क्या भला होगा?

इन तमाम कानूनविदों की चिंता जायज है। अदालतों का यह परम कर्तव्य है कि वे गुणदोष, साक्ष्यों और तथ्यों को संवैधानिक कसौटी पर परखकर इंसाफ करें। न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि दिखना भी चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि न्यायाधीश का जीवन भी आदर्श हो। मुंशी प्रेमचंद ने एक कहानी लिखी थी ‘पंच परमेश्वर’, जस्टिस उसी की तरह होना चाहिए। न्याय की देवी की आंखों पर काली पट्टी इसी आशय से बांधी गई है कि वह इंसाफ करते वक्त यह न देखे कि सामने कौन है। कुछ सालों के दौरान अदालतों और उसके बाहर जो घट रहा है, वह उसकी गरिमा गिराने के लिए पर्याप्त है।

जज तमाम कमेटियों में सरकारी मंत्रियों के साथ बैठने में खुद को सम्मानित महसूस करने लगे हैं। सेवा समाप्ति के बाद कोई पद मिल जाएगा, इस लालच में वह हर कर्म करने को तैयार बैठे हैं, जो न्याय की हत्या करता है। नोटों की कुछ गड्डियां और सरकारी ओहदे की चमक उनकी आंखों से शर्म का पानी खत्म कर रही है। नतीजतन, ऐसे जजों के फैसले इंसाफ नहीं, एजेंडे पूरे करते हैं। शीर्ष सत्ता की मर्जी में ही ऐसे न्यायाधीशों को न्याय का सूर्य नजर आता है।

इंसाफ के लिए जरूरी है कि न्याय तथ्यों, साक्ष्यों की कसौटी पर डंके की चोट से किया जाये। न्याय सत्ता प्रतिष्ठान के लिए प्रिय या लोकलुभावन न हो, बल्कि सत्य पर परखा गया हो। उसमें भ्रष्ट आचरण या किसी को खुश करने की बू न आती हो। फैसले संवैधानिक लोकतंत्र को मजबूत बनाने वाले हों, न कि विश्वास को कमजोर करने वाले। जरूरत पड़ने पर न्याय के लिए संविधान में दिये गये विशेषाधिकार का भी प्रयोग किया जाये। जब ऐसा होने लगेगा, तब न्यायिक सम्मान पुनः स्थापित हो जाएगा। किसी को अपना जमीर नहीं बेचना पड़ेगा और पंच परमेश्वर फिर जीवित हो उठेगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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शस्त्र पूजा और सेना पर राजनीति करने वालों को आलोक मेहता ने यूं सुनाई खरी खरी

लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की आलोचना-विरोध की पूरी गुंजाइश है, लेकिन क्या यह इतना गंभीर मामला है, जिससे आधुनिक भारत की छवि बिगड़ रही है

Last Modified:
Saturday, 12 October, 2019
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।

राफेल सौदे के बाद अब विमान तथा उसमें लगे प्रक्षेपास्त्र पर प्रतीकात्मक शस्त्र पूजा को लेकर राजनीतिक विरोध। कांग्रेस सहित कुछ दलों के नेताओं और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया के एक वर्ग ने पेरिस में राफेल का पहला विमान सौंपे जाने के समारोह में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह द्वारा शस्त्र पूजा की संस्कृति के अनुरूप कुमकुम, चावल और नारियल के साथ की गई दो मिनट की पूजा अर्चना का विरोध किया। आलोचना के साथ कार्टून इत्यादि से सोशल मीडिया में मखौल भी बनाया गया। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की आलोचना-विरोध की पूरी गुंजाइश है, लेकिन क्या यह इतना गंभीर मामला है, जिससे आधुनिक भारत की छवि बिगड़ रही है?

भारत की सरकार-संसद के शपथ ग्रहण के दौरान ही नहीं, पश्चिमी या अन्य देशों में भी अपने-अपने धर्म के इष्ट, ग्रंथ का नाम लेकर बड़े-बड़े नेता शपथ लेते हैं। यों लोकतंत्र में नास्तिक मान्यता रखने पर ऐसा करने की आवश्यकता नहीं होती। फिर कांग्रेस और गठबंधन के नेता शायद भूल जाते हैं कि 1985 से राजीव गांधी के कार्यकाल से मनमोहन राज तक विभिन्न देशों में होने वाले ‘भारत महोत्सवों’ के दौरान भारतीय संस्कृति के अनुरूप विदेशियों को टीका लगाया जाता रहा है और भारतीय संस्कृति को लेकर लंदन, पेरिस, न्यूयॉर्क ही नहीं बीजिंग, मॉस्को, कुवैत, दुबई, आबूधाबी में भी बड़ा आकर्षण होता है।

हर वर्ष विजयदशमी के अवसर पर विभिन्न दलों के राजनेता रामलीला के कलाकारों का टीका-फूलमाला इत्यादि से स्वागत करते हैं। सशस्त्र बलों में भी शस्त्र पूजा के आयोजन होते रहे हैं। मनमोहन सिंह या सोनिया गांधी या अन्य नेता जब ‘धनुष बाण’ से रावण दहन का ‘नाटक’ करते हैं, तब क्या दुनिया हंस रही होती है? दशहरे से पूर्व नवरात्रि के दौरान पश्चिम बंगाल के दिग्गज कम्युनिस्ट नेता नवरात्रि मंडपों में दुर्गा-पूजा करने में क्या संकोच करते हैं? निश्चित रूप से किसी पूजा-पाठ से अंधविश्वास को जोड़ना गलत कहा जा सकता है। कांग्रेसी नेता सदानन्द खड़गे या उनके साथियों को उनके वरिष्ठ नेता पूर्व रक्षामंत्री ए.के. एंटनी या किसी सार्थक सेनाधिकारी ने यह नहीं बताया कि भारतीय सेना के जवानों को प्रशिक्षण के दौरान और युद्धभूमि में आक्रमण के लिए किन प्रमुख नारों का उपयोग किया जाता है।

आश्चर्य यह है कि राफेल शस्त्र-पूजा के विरोध का जवाब देने के लिए टी.वी. चैनलों पर आए सत्तारूढ़ पक्ष के अधिकांश नेताओं ने इन नारों की ओर ध्यान नहीं दिलाया। दिलचस्प तथ्य यह है कि भारतीय सेना की हर रेजीमेंट को जोश दिलाने वाले नारों में हिंदू देवी-देवताओं के नाम हैं और सब हिंदी में लगाए जाते हैं। हर वर्ष 15 जनवरी को सेना दिवस के अवसर पर होने वाली परेड में भी इन नारों को सुना जा सकता है। रक्षा मंत्रालय और भारतीय सेना के अपने रिकॉर्ड के अनुसार हर रेजीमेंट के नारे अलग और कहीं समान भी हैं। सैनिक बिहार रेजीमेंट में-‘जय बजरंग बली’ या ‘बिरसा मुंडा की जय’, राजपूताना राइफल्स-‘रामचन्द्रजी की जय’, राजपूताना रेजीमेंट-‘बोल बजरंग बली की जय’, कुमाऊं रेजीमेंट-‘कालका माता की जय’। ‘बजरंग बली की जय’। ‘दादा किशन की जय’, गढ़वाली रेजीमेंट-‘बदरी विशाल की जय’, डोगरा रेजीमेंट-‘ज्वाला माता की जय’, पंजाब और सिख रेजीमेंट्स-‘बोले सो निहाल’, सत श्री अकाल’ और जम्मू-कश्मीर रायफल्स में-‘दुर्गा माता की जय’ के नारे लगाकर आक्रमण करते हैं। माना जाता है कि दुश्मनों के छक्के छुड़ाने और सैनिकों का मनोबल ऊंचा रखने के लिए इन नारों का उपयोग होता है। लद्दाख की दुर्गम पर्वत श्रृंखला पर सैन्य शिविरों के साथ आपको मंदिर-गुरुद्वारे मिल जाते हैं। इसी तरह इस्लाम धर्म मानने वाले समय और सुविधानुसार नमाज भी अदा करते हैं।

इस परंपरा को देखते हुए जिम्मेदार नेताओं द्वारा पारंपरिक-प्रतीकात्मक आयोजनों पर विवाद खड़ा करना कहां तक उचित कहा जाएगा? भारतीय सेना की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि उसने कभी सांप्रदायिक अथवा राजनीतिक पूर्वाग्रह से काम नहीं किया। 1962 से 1999 के बीच हुए युद्ध के दौरान हर धर्म-जाति के सैनिकों ने कंधा से कंधा मिलाकर भारत को विजयी बनाया। एक-दूसरे की जान बचाने के लिए बलिदान भी दिया। संचार माध्यमों और मीडिया के विस्तार होने के साथ कुछ तत्व एवं दल सेना के मुद्दों पर राजनीति करने लगे हैं। सशस्त्र बलों के वेतन, पेंशन, आवश्यक सुविधाएं व संसाधन जुटाने पर संसद में स्वस्थ्य चर्चा होती रही है।

इसी का परिणाम है कि हाल के वर्षों में वर्तमान या पूर्व सैनिकों के वेतन-भत्तों व पेंशन में बढ़ोत्तरी हुई है। इसी तरह सेना की गतिविधियों, उपलब्धियों या यदा कदा किसी सिपाही या सेनाधिकारी की गड़बड़ी होने की सार्वजनिक चर्चा होने लगी है। किसी ज्यादती और अपराध या भ्रष्टाचार पर सेनाधिकारियों को दंडित भी किया गया है। दो दशक पहले रक्षा मामलों पर मीडिया में बेहद अनुशासित और नियंत्रित सूचनाएं मिलती थी। संवेदनशील और रक्षा से जुड़े होने के आधार पर सरकारें अधिक जानकारी नहीं देती थी। केवल रक्षा सौदे में घोटालों पर खोजपरक रिपोर्ट, विश्लेषण होने या विवाद बढ़ने पर सरकारें महत्वपूर्ण अधिकृत जानकारियां उपलब्ध कराती थीं। कंप्यूटर युग में आधुनिक हथियारों, विमानों, जहाजों, पनडुब्बियों की निर्माता कंपनियां, मान्यता प्राप्त अथवा अनधिकृत एजेंसियों के एजेंट अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए पूरे विवरण प्रचारित करती हैं।

भारत में तो राफेल ही नहीं, प्रमुख हथियारों इत्यादि की खरीद की प्रक्रिया इतने स्तरों पर चलती है कि इसी में वर्षों लग जाते हैं। यही नहीं, थल, वायु, नौ सेनाओं के वरिष्ठ अधिकारी और विशेषज्ञों की अनुशंसा पर कोई खरीदारी होती है। इसलिये पारदर्शिता के दौर में राफेल विमानों के सौदे पर राजनीतिक विवाद के चलते भारत सरकार द्वारा फ्रांस से पहला विमान मिलने की औपचारिकता को धूमधाम से प्रचारित किए जाने का स्वागत क्यों नहीं होना चाहिए? लोकतंत्र में रक्षा और अंतरराष्ट्रीय मामलों पर जनता को अधिकाधिक पारदर्शिता के साथ सूचनाएं मिलनी चाहिये और सेना तथा रक्षा से जुड़े मुद्दों को संकीर्ण सांप्रदायिक राजनीति से प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए। 

(लेखक पद्मश्री से सम्मानित व एडिटर्स गिल्ड के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

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इन सवालों के जवाब आप खुद तलाशिये मिस्टर मीडिया

बीते दिनों बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत आईं थीं। चैनलों में से कितने ऐसे थे, जिन्होंने समझौतों के अलावा परदे के पीछे की सियासत का विश्लेषण किया?

Last Modified:
Friday, 11 October, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

टीवी चैनल्स की डिबेट्स हमें क्या देती हैं? ज्ञान बढ़ाती हैं? विशुद्ध खबरें देती हैं? हमारी विश्लेषण क्षमता बढ़ाती हैं? किसी मसले पर नजरिया परिपक्व बनाती हैं? मुल्क के राष्ट्रीय हितों के मद्देनजर गंभीर अध्ययन के बाद निष्कर्ष निकालती हैं? अगर इन सारे सवालों का उत्तर नहीं में है तो क्या यह हमारी पत्रकारिता के लिए कोई गंभीर संकेत है? अब इसके उलट विचार करिए।

क्या चैनल की चर्चा के बाद आपको खीज होती है? क्या एंकर अपनी राय दर्शकों पर थोपते लगते हैं? क्या चर्चा में शामिल सभी मेहमानों को अपनी बात रखने का पूरा समय नहीं मिलता? क्या चर्चा में आए गेस्ट विषय में पारंगत नहीं होते? क्या गेस्ट तर्क में फेल होने पर चीखते चिल्लाते हैं और एंकर उनके मजे लेता है? क्या डिबेट के बाद आप दुःखी होते हैं? यदि इन प्रश्नों का उत्तर आप हां में है तो भी यह बेहद चिंता की बात है।

बीते दिनों बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत आईं थीं। चैनलों में से कितने ऐसे थे, जिन्होंने समझौतों के अलावा परदे के पीछे की सियासत का विश्लेषण किया?  शेख हसीना ने प्याज निर्यात रोकने के बहाने तंज क्यों किया? रोहिंग्या मामले में चीन ने न्यूयॉर्क में म्यांमार और बांग्लादेश के बीच समझौता कराया। हम क्यों नहीं करा सके? क्या बांग्लादेश हमारी कोख से नहीं निकला? क्या हम अपने मित्र पड़ोसी देशों से संरक्षक जैसा व्यवहार करते हैं? 

क्या हमारे दोस्त पड़ोसी हम पर सौ फ़ीसदी यकीन करते हैं?  बांग्लादेश की आर्थिक रफ्तार क्या चौंकाने वाली नहीं है? क्या बांग्लादेश दुनिया का आठवां बड़ा देश नहीं है? क्या म्यांमार की मुखिया आंग सान सू ची और शेख हसीना के लिए भारत दूसरा घर नहीं है? क्या सू ची भारत से कुछ साल से खफा नहीं हैं? क्या हिन्दुस्तान ने उनके सरोकारों को कभी समझने की कोशिश की? 

क्या इन पड़ोसियों  की अंदरूनी चिंताओं पर भारतीय मीडिया ने तथ्यपरक और तार्किक विश्लेषण किया? क्या बांग्लादेश, म्यांमार,भूटान, नेपाल और श्रीलंका पर चीन का प्रभाव बढ़ रहा है? उसके कारण क्या हैं? क्या हमें कोई सबक लेने की आवश्यकता है? इस बार का मिस्टर मीडिया केवल सवालों के साथ है। बाकी के उत्तर आप खोजिए मिस्टर मीडिया।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: मिस्टर मीडिया: गांधी से साहसी पत्रकार कौन?

मिस्टर मीडिया: मीडिया सेमिनारों की उपयोगिता के मायने क्या?

मिस्टर मीडिया: बेशर्मी के साथ हो रही है अखबार के इस गरिमावान अंग की चरित्र हत्या

मिस्टर मीडिया: हम कितने गैर जिम्मेदार और देहाती हैं 

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जन्मदिन विशेष: गरिमामय स्त्रीत्व की सुप्त ज्वालामुखी हैं रेखा

बॉलिवुड की जानी-मानी एक्ट्रेस रेखा का आज जन्मदिन है। वरिष्ठ पत्रकार बादल सरोज ने खास अंदाज में उन्हें अपनी शुभकामनाएं दी हैं

Last Modified:
Thursday, 10 October, 2019
Rekha

रेखा एक दृष्टि हैं
उन कैरियरिस्ट और चतुर बच्चों को दूर से ही भांप लेती हैं जो सारी उछलकूद और अपनी पारी खेलने के बाद जैसे ही खुद का नम्बर आता है, वैसे ही बिसूरकर कहते है ‘नईं अब हम नईं खेलेंगे, मम्मी नाराज होंगी।’ बाकियों का सबकुछ खर्च करा लेने के बाद, अपने पैसे छुपा लेते हैं, खोज लिए जाने पर कहते हैं, ‘ये तो दादी की दवा के पैसे हैं।’ इस डेढ़ स्यानपट्टी से चिढ़ने की बजाय उनकी आंखें मुस्कुरा कर कहती हैं: ‘रहन दे, तुझ पै नही हो पायेगा प्रेम-व्रेम, जा घर जाके ब्रश करके सो जा बबुआ।‘

रेखा एक इस्तगासा हैं

एक जीती जागती चार्जशीट। उस मुकदमे की जो उसके खिलाफ नहीं जो उनके लायक नहीँ था, उन सबके खिलाफ है, जो उनके साथ नहीँ हैं। उनकी मौजूदगी ही उनकी पैरवी है। इस कदर प्रभावी और तेजस्वी कि शहंशाह की झुकी और शर्मसार नजरों के रूप में कन्विक्ट की शिनाख्त परेड भी करा जाती हैं।

रेखा एक व्यक्तित्व हैं

सचमुच की असाधारण शख्सियत। विक्टिम सिंड्रोम से मीलों दूर, 'हाय मर जायेंगे- हाय लुट जायेंगे'’ के रुदाली रुदन से परे-खुद के किये के लिए किसी हतभाव या मलाल, शिकवे और शिकायत के बिना। उनकी यह ताब जिन्हें डराती है, वे औरत को विछोह के अवसाद और अनकिये के पश्चाताप में देखना चाहने वाले पितृसत्ताक मनोरोगी हैं। इनकी कारगर एन्टी डोज हैं वे।

रेखा गरिमामय स्त्रीत्व की सुप्त ज्वालामुखी हैं

उन्होंने डर्टी पिक्चर की नायिका का अंत चुनने की बजाय तटस्थ मौजूदगी भर से महानायक की पिक्चर डर्टी कर दी। बाकियों को भी खुद के अंदर झांकने पर विवश कर दिया । वे विरह का उत्सव हैं, सशरीर!

रेखा एक आईना हैं

इस आईने में उनकी कहानी के जरिये, दुनिया के उन पुरुषों-महापुरुषों की कायरता का प्रतिबिम्ब दिखता है जिनके लिए मोहब्बत एक लाभ-हानि के गणित से आंके जाने वाले फ्लर्ट से अधिक कुछ नही है । रेखा से अपना लेना देना उनके अभिनय और कमाल के नृत्य के प्रशंसक के अलावा इतना और है कि वे हमसे कुछ महीने बड़ी हैं और इस तरह आयु के वर्षों के मनोवैज्ञानिक बोझ से निवृत्त कर देती हैं। युवा बनाये रखती हैं।

हैप्पी बर्थडे रेखा गणेशन, वन ऑफ द मोस्ट आउटस्टैंडिंग एन्ड सेल्फ मेड पर्सनालिटी ऑफ बॉलिवुड!!

(पिछली साल सीधी जिले के गांवों में लिखा था यह ग्रीटिंग कार्ड: साल भर में न रेखाजी मे कोई बदलाव आया, न इस पोस्ट पर मिली एकाध झिड़की के बावजूद हमारे नजरिये में कोई तब्दीली आयी, इसलिए पुनर्पोस्ट।)

(पाक्षिक अखबार लोकजतन के संपादक बादल सरोज की फेसबुक वॉल से साभार)

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नई नहीं है मीडिया को निशाना बनाने की ये 'परंपरा'

मुख्यमंत्री इतनी सी बात नहीं समझ सकते कि बाहर से आने वाले पत्रकार कम से कम पूर्वाग्रही हो सकते हैं। स्थानीय पत्रकार तो स्वयं बाढ़ या अन्य कारणों से सरकार से निजी नाराजगी रख सकता है

Last Modified:
Saturday, 05 October, 2019
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।

सिंहासन  वही होता है। सत्ताधारी बदलते रहते हैं। पीछे लगे झंडे या सिर पर लगी टोपी का रंग बदल सकता है। अहंकार और आक्रोश समान रहता है। तभी तो संवेदनशील सुशासन के लिए प्रचारित नीतीश कुमार पटना और बिहार में भारी वर्षा, बाढ़, जलभराव और लाखों लोगों की संकटमय स्थिति में सुधार और राहत के सवाल पर बुरी तरह भड़क गए। नीतीश ने मीडिया को ही पूर्वाग्रही और दोषी ठहरा दिया कि पत्रकार बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहे हैं और उसी तरह लिख-बोल रहे हैं। आपत्ति यहां तक कि देश के प्रमुख समाचार चैनल के संवाददाता पटना क्यों आ गए?

अनुभवी मुख्यमंत्री इतनी सी बात नहीं समझ सकते कि दिल्ली-मुंबई या देश-विदेश से आने वाले पत्रकार कम से कम पूर्वाग्रही हो सकते हैं। स्थानीय पत्रकार तो स्वयं बाढ़ या अन्य कारणों से सरकार से निजी नाराजगी रख सकता है। हां, कोप से बचने के लिए सिर झुकाकर लीपापोती करने वाले कुछ लोग हो सकते हैं। मुख्यमंत्री के अपने सहयोगी उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी तक जलजमाव की भारी अव्यवस्था से तीन दिन अपने घर में फंसे रहे। मेहरबान मुख्यमंत्री ने उन्हें निकालने की आपात व्यवस्था नहीं की। अन्य नेता, अधिकारी, व्यापारी और सामान्य जनता मुसीबत झेलती रही। आश्चर्य की बात यह भी है कि नीतीश कुमार ने मुंबई और अमेरिका में भी भारी वर्षा और जल जमाव से तुलना कर दी। निश्चित रूप से मुंबई के भी कुछ इलाके, सड़कें कुछ दिन प्रभावित होती हैं। लेकिन अधिकांश दिनों में जनजीवन लोकल ट्रेन और अन्य सेवाओं से सामान्य बना रहता है। बिहार में भी हर साल कहीं न कहीं बाढ़ आती है। लेकिन सर्वाधिक संपन्न कही जाने वाली पाटलिपुत्र कालोनी में पिछले 25 वर्षों में जल निकासी की व्यवस्था करने, पिछले वर्षों की तरह अस्पताल के आपात वार्ड और पुलिस थानों में जलभराव को रोकने के लिए सरकार ने समय रहते कदम क्यों नहीं उठाए?

यों अकेले नीतीश कुमार और उनकी सत्तारूढ़ पार्टी जनता दल (यू) ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल तथा कांग्रेस बिहार में राज करती रही हैं। सत्ता या प्रतिपक्ष में रहकर वे भी एक-दूसरे को और मीडिया को ‘अपराधी’ ठहराने में नहीं चूकते। लालू प्रसाद यादव सत्ता या जेल में रहते हुए भी अपने विरोधियों और मीडिया के विरुद्ध जहर उगलते रहते हैं। भाजपा के कई नेता पुरानी धारणा के कारण मीडिया के एक वर्ग को पूर्वाग्रही मानकर चलते हैं। सोलह साल से राजनीति कर रहे राहुल गांधी अपने-पराये की पहचान नहीं कर पाते और मीडिया को ‘कायर’, ‘बेचारा’ साबित करने में लगे रहते हैं। सुश्री मायावती, सुश्री ममता बनर्जी, साध्वी प्रज्ञा ठाकुर या दक्षिण भारत के चन्द्रबाबू नायडू, स्टालिन इत्यादि भी विरोधियों को दुश्मन तथा मीडियाकर्मियों को ‘खलनायक’ अथवा ‘गुलाम’ की श्रेणी में रखने की कोशिश करते हैं। यों पिछले चार वर्षों के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मीडिया से नफरत के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। हां, संवैधानिक नियम-कानूनों की वजह से वह कोई कानूनी दंड देने की स्थिति मे नहीं हैं। भारत में प्रदेशों के कुछ सत्ताधारी और उनकी पुलिस कानूनों को ताक पर रखकर झूठे मामले दर्ज करवाने से नहीं हिचकते।

असली समस्या वर्तमान दौर में असहनशीलता की है। असहमतियों को बर्दाश्त करना दूर रहा, लोगों को सुनना भी अच्छा नहीं लगता। स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश में विचारों के लिए हर खिड़की, दरवाजे खुले रखने की जरूरत होती है। चीन में कम्युनिस्ट राज के बावजूद दीवारों और पोस्टरों पर समस्याओं को लेकर नाराजगी की बातें लिखी, देखी-पढ़ी जाती हैं। ईरान में बुर्काधारी महिलाओं के प्रदर्शन के दृश्य मैंने स्वयं देखे हैं। पाकिस्तान में इन दिनों कुछ समाचार चैनलों या अखबारों में प्रधानमंत्री इमरान खान के कारनामों की धज्जियां उड़ाई जा रही है। फिर भारत जैसे देश में समझदार नेता इतने कठोर, अहंकारी क्यों होते जा रहे हैं? इसका एक बड़ा कारण यह है कि नेता ‘चुनाव प्रबंधन’ में माहिर हो गए हैं, लेकिन जमीन से कटते जा रहे हैं। यहां तक कि अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों से दूरी बढ़ती जा रही है। वे ‘डिजिटल’ संपर्क पर विश्वास करने लगे हैं। इससे आवश्यक सूचनाएं मिल सकती हैं, दिल-दिमाग के दर्द का पता नहीं चल सकता है।

यही नहीं, विभिन्न सरकारी या निजी व्यावसायिक एजेंसियों से सूचना पाने या प्रचार करवाने पर निर्भर रहने लगे हैं। प्रशांत किशोर जैसे अमेरिकी रिटर्न लोगों की चांदी हो जाती है, लेकिन संगठन, पंचायत, पार्षद, विधायक, दूसरी-तीसरी पंक्ति के मंत्री-सांसद तक की महत्ता नाममात्र की रह जाती है। इसी वजह से समाज में हो रहे अच्छे काम, रचनात्मक गतिविधियों, यहां तक कि सरकार के जन कल्याण कार्यक्रमों-योजनाओं की सही जानकारियां लोगों तक नहीं पहुंचतीं। वैसे सत्ताधारी यह भी जानते हैं कि जनता की भागीदारी के बिना गांव, शहर, प्रदेश, देश की प्रगति संभव नहीं है। महाराष्ट्र-गुजरात हो अथवा हरियाणा-पंजाब या आदिवासी बहुल छत्तीसगढ़-झारखंड, ग्राम पंचायतों, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने सामाजिक-आर्थिक बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दुर्भाग्यवश बिहार-उत्तर प्रदेश जैसे प्रदेशों में राजनीतिक सत्ताधारियों ने जमीनी संस्थाओं को बेकार बना दिया। हां, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने संगठनात्मक ढांचे का उपयोग किया।

इसी का परिणाम हुआ कि उसे राष्ट्रीय स्तर पर पूर्ण बहुमत मिल गया। कुछ राज्यों में गुटबाजी या विधायकों-मंत्रियों की निष्क्रियता ने उसे पराजित भी किया है। लेकिन हरियाणा जैसे प्रदेश में पंचायत चुनाव में मैट्रिक की शिक्षा की अनिवार्यता से हुए चुनाव तथा पंचायतों को मिले अधिकारों से गांवों में चमत्कारिक ढंग से बदलाव आया है। अब जम्मू-कश्मीर में भी पंचायतें ही संपूर्ण व्यवस्था को बदलने एवं नई विकासधारा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेंगी। प्राकृतिक विपदा हो अथवा प्राकृतिक संपदा का संरक्षण या सामाजिक-आर्थिक तरक्की के लिए केन्द्रीय सत्ता के बजाय सुदूर ग्रामीण स्तर तक सत्ता का विकेन्द्रीकरण, योजनाओं का क्रियान्वयन होने पर ही सत्ता को कल्याणकारी एवं लोकप्रिय साबित किया जा सकता है।

(लेखक पद्मश्री सम्मानित व एडिटर्स गिल्ड के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

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मिस्टर मीडिया: गांधी से साहसी पत्रकार कौन?

वे सरकार के उस फ़रमान को नही मानते, जिसमें कहा गया था कि सरकार की अनुमति के बिना कोई समाचारपत्र नहीं निकाल सकता। साथ ही एक शब्द भी बिना अनुमति के नहीं छप सकता...

Last Modified:
Wednesday, 02 October, 2019
Mister Media

राजेश बादल

वरिष्ठ पत्रकार

सारा देश गांधीमय है। इस बार याद के अहसास की तीव्रता तनिक ज़्यादा है। मीडिया भी हर बार की अपेक्षा इस बार अधिक स्थान राष्ट्रपिता को दे रहा है। सिर्फ़ इसीलिए नहीं कि यह साल महात्मा जी के जन्म का डेढ़ सौवां साल है ,बल्कि इसलिए कि इस बार सरकारी मशीनरी भी पुरजोर प्रयास कर रही है। अन्यथा हर बार दो अक्टूबर और तीस जनवरी को गांधी हमारे दिलों में जागता है और उसके बाद सो जाता है। मीडिया भी कोई अपवाद नहीं है। 

सवाल यह है कि आज कि पत्रकारिता में जो चुनौतियां हैं, उनका मुकाबला करने के लिए हमारे अंदर साहस है अथवा नहीं? क्या गांधी की पचपन साला पत्रकारिता से हमने कुछ ग्रहण किया है। गांधी ने तो साफ कहा था कि देश की आजादी के लिए मेरा  संघर्ष तो वही है  जो एक हिन्दुस्तानी को करना चाहिए। असल काम तो मेरा पत्रकारिता का है। मैंने जीवन भर पत्रकारिता ही की है और बिना समझे एक शब्द भी नहीं लिखा, न ही कोई शब्द अपनी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ लिखा है। तो अगर गांधी उस दौर में अपने साहस का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकते थे, जिस काल में गोरी हुकूमत  सर्वाधिक क्रूर और अमानवीय ढंग से व्यवहार कर रही थी। उनसे बड़ा साहसी पत्रकार कौन हो सकता था। 

याद करिए वायसरॉय पर जानलेवा हमले के बाद बर्तानवी सत्ता ने क्रांतिकारियों के प्रति अत्यंत हिंसक रवैया अख्तियार किया था। गदर पार्टी के सदस्यों, काकोरी केस के सेनानियों से लेकर जलियांवाला बाग़ नरसंहार और चंद्रशेखर आजाद,सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत। किशोरों तक को सूली टांगा जाने लगा था। सारा देश थर थर कांप रहा था। पूरे देश में डर की सत्ता थी।

ऐसे में 1919 में गांधी जी क़ानून का विरोध करते हैं। वे सरकार के उस फ़रमान को नही मानते, जिसमें कहा गया था कि सरकार की अनुमति के बिना कोई समाचारपत्र नहीं निकाल सकता। साथ ही एक शब्द भी बिना अनुमति के नहीं छप सकता। गांधी बिना इजाज़त सत्याग्रह का प्रकाशन करते हैं। वे संपादक की हैसियत से लिखते हैं कि सत्याग्रह का प्रकाशन बिना सरकारी आज्ञा लिए किया का रहा है और इसके कंटेंट की अनुमति भी नहीं ली जाएगी। यह तब तक जारी रहेगा, जब तक कि क़ानून वापस नहीं लिया जाता। ऐसा हुआ और जल्लाद सरकार देखती रही। यह था गांधी का साहस। उनकी पत्रकारिता सच का आग्रह करती थी। तभी तो वह सत्याग्रह था। इस निर्भीक पत्रकारिता का शतांश भी हम कर सकें तो शायद  आज की चुनौतियों का सामना कर पाएंगे। इस मंत्र को ध्यान में रखना होगा मिस्टर मीडिया!

 

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वरिष्ठ पत्रकार सिराज कुरैशी ने ऐसे जोड़ा गांधी और मोदी को

मोदी विश्व के किसी भी देश में पहुंचें, उनकी एक झलक पाने, उनकी मधुर वाणी सुनने के लिये लाखों लोग तत्पर दिखाई देते हैं

Last Modified:
Tuesday, 01 October, 2019
Siraj Qureshi

डॉ. सिराज कुरैशी, वरिष्ठ पत्रकार।।

भारत का वह प्रदेश जिसने विश्व पटल पर देश का नाम रोशन किया-वह है ‘गुजरात’। गुजरात की अपनी खुद की जो पहचान है, वह तो है ही, लेकिन गुजरात के दो महारथियों ने विश्व पटल पर जो नाम कमाया, उससे पूरे विश्व के प्रमुखों के दांत खट्टे हो गये। इन दोनों महारथियों के नाम हैं-मोहन दास करमचन्द गांधी, जिन्हें आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम से भी पहचाना जाता है। दूसरे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी, जिन्हें विश्व का नम्बर वन सियासतदां माना जाता है।

महात्मा गांधी जन्म के डेढ़ सौ साल बाद भी आज जिन्दा हैं। उनके विचारों को मानते हुये, उनके पदचिन्हों पर आज करोड़ों लोग चलते हुये देखे जा सकते हैं। लाखों लोग अपने फायदे के लिये उनके नाम का इस्तेमाल भी करते हुये देखे जा सकते हैं, लेकिन दुःख तब होता है जब ऐसे महारथी (महात्मा गांधी) को विवादित बना दिया जा रहा है।

मैं यकीन के साथ कह सकता हूं कि गुजरात के दूसरे महारथी जनाब नरेंद्र भाई मोदी, महात्मा गांधी के नाम को कभी विवादित नहीं बनने देंगे, क्योंकि वर्तमान में यह नाम देश की धरोहर बन गया है। इसका मुख्य कारण यह भी कहा जा सकता है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारों और चरित्र में जो गहराई थी, उसका लोहा आज भी पूरी दुनिया मानती है।

ठीक उसी तरह नरेंद्र भाई मोदी के कार्य भी विश्व को आश्चर्यचकित किये हुए हैं। जिस तरह की बुनियादी सोच गांधीजी की थी, उसी सोच के मालिक मोदीजी भी हैं। यही वजह है कि मोदी विश्व के किसी भी देश में पहुंचें, उनकी एक झलक पाने, उनकी मधुर वाणी (जो शिक्षाप्रद होती है) सुनने के लिये लाखों लोग तत्पर दिखाई देते हैं। यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि यह सच्चाई की खोज में निकले व्यक्ति की यात्रा है। सच्चाई में भगवान (खुदा) को खोजने की जीवन भर की यात्रा न कि उस दैवत्व की, जिसे सादा तरीके से परिभाषित किया जा सकता हो।

विगत दिनों अमेरिका में हुई इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में विश्व भर के रहनुमाओं के बीच नरेंद्र मोदीजी की स्पीच ने आतंकवाद से लड़ने की जो विधि बताई तथा जिस तरह एकता की राह पर चलने का रास्ता दिखाया, उसे सुनकर पूरी दुनिया के देशों के प्रमुख दांतों तले अंगुली दबा बैठे और लोहा मान गये। यह कोई पहली घटना नहीं है, इससे पहले भी जिस देश में जाकर मोदी बोले हैं, वहां की अवाम ने उनके उपदेशों को अपनाया भी है। ऐसा मुझे पढ़ने को भी मिला है।

खैर, आज हमारे पड़ोसी देश अपने देश की अवाम की परेशानियों की अनदेखी करते हुए कश्मीर की बात करते दिखते हैं, जबकि मोदी और उनकी टीम ने कश्मीरी परिवारों की परेशानी को भांपकर निःसंकोच अनुच्छेद 370 हटाकर उनके और उनके प्रदेश (कश्मीर) के उत्थान के लिए जो कदम उठाया, उससे केवल हिन्दुस्तानी अवाम ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व ने खुशी जाहिर की है।

कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करने की बात मैंने इस लेख में इसलिये भी जोड़ी है कि जिस तरह अंग्रेजी हुकूमत ने भारत में अपने कदम ठोस तरीके से जमा रखे थे और उन्हें हटाने वाला कोई नहीं था-उन कदमों को केवल एक ही शख्स ने हटाने की हिम्मत जुटाई और वह शख्स था मोहनदास करम चंद गांधी। ठीक उसी तरह किसी भी प्रधानमंत्री ने 70 सालों से लगे अनुच्छेद 370 को हटाने की जर्रत नहीं की, वह हिम्मत वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ही दिखाई।

शायद मोदीजी यह भी अच्छी तरह जानते हैं कि हमारा देश छोटे-छोटे समुदायों से ही बना है, इसलिये भारत वर्ष को भाषा-पंथ यहां तक कि जन्म स्थान और विरासत से परिभाषित करना संभव नहीं है। मोदीजी शायद यह भी भली-भांति जानते हैं कि यदि सभी लोग सामान्य रूप से मानवता में विश्वास करते हों तो उनके सामने विवाद, खासकर राजनीतिक पटल पर मतभेदों और विवादों को सुलझाने का मसला हो तो कैसा कदम उठाना चाहिये। मुझे यह लेख लिखते समय ध्यान आ रहा है कि एक बार जनसभा को सम्बोधित करते हुये मोदीजी ने उपस्थित जनता से ही प्रश्न पूछा था कि आप बताएं कि जीवन कैसे जिया जाये? पूरी सभा में खामोशी छा गई। इसका उत्तर भी स्वयं मोदीजी ने ही दिया। यह सवाल भी आज कहीं ज्यादा मौजूं हो गया है।

जब पर्यावरण के प्रभाव को लेकर लोगों और समूहों में दिनोंदिन जागरूकता बढ़ रही है। इसके अलावा देश की जनता जनसंख्या सीमित करने को लेकर भी जागरूक दिखाई दे रही है। देश-प्रदेश-शहर और कालोनी कैसे स्वस्थ्य और साफ-सुथरी रहे, इसको बताने के लिये जब स्वयं झाडू़ उठाई तो देश की समस्त जनता की आंखें उसी तरह खुल गईं, जिस तरह से महात्मा गांधी ने कपड़ों का त्याग करके केवल चश्मा-लाठी और धोती को अपनाकर अंग्रेजों की नींद उड़ा दी थी। 

आखिर में पुनः मैं गुजरात प्रदेश की सराहना करता हूं कि इस प्रदेश ने दो महारथी (गांधीजी और मोदीजी) भारत को दिये हैं, जो सदैव विश्व पटल पर चमकते रहेंगे। दो अक्टूबर को महात्मा गांधी को श्रद्धांजिल अर्पित करते हुये दूसरे गुजरातवासी (गांधी ही कहें) मोदी को दुआयें देता हूं।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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‘अधिकांश हिंदी चैनल्स के संपादकों का भी यही सच है’

कुछ एंकर ऐसे भी मिले जो सचेत होना ही नहीं चाहते। वे जिस हिंग्लिश के अभ्यस्त हो गए हैं, उसे छोड़ना नहीं चाहते, खुद को बदलना नहीं चाहते

Last Modified:
Monday, 30 September, 2019
Rahul Dev

राहुल देव, वरिष्ठ पत्रकार।।

ऐसा नहीं कि सभी हिंदी एंकर अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हुए हैं और अंग्रेजी की पृष्ठभूमि से आए हैं। अधिकांश हिंदी पृष्ठभूमि और माध्यम के हैं। संपादकों का भी यही सच है। गिने-चुने ही अंग्रेजी के हैं, लेकिन कई बड़े विचारवान अथवा गंभीर संपादक भी अपनी मूल भाषा, अपने चैनल की भाषा की गरिमा, शील और प्रतिष्ठा के प्रति अगंभीर, उदासीन दिखते हैं। वे भी अपने आप पर पड़े अंग्रेजी-ज्ञानी दिखने के व्यापक दबाव के असर को देख नहीं पाते शायद। यह दबाव हर हिंदी वाला महसूस करता है। जो सजग हैं, वे बच जाते हैं। जो अपने भाषा-व्यवहार में अचेत हैं, कहीं उसी हीनता बोध से ग्रस्त हैं, वे नहीं बच पाते।

कुछ एंकर ऐसे भी मिले जो सचेत होना ही नहीं चाहते। वे जिस हिंग्लिश के अभ्यस्त हो गए हैं, उसे छोड़ना नहीं चाहते, खुद को बदलना नहीं चाहते। उसकी जरूरत ही महसूस नहीं करते। कुछ ऐसे हैं, जो टोके जाने पर चिढ़ जाते हैं। टोके जाना किसी को अच्छा नहीं लगता। मुझे भी। पर यह हमारे ऊपर है कि टोके जाने पर हम उसके कारण को तटस्थ होकर देख सकते हैं, उसपर विचार कर सकते हैं और अपने को बेहतरी के लिए बदल सकते हैं या सिर्फ अपने अहंकार के आहत होने पर जिद करके वही काम करने लग जाते हैं।

एक सामूहिक समस्या यह भी है कि अधिकांश टीवी न्यूजरूम्स में, चैनलों की संपादकीय नीतियों में सही हिंदी लिखने, बोलने और भाषा के दूसरे गंभीर पक्षों पर कोई ध्यान और जोर नहीं दिखता। जहां संपादक ही घोर हिंग्लिश बोलते हैं, वहां ऐसी किसी भाषा नीति, नियम और संवेदनशीलता की उम्मीद करना नादानी ही होगी।

ऐसे अपने सभी मित्रों से विनम्रता के साथ सिर्फ एक बात कहना चाहता हूं-आपकी, हमारी और आपके चैनलों की पहचान, उनके अस्तित्व का आधार हिंदी है। आप हिंदी पत्रकार और हिंदी चैनल के रूप में ही जाने जाते हैं। इसलिए आपकी हिंदी अच्छी होगी, सिर्फ हिंदी होगी तो आपकी निजी और आपके चैनल की ही प्रतिष्ठा बढ़ेगी। आप बाजारू हिंग्लिश बोल-लिखकर अपनी ही पहचान को मटमैला और बाजारू कर रहे हैं।

जरा अंग्रेजी चैनलों के संपादकों, संवाददाताओं, एंकरों का भाषा-व्यवहार देखिए। क्या वह अपनी अंग्रेजी में हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं के शब्द, वाक्यांश, वाक्य, अभिव्यक्तियां मिलाते हैं, जैसे हम? क्या हम उनसे कमतर, कमजोर और हीन हैं?

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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