‘टाइम्सख नाउ’ हिंदी में प्रिंसिपल करेसपॉन्डेंट कुलदीप को यह सम्मान उत्तटर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यसनाथ के हाथों दिया जाएगा

समाचार4मीडिया ब्यूरो 8 months ago


पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में लेखिका व वरिष्ठ पत्रकार जयंती रंगनाथन के नए उपन्यास का लोकार्पण किया गया

समाचार4मीडिया ब्यूरो 1 year ago


पत्रकारिता में करीब 25 साल के करियर के दौरान कई पब्लिकेशन हाउस में अपनी जिम्मेदारी निभा चुके हैं विनोद श्रीवास्तव

समाचार4मीडिया ब्यूरो 1 year ago


जाने-माने साहित्यकार, पत्रकार और स्तंभकार कमलाकांत त्रिपाठी ने महाकाव्यात्मक शैली का उपन्यास लिखा है

समाचार4मीडिया ब्यूरो 1 year ago


युवा पीढ़ी के लेखक भुवनेश्वर उपाध्याय जो पूरी तरह से लेखन को अपना कर्म और धर्म...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago


एक पत्रकार से पंजाब नेशनल बैंक के पूर्व जनरल मैनेजर रहे वेद माथुर का हास्य उपन्यास...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago



समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। पिछले 13 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय भूमिका निभा रहे मनीष शर्मा का जल्द ही एक और नया उपन्यास आने वाला है, जो कि अंग्रेजी फिक्शन पर आधारित होगा। हालांकि उनके इस उपन्यास का कवर पेज फेसबुक पर लॉन्च हो गया है। इस उपन्यास का नाम है ‘आय वॉन्ट टू बी तेंदुलकर!’। बता दें कि मनीष का यह दूसरा उन्यास है। तीन स

समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago


टीवी पत्रकार हृदयेश जोशी का उपन्यास ‘लाल लकीर’  नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में घट रही त्रासदी के बीच एक आदिवासी के प्रेम और और संघर्ष की मर्मस्पर्शी कहानी है। इस उपन्यास की समीक्षा हिंदी की मशहूर पत्रिका 'कादम्बिनी' में पत्रकार सौदामिनी पांडे ने लिखी है, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं: <img class="alignright size-full wp-image-15102" src="http://samach

समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago


<div><b>शेष नारायण</b><b>&nbsp;</b><b>सिंह</b><b>&nbsp;</b></div> <div>प्रोफ़ेसर&nbsp;काशी नाथ सिंह

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<div><strong>शिशिर शुक्ला</strong></div> <div><strong>समाचार4मीडिया.कॉम</strong></div> <div>दिल्ली क

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<strong>समाचार4मीडिया ब्यूरो</strong> <div align="justify">चर्चित व्यंग्यकार सुभाष चंदर का 'अक्कड़-बक्कड़' उपन्यास ग्रामीण जीवन को आधार बना कर लिखा गया है, उनके उपन्यास की समीक्षा समीक्षक एम.एम. चंद्रा ने की है, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं: नवउदारवादी दौर में ग्राम्य जीवन पर बहुत कम उपन्यास लिखे गए हैं। खासकर 1990 के बाद तो ग्रामीण पृष्ठभूमि

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