एसपी के आलोचकों में कई तरह के लोग हैं, पर वे सब बहुत बौने हैं

हमें भी एसपी सिंह के साथ रविवार और नवभारत टाइम्स में काम करने का अनुभव है

Last Modified:
Friday, 01 July, 2016
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जयशंकर गुप्ता

वरिष्ठ पत्रकार ।। 

राजेश बादल जी, एसपी यानी सुरेंद्र प्रताप सिंह पर सामग्री और संसाधनों के अभाव के बावजूद बेहतरीन बायोपिक फिल्म तैयार करने और उनकी पुण्य तिथि पर इसके प्रसारण के लिए आपको और राज्यसभा टीवी को कोटिशः धन्यवाद। इस फिल्म को लेकर आपकी पोस्ट पर आई कुछ टिप्पणियों-कटूक्तियों को देखकर कम से कम मुझे तो कोई आश्चर्य नहीं हुआ। धर्मयुग, रविवार, नवभारत टाइम्स, देव फीचर्स, दि टेलिग्राफ के जरिए प्रिंट माध्यम तथा ‘आजतक’ के जरिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र में एसपी सिंह के योगदान को लेकर इस देश की राजनीति, पत्रकारिता और आम लोगों के बीच उनके समर्थकों और प्रशंसकों का एक बहुत बड़ा संसार है तो उनके आलोचक भी अपने-अपने कारणों से बहुतेरे मिल जाएंगे।

अगर आज भी और खासतौर से नब्बे के दशक में खबरिया चैनलों पर कहा जाने वाला अगर सबसे लोकप्रिय और आम लोगों की जुबान पर छा जाने वाला एक ही वाक्य था, ‘ये थीं खबरें आज तक इंतजार कीजिए कल तक’ या फिर ‘ये थीं खबरें आजतक, इंतजार कीजिए सोमवार तक।’ और लोग, जिनमें एसपी के प्रशंसकों से लेकर कटु आलोचक भी होते थे, वाकई सरकारी दूरदर्शन पर बीस मिनट के आजतक के प्रसारण का इंतजार करते थे। हम रामहित नंदन जी जैसे विद्वान और पारखी लोगों की बात नहीं कर सकते लेकिन एसपी से असहमत रहने वाले लोग भी उनकी तथ्य और कथ्य की समझदारी और शैली के कायल थे।

हमें भी एसपी सिंह के साथ रविवार और नवभारत टाइम्स में काम करने का अनुभव है। कहने की जरूरत नहीं कि उनके रहते रविवार और नवभारत टाइम्स की लोकप्रियता चरम पर थी। रविवार में रहते हिंदी की बात तो छोड़ ही दें अंग्रेजी और बांग्लाभाषी बड़े-बड़े पत्रकार राजनीति से लेकर खेल तक के विषयों में तथ्य चेक करने अथवा परामर्श करने एसपी के पास ही आते थे।

एक वृतांत बताता हूं। 1984 के लोकसभा चुनाव हो रहे थे। हम सारे लोग रिपोर्टर्स, रिटेनर्स और डेस्क के कई साथी भी फील्ड में जाकर रिपोर्ट कर रहे थे। हम सबने प्रायः अपने अपने हिसाब से स्थानीय मुद्दों और सामाजिक समीकरण को सामने रखकर रिपोर्टिंग की। हमने इलाहाबाद में हेमवतीनंदन बहुगुणा और अमिताभ बच्चन के बीच के चुनावी महाभारत पर बड़ी रिपोर्ट लिखी थी जिसे एमजे अकबर ने टेलिग्राफ में भी पूरे एक पन्ने पर ‘बैटिल ऑफ इलाहाबाद, बहुगुणा वर्सेज बच्चन' के नाम से प्रकाशित की थी। एसपी सिंह भी केंद्रीय उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में घूम कर लौटे थे। आपस की बैठक में उन्होंने कहा कि उन्होंने सबकी रिपोर्ट देख ली है लेकिन उनका अपना मानना है कि इस चुनाव में कांग्रेस को 400 से अधिक सीटें मिलने वाली हैं और इलाहाबाद में बच्चन की जीत पक्की है। हम सब सकते में थे। हमने कुछ ज्यादा ही तैश में आकर कह दिया कि लगता है कि डीपीटी ने आपको पट्टी पढ़ा दी है और आपका कांग्रेसीकरण हो गया है। एक पल के लिए झेंपने के बाद उन्होंने कहा कि हो सकता है कि गलत हो लेकिन यह मेरा आंकलन है और जयशंकर तुमसे तो मैं एक बोतल रम की बाजी लगा सकता हूं। जब चुनावी नतीजे आए तो हम सारे नतमस्तक थे। संभवतः यह केवल एसपी सिंह और समाजवादी नेता मधु लिमए ही थे जिन्होंने 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 400 से अधिक सीटें मिलने का पूर्वानुमान लगाया और उसे सार्वजनिक भी किया था।

इस तरह के तमाम तथ्य हैं जो तथ्य और कथ्य की एसपी सिंह की समझदारी को लेकर उन पर कटुक्तियां करने वालों को बहुत बौना साबित करती हैं। उनके आलोचकों में कई तरह के लोग हैं। एक तो वे लोग हैं जिन्हें वह किन्हीं कारणों से अपने साथ काम करने का मौका नहीं दे सके, दूसरे वे लोग हैं जिन्हें उनकी कार्यशैली में एसपी के करीबी कहे जानेवाले लोगों की अपेक्षा कम महत्व मिला और तीसरी श्रेणी के लोग वे हैं जिनकी विचारधारा एसपी की पत्रकारिता को कभी पसंद कर ही नहीं सकती। संघ की विचारधारा में दीक्षित लोगों के पास स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर राजनीति और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी महानायकों की बात तो छोड़ ही दें नायक भी दूरबीन लगाकर खोजने से भी नहीं मिलते।

ऐसे संघनिष्ठ लोग अंग्रेजों से माफी मांगने वाले सावरकर में अपना नायक तलाशते हैं, हालांकि जीवित रहते सावरकर और संघ के लोगों में कभी नहीं बनी। इसी तरह उनके नायकों में बालासाहेब देवरस हैं जिन्होंने आपातकाल में इंदिरा गांधी के पास माफीनामा भेजकर उनके बीस सूत्री कार्यक्रमों का समर्थन करने की ख्वाहिश जाहिर की थी। रामहित नंदन जी ने शायद एसपी सिंह के साथ काम नहीं किया लेकिन उनके सहयोगियों के साथ काम करने के उनके अनुभव शायद बहुत अच्छे नहीं रहे। हालांकि बाद के दिनों में वह जहां जिस चैनल में भी गए कोई ऐसा कीर्तिमान नहीं खड़ा कर सके जिसके लिए उनकी अपनी कोई पहचान बन सकी हो।

यह मेरी कमी हो सकती है, लेकिन उनकी विद्वता और अनुभव के लाभ से मैं वंचित ही रहा हूं। उन्हें यह कहने का पूरा हक है कि एसपी सिंह पत्रकारिता के नायक-महानायक नहीं बल्कि औसत दर्जे के पत्रकार थे। अब मुश्किल यही है कि उस औसत दर्जे के पत्रकार’ के अधितकतर सहयोगी ही, जिन्हें रामहित चेले कहते हैं, आज हिंदी की प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सिरमौर बने हैं।

राज्यसभा टीवी के द्वारा ‘पत्रकारिता के महानायक एसपी सिंह’ पर बनाने और दिखाई जानेवाली फिल्म को लेकर ही नहीं बल्कि इसकी और भी बहुत सारी बातों को लेकर हमारे संघनिष्ठ भाइयों को तीखी आपत्ति है। उनकी मुश्किल है कि अन्य टीवी चैनलों की तरह राज्यसभा टीवी को भी नियंत्रित कर निक्करधारियों-माफ कीजिएगा अब फुल पैंट धारण करने की छूट मिलने लगी है-द्वारा संचालित करने के मंसूबे पूरे नहीं हो पा रहे।

रही बात हमारे प्रिय मित्र जितेंद्र की तो उन्होंने एसपी सिंह के सामाजिक सरोकारों के बरक्स नौकरी देने के मानदंडों, भाषा-भूषा और शिक्षा को लेकर सवाल उठाए हैं। और यहां तक कह दिया है कि एसपी सिंह नहीं चाहते थे कि पढ़े लिखे और समझदार लोग उनके साथ काम करें। अब इसका फैसला तो एसपी सिंह की रविवार और नवभारत टाइम्स से लेकर टेलिग्राफ और आजतक की टीम के सदस्यों की शिक्षा-दीक्षा, भाषा और पहनावे की पड़ताल करने के बाद ही हो सकेगा। भाई जितेंद्र सामाजिक सरोकारों को लेकर चिंतित और सामाजिक न्याय के पक्षधर, विचारों से अति वाम क्रांतिकारी पत्रकार हैं और अगर शब्दों और भाषणों से ही क्रांति संभव हो तो यह काम वह निमित तौर पर करते रहते हैं। लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में जब कभी और जहां जहां उन्हें अपनी प्रतिभा और प्रतिबद्धता साबित करने के अवसर मिले, वह कुछ ज्यादा नहीं कर सके। वह कह सकते हैं कि मौजूदा व्यवस्था में उनके जैसों के लिए खस कुछ कर पाने की स्थितियां हैं ही नहीं।

जितेंद्र की मानें तो एसपी सिंह अपने इर्द गिर्द मूर्खों और मूर्खाओं को ही रखते थे जो उनकी हर बात मानें और अंधानुकरण करें। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि उनकी इस जमात में रविवार से लेकर नवभारत टाइम्स तक हम जैसे मूर्ख और अशिक्षित भी शामिल रहे हैं। मुझे नहीं मालूम कि जब इस देश में मंडल कमंडल को लेकर विवाद चरम पर था, पूरी हिंदी पत्रकारिता ‘सवर्ण हिंदू पत्रकारिता के रूप में बदल गई थी, उस समय जितेंद्र कहां थे? तब अकेले राजेंद्र माथुर और एसपी सिंह के नेतृत्व में नवभारत टाइम्स ही अकेला ऐसा अखबार था जो सवर्ण मनुवादियों और सांप्रदायिक ताकतों के निशाने पर था। एसपी सिंह को कुर्मी, नभाटा के मुख्य संवाददाता शैलेश को दलित और मुझे तेली कहा जाता था, जबकि हममें से तीनों ही सवर्ण थे।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की अपनी आवश्यकताएं और विडंबनाएं भी हैं। एसपी सिंह जब आजतक के साथ जुड़े थे तब वह देश में और खासतौर से हिंदी में इलेकट्रानिक मीडिया का शुरुआती दौर था। बहुत कुछ बाजार और मालिकान भी तय करते थे। एसपी सिंह बाजार की दशा-दिशा को बहुत पहले ही भांप चुके थे और यह मानने लगे थे कि इस विधा में उनके जैसे लोगों के टिके रहना मुश्किल होते जाएगा। एक तरह क विरक्ति का भाव सा जग रहा था उनमें। और उनकी प्रस्तुति पर सवाल करनेवाले मित्र शायद भूल जाते हैं कि वह किस हद तक अपने विषय की गहाइयों के साथ जुड़े होते थे। उपहार कांड पर उनकी भावुक प्रस्तुति को कौन भुला सकता है। आप उन्हें नायक महानायक माने अथवा नहीं मानें, आपकी मर्जी, लेकिन उस समय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक ही ब्रैंड था और उसका नाम था सुरेंद्र प्रताप सिंह जिसे देखने और सुनने के लिए लोग ‘आजतक’ का इंतजार करते थे। आप उनसे सहमत हों या असहमत, यह दीगर बात है लेकिन वह किसी नंदन या जितेंद्र अथवा आलोक श्रीवास्तव के सर्टिफिकेट के मोहताज तो कतई नहीं थे।

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पूण्य प्रसून का सवाल- न्यूज चैनलों के किसी पत्रकार को ये खबर पहले क्यों नहीं पता लगी?  

पुण्य प्रसून बाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार ।। किन्हें नाज है मीडिया पर आडवानी 35.00, खुराना 3.00, एसएस 18.94, के नाथ 7.00, एनडीटी 0.88, बूटा 7.50, एपी 5.00, एलपीए

Samachar4media Bureau by Samachar4media Bureau
Published - Thursday, 29 December, 2016
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Thursday, 29 December, 2016
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पुण्य प्रसून बाजपेयी

वरिष्ठ पत्रकार ।।

किन्हें नाज है मीडिया पर

आडवानी 35.00, खुराना 3.00, एसएस 18.94, के नाथ 7.00, एनडीटी 0.88, बूटा 7.50, एपी 5.00, एलपीएस 5.50, एस यादव 5.00, ए एम 30.00, एएन 35.00, डी लाल 50.00, वीसीएस 47.00, एनएस 8.00 ...और इसी तरह कुछ और शब्द। जिन के आगे अलग अलग नंबर। यानी ना तो इनीशियल से पता चलता कि किसका नाम और ना ही नंबर से पता चलता कि ये रकम है या कुछ और। लेकिन पन्ने के उपर लिखा हुआ पीओई फ्राम अप्रैल 86 टू मार्च 90। और सारे नामों के आगे लिखे नंबर को जोडकर लिखा गया 1602.06800। और कागज के एक किनारे तीन हस्ताक्षर। और तीनों के नीचे तारीख 3/5/91 ....तो इस तरह के दो पन्ने जिसमें सिर्फ नाम के पहले अक्षर का जिक्र।

मसलन दूसरे पन्ने में एलकेए या फिर वीसीएस। और देखते देखते देश की सियासत गर्म होती चली गई कि जैन हवाला की डायरी का ये पन्ना है। जिसमें लिखे अक्षर नेताओं के नाम हैं, जिन्हें हवाला से पेमेंट हुई। और इस पन्ने को लेकर देश की सियासत कुछ ऐसी गर्म हुई कि लालकृष्ण आडवाणी ने ये कहकर लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया कि जब तक उनके नाम पर लगा हवाला का दाग साफ नहीं होता, वह संसद में नहीं लौटेंगे। बाकी कांग्रेस-बीजेपी के सांसद जिनके भी नाम डायरी के पन्नों पर लिखे शब्द को पूरा करते उनकी राजनीति डगमगाने लगी और पूरे मामले की जांच शुरू हो गई।

उस वक्त प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने सीबीआई के हवाले जैन हवाला की जांच कर दी। लेकिन बीस बरस पहले 1996 में डायरी का ये पन्ना किसी नेता ने हवा में नहीं लहराया। ना ही किसी सीएम ने विधानसभा में डायरी के इस पन्ने को लहराकर किसी से इस्तीफा मांगा, बल्कि तब के पत्रकारों ने ही डायरी के इस पन्ने के जरिए क्रोनी कैपटिलिज्म और नेताओं का जैन बंधुओं के जरिए हवाला रैकेट से रकम लेने की बात छापी। जनसत्ता ने नामों का जिक्र किया तो आउटलुक ने तो 31 जनवरी 1996 के अंक में कवर पेज पर ही डायरी का पन्ना छाप दिया और जैन हवाला की इस रिपोर्ट ने बोहरा कमेटी की उस रिपोर्ट को भी सतह पर ला दिया, जिसमें 93 के मुंबई ब्लास्ट के बाद नेताओं के तार अपराध-आतंक और ब्लैकमनी से जुड़े होने की बात कही गई। लेकिन तब जिक्र मीडिया के जरिए ही हो रहा था। सवाल पत्रकार ही उठा रहे थे। मीडिया संस्थान भी बेखौफ सत्ता-सियासत के भीतर की काई को उभार रहे थे।

अतीत के इन पन्नों को जिक्र इसलिए क्योंकि मौजूदा वक्त में जिन कागजों को लेकर हंगामा मचा है, उसमें पहली बार कोई भी सवाल पूछ सकता है कि आखिर ये कौन सा दौर है कि जिस दस्तावेज को केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा में उछाला, जिन कागजों को राहुल गांधी हर रैली में दिखा रहे हैं और जिन कागज-दस्तावेज के आसरे वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खठखटा रहे हैं और अब 11 जनवरी को सुनवाई होनी है। वह कागज मीडिया में पहले क्यों नहीं आये।

आखिर ये कैसे संभव है कि नेता ही नेताओं के खिलाफ कागज दिखा रहे हैं लेकिन किसी पत्रकार ने इन दस्तावेजों को पहले अखबार में क्यों नही छापा? किसी न्यूज चैनल के किसी पत्रकार को ये खबर पहले क्यों नहीं पता लगी? और अब जब राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाते हुए भूकंप लाने वाले हालात का जिक्र कर हवा में आरोपों को उछाल रहे हैं तो क्या वाकई किसी पत्रकार को भूकंप लाने वाली खबर की कोई जानकारी नहीं है या फिर मौजूदा दौर में जानकारी होते हुए भी पत्रकार कमजोर पड़ चुके हैं। मीडिया संस्थान किसी तरह की कोई ऐसी खबर ब्रेक करना नहीं चाहते, जहां सत्ता ही कटघरे में खड़ी हो जाए। तो क्या मौजूदा दौर में मीडिया की साख खत्म हो चली है या फिर सत्ता ने खुद पुरानी हर सत्ता से इतर कुछ इस तरह परिभाषित कर लिया है कि सत्ता की साख पर बट्टा लगाना लोकतंत्र के किसी भी खम्भे के बूते से बाहर हो चला है। या फिर लोकतंत्र के नाम पर लोकतंत्र को ही हड़प कर देशभक्ति का राग जिस तरह देश में गाया जा रहा है, उसमें मीडिया को भी पंचतंत्र के उस बच्चे का इंतजार का है जो भोलेपन से ही बोले लेकिन बोले और राजा को नंगा कह दे।

ये सवाल इसलिये बड़ा है क्योंकि जैन हवाला में तो सिर्फ निजी डायरी के पन्ने थे। लेकिन सहारा और बिरला के दस्तावेजों में बाकायदा खुले तौर पर या तो पूरे नाम हैं या फिर पद हैं। यानी किसी कंपनी की फाइल से निकाले गये कागज भर ही नहीं हैं बल्कि जिस अधिकारी ने छापा मार कागजों को जब्त किया उसके दस्तख्वत भी हैं। और चश्मदीद के तौर पर सहारा की तरफ से अधिकारी के भी हस्ताक्षर हैं। लेकिन मसला कागजों या दस्तावेजों से ज्यादा अपनी अपनी सुविधा से नेताओं का कागज का कुछ हिस्सा दिखाते हुये अपने अपने राजनीतिक लाभ के लिये कागजों की परिभाषा गढते हुये खुद को पाक साफ बताने या कहें सत्ता को कटघरे में खड़ाकर अपनी राजनीतिक जमीन बनाने की मशक्कत भी है।

मीडिया को लेकर असल सवाल यहीं से शुरू होता है कि जो भी देश का नामी अखबार या मीडिया हाउस आज की तारीख में राहुल गांधी के प्रधानमंत्री मोदी पर लगाये आरोपों को छापने-दिखाने की हिम्मत दिखा रहे हैं। क्या वाकई उन्हें पता ही नहीं था कि इस तरह के दस्तावेज भी हैं? या फिर ये कहें कि मौजूदाहालात ने हर किसी को इतना कमजोर बना दिया है कि वह सत्ता को लेकर कोई सवाल करना ही नहीं चाहता क्योंकि न्यायपालिका को लेकर भी उसके जहन में कई सवाल हैं। यानी ये भी सवाल है कि क्या न्याय का रास्ता भी सत्ता ने हड़प लिया है? क्योंकि प्रशांत भूषण भी जब सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस खेहर जो 3 जनवरी को चीफ जस्टिस बन जायेंगे। उन पर सुप्रीम कोर्ट में 14 दिसंबर को ये सवाल उठाने से नहीं चूकते कि, ‘ जब मामला पीएम को लेकर है और चीफ जस्टिस होने की फाइल पीएम के ही पास है तो उन्हें खुद को इस मामले से अलग कर लेना चाहिये।' तो क्या वाकई देश में ऐसा माहौल बन चुका है कि लोकतंत्र का हर पिलर पंगु हो चला है।

लेकिन यहां तो मामला लोकतंत्र के चौथे खम्भे यानी मीडिया का है। और चूंकि पहली बार केजरीवाल ने सहारा-बिरला के दस्तावेजों को नवंबर में विधानसभा में उठाया। नवंबर के शुरू में ही प्रशांत भूषण ने भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। और राहुल गांधी ने दस्तावेजों को दिसंबर में मुद्दा बनाकर प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधना शुरू किया। लेकिन मीडिया का सच तो यही है कि सारे दस्तावेज जून में ही मीडिया के सामने आ गये थे। और ऐसा भी नहीं है मीडिया अपने तौर पर दस्तावेजों को परख नहीं रहा था। और ऐसा भी नहीं है कि देश के जो राष्ट्रीय मीडिया इमरजेन्सी से लेकर जैन हवाला तक के दौर में कभी भी खबरों को लेकर सहमे नहीं।

सत्ता से लड़ते भिड़ते ही हमेशा नजर आये। और तो और मनमोहन सिंह के दौर के घपले घोटालों को भी जिस मीडिया हाउस ने खुलकर उभारा। वह सभी जून से नवंबर तक इन सहारा-बिरला के कागजों को दिखाने की हिम्मत दिखा क्यों नहीं पाये। जबकि सच यही है कि कागजों का पुलिंदा एक मीडिया हाउस के नकारने के बाद दूसरे मीडिया हाउस के दरवाजे पर दस्तक देता रहा। ऐसा भी नहीं है कि जून से नवंबर तक किसी मीडिया हाउस ने दस्तावेजों को परखा नहीं। हर मीडिया हाउस ने अपने खास रिपोर्टरों को दस्तावेजों के सच को जानने समझने के लिये लगाया।

बोफोर्स घोटालों को उजागर करने वाले मीडिया संस्धान ने सहारा के कागजों की जांच कर रहे अधिकारी को जयपुर में पकड़ा। जानकारी हासिल की, लेकिन फिर लंबी खामोशी। तो इमरजेन्सी के दौर मे इंदिरा की सत्ता से दो दो हाथ करने वाले मीडिया संस्थान ने तो कागजों को देख कर ही मान लिया कि देश के पहले तीन को छोड़कर कुछ भी छापा जा सकता है। लेकिन उन्हें छुआ नहीं जा सकता। जैन हवाला की डायरी के पन्नों को छापकर रातों रात देश में पत्रकारिता की साथ ऊंचा करने वाले मीडिया संस्थान ने तो कागज पर दस्तख्त करने वाले इनकम टैक्स अधिकारी से भी बात की और कांग्रेस के एक नेता के प्राइवेट सेकेट्री से भी बात कर कागजों की सच्चाई को परखा। लेकिन उसके बाद खामोशी ही बरती गई। एक रिपोर्टर ने तो वित्त मंत्रालय के भीतर सहारा के दस्तावेजों को लेकर चल क्या रहा है, उसे भी परखा। लेकिन अखबार के पन्नों पर कुछ भी नहीं आया। और तो और दस्तावेजों में जिन नेताओं को सहारा के जिन कारिंदो ने पैसा पहुंचाया, जब उनका नाम तक दर्ज है तो उन नामों तक भी कई मीडिया हाऊस पहुंचे।

यानी सहारा के कागजों में सहारा के ही जिन नामों का उल्लेख है....जो अलग अलग नेताओं को ब्रीफकेस पहुंचा रहे थे। वह नाम भी असली है और कोई दिल्ली में तो कोई लखनऊ में तो कोई मुंबई में सहारा दफ्तर का कर्मचारी है ये भी सामने आया लेकिन जून से नवंबर तक किसी मीडिया हाउस ने खबर को छुआ तक नहीं। मसलन जो ब्रीफकेस पहुंचा रहे थे या जिनके निर्देश पर ब्रीफकेस देने का जिक्र सहारा के कागजो में है, उसमें उदय , दारा , सचिन , जैसवाल , डोगरा का ही जिक्र सबसे ज्यादा है। और ये सारे नाम लखनऊ में सहारा सेक्रटियट से लेकर दिल्ली दफ्तर और सहारा के मुंबई गिरगांव दफ्तर में काम करने वाले लोगों के नाम हैं।

ये भी सच निकल कर आया। लेकिन फिर भी खबर मीडिया में क्यों नहीं आई। इतना ही नहीं मुंबई के एक मीडिया संस्थान ने भी दस्तावेजों को खंगाल कर मुंबई के जिस पते से करोड़ों रुपये खाते में आ रहे थे, उसे भी खंगाला। यानी कोई खास इन्वेस्टिगेटिव पत्रकारिता करने भी जरुरत नहीं रही। सिर्फ कागज में दर्ज उस पते पर रिपोर्टर पहुंचा। जानकारी हासिल की। लेकिन खबर कहीं नहीं आई। तो क्या मीडिया की लंबी खामोशी सिर्फ मौजूदा वक्त की नब्ज बताने वाली है या फिर पहली बार देश के सिस्टम को ही कागजों में दर्ज राजनीतिक हमाम में बदल दिया गया है। क्योंकि कागजों में तो राजनीतिक दलों को रुपया बांटने में समाजवाद बरता गया। यानी सहारा दफ्तर से कुछ हाथों से लिखे पन्ने। कुछ कंप्यूटर से निकाले गये पन्ने तो कुछ नेताओं के नाम वाले पन्नो के पुलिन्दे बताते हैं कि कैसे चिटफंड के जरिये अरबों का टर्नओवर जब कोई कंपनी पार कर मजे में है तो सिर्फ गरीबों के पैसो से सपने बेचने भर का खेल नहीं होता बल्कि राजनीतिक व्यवस्था ही उसके दरवाजे पर कतार लगाये कैसे खड़ी रहती है।

ये दस्तावेज उसी का नजारा भर है। और यहीं से भारतीय मीडिया का वह सच उभरता है कि अगर जून से नवंबर तक तमाम मीडिया को अगर ये कागज फर्जी लग रहे थे तो नवंबर के बाद से राजनीतिक गलियारे में ही जब ये कागज हवा में लहराये जा रहे है तो कोई मीडिया ये कहने की हिम्मत क्यों नहीं दिखा पा रहा है कि उसकी जांच में तो सारे कागजात फर्जी थे। और चूंकि ऐसा हो नहीं रहा। होगा भी नहीं। तो क्या करप्शन या क्रोनी कैपटिलिज्म के कटघरे को ही देश का सिस्टम बना दिया गया है। और पहली बार मीडिया का मतलब सिर्फ मीडिया घराने नहीं बल्कि पत्रकारिता करते संपादक समूह भी अपाहिज सा हो चला है। या फिर देश में वातावरण ही 2014 के सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक शून्यता का कुछ ऐसा बना है कि जो सत्ता में है वह खुद को पूर्व तमाम सत्ता से अलग पेश कर राष्ट्रीय हित में सत्ता चलाने का दावा कर रहा है। सत्ता पार्टी या संवैधानिक संस्थाओं तक को खारिज कर मॉस कम्युनिकेशन/सोशल मीडिया के जरिये जनता से सीधे संवाद कर इस एहसास को जनता के बीच जगा रही है जहां संस्थानों की जरुरत ही ना पड़े। और जनता की आवाज ही कानूनी जामा पहने हुये दिखायी दे। और मीडिया या उसमें काम कर रहे पत्रकारों को अगर ये लग भी रहा है कि सत्ता राष्ट्रीयता के नाम को ही भुना रही हैं तो भी उसकी आवाज नहीं निकल पा रही है क्योंकि या तो देश में कोई राजनीतिक विकल्प कुछ है ही नहीं। या फिर नैतिकता की जिस पीठ पर सवार हो कर सत्ता देश को हांक रही है उसमें बाजार व्यवस्था में लोकतंत्र के हर पाये ने बीते दौर में नैतिकता ही गंवा दी है तो वह कुछ बोले कैसे। ऐसे में लोकतंत्र मतलब ही यही है कि करप्शन देश का मुद्दा हो सकता है। करप्शन के नाम पर सत्ता पलट सकती है। जनता की भावनाओं को राजनीतिक दल अपने पक्ष में कर सकते है लेकिन जो भ्रष्ट हैं, वह सभी मिले हुये है। यानी एक सरीखे हैं। और लोकतंत्र का हर पाया भी दूसरे पाये की कमजोरियों को ढंकने के ही काम आता है। और लोकतंत्र की निगरानी रखने वाला मीडिया भी उसी कतार में जा खड़ा हुआ है। तो क्या 1996 के जैन हवाला के डायरी के पन्नों से निकली सियासत और मीडिया की बुलंद आवाज बीस बरस बाद 2016 में सहारा-बिरला के दस्तावेजों तले दफन हो चली है। यहां से आगे का रास्ता अब सिर्फ लोकतंत्र के राग को गाते हुये जयहिन्द बोलने भर का बचा है। ये सवाल है। मनाइये कि यह सवाल जवाब ना बन जाये। और इसके लिये 11 जनवरी 2017 का इंतजार करना होगा। क्योंकि इसी दिन सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि सहारा-बिरला वाले कागजात फर्जी है या जांच होनी चाहिये। लेकिन चाहे अनचाहे ये तो तय हो गया कि 2016 मीडिया के रेंगने के लिये याद किया जायेगा।

(साभार: फेसबुक वॉल से)

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आपमें खबर को समझने-समझाने की गजब शक्ति थी, पर इंसान नहीं पहचान पाए: चंदन प्रताप

कई दिनों से आपसे बात करने को जी चाह रहा था। सोचा कि आज कर लूं। क्योंकि आज आपकी बरसी पर बहुतों को मर्सिया पढ़ते देख रहा हूं...

Samachar4media Bureau by Samachar4media Bureau
Published - Tuesday, 27 June, 2017
Last Modified:
Tuesday, 27 June, 2017
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चंदन प्रताप सिंह

न्यू मीडिया जर्नलिस्ट ।।

कई दिनों से आपसे बात करने को जी चाह रहा था। सोचा कि आज कर लूं, क्योंकि आज आपकी बरसी पर बहुतों को मर्सिया पढ़ते देख रहा हूं। खैर, हम अपनी बातें करते हैं। मुझे अब आपकी वो नसीहत बहुत याद आती है, जब आप बार-बार मुझे पत्रकार बनने से रोकते थे। निर्मल दा के जरिए बहुत सारी बातें समझाई थीं। तब मुझे आपकी नसीहतें और बहुत सारी बातें समझ में नहीं आई। लेकिन आज समझ में आ रही है, जब आप नहीं हैं।

मुझे उस समय आपकी बहुत याद आई, जब मैं बहुत बीमार था। अस्पताल में बार-बार आपका चेहरा घूमता था। आप हमेशा कहते थे ना कि दुनिया में खून से भी बड़े तीन तरह के रिश्ते होते हैं। एक पैसे का, दूसरा मतलब का और तीसरा दिल का। सच कहता हूं आपसे अब मुझे तीनों रिश्तों की पहचान हो गई है।

उस समय आपसे कह नहीं पाता। लेकिन आज मैं कह सकता हूं। आपमें खबर को समझने और समझाने की गजब की शक्ति थी, लेकिन आप इंसान नहीं पहचान पाए। जिन लोगों को आपने गढ़ा। जो लोग आपके सामने धर्म, जाति और लालच से ऊपर उठकर होने का दावा किया करते थे, आज उन्हीं लोगों को उन्हीं कीचड़ों में लथपथ देखता हूं। तब पता नहीं क्यों लगता है कि आप शायद ऐसे लोगों को पहचान नहीं पाए या पहचान कर भी अनजान बने रहे।

आपका मैं कभी एकलव्य तो नहीं बन पाया। लेकिन यकीन मानिए कि एकलव्य से कम भी नहीं हूं। पच्चीस बरस की पत्रकारिता में मैंने भी बहुत पापड़ बेल लिए। आज मुझे कहने में कोई संकोच नहीं और ना ही किसी का खौफ कि आपके दौर की पत्रकारिता स्वर्णिम दौर की थी। तब पत्रकार पार्टी के अध्यक्ष तो क्या प्रधानमंत्री से भी तीखे सवाल पूछने में रत्ती भर नहीं डरते थे। आज के पत्रकारों की प्रवक्ताओं और धनबल-बाहुबल में चूर नेताओं से सवाल पूछने में सांसें फूल जाती हैं। स्टूडियो में बिठाकर मंत्रियों से ऐसे सवाल करते हैं मानों या तो ककहरा सीख रहे हों या फिर कटोरा भर तेल और मक्खन लेकर मालिकों ने उन्हें इसी काम के लिए एयर किया हो।

आज तो मुझे कुकुरमुत्ते की तरह उग आए चैनलों में ऐसे कई प्रधान संपादक और सीईओ भी टकराए लेकिन जो हिंदी वर्तनी में अपना नाम भी शुद्ध नहीं लिख सकते। फिर आपकी याद आती है। आप बचपन  में एक किस्सा सुनाया करते थे कि कैसे जैन घरानें में बाटा कंपनी से एक जीएम आया था। वो उस घराने के बड़े संपादकों पर छड़ी फिराने का शौक रखता था और बड़े शान से कहता था कि आई डोंट नो इवन दा का, खा, गा ऑफ हिंदी। बट आई हेडिंग हिंदी मैगजीन्स। फिर आप लोगों ने कैसे उसे चलता किया। सोचता हूं कि एक दिन ये लोग भी चलते होंगे।

आपने कई बार सार्वजनिक मंचों से कहा कि अब कई पत्रकारों ने इस पेशे को बदनाम कर दिया है। वसूली और रिश्वतखोरी की वजह से लोग पत्रकारों से भी उसी तरह डरने लगे हैं, जैसे कि वो पुलिसवालों से डरते हैं। आपकी बात सोलहों आने सच साबित हो रही है। पहाड़ पर वसूली का धंधा चलाते हैं। फिर कानून के डर से भागकर मैदान में आ जाते हैं और ये सब हो रहा है पत्रकारिता के नाम पर।

आपसे बहुत सारी बातें करनी हैं। कुछ घर की, कुछ परिवार की, कुछ नाते-रिश्तदारों की और कुछ पत्रकारिता की भी। वो तमाम बातें आपसे खुलकर और बिना डरे हुए करना चाहता हूं, जो इस जन्म में नहीं कर पाया। बहुत जल्द मिलूंगा आपसे। आपके पास आकर। फिर करुंगा अपनी मन की बात। इस बार आप सिर्फ सुनेंगे। और हां, इस बार आप जो कहेंगे, मैं उस पर अमल करुंगा।


 

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वरिष्ठ पत्रकार सुप्रिय प्रसाद ने बताया, कुछ यूं एसपी ने लालू को कराया था चुप

उन खुशनसीब पत्रकारों में मेरा नाम भी शामिल है, जिन्हें एसपी के साथ काम करने का मौका मिला...

Samachar4media Bureau by Samachar4media Bureau
Published - Wednesday, 27 June, 2018
Last Modified:
Wednesday, 27 June, 2018
Samachar4media

सुप्रिय प्रसाद

मैनेजिंग एडिटर, टीवी टुडे ग्रुप

उन खुशनसीब पत्रकारों में मेरा नाम भी शामिल हैजिन्हें एसपी के साथ काम करने का मौका मिला। एसपी ने 1 जुलाई 1995 को 'आजतक' जॉइन किया था। लेकिन मैं उनसे ठीक बीस दिन पहले यानी 10 जून को ही 'आजतक' आ गया था। जॉइन करने के बाद एसपी ने कायदे से एंकरिंग का अभ्यास किया था। 17 जुलाई 1995 को दिल्ली दूरदर्शन पर 20 मिनट के न्यूज शो के रूप में आजतक शुरू हुआ था। एसपी के साथ काम करने का तजुर्बा अपनेआप में अनोखा था। खबरों के प्रति उनकी दीवानगी को देख हमलोग हैरान थे। वे रोज कई क्षेत्रीय अखबारों समेत 40 से 50 अखबार पढ़ते थे। कई बार तो खुद कई ब्यूरो चीफ को फोन कर बताते थे कि उनके शहर या इलाके में कौन सी खबर है और उसे कैसे कवर करना है।


आजतक में तब मुझे तीन महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर ट्रेनी रिपोर्टर के रूप में काम करने का मौका मिला था। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तब तकनीकी रूप से इतना समृद्ध भी नहीं था। मेरा कॉन्ट्रैक्ट 10 सितंबर को पूरा होने वाला था, उससे पहले ही मैं एसपी के पास पहुंच गया और पूछ बैठा कि सर तीन महीने पूरे होने वाले हैं अब बता दीजिए कि 10 सितंबर के बाद आना है या नहीं। एसपी हंस पड़े और बोले कि आपके काम से मैं बहुत खुश हूं और आप मेरे साथ काम कर रहे हैं। तभी मुझे असिस्टेंट न्यूज को-ऑर्डिनेटर का पद दिया गया।

एसपी के साथ काम करने में सबसे बड़ी सुविधा थी उनकी सहज उपलब्धता। उनसे हर कोई सहज ही मिल सकता था और कुछ भी पूछ सकता था। खेल हो या बिजनेसराजनीति हो या चुनाव, हर विषय पर उनकी पकड़ अद्भुत थी। आजतक के शुरुआती दौर में एसपी हर खबर की एक-एक लाइन पढ़ते थे, और फिर उस पर अपनी राय देते थे। खबरों को लेकर उनसे सीधा जुड़ाव होने के कारण ही मुझे उनसे इंटरैक्शन का पूरा मौका भी मिला।

शो की शूटिंग के दौरान कई मजेदार घटनाएं भी घटती रहती थीं। मुझे याद है एक ऐसी ही मजेदार घटना तब घटी थी जब लालू प्रसाद यादव गेस्ट के रूप में स्टूडियो आए थे। लालू यादव उस समय बिहार के मुख्यमंत्री थे। स्टूडियो में लालू यादव और एसपी के बीच सवाल-जवाब का दौर शुरू हो गया। इंटरव्यू रिकार्ड हो रहा था। उस समय किसी का भी इंटरव्यू चार मिनट से ज्यादा नहीं जा सकता था,  क्योंकि शो ही 20 मिनट का था। अब लालू ने पहले सवाल के जवाब में बोलना शुरू किया तो बोलते ही चले जा रहे थे। दूसरा सवाल पूछने के लिए एसपी उन्हें रुकने का इशारा करने लगे, लेकिन लालू उस समय कहां किसी का इशारा समझते थे। इधर जब एसपी ने देखा कि लालू को इशारा करना समय गंवाना है तो अंत में उन्होंने लालू के पैर पर ही अपना पैर जोर से मार दिया। तब जाकर लालू के बोलने पर ब्रेक लगा।

एसपी सिंह अपने आप में पत्रकारिता के विश्वविद्यालय थे। खबरों को लेकर उनका जुनून था तो विजन भी था। जो भी उनके साथ रहाबहुत कुछ सीख गया। एसपी के साथ काम करके ही मेरी बुनियाद मजबूत हो पाई, जिस पर आज मैं खड़ा हूं।

 

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