एसपी के आलोचकों में कई तरह के लोग हैं, पर वे सब बहुत बौने हैं

हमें भी एसपी सिंह के साथ रविवार और नवभारत टाइम्स में काम करने का अनुभव है

Last Modified:
Friday, 01 July, 2016
sp5

जयशंकर गुप्ता

वरिष्ठ पत्रकार ।। 

राजेश बादल जी, एसपी यानी सुरेंद्र प्रताप सिंह पर सामग्री और संसाधनों के अभाव के बावजूद बेहतरीन बायोपिक फिल्म तैयार करने और उनकी पुण्य तिथि पर इसके प्रसारण के लिए आपको और राज्यसभा टीवी को कोटिशः धन्यवाद। इस फिल्म को लेकर आपकी पोस्ट पर आई कुछ टिप्पणियों-कटूक्तियों को देखकर कम से कम मुझे तो कोई आश्चर्य नहीं हुआ। धर्मयुग, रविवार, नवभारत टाइम्स, देव फीचर्स, दि टेलिग्राफ के जरिए प्रिंट माध्यम तथा ‘आजतक’ के जरिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र में एसपी सिंह के योगदान को लेकर इस देश की राजनीति, पत्रकारिता और आम लोगों के बीच उनके समर्थकों और प्रशंसकों का एक बहुत बड़ा संसार है तो उनके आलोचक भी अपने-अपने कारणों से बहुतेरे मिल जाएंगे।

अगर आज भी और खासतौर से नब्बे के दशक में खबरिया चैनलों पर कहा जाने वाला अगर सबसे लोकप्रिय और आम लोगों की जुबान पर छा जाने वाला एक ही वाक्य था, ‘ये थीं खबरें आज तक इंतजार कीजिए कल तक’ या फिर ‘ये थीं खबरें आजतक, इंतजार कीजिए सोमवार तक।’ और लोग, जिनमें एसपी के प्रशंसकों से लेकर कटु आलोचक भी होते थे, वाकई सरकारी दूरदर्शन पर बीस मिनट के आजतक के प्रसारण का इंतजार करते थे। हम रामहित नंदन जी जैसे विद्वान और पारखी लोगों की बात नहीं कर सकते लेकिन एसपी से असहमत रहने वाले लोग भी उनकी तथ्य और कथ्य की समझदारी और शैली के कायल थे।

हमें भी एसपी सिंह के साथ रविवार और नवभारत टाइम्स में काम करने का अनुभव है। कहने की जरूरत नहीं कि उनके रहते रविवार और नवभारत टाइम्स की लोकप्रियता चरम पर थी। रविवार में रहते हिंदी की बात तो छोड़ ही दें अंग्रेजी और बांग्लाभाषी बड़े-बड़े पत्रकार राजनीति से लेकर खेल तक के विषयों में तथ्य चेक करने अथवा परामर्श करने एसपी के पास ही आते थे।

एक वृतांत बताता हूं। 1984 के लोकसभा चुनाव हो रहे थे। हम सारे लोग रिपोर्टर्स, रिटेनर्स और डेस्क के कई साथी भी फील्ड में जाकर रिपोर्ट कर रहे थे। हम सबने प्रायः अपने अपने हिसाब से स्थानीय मुद्दों और सामाजिक समीकरण को सामने रखकर रिपोर्टिंग की। हमने इलाहाबाद में हेमवतीनंदन बहुगुणा और अमिताभ बच्चन के बीच के चुनावी महाभारत पर बड़ी रिपोर्ट लिखी थी जिसे एमजे अकबर ने टेलिग्राफ में भी पूरे एक पन्ने पर ‘बैटिल ऑफ इलाहाबाद, बहुगुणा वर्सेज बच्चन' के नाम से प्रकाशित की थी। एसपी सिंह भी केंद्रीय उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में घूम कर लौटे थे। आपस की बैठक में उन्होंने कहा कि उन्होंने सबकी रिपोर्ट देख ली है लेकिन उनका अपना मानना है कि इस चुनाव में कांग्रेस को 400 से अधिक सीटें मिलने वाली हैं और इलाहाबाद में बच्चन की जीत पक्की है। हम सब सकते में थे। हमने कुछ ज्यादा ही तैश में आकर कह दिया कि लगता है कि डीपीटी ने आपको पट्टी पढ़ा दी है और आपका कांग्रेसीकरण हो गया है। एक पल के लिए झेंपने के बाद उन्होंने कहा कि हो सकता है कि गलत हो लेकिन यह मेरा आंकलन है और जयशंकर तुमसे तो मैं एक बोतल रम की बाजी लगा सकता हूं। जब चुनावी नतीजे आए तो हम सारे नतमस्तक थे। संभवतः यह केवल एसपी सिंह और समाजवादी नेता मधु लिमए ही थे जिन्होंने 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 400 से अधिक सीटें मिलने का पूर्वानुमान लगाया और उसे सार्वजनिक भी किया था।

इस तरह के तमाम तथ्य हैं जो तथ्य और कथ्य की एसपी सिंह की समझदारी को लेकर उन पर कटुक्तियां करने वालों को बहुत बौना साबित करती हैं। उनके आलोचकों में कई तरह के लोग हैं। एक तो वे लोग हैं जिन्हें वह किन्हीं कारणों से अपने साथ काम करने का मौका नहीं दे सके, दूसरे वे लोग हैं जिन्हें उनकी कार्यशैली में एसपी के करीबी कहे जानेवाले लोगों की अपेक्षा कम महत्व मिला और तीसरी श्रेणी के लोग वे हैं जिनकी विचारधारा एसपी की पत्रकारिता को कभी पसंद कर ही नहीं सकती। संघ की विचारधारा में दीक्षित लोगों के पास स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर राजनीति और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी महानायकों की बात तो छोड़ ही दें नायक भी दूरबीन लगाकर खोजने से भी नहीं मिलते।

ऐसे संघनिष्ठ लोग अंग्रेजों से माफी मांगने वाले सावरकर में अपना नायक तलाशते हैं, हालांकि जीवित रहते सावरकर और संघ के लोगों में कभी नहीं बनी। इसी तरह उनके नायकों में बालासाहेब देवरस हैं जिन्होंने आपातकाल में इंदिरा गांधी के पास माफीनामा भेजकर उनके बीस सूत्री कार्यक्रमों का समर्थन करने की ख्वाहिश जाहिर की थी। रामहित नंदन जी ने शायद एसपी सिंह के साथ काम नहीं किया लेकिन उनके सहयोगियों के साथ काम करने के उनके अनुभव शायद बहुत अच्छे नहीं रहे। हालांकि बाद के दिनों में वह जहां जिस चैनल में भी गए कोई ऐसा कीर्तिमान नहीं खड़ा कर सके जिसके लिए उनकी अपनी कोई पहचान बन सकी हो।

यह मेरी कमी हो सकती है, लेकिन उनकी विद्वता और अनुभव के लाभ से मैं वंचित ही रहा हूं। उन्हें यह कहने का पूरा हक है कि एसपी सिंह पत्रकारिता के नायक-महानायक नहीं बल्कि औसत दर्जे के पत्रकार थे। अब मुश्किल यही है कि उस औसत दर्जे के पत्रकार’ के अधितकतर सहयोगी ही, जिन्हें रामहित चेले कहते हैं, आज हिंदी की प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सिरमौर बने हैं।

राज्यसभा टीवी के द्वारा ‘पत्रकारिता के महानायक एसपी सिंह’ पर बनाने और दिखाई जानेवाली फिल्म को लेकर ही नहीं बल्कि इसकी और भी बहुत सारी बातों को लेकर हमारे संघनिष्ठ भाइयों को तीखी आपत्ति है। उनकी मुश्किल है कि अन्य टीवी चैनलों की तरह राज्यसभा टीवी को भी नियंत्रित कर निक्करधारियों-माफ कीजिएगा अब फुल पैंट धारण करने की छूट मिलने लगी है-द्वारा संचालित करने के मंसूबे पूरे नहीं हो पा रहे।

रही बात हमारे प्रिय मित्र जितेंद्र की तो उन्होंने एसपी सिंह के सामाजिक सरोकारों के बरक्स नौकरी देने के मानदंडों, भाषा-भूषा और शिक्षा को लेकर सवाल उठाए हैं। और यहां तक कह दिया है कि एसपी सिंह नहीं चाहते थे कि पढ़े लिखे और समझदार लोग उनके साथ काम करें। अब इसका फैसला तो एसपी सिंह की रविवार और नवभारत टाइम्स से लेकर टेलिग्राफ और आजतक की टीम के सदस्यों की शिक्षा-दीक्षा, भाषा और पहनावे की पड़ताल करने के बाद ही हो सकेगा। भाई जितेंद्र सामाजिक सरोकारों को लेकर चिंतित और सामाजिक न्याय के पक्षधर, विचारों से अति वाम क्रांतिकारी पत्रकार हैं और अगर शब्दों और भाषणों से ही क्रांति संभव हो तो यह काम वह निमित तौर पर करते रहते हैं। लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में जब कभी और जहां जहां उन्हें अपनी प्रतिभा और प्रतिबद्धता साबित करने के अवसर मिले, वह कुछ ज्यादा नहीं कर सके। वह कह सकते हैं कि मौजूदा व्यवस्था में उनके जैसों के लिए खस कुछ कर पाने की स्थितियां हैं ही नहीं।

जितेंद्र की मानें तो एसपी सिंह अपने इर्द गिर्द मूर्खों और मूर्खाओं को ही रखते थे जो उनकी हर बात मानें और अंधानुकरण करें। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि उनकी इस जमात में रविवार से लेकर नवभारत टाइम्स तक हम जैसे मूर्ख और अशिक्षित भी शामिल रहे हैं। मुझे नहीं मालूम कि जब इस देश में मंडल कमंडल को लेकर विवाद चरम पर था, पूरी हिंदी पत्रकारिता ‘सवर्ण हिंदू पत्रकारिता के रूप में बदल गई थी, उस समय जितेंद्र कहां थे? तब अकेले राजेंद्र माथुर और एसपी सिंह के नेतृत्व में नवभारत टाइम्स ही अकेला ऐसा अखबार था जो सवर्ण मनुवादियों और सांप्रदायिक ताकतों के निशाने पर था। एसपी सिंह को कुर्मी, नभाटा के मुख्य संवाददाता शैलेश को दलित और मुझे तेली कहा जाता था, जबकि हममें से तीनों ही सवर्ण थे।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की अपनी आवश्यकताएं और विडंबनाएं भी हैं। एसपी सिंह जब आजतक के साथ जुड़े थे तब वह देश में और खासतौर से हिंदी में इलेकट्रानिक मीडिया का शुरुआती दौर था। बहुत कुछ बाजार और मालिकान भी तय करते थे। एसपी सिंह बाजार की दशा-दिशा को बहुत पहले ही भांप चुके थे और यह मानने लगे थे कि इस विधा में उनके जैसे लोगों के टिके रहना मुश्किल होते जाएगा। एक तरह क विरक्ति का भाव सा जग रहा था उनमें। और उनकी प्रस्तुति पर सवाल करनेवाले मित्र शायद भूल जाते हैं कि वह किस हद तक अपने विषय की गहाइयों के साथ जुड़े होते थे। उपहार कांड पर उनकी भावुक प्रस्तुति को कौन भुला सकता है। आप उन्हें नायक महानायक माने अथवा नहीं मानें, आपकी मर्जी, लेकिन उस समय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक ही ब्रैंड था और उसका नाम था सुरेंद्र प्रताप सिंह जिसे देखने और सुनने के लिए लोग ‘आजतक’ का इंतजार करते थे। आप उनसे सहमत हों या असहमत, यह दीगर बात है लेकिन वह किसी नंदन या जितेंद्र अथवा आलोक श्रीवास्तव के सर्टिफिकेट के मोहताज तो कतई नहीं थे।

  समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए