राजेन्द्र माथुर के बिना पत्रकारिता के 26 साल....

डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी वरिष्ठ पत्रकार (श्री राजेन्द्र माथुर का यह फोटो 1982 का है और यह उन्होंने नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक बनने पर बैनेट, कोलमैन एंड कंपनी के एच आर विभाग के आग्रह पर दफ्तर में जमा करने के लिए खिंचवाया था.)  मैंने राजेन्द्र माथुर जी के साथ दो पारियों में काम क

Last Modified:
Sunday, 09 April, 2017
Rajendra-Mathur
डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी वरिष्ठ पत्रकार (श्री राजेन्द्र माथुर का यह फोटो 1982 का है और यह उन्होंने नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक बनने पर बैनेट, कोलमैन एंड कंपनी के एच आर विभाग के आग्रह पर दफ्तर में जमा करने के लिए खिंचवाया था.)  

मैंने राजेन्द्र माथुर जी के साथ दो पारियों में काम किया। पहले नईदुनिया और बाद में नवभारत टाइम्स में। आज उनके बिना हिन्दी पत्रकारिता को 26 साल हो गए हैं।prakash-hindustaniजब राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता के संसार से विदा हुए, तब इंटरनेट और मोबाइल चलन में नहीं थे। सोशल मीडिया और वाट्सएप मीडिया भी नहीं था। टीवी के इतने प्राइवेट चैनल भी नहीं थे। पत्रकारिता मूल रूप से प्रिंट तक ही सीमित थी और प्रिंट में भी पत्रकारिता की अलग-अलग शाखाएं थी राजेन्द्र माथुर के दौर में पत्रकारिता में जिस तरह के बदलाव हो रहे थे, अब उससे अलग तरह के बदलाव हो रहे है। ये बदलाव तेज गति वाले है, किसी आंधी या तूफान की तरह। जिस बात को हम हिन्दी पत्रकारिता में दस साल पहले सत्य मानते थे, अब वह कहीं नजर नहीं आती और आज हम जिस पत्रकारिता को देख रहे है, वह पांच साल बाद अलग होगी। अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे राजेन्द्र माथुर के लेख टाइम्स ऑफ इंडिया में भी प्रमुखता से छपते रहते थे और टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार मुझसे पूछते थे कि इतनी अच्छी अंग्रेजी लिखने वाले राजेन्द्र माथुर आखिर टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक क्यों नहीं बन जाते? राजेन्द्र माथुर की केवल अंग्रेजी ही अच्छी नहीं थी, उनके पास नई भाषा को गढ़ने वाले मुहावरे थे। वे बातों को रूपक शैली में लिखते थे और वह शैली लोगों को बहुत पसंद आती थी। इमरजेंसी के दिनों में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम के बहाने भारत में घट रही घटनाओं को लेकर इस तरह लिखा कि कोई भी आदमी आसानी से समझ सकता था कि आखिर यह बात किस संदर्भ में कही जा रही है। वामपंथ और दक्षिणपंथ को समझने की उनकी विशेषता थी कि वे जब इन पंथों के बारे में लिखते, तब वह पठनीय और विचारणीय बात हो जाती। समाजवाद को लेकर उन्होंने जो कुछ लिखा, वह आज भी लोगों को याद है। हिन्दी पत्रकारिता की शक्ति को उन्होंने आधी शताब्दी पहले ही समझ लिया था। वे कहते थे कि भारत के सभी हिन्दी भाषी राज्यों की राजधानी से ऐसे हिन्दी अखबार निकल सकते है, जिनका मुकाबला दुनिया के श्रेष्ठतम अखबार भी नहीं कर पाएंगे। अगर अभी (उस दौर में) हिन्दी पत्रकारिता को वह स्थान प्राप्त नहीं है, जहां उसे होना चाहिए, तो इसका कारण यह है कि हिन्दी पत्रकारिता में तकनीक और शिल्प को प्रमुखता नहीं मिल रही है। वे बार-बार कहते थे कि हिन्दी पत्रकारिता तभी शिखर पर होगी, जब हिन्दी के पत्रकार और अखबार अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं से बेहतर काम करे। हिन्दी के पाठकों के क्रयशक्ति बढ़ने के साथ ही हिन्दी की शक्ति भी बढ़ने लगेगी। अंग्रेजी पत्रकारिता के प्रोफेशनलिज्म के आगे हिन्दी पत्रकारिता में वह प्रोफेशनलिज्म नजर नहीं आता। जिस दिन ऐसा होगा, उस दिन हिन्दी का ही बोलबाला होगा। कुछ मामलों में राजेन्द्र माथुर के विचार बहुत स्पष्ट थे। किसी भी अखबार को पसंद करने के पीछे वे इसकी भाषा नहीं, बल्कि उस अखबार के स्तर को महत्व देते थे। भाषा और देश में से किसी का चुनाव करना हो, तो उनका स्पष्ट कहना था कि देश है तो भाषा है। संपादक के रूप में उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता को संपन्न बनाने के लिए नए-नए प्रयोग किए। अखबार की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए उसके वैचारिक पक्ष का भी पूरा ध्यान रखा। साथ ही पाठकों में लोकप्रिय तत्वों का भी समावेश करते चले गए। राजेन्द्र माथुर ऐसे संपादक थे, जिनके नेतृत्व में हर विचारधारा के पत्रकार काम करते रहे। अपने साथी पत्रकारों की प्रतिभा का मूल्यांकन उन्होंने विचारधारा के आधार पर नहीं किया। सभी सहकर्मियों की विचारधारा का भी वे सम्मान करते रहे और मौका पड़ने पर उनसे चर्चा भी करते रहे। अलग-अलग भाषाएं जानने वाले और अलग-अलग धर्म और जाति के पत्रकार वे अपने अखबार से जोड़ते गए। नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक के रूप में भी उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विशेषज्ञ पत्रकारों की नियुक्ति करवाई। गाहे बगाहे वे खुद भी ग्रामीण इलाकों में जाते और आम आदमी के चश्मे से वहां की जिंदगी और समस्याओं को देखने और समझने की कोशिश करते। उन्होंने प्रमुख हिन्दी भाषी राज्यों की राजधानी से हिन्दी अखबार शुरू करने की पहल की थी। लखनऊ-पटना और जयपुर से अखबार के नए संस्करण शुरू किए गए थे। इससे अखबार का वितरण आसान हुआ। जब चांद पर मानव के कदम पड़े, तब उन्होंने अपने अखबार में एक विशेष अंक प्रकाशित किया था, जिसमें मानव के चंद्र अभियान की संपूर्ण सचित्र और वैज्ञानिक यात्रा वर्णन था। इतने अच्छे विशेषांक उस दौर में अंग्रेजी के अखबार भी नहीं निकाल पाए थे। संपादकीय पृष्ठ पर समकालीन कविता प्रकाशित करने का प्रयोग भी उन्होंने किया था और प्रतिदिन व्यंग कॉलम भी उन्होंने प्रकाशित करना शुरू किया। राजेन्द्र माथुर अखबार के संपादक थे, तो संपादक ही रहे, उन्होंने अखबार का प्रबंधक बनने की कोशिश नहीं की। उन्हें जब प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका सौंपी जाने की बात होती, तब वे कन्नी काट जाते। उनकी अधिकांश चिंताएं समाचार पत्र की गुणवत्ता को लेकर ही रहती। समाचार पत्र किस तरह और धंधे करें, नेताओं से संपर्क करें, पेड न्यूज छापे, इवेंट आदि का आयोजन कर उगाही करें जैसे कामों में उनकी रूचि शायद ही होती। आज के दौर में प्रकाशन संस्थाओं को ऐसे चिंतनशील पत्रकारों की आवश्यकता कम ही होगी। राजेन्द्र माथुर के जाने के बाद इन 26 साल में पत्रकारों की एक नई पीढ़ी तैयार हो चुकी है। 1991 में जब उनका निधन हुआ था, तब वर्तमान के पत्रकारों की एक बड़ी संख्या पत्रकारिता का ककहरा सीख रही थी। अब ये सब लोग युवा हो चुके है और इनके लिए पत्रकारिता के मायने बदल चुके है। समाचार प्रकाशन संस्थानों के लिए भी अब पत्रकारिता का अर्थ कुछ और हो गया है। दौर कोई भी हो, राजेन्द्र माथुर का महत्व कम नहीं होने वाला।
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जब अपनी प्रतिमा से राजेन्द्र माथुर बाहर निकल आए तो मेरी आंखें तो फटी की फटी रह गईं: प्रकाश हिन्दुस्तानी

प्रकाश हिन्दुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार ।।

Last Modified:
Monday, 08 August, 2016
rajendra9

प्रकाश हिन्दुस्तानी,

वरिष्ठ पत्रकार ।।

prakash-hindustaniदोपहर को इन्दौर के पलासिया में राजेन्द्र माथुर चौराहे से गुजर रहा था कि किसी ने मेरे नाम की आवाज लगाकर रोका।

मुड़कर देखा तो मुझे पत्रकारिता में लानेवाले मेरे गुरू राजेन्द्र माथुर साहब अपनी प्रतिमा से निकलकर सामने खड़े मुस्करा रहे थे। साक्षात ! मेरी तो आंखें फटी की फटी रह गई।

''सर, आप प्रतिमा से बाहर, जीवित!!'' मैं चौंक गया...

''कहां जा रहे हो?'' उन्होंने पूछा

''प्रेस क्लब के उम्मीदवार ने पार्टी दी है, कल 7 अगस्त को चुनाव है।"

''मुझ से मिलने नहीं आओगे, कल तो मेरा भी जन्म दिन है...''

''क्यों नहीं सर'', मैं खिसियाकर बोला '' 7 अगस्त को आपका जन्मदिन है और इन्दौर के उस प्रेस क्लब के चुनाव भी हैं, आप कभी जिसके अध्यक्ष हुआ करते थे'' मैंने बात संभालने की कोशिश की। फिर और संभालता हुआ बोले -''सर, वोट देने के पहले आपकी प्रतिमा पर हार-फूल चढ़ाकर, आशीर्वाद लेकर ही जाएंगे।''

''खूब पार्टियां हो रही हैं, क्या प्रेस क्लब अध्यक्ष को तनख़्वाह मिलने लगी है?''

''ना, सर ना, घर फूंक, तमाशा देख ही है''

''तो फिर यह क्या है? रोज-रोज काकटेल पार्टियां ? 'जैन पत्रकार', 'ब्राह्मण पत्रकार', 'मुस्लिम-पत्रकार', 'सांध्य दैनिक के पत्रकार', 'टीवी पत्रकार', 'कैमरामैन पत्रकार', फोटोग्राफर, 'भोपाल में रह रहे इन्दौर के पत्रकारों' आदि के लिए अलग अलग दावतें ! 'पत्रकार वोटरों' के लिए कव्वाली, भंडारे, वाटर पार्क, वन भोज, फैमिली गेट टुगेदर......प्रेस क्लब चुनाव में होर्डिंग, पोस्टर, बैनर ! कितने मेंबर हैं?''

''1 हज़ार 321 हैं सर."

''इतने पत्रकार !''

''हां, सर कित्ते तो चैनल, पेपर, वेबसाइट आ गई हैं, अभी भी वेटिंग में हैं कई....''

''इत्ते वोटर हैं तो खर्च भी होता होगा.....''

''हां, सर महंगाई भी तो बढ़ गई है, चार करोड़ तो हो ही जाएंगे 'पत्रकार नेताओं' के''

अरे ! ये क्या, मेरी बात पूरी हुई ही नहीं थी कि आदरणीय राजेन्द्र माथुर साहब की काया वापस प्रतिमा में समाहित होने लगी. मैं चिल्लाया --सर, वापस मत जाइये, वापस मत जाइये, चुनाव तक तो रुकिए, लेकिन वे मेरी बात कहां सुननेवाले थे। ..... और फिर इतने में मेरी नींद खुल गई।

( आदरणीय माथुर साहब को श्रद्धांजलि)

(साभार: फेसबुक वॉल से)

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अब जब मंदी की मार पड़ी तो आंखें खुलीं और फिर याद आ रहे हैं राजेन्द्र माथुर: राजेश बादल

राजेश बादल एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर, राज्यसभा टीवी ।। 25 बरस पहले की भारतीय पत्रकारिता। टाइम्स ऑफ इंडिया समूह की लोकप्रिय स

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Saturday, 06 August, 2016
rajendra5
राजेश बादल एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर, राज्यसभा टीवी ।।

rajesh25 बरस पहले की भारतीय पत्रकारिता। टाइम्स ऑफ इंडिया समूह की लोकप्रिय साहू अशोक जैन-रमेश जैन की जोड़ी हाशिए पर जा रही थी। नई पीढ़ी को मेनैजमेंट सम्भालने के अवसर मिलने लगे थे। यह पीढ़ी अपनी अवधारणा के साथ समाचार पत्र का संचालन करना चाहती थी। याने अखबार और पत्रिकाएं अभिव्यक्ति का सकारात्मक स्वर और लोकतांत्रिक प्रणाली में चौथे खंभे का प्रतीक न माने जाएं तो समाचार पत्र प्रबंधन को क्या फर्क पड़ता है? दूसरी तरफ पत्रकारिता, प्रॉडक्ट बन जाए तो मैनेजमेंट की जेब भारी हो जाती है।

नई पीढ़ी इसी सोच के साथ जवान हुई थी और वो धर्मयुग, दिनमान और नवभारत टाइम्स की तुलना में साबुन, शैंपू और डिजर्जेंट से करने लगी थी। मेरी नजर में तो भारतीय पत्रकारिता का ये संक्रमण काल शुरू हो रहा था। 1982 से लेकर 87-88 तक राजेन्द्र माथुर ने नवभारत टाइम्स के पन्नों पर पत्रकारिता के जितने प्रयोग किए वे अद्भुत और चौंकाने वाले थे।

अखबार के संस्करण दिल्ली और मुंबई से निकलकर पटना, लखनऊ और जयपुर जैसे प्रादेशिक अवतारों में प्रकट हुए। बताने की जरूरत नहीं कि इन अखबारों ने निष्पक्ष, निर्भीक और जिम्मेदार पत्रकारिता के एक से बढ़कर एक नमूने पेश किए। भारत की आजादी के बाद कभी ऐसा नहीं हुआ था। करीब-करीब हर संस्करण एक लाख की प्रसार संख्या छू रहा था। 25 साल पहले के हालात में यह एक करिश्मा ही था। एक तरफ पत्रकारिता के नित नए कीर्तिमान रचते राजेन्द्र माथुर तो दूसरी तरफ प्रबंधन पत्रकारिता को साबुन बनाकर बेचने की कोशिश कर रहा था। जहाज के नाविक बनकर माथुर जी उसे फुल स्पीड पर दौड़ाने के प्रयास में थे तो दूसरी ओर जहाज के पेंदे में छोटे-छोटे सुराख भी जहाज बनाने वाले कर रहे थे। पत्रकारिता की ऊंचाई छूते पेशेवर तो दूसरी तरफ पत्रिकाओं की हत्या भी हो रही थी। वह एक भयावह दौर था। यह दौर बाद में सारे प्रादेशिक संस्करणों की जान ले बैठा।

9 अप्रैल 1991 को अचानक राजेन्द्र माथुर ने हमसे विदा ले ली। सिर्फ 56 साल उमर। संवेदनाओं के किसी धरातल पर कलम का यह महानायक इस दौर के क्रूर चेहरे को महसूस करता रहा और अभिन्यु की तरह अकेला मुकाबला करता रहा। उनकी विदाई के बाद अखबार के प्रादेशिक संस्करणों ने भी विदा ले ली। इसके बाद नरसिंहराव के नेतृत्व में बनी सरकार ने उदारीकरण का पाठ पढ़ा और देश को पढ़ाया। इस पाठ से राष्ट्रीय स्वाभिमान, मूल्यों की पत्रकारिता और निष्पक्षता वाले पन्ने गायब थे। बचे हुए पन्ने थे बाजारवाद, उसके दबाब में टूटते आदर्श औऱ देश की देह पर लगते चीरे।

मैं और मेरी माथुर-युग की पत्रकारिता के सारे गवाह हक्का-बक्का थे। हमले हो रहे थे और उनसे मुकाबला करने वाला नाविक हमारे बीच नहीं था। शायद हम चक्रव्यूह से बाहर निकलने का हुनर नहीं जानते थे और जब हमने पाया कि जहाज के सुराख काफी बड़े हो चुके हैं, तब तक काफी देर हो चुकी थी।

इसी बीच टेलिविजन पत्रकारिता का नन्हा सा बच्चा दाखिल होकर एक बिगड़ैल जवान बन गया। पत्रकारिता ‘टीवी इंडस्ट्री’ के रूप में सारे रोगों और कुरुपताओं के साथ पनप चुकी थी। बाजार के दबाव तथा आधुनिक तकनीक के शोर में गुम हो गईं पेशागत प्राथमिकताएं और गुम हो गए राजेन्द्र माथुर। नतीजा क्या निकला। पेड न्यूज जैसी महामारी, पत्रकारिता के धंधे की अधकचरी ट्रेनिंग देने वाले कुकुरमुत्ते की तरह उग आए संस्थान, गैर जिम्मेदार और अपने को समाज में उपहास का केंद्र बना बैठी पत्रकारिता।

नहीं कह सकता कि मौजूदा दौर कब तक चलेगा। हां- यह जरूर कह सकता हूं कि हमेशा नहीं चलेगा। सुबह का भूला शाम को वापस आ जाए तो भूला नहीं कहलाता।

राजेन्द्र माथुर कुछ समय के लिए भारतीय हिंदी पत्रकारिता में अदृश्य जरूर हुए थे, लेकिन हाल के वर्षों में उन्हें शिद्दत से याद किया जा रहा है। यह राहत की बात है। कई बार मंच से अनुपस्थित होने क बाद अभिनेता के काम और कद का मुल्यांकन होता है। उसकी कमी गहराई तक महसूस होती है। शायद राजेंद्र माथुर के मामले में ऐसा ही हुआ है। एक अंधी सुरंग से बाहर निकलने का रास्ता देने वाले सिर्फ और सिर्फ राजेन्द्र माथुर हैं। 1955 से 1991 के बीच लिखा हुआ उनका एक-एक शब्द पढ़ जाइए। उजाले का एक सूरज चमकता मिलेगा। एक ऐसा सूरज, जो कभी अस्त नहीं होता।

 जिन लोगों ने राजेन्द्र माथुर को नहीं पढ़ा है या जिन पत्रकारों/संपादकों ने उनके साथ काम नहीं किया है। इन्हें मेरे विचार अतिशयोक्ति भरे लग सकते हैं। लेकिन जो लोग इनके संपर्क में रहे हैं या उनके साथ काम कर चुके हैं या उनके लेखन की गहराई से परिचित हैं, वे यकीनन जानते हैं कि आज के दौर की पत्रकारिता के सामने खड़े सारे मुश्किल सवालों का हल राजेन्द्र माथुर के विचारो में है। आवश्यकता इस बात की है कि इन विचारों और लेखन को नई नस्लों तक उतने ही महत्व के साथ पहुंचाया जाए, जितना हम लोगों ने समझा है तो बहुत बड़ा काम हो जाएगा। यदि हम लोग ऐसा नहीं कर पाए तो ये देश और हिंदी पत्रकारिता हमें कभी माफ नहीं करेगी। जो कर्ज राजेन्द्र माथुर से हमने लिया है, उसे लौटाने का वक्त आ गया है।

कितना दिलचस्प होता है कि पत्रकारिता को धंधा बनाने की वकालत करने वाले भी इन दिनों सरोकारों की बात करते नजर आते हैं। अपने-अपने शैंपू, साबुन बनाकर उन्होंने मुनाफा तो जरूर कमाया,लेकिन साख पर बट्टा लगा बैठे। क्या आज का पाठक और दर्शक हर अखबार या चैनल को एक ही तराजू  पर नहीं तौल रहा है? क्या हर समाचार चैनल एक-दूसरे की कार्बन कॉपी नहीं लगता? जिस अखबार में संपादक के नाम पर छपने पर सरकार में खलबली मच जाती थी, अब आठ कॉलम बैनर छपने पर भी असर नहीं होता। कभी खबरिया चैनल में केवल यही चलने पर हड़कंप मच जाता। अब आधा-आधा घंटे की एक खबर भी प्रभाव नहीं डालती। साफ है कि प्रॉडक्ट स्वाद और रंगरूप से नहीं, बल्कि सरोकारों और सिद्धांतों से चलेगा। यही बात राजेन्द्र माथुर सारी जिंदगी कहते रहे।

उस समय तो धंधेबाजी के पैरोकारों ने उसूलों की होली जला दी, लेकिन । अखबार हों या समाचार चैनल वापस खबरों पर लौट रहे हैं। पटरी से उतरी गाड़ी को पटरी पर लाने में वक्त लगेगा। उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि दो चार महीनों में चमत्कार हो जाएगा। पर यह तय है कि मूल्यों और सरोकारों वाली पत्रकारिता का युग एक बार फिर आएगा। इतिहास अपने को दोहराएगा और राजेन्द्र माथुर एक बार फिर संकट मोचक के रूप में नजर आएंगे। विचारों के शक्तिपुंज  की तरह वे हमेशा हमारे साथ रहेंगे।

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