सार्वजनिक बहस में नहीं पहुंची चित्रा त्रिपाठी पर नवीन कुमार ने कसा तंज

वर्ण व्यवस्था और जातिवाद को लेकर दो पत्रकारों के बीच शुरू हुई सार्वजनिक बहस सोशल मीडिया से निकलकर एक खुले मंच पर जा पहुंची, लेकिन किन्हीं वजहों से यह बहस नहीं हो सकी। न्यूज 24 के पत्रकार नवीन कुमार और इंडिया न्यूज की पत्रकार चित्रा त्रिपाठी के बीच शनिवार को खुले मंच पर होने वाली इस बहस का सभी को इंतजार था। लेकिन चित्रा त्रिपाठी इस बहस ने नहीं पहुंच

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Monday, 13 June, 2016
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वर्ण व्यवस्था और जातिवाद को लेकर दो पत्रकारों के बीच शुरू हुई सार्वजनिक बहस सोशल मीडिया से निकलकर एक खुले मंच पर जा पहुंची, लेकिन किन्हीं वजहों से यह बहस नहीं हो सकी। न्यूज 24 के पत्रकार नवीन कुमार और इंडिया न्यूज की पत्रकार चित्रा त्रिपाठी के बीच शनिवार को खुले मंच पर होने वाली इस बहस का सभी को इंतजार था। लेकिन चित्रा त्रिपाठी इस बहस ने नहीं पहुंच सकी, जिसकी वजह हमने अपनी पिछले रिपोर्ट में बताई थी। लेकिन उनके इस मंच पर न पहुंचने से पत्रकार नवीन कुमार ने उन्हें आड़ें हाथों लिया है और फेसबुक पर एक पोस्ट लिखी है, जिसे आप सभी यहां पढ़ सकते हैं: यहां पढ़ें : चित्रा त्रिपाठी ने बताया कि आखिऱ क्यों नहीं वे पहुंची नवीन कुमार से डिबेट करने… नाथूराम गोडसे के ब्राह्मण होने पर गर्व करने वाली Chitra Tripathi जी, एक स्वीकृत बहस से भाग खड़े होने के जवाब में भयानक कुंठा, बेबसी, क्षोभ और अहंकार से भरा पत्र पढ़ा। मैं आपकी बेचारगी समझ सकता हूं और सोच रहा हूं कि आपकी वैचारिक दरिद्रता और जातीय पाखंड का क्या जवाब हो सकता है। और यह भी कि जब इस दरिद्रता और पाखंड को ही कोई अपना अर्जित ज्ञान समझ बैठता है तो उसकी दशा आपकी तरह क्यों हो जाती है? अब जबकि आप चीख-चीखकर कह रही हैं कि आपको पढ़ने-लिखने सोचने की कोई ज्यादा ज़रूरत नहीं क्योंकि आप व्यावहारिक गुणों से भरपूर एक विदुषी हैं तो कहने को क्या वाकई कुछ बचता है? अपने आपको डिफेंड करने की कोशिश में आपने कल्पेश याग्निक को कोट किया है। आप उन्हें खलिल जिब्रान, नोम चोम्स्की, पाओलो कोएल्हो, प्रेमचंद, धूमिल या पाश मान लेने को स्वतंत्र हैं लेकिन आप समझ नहीं पाईं कि इस कोशिश में आपकी समझ की सीमाएं उधड़कर बेपर्दा हो गई है। आपने लिखा है कि “मैं देश के बड़े चैनल के महत्त्वपूर्ण ओहदे पर हूं, कुछ भी लिखने या बोलने से पहले देखना पड़ता है कि उसका क्या असर होगा।” क्या वाकई चित्रा त्रिपाठी? फिर तो मान लेना चाहिए कि जब देश के इतिहास को तोड़ा—मरोड़ा जा रहा था, जब बापू के हत्यारे नाथू राम गोडसे को ग्लोरीफाई किया जा रहा था तो आपने बहुत सोच समझकर उसके पक्ष में अपनी पसंद का झंडा उठाया था। अगर आप वाकई बहुत सोच समझकर लिखती बोलती हैं तो आप चार दिन में स्मृतिदोष की शिकार क्यों हो गई हैं। हालांकि अपनी इस पूरी समझदारी में गोडसे की प्रशंसक होने के कारण आप तार्किकता के महत्त्व को नहीं समझ पाएंगी लेकिन आपको याद दिलाना जरूरी है कि मीडिया विजिल के पोस्ट पर विचलित होकर आपने दो जून की रात के साढ़े बारह बजे सार्वजनिक तौर पर अपने और मीडिया विजिल के पेज पर उसके संचालकों का नंबर देने की एक पोस्ट डाली थी। आपने लिखा था “मैं आपसे बात करना चाहती हूं।” मीडिया विजिल ने इसका एक स्वाभाविक जवाब दिया था लेकिन उस जवाब से घबराकर आपने अपनी पोस्ट डिलीट कर दी थी लेकिन मीडिया विजिल का जवाब अभी भी वहीं है। आप अपनी सहूलियत से भूल गई हों तो पढ़िए। “MediaVigil नंबर नहीं है, लेकिन साइट के ऊपर दर्ज एक ईमेल है। आप ब्राह्मण जाति पर अपने गर्व के सैद्धांतिक आधारों को स्पष्ट करते हुए टिप्पणी भेज सकती हैं। यह भी बताइएगा कि ब्राह्मण या किसी भी जाति में पैदा होने पर किसी को क्यों गर्व होना चाहिए और इसमें (पैदा होने में) जातक का क्या योगदान है। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक तमाम ऐसे मनीषी हुए हैं जिन्होंने जातिप्रथा को मनुष्य होने की राह में रोड़ा बताते हुए इससे मुक्त होने का संदेश दिया था। उनकी नजर में जाति भेदभाव का सबसे सुगठित तंत्र है जिसकी किसी आधुनिक समाज में कोई जगह नहीं हो सकती। आप इस विचार का खंडन करते हुए अपने तर्क लिख भेजें। मीडिया विजिल में छपेगा।” आपकी जवाब देने की हिम्मत क्यों नहीं हुई चित्रा जी? आपको लगा कि अब आपकी वैचारिक दरिद्रता और जातीय श्रेष्ठताबोध का पाखंड और बेपर्दा हो जाएगा तो आपने अपनी पोस्ट ही डिलीट कर दी। आप जवाब न देतीं तो न देतीं लेकिन आपने अपनी पोस्ट क्यों डिलीट की? आपने तो उसी दिन एक स्वस्थ बहस में विश्वास को लेकर अपनी नीयत जाहिर कर दी थी। पता नहीं आपने क्यों सोचा कि यह बहस जीत या हार के लिए है। जबकि हममें से हरेक व्यक्ति वैचारिक तौर पर कुछ ज्यादा ठोस हासिल करने की उम्मीद में वहां पहुंचा था। आप क्यों दहशत से भर गई थीं? शनिवार और इतवार वाला आपका बहाना बहुत खोखला, बेतुका और विरोधाभासी है। आप तो कहती हैं कि टीवी में एक सेकंड का भी बहुत महत्त्व होता है। फिर आपके लिए क्यों 30 घंटे पहले की तयशुदा बहस का कोई मतलब नहीं रहा। क्योंकि आप चुनौती स्वीकार करने के साथ ही इससे भागने का बहाना ढूंढने लगी थीं। बड़ी लाजवाब है आपकी न आने की दलील। शुक्रवार को सवेरे ही जब आपको बताया गया कि आयोजन शनिवार को ही है तब भी आपने नहीं बताया कि आप नहीं आएंगी। जबकि आपको यह लिखना याद रहा कि अबतक तुम कहां थे। उसी समय आपने क्यों नहीं कहा कि आप नहीं आ पाएंगी। जब आपको टर्म्स ऑफ रेफरेंस की जानकारी दी गई तब भी आपने नहीं बताया कि आप नहीं आ रही हैं। हद तो तब हुई जब बहस वाले दिन मैं लगातार आपको फोन करता रहा, मैसेज करता रहा कि आप आ रही हैं या नहीं। कम से कम इतना ही बता दें जिससे कार्यक्रम शुरू हो सके। आपके भीतर का वह कौन सा भय था चित्रा जी जिसने आपको फोन उठाने या मैसेज के जवाब देने से रोक दिया? और कार्यक्रम की तस्वीर आते ही आप अपनी अहंकारी मुद्रा के साथ फेसबुक पर हाजिर हो गईं। खैर, आपने एक तार्किक बातचीत से पलायन के पक्ष में महान विचारक श्री कल्पेश याग्निक का एक ऐतिहासिक कोट डाला है – “व्यवहार ही सर्वोच्च है, विचार नहीं। व्यवहार का एक ग्राम विचार के एक क्विंटल पर भारी है।” अपनी वैचारिक दरिद्रता, अनपढ़ता और खोखलेपन के पक्ष में आपका यह तर्क लाजवाब कर देने वाला है। आपने एक ही लाइन में स्वतंत्रता के सिद्धांत, लोकतंत्र के सिद्धांत, बराबरी के सिद्धांत, भाईचारे के सिद्धांत और ऐसे तमाम सिद्धांतों को पढ़ने-समझने में समय और ऊर्जा खपाने वालों की कोशिशों को धो पोंछकर बराबर कर दिया है। दूसरे, आपके जवाब में एक बहुत स्वाभाविक उत्कंठा जगाई है। आप किस बाट से तौलती हैं विचार को और फिर उसे कैसे व्यवहार से बदलती होंगी। ग्राम में विचार और क्विंटल में व्यवहार वाली बात सचमुच में अभिनव किस्म की है। खैर, अब जबकि आपने घोषणा कर दी है कि एक बड़े चैनल के जिम्मेदार ओहदे पर होने के नाते आप लिखने या बोलने से पहले बहुत सोचती हैं और आप अपने व्यावहारिक ज्ञान के सामने पढ़ाई—लिखाई-समझदारी को कूड़ा समझती हैं तो यह तय माना जाना चाहिए कि बापू के हत्यारे के पक्ष में आप बहुत सोच समझकर खड़ी हुई हैं। वह झटके में हुई कोई घटना या भूल नहीं थी। और एक चैनल की एसोसिएट एडिटर होने की जिम्मेदारी का भाव भी गोडसे की आपकी झंडाबरदारी में शामिल है। कहने की जरूरत नहीं कि आप गोडसे को लेकर अपने गर्व के भाव से भागेंगी नहीं और ना ही पोस्ट डिलीट करेंगी। दर्शकों पाठकों की सहूलियत के लिए स्नैपशॉट नत्थी है। 2 जून को सुबह 10 बजके 4 मिनट पर एक पोस्ट डाली जाती है। एक सज्जन मुझे और आपके अलावा दस और लोगों को टैग करते हैं। इतिहास की मामूली जानकारी रखने वाले भी समझ जाएंगे कि उस पोस्ट में तथ्य के नाम पर वाहियात किस्म की जानकारी और विचार के नाम पर अमानवीय घोषणाएं हैं। उस पोस्ट को लिखने वाली के पास जानकारी की दरिद्रता ऐसी है कि वह खुलेआम कहता है आजादी के आंदोलन में हिस्सा लेना वाले 90 फीसदी लोग ब्राह्मण थे। वह ब्राह्मणों से अलग किसी को महान मानने को तैयार ही नहीं। जरा सूची देखिए लाल बहादुर शास्त्री राजेंद्र प्रसाद सुभाष चंद्र बोस बिपिन चंद्र पाल स्वामी सहजानंद आपने आजादी का बुनियादी इतिहास भी पढ़ा होता तो आपको पता होता कि ये लोग ब्राह्मण नहीं थे। चित्रा जी आप तो बहुत जिम्मेदारी से कुछ भी लिखती-बोलती हैं फिर कैसे इस पोस्ट को वैधता दी? मेरी समझ में तो लाइक का मतलब होता है पसंद करना। आप कह भी चुकी हैं कि आप बहुत सोच-समझकर कुछ लिखती-बोलती हैं। जाहिर है आपकी दंभी व्यावहारिकता को ऐसे घिनौने इतिहासबोध पर सवाल करने की कोई वजह नहीं लगी होगी। एक पत्रकार जब पढ़ने-लिखने से भागता है तो ऐसा होता ही है। फिर आप तो इसपर गर्व भी करती हैं। पढ़ने में आपके न्यूनतम विश्वास और व्यवहार में अधिकतम विश्वास दोनों को यह महसूस नहीं हुआ कि एक आपराधिक पोस्ट का एक चैनल के संपादकीय ओहदे पर बैठे पत्रकार को अंदाजा होना चाहिए। लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है। मुझे तो एक इंसान के तौर पर शर्म आती है आगे का लिखा पढ़ते हुए। एक बड़े चैनल के जिम्मेदार पद पर बैठे होने के बावजूद आपने उसमें अपनी पसंद जाहिर की है तो जरूर आपको इसमें कुछ खास बात लगी होगी। सारे सवाल यहीं खड़े होते हैं। क्या वाकई आपको लगता है चित्रा त्रिपाठी कि
  1. “अगर ब्राह्मण का अस्तित्व नहीं होगा तो किसी का अस्तित्व नहीं होगा?”
  2. “ब्राह्मणों की उपेक्षा व तिरस्कार की बात सोचने मात्र से सोचने वाले का सर्वस्व पतन शुरू हो जाता है?”
  3. “तुम जितनी जल्दी मान लोगे कि तुम्हारा (जनता का) वजूद हमपर (ब्राह्मणों) के वजूद पर ही टिका है, तुम्हारे लिए उतना ही अच्छा होगा।”
आप किस मानसिकता की पत्रकार हैं चित्रा त्रिपाठी? जिन पंक्तियों पर पूरी मनुष्यता को शर्म आ जाए आप उसे अपनी पूरी सोच समझ और जिम्मेदारी के साथ लाइक करती हैं। उसपर मजे लेती हैं? अब यह मत कहिएगा कि वो तो मैंने ऐसे ही कर दिया था। क्योंकि आप पहले ही कह चुकी है आप बहुत सोच-समझकर कुछ लिखती-बोलती हैं क्योंकि आप एक बड़े चैनल के जिम्मेदार ओहदे पर बैठी हैं। लेकिन आपकी जानकारी और पसंद की यह अंतिम सीमा नहीं थी। उस पोस्ट में आगे तमाम ब्राह्मणों के गुण गिनाए गए हैं। कि जब वह दान पर आता है तो दधीचि हो जाता है, लेने पर आता है तो सुदामा हो जाता है वगैरह-वगैरह। उसी पोस्ट के आखिर में लिखा है “अगर ब्राह्मण निराश होता है तो नाथू राम गोडसे हो जाता है।” नाथूराम गोडसे होने का मतलब क्या होता है चित्रा जी? वह अपनी नफरत के मारे गांधी की हत्या कर देता है। गजब है आपकी पसंद कि अगर ब्राह्मण निराश होता है तो नाथूराम गोडसे हो जाता है। आप इस पोस्ट को न सिर्फ लाइक करती हैं बल्कि इसपर एक अप्रत्याशित गर्व से भर जाती हैं। आप इस गर्व को संभाल नहीं पातीं। सवाल भी पूछती हैं। “इतनी जानकारी कहां से जुटाई?” मतलब आप न सिर्फ इन लिजलिजी सोच को अपनी लाइक की वैधता देती हैं बल्कि उसके महान जानकारी होने पर गर्व का इजहार भी करती हैं। आप किस मानसिकता की पत्रकार हैं चित्रा त्रिपाठी? आप पढ़ने-लिखने से नफरत करती हैं तो कीजिए। हैरत तो इस बात की है कि ब्राह्मण होने का आपका जातीय अहंकार इस कदर जोर मारता है कि आप नाथूराम गोडसे जैसे बापू के हत्यारे पर सार्वजनिक गर्व के इजहार पर मजबूर हो जाती हैं। आपके सवाल का जवाब दिया जाता है “रिसर्च करना पड़ा। गोरेलाल की भी मदद मिली। ब्राह्मण एक हो रहे हैं। आप सभी सहभागी हो।” आपकी ढिठाई की इंतिहा ये है कि आप इसपर हमें ही लानतें भेजने लगीं। बेशर्म कहने लगीं। नाथू राम गोडसे पर नाज करने वाली पोस्ट को पूरी जिम्मेदारी के साथ लाइक करने वाली एक बड़े चैनल की पत्रकार को कोई झिझक नहीं और सवाल उठाने वाला बेशर्म हो गया। आपके साहस को सलाम है चित्रा जी। वाकई नाथूराम गोडसे के पक्ष में खड़ा होने के लिए जिगर चाहिए। अच्छा हुआ आप बहस से भाग खड़ी हुईं। आपकी इस ढिठाई के सामने तो मैं तब भी हाथ जोड़ देता। फिर तो अगर आप हाफिज सईद और मौलाना मसूद अजहर की शान में लिखे गए पोस्ट को भी लाइक करेंगी या उसके पक्ष में तैयार रिसर्च पर नाज़ करेंगी तो किसी को कोई हैरत नहीं होगी। जिस पत्रकार की वैचारिक पसंद ये हो कि पूरी दुनिया का वजूद ब्राह्मणों से है और उसके तिरस्कार की बात सोचने से भी सबकुछ लुट जाता है तो इसमें कहने सुनने को क्या बचता है? एक पत्रकार जब ब्राह्मणवादी होने के अहंकार में गोडसे के ब्राह्मण होने पर गर्व करने लगता है तो उसकी मानसिक स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं रह जाता। मानवता को लेकर आपकी नफरत इस कदर है कि आपको लगता ही नहीं कि ब्राह्मणों की कृपा से अलग किसी व्यक्ति का कोई वजूद है। आपको यह नफरत मुबारक। आपको नाथूराम गोडसे को लेकर आपका जातीय गुमान मुबारक। ज्ञान का वह कचरा मुबारक जो आपको एक जबरदस्त रिसर्च का ज़ाया लगता है। आपको जानकारियों का वह कूड़ेदान मुबारक जो पत्रकारिता ही नहीं किसी भी सोच समझ वाले आदमी के लिए आपराधिक और शर्मनाक है। मेरी तरह के तमाम लोग सिर्फ इतने को लेकर फिक्रमंद हैं कि एक बड़े चैनल के जिम्मेदार ओहदे पर बैठी पत्रकार जो कि बहुत सोच-समझकर लिखने-बोलने का दावा करती है, ऐसी सोच के साथ न्यूज़ रूम में दाखिल होती होगी तो उनकी अज्ञानता और असंवेदनशीलता का आतंक कितना भयानक होता होगा। आपसे मुझे कोई शिकायत नहीं। आपकी प्रतिभा पर कोई शक नहीं। आपके ज्ञान पर भी कोई सवाल नहीं। क्योंकि आपको वाकई नहीं पता कि आपने क्या कर डाला है, क्या किए जा रही हैं और क्या करेंगी। लेकिन आपकी वैचारिक दरिद्रता देखकर दिल से दुखी ज़रूर हूं। आपको सच में नहीं पता रहा होगा कि गैर ब्राह्मणों को भी स्वाभिमान से जीने का हक होना चाहिए और वह किसी की कृपा से नहीं होना चाहिए। आपको सच में नहीं पता रहा होगा कि ब्राह्मणों के तिरस्कार से दुनिया नष्ट नहीं होती। आपको सच में पता नहीं रहा होगा कि भारतीय आजादी की लड़ाई में लड़ने वाले “90 फीसदी लोग” ब्राह्मण नहीं थे। लेकिन जब आप नाथूराम गोडसे के ब्राह्मण होने पर गर्व करने की अपनी पसंद पर आह्लादित हो जाते हैं तो सच में मन उदास हो जाता है। आपको और आपके मुरीदों को बुरा लग रहा होगा लेकिन अब यह आपके बायोडाटा के साथ नत्थी हो चुका है कि आपको नाथूराम गोडसे के ब्राह्मण होने पर गर्व है। चित्रा जी यह सवाल किसी नवीन कुमार, किसी चित्रा त्रिपाठी या किसी रमेश, प्रवीण या अनिल का नहीं है। यह प्रश्न संवेदना के उन सिरों के बचे रहने या उन्हें काटकर खत्म कर देने का है जो पत्रकारिता के विमर्श तय करते हैं। मुझे अफसोस है कि आदमी को आदमी न समझने, उसके ब्राह्मणों के रहमो करम पर जिंदा रहने और नाथूराम गोडसे के ब्राह्मण होने पर अभिमान की सोच रखने के अपराध में आप अकेले नहीं है। लेकिन आप तो एक बड़े चैनल की सहायक संपादक हैं। आपको सचमें अफसोस नहीं होता कि आपको भारतीय इतिहास और सामाजिक व्यवस्था की बुनियादी जानकारी भी नहीं है? आपको मेरे सवालों का जवाब देने की जरूरत नहीं है। लेकिन खुद से भी नहीं पूछतीं कभी? नाथूराम गोडसे के गर्व में शामिल हो जाने की हद तक जा पहुंचे आपके ब्राह्मणवादी अहंकार में अगर कुछ है भी तो आपका अर्जित क्या है? मेरे लिए यह विषय अब बंद है। एक बार फिर से आपकी योग्यता और आपकी समझदारी को सलाम। (साभार: नवीन कुमार की फेसबुक वॉल से)   समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं। समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
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दुनिया को अलविदा कह गए जाने-माने टॉक शो होस्ट लैरी किंग

लैरी किंग ने 25 वर्षों से ज्यादा समय तक सीएनएन पर शो होस्ट किया था

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 23 January, 2021
Last Modified:
Saturday, 23 January, 2021
Larry King

अमेरिका के जाने-माने टॉक शो होस्ट लैरी किंग (Larry King) का शनिवार को निधन हो गया है। वह करीब 87 साल के थे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, लैरी किंग ने 25 सालों से ज्यादा समय तक सीएनएन पर ‘लैरी किंग लाइव’ शो होस्ट किया था।

किंग ने बराक ओबामा से लेकर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और लेडी गागा समेत कई मशहूर हस्तियों, एथलीट्स व अन्य लोगों के इंटरव्यू लिए थे। इस लोकप्रिय शो के 6000 से ज्यादा एपिसोड करने के बाद लैरी किंग वर्ष 2010 में सेवानिवृत्त हुए थे।

किंग के वेरिफाइड फेसबुक अकाउंट पर शनिवार को उनके निधन के बारे में एक पोस्ट की गई है। इस फेसबुक पोस्ट में कहा गया है, 'गहरे दुख के साथ ओरा मीडिया अपने सह-संस्थापक, होस्ट और दोस्त लैरी किंग के निधन की घोषणा करता है, जिनकी आज सुबह 87 साल की उम्र में लॉस एंजिल्स स्थित सीडर-सिनाई मेडिकल सेंटर में मौत हो गई। 63 सालों तक रेडियो, टेलीविजन और डिजिटल मीडिया प्लेटफार्म्स पर  लैरी के हजारों इंटरव्यू, पुरस्कार और वैश्विक प्रशंसा एक प्रसारक के रूप में उनकी अद्वितीय और स्थायी प्रतिभा के लिए साक्षी के रूप में खड़े हैं।'

बयान में किंग की मौत की वजह नहीं बताई गई है। हालांकि, सीएनएन ने उनके परिवार के करीबी सूत्र के हवाले से बताया है कि उन्हें जनवरी की शुरुआत में कोविड-19 की वजह से अस्पताल में भर्ती कराया गया था। किंग तमाम स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ चुके थे।

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जर्नलिस्ट सिद्दीकी कप्पन को SC ने मां से बातचीत करने की दी इजाजत

हाथरस जाते वक्त गिरफ्तार किए गए जर्नलिस्ट सिद्दीकी कप्पन को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी मां से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये बातचीत करने की इजाजत दे दी है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 23 January, 2021
Last Modified:
Saturday, 23 January, 2021
Kappan

हाथरस जाते वक्त गिरफ्तार किए गए जर्नलिस्ट सिद्दीकी कप्पन को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी मां से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये बातचीत करने की इजाजत दे दी है। वहीं कप्पन की रिहाई की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई अगले हफ्ते के लिए टाल दी है।

केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट की ओर से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल पेश हुए और उन्होंने कहा कि कप्पन की मां की हालत बहुत खराब है और वह बेहोशी की हालत में अपने बेटे से बात करना चाहती हैं, उन्हें देखना चाहती हैं, जिसके चलते इस संबंध में अर्जी लगाई गई है।  कृपया कप्पन को उनकी मां से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बातचीत करने दी जाए।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बोबडे की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। जब मुख्य न्यायाधीश ने इस बात पर सहमति जताई कि कप्पन की मां को उनसे बात करने दी जाए।

इस दौरान यूपी सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट से कहा कि इसे उत्तर प्रदेश सरकार पर छोड़ दिया जाए। अथॉरिटी इस मामले में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सहूलियत की संभावना को देखेगी।

वहीं, इससे पहले यूपी सरकार ने कप्पन की जमानत का विरोध किया और कहा कि कप्पन पर पीएफआई के मेंबर होने का आरोप है। हाथरस कांड के समय शांति भंग करने का आरोप है।
 

केरल बेस्ड जर्नलिस्ट कप्पन को तब गिरफ्तार किया गया था, तब वे हाथरस जा रहे थे जहां एक युवती का गैंग रेप करने के बाद हत्या कर दी गई थी। PFI से संबध रखने के आरोप में कप्पन को हाथरस कांड के बाद यहां जाते समय गिरफ्तार किया गया था।

कप्पन की गिरफ्तारी के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में 2 दिसंबर को यूपी सरकार ने कहा था कि मामले की छानबीन के दौरान कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। हाथरस में दलित के गैंग रेप और मौत के बाद जर्नलिस्ट हाथरस जा रहा था तभी यूपी पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया था। यूपी सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया था कि कप्पन जिस अखबार में काम करने की बात कर रहे हैं वह दो साल पहले ही बंद हो चुका है। योगी सरकार ने एफिडेविट में कहा है कि पत्रकार संघ कप्पन की असलियत छिपाने की कोशिश कर रहा है।

   

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आरईसी ने किया राजभाषा गोष्ठी का आयोजन

निगम कार्यालय नई दिल्ली में 21 जनवरी 2021 को आयोजित गोष्ठी में राजभाषा के अधिकाधिक प्रयोग पर दिया गया बल

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 23 January, 2021
Last Modified:
Saturday, 23 January, 2021
Seminar

बिजली मंत्रालय के अंतर्गत केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रम ‘आरईसी लिमिटेड’ (REC Limited) द्वारा 21 जनवरी 2021 को निगम कार्यालय, नई दिल्ली में राजभाषा गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस गोष्ठी के मुख्य अतिथि डॉ. सुमीत जैरथ, सचिव, राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार थे।

इस मौके पर डॉ. सुमीत जैरथ ने कहा कि राजभाषा के प्रति अनुराग और लगाव राष्ट्र प्रेम का ही एक रूप है। उन्होंने राजभाषा हिंदी के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए 12 ‘प्र’ यानी प्रेरणा, प्रोत्साहन, प्रेम, पुरस्कार, प्रशिक्षण, प्रयोग, प्रचार, प्रसार, प्रबंधन, प्रमोशन, प्रतिबद्धता और प्रयास की भूमिका पर चर्चा करते हुए कार्यालय में राजभाषा के अधिकाधिक प्रयोग पर बल दिया। इस मौके पर उन्होंने आरईसी द्वारा किए जा रहे कार्यों की सराहना भी की।

गोष्ठी में बीएल मीणा, निदेशक (सेवा), राजभाषा विभाग (गृह मंत्रालय), आरईसी के सीएमडी संजय मल्होत्रा, निदेशक (तकनीकी) संजीव कुमार गुप्ता, निदेशक (वित्त) अजय चौधरी, मुख्य सतर्कता अधिकारी श्रीमती सुनीता सिंह एवं मुख्यालय के सभी विभागाध्यक्ष भी शामिल हुए। साथ ही सभी क्षेत्रीय कार्यालयों के प्रमुख भी वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़े थे। इस मौके पर आरईसी में किए जा रहे राजभाषा कार्यों की संक्षिप्त प्रस्तुति भी दी गई।

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हादसे ने छीन ली एक पत्रकार की जिंदगी, दूसरा लड़ रहा जिंदगी की जंग

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में गुरुवार रात हुई सड़क दुर्घटना में एक पत्रकार की मौत हो गई है जबकि एक अन्य गंभीर रूप से घायल हो गया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 23 January, 2021
Last Modified:
Saturday, 23 January, 2021
Accident

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में गुरुवार रात हुई सड़क दुर्घटना में एक पत्रकार की मौत हो गई है जबकि एक अन्य गंभीर रूप से घायल हो गया। पुलिस ने यह जानकारी दी।

पुलिस ने बताया कि मृतक पत्रकार का नाम सोहम मल्लिक है, जबकि मयूख रंजन घोष नाम का एक और संवाददाता गंभीर रूप से घायल है।

पुलिस की ओर से जारी बयान में बताया गया है कि गुरुवार रात सोहम मलिक और मयूखरंजन घोष दोनों ही एक ही बाइक पर लौट रहे थे, तभी लॉर्ड्स मोड़ पर यह दुर्घटना घटी। अंदेशा लगाया जा रहा है कि बाइक फिसली और वह सड़क के किनारे एक पेड़ से टकरा गई, जिसकी वजह से ये हादसा हुआ। वहीं इस बात की जांच-पड़ताल भी की जा रही है कि कहीं किसी वाहन ने पीछे से कोई टक्कर तो नहीं मार दी।

फिलहाल दोनों को खून से लथपथ हालत में एसएसकेएम अस्पताल ले जाया गया जहां चिकित्सकों ने सोहम को मृत घोषित कर दिया और मयूख रंजन को आईसीयू में भर्ती किया गया है। उसके सिर पर गंभीर चोट लगी है। मयूख की एक आंख बुरी तरह से जख्मी हो गई है और वह कोमा में हैं। उनकी हालत नाजुक बनी हुई है। घटना रात 3:00 से 4:00 के बीच की है।

दोनों की नई नई नौकरी लगी थी और वे एक नए न्यूज चैनल के लिए काम करते थे। दोनों लंबे समय से पत्रकारिता करते रहे हैं। सोहम की मौत से कोलकाता के मीडिया जगत में शोक की लहर पसरी हुई है।

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डॉ. दिव्या प्रकाश की स्मृति में मुफ्त चिकित्सा शिविर लगाया

तीन दिवसीय इस शिविर में पित्ताशय की पथरी एवं गर्भाशय से संबंधित ऑपरेशन किए गए

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 21 January, 2021
Last Modified:
Thursday, 21 January, 2021
Medical Camp

आगरा की जानी-मानी महिला रोग विशेषज्ञ एवं कोरोना वॉरियर डॉ. (स्वर्गीय) दिव्या प्रकाश की स्मृति में पित्ताशय की पथरी एवं गर्भाशय से संबंधित ऑपरेशन के लिए निःशुल्क चिकित्सा शिविर का आयोजन किया गया।

आगरा में गुरु का ताल, सिकंदरा स्थित नवनिर्मित शांति वेद चिकित्सा संस्थान में 14 जनवरी 2021 से आयोजित तीन दिवसीय इस चिकित्सीय शिविर में सौ से अधिक ऑपरेशन करने की व्यवस्था की गई और रोजाना लगभग 30 ऑपरेशन किए गए।

डॉ. दिव्या प्रकाश के परिजनों के अनुसार,‘उनका (डॉ. दिव्या का) सपना था कि सामान्य जनता के हित से जुड़ा हुआ कोई नवीन सेवा कार्य किया जाए, जो आगरा एवं समीपवर्ती इलाकों में चिकित्सा के क्षेत्र में एक उदाहरण बने। दुर्भाग्य से कोविड-19 से चार माह तक संघर्ष करते हुए उनका स्वर्गवास हो गया और डॉ. दिव्या का यह स्वप्न उनके जीवन काल में अपूर्ण रह गया।’

डॉ. दिव्या के परिजनों ने उनके अधूरे स्वप्न को पूरा करते हुए इस शिविर को उन जरूरतमंदों को समर्पित किया है, जिन्हें इस शल्य चिकित्सा की अत्यन्त आवश्यकता थी।

लॉयन्स क्लब ऑफ आगरा विशाल के सौजन्य से आयोजित इस शिविर में डॉ. अजय प्रकाश, डॉ. संजय प्रकाश, डॉ. मधु प्रकाश, डॉ. श्वेतांक प्रकाश, डॉ. ब्लॉसम प्रकाश, डॉ. स्वाती प्रकाश, डॉ. शिवांक प्रकाश, डॉ. बीबी बंसल, डॉ. मिहिर गुप्ता, डॉ.एससी साहनी, नर्सिंग स्टाफ और समस्त शांति वेद परिवार का विशेष योगदान रहा।

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अखबार के मालिक पर दुष्कर्म का आरोप लगाने वाली पीड़िता की मौत

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में नींद की दवा का ओवरडोज लेने से एक युवती की बुधवार रात को एक अस्पताल में मौत हो गई।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 21 January, 2021
Last Modified:
Thursday, 21 January, 2021
Death

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में नींद की दवा का ओवरडोज लेने से एक युवती की बुधवार रात को एक अस्पताल में मौत हो गई। बताया जा रहा है कि यह वही पीड़ित युवती है, जिसने अखबार के एक मालिक पर दुष्कर्म करने का आरोप लगाया था।

एक पुलिस अधिकारी ने मीडिया को बताया कि एक किशोरी ने भोपाल में स्थित सरकारी बालिका आश्रय गृह में नींद की गोलियां खा ली थीं, इसके बाद उसे सोमवार रात को गंभीर हालत में सरकारी हमीदिया अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

वहीं, हमीदिया अस्पताल के अधीक्षक डॉ. आईडी चौरसिया ने बताया कि किशोरी को सोमवार रात को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया था, बुधवार रात को उसकी मौत हो गई। जिला प्रशासन ने बुधवार को ही इस मामले में न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं।

बता दें कि पिछले साल जुलाई में स्थानीय अखबार चलाने वाले 68 वर्षीय प्यारे मियां के खिलाफ पांच नाबालिग लड़कियों के साथ बलात्कार करने के आरोप में मामला दर्ज किया गया था। पुलिस महानिरीक्षक (IG) उपेन्द्र जैन ने बताया कि जिस लड़की ने सोमवार रात को नींद की गोलियां खाई थीं, वह इन पांच पीड़ित बालिकाओं में से एक थी। उन्होंने बताया कि पीड़ित लड़कियों को सुरक्षा के मद्देनजर सरकारी बालिका आश्रय गृह में रखा गया था, इनमें से दो बालिकाओं की तबीयत सोमवार रात को बिगड़ गई, जिन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। उन्होंने बताया कि इनमें से एक लड़की की हालत बेहद नाज़ुक होने पर सोमवार देर रात को ही उसे हमीदिया अस्पताल रेफर किया गया था। आईजी ने बताया कि घटना के बाद जिलाधिकारी ने मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही असली तस्वीर सामने आएगी।

इस बीच, कमला नगर थाना प्रभारी विजय सिसोदिया ने गुरुवार को बताया कि अत्यधिक मात्रा में नींद की गोलियों का सेवन करने वाली दुष्कर्म पीड़िता का हमीदिया अस्पताल में उपचार किया जा रहा था, लेकिन बुधवार रात को अस्पताल में उसकी मौत हो गई। उन्होंने कहा कि यह पता लगाया जा रहा है कि आश्रय गृह में उसे नींद की गोलियां कैसे मिलीं।

गौरतलब है कि पिछले साल जुलाई में भोपाल के रातीबड़ इलाके में पांच लड़कियों के नशे की हालत में घूमने के बाद प्यारे मियां और उसकी साथी स्वीटी विश्वकर्मा (21) के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था. मियां पर आरोप है कि उसने नाबालिग लड़कियों का यौन शोषण किया। पुलिस ने बाद में उसे जम्मू-कश्मीर से गिरफ्तार किया था।

 

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दूरदर्शन के वरिष्ठ अधिकारी की मौत

दूरदर्शन के एक वरिष्ठ अधिकारी ईटानगर स्थित अपने आधिकारिक आवास में मंगलवार 19 जनवरी को मृत पाए गए।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 21 January, 2021
Last Modified:
Thursday, 21 January, 2021
KMorang

दूरदर्शन के एक वरिष्ठ अधिकारी ईटानगर स्थित अपने आधिकारिक आवास में मंगलवार 19 जनवरी को मृत पाए गए। वह 50 साल के थे।

दूरदर्शन के रीजनल न्यूज चैनल ‘डीडी न्यूज अरुणाचल’ ने ट्विटर के जरिए इसकी जानकारी दी कि ईटानगर स्थित दूरदर्शन केंद्र में निदेशक (इंजीनियरिंग) और कार्यालय प्रमुख के. मोरंग की मृत्यु हो गई। मोरंग, 1995 में भारतीय प्रसारण इंजीनियरिंग सेवा में शामिल हुए थे और वह पिछले चार साल से स्थानीय दूरदर्शन केंद्र के प्रमुख थे।

बुधवार को मोरंग के शव का पोस्टमार्टम कराया गया, लेकिन खबर लिखे जाने तक उनके मौत का सटीक जानकारी नहीं मिल पाई है। वैसे आशंका जताई जा रही है कि मोरंग की मृत्यु दिल का दौरा पड़ने से हुई होगी।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक अधिकारी की मौत के समय उनका परिवार साथ नहीं था। मोरंग ‘डीडी अरुणप्रभा’ चैनल की लॉन्चिंग टीम के मुख्य सदस्य थे।  

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नहीं रहे वरिष्ठ पत्रकार गुलाम नबी शैद

करीब 70 वर्षीय शैद पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 20 January, 2021
Last Modified:
Wednesday, 20 January, 2021
Ghulam Nabi

जम्मू-कश्मीर के जाने-माने पत्रकार और उर्दू अखबार ‘वादी की आवाज’ (Wadi ki Awaz) के मालिक और संपादक गुलाम नबी शैद (Ghulam Nabi Shaida) का निधन हो गया है। मंगलवार की रात उन्होंने श्रीनगर स्थित अपने आवास पर आखिरी सांस ली।  

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, करीब 70 वर्षीय शैद पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे। उनके परिवार में एक बेटी है। शैद की पत्नी का वर्ष 2015 में निधन हो गया था।

शैद के निधन पर मीडिया के साथ ही तमाम सामाजिक व राजनीतिक संगठनों से जुड़े लोगों ने शोक जताते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी है। ‘कश्मीर एडिटर्स गिल्ड’ (KEG) ने शैद के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि शैद को हमेशा उनमें काम और विनम्र स्वभाव के लिए जाना जाएगा।

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फेक कंटेंट को पहचानें और इसे बेनकाब करें: प्रो. केजी सुरेश

एमसीयू और यूनिसेफ द्वारा आयोजित ‘जन-स्वास्थ्य और तथ्यपरक पत्रकारिता’ पर आधारित कार्यशाला में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केजी सुरेश ने विद्यार्थियों को बेहतर पत्रकारिता के गुर सिखाए।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 20 January, 2021
Last Modified:
Wednesday, 20 January, 2021
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‘माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय’ (एमसीयू) और यूनिसेफ द्वारा आयोजित ‘जन-स्वास्थ्य और तथ्यपरक पत्रकारिता’ पर आधारित कार्यशाला में  विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केजी सुरेश ने विद्यार्थियों को बेहतर पत्रकारिता के गुर सिखाए। इस मौके पर प्रो. केजी सुरेश का कहना था, ‘स्वास्थ्य पत्रकारिता न केवल सामाजिक दृष्टिकोण से जरूरी है, बल्कि पत्रकारिता का विद्यार्थी होने के नाते ये आपके करियर के लिए भी आवश्यक है। इसलिए आपका कर्त्तव्य बनता है कि आप फेक कंटेंट को बेनकाब करें।‘

कार्यशाला की अध्यक्षता कर रहे प्रो. सुरेश ने कहा कि आजकल कोरोना को लेकर बहुत फेक कंटेंट आ रहा है, जिससे सनसनी फैल रही है। इसलिए ऐसे मामलों में सरकारी पक्ष जानना बहुत जरूरी है। बिना तथ्यों को जांचे-परखे कभी भी खबरों को प्रकाशित/प्रसारित नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकारी पक्ष के साथ ही खबरों को प्रकाशित करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि नकारात्मक खबरें छापने का दूरगामी परिणाम होता है, इसलिए हमें सकारात्मक खबरें छापना चाहिए। कोरोनाकाल में अफवाहें, अटकलें फैलाईं जा रही हैं, जो तेजी से बढ़ती जा रही हैं, पत्रकारिता के विद्यार्थी होने के नाते आपको साक्ष्य आधारित पत्रकारिता करते हुए अपनी जिम्मेदारियों को निभाना चाहिए। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता की सराहना करते हुए प्रो. सुरेश ने कहा कि आजकल सूचना के लिए लोगों की भूख बढ़ गई है, अत: हमारा कर्तव्य बनता है कि हम पाठकों तक विश्वसनीय खबरों को पहुंचाएं। प्रो.सुरेश ने कहा कि पत्रकारिता का मूल कार्य सिर्फ सूचित करना, शिक्षित करना ही नहीं है, बल्कि लोगों को प्रेरित करना भी है। हेल्थ रिपोर्टिंग का महत्व बताते हुए प्रो. सुरेश ने कहा कि स्वास्थ्य पत्रकारिता को जिले स्तर तक ले जाने की आवश्यकता है। उन्होंने 29 जनवरी को पत्रकारों के लिए भी स्वास्थ्य पत्रकारिता पर कार्यशाला का आयोजन किए जाने की बात कही।

कार्यशाला में विषय विशेषज्ञ के रूप में वरिष्ठ पत्रकार संजय देव ने कहा कि कोरोनाकाल में खबरों की बाढ़ सी आ गई है लेकिन हमें तथ्यों की जांच-पड़ताल करके ही सही सूचनाओं को लोगों तक पहुंचाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आशंकाएं एवं समाधान हर जगह से अलग-अलग आ रही हैं, हमें गंभीरता से इन्हें समझते हुए पत्रकारिता करनी चाहिए। हमारा फर्ज बनता है कि हम अफवाहों, अटकलों एवं भ्रमों का निवारण करें और समाज में एक सकारात्मक माहौल का निर्माण करें। स्वास्थ्य पत्रकारिता में डर का वातावरण न बनाने की बात कहते हुए उन्होंने कहा कि हमें तथ्यों के दायरे में रहते हुए समाज में उपयोगी जानकारियों को पहुंचाना चाहिए।

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी ने विद्यार्थियों से कहा कि यदि आप स्वास्थ्य पत्रकारिता करना चाहते हैं इसमें विशेषज्ञता का होना बहुत आवश्यक है। आपको इससे संबंधित कुछ जरूरी जानकारियों का पता होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जांच-परख, तथ्य, कौशल एक स्वास्थ्य पत्रकार के पास होना जरूरी है। स्वास्थ्य पत्रकारिता बिना सिद्धांतों के नहीं करने की बात करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें वस्तुनिष्ठता, स्पष्टवादिता एवं परिशुद्धता का होना बहुत आवश्यक है। स्वास्थ्य पत्रकारिता को जिम्मेदारी की पत्रकारिता बताते हुए उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि वे समाज से हमदर्दी रखें, उनसे दूरी न बनाएं।

वरिष्ठ पत्रकार संजय अभिज्ञान ने कहा कि हेल्थ रिपोर्टिंग में खतरा बहुत है, क्योंकि फेक न्यूज से किसी के जीवन को बचाने की जगह उसे मौत के मुंह में भी पहुंचाया जा सकता है। अत: पत्रकारिता के विद्यार्थियों को इससे बचते हुए तथ्यपरक पत्रकारिता करनी चाहिए, पाठकों तक विश्वसनीय एवं सही सूचनाओं को पहुंचाना चाहिए। स्वास्थ्य पत्रकारिता का काम लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा करना है। उन्होंने विद्यार्थियों से समाज हित में कलम उठाकर स्वास्थ्य पत्रकारिता करने की बात कही।

कार्यशाला का समन्वय एवं संचालन वरिष्ठ सहायक प्राध्यापक लाल बहादुर ओझा ने किया। कार्यशाला में विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. (डॉ.) अविनाश वाजपेयी, यूनिवर्सिटी कैंपस मेंटर डॉ. मणिकंठन नायर, प्रोग्राम को-ऑर्डिनेटर अंकित पांडे, विश्वविद्यालय के जनसंचार, प्रबंधन एवं कंप्यूटर एवं अनुप्रयोग विभाग के साथ ही नोएडा, खंडवा एवं रीवा परिसर के विद्यार्थी भी ऑनलाइन उपस्थित थे।

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राजद्रोह और UAPA के तहत गिरफ्तार दो संपादकों को मिली जमानत, ये है मामला

मणिपुर पुलिस ने स्थानीय न्यूज पोर्टल के दो संपादकों को रविवार की सुबह हिरासत में लिया और सोमवार को उन्हें जमानत पर छोड़ दिया गया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 20 January, 2021
Last Modified:
Wednesday, 20 January, 2021
ManipurJournalist5

मणिपुर पुलिस ने स्थानीय न्यूज पोर्टल के दो संपादकों को रविवार की सुबह हिरासत में लिया और सोमवार को उन्हें जमानत पर छोड़ दिया गया। दरअसल पुलिस ने इन दोनों पत्रकारों को राज्य के विद्रोही आंदोलन से जुड़े एक लेख के प्रकाशन को लेकर गिरफ्तार किया था।

गिरफ्तार किए गए दोनों संपादकों की पहचान ‘द फ्रंटियर मणिपुर’ के कार्यकारी संपादक पोजेल चोबा और प्रधान संपादक धीरेन सदोकपम के रूप में की गई। दोनों को सोमवार की दोपहर करीब साढ़े तीन बजे जमानत पर छोड़ दिया गया। इस दौरान दोनों पत्रकारों ने पुलिस को लिखित में दिया है कि वे ऐसी गलती दोबारा नहीं करेंगे।

मीडिया रिपोर्ट्स ऐसी खबर सामने आई कि इन दोनों पत्रकारों के खिलाफ IPC की धारा 124A (देशद्रोह), 120B (आपराधिक साजिश), 505B (राज्य के खिलाफ अपराध को प्रेरित करना), धारा 34 (सामान्य इरादे) और आतंकवादी संगठनों का समर्थन करने के खिलाफ 'अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट' यानी UAPA की धारा 39 लगाई गई, लेकिन अब पुलिस ने अपनी एफआईआर में ऐसी कोई भी धारा नहीं लगाने की बात कही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मामले को देख रहे इम्फाल वेस्ट के पुलिस अधीक्षक के. मेघाचंद्र सिंह के मुताबिक, एक गलत लेख प्रकाशित करने के मामले में पुलिस ने दो पत्रकारों को हिरासत में लिया था, लेकिन अब दोनों को जमानत पर रिहा कर दिया गया है। इन पत्रकारों का 'द फ्रंटियर मणिपुर' नाम से एक फेसबुक वेब पेज है, जो पंजीकृत नहीं है और न ही इसका यहां कोई ऑफिस है। इन लोगों ने किसी अज्ञात व्यक्ति से वॉट्सऐप पर प्राप्त एक आर्टिकल को अपने वेब पोर्टल पर योगदानकर्ता के किसी भी प्रमाणीकरण के बिना प्रकाशित कर दिया। उस लेख में मणिपुर के विद्रोही संगठन से जुड़ी कई सारी गलत जानकारियां थीं। लेख में ऐसा कहा गया कि मणिपुर में विद्रोही आंदोलन भयावह हो रहा है और इस तरहसे लोगों में एक गलत संदेश गया, क्योंकि ऐसे बहुत से विद्रोही हैं जो मुख्यधारा में लौटे हैं।

वहीं बाद में ऑल मणिपुर वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के कई वरिष्ठ पत्रकारों ने इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह से भी मुलाक़ात की और उनसे इस मामले में कुछ सहानुभूति दिखाने की अपील की, चूंकि ऐसी गलती पहली दफा हुई है और सभी बातों पर दिए गए क्लेरिफिकेशन को ध्यान में रखते हुए उन्हें रिहा किया गया है।  

  

 

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